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ईडी ने कोर्ट में कहा कि AAP एक कंपनी है और अरविंद केजरीवाल इसके निदेशक के तौर पर काम करते हैं.

AAP एक ‘कंपनी’ है, उस कंपनी का ‘डायरेक्टर’ केजरी है! कोर्ट में ईडी के दावे पर बहस करते हुए ईडी ने कोर्ट में पीएलएमए एक्ट की धारा 70 का हवाला दिया. इस धारा का उपयोग कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार के मामलों में किया जाता है। केजरीवाल के खिलाफ इस कानून के इस्तेमाल से विवाद शुरू हो गया है. दिल्ली एक्साइज मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के कई नेताओं और मंत्रियों को ईडी ने गिरफ्तार किया है। यहां तक ​​कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल को भी केंद्रीय जांच एजेंसी ने गिरफ्तार कर लिया है. शुक्रवार को उसे कोर्ट में पेश किया गया. ईडी ने केजरीवाल की एक्साइज ‘भ्रष्टाचार’ में संलिप्तता की बात करते हुए ‘आप’ की तुलना एक ‘कंपनी’ से कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने केजरीवाल को उस ‘कंपनी’ का निदेशक भी बताया। विवाद तब शुरू हुआ जब राजनीतिक दल की तुलना एक कंपनी से की गई और उसके नेता को कंपनी का निदेशक बताया गया.

केजरीवाल को गुरुवार रात एक्साइज मामले में गिरफ्तार किया गया था. ईडी ने शुक्रवार को विशेष सीबीआई अदालत में दावा किया कि आप ने केजरीवाल के जरिए अवैध वित्तीय लेनदेन का अपराध किया है. अपने तर्क को समझाते हुए, ईडी ने गैरकानूनी धन लेनदेन या पीएलएमए अधिनियम की धारा 70 का उल्लेख किया। इस धारा का उल्लंघन तब होता है जब किसी कंपनी का निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कोई अन्य वरिष्ठ अधिकारी किसी भी तरह से वित्तीय धोखाधड़ी में शामिल होता है। इस धारा के उल्लंघन के अपराध के लिए संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कुछ दंड भी निर्धारित हैं।

शुक्रवार को ईडी ने कोर्ट में यही धारा कही. ईडी ने दावा किया कि यूपी का वित्त एक कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चलाया जाता था। उस कंपनी में आखिरी अधिकार केजरीवाल का था। केजरीवाल को अच्छी तरह पता था कि पार्टी फंड में कितना पैसा है और वह पैसा कहां से आ रहा है। पार्टी सुप्रीमो को इस बात की जानकारी नहीं थी कि दिल्ली की उत्पाद शुल्क नीति के कारण व्यवसायियों से ली गई ‘रिश्वत’ के कारण टका अप फंड में कितनी राशि आएगी। ईडी ने आप कोषाध्यक्ष या राज्यसभा सांसद एनडी गुप्ता के बयान का इस्तेमाल कर अपनी बात साबित करने की कोशिश की. केंद्रीय जांच एजेंसी ने दावा किया कि AAP के कोषाध्यक्ष ने उन्हें बताया कि केजरीवाल ही पार्टी के आखिरी शब्द हैं.

ईडी ने अदालत को बताया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री को धन शोधन निवारण अधिनियम के विशिष्ट प्रावधानों के अनुसार गिरफ्तार किया गया है। आप प्रमुख की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने यह भी कहा कि केजरीवाल सीधे तौर पर अपराध में शामिल थे. दावा है कि कुछ कारोबारियों से रिश्वत लेने के लिए आबकारी नीति बनाई गई थी.

शुक्रवार को ईडी ने कोर्ट में यह भी दावा किया कि केजरीवाल एक्साइज मामले में ‘साउथ ग्रुप’ को मदद पहुंचाने के लिए पैसे चाहते थे. केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि इस दावे के पक्ष में सबूत हैं. इतना ही नहीं पैसों का सारा लेन-देन हवाला के जरिए होता है. ईडी ने शुरू में दावा किया था कि आप नेताओं ने मामले में 100 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। ईडी ने शुक्रवार को कोर्ट में दावा किया कि रकम 600 करोड़ तक पहुंच सकती है. केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि उस मामले में केजरीवाल सीधे तौर पर शामिल हैं. ईडी ने यह भी कहा कि उत्पाद शुल्क मामले से मिले 45 करोड़ रुपये हवाला के जरिए गोवा गए. उस पैसे का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में किया गया. इसके अलावा ईडी ने यह भी दावा किया कि उत्पाद शुल्क ‘भ्रष्टाचार’ मामले के पैसे का इस्तेमाल पंजाब विधानसभा चुनाव में किया गया था.

बंगाल के ‘न्यारापोरा’ के समान, त्योहार से पहले बुरी आत्माओं को दूर रखने के लिए उत्तर भारत के बड़े हिस्से में ‘होलिका दहन’ की प्रथा है। इस बार दिल्ली बीजेपी ने भ्रष्टाचार को बुरी ताकत के रूप में पहचानते हुए अरविंद केजरीवाल का पुतला फूंका. रविवार को बीजेपी के विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम में भी केजरीवाल के इस्तीफे की मांग की गई.

कार्यक्रम का एक वीडियो बाद में दिल्ली बीजेपी के एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से पोस्ट किया गया था। कार्यक्रम का नेतृत्व दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष बीरेंद्र सचदेव ने किया. पुतले के चेहरे पर केजरीवाल का पोस्टर लगाकर उसे जला दिया गया. बीजेपी समर्थकों ने नारे लगाए, “केजरीवाल इस्तीफा दो।”

इस कार्यक्रम के बारे में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, ”होली बुरी ऊर्जा पर अच्छी ऊर्जा की जीत का त्योहार है. आज हमने भ्रष्टाचार की होलिका जलाई। अगर दिल्ली में कोई भ्रष्टाचार का चेहरा रहा है तो वह मुख्यमंत्री केजरीवाल हैं। साथ ही उन्होंने आप प्रमुख पर हमला बोलते हुए कहा, ”केजरीवाल ने देश के बारे में नहीं सोचा. सिर्फ अपने परिवार और जेब के बारे में सोचा. इसलिए वह और उनके मंत्री आज जेल में हैं।”

क्या अब भी है यूट्यूबर एलविश यादव की जमानत के आसार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यूट्यूबर एलविश यादव की जमानत के आसार अब भी है या नहीं! रेव पार्टी और पार्टियों में सांप का जहर सप्लाई करने के मामले में एल्विश यादव बुरी तरह फंस गए हैं। नोएडा कमिश्नरेट पुलिस ने उन्‍हें अरेस्‍ट कर 14 दिनों की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। बताया जा रहा है कि 25 साल के एल्विश यादव ने पुलिस पूछताछ में उसने रेव पार्टी में सांप के जहर की सप्‍लाई की बात स्‍वीकार कर ली है। उसने माना कि वह विभिन्न रेव पार्टियों में आरोपियों से मिला था और उनके संपर्क में था। अगर उसके ऊपर आरोप साबित हो जाते हैं तो उसे 20 साल तक की जेल हो सकती है। वहीं दूसरी और एल्विश की जमानत के लिए उसके वकीलों ने तैयारी शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि आज यानी सोमवार या मंगलवार को उसकी जमानत का आवेदन कोर्ट में भेजा जाएगा। उधर, यूट्यूबर और बिग बॉस ओटीटी-2 विनर एल्विश यादव के खिलाफ नोएडा कमिश्नरेट पुलिस पहले ही गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर चुकी है। लेकिन पेच यह है कि गौतमबुद्ध नगर जिला न्यायालय के वकील आज यानी सोमवार को हड़ताल पर है। इसलिए आज एल्विश यादव की जमानत अर्जी पर सुनवाई होने भी मुश्किल है।

