Sunday, April 12, 2026
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आखिर क्या है भारतीय सेना की नई प्रमोशन पॉलिसी?

आज हम आपको भारतीय सेना की नई प्रमोशन पॉलिसी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! भारतीय सेना में अब प्रमोशन बोर्ड साल में दो बार भी बैठ सकता है। इसी महीने से लागू नई प्रमोशन पॉलिसी में इसका प्रावधान किया गया है। अब तक साल में एक बार ही प्रमोशन बोर्ड बैठता था यानी एक बार ही तय होता था कि किसका प्रमोशन होना है या नहीं। सेना के एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि सेना की अलग अलग आर्म और सर्विस में अगर कोई पीछे छूट गया है तो उसे भी बराबरी पर ला सकें। साथ ही प्रमोशन पॉलिसी में पहले के सारे कंफ्यूजन को हटाया गया है। अब तक कई अलग अलग पॉलिसी लेटर के आधार पर प्रमोशन के नियम माने जाते थे और इसमें इसलिए कंफ्यूजन रहता था क्योंकि कोई पहली पॉलिसी लेटर का उल्लेख करता था तो कोई दूसरी पॉलिसी लेटर का। अब जो पॉलिसी बनाई गई है वह भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई है ताकि कम से कम 10 साल तक कोई बदलाव की जरूरत ना हो। इसमें संगठन के इंटरेस्ट को भी ध्यान में रखा है और सेना के सभी अधिकारियों की महत्वाकांक्षाओं का भी ख्याल रखा है। पहले पांच साल का डेटा देखकर अनुमान लगाते थे कि कर्नल के और ब्रिगेडियर के कितने पद खाली हो रहे हैं और उस हिसाब से ही प्रमोशन दिया जाता था। इसमें सिर्फ रिटायर होने वाले लोग ही नहीं होते बल्कि प्री मैच्योर रिटायरमेंट, डेपुटेशन पर जाने वाले लोग भी होते थे। इसमें त्रुटि का मार्जिन ज्यादा रहता था तो ओवर प्रमोशन हो जाते थे। इससे नई रैंक में पोस्ट पाने के लिए वेटिंग पीरियड ज्यादा हो जा रहा था और फिर हर प्रमोशन पर इसका असर दिख रहा था। अब तीन साल में कितने पद खाली होंगे इसका अनुमान एक साथ लगाया जाएगा जिससे त्रुटि की गुंजाइश कम होगी और फिर प्रमोशन पाने के बाद पोस्टिंग होने में वेटिंग पीरियड भी कम होगा।

इसके साथ ही नई प्रमोशन पॉलिसी में मेजर जनरल स्टाफ बनने वालों के लिए भी कैरियर में आगे का रास्ता खुल गया है। अब तक कोई अधिकारी मेजर जनरल स्टाफ बन जाते थे तो उनके कैरियर में फुल स्टाप लग जाता था और उन्हें फिर आगे प्रमोशन नहीं मिलता था। लेकिन अब मेजर जनरल स्टाफ का भी प्रमोशन हो सकेगा और वह लेफ्टिनेंट जनरल स्टाफ बन सकेंगे। यही नहीं इसी महीने से भारतीय सेना ने प्रमोशन की नई पॉलिसी लागू की है। इसमें ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे आर्मी फिट बनेगी। पॉलिसी के तहत सीनियर रैंक टू स्टार, थ्री स्टार जनरल में शेप-1 यानी मेडिकली फिट अधिकारी को ही प्रमोशन दिया जाएगा। अब तक स्टाफ पोस्टिंग में प्रमोशन के लिए यह नियम नहीं था, लेकिन अब स्टाफ पोस्टिंग भी पूरी तरह फिट ऑफिसर को ही मिलेगी। साथ ही, आर्मी अलग-अलग कोर्स के वेटेज को लेकर भी बदलाव करने की योजना बना रही है। इस बारे में स्टडी चल रही है। प्रमोशन के लिए कोर्स का वेटेज इस तरह करने की प्लानिंग है कि अफसर कोर्स के पीछे नहीं, एक्सपर्टीज यानी अपनी फील्ड में महारत पर फोकस करें।

सेना में स्टडी चल रही है कि प्रमोशन के लिए अलग-अलग कोर्स के जो नंबर दिए जाते हैं, उन्हें इस तरह बदला जाए कि अधिकारी अपनी फील्ड में महारत हासिल करने पर फोकस करें और इससे जुड़े कोर्स को प्राथमिकता दें। इसे क्वांटिफाइड सिस्टम ऑफ सिलेक्शन कहते हैं। एक अधिकारी ने उदाहरण दिया, जैसे अभी MTech करने पर कम वेटेज है और स्टाफ कॉलेज का ज्यादा वेटेज है, लेकिन अब इस पर फोकस किया जा रहा है कि अधिकारी अपनी फील्ड की एक्सपर्टीज पर जोर दें और उनके प्रमोशन के चांस भी प्रभावित ना हों। करीब छह महीने पहले इस बारे में स्टडी शुरू हुई है जिसे पूरा होने में कम से कम एक साल लगेगा।

नई प्रमोशन पॉलिसी में फिट रहने पर जोर दिया गया है। अगर ऑफिसर पूरी तरह फिट हैं, तभी कर्नल और ब्रिगेडियर रैंक में उन्हें कमांड पोजिशन दी जाएगी। अगर वह शेप-1 यानी एकदम फिट नहीं हैं, तो उन्हें स्टाफ पोस्टिंग ही मिलेगी। अब तक शेप-1 न होने पर भी मेजर जनरल या लेफ्टिनेंट जनरल बन जाया करते थे, लेकिन उन्हें स्टाफ पोस्टिंग ही मिलती थी। नई पॉलिसी में प्रावधान है कि अगर ऑफिसर मेडिकली फिट नहीं हैं, तो उन्हें प्रमोशन ही नहीं मिलेगा यानी वह ब्रिगेडियर से ऊपर प्रमोट नहीं किए जाएंगे। पूर्वी लद्दाख में जब चीन के साथ अचानक तनाव बढ़ा, तब कई अधिकारियों को तुरंत पीस पोस्टिंग से वहां भेजा गया। क्योंकि वहां तुरंत तैनाती बढ़ाने की जरूरत थी। बाद में यह तय किया गया कि शेप-1 को ही कमांड पोस्टिंग और सीनियर रैंक में प्रमोशन मिलेगा।

क्या गरीबी से निजात पा रहा है भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत गरीबी से निजात पा रहा है या नहीं! बीते नौ वर्षों में देश के लगभग 24.8 करोड़ लोगों का गरीबी से पीछा छूट गया। नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुआयामी गरीबी से मुक्ति पाने के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार ने सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की है। नीति आयोग के दो शीर्ष अधिकारियों ने सोमवार को नई रिसर्च रिपोर्ट जार की। रिसर्च में स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, मातृ स्वास्थ्य और बैंक खातों सहित 12 मापदंडों के आधार पर बहुआयामी गरीबी का आकलन किया गया है। इन कसौटियों के आधार पर तय गरीबों की आबादी 2022-23 में 11.3% तक कम होने का अनुमान है, जो 2019-21 में 15% और 2013-14 में 29.2% थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी से लड़ाई में इस बड़ी जीत की सराहना की। उन्होंने ट्वीट किया, ‘बहुत उत्साहजनक, समावेशी विकास को आगे बढ़ाने और हमारी अर्थव्यवस्था में परिवर्तनकारी बदलावों पर ध्यान देने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हम चौतरफा विकास की दिशा में काम करते रहेंगे और हर भारतीय के लिए समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करेंगे।’

