Home Blog Page 803

आखिर क्या है गैस लाइटिंग?

आज हम आपको गैस लाइटिंग के संदर्भ में जानकारी देने वाले हैं! 1944 में एक साइकॉलजिकल थ्रिलर आई थी ‘Gaslight’। फिल्म की कहानी कुछ यूं है। Gregory और Paula शादीशुदा हैं। Gregory को कोशिश Paula को मेंटल हॉस्पिटल भेजने की है ताकि वह पत्नी के जेवरात पर कब्जा कर सके। वह इसके लिए कई हथकंडे आजमाता है। एक बार वह Paula के पर्स से एक जेवर चुरा लेता है और उसके मन में संदेह बिठाने की कोशिश करता है कि उसने जेवर पर्स में रखा ही नहीं था। एक दफा वह घड़ी छुपा देता है और Paula पर उसे चुराने का इल्जाम लगाता है। फिर उसे ढूंढ निकालने का दिखावा करता है। इन घटनाओं में वह खुद को सही और Paula को झूठा साबित करने की कोशिश करता है। इसलिए ताकि वह Paula को यकीन दिला सके कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। फिल्म में Paula की भूमिका Ingrid Bergman और Gregory का रोल Charles Boyer ने निभाया था। Gregory फिल्म में Paula को उसकी खराब मानसिक स्थिति का यकीन दिलाने के लिए जो करतूतें करता है, उसे ‘Gaslighting’ कहते हैं। डिक्शनरी में यह शब्द इस फिल्म से ही आया। इसी विषय पर Kate Abramson की किताब आई है, जिसका नाम है ‘On Gaslighting’। वह लिखती हैं कि 1980 के दशक में इस शब्द ने मेडिकल की दुनिया में जगह बनाई और उसके बाद से इसका इस्तेमाल बढ़ता ही गया है।

gaslighters का व्यवहार कैसा होता है। वे अक्सर अपने टारगेट से कहते हैं कि इतनी भावुकता की जरूरत नहीं है या तुम ओवररिएक्ट कर रहे हो या तुम्हें तो दिन में भी सपने आ रहे हैं। Kate इस चलन से सावधान करते हुए कहती हैं कि लोगों को थेरेपी की शब्दावली का इस्तेमाल यूं ही नहीं करना चाहिए। वह बताती हैं कि अक्सर झूठ बोलने, बरगलाने की कोशिश करने और अपराधबोध को मिलाया जा रहा है। Kate लिखती हैं कि बेशक ये सारी बातें बुरी हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि जो ऐसा कर रहा है, वह आपको ‘Gaslight’ कर रहा हो। वह सलाह देती हैं कि इस शब्द का प्रयोग बिल्कुल खास मामलों में होना चाहिए. जहां साजिशन ऐसा हो रहा हो।

Kate लिखती हैं कि Gaslighting के कई आयाम होते हैं। कई पहलू और बारीकियां होती हैं। इसलिए किसी भी घटना को Gaslighting कहना मुनासिब नहीं होगा। वह इसे और स्पष्ट करते हुए लिखती हैं कि gaslighter वह शख्स है, जो इसलिए झूठ बोलता है ताकि वह अपने टारगेट को अहसास दिला सके कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। साथ ही, वह उसे पागल बनाने की कोशिश भी कर रहा होता है। इस किताब में फ्रांस की मशहूर लेखिका सिमोन द बोउवा और उनके प्रेमी ज्यां पॉल सार्त्र का भी जिक्र आता है। सिमोन की सार्त्र के साथ बातचीत का जिक्र इस किताब में हुआ है। सिमोन उस बारे में बताती हैं कि वह उनके नजरिये को न सिर्फ खारिज करते थे, बल्कि उसे तार-तार कर देते थे। इससे सिमोन को लगने लगा कि उनकी सोच सही नहीं है। एक दौर आया जब सिमोन को लगने लगा, ‘मुझे नहीं पता मैं क्या सोचती हूं या मेरे अंदर सोचने की क्षमता रह भी गई है?’