नोएडा कमिश्नरेट पुलिस ने एल्विश के ऊपर जांच के दौरान एनडीपीएस एक्ट की धाराओं में बढ़ोतरी की गई है। थाना सेक्टर-20 पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत धारा-8/20/27/27ए/29/30/32 शामिल किया है। अगर उसके ऊपर इन धाराओं के तहत आरोप साबित हो जाते हैं तो उसे कितने साल की सजा हो सकती है? आरोप सिद्ध होने के बाद उसे कितनों दिनों तक जेल काटनी पड़ी सकती है?इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रुद्र विक्रम सिंह ने एनबीटी की टीम को जानकारी देते हुए बताया कि आरोप साबित होने के बाद 20 साल तक की जेल हो सकती है।उसे जमानत मिलना भी मुश्किल है। अमूमन जिला अदालतें ऐसे मामलों में चार्जशीट फाइल होने के बावजूद भी जमानत देने से बचती हैं। जिला अदालत से खारिज होने के अगले दिन भी हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं, कोई टाइम लिमिट नहीं है। साथ ही इस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा-27ए में 10 से 20 साल, धारा-20 में 10 से 20 साल तक की सजा का प्रावधान है। चूंकि एनडीपीएस की वो धाराएं भी लगी हैं जिसमें 20 साल तक की सजा है। इसलिए अभी कुछ महीनों तक जमानत मिलना मुश्किल है। कम से कम तब तक, जब तक पुलिस चार्जशीट फाइल नहीं कर लेती है। प्राथमिक तौर पर वह डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ही बेल लगायेंगे, उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएंगे पर यह तय है कि अगले कुछ महीनों तक जेल में रहेंगे।

 सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रुद्र विक्रम सिंह ने आगे बताया कि वाइल्ड लाइफ की जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज था उसमें अधिकतम सजा तीन वर्ष की थी। इसी वजह से पुलिस एल्विश को गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार स्टेट ऑफ बिहार में यह कहा है कि सात साल से कम की सजा वाले अभियुक्त की सीधे तौर पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती। अब चूंकि जिन मामलों में वह अभियुक्त है उसमें 20 वर्ष तक की सजा है। इसलिए पुलिस के पास उसे गिरफ्तार करने का भी अधिकार था और अब कम से कम जब तक चार्जशीट फाइल नहीं हो जाती, उसे जमानत मिलना भी मुश्किल है। अमूमन जिला अदालतें ऐसे मामलों में चार्जशीट फाइल होने के बावजूद भी जमानत देने से बचती हैं। जिला अदालत से खारिज होने के अगले दिन भी हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं, कोई टाइम लिमिट नहीं है।

वरिष्ठ वकील रुद्र विक्रम सिंह ने बताया एनडीपीएस की धारा-27ए एल्विश यादव को सबसे अधिक मुसीबत में डाल सकती है। यूट्यूबर और बिग बॉस ओटीटी-2 विनर एल्विश यादव के खिलाफ नोएडा कमिश्नरेट पुलिस पहले ही गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर चुकी है। लेकिन पेच यह है कि गौतमबुद्ध नगर जिला न्यायालय के वकील आज यानी सोमवार को हड़ताल पर है। इसलिए आज एल्विश यादव की जमानत अर्जी पर सुनवाई होने भी मुश्किल है।एनडीपीएस एक्ट लगने के बाद उसे जेल भेजना पुलिस के लिए आसान हो गया। एनडीपीएस एक्ट का मतलब होता है नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट अधिनियम 1985, जिसे आम तौर पर एनडीपीएस एक्ट के रुप में जाना जाता है। भारतीय संसद का एक अधिनियम है जो किसी भी व्यक्ति को उत्पादन, विनिर्माण, खेती, कब्जा, ब्रिकी, खरीद या किसी भी नशीली दवाई का सेवन करता है। उस पर ये एक्ट लगाया जाता है।

क्या ITBP जवानों के राशन में हो रहा है बड़ा घोटाला?

वर्तमान में ITBP जवानों के राशन में बड़ा घोटाला नजर आ रहा है! हिम प्रहरियों के रसद में करीब 70 लाख रुपये का घोटाला करने वाले आईटीबीपी सीमाद्वार देहरादून में तैनात तत्कालीन तत्कालीन कमांडेंट, दो दरोगा और तीन व्यापारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। गृह मंत्रालय की अनुमति के बाद सीबीआई ने इन छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोपी कमांडेंट और दरोगा समेत अन्य पर चमोली जिले में हीटिंग ऑयल की आपूर्ति में घोटाला करने के मामले में सीबीआई चार्जशीट दे चुकी है। आरोपी कमांडेंट वर्तमान में बिहार में तैनात है। 23 बटालियन आईटीबीपी देहरादून के कमांडेंट पियूष पुष्कर ने सीबीआई को दी शिकायत में कहा है कि देहरादून में तैनाती के दौरान कमांडेंट अशोक कुमार गुप्ता ने वर्ष 2017 से 2019 के बीच उपनिरीक्षक सुधीर कुमार तत्कालीन संयुक्त क्वार्टर मास्टर राशन और सहायक उप निरीक्षण अनुसूया प्रसाद ने तीन निजी व्यापारियों नरेंद्र आहूजा, मैसर्स आहूजा ट्रेडर्स 141 राजपुर रोड, देहरादून, विनय कुमार, प्रोपराइटर मैसर्स विनय कुमार ट्रेडर्स 1-हरिद्वार रोड देहरादून, नवीन कुमार, प्रोपराइटर नवीन ट्रेडर्स कौलागढ़ देहरादून के साथ मिली भगत कर सरकारी खरीद में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं की।

जवानों को मिलने वाले राशन, मटन, चिकन, मछली, अंडे, पनीर, दूध और फल आदि की आपूर्ति के बढ़े हुए बिल पेश कर आधिकारिक रिकॉर्ड में बदलाव कर बिलों में काट-छांट कर आईटीबीपी को 70,56,787 रुपए की वित्तीय हानि पहुंचाई गई है। कमांडेंट पीयूष पुष्कर के अनुसार इस मामले में जब आंतरिक जांच हुई तो करीब 70 लाख रुपए के घोटाले का खुलासा हुआ। जिस पर आईजी नॉर्दर्न फ्रंटियर सीमाद्वार देहरादून ने गृह मंत्रालय से इन आरोपियों पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति मांगी थी। गृह मंत्रालय ये मुकदमे दर्ज करानेकी अनुमति के बाद कमांडेंट पीयूष पुष्कर ने सीबीआई को तहरीर दी। सीबीआई देहरादून शाखा के एसपी सतीश कुमार राठी ने मुकदमा दर्ज कर पूरे मामले की विस्तृत जांच इंस्पेक्टर शरद चंद्र गुसाईं को सौंपी है।

वहीं कमांडेंट के खिलाफ भ्रष्टाचार का दूसरा मुकदमा दर्ज होने से उनके कार्यकाल में तैनात अफसरों, जवानों और वाहिनी को आपूर्ति करने वाले व्यापारियों में भी हड़कंप मचा हुआ है। सीबीआई के अनुसार इस घोटाले में कई और अफसर और सप्लायर भी शामिल हो सकते हैं। कमांडेंट पर आरोप है कि मटन के बिल बनाकर चिकन खिलाया गया। जबकि पनीर के बिल बनाकर सामान्य सब्जी जवानों को परोसी गई। सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के एसपी सतीश कुमार राठी के मुताबिक सप्लायर ने खाद्यान्न सामग्री के बढ़े हुए बिल पेश किए जिनका भुगतान अफसर की मिली भगत से किया गया।

सरकारी रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर काट-छांट, ओवरराइटिंग कर 70,56,787 रुपए की गड़बड़ी कर सप्लायर को लाभ पहुंचाया गया। मामले की जांच की जा रही है जल्द ही आरोपियों से पूछताछ की जाएगी। सीबीआई ने छह नामजद के अलावा अन्य अधिकारियों और सप्लायर के भी इस गड़बड़ी में शामिल होने की आशंका जताते हुए कुछ अज्ञात को भी आरोपी बनाया है। विदित हो कि आईटीबीपी की भारत-चीन नियंत्रण रेखा पर चार चौकियों पर तैनात जवानों के लिए हीटिंग तेल समेत राशन की खरीद और आपूर्ति में भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने आईटीबीपी के तत्कालीन कमांडेंट, सब इंस्पेक्टर और हरिद्वार के एक तेल कारोबारी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया था जिसमें चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।