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद और वरिष्ठ सलाहकार योगेश सुरी की तरफ से तैयार पेपर में दावा किया गया है कि अगले वित्त वर्ष 2024-25 तक भारत में गरीब आबादी का प्रतिशत सिंगल डिजिट में आ जाएगा। पेपर लिखने वालों का यह भी दावा है कि भारत 2030 तक अपने सभी आयामों में गरीबी को आधा करने के लक्ष्य से काफी आगे है। पेपर में कहा गया है, ‘एमपीआई बहुआयामी गरीबी सूचकांक के सभी 12 संकेतकों में इस अवधि के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है।’

हालांकि इसने कई मापदंडों के अनुमान नहीं बताए, लेकिन कहा गया कि पोषण अभियान, एनीमिया मुक्त भारत और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी पहलों ने मदद की है। इसमें कहा गया, ‘2013-14 से 2022-23 की अवधि के दौरान बहुआयामी गरीबी में गिरावट की दर में तेजी आई है। यह संभव हो पाया है क्योंकि खास तरह के वंचित पहलुओं में सुधार लाने के लिए सरकार ने कई पहल किए हैं और तरह-तरह की योजनाएं लागू की हैं।’ रमेश चंद ने पत्रकारों को बताया कि वित्त वर्ष 2023 तक के नौ वर्षों में कृषि क्षेत्र में वृद्धि किसी अन्य अवधि की तुलना में तेज हुई है।हालांकि, इसने चेतावनी दी कि गरीबी में कमी की गति तब तेज होती है जब स्तर अधिक होते हैं और आगे की गिरावट बाहरी कारकों से भी जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा, पेपर में जताए गए अनुमान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण पर आधारित हैं, जिसके लिए डेटा महामारी से पहले एकत्र किया गया था और ताजा अनुमान महामारी के प्रभाव का सटीक आकलन नहीं कर सकते।

कुल संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि उत्तर प्रदेश ने 5.9 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। उसके बाद बिहार का नंबर है जहां के 3.8 करोड़ लोग गरीबी के अभिशाप से मुक्त हुए। पेपर में कहा गया है, ‘यह भी देखा गया है कि जिन राज्यों में गरीबी की घटना अधिक है, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में गरीबी के अनुपात में अधिक कमी देखी है। इससे यह पता चलता है कि विभिन्न राज्यों में बहुआयामी गरीबी असमानता पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है।’ आपको बता दें कि भारत में आंकड़ों पर बहस चलती रहती है। पिछले साल आई वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी के मुताबिक 2011 में 22.5 फीसदी गरीबी थी जो 2019 में घटकर 10.2 फीसदी रह गई। यह आंकड़ा आईएमएफ के डेटा से मेल नहीं खाता है। अमेरिका का जाने माने ब्लॉगर-इकनॉमिस्ट Noah Smith ने World Poverty Clock और The Washington Post के एक चार्ट का हवाला देते हुए एक चार्ट ट्वीट किया है। इसके मुताबिक भारत में छह साल में गरीबी में भारी गिरावट आई है। 2016 में गरीबों की आबादी 12.4 करोड़ थी जो 2022 में 1.5 करोड़ रह गई है। मैं इसका विरोध करने की तैयारी कर रहा था कि तभी स्मिथ ने खुद ही कुछ और चार्ट ट्वीट कर दिए। इनमें अलग-अलग मान्यताओं के हिसाब से गरीबी के अलग-अलग अनुमान लगाए गए थे।

एक लंबे चार्ट में साल 2017 की 2.15 डॉलर की गरीबी रेखा को आधार बनाया गया था। इसके मुताबिक 1993 में देश में गरीबों की संख्या 47.6 फीसदी थी जो 2019 में घटकर 10 फीसदी रह गई है। इस दौरान गरीबी के अनुमान में लगातार गिरावट आई है फिर चाहे सरकार किसी भी पार्टी की रही हो। इसके लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों श्रेय ले सकती हैं। मनमोहन सिंह जब 2004 प्रधानमंत्री बने थे तो देश में गरीबी 39.9 परसेंट थी और 2014 में यह 18.7 फीसदी रह गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गरीबी में गिरावट जारी रही। 2019 में यह 10 फीसदी रह गई।

क्या पीएम मोदी के मूर्ति छूने से नाराज है शंकराचार्य?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शंकराचार्य पीएम मोदी के मूर्ति छूने से नाराज है या नहीं! पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उन्होंने इसे लेकर कहा है कि वह अयोध्या नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान है। उन्होंने कहा कि वहां पीएम नरेंद्र मोदी मूर्ति का लोकार्पण करेंगे और उसे स्पर्श करेंगे। क्या मैं वहां ताली बजा-बजाकर जय-जय करूंगा? शंकराचार्य के इस बयान के बाद से कंट्रोवर्सी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के मूर्ति को स्पर्श करने को शंकराचार्य द्वारा रेखांकित करने पर पुराने विवाद की यादें भी ताजा हो गई हैं। साथ ही सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसे समय में जब नरेंद्र मोदी को सनातन धर्म के प्रतीकों के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है तब स्वामी निश्चलानंद उनसे नाराज क्यों हैं? और ऐसे बागी बयान क्यों दे रहे हैं? गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती उर्फ नीलाम्बर का जन्म बिहार में हुआ था। 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में लगभग 31 साल की आयु में स्वामी करपात्री महाराज के सान्निध्य में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इसके बाद से वह नीलाम्बर से स्वामी निश्चलानंद हो गए थे। पुरी के 144वें शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी मानकर 9 फरवरी 1992 को पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर आसीन किया था।

राम मंदिर आंदोलन के बहाने धर्म और राजनीति के आपस में घुल-मिल जाने के दौर में तमाम संत खुलकर अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने लगे हैं। अयोध्या के तमाम मठों के महंत और शंकराचार्य भी राजनैतिक पार्टियों के समर्थन में यदा-कदा नजर आते हैं। ऐसे माहौल में भी पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद इस बात पर भरोसा करते हैं कि शंकराचार्य का पद किसी पार्टी को समर्थन देने वाला नहीं बल्कि शासकों पर शासन करने वाला पद है। उनकी वेबसाइट पर यह वाक्य प्रमुखता से दर्ज भी है। ऐसे में उनकी इस सैद्धांतिकी में पीएम मोदी से उनका विरोध काफी हद तक समझा भी जा सकता है।