Kate लिखती हैं कि यह बात सही है कि gaslighters किसी के प्रेम और भरोसे को हथियार बनाकर उसे मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन gaslighters को अक्सर पता नहीं होता कि वे ऐसा कर रहे हैं। वह यह भी लिखती हैं कि यह घटना लंबी अवधि में घटती है। लेखिका ने यह भी बताया है कि आमतौर पर ऐसा कपल्स के बीच होता है, लेकिन माता-पिता भी यह गलती कर सकते हैं। ऑफिस के अंदर भी ऐसा हो सकता है। यहां इसका शिकार ऐसे व्यक्ति को बनाया जाता है, जो पहले से हाशिये पर है और छोटे ग्रुप का हिस्सा है। अगर किसी कर्मचारी के साथ ऑफिस में बहुत बुरा बर्ताव होता है और बॉस उसे छोटी घटना के तौर पर दिखाने की कोशिश करता है तो वह Gaslighting है। वह आपको ‘Gaslight’ कर रहा हो। वह सलाह देती हैं कि इस शब्द का प्रयोग बिल्कुल खास मामलों में होना चाहिए. जहां साजिशन ऐसा हो रहा हो।यह किताब बताती है कि कई बार नस्लवाद और मर्दवादी सोच को सही ठहराने के लिए भी इसका एक औजार के तौर पर प्रयोग होता है। इसलिए वह गुजारिश करती हैं कि अगर ऑफिस जैसे संस्थानों में ऐसा हो रहा हो तो उसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है।

आखिर कौन है आरएसएस के दत्तात्रेय होसबाले?

आज हम आपको आरएसएस के दत्तात्रेय होसबाले के बारे में बताने जा रहे हैं!  दत्तात्रेय होसबाले को फिर संघ का सरकार्यवाह चुना गया है। होसबाले को 2021 में चार बार से संघ के नंबर दो का पद संभाल रहे भैय्या जी जोशी की जगह पर नया सरकार्यवाह बनाया गया था। सरकार्यवाह संघ में नंबर दो पोजिशन है लेकिन यह पद सबसे अहम माना जाता है क्योंकि यह नीतियों को जमीन पर उतारने के लिहाज से सबसे बड़ा है। यानी कहें तो व्यवहारिक स्तर पर सरकार्यवाह आरएसएस का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होता है। सरसंघचालक यानी संघ प्रमुख मूलतः राजनीतिक और वैचारिक दिशा-निर्देश देने तक सीमित रहते हैं जबकि रोजमर्रा के काम की निगरानी सरकार्यवाह ही करते हैं। सरकार्यवाह की एक बड़ी भूमिका उसकी राजनीतिक संस्था भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के साथ तालमेल बिठाने की भी होती है। ऐसे में दत्तात्रेय होसबाले को फिर से तीन साल के लिए सरकार्यवाह का दायित्व देना अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। दोनों के बीच अच्छा तालमेल है। होसबाले संघ में ‘शाखा तंत्र’ से बाहर के पहले सरकार्यवाह हैं। दत्तात्रेय होसबाले शुरू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी में रहे हैं। आरएसएस की विचारधारा को बीजेपी में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आरएसएस के मूल्यों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच विचारों और नीतियों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।वो कर्नाटक के रहने वाले हैं। आरएसएस और बीजेपी के बीच तालमेल बिठाने में सरकार्यवाह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे दोनों संगठनों के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं, विचारों और नीतियों का आदान-प्रदान करते हैं और समन्वय स्थापित करते हैं।

सरकार्यवाह RSS के विचारों और नीतियों को बीजेपी तक पहुंचाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं को आरएसएस के दृष्टिकोण से अवगत कराते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सरकार्यवाह चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेतृत्व के साथ मिलकर काम करते हैं और चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए योजनाएं बनाते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच बैठकों और कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, और सदस्यों के बीच समन्वय को बढ़ावा देते हैं।

सरकार्यवाह आरएसएस की विचारधारा को बीजेपी में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आरएसएस के मूल्यों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच विचारों और नीतियों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने और विचारधारा को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए अगला साल बेहद अहम होने वाला है। 2025 में संगठन के 100 साल पूरा होने वाले हैं। संघ इस मौके पर पूरे साल की स्तर पर जनसंवाद और जनसंपर्क अभियान चलाने वाली है। संघ में मौजूदा बदलाव को उस प्रिज्म से देखा जा रहा है। पिछले कुछ सालों से संघ ने अपनी शाखाओं में काफी वृद्धि की है। शताब्दी वर्ष में आएरएसएस गांव-गांव में अपनी शाखाओं का विस्तार करने के मिशन पर है।फिर से तीन साल के लिए सरकार्यवाह का दायित्व देना अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। दोनों के बीच अच्छा तालमेल है। होसबाले संघ में ‘शाखा तंत्र’ से बाहर के पहले सरकार्यवाह हैं। दत्तात्रेय होसबाले शुरू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी में रहे हैं। वो कर्नाटक के रहने वाले हैं। आरएसएस और बीजेपी के बीच तालमेल बिठाने में सरकार्यवाह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने और विचारधारा को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी उद्देश्य से बदली जरूरत को देखते हुए संघ भी अपनी टीम में बदलाव और विस्तार करने की कोशिश में है और अगले कुछ दिनों में कई और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

आखिर क्या है राहुल गांधी का शक्ति वाला बयान?