इसके साथ ही आईटीबीपी की सीमाद्वार स्थित कैंटीन से जवानों के लिए भेजे जाने वाले राशन के भी हेराफेरी का आरोप लगाया गया था। बटालियन के रिकॉर्ड के अनुसार 6 अगस्त 2018 को माणा क्षेत्र स्थित चार पोस्ट माणा, घासतोली, राताकोना और कौठियासैंण पर सब्सिडी वाले हीटिंग तेल के दो टैंकर पहुंचे थे। रिकॉर्ड में भी यह दिखाया गया है कि पोस्ट पर दो टैंकर यानी कुल 19,568 लीटर हीटिंग तेल स्टॉक में लिया गया था लेकिन जांच में पता चला कि केवल एक टैंकर ही पोस्ट पर पहुंचा था। जबकि दूसरा केवल रिकॉर्ड में दर्शाया गया।इसी तरह से तत्कालीन कमांडेंट अशोक कुमार गुप्ता व उपनिरीक्षक सुधीर कुमार को आईटीबीपी की वेट कैंटीन में सामान की खरीद में गड़बड़ी का भी आरोपी पाया गया। जांच में पता चला कि कैंटीन में सामान की खरीद केंद्रीय पुलिस कैंटीन के माध्यम से नहीं बल्कि स्थानीय बाजार से बिना किसी निविदा प्रक्रिया के की गई।

सीबीआई ने जांच के बाद 20 जुलाई 2022 को आरोपितों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया था। मुकदमे में कमांडेंट अशोक गुप्ता, उप निरीक्षक सुधीर कुमार और हरिद्वार के पेट्रोल पंप स्वामी गिरीश सहगल को नामजद किया गया था। जांच में पता चला कि 4 अगस्त 2018 को इंडियन ऑयल के रुड़की डिपो से हीटिंग तेल का टैंकर चला था जिसे 6 अगस्त को माणा पहुंचना था इस टैंकर को हरिद्वार में गिरीश सहगल के पेट्रोल पंप पर खाली कर दिया गया था।

क्या पहाड़ों पर लेट बर्फबारी के कारण इस साल आ सकते हैं घातक परिणाम?

पहाड़ों पर लेट बर्फबारी के कारण इस साल घातक परिणाम आ सकते हैं! कभी दिसंबर और जनवरी के महीने में ही बर्फ की सफेद चादर से ढक जाने वाला हिमालय के इलाके इस बार जनवरी अंत तक सूखे पड़े दिखाई दिए। इस बार दिसंबर और जनवरी के दौरान सैलानियों को काले पहाड़ दिखाई दिए। यही नहीं पहाड़ों पर रहने वाले लोग सूखी ठंड से परेशान और हैरान हैं। वसंत में खिलने वाला बुरांश का फूल अगर शरद ऋतु में खिल रहा है, तो यह चिंता की बात है। पर्यावरणविद पहाड़ों की यह हालत देख परेशान हैं। वे इसे क्लाइमेट चेंज का साफ संकेत बता रहे हैं। माना जा रहा है कि बर्फबारी न होने के घातक नतीजे हो सकते हैं। इसको मौसम में हुए में हुए बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इसका असर हिमालय में मिलने वाली तितलियों पर भी पड़ता दिख रहा है। प्रख्यात तितली एक्सपर्ट पीटर स्मेटासेक की रिसर्च बताती है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से ही कई प्रजातियों की तितलियों के प्यूपा जीवित नहीं रह पा रहे हैं। जब कैटरपिलर पूरी तरह विकसित हो जाता है और खाना बंद कर देता है तो वह प्यूपा बन जाता है। पीटर का कहना है कि क्लाइमेट चेंज का इन प्रजातियों पर इतना गंभीर असर हुआ है कि आमतौर पर जिन जगहों पर इन दिनों 500 से ज़्यादा प्रजातियों की तितलियां दिखती थीं, वहां अब सिर्फ 5 या 6 तितलियां दिख रही हैं। हिमालय के वातावरण में सूखापन ज़्यादा होने और नमी कम होने से प्यूपा स्टेज में ही तितलियां दम तोड़ रही हैं। लार्वा स्टेज तक बचने के बाद जैसे ही तितली प्यूपा स्टेज में आती है, तो उसको नमी की ज़रूरत होती है जो हिमालय में क्लाइमेट चेंज की वजह से कम हो रही है। इस वजह से तितलियां प्यूपा स्टेज पार ही नहीं कर पातीं। प्यूपा बनने के बाद वह एक जगह पर ही स्थिर रहता है। नमी की कमी से प्यूपा इसी स्टेज में सूखने लगता है। आगे की स्टेज में पहुंचने से पहले ही मर जाता है। इसलिए तितलियों की कई प्रजातियां खतरे में हैं। यहां पाई जाने वाली तितलियों की प्रजातियां 50 फीसदी तक घटती दिख रही हैं।

क्लाइमेट चेंज की वजह से उत्तराखंड में कड़ाके की ठंड के बावजूद इस साल जंगलों में आग लगने की घटनाएं बीते बरसों के मुकाबले ज़्यादा देखी गई हैं। सर्दियों में बर्फ से ढकी रहने वाली हिमालय की हसीन वादियों, जिनमें उत्तराखंड और हिमाचल से लेकर जम्मू-कश्मीर की वादियां भी शामिल हैं, से मुख्य सीज़न के दौरान बर्फ नदारद दिखाई दी। कई जगह पर इन दिनों आग की लपटें और धुआं दिखाई दे रहा है।

भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में 9 से 16 जनवरी के बीच 600 से ज़्यादा जंगल की आग का अलर्ट जारी होने से यह जंगलों में आग के मामले में पहले नंबर पर आ गया है। हिमाचल प्रदेश में इस दौरान 400 से अधिक फायर अलर्ट आए जो दूसरे नंबर पर है। तकरीबन 250 अलर्ट के साथ जम्मू-कश्मीर तीसरे नंबर पर है। अरुणाचल प्रदेश में भी 200 के आसपास अलर्ट जारी किए गए हैं।इस तरह बीते दिनों में देश में जंगल की आग की बड़ी घटनाओं में टॉप के पांच राज्यों में हिमाचल पहले नंबर पर है। हिमाचल में पिछले बीते हफ्तों में 36 बड़ी आग की घटनाएं देखने को मिली हैं। मॉनसून के बाद बारिश न होने से जंगल में सूखी पत्तियों का ढेर जमा है, जिससे आग भड़क जाती है। कई जगहों पर वन विभाग भी इस समय कंट्रोल बर्निंग कर रहा है।

मॉनसून के बाद बारिश और बर्फबारी न होने का असर खेती और बागवानी पर भी दिखाई दे रहा है। सर्दियों में लगाए जाने वाले फलदार पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा। सेब, आड़ू, आलूबुखारा, खुबानी और कीवी समेत सभी फसलें प्रभावित हो रही हैं। पिछले फलों के सीज़न में नैनीताल जिले के रामगढ़-धारी-मुक्तेश्वर में सेब की बंपर फसल के बावजूद सेब का आकार छोटा रह गया था। इस वजह से सेब मार्केट में अच्छे दाम नहीं पा सके। हालत यह हो गई थी कि हल्द्वानी मंडी में ‘B’ और ‘C’ ग्रेड के सेब के खरीददार ही नहीं मिले। इसलिए सेब बहुत कम कीमत पर बिके और बाग मालिकों को नुकसान झेलना पड़ा।