निश्चलानंद स्वामी राजनीति में संतों का इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति से भी नाराज दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने इसे लेकर एक बयान दिया था कि सियासी पार्टियां पहले संतों को अपना स्टार प्रचारक बनाती हैं और बाद में उन्हें मौनी बाबा बना देती हैं। उन्होंने श्री-श्री रविशंकर और योग गुरु बाबा रामदेव का उदाहरण भी दिया। उन्होंने किसी पार्टी का नाम लिए बिना कहा था कि पहले राजनैतिक दल ने दोनों का भरपूर इस्तेमाल किया। शासन सत्ता पाते ही उन्हें मौनी बाबा बना दिया गया। स्वामी निश्चलादनंद की भाजपा से नाराजगी क्या है, इसका जवाब साफतौर पर नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अपने बयानों में जब-तब उन्होंने भाजपा नेताओं और संघ प्रमुख को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की इसलिए निंदा की थी कि वह भाजपा के प्रचारक बन गए हैं। इसके अलावा हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था पर बयान देने वाले मोहन भागवत के लिए कहा था कि उनके पास ज्ञान की कमी है। इतना ही नहीं, हिंदू मंदिरों में सरकार के हस्तक्षेप से भी निश्चलानंद को दिक्कत है। अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि मंदिरों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और ट्रस्ट को सक्षम बनकर मंदिरों में बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए। मंदिरों के लगातार हो रहे ‘कॉरिडोरीकरण’ का भी निश्चलानंद ने अक्सर विरोध किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वामी निश्चलानंद कभी प्रशंसा करते हैं तो कभी उनसे नाराज भी रहते हैं। उनके बयानों से लगता है कि राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज्यादा उपस्थिति भी उनकी आपत्ति का कारण है। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान उन्होंने इसे लेकर बड़ा बयान दिया था। निश्चलानंद ने सवालिया लहजे में कहा था कि राम जन्मभूमि को लेकर मोदी की क्या भूमिका रही थी? राम मंदिर निर्माण को लेकर क्या उनका एक भी भाषण सुनने को मिलेगा। अयोध्या न जाने के लिए स्वामी निश्चलानंद ने जो कारण गिनाया है, उसमें उन्होंने कहा है, ‘मोदी लोकार्पण करें। मूर्ति को स्पर्श करेंगे, तो मैं वहां ताली बजाकर जय-जयकार करूंगा क्या?’ उनके इस बयान के तमाम मतलब भी निकाले जा रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से दिक्कत है। इस संदर्भ में एक पुराने विवाद की भी चर्चा चल पड़ी है। दरअसल, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश की इजाजत नहीं थी। साल 1958 में काफी लंबी लड़ाई के बाद दलितों को प्रवेश का मौका मिला। तब जैसे ही दलितों ने मंदिर में शिवलिंग को छुआ, तब करपात्री महाराज ने इसका विरोध किया था। उन्होंने विश्वनाथ मंदिर को अछूत घोषित कर दिया और काशी में ही गंगा के तट पर एक दूसरा काशी विश्वनाथ बनवा डाला था।

इन्हीं करपात्री महाराज के सान्निध्य में निश्चलानंद ने भी संन्यास ग्रहण किया है। ऐसे में इस पुराने विवाद को नरेंद्र मोदी के रामलला की मूर्ति के स्पर्श करने को लेकर शंकराचार्य की जताई जा रही कथित आपत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

आखिर कौन है शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

आज हम आपको शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बारे में बताने वाले हैं! रामलला के प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हिंदू समाज में जहां एक तरफ खुशी की लहर है तो वहीं संत समाज के एक धड़े की तरफ से आपत्ति भी सामने आई है। इस पर आपत्ति जताने वाले उत्तराखंड ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद हैं। उन्होंने अधूरे या निर्माणाधीन मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा किए जाने पर ऐतराज जताया है। उन्होंने शास्त्रों को हवाला दिए बिना ही सिर या आंखों की मूर्ति शरीर में प्राण प्रतिष्ठा को गलत करार दिया है। यह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आखिर हैं कौन, जान लीजिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अयोध्या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर सवाल उठाया है। दरअसल, सितंबर 2022 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद पर समाधि से पहले उत्तराधिकारियों का चयन कर लिया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ का प्रमुख बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि चारों शंकराचार्यों को प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण नहीं आया, इसलिए वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रहे हैं। हालांकि स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रोक लगने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने पट्टाभिषेक करवाया और अब अपने आप को शंकराचार्य लिख रहे हैं जो कि सरासर गलत है। इन पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए।

प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को जन्मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नाम उमाशंकर पांडेय था। कक्षा 6 तक की पढ़ाई गांव में ही करने के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए बाहर भेज दिया गया। एक बार उनके पिता उन्हें गुजरात ले गए, वहां पर काशी के संत रामचैतन्य से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने बेटे को वहीं पर छोड़ दिया। तबसे यहीं पर रहकर उमाशंकर पूजन पाठ और पढ़ाई में रम गए। गुजरात में रहकर अगले कुछ साल तक पढ़ाई करने के बाद उमाशंकर फिर वाराणसी पहुंचे। वहां पर उनकी मुलाकात स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई। इसके बाद उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। साल 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए। इसके बाद उमाशंकर पांडे से वह दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बन गए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान किया था। पुलिस प्रशासन की तरफ से रोके जाने के बाद वे 108 घंटे तक अनशन पर बैठे रहे। मंदिर भगवान का शरीर होता है, उसके अंदर की मूर्ति आत्मा होती है। बता दें कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है।उसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कहने पर उन्होंने अनशन को समाप्त कर लिया था।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि मंदिर में अगर प्रतिष्ठा हो रही तो मंदिर पूरा बना हुआ होना चाहिए। अगर चबूतरे पर प्रतिष्ठा हो रही है तो चबूतरा पूरा बना होना चाहिए। यही इतनी बात कुछ लोगों को समझ नहीं आ रही है क्योंकि उन्हें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। ऐसे लोग कहते हैं कि गर्भगृह तो बन गया है बाकी भले नहीं बना। अधिकतर लोग समझते हैं कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा होनी है, जबकि ऐसा नहीं है। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होनी है।’

स्वामी ने आगे बात कहते हुए कहा, ‘मंदिर भगवान का शरीर होता है, उसके अंदर की मूर्ति आत्मा होती है। बता दें कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रोक लगने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने पट्टाभिषेक करवाया और अब अपने आप को शंकराचार्य लिख रहे हैं जो कि सरासर गलत है। इन पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान किया था। पुलिस प्रशासन की तरफ से रोके जाने के बाद वे 108 घंटे तक अनशन पर बैठे रहे। उसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कहने पर उन्होंने अनशन को समाप्त कर लिया था।मंदिर का शिखर भगवान की आंखें हैं। कलश भगवान का सिर है और मंदिर में लगा झंडा भगवान के बाल हैं। बिना सिर या आंखों के शरीर में प्राण-प्रतिष्ठा करना सही नहीं है। यह हमारे शास्त्रों के खिलाफ है।’