आज हम आपको राहुल गांधी का शक्ति वाला बयान बताने जा रहे हैं! कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी के एक और बयान पर बीजेपी ने घोर आपत्ति जताते हुए हमलावर हो गई है। राहुल गांधी ने हिंदू धर्म के ‘शक्ति’ शब्द का जिक्र करते हुए कहा कि वो शक्ति से लड़ रहे हैं तो बीजेपी ने इसे सनातन धर्म का एक और अपमान बता दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राहुल गांधी के इस बयान पर तमतमाए चेहरे से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, मैं इस चुनौती को स्वीकार करता हूं और मैं इन शक्ति स्वरूपा माताओं-बहनों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दूंगा। बता दें कि राहुल गांधी ने शक्ति के खिलाफ लड़ने का बयान दिया। राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं।उन्होंने कहा, ‘हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम शक्ति से लड़ रहे हैं, एक शक्ति से लड़ रहे हैं।’ राहुल बोले, ‘अब सवाल उठता है, वो शक्ति क्या है? जैसे किसी ने यहां कहा- राजा की आत्मा ईवीएम में है। सही है, सही है। राजा की आत्मा ईवीएम में है। हिंदुस्तान की हर संस्था में है। ईडी में है, सीबीआई में है, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में है।’ प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी के बयान का जवाब तेलंगाना के जगतियाल स्थित एक सभा को संबोधित करते हुए दिया। सभा में भारी संख्या में मौजूद महिलाओं को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, ‘इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं। मैं भारत मां का पुजारी हूं।

मैं आप शक्ति स्वरूपा माता, बहन, बेटियों का भी पुजारी हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘इंडी अलायंस ने कल शिवाजी पार्क से जारी अपने घोषणा पत्र में शक्ति को खत्म करने का ऐलान किया है। मैं इस चुनौती को स्वीकार करता हूं और मैं इन शक्ति स्वरूपा माताओं-बहनों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दूंगा। जीवन खपा दूंगा।’राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि राहुल गांधी ने डीएमके नेता उदयनिधि स्टालीन की तरह ही सनातन के खिलाफ बोल रहे हैं।

एक ओर शक्ति के विनाश की बात करने वाले लोग हैं, दूसरी ओर शक्ति की पूजा करने वाले लोग हैं। मुकाबला 4 जून को हो जाएगा कि कौन शक्ति का विनाश कर सकता है और कौन शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। दरअसल, विपक्षी गठबंधन ने मुंबई के शिवाजी पार्क से रविवार को अपना घोषणा पत्र जारी किया। उसी मौके पर राहुल गांधी ने शक्ति के खिलाफ लड़ने का बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम शक्ति से लड़ रहे हैं, एक शक्ति से लड़ रहे हैं।’ राहुल बोले, ‘अब सवाल उठता है, वो शक्ति क्या है? जैसे किसी ने यहां कहा- राजा की आत्मा ईवीएम में है। सही है, सही है। राजा की आत्मा ईवीएम में है। हिंदुस्तान की हर संस्था में है। ईडी में है, सीबीआई में है, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में है।’

राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं। मैं भारत मां का पुजारी हूं। मैं आप शक्ति स्वरूपा माता, बहन, बेटियों का भी पुजारी हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘इंडी अलायंस ने कल शिवाजी पार्क से जारी अपने घोषणा पत्र में शक्ति को खत्म करने का ऐलान किया है।पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि राहुल गांधी ने डीएमके नेता उदयनिधि स्टालीन की तरह ही सनातन के खिलाफ बोल रहे हैं।

वर्तमान में लोग लड़का या लड़की में किसको ले रहे हैं सबसे ज्यादा गोद?