उत्तराखंड के चमोली जिले के औली का नवंबर के मध्य से मार्च के मध्य तक तापमान गिरते रहने की वजह से बड़ा नाम रहता है। जिले का अधिकांश भाग नॉर्थ में होने से यह सालभर बर्फ से ढका रहता था। यह खासीयत है, जिससे औली स्कीइंग प्रेमियों के लिए आदर्श जगह है। विंटर स्पोर्ट्स के लिए मशहूर उत्तराखंड में चमोली जिले के औली में साल के इस वक्त तापमान अमूमन 1 से 3 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। लेकिन इस साल तापमान 8 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। इस बदलाव ने उत्तराखंड के स्कीइंग स्थल पर स्नो स्कीयर्स की उम्मीदें भी धूमिल कर दी हैं। औली में 17 जनवरी 2024 को इस साल पहली बर्फबारी महज 1cm हुई। वह भी एक ही दिन में पिघल गई।कम बर्फबारी का नुकसान औली के स्कीइंग स्थल को भी हो रहा है। औली 2024 में शीतकालीन नैशनल गेम्स की मेज़बानी कर भी सकेगा या नहीं, इस पर सवालिया निशान लग गया है। स्कीइंग जलवायु संकट से सबसे पहले और सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला खेल है। जनवरी बीत चुकी है और अब तक 2024 के विंटर नैशनल गेम्स का कार्यक्रम भी जारी नहीं हुआ है। उधर, बर्फबारी न होने से टूरिज़म इंडस्ट्री पर भी इसका खासा असर पड़ा। विंटर टूरिज़म कारोबार 20% के आसपास भी नहीं पहुंच पाया। एक तरह से पूरा विंटर टूरिज़म ठप हो गया।

हिमालयन इंस्टिट्यूट ऑफ जियोलॉजी के डायरेक्टर रहे ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. डी पी डोभाल कहते हैं कि अगर हम स्नो हार्वेस्टिंग पर ध्यान दे सकें तो इससे ग्लेशियर पिघलने को भी काबू में किया जा सकता है। जब ताज़ी बर्फ गिरती है तो उसमें पानी की मात्रा बहुत ही कम होती है। लेकिन जब वह कुछ दिन टिककर हवा और वायुमंडल के संपर्क में आती है तो बर्फ के रूप में परिवर्तित होकर उसमें पानी का जमाव होता है। यही प्रकृतिक स्रोतों के रूप में और ग्राउंड वॉटर के रूप में स्टोरेज में काम आता है, इसलिए जहां भी ताज़ी बर्फबारी हुई हो उस जगह पर किसी को न जाने दिया जाए।जब कहीं भी बर्फ पड़े तो वहां एकदम किसी टूरिस्टों और गाड़ियों का प्रवेश रोका जाए ताकि गिरी हुई बर्फ का हवा और वायुमंडल से संपर्क ठीक से हो सके। उसको हवा और वायुमंडल के संपर्क में आने दिया जाय तो उससे कुछ राहत मिल सकती है। इसके अलावा ऊपरी हिमालय स्थित धार्मिक जिस रफ्तार से तीर्थयात्री पहुंच रहे हैं, उसे भी कंट्रोल करने की ज़रूरत है। अगर स्नो हार्वेस्टिंग कर सकेंगे तो क्लाइमेट चेंज के चलते ग्लेशियर्स पर पड़ रहे घातक प्रभाव और उद्यान में फलों की खेती और कृषि उपज पर इसके प्रभावों को कुछ हद तक कंट्रोल कर ही सकते हैं। हमारे प्राकृतिक जल स्रोत और जंगलों में लगने वाली आग समेत कीट पतंगों के ऊपर नमी के कम होने के प्रभाव को भी कुछ हद तक ही सही कुछ कम किया जा सकता है।

जब उत्तराखंड के जोशीमठ में काटे गए हजारों पेड़?

उत्तराखंड के जोशीमठ में हजारों पेड़ों को मौत के घाट उतार दिया गया है! उत्तराखंड के ‘जागेश्वर’ में एक हजार पेड़ों के मौत के फरमान पर एक शायर की ये लाइनें सटीक बैठती हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल का अल्मोड़ा जिला आजकल बेहद टेंशन में है। दरअसल जिले के ‘जागेश्वर’ में उत्तराखंड सरकार ने देवदार के 1000 पेड़ों को काटने का फरमान जारी किया है। पेड़ों के सीने पर खंजर से मौत का नंबर भी डाल दिया है। पौराणिक पेड़ों की छाती पर मौत का बिल्ला देख स्थानीय लोग और जागेश्वर धाम मंदिर के पुजारी बेहद नाराज और दुखी हैं। सोशल एक्टिविस्ट भी विकास के नाम पर पेड़ों की हत्या को रोकने के लिए सरकार पर दवाब बना रहे हैं। जागेश्वर धाम के मुख्य पुजारी, हेमंत भट्ट का कहना है, ‘देवदार पेड़ों का संबंध सीधे-सीधे हिंदू धर्म की आस्था और मान्यता से है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर अगर पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई गई तो यह विकास नहीं विनाश की दस्तक होगी। केदारनाथ त्रासदी हम देख चुके हैं, उससे सबक लेने की जरूरत है।’ उन्होंने कहा, ‘कुमाऊं कमिश्नर के संज्ञान में पूरा मामला है, उत्तराखंड सरकार से अनुरोध है कि जल्द से जल्द पेड़ों के कटान के फैसले को रद्द किया जाए।’ जागेश्वर धाम के मुख्य आचार्य गिरीश भट्ट बताते हैं कि दारूक वन की वजह से ‘जागेश्वर धाम’ का महत्व है। उन्होंने कहा, ‘शिवपुराण में स्पष्ट है कि 8वां नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ‘दारुक वन’ में है। दारुक वन का उल्लेख भारतीय महाकाव्यों, जैसे काम्यकवन, द्वैतवन, दंडकवन में भी मिलता है। उन्होंने बताया कि जागेश्वर धाम देवदार के जंगल के बीच स्थित है। इसे दारुक वन के नाम से ही पहचान मिली है। यहां सात ऋषियों- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज ने तपस्या की है। देवदार का संधि विच्छेद देव और दार है। देव का मतलब ‘देवता’ और दार का मतलब ‘वृक्ष’ होता है। देवदार के पेड़ों में देवता का स्वरूप होता है। भट्ट कहते हैं, ‘अगर इन्हें काटा गया तो 110% संभावना है कि भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुल जाएगा और कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आएगी, जिसके लिए सरकार तैयार रहे।’

जागेश्वर धाम के मुख्य आचार्य गिरीश भट्ट बताते हैं कि यहां रोजाना देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु भी पेड़ों की कटाई की खबर को सुनकर परेशान हैं। वहीं जागेश्वर में रहने वाले 100 से अधिक परिवारों को इस बात की चिंता सता रही है कि अगर पेड़ों को काटा गया तो कोई बड़ी आपदा आएगी और लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा। स्थानीय लोग और पर्यावरणविद् लगातार धामी सरकार को आने वाली आपदा को लेकर आगाह कर रहे हैं।