2024 में कैसे और किन लोगों को मिलेगा बीजेपी से टिकट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि 2024 में बीजेपी से किन लोगों को कैसे टिकट मिलेगा! 2024 के लोकसभा चुनाव के बीजेपी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बीजेपी ने इस बार 10 फीसदी वोट बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पिछले चुनाव में बीजेपी ने 37.36 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 303 सीटें जीती थीं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी ने सभी घोड़े खोल दिए हैं। पिछले दो साल से ग्राउंड लेवल पर बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक्टिव हैं। पार्टी के कार्यकर्ता, विधायक और सांसद पीएम मोदी के दस साल की उपलब्धि के साथ जनसंपर्क में जुट गए हैं। चुनाव की कमान पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने संभाली है। तीसरी बार लगातार जीत के लिए पार्टी कई ऐसे प्रयोग करने जा रही है, जिसे पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाया जा चुका है। चर्चा है कि केंद्रीय नेतृत्व मौजूदा सांसदों के परफॉर्मेंस का आकलन कर रही है। प्रदेश के पदाधिकारियों से फीडबैक लिए जा चुके हैं। टिकट फाइनल करने से पहले हर संसदीय क्षेत्र में कमेटियां जाएंगी और केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट देगी। इसके अलावा जातीय और सामाजिक समीकरणों के आधार पर नए चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी है। ऐसा माना जा रहा है कि बिहार में इस बार आईएएस और आईपीएस रहे कई युवा ऐसे चेहरों को बीजेपी टिकट देगी, जिनकी छवि तेजतर्रार अफसरों की रही है। बताया जा रहा है कि पार्टी बीजेपी शासित राज्यों में मंत्रियों, विधायकों और पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा चर्चित नेताओं को मैदान में उतारेगी। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, केशव प्रसाद मौर्य और जतिन प्रसाद भी लोकसभा प्रत्याशी बनाए जा सकते हैं। 2019 में भी बीजेपी ने योगी सरकार के चार मंत्रियों रीता बहुगुणा जोशी, सत्यदेव पचौरी, मुकुट बिहारी वर्मा और एस पी सिंह बघेल को चुनाव में उतारा था। मुकुट बिहारी वर्मा को छोड़कर सभी मंत्री चुनाव जीतने में सफल रहे थे। केशव मौर्य को एक बार फिर फूलपुर से उतारने की चर्चा है। जतिन प्रसाद अपनी परंपरागत सीट शाहजहांपुर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। इसके अलावा मंत्री दयाशंकर मिश्रा को भी लोकसभा में जोर आजमाइश करनी होगी। ऐसा प्रयोग राजस्थान और मध्यप्रदेश में किया जाएगा। राजस्थान में विधानसभा हार चुके राजेंद्र राठौर और सतीश पूनिया पर बीजेपी दांव लगाएगी। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को विदिशा या भोपाल लोकसभा सीट से लड़ाया जा सकता है। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष बी डी शर्मा और नरोत्तम मिश्रा के नाम पर कैंडिडेट की लिस्ट में हो सकता है। ऐसा ही प्रयोग महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में भी आजमाया जाएगा।

2024 के लोकसभा चुनाव में ऐसे मंत्रियों को भी चुनाव लड़ाया जाएगा, जो फिलहाल राज्यसभा में हैं। पीएम नरेंद्र मोदी खुद ही संसदीय दल की बैठक में इस प्रस्ताव को लेकर आए थे। इस लिस्ट में उन नेताओं के नाम हैं, जो दो बार लगातार राज्यसभा का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। पिछले चुनाव में पटना साहिब सीट पर रविशंकर प्रसाद और अमेठी में स्मृति ईरानी को चुनाव में उतारा गया था और दोनों जीतने में सफल रहे थे। अगले चुनाव के लिए इसमें धर्मेंद्र प्रधान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, गजेंद्र शेखावत का नाम टॉप पर है। इसके अलावा निर्मला सीतारमन, अश्विनी वैष्णव, भूपेंद्र यादव, नारायण राणे,पुरुषोत्तम रुपाला, हरदीप सिंह पुरी, राजीव चंद्रशेखर और पीयूष गोयल जैसे दिग्गजों के नाम भी शामिल हैं। धर्मेंद्र प्रधान अपने गृह राज्य ओडिशा से चुनाव लड़ेंगे। हरदीप सिंह पुरी को दिल्ली और भूपेंद्र यादव को हरियाणा से उतारा जा सकता है। पुरुषोत्तम रूपाला और पीयूष गोयल गुजरात से चुनावी मैदान में उतरेंगे। निर्मला सीतारमन को केरल और राजीव चंद्रशेखर कर्नाटक से चुनावी ताल ठोकेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और नारायण राणे को महाराष्ट्र में अपनी ताकत दिखानी होगी। झारखंड की हजारीबाग सीट से राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश को मौका दिया जा सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह टिकट बंटवारे में गुजरात का फॉर्मूला लागू करेगी। 70 प्लस की उम्र और परफॉर्मेंस की कसौटी पर खरे नहीं उतरने वाले करीब 30 फीसदी मौजूदा सांसदों का टिकट सकता है। टिकट कटने वालों लोकसभा सांसदों की संख्या 65 से 70 तक हो सकती है। इन सीटों पर नए चेहरों, राज्यसभा सांसदों और दिग्गज नेताओं को उतारा जाएगा। इसके अलावा दूसरे पार्टी से आने वाले दिग्गजों को भी इन सीटों पर टिकट दिया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार, अमित शाह की कैंची यूपी और बिहार में ज्यादा चलेगी। बिहार की कटौती वाली लिस्ट में केंद्रीय मंत्री समेत कई चौंकाने वाले नाम भी हो सकते हैं। बंगाल, हरियाणा, असम, उत्तराखंड और झारखंड में भी बड़े पैमाने पर प्रत्याशी बदले जा सकते हैं। जातीय समीकरणों के आधार पर इनमें में कई नेताओं को राज्यसभा में लाया जाएगा या दूसरे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति हो सकती है। बीजेपी इस प्रयोग को गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों में आजमा चुकी है, जहां से उसे बेहतर नतीजे मिले हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के पास दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहला 2019 में बीजेपी 436 सीटों पर चुनाव लड़ी और 133 सीटों पर हार गई। 2024 में उन सीटों को जीतना आसान नहीं है। दूसरा, पिछले पांच साल में कई राज्यों में एडीए गठबंधन के पुराने साथी विपक्ष के खेमे में जा चुके हैं। बिहार में जेडी यू, पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना यूबीटी अब अलायंस के पार्टनर नहीं रहे। अलायंस बदलने से तीन राज्यों की 56 सीटों का समीकरण बदल गया है। इन सीटों पर अब बीजेपी अपने उम्मीदवार उतारेगी। बिहार, पंजाब और महाराष्ट्र की कुल 25-30 सीटों पर बीजेपी को नए सिरे से जिताऊ कैंडिडेट की तलाश करनी होगी। महाराष्ट्र में शिवसेना शिंदे और एनसीपी अजित गुट गठबंधन में शामिल हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए पार्टी ने प्लानिंग कर ली है। कमजोर यानी पिछले चुनाव में हारी हुई सीटों पर 22 जनवरी के बाद कभी भी कैंडिडेट की लिस्ट जारी हो सकती है। इसके अलावा नई सीटों पर भी फरवरी के अंत तक उम्मीदवारों की घोषणा कर दी जाएगी। इन क्षेत्रों में पीएम नरेंद्र मोदी की रैली भी पहले चरण में होगी।

आखिर दारा सिंह चौहान को बीजेपी से क्यों मिल रहा है बार-बार मौका?

वर्तमान में दारा सिंह चौहान को बीजेपी से लगातार मौका मिलने जा रहा है! उत्तर प्रदेश में मऊ जिले के घोसी विधानसभा सीट के पूर्व विधायक, पूर्व मंत्री और प्रदेश के कद्दावर नेता दारा सिंह चौहान का जलवा बरकरार है। घोसी विधानसभा उपचुनावमें सपा से मिली करारी हार के बाद भी भाजपा का दारा मोह कम नहीं हुआ है। भाजपा ने एक बार फिर दारा पर भरोसा जताते हुए अबकी विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया है। मंगलवार को भाजपा के केंद्रीय कार्यालय ने दारा सिंह चौहान के उम्मीदवारी पर मोहर लगाते हुए इन्हें विधान परिषद उपचुनाव का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। दारा सिंह चौहान को प्रदेश की राजनीति में मौसम वैज्ञानिक माना जाता है। लोगों का ऐसा मानना भी है की दारा सिंह चौहान हमेशा सत्ता के करीब रहे हैं चाहे सत्ता किसी पार्टी की रही हो। दारा सिंह चौहान का राजनीतिक इतिहास भी इसी इशारा करता है। सत्ता के करीब रहने के लिए दारा सिंह चौहान हमेशा पाला बदलने में माहिर रहे हैं कभी बसपा, कभी सपा तो कभी बीजेपी। 2017 में योगी सरकार में वन मंत्री के पद पर रहने वाले तारा सिंह चौहान 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर पिछड़ों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए सपा के खेमे में शामिल हो गए लेकिन जब चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में आए तो 1 साल के भीतर ही दारा सिंह चौहान ने अपना पाला बदलते हुए फिर से भाजपा का दामन थाम लिया।