आज हम आपको बताएंगे कि वर्तमान में लोग लड़का या लड़की में से किसे सबसे ज्यादा गोद ले रहे हैं! मरने के बाद हमारा का अंतिम संस्कार कौन करेगा? हिंदू समाज में नि:संतान बुजुर्ग आदमी या औरत बेटे के हाथों अंतिम संस्कार से स्वर्ग पाने की लालसा मन में पाले रहते हैं। हिंदू धर्म में बेटे के हाथों अंतिम संस्कार के महत्व वर्णन भी पढ़ने-सुनने को मिलता है। अंतिम संस्कार के अलावा और कई कारणों से नि:संतान दंपती बड़े चाव से बच्चे को गोद लेते हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय से लड़कों को गोद लेने की पारंपरिक लालसा में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पिछले दो साल में हिंदू अडॉप्शन और मेंटिनेंस एक्ट के तहत बच्चा गोद लेने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही देश में लड़कियों को गोद लेने की प्राथमिकता में उल्लेखनीय झुकाव देखा गया है। इसमें सबसे हैरानी की बात यह है कि पंजाब इस ट्रेंड लड़कियों को गोद में सबसे आगे दिख रहा है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से केंद्र सरकार की तरफ से पेश आंकड़े इस ट्रेंड को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं जो वैदिक युग जितनी पुरानी है। जबकि 10 राज्यों ने पिछले साल 20 नवंबर को हाई कोर्ट की तरफ निर्देशित एचएएमए के तहत गोद लेने से संबंधित डेटा प्रस्तुत नहीं किया था। एएसजी ने 11 राज्यों द्वारा रिकॉर्ड पर रखा गया डेटा प्रस्तुत किया। इसमें 2021-2023 की अवधि में कुल 15,486 गोद लेने की बात दर्ज की गई थी। एचएएमए के तहत दर्ज किए गए कुल गोद लेने में से, गोद लेने वाले माता-पिता ने 6,012 लड़कों मुकाबले 9,474 लड़कियों को घर ले जाना पसंद किया।

हालांकि, गोद लिए गए बच्चों की पसंदीदा उम्र छह साल से कम रही, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी टेबल से पता चलता है कि 69.4% रजिस्टर्ड भावी दत्तक माता-पिता 0 से 2 वर्ष की आयु के बच्चों को चुनते हैं। 2 से 4 वर्ष के आयु वर्ग में 10.3% और 4 से 6 वर्ष के आयु वर्ग में 14.8% भावी माता-पिता ने रुचि दिखाई। पंजाब और चंडीगढ़ भारत में लैंगिक समानता की दिशा में आगे बढ़ने में अग्रणी बनकर उभरे हैं। आंकड़ों से ऐसा लगता होता है कि गोद लेने में इन दोनों पर जोर दिया जा रहा है। राज्य में एचएएमए के तहत पंजीकृत कुल 7,496 गोद लेने वालों में से 4,966 लड़कियां और 2,530 लड़के थे। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में गोद लिए गए कुल 167 बच्चों में से 114 लड़कियां थीं।

हिमाचल प्रदेश के दंपतियों ने 2,107 बच्चों 1,278 लड़कियों को गोद लिया। तमिलनाडु 1,671, 985 लड़कियां; दिल्ली में 1,056, 558 लड़कियां; उत्तराखंड में 685 472 लड़कियां; आंध्र प्रदेश में 1,415, 835 लड़कियां बच्चों को गोद लिया गया। इसके अलावा ओडिशा में 291 165 लड़कियां बच्चों को गोद लिया गया। वहीं, तेलंगाना के हिंदू जोड़ों ने लड़कों को गोद लेना अधिक पसंद किया। यहां कुल 242 बच्चों को गोद लिया गया जिनमें से महज 48 लड़कियां थीं। पश्चिम बंगाल में कपल ने कुल 228 बच्चों को गोद लिया, जिनमें से 112 लड़कियां थीं। उत्तर प्रदेश के नोएडा में सेक्टर-39 थाना एरिया से संदिग्ध परिस्थितियों में पिछले 19 दिन से लापता कारोबारी का बेटा मिल गया है। यह बच्चा सीडब्ल्यूसी के ऑफिस में मिला। वहां पर एक दंपती इसे आधिकारिक रूप से गोद लेने के लिए पहुंचे हुए थे। एक मंदिर के पास भटकते मिले बच्चे ने इस दंपती को बताया था कि उसका कोई नहीं है और वह अनाथ है। इसलिए पति-पत्नी गोद लेने ने की प्रक्रिया के लिए उसे लेकर गए थे। इतने में भटकते हुए कारोबारी का परिवार भी वहां पहुंच गया।