उत्तराखंड के जागेश्वर में मास्टर प्लान के तहत हो रहे सड़क चौड़ीकरण के लिए करीब 1000 देवदार के पेड़ों को काटने की तैयारी से पर्यावरणविद चिंतित हैं। कार्यदायी संस्था लोक निर्माण विभाग ने चौड़ीकरण की जद में आ रहे पेड़ों की पहचान शुरू कर दी है। इस क्षेत्र के लोग भी इसके विरोध में उतर आए हैं। उनका कहना है कि आस्था से जुड़े दारुक वन में खड़े इन पेड़ों की वे पूजा करते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह दारुक वन भगवान शिव का निवास स्थान है, लेकिन धाम के विकास के लिए मास्टर प्लान को धरातल पर उतारने के लिए आरतोला से जागेश्वर तक तीन किमी सड़क का चौड़ीकरण होना है। टू-लेन सड़क बनाने के लिए इसकी जद में आ रहे 1000 से अधिक देवदार के पेड़ों का कटान होना है। उधर स्थानीय लोग आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार को बताना चाहिए कि पेड़ों को काटने वाला विकास किसने मांगा है। उत्तराखंड में कई वन पूरी तरह बंजर हो गए हैं, उसके लिए सरकार ने अबतक क्या किया है। सरकार तथाकथित विकास के नाम पर सिर्फ कुछ ठेकेदार लॉबी को खुश करने का काम कर रही है। जागेश्नर में सड़क चौड़ीकरण की कोई जरूरत नहीं है। यहां सिर्फ महाशिवरात्रि के दिन ही भारी भीड़ लगती है। इस भीड़ को स्थानीय प्रशासन और लोग आसानी से कंट्रोल कर लेते हैं। लेकिन सरकार ने चौड़ीकरण की आड़ में लूट का मास्टर प्लान तैयार किया है। अगर सरकार ने पेड़ों के काटने की योजना को नहीं टाला तो पूरे प्रदेश में जनजागरण होगा।

वन संरक्षण अधिनियम 1976 के अनुसार, 12 प्रजातियों के किसी भी पेड़ को काटने वाले को जेल जाना पड़ सकता है। इनमें अखरोट, अंगू, साल, पीपल, बरगद, देवदार, चमखड़िक, जमनोई, नीम, बांज, महुआ और आम के पेड़ शामिल हैं। उत्तराखंड में 12 प्रजातियों के पेड़ों को काटना पूरी तरह से मना ही नहीं बल्कि यह गैरकानूनी है। इन पेड़ों को काटने वाले को जुर्माने के साथ-साथ 6 महीने की जेल होती हो सकती है। हालांकि पिछले साल गैरसैंण के विधानसभा में वन संरक्षण अधिनियम को लेकर सदन में इस पर बात की गई थी, जिसमें पेड़ काटने पर लोगों को जेल की सजा छोडकर जुर्माना देना हो, लेकिन अभी इसपर कोई आदेश जारी नहीं किया गया है।

आखिर क्या था रामपुर तिराहा कांड?

आज हम आपको रामपुर तिराहा कांड के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं! रामपुर तिराहा की 01 अक्टूबर 1994 की उस रात को महिला आंदोलनकारियों के साथ जो बर्बरता हुई उसे आज तक कोई भुला नहीं पाया है। शहीद हुए आंदोलनकारियों के तो शरीर गोली से छलनी हुए, लेकिन मातृशक्ति का तो स्वाभिमान ही सड़क पर छलनी हो गया था। राज्य प्राप्ति आंदोलन में सर्वस्व गंवाने वाली महिला आंदोलनकारियों ने तीन दशक तक न्याय का इंतजार किया। आज जब दो दोषी सिपाहियों को उम्रकैद का फैसला आया तो उन पीड़िताओं के जख्मों पर मरहम लगा, जो हर रोज उस भयावह मंजर को याद कर सिहर जाती हैं, लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का एक सवाल आज भी वही है कि आखिर इस कांड के लिए आदेश देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उस भयावह रात का काला सच जब सुबह सामने आया तो रामपुर तिराहा का वो मंजर देख हर कोई सिहर गया। घायल आंदोलनकारियों और वहशी पुलिसकर्मियों का शिकार बनीं महिलाओं को स्थानीय लोगों ने सहारा दिया। बस से लेकर खेतों तक फैले कपड़े रात को हुई पुलिस की बर्बरता को बयां कर रही थीं। किस तरह वे महिलाएं वहां से निकल कर अपने घरों तक पहुंचीं और तब से अब तक प्रताड़ना के किस दौर से वे गुजरी होंगी, उनका दर्द शायद ही कोई महसूस कर सकता है। जिस दुष्कर्म को लेकर समाज आाज भी महिलाओं को ही दोषी ठहराता है तो आज से तीन दशक पहले पीड़िताओं ने क्या कुछ नहीं झेला इसे कोई नहीं समझ सकता है। दबी जुबान में लोगों ने उन पीड़िताओं को ही निशाना बनाया। किसी ने यह नहीं सोचा कि वे तो राज्य आंदोलन में जा रही थीं, लेकिन रास्ते में बर्बरता का शिकार हो गई तो ऐसे में उनकी क्या गलती है। जीवनभर इसी दंश के साथ वे जीती रहीं।

इन हालात में वे न तो अपनी बात किसी से कह सकती हैं और न ही इस फैसले पर खुशी जता सकती हैं। तीन दशक तक न्याय की आस में पीड़िताओं ने समय गुजार दिया। उनमें से कइयों का तो इस फैसले को सुनने से पहले निधन हो चुका है। जो जीवित हैं, शायद यह फैसला उनके घावों पर मरहम का काम कर सके। राज्य आंदोलन के यज्ञ में मातृशक्ति ने अपनी अस्मिता की सबसे बड़ी आहुति दी, जिन्होंने इस आंदोलन में अपने भाई, पति और बेटों को खो दिया और अंत में सामूहिक दुष्कर्म का शिकार बनीं। कुछ महिलाओं को इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद मुआवजा मिला, लेकिन कई महिलाएं तो समाज के डर से आगे भी नहीं आईं।

रामपुर तिराहा कांड के बाद आंदोलनकारियों का अलग पहाड़ी राज्य आंदोलन ने जोर पकड़ा। लंबे संघर्ष के बाद 09 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग राज्य उत्तराखंड बना। इस रामपुर तिराहा कांड में कई पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हुई और फिर 1995 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। कांड में दो दर्जन से अधिक पुलिसवालों पर रेप, डकैती, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ जैसे मामले दर्ज हुए। साथ ही सीबीआई के पास सैकड़ों शिकायतें दर्ज हुईं।

रामपुर तिराहा कांड मामले में पीएसी के दो सिपाहियों पर 15 मार्च को दोष सिद्ध हो चुका था। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-7 के पीठासीन अधिकारी शक्ति सिंह ने सुनवाई की और दोनों दोषी सिपाहियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने दोषियों पर 40 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया है। शासकीय अधिवक्ता फौजदारी राजीव शर्मा, सहायक शासकीय अधिवक्ता फौजदारी परवेंद्र सिंह, सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक धारा सिंह मीणा और उत्तराखंड संघर्ष समिति के अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने बताया कि सीबीआई बनाम मिलाप सिंह की पत्रावली में सुनवाई पूरी हो चुकी है। अभियुक्त मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप सिंह पर दोष सिद्ध हुआ था।

वर्ष 2010 से रुड़की सिविल लाइन निवासी अधिवक्ता केपी शर्मा शासकीय अधिवक्ता की जिम्मेदारी निभा रहे थे, लेकिन गत वर्ष उनके इस्तीफा देने के बाद वकील नियुक्त नहीं हो पाए। गृह विभाग ने हरिद्वार से शासकीय अधिवक्ता कुशल पाल सिंह चौहान को शासकीय अधिवक्ता नामित करने की कार्रवाई प्रारंभ की, लेकिन विधिवत आदेश नहीं किए गए। कोर्ट में सबूत पेश करने, गवाही और जिरह करने की मुख्य भूमिका सीबीआई के अधिवक्ताओं की होती है और राज्य के वकील इसमें सहायक के रूप में होते हैं। इस फैसले पर उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष जगमोहन सिंह नेगी ने कहा कि देरी से आए इस फैसले को न्याय नहीं कहा जा सकता है। रामपुर तिराहा कांड के बाद आंदोलनकारियों की पहली मांग न्याय की थी। जिसको लेकर हम सुप्रीम कोर्ट भी गए थे, क्योंकि बीच में फाइलें गायब हो गई थीं। सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन है कि पीड़ित जहां का होता है, वहीं पर केस चलता है।ऐसे में गढ़वाल मंडल के केस की सुनवाई देहरादून और कुमाऊं मंडल की सुनवाई नैनीताल में होनी चाहिए थी, लेकिन देहरादून से यह कब मुजफ्फरनगर शिफ्ट हो गई आज तक कोई नहीं जान पाया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मामले में तेजी आई। फैसला देरी से आया, लेकिन कुछ आस जगी है। इस पूरे प्रकरण के आरोपी तत्कालीन डीएम अनंत कुमार और डीआईजी बुआ सिंह के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए, तभी न्याय को पूर्ण माना जाएगा।