सपा का साथ छोड़ने के साथ-साथ दारा सिंह चौहान ने अपने विधायकी से भी इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद घोसी विधानसभा की सीट रिक्त हो गई थी। निर्वाचन आयोग ने इस सीट पर 2023 में उपचुनाव की घोषणा कर दी थी। उपचुनाव में दारा सिंह चौहान ने फिर से भाजपा का दामन थामा और भाजपा प्रत्याशी के रूप में इसी विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में कूद पड़े। हालांकि इस बार उनका मुकाबला सपा के सुधाकर सिंह से था। पूर्व विधायक सुधाकर सिंह क्षेत्रीय राजनीति में अपना दबदबा रखते हैं । सुधाकर सिंह घोसी की जनता को यह समझाने में सफल रहे की दारा सिंह चौहान मौका परस्त हैं और बार-बार अपने लाभ के लिए दल बदलने की कोशिश करते हैं उन्होंने घोसी से क्षेत्रीय नेता को जिताने की अपील भी की थी जिसके बाद सुधाकर ने इस उप चुनाव को क्षेत्रीय बनाम बाहरी बनाते हुए दारा सिंह चौहान को करारी शिकायत दे दी।

दारा सिंह चौहान को सपने में भी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि जिस सीट पर वह 2022विधनसभा चुनाव में इतनी आसानी से कब्जा जमा चुके थे उस पर उनको इतनी करारी हार का सामना करना पड़ेगा। मन में मंत्री पद का सपना सजा दारा सिंह चौहान को इस उपचुनाव में मायूसी हाथ लगी लेकिन दारा सिंह चौहान लगातार भाजपा के शीर्ष नेताओं के संपर्क में बने रहे। भाजपा द्वारा विधान परिषद उपचुनाव में दारा सिंह चौहान को प्रत्याशी बनाए जाने पर क्षेत्र के लोगों ने अपनी-अपनी राय दी है। क्षेत्र के प्रवीण राय ने कहा कि भाजपा के पास पूर्वांचल में कोई बड़ा चौहान चेहरा नहीं है, जिसके कारण दारा सिंह चौहान को टिकट देना भाजपा की मजबूरी बन जाती है। वहीं पत्रकार श्री राम जायसवाल ने बताया कि पूर्वांचल के कुछ सीटों पर दारा सिंह चौहान वोटरों पर अपनी पकड़ रखते हैं और 2024 में भाजपा चौहान वोटरों को साधने के लिए दारा सिंह चौहान पर अपना दांव खेल रही है। मॉर्निंग वॉक्स सिंडिकेट के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ अरुण सिंह का मानना है कि दारा सिंह चौहान भाजपा के बड़े नेताओं के करीबी हैं जिसके कारण भाजपा से टिकट पा जाते हैं वही क्षत्रिय महासभा के जन्मेजय सिंह ने कहा कि करारी हार के बाद भी भाजपा का बार-बार दारा सिंह चौहान पर दांव लगाना भाजपा की इमेज खराब कर रहा है मिशन 2024 में भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

विधानसभा उपचुनाव 2023 के करारी हार के बाद भी भाजपा ने दारा सिंह चौहान पर विश्वास जताते हुए उनको फिर से विधान परिषद उपचुनाव का प्रत्याशी बनाया है। दारा सिंह चौहान को विधान परिषद उपचुनाव में प्रत्याशी घोषित करने के पीछे भाजपा की नजरे लोकसभा चुनाव 2024 पर टिकी हुई हैं ऐसा माना जाता है कि दारा सिंह चौहान के जरिए भाजपा चौहान वोटरों को अपनी तरफ खींचने की फिराक में हैं अब देखना है दिलचस्प होगा कि भाजपा का दर मोह आगे कहां तक सफल हो पाता है।

जब पहली बार तय की गई राम मंदिर आंदोलन की दिशा!

एक ऐसा समय जब पहली बार राम मंदिर आंदोलन की दिशा तय की गई थी! प्रभु रामलला 1990 आते- आते पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन गए थे। विवादित परिसर में मंदिर का निर्माण होगा या नहीं, यह राजनीतिक रैलियों का मुद्दा बन गया था। मंदिर बनेगा तो कैसे बनेगा? यह सवाल भी उठने लगा था। 1853 और 1934 में मस्जिद को ध्वस्त करने की दो नाकाम कोशिशें हो चुकी थीं। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने 30 अक्टूबर 1990 को पहुंचे रामभक्त कारसेवक गोलीकांड का शिकार हुए थे। कारसेवकों की मौत ने देश के हिंदू समाज को आक्रोशित कर दिया था। मुलायम सिंह सरकार के खिलाफ जनाक्रोश लगातार बढ़ रहा था। कुछ यही हाल केंद्र की वीपी सिंह सरकार का था। 1990 की घटनाओं ने यूपी ही नहीं देश की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर दिया था। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रही थी। वहीं, दूसरी तरफ जनता दल की ओर से कांग्रेस के बने- बनाए सामाजिक समीकरण में सेंधमारी शुरू कर दी थी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का राजनीतिक उभार हो चुका था। बीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन को लागू कर ओबीसी वर्ग को राजनीतिक तौर पर सजग कर दिया था। ओबीसी वर्ग राजनीतिक तौर पर जागरूक हुआ तो लीडरशिप में भागीदारी की मांग तेज हो गई। इसके साथ ही राम मंदिर का मुद्दा और गहराना शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने जातियों की राजनीति के बीच हिंदू धर्म को आधार पर तमाम वर्गों को जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। 1990 की कारसेवकों पर गोलीकांड की घटना ने देश को राजनीतिक तौर पर झकझोड़ दिया था। राम मंदिर का मुद्दा अब आंदोलन से उन्माद की तरफ बढ़ने लगा। अयोध्या में ‘लंका कांड’ की शुरुआत हो चुकी थी। युद्ध का बिगुल बज चुका था। ऐसे में दो बड़ी घटनाएं हुई। पहली देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद अल्पमत में आ गई थी। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। 10 नवंबर 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई। जनता दल के दूसरे धड़े के नेता चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। इस बार चंद्रशेखर को समर्थन कांग्रेस ने दिया। 2 दिसंबर 1989 को बनी वीपी सिंह सरकार अपने एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। जनता दल में एक और दरार की पटकथा मुलायम- लालू लिख चुके थे। वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर की सरकार बनी, लेकिन यह कांग्रेस की एक सोची- समझी राजनीति थी। दरअसल, कांग्रेस कारसेवकों पर गोलीकांड के कारण भाजपा को किसी राजनीतिक लाभ लेने से वंचित रखना चाहती थी। ऐसे में अयोध्या एक बार फिर राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका था। मेरे राम पर बड़ी राजनीतिक संघर्ष का यह आरंभ था।