फिर पुलिस पहुंची और इस हाईप्रोफाइल गुमशुदगी का खुलासा हो गया। थाना प्रभारी सेक्टर-39 ने बताया कि बच्चे को सेक्टर 12 स्थित सांईं कृपा संस्थान में रखा गया है। आगे सीडब्ल्यूसी में पेश किया जाएगा। बाल कल्याण समिति का जब आदेश होगा, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। जांच के दौरान पुलिस को पता चला है कि बच्चा घर से नाराज होकर चला गया था। 20 नवंबर को हाई कोर्ट की तरफ निर्देशित एचएएमए के तहत गोद लेने से संबंधित डेटा प्रस्तुत नहीं किया था। एएसजी ने 11 राज्यों द्वारा रिकॉर्ड पर रखा गया डेटा प्रस्तुत किया। इसमें 2021-2023 की अवधि में कुल 15,486 गोद लेने की बात दर्ज की गई थी। एचएएमए के तहत दर्ज किए गए कुल गोद लेने में से, गोद लेने वाले माता-पिता ने 6,012 लड़कों मुकाबले 9,474 लड़कियों को घर ले जाना पसंद किया।मालूम हो कि बच्चे की यह गुमशुदगी पूरे कमिश्नरेट पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी। व्यापारी कई पुलिस अधिकारियों से मिले थे। पुलिस की सेक्टर-39 थाना समेत अन्य टीमें भी लगी हुई थीं। परिवारीजन के मन में कई तरह की आशंकाएं आ रहीं थीं। अपहरण की आशंका भी जताई जा रही थी।

ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर एडम ज़म्पा की जगह घरेलू खिलाड़ी तनुश कोटियन को दी गई है.

0

आईपीएल ने दिया रणजी जीतने का इनाम, प्रतियोगिता के पहले दिन करोड़पति लीग बनने का मौका! मुंबई के लिए रणजी विजेता युवा स्पिनर ने टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई. तनुष को राजस्थान रॉयल्स ने चुना। तनुष ऑस्ट्रेलिया के एडम जंपर की जगह टीम में आए थे. तनुष कोटियन कुछ दिन पहले रणजी ट्रॉफी खेल रहे थे. उन्होंने मुंबई के लिए रणजी जीता। टीम की जीत में इस युवा स्पिनर ने अहम भूमिका निभाई. तनुष को राजस्थान रॉयल्स ने चुना। तनुष ऑस्ट्रेलिया के एडम जंपर की जगह टीम में आए थे.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने बार-बार घरेलू क्रिकेट खेलने के लिए कहा है। कई क्रिकेटरों ने इसे स्वीकार नहीं किया. लेकिन राजस्थान रॉयल्स ने अपने विदेशी स्पिनर की जगह घरेलू क्रिकेटर को टीम में शामिल कर लिया और साफ कर दिया कि आईपीएल में मौका पाने के लिए रणजी जरूरी है. तनुष ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 26 मैचों में 75 विकेट लिए हैं। उन्होंने 23 टी20I में 24 विकेट लिए हैं. तनुष बल्ले से भी पारंगत हैं। इसीलिए राजस्थान ने युवा स्पिनर को टीम में लिया है.

जाम्पा ने गुरुवार को ऐलान किया कि वह आईपीएल में नहीं खेल पाएंगे. वह निजी कारणों से आईपीएल नहीं खेलेंगे. उस स्थान पर तनुष को राजस्थान ने चुना। जंपा ने वनडे वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया के लिए बड़ी भूमिका निभाई थी. उनकी जगह टीम में शामिल किए गए तनुष को राजस्थान ने 20 लाख रुपए में अपनी टीम में शामिल किया। राजस्थान के रॉबिन मेंज भी नहीं खेल पाएंगे. वह एक कार दुर्घटना में घायल हो गये थे. उनकी जगह बीआर शरथ को टीम में लिया गया है. कर्नाटक के इस क्रिकेटर ने इस बार रणजी नहीं खेला. लेकिन इस विकेटकीपर-बल्लेबाज ने 28 टी20I में 328 रन बनाए. स्ट्राइक रेट 118.84.

कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के पास एक से बढ़कर एक ओपनर हैं। हालाँकि, पिछली बार एक समस्या थी। इंग्लैंड के फिल साल्ट इस बार रहमानुल्लाह गुरबाज, बेंकटेश एयर्स के साथ जुड़ गए हैं। जिन्होंने वॉर्मअप मैच में धमाकेदार पारी खेलकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. नमक पहले ग्यारह में होगा? वह अभी भी नहीं जानता.