रामपुर तिराहा की उस रात गोलीकांड की प्रत्यक्षदर्शी, सीबीआई की गवाह और राज्य आंदोलनकारी कल्याण परिषद की पूर्व अध्यक्ष ऊषा नेगी ने फैसले को पीड़िताओं के जख्म पर हल्का सा मरहम लगने की बात कही है। इतना लंबा इंतजार, कई तो न्याय के इंतजार में दुनिया से विदा हो गईं। यहां तक कि उनके परिजन भी इस फैसले को सुनने के लिए नहीं रहे। हां, इतना जरूर है कि सभी ने कोर्ट में सम्मान की लड़ाई लड़ी और आज यह फैसला आया। इन दोषी सिपाहियों के लिए तो उम्रकैद की सजा कुछ भी नहीं है। इन्हें तो फांसी होनी चाहिए। यह फैसला अभी निचली अदालत से आया है और इनके पास ऊपरी अदालत के विकल्प खुले हैं। ऐसे में हम सभी एक बार फिर से राज्य आंदोलन की तर्ज पर एकजुट होकर कोर्ट में लड़ाई लड़नी होगी। सशक्त पैरवी करनी होगी। अगर इस मामले में जल्द फैसला आता तो राहत मिलती।पीड़िताओं को मुआवजा देकर उनका आत्मसम्मान तो नहीं लौटाया सकता है। राज्य आंदोलन में शहादतों के साथ ही इन महिलाओं ने अपने स्वाभिमान की सबसे बड़ी आहुति दी है। उनके साथ जघन्य अपराध हुआ। इस पूरे कांड को अंजाम देने के लिए आदेश करने वाले तत्कालीन डीएम और डीआईजी को जब तक सजा मिलेगी, तभी थोड़ा राहत मिल पाएगी।

क्या स्वास्थ्य बीमा करके भी की जा सकता है बचत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या स्वास्थ्य बीमा करके भी बचत की जा सकती है या नहीं! वित्तीय वर्ष 31 मार्च को खत्म होने वाला है और ऐसे में हर कोई अपनी कमाई को निवेश करने और साथ ही टैक्स बचाने के रास्ते खोज रहा है। अपने परिवार की देखभाल करते हुए आर्थिक रूप से तरक्की करने और टैक्स बचाने के लिए हेल्थ इंश्योरेंस एक बढ़िया तरीका है। यह अनोखा निवेश न सिर्फ आपके स्वास्थ्य की रक्षा करता है बल्कि इनकम टैक्स एक्ट 80D के तहत कटौती का लाभ उठाने का एक बेहतर अवसर भी देता है। इस एक्ट के जरिए आप अपने और अपने फैमिली मेंबर्स के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर सालाना 1 लाख रुपये तक का टैक्स बचा सकते हैं। ये कटौती आपकी और आपके परिवार के सदस्यों की उम्र के आधार पर तय होती है। रिलायंस जनरल इंश्योरेंस एक विश्वसनीय बीमा कंपनी है, जो विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किए गए कई तरह के हेल्थ इंश्योरेंस पेश करती है। हर पॉलिसी को व्यापक कवरेज प्रदान करने के लिए बनाया गया है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि व्यक्ति और परिवार चिकित्सा खर्चों के वित्तीय बोझ से सुरक्षित रहें।

रिलायंस हेल्थ ग्लोबल एक इंटरनेशनल हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी है। यह दुनिया भर के फेमस हॉस्पिटल्स को कवर करती है, जिसमें अमेरिका और कनाडा के हॉस्पिटल भी शामिल हैं। यह पॉलिसी निर्धारित इलाजों जैसे सर्जरी और ट्रांसप्लांट को कवर करती है। इसमें आपको व्यापक सुरक्षा के लिए अधिकतम 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक का बीमा राशि मिलता है। गौर करने वाली बात यह है कि ये भारत के अंदर इमरजेंसी और प्लांड ट्रीटमेंट्स के लिए अनलिमेटेड बीमा राशि वाली पहली इंटरनेशनल हेल्थ पॉलिसी है। आपको कम बजट में भी ढेर सारे फायदे देता है। यह बीमा योजना 5 करोड़ रुपये तक के कवरेज के साथ आती है। इसमें अस्पताल में भर्ती होने से पहले और बाद के खर्चों के लिए भी बढ़ा हुआ लाभ मिलता है। साथ ही, आप अपनी पॉलिसी में कई तरह के आकर्षक ऐड-ऑन चुन सकते हैं, जैसे कि रिस्टोर बेनिफिट्स, ओपीडी कवर और मैटरनिटी कवर। यह सब मिलकर रिलायंस हेल्थ इंफिनिटी इंश्योरेंस को एक व्यापक और किफायती हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी बनाते हैं। इतना ही नहीं, आपको ये सभी फायदे आकर्षक छूट पर मिलते हैं।

जीवन की अप्रत्याशित घटनाओं से निपटने के लिए Reliance Health Gain Policy एक बढ़िया हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी है। यह पॉलिसी आपको अपने हिसाब से कवरेज चुनने की सुविधा देती है, जिसे #MeriPolicyMeriChoice प्लान कहते हैं। आप ₹1 करोड़ तक के कवरेज को अपने पसंद के अनुसार बना सकते हैं। साथ ही, इस पॉलिसी में आपके बीमा राशि की बहाली की कोई सीमा नहीं होती है और कमरे के किराए पर भी कोई सीमा नहीं होती है। इसका मतलब है कि आपकी पॉलिसी आपकी हेल्थ से कोई समझौता नहीं करने देगी। रिलायंस हेल्थ सुपर टॉप अप आपकी मेडिकल इमरजेंसी के आधार पर बेहतर सुरक्षा कवर देती है। यह पॉलिसी आपके प्राथमिक स्वास्थ्य बीमा की सीमा समाप्त हो जाने पर भी आपके चिकित्सा खर्चों को कवर करने का एक अतिरिक्त उपाय प्रदान करती है। यह ₹5 लाख से ₹1.30 करोड़ के बीच की बीमा राशि के साथ-साथ दुनिया भर में वर्ल्डवाइड इमरजेंसी, मैटरनिटी कवर और कई छूट जैसे कई लाभ प्रदान करती है। हेल्थ इंश्योरेंस में इन्वेस्ट करना सिर्फ आपके परिवार की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने से कहीं ज्यादा है। लाख रुपये तक का टैक्स बचा सकते हैं। ये कटौती आपकी और आपके परिवार के सदस्यों की उम्र के आधार पर तय होती है। रिलायंस जनरल इंश्योरेंस एक विश्वसनीय बीमा कंपनी है, जो विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किए गए कई तरह के हेल्थ इंश्योरेंस पेश करती है। हर पॉलिसी को व्यापक कवरेज प्रदान करने के लिए बनाया गया है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि व्यक्ति और परिवार चिकित्सा खर्चों के वित्तीय बोझ से सुरक्षित रहें।यह टैक्स बचाने के लिए भी एक शानदार प्लानिंग है। यह सब मिलकर रिलायंस हेल्थ इंफिनिटी इंश्योरेंस को एक व्यापक और किफायती हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी बनाते हैं। इतना ही नहीं, आपको ये सभी फायदे आकर्षक छूट पर मिलते हैं।एक्ट 80D के तहत मिलने वाले कर लाभ हेल्थ पॉलिसी प्रीमियम को आपके कर दायित्व को कम करने का एक आकर्षक तरीका बनाते हैं। रिलायंस जनरल इंश्योरेंस के विभिन्न हेल्थ पॉलिसी प्रोडक्ट्स की रेंज सुनिश्चित करते हैं कि आपकी जरूरी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को सटीक रूप से पूरा किया जाए।

ऐसा समय जब सभी लोग नहीं दे पाते थे वोट!