1990 में मुलायम सरकार ने 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा कर देश की राजनीति को बदल दिया। यूपी से देश तक इसका अलग संदेश गया। हालांकि, 1989 में राजीव सरकार के पतन और वीपी सिंह सरकार के गठन के बाद राम एक मुद्दा बन चुके थे। वीपी सिंह सरकार में शामिल भाजपा इस मुद्दे को छोड़ने को तैयार नहीं थी। लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा के ऐलान के साथ वीपी सिंह सरकार ने हिंदू- मुस्लिम पक्ष के बीच वार्ता के जरिए मुद्दे का हल निकालने की पहल की। हालांकि, यह कोशिश आगे नहीं बढ़ पाई। ऐसे में वीपी सिंह सरकार ने एक ऐसा आदेश दिया, जिसने मेरे प्रभु राम के मंदिर के बनने की आस दिखने लगी। वीपी सिंह सरकार ने विवादित स्थल के अधिग्रहण का आदेश जारी कर दिया। वीपी सिंह सरकार की ओर से जारी भूमि अधिग्रहण के अध्यादेश का मुस्लिम पक्ष की ओर से जोरदार विरोध शुरू हो गया। वीपी सिंह सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। भाजपा ने सरकार के इस कदम को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ा।

वीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने। कांग्रेस की पहल पर 1989 में अयोध्या राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ था। ऐसे में कांग्रेस फिर एक्टिव हुई। वीपी सिंह जिस वार्ता की योजना बना रहे थे। हिंदू- मुस्लिम पक्ष को एक राय बनाने के लिए वार्ता के मंच तक जाने की कोशिश की गई। पीएम चंद्रशेखर ने राम मंदिर मुद्दे पर वार्ता के लिए अपनी सरकार में मंत्री सुबोध कांत सहाय और तीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, भैरों सिंह शेखावत और शरद पवार की एक कमेटी गठित की। इस कमेटी को हिंदू और मुस्लिम पक्ष से वार्ता कर मुद्दे के समाधान की राह निकालने को तैयार किया गया था। सरकार की कमेटी के नेतृत्व में दोनों पक्ष मिले। हिंदू और मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रमाणों को पेश किया गया।

मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधि इतिहासकारों ने अयोध्या में मौका मुआयना करके दोबारा बातचीत में आने को कहा। 25 जनवरी 1991 को यह वार्ता टूट गई। पीएम चंद्रशेखर के मित्र तांत्रिक चंद्रास्वामी ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा लिया। लेकिन, कोई नतीजा नहीं निकला। इसी दौरान कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार गिर गई। बातचीत का सिलसिला खत्म हो गया। इसके बाद अगले तीन दशकों तक राम मंदिर चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बनकर चलता रहा।

देश में चंद्रशेखर को एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर कांग्रेस ने अपने चुनावी कैंपेन की शुरुआत कर दी। कांग्रेस देश में आम चुनाव की तैयारी कर ली थी। लेकिन, यूपी में पार्टी मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति पर काम कर रही थी। कांग्रेस की रणनीति थी कि यूपी में मुलायम को अल्पमत की सरकार साबित कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए। दरअसल, 1989 के यूपी चुनाव में जनता दल यूपी की 425 सीटों वाली विधानसभा में 208 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस 94 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। भाजपा 57 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। मुलायम वीपी सिंह और चौधरी देवीलाल के समर्थन से यूपी में मुख्यमंत्री बन गए। वीपी सिंह सरकार गिरने के बाद मुलायम ने पाला बदला। पीएम चंद्रशेखर के समाजवादी जनता दल का दामन थाम लिया। कांग्रेस के चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद कांग्रेस मुलायम सरकार को भी गिराने की तैयारी में थी।

अप्रैल 1990 में एक रात दिल्ली में कांग्रेस ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति बनाई। अगले दिन राजभवन को कांग्रेस मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने वाली थी। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने इस मामले की जानकारी मुलायम तक पहुंचा दी। लखनऊ में मुलायम सिंह यादव ने अपने- अपने बंगलों में सो रहे सभी मंत्रियों को जगाया। कैबिनेट की आपात बैठक हुई। ‘बाई सर्कुलेशन’ कैबिनेट से इस प्रस्ताव की मंजूरी ली गई कि मंत्रिपरिषद विधानसभा भंग कर नए विधानसभा चुनाव की सिफारिश करती है। कांग्रेस का खेल खराब हो गया और प्रदेश में चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई।

अक्टूबर- नवंबर 1990 में अयोध्या में जिस प्रकार से कारसेवकों पर गोलियां चली। लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया, उसने देश में अलग ही माहौल बना दिया। देश में मंडल कमीशन के बाद की राजनीति के बाद बदले सामाजिक समीकरणों से उपजे नेता राज्यों की कमान संभाल रहे थे। देश की आजादी के बाद बड़े स्तर पर समीकरणों में बदलाव हो रहा था। कांग्रेस से सवर्ण वोट बैंक किनारे हो रहा था। मंडल कमीशन के मुद्दे के बाद ओबीसी वोट बैंट भी छिटका। कांग्रेस की सबसे बड़ी समर्थक मुस्लिम वोट बैंक ने भी 1986 में राम मंदिर का ताला खोलने और 1989 में शिलान्यास कार्यक्रम की मंजूरी से नाराज हो गई। क्षेत्रीय क्षत्रपों के दलों ने इस राजनीति पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया। इसके बाद भी कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी हुई थी। पावर पॉलिटिक्स में बाउंस बैक करने का दम रखती थी। ऐसे में राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार पर जासूसी का आरोप लगाया। चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया गया।

चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद देश में मध्यावधि चुनावों की घोषणा हुई। 20 मई से वोटिंग का ऐलान चुनाव आयोग की ओर से किया गया। कांग्रेस ने अपना जोरदार प्रचार अभियान शुरू किया। अल्पसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी से चिंतित राजीव गांधी इस बार राम मंदिर के मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचते दिख रहे थे। देश में पहले चरण की वोटिंग के बाद राजीव गांधी प्रचार अभियान के लिए तमिलनाडु के श्रीपेररुंबदूर पहुंचे थे। वहां पर बम विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर का साथ मिला। चुनाव आयोग ने इस घटना के बाद 12 और 15 जून को वोटिंग का ऐलान किया। राजीव हत्याकांड से मंडल और कमंडल दोनों कमजोर हुआ।

लोकसभा चुनाव 1991 में कांग्रेस ने 36.26 फीसदी वोट शेयर के साथ 232 सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि, कांग्रेस बहुमत के 268 सीटों के आंकड़े से 36 सीट कम रह गई थी। हालांकि, पार्टी ने पर्याप्त बहुमत जुटाया और पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। इस चुनाव में कमंडल का जोर दिखा। अपने तीसरे लोकसभा चुनाव में भाजपा 20.11 फीसदी वोट शेयर के साथ देश की 120 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। आठ साल से भी कम समय में पार्टी 2 से 120 तक पहुंच चुकी थी। यह राम मंदिर मुद्दे का परिणाम था। इस चुनाव में जनता दल 59 और माकपा 35 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही।

क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन का खेल बिगाड़ेगी बसपा?