सनराइजर्स हैदराबाद और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच शनिवार को कोलकाता में मुकाबला होगा। आईपीएल शुरू होने से पहले एक और इंग्लिश क्रिकेटर जेसन रॉय ने कहा था कि वह नहीं खेलेंगे. उसके स्थान पर नमक ले लिया गया। एक मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ”केकेआर से जुड़कर बहुत अच्छा लग रहा है. बहुत अच्छी टीम. मेंटर गौतम गंभीर और कोच चंद्रकांत पंडित ने हमें अच्छे से समझाया कि कैसे खेलना है। एक मेंटर के तौर पर गंभीर सभी को अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझाते हैं. वह बहुत जिम्मेदार है. काम के साथ रहना पसंद है. साथ ही टीम में सभी के साथ खूब मस्ती भी की।”

हालांकि धोनी ने भूमिका के बारे में तो साफ किया, लेकिन उन्होंने ये साफ नहीं किया कि साल्ट को टीम की पहली एकादश में मौका मिलेगा या नहीं. साल्ट ने कहा, “मुझे अभी भी नहीं पता कि मुझे शनिवार को खेलने का मौका मिलेगा या नहीं।” साल्ट की अभी तक केकेआर के मालिकों में से एक शाहरुख खान से मुलाकात नहीं हुई है. लेकिन इंग्लिश ओपनर ने उनकी कई फिल्में देखी हैं। सॉल्ट ने कहा, ”मैंने शाहरुख के बारे में पहले ही सुन रखा है. वह एक बड़े स्टार हैं. मैंने शाहरुख की कई फिल्में भी देखी हैं।” सॉल्ट को फिल्में देखने के अलावा गोल्फ खेलना पसंद है। जब उन्हें क्रिकेट से फुर्सत मिली तो वह गोल्फ खेलने चले गए।

आईपीएल के बाद इस बार टी20 वर्ल्ड कप. साल्ट का मानना ​​है कि इससे क्रिकेटरों को अतिरिक्त फायदा मिलेगा. उन्होंने कहा, ”आईपीएल दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टी20 लीगों में से एक है। टी20 वर्ल्ड कप से पहले इस लीग में खेलने से क्रिकेटरों को तैयारी में मदद जरूर मिलेगी. हमारे पास पाकिस्तान के खिलाफ भी कुछ मैच हैं।’ वहां भी तैयारी की जा सकती है।” उन्होंने दिवाली की रात अहमदाबाद की सड़कों पर सो रहे लोगों की आर्थिक मदद की. वह वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया था. वह स्वयं एक गरीब परिवार से थे। प्रैक्टिस पर जाने के लिए मेरी जेब में 10 रुपये भी नहीं थे. शायद वह इतने बड़े दिल वाले इंसान हैं क्योंकि वह विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकले हैं. वह रहमानुल्लाह गुरबाज हैं।

अफगानिस्तान के विकेटकीपर-बल्लेबाज ने पिछली बार कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए 11 मैचों में 227 रन बनाए थे। दो अर्द्धशतक लगे. औसत 20.63. लेकिन इस बार फिल साल्ट उन्हें परखने के लिए टीम में आए हैं. जिनकी आईसीसी रैंकिंग टी20 में दो है. वह इंग्लैंड के मौजूदा ओपनर हैं. व्यवहार में नमक का महत्व कुछ अधिक है। दोनों अभ्यास मैचों में पचास रन बनाये। वह भी रखता है. ऐसे में गुरबाज़ की संभावना सवालों के घेरे में है।

हालाँकि, अफगान स्टार साल्ट को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं देखता है। आनंदबाजार को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में गुरबाज ने कहा, ‘नमक मेरा प्रतिद्वंद्वी नहीं है। पहली एकादश के बारे में सोचना मेरा काम नहीं है। किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहें. ताकि मैं मौके का फायदा उठा सकूं.” इस बार भी अगर शुरू से मौका मिला तो मैं खुद को बर्बाद कर लूंगा.

गुरबाज का मानना ​​है कि केकेआर के मेंटर के रूप में गौतम गंभीर के जुड़ने से उनकी बल्लेबाजी में सुधार होगा। वह कह रहे थे, ”सर गंभीर बहुत मददगार हैं. कोई भी सवाल हो तो वह बड़ी आसानी से समझा देते हैं। उनकी ट्रेनिंग में बल्लेबाजी में सुधार होना तय है।

बीजेपी लोकसभा चुनाव 2024 के लिए पश्चिम बंगाल की दूसरी उम्मीदवार सूची की घोषणा क्यों नहीं कर रही है?