एक ऐसा भी समय था जब सभी लोग वोट नहीं दे पाते थे! आज 18 साल से ऊपर के हर व्यक्ति को वोट देने का अधिकार है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। साल 1988 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते संसद ने संविधान में 61वां संशोधन किया और उसके जरिए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में वोट देने के लिए मिनिमम एज 21 से घटाकर 18 साल की गई। लेकिन आजादी के पहले तो 21 साल वालों को भी वोट देने का अधिकार नहीं था। आजादी के पहले इस बारे में लंबी बहसें हुईं कि सभी वयस्कों को मताधिकार मिलना चाहिए या नहीं। इसके विरोध में दलीलें दी गईं कि वयस्क मताधिकार शुरू करने से वोटरों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि वोटिंग का इंतजाम करना मुश्किल हो जाएगा। दूसरी दलील यह थी कि वोटर साक्षर नहीं होगा, तो वह अपने मताधिकार का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाएगा और चुनाव व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

कांग्रेस के नेताओं के दबाव में अंग्रेजों ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत प्रांतीय चुनाव तो कराए, लेकिन उसमें सभी लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया। साक्षरता, जाति, जमीन-जायदाद और टैक्स पेमेंट जैसे कई पैमाने लगाकर अधिकतर लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। बमुश्किल 14% लोगों को वोट देने का अधिकार दिया। राजे-रजवाड़ों के कब्जे वाली रियासतों में तो और भी बुरा हाल था। 1928 में भारत के संविधान की बुनियादी बातें तय करने के लिए जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में जो कमिटी बनाई गई थी, उसने वयस्क मताधिकार को सही माना था। पहले गोलमेज सम्मेलन में इस बारे में जो उप-समिति बनी, उसका भी कहना था कि इसे लागू किया जाना चाहिए। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी सुकुमार सेन।हालांकि 1932 में रिपोर्ट देने वाली इंडियन फेंचाइजी कमिटी इस नतीजे पर पहुंची कि वयस्क मताधिकार का फैसला राज्यों पर छोड़ देना चाहिए।

बाद में संविधान सभा की फंडामेंटल राइट्स सब-कमिटी और माइनॉरिटीज सब-कमिटी ने कहा कि वयस्क मताधिकार को भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया जाए। माइनॉरिटीज और फंडामेंटल राइट्स से जुड़ी अडवाइजरी कमिटी ने इस सलाह को ठीक तो माना, लेकिन सुझाव यह दिया कि मौलिक अधिकार बनाने के बजाय वयस्क मताधिकार की बात को संविधान में कहीं और दर्ज किया जाए। लिहाजा संविधान के आर्टिकल 326 में यह प्रावधान किया गया कि संसद और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। इस तरह 1951-52 के पहले चुनाव से आजाद भारत में वयस्क मताधिकार लागू हो गया।

26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ। अंतरिम सरकार की अगुआई कर रहे थे जवाहरलाल नेहरू। संविधान लागू होने के साथ ही उन्होंने चुनाव को लेकर जल्दबाजी दिखानी शुरू कर दी। वह नहीं चाहते थे कि पड़ोसी पाकिस्तान की तरह भारत में लोकतंत्र को लेकर किसी तरह का संशय पैदा हो। लेकिन दिक्कत यह थी कि जिस चुनाव आयोग को चुनाव करवाने की जिम्मेदारी निभानी थी, वह भी तो नया-नया ही बना था और बिना किसी अनुभव के। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी सुकुमार सेन।

नेहरू चाहते थे कि 1951 के शुरुआती महीनों में चुनाव हो जाए, लेकिन सेन ने उनसे वक्त मांगा। उन्हें कई गुणा-गणित करने थे। तब लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होने थे। उस समय लोकसभा की 489 सीटें थीं और निर्वाचन क्षेत्र 401, इनमें से 86 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे थे, जिन पर दो जनप्रतिनिधि चुने जाने थे। एक सांसद एससी या एसटी समुदाय का होना था। वहीं, एक सीट ऐसी भी थी, जहां से तीन जनप्रतिनिधियों का चयन होना था। सेन को लगभग साढ़े 17 करोड़ आबादी के लिए वोटिंग का इंतजाम करना था। और सबसे बढ़कर उनके बारे में सोचना था, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते। उनके सामने सवाल थे कि ये लोग दर्जनों उम्मीदवारों के बीच अपनी पसंद के कैंडिडेट को कैसे पहचानेंगे?भारत को अपना भविष्य ही नहीं गढ़ना था, बल्कि दुनिया को भी जवाब देना था, तो तैयारी शुरू हुई। हर चीज भव्य और बड़े पैमाने पर। साढ़े 16 हजार क्लर्क 6 महीने के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए। इनको कड़ी ट्रेनिंग दी गई। 19.60 लाख पोलिंग स्टेशन बने। लगभग 20 लाख बुलेटप्रूफ बैलट बॉक्स तैयार करवाए गए। हर निर्वाचन क्षेत्र में हर उम्मीदवार के लिए अलग रंग का बैलट बॉक्स, जिस पर उसका नाम और चुनाव चिह्न भी था। इन बॉक्स को पोलिंग स्टेशन तक पहुंचाने से पहले उस गांव-टोले तक सड़क पहुंची। हिंद महासागर में स्थित छोटे-छोटे द्वीपों तक नावें सामान लेकर गईं।

मोदी सरकार की गारंटी पर क्या बोले मल्लिकार्जुन खड़गे?

हाल ही में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार की गारंटी पर एक बयान दिया है! कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मंगलवार को कहा कि देश बदलाव चाहता है तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की गारंटी का वही हश्र होने जा रहा है जो 2004 में ‘इंडिया शाइनिंग’ भारत उदय नारे का हुआ था। उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में यह भी कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के घोषणा पत्र को घर-घर तक ले जाना होगा। कार्य समिति की बैठक घोषणा पत्र को अंतिम रूप देने के लिए बुलाई गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी इस लोकसभा चुनाव में जो वादे करने जा रही है, उन्हें वह पूरा करेगी। उन्होंने कहा, “हम वादे करने के पहले गहराई से यह पड़ताल कर लेते हैं कि उनको पूरा कर पाएंगे या नहीं।खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है। इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की पांच गारंटी का उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।” खरगे ने कहा कि देश बदलाव चाहता है। मौजूदा सरकार की गारंटी का वही हश्र होने जा रहा है जो 2004 में ‘इंडिया शाइनिंग’ नारे का हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि इसीलिए कांग्रेस का घोषणापत्र 1926 से देश के राजनीतिक इतिहास में ‘भरोसे का दस्तावेज’ बना हुआ है। कांग्रेस का घोषणा पत्र पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली समिति ने तैयार किया है। खरगे के अनुसार, ”समिति ने प्रयास किया कि हमारा घोषणा पत्र सिर्फ अकादमिक कवायद न रहे, बल्कि उसमें व्यापक जन भागीदारी हो। इसके लिए संपर्क और संवाद किया गया। वेबसाइट “आवाज भारत की” के जरिये लोगों से सुझाव आमंत्रित किए गए थे।

उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस यात्रा से जुड़े मुद्दों की देश विदेश में बहुत चर्चा हुई है। इससे हम देश का ध्यान जनता के असली मुद्दों पर खींच पाए। इस यात्रा का समापन 16 मार्च को मुंबई में हुआ। खरगे ने कहा, “मुंबई हमारे लिए ख़ास तौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी पार्टी की स्थापना मुंबई में ही हुई थी। हमारे स्वाधीनता आंदोलन को ताक़त भी 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान मुम्बई से ही मिली थी। बड़ी ख़ुशी की बात है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का समापन भी मुंबई में ही हुआ।

खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है।उनको पूरा कर पाएंगे या नहीं।खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है। इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की पांच गारंटी का उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।” इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की मुंबई हमारे लिए ख़ास तौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी पार्टी की स्थापना मुंबई में ही हुई थी। हमारे स्वाधीनता आंदोलन को ताक़त भी 1942 में ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन के दौरान मुम्बई से ही मिली थी। बड़ी ख़ुशी की बात है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का समापन भी मुंबई में ही हुआ।उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।”

आखिर कैसे किया जाता है लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कैसे किया जाता है! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज गई है। यूपी की 80 सीटों समेत देश की 543 लोकसभा सीटों पर चुनाव का शंखनाद हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से तारीखों का ऐलान होते ही जिला स्तर पर चुनावी तैयारियां शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन की ओर से तमाम चुनाव तैयारियां को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस क्रम में चुनाव आयोग के निर्देश पर निर्वाचन शाखा का निर्माण पहले ही किया जा चुका है। जिलों के डीएम लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्य निर्वाचन अधिकारी की भूमिका में रहेंगे। उनके स्तर पर ही लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार अपने नामांकन पत्रों को जमा कराएंगे। नामांकन पत्रों को जमा करना लोकसभा चुनाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसके तहत उम्मीदवार अपने नाम को चुनाव आयोग के समक्ष रजिस्टर करते हैं। वे दावा करते हैं कि लोकसभा चुनाव के मैदान वे जनता का वोट हासिल करने के लिए सही दावेदार हैं। देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद 20 मार्च से नामांकन फॉर्म भरे जाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। पहले चरण की वोटिंग 19 अप्रैल को होगी। वहीं, 1 जून को आखिरी चरण का मतदान और 4 जून को मतगणना के बाद रिजल्ट का प्रकाशन किया जाएगा। प्रत्याशियों की ओर से जमा कराए गए तमाम प्रमाण पत्रों की जांच के बाद चुनाव आयोग उनकी लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी तय करती है। चुनाव आयोग की ओर से प्रत्याशियों को उम्मीदवार के रूप में रजिस्टर्ड घोषित किया जाता है। उम्मीदवारी फाइनल होने के बाद ही प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर कर अपना प्रचार अभियान तेज कर अपने पक्ष में वोट मांग सकते हैं। उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला आखिरकार जनता अपनी वोट की ताकत के जरिए करती है। इस प्रक्रिया में नॉमिनेशन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

लोकसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद जिला स्तर पर चुनाव की घोषणा होगी। चुनाव आयोग के निर्देश पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी सह जिलाधिकारी की ओर से चुनाव कार्यक्रम का प्रेस नोट जारी किया जाएगा। अमूमन सभी चरणों के लिए यह प्रक्रिया जिलों में एक साथ पूरी कराई जा सकती है। साथ ही, चुनाव का नामांकन शुरू होने से पहले से भी डीएम की तरफ से इस संबंध में मीडिया के जरिए लोगों को प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी जाती है। इसके बाद योग्य उम्मीदवार जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष पहुंच कर अपना नामांकन पेपर दाखिल करते हैं।

लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी लोकसभा सीट के लिए नामांकन कर सकते हैं। इसके लिए उनका वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य होता है। जब किसी उम्मीदवार को किसी राजनैतिक पार्टी की ओर से प्रत्याशी बनाया जाता है, तो सामान्य तौर पर इसे पार्टी का टिकट मिलना शब्द से संबोधित किया जाता है। सिंबल के साथ प्रत्याशी अपना नामांकन दाखिल करते हैं। ऐसे में उन्हें चुनाव आयोग की ओर से संबंधित पार्टी सिंबल का आवंटन किया जाता है। इसके अलावा देश का कोई भी नागरिक सांसद बनने के लिए नामांकन कर सकता है।

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने सात चरणों में चुनावी प्रक्रिया पूरी करने का ऐलान किया है। अलग- अलग लोकसभा सीटों के लिए निर्वाची पदाधिकारी और ऑर्ब्जवर्स की नियुक्ति की गई है। उम्मीदवार जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में पहुंच कर नामांकन फॉर्म जमा कर सकते हैं। नामांकन पत्र के साथ उम्मीदवारों को जमानत राशि के रूप में निर्धारित रकम भी जमा करानी होती है। चुनाव अधिकारी के मुताबिक उम्मीदवार नामाकंन के दौरान सीमित संख्या में गाड़ी का इस्तेमाल करना होता है। इसके अलावा वाहनों को निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से 100 मीटर पहले खड़ा किया जाता है। नामाकंन के दौरान निर्वाचन अधिकारी की स्वीकृति के बिना कोई उम्मीदवार ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।

उम्मीदवर को नामांकन पेपर के साथ शपथ पत्र भी देना होता है। नोटरी के स्तर पर इस शपथ पत्र को तैयार कराया जाता है। इसमें प्रत्याशी अपनी आय- व्यय के ब्यौरा से लेकर पूरी जानकारी भरता है। लोकसभा सीट पर उम्मीदवार बनने से पहले नामांकन पत्र भरना होता है। जरूरी कागजों में प्रत्याशी को अपने पासपोर्ट साइज फोटो, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र की फोटोकॉपी जैसे कागजों की जरूरत होती है। विधायक बनने से पहले नामांकन पत्र में अपनी चल- अचल संपत्ति का ब्यौरा, पत्नी और आश्रित बच्चों की भी आय- व्यय एवं लोन की पूरी जानकारी देनी पड़ती है। इसके अलावा उम्मीदवारों के कितने हथियार हैं, कितने जेवर हैं और शैक्षणिक जानकारी भी देनी होती है। आय के साधन को भी यहां अंकित करना होता है। इसके अलावा प्रत्याशी पर कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं? कितने मामले कोर्ट में चल रहे हैं? क्या किसी मामले में सजा हुई है? इन सभी का विवरण एफिडेविट के माध्यम से सही- सही देना होता है।

नामांकन फॉर्म भरने के बाद भारत निर्वाचन आयोग की ओर से नामांकन फॉर्म की जांच और नाम वापसी जैसी प्रक्रियाओं को पूरा कराया जाता है। लोकसभा चुनाव 2024 के उम्मीदवारों को चुनाव आयोग ने साफ किया है कि अपने नामांकन पत्र को भरते समय उम्मीदवार पूरी सावधानी बरतें और नामांकन पत्र का कोई भी कॉलम खाली न छोड़ें। ऐसा करने वालों पर नामांकन पत्र अवैध माना जाएगा। ऐसे नामांकन फॉर्म खारिज कर दिए जाएंगे। आयोग की ओर से कहा गया है कि राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अपने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों, रिटर्निंग आफिसर को इस संबंध में निर्देश जारी करें। प्रत्याशियों की ओर से दाखिल किए जाने वाले नामांकन पत्र और उसके साथ संलग्न किए जाने वाले शपथ पत्र की बारीकी से जांच की जाए। सूचना के अधिकार कानून के अनुच्छेद- 33ए का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उम्मीदवार को नामांकन पत्र में केस के संबंध में स्पष्ट उल्लेख करना होगा। बताना होगा कि वह किसी आपराधिक मामले में दो साल या इससे अधिक की सजा पा चुका है या फिर उसे किसी मामले में एक साल या इससे अधिक की सजा मिल चुकी है?

नामांकन करने और स्क्रूटनी में सही पाए जाने वाले उम्मीदवारों को अपना नाम वापस लेने की सुविधा होगी। भारत निर्वाचन आयोग की ओर से इसके लिए समय सीम का निर्धारण किया गया। उस समय अवधि में प्रत्याशी अपनी मर्जी से नाम वापस ले सकता है। इसके लिए एक एफिडेविट पर घोषणा पत्र देना होता है। इसमें नाम वापसी करने की डिटेल लिखी होती है। वेरिफाई करने के बाद प्रत्याशी का नाम वापस कर दिया जाता है।