विपक्ष के INDIA गठबंधन का बसपा खेल बिगाड़ सकती है! बहुजन समाज पार्टी बसपा प्रमुख मायावती की आगामी लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा हिंदी पट्टी के सर्वाधिक सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन इंडिया को नुकसान पहुंचा सकती है।आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस वाईएसआरसीपी, तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति बीआरएस और ओडिशा में बीजू जनता दल जैसे अन्य क्षेत्रीय दल भी अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे और इन राज्यों में इन दलों को तीसरी ताकत के रूप में देखा जा रहा है। कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर ने पहले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ जाने का फैसला कर लिया है। बसपा की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने 68वें जन्मदिन पर सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले ही लड़ेगी लेकिन चुनाव के बाद सरकार बनाने वाली पार्टी को उचित भागीदारी के साथ समर्थन देगी। मायावती ने उनके राजनीति से संन्यास लेने की खबरों को आधारहीन बताते हुए कहा मैं अंतिम सांस तक पार्टी को मजबूत करती रहूंगी। कांग्रेस ने पिछले साल फरवरी में अपने रायपुर अधिवेशन के घोषणापत्र में कहा था कि किसी तीसरी ताकत के उभरने से भाजपा/राजग को फायदा होगा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राजग से वैचारिक आधार पर मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकजुटता की तत्काल आवश्यकता है। कांग्रेस ने इस बात से इनकार किया है कि उसका कोई भी नेता बसपा नेतृत्व के संपर्क में था। हालांकि, सूत्रों ने कहा कि बसपा के साथ अनौपचारिक बातचीत चल रही थी। कहा था कि बसपा को इंडिया गठबंधन में शामिल होने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

सपा और बसपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में 38-38 सीटों पर मिलकर लड़ा था और अमेठी और रायबरेली सीटों पर कांग्रेस के खिलाफ अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। तब उत्तर प्रदेश में महागठबंधन के तहत बसपा ने जहां 10 सीटें जीती थीं, वहीं सपा ने पांच सीटें जीती थीं। भाजपा प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा मायावती जी ने दुर्घटनाग्रस्त हो रहे विमान ‘इंडि’ इंडिया गठबंधन पर सवार होने से इनकार कर दिया है, जिसके पायलट आंखों पर पट्टी बांधकर उड़ान भर रहे हैं।

बता दे कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपने बर्थ डे पर इंडिया गठबंधन को बड़ा सरप्राइज दिया। इंडिया गठबंधन में शामिल होने के अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के यूपी प्रभारी ने बहुजन समाज पार्टी बीएसपी से चुनावी तालमेल को हवा दी थी। बसपा प्रमुख ने अखिलेश यादव को भी खरी-खोटी सुनाते हुए सपा के फ्रेंडली फाइट के मंसूबे पर भी पानी फेर दिया। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, इनसे बचकर रहना चाहिए। मायावती ने कहा कि विरोधी दल उनके संन्यास की अफवाह फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अभी संन्यास लेने वाली नहीं हैं। वह अंतिम समय तक पार्टी के लिए काम करती रहेंगी। बीएसपी चीफ के ऐलान के बाद तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश में 2024 का लोकसभा चुनाव त्रिकोणीय होगा। बीजेपी, बीएसपी और सपा-रालोद-कांग्रेस के गठबंधन के बीच यूपी में फाइनल मुकाबला होगा। मायावती के फैसले से बीजेपी नेताओं ने राहत की सांस ली होगी, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट के मंसूबे भी ध्वस्त हो गए हैं।

2024 में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने सभी लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट का फॉर्मूला दिया था। इंडिया गठबंधन भी इस फॉर्मूले पर राजी था। विपक्षी दलों को कोशिश है कि 2024 में बीजेपी के सामने विपक्ष की ओर से सिर्फ एक उम्मीदवार हो। 1977 के लोकसभा चुनाव में तब के विपक्षी दलों ने जनता पार्टी इसी फॉर्मूले पर बनाई थी। तब जनता पार्टी ने ताकतवर इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को हराकर केंद्र की सत्ता हासिल की थी। इंडिया गठबंधन में भी सभी विपक्षी दल एक छतरी के नीचे इकट्ठा हुए। विपक्षी दलों को नरेंद्र मोदी के खिलाफ बड़ी जीत के लिए 80 लोकसभा सीटों वाले में ज्यादा से ज्यादा सहयोगियों की दरकार थी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच समझौते की राय बनी। दलों ने बीएसपी प्रमुख मायावती को भी गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की, मगर वह नहीं मानी। कुछ दिन पहले बीएसपी सांसद मलूक नागर ने गठबंधन में शामिल होने के लिए मायावती को पीएम कैंडिडेट बनाने की शर्त रख दी। इससे बसपा के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की अफवाह को हवा मिल गई। मगर अपने जन्मदिन पर मायावती ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर सपा-कांग्रेस गठबंधन को तगड़ा झटका दे दिया।

ओवैसी ने आम आदमी पार्टी पर क्यों बोला हमला?

हाल ही में ओवैसी ने आम आदमी पार्टी पर हमला बोल दिया है! AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने RSS का छोटा रिचार्ज बता आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्‍होंने सुंदरकांड पर AAP के ताजा फैसले को लेकर जमकर हमला क‍िया है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व वाली पार्टी ने मंगलवार को दिल्ली के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सुंदरकांड पाठ आयोजित करने का फैसला लिया है। ओवैसी ने दावा किया यह फैसला 22 जनवरी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह के मद्देनजर लिया गया। आम आदमी पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी मंगलवार को दिल्ली के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सुंदरकांड पाठ कार्यक्रम आयोजित करेगी। अगले सप्ताह से हर मंगलवार को शहर के सभी विधानसभा क्षेत्रों और नगर निगम वार्ड सहित 2,600 स्थानों पर सुंदरकांड और हनुमान चालीसा के पाठ किए जाएंगे। इसके लिए आम आदमी पार्टी के भीतर एक संगठन बनाया गया है। सुंदरकांड महाकाव्य रामचरितमानस का एक अध्याय है। यह भगवान हनुमान को समर्पित है।आप ने यह घोषणा 22 जनवरी को अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए अभी तक औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है। हालांकि, मुख्यमंत्री को कुछ दिन पहले एक पत्र मिला था जिसमें कहा गया था कि उन्हें एक औपचारिक निमंत्रण भेजा जाएगा और वह उस दिन अपना कोई और कार्यक्रम नहीं रखें।

सुंदरकांड आयोजित करने के AAP के ताजा फैसले के बाद ओवैसी खफा हो गए। उन्‍होंने सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म एक्‍स पर इस फैसले को लेकर अपना गुस्‍सा जाहिर किया। उन्‍होंने कहा- आरएसएस के छोटे रिचार्ज ने फैसला लिया है कि दिल्‍ली की हर विधानसभा क्षेत्र में हर महीने के पहले मंगलवार को सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया जाएगा। ये फैसला 22 जनवरी के उद्घाटन की वजह से लिया गया। ओवैसी ने बिल्‍किस बानो का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि ये लोग वही हैं जिन्‍होंने उस मसले पर चुप्‍पी बनाए रखी थी। यह कहा था कि वे सिर्फ शिक्षा और सेहत जैसे मसलों पर बात करना चाहते हैं।