0

बंगाल के बाकी 23 उम्मीदवारों का ऐलान क्यों? इतनी सीटें जीतीं, लड़खड़ाई पद्मा बीजेपी ने 2019 में बंगाल में 18 सीटें जीतीं. लेकिन उनमें से आठ सीटों पर उन्होंने अभी तक उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है. इन सभी सीटों पर उम्मीदवार बदलने की संभावना है। और इसीलिए बीजेपी ने दावा किया है कि लोकसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी जाएगी. वह एपिसोड शुरू हो चुका था. लेकिन यह अभी ख़त्म नहीं हुआ है. 2 अप्रैल को पहली सूची में देश की 194 सीटों में से पश्चिम बंगाल की 20 सीटें थीं। हालांकि, एक सीट के उम्मीदवार ने अपना नाम वापस ले लिया है. नतीजतन, राज्य की 23 सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होनी बाकी है. दूसरे चरण में देश की 72 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची 13 मार्च को जारी की गई थी, लेकिन इसमें बंगाल की एक भी सीट नहीं थी. गुरुवार की तीसरी लिस्ट में नहीं है बांग्ला! बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, बंगाल की कुछ सीटों पर उम्मीदवारों के नाम पर पार्टी के अंदर अभी भी असहमति है. हाल ही में केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य के नेताओं के साथ बैठक भी की थी. उस बैठक में कुछ सीटों पर सहमति नहीं बनने पर बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने कहा था कि अंतिम फैसला वे लेंगे. अब तक जो जानकारी है उससे पता चलता है कि केंद्रीय चुनाव समिति सप्ताहांत में कुछ और सीटों पर मुहर लगा सकती है। उस घोषणा के बाद. जैसा कि पहले दो सूचियों के प्रकाशन में देखा गया था, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के एक दिन बाद उम्मीदवारों की सूची की घोषणा की गई थी। ऐसे में बंगाल के बाकी 23 उम्मीदवारों में से कुछ के नाम उसके बाद सामने आ सकते हैं. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र और राज्य के नेता पहले चार चरणों के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम फाइनल कर पहले ही उनकी घोषणा कर देना चाहते हैं. बाकी तीन चरणों की घोषणा बाद में हो सकती है.

ऐसे में सुकांत मजूमदार और शुभेंदु अधिकारी को दिल्ली तलब किया गया है. उन्हें शनिवार दोपहर को रवाना होना है। शाम या देर रात को उनकी केंद्रीय चुनाव समिति के नेताओं के साथ बैठक हो सकती है.

उम्मीदवार चयन में हो रही देरी को लेकर बीजेपी के भीतर अटकलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. बीजेपी नेता मजाक में कह रहे हैं कि पार्टी का नाम अब ‘भारतीय जलपना पार्टी’ है. सबसे ज्यादा अटकलें 2019 में जीती जाने वाली सीटों पर हैं, जिनके उम्मीदवारों की घोषणा होना बाकी है. पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल में बीजेपी ने एक को छोड़कर सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन इस बार जीती गई तीन सीटों पर उम्मीदवारों के नाम अभी तक सामने नहीं आए हैं. लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही हैं कि पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंगला को दार्जिलिंग सीट से उम्मीदवार बनाया जाएगा. सुनने में यह भी आ रहा है कि श्रृंगला खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा उम्मीदवार हैं. हालांकि, उस सीट के मौजूदा सांसद राजू बिहार का क्या होगा, इसके बारे में अभी तक कुछ पता नहीं है. राजू वह सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, अगर राजू को हटाना है तो उन्हें बंगाल से नहीं, बल्कि अपने ही राज्य मणिपुर से उम्मीदवार बनाया जा सकता है. इसी पेचीदगी के कारण तृणमूल प्रत्याशी गोपाल लामा ने चुनाव प्रचार शुरू किया, लेकिन अब तक पदमा कार्यकर्ताओं ने हाथ पर हाथ धरे रखा है. बिमल गुरुंग की पार्टी भी मूक सहयोगी है. पिछले साल, भाजपा के डॉक्टर उम्मीदवार जयंतकुमार रॉय ने जलपाईगुड़ी निर्वाचन क्षेत्र से 180,000 से अधिक वोटों से जीत हासिल की थी। हालाँकि, पिछले विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने उस निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित सात विधानसभाओं में से केवल तीन में जीत हासिल की थी। इस बात को लेकर अटकलें तेज हैं कि अब तक इस सीट पर उम्मीदवार के नाम की घोषणा क्यों नहीं की गई है. पड़ोसी सीट अलीपुरद्वार में बीजेपी ने पिछली विधानसभा में सभी सीटें जीती थीं. हालांकि, उस सीट के सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री जॉन बारला को इस बार टिकट नहीं दिया गया.