बता दे कि राममय माहौल के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने बड़ा ऐलान किया है। राजधानी दिल्ली में हर महीने पहले मंगलवार को AAP सुंदरकांड का आयोजन करेगी। विधायक और पार्षद हर महीने सुंदरकांड का आयोजन करेंगे। सुदरकांड के साथ-साथ हनुमान चालीसा का भी पाठ होगा। हर महीने 2600 जगहों पर सुंदरकांड का आयोजन पार्टी करेगी। AAP के नेता व दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने सोमवार इसका ऐलान किया। आम आदमी पार्टी की ओर से यह ऐलान उस वक्त किया गया है जब विपक्षी पार्टियां 22 जनवरी को होने जा रहे राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर बीजेपी पर निशाना साध रही हैं। कांग्रेस समेत कई दल यह आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी इसके जरिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इस मुद्दे पर जारी सियासत के बीच अब आम आदमी पार्टी की ओर से उठाया गया यह कदम क्या बीजेपी की काट के लिए है?  दिल्ली के मंत्री और AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने सोमवार कहा कि राम जी के नाम और हनुमान जी की भक्ति पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। जो सवाल उठा रहा है वह गलत सवाल उठा रहा है। राम मंदिर के लिए हमलोगों की तरफ से कोई सवाल नहीं है। जब सुप्रीम कोर्ट में फैसला आया तो हमने इसका स्वागत किया। राम मंदिर बन रहा है यह हम सबके लिए बहुत गर्व व उल्लास की बात है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पार्टी की ओर से हनुमान भक्ति दिखाई गई है। अरविंद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में चुनाव जीतने के बाद हनुमान जी के दर्शन के लिए मंदिर गए। मार्च 2021 में भी दिल्ली विधानसभा में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे हनुमान के भक्‍त हैं और हनुमान रामचंद्र जी के और इस नाते वह रामचंद्र जी के भी भक्‍त हुए। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने दिल्‍ली के भीतर ‘राम राज्‍य’ लाने की कोशिश की है। उस वक्त ही दिल्ली के सीएम ने घोषणा करते हुए कहा था कि अयोध्‍या में भव्‍य मंदिर बनने के बाद सरकार बुजुर्गों को मुफ्त में दिल्‍ली से अयोध्‍या दर्शन के लिए ले जाएगी। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के भीतर भी शामिल दलों की अलग-अलग राय है। कांग्रेस की ओर से पिछले दिनों यह क्लियर कर दिया गया कि उनकी पार्टी के नेता 22 जनवरी को अयोध्या के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस की ओर से यह आरोप लगाया गया कि यह कार्यक्रम आरएसएस और बीजेपी का है। वहीं गठबंधन में शामिल ममता बनर्जी ने भी इसको लेकर बीजेपी पर निशाना साधा। यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव और विश्व हिंदू परिषद के बीच इस मुद्दे पर खींचतान भी दिखी। अखिलेश यादव ने कहा है कि वह प्राण प्रतिष्ठा के बाद सपरिवार जाएंगे। सॉफ्ट हिंदुत्व वाली राजनीति से एक ओर जहां कांग्रेस किनारा करती नजर आ रही है तो वहीं दूसरी और AAP का स्टैंड अलग नजर आ रहा है।

क्या विजय माल्या जैसे ठग भारत आएंगे वापस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विजय माल्या जैसे ठग क्या भारत वापस आ सकते हैं या नहीं! सरकार ने भारत में करोड़ों-अरबों का घपला करके विदेश भागने वालों की जल्दी वापसी की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। घोटालेबाजों की फौज जो ब्रिटेन में बैठी है, उसे वापस भारत लाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की एक टीम गठित की गई है। सरकार केंद्रीय जांच अभिकरण सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय ईडी और राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए से बने एक उच्च स्तरीय दल को जल्द ही ब्रिटेन रवाना कर रही है। इसका लक्ष्य भारत के मोस्ट वॉन्टेड भगोड़ों को वापस लाने की प्रक्रिया को तेज करना है, जिनमें हथियार डीलर संजय भंडारी, हीरा व्यापारी नीरव मोदी और किंगफिशर एयरलाइंस के प्रमोटर विजय माल्या शामिल हैं। इसके अलावा, टीम भगोड़ों की अवैध कमाई का पता लगाने की भी कोशिश करेगी, जो उन्होंने ब्रिटेन और अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है। सूत्रों का कहना है कि इस दल की अगुवाई विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कर रहे हैं। लंदन में भारतीय उच्चायोग ने यूके के अधिकारियों के साथ बैठकें तय की हैं। इन बैठकों में वही सबूत जुटाए जाएंगे जिनसे मालूम चले कि भगोड़ों ने लंदन में कितनी संपत्ति हथिया ली है और उनके बैंक खातों में क्या लेनदेन हुए हैं।

हथियार डीलर भंडारी 2016 में फरार हो गया था। इससे पहले आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने यूपीए सरकार के दौरान हुए कई रक्षा सौदों की जांच शुरू की थी। यूके के साथ बातचीत के लिए विदेश मंत्रालय को शामिल किया गया है क्योंकि सभी अनुरोध उसी के जरिए दूसरे देशों को भेजे जाते हैं। नीरव मोदी पर पीएनबी की 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि के धोखाधड़ी के आरोप हैं, जबकि बैंकों को ठगने के लिए माल्या की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क और जब्त की गई थी।ईडी के मुताबिक, भंडारी ने लंदन और दुबई में संपत्ति हथिया ली थी, जिन्हें बाद में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा के सहयोगी माने जाने वाले सीसी थंपी के नियंत्रण वाली कंपनियों के नाम कर दिया गया था। भंडारी, मोदी और माल्या का प्रत्यर्पण फिलहाल यूके में अटका हुआ है क्योंकि उन्होंने भारत वापसी के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील कर रखी है। ईडी ने पहले ही भारत में उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया है। विजय माल्या और नीरव मोदी की हजारों करोड़ की संपत्ति बेचकर बैंकों का बकाया चुकाया जा चुका है।

लंदन जाने वाला दल लंबित सूचनाओं के आदान-प्रदान पर बातचीत करने वाला है जो आपसी कानूनी सहायता संधि एमएलएटी के तहत काफी समय से यूके के अधिकारियों के पास लंबित है। ईडी कई रक्षा सौदों में कथित तौर पर मिले रिश्वत के सिलसिले में भंडारी, थंपी और वाड्रा की जांच कर रही है। अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है।भारत और यूके दोनों ही एमएलएटी के हस्ताक्षरकर्ता हैं और आर्थिक अपराधियों और अन्य से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच के लिए सूचना साझा करने के लिए बाध्य हैं। एनआईए की टीम इस समय खालिस्तानी आंदोलन में शामिल कई आतंकवादी संदिग्धों की जांच कर रही है।

हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय एमएलएटी से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए नोडल मिनिस्ट्री है, लेकिन इस मामले में यूके के साथ बातचीत के लिए विदेश मंत्रालय को शामिल किया गया है क्योंकि सभी अनुरोध उसी के जरिए दूसरे देशों को भेजे जाते हैं। नीरव मोदी पर पीएनबी की 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि के धोखाधड़ी के आरोप हैं, जबकि बैंकों को ठगने के लिए माल्या की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क और जब्त की गई थी।

ईडी कई रक्षा सौदों में कथित तौर पर मिले रिश्वत के सिलसिले में भंडारी, थंपी और वाड्रा की जांच कर रही है। अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है। सूत्रों का कहना है कि इस दल की अगुवाई विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कर रहे हैं। लंदन में भारतीय उच्चायोग ने यूके के अधिकारियों के साथ बैठकें तय की हैं। इन बैठकों में वही सबूत जुटाए जाएंगे जिनसे मालूम चले कि भगोड़ों ने लंदन में कितनी संपत्ति हथिया ली है और उनके बैंक खातों में क्या लेनदेन हुए हैं।एजेंसी ने भारत में भंडारी की 26 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पहले ही कुर्क कर ली है और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी दायर किया है, जबकि एक विशेष अदालत ने उसे माल्या और मोदी की तरह भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया है।