हालांकि बारला को लेकर ज्यादा अटकलें नहीं हैं, यह देबाश्री चौधरी के बारे में है जो रायगंज सीट से जीतकर केंद्रीय मंत्री बनीं। पिछली विधानसभा के नतीजे आने और रायगंज से बीजेपी विधायक कृष्णा कल्याणी के तृणमूल में जाने के बाद यह सीट बीजेपी के लिए ‘मुश्किल’ है. वह कृष्णा दिल्लीबाड़ी की लड़ाई में रायगंज से तृणमूल उम्मीदवार हैं. 2019 में सीपीएम के मोहम्मद सलीम और कांग्रेस की दीपा दशमुंशी के बीच जीत हासिल करने वाली जया देबाश्री ने सीट बदलने के लिए पहले ही पार्टी में आवेदन कर दिया था. मांग दमदम सीटों की थी. लेकिन बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल से बीजेपी में गए शीलभद्र दत्ता दमदम सीट से उम्मीदवार हो सकते हैं. चूंकि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व देबाश्री को कोलकाता दक्षिण में उम्मीदवार के रूप में खड़ा करना चाहता था, इसलिए उन्होंने कहा कि वह रायगंज में खड़े होने के लिए सहमत हैं। हालांकि, राज्य का कोई भी नेता ठीक-ठीक यह नहीं कह सकता कि केंद्रीय नेतृत्व क्या फैसला करेगा। बीजेपी ने 2019 में दक्षिण बंगाल में जीती पांच सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा भी नहीं की है। इनमें आसनसोल में भोजपुरी कलाकार पवन सिंह के नाम की घोषणा की गयी थी, लेकिन उन्होंने खुद ही नाम वापस ले लिया. किसी स्थानीय को टिकट मिल सकता है. मेदिनीपुर सीट पर दिलीप घोष और भारती घोष के बीच लड़ाई को लेकर भी तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. अंत में दिलीप को बर्दवान दुर्गापुर सीट पर भेजने का फैसला किया गया, लेकिन सांसद सुरेंद्र सिंह अहलूवाला को कौन सी सीट दी जाएगी, इस पर विवाद है. बीजेपी किसी दूसरे जीते हुए सांसद को मैदान में नहीं उतारना चाहती. पद्मशिबिरा सूत्रों के मुताबिक झाड़ग्राम सीट से सांसद कुंअर हेम्ब्रम को हटाकर आदिवासी समुदाय के डॉक्टर प्रणब टुडू को उम्मीदवार बनाया जा सकता है. कुंअर ने यह भी घोषणा की है कि वह राजनीति छोड़ने वाले उम्मीदवार नहीं होंगे। इसके अलावा बैरकपुर रहा. भाजपा छोड़कर तृणमूल में लौटे अर्जुन सिंह को उम्मीदवार बनाया जाए या नहीं, इस पर पार्टी के भीतर बहस के बावजूद, सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने यह फैसला लिया है। फिलहाल युद्धक्षेत्र बैरकपुर पर अर्जुन का कब्जा है.

ओडिशा में बीजेपी-बीजेडी गठबंधन जटिलताओं के कारण रुका हुआ है.

0

बीजेडी-बीजेपी गठबंधन इस मुद्दे पर फंस गया है कि ओडिशा में सबसे बड़ी पार्टी कौन होगी. बिहार में बीजेपी नीतीश कुमार के साथ सीटों का सौदा कर ज्यादा सीटें हासिल करने में कामयाब रही. इसी समीकरण पर चलते हुए बीजेपी ने ओडिशा में बड़े दादा का दर्जा मांगा. नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी ने इसे खारिज कर दिया. पार्टी के मुताबिक, बिहार में संख्या बल के हिसाब से नीतीश कुमार कमजोर हैं. इसलिए मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें सीट बंटवारे के सवाल पर बीजेपी की मांग मानने को मजबूर होना पड़ा है. इसके विपरीत नवीन पटनायक अकेले दम पर सरकार चला रहे हैं. इसलिए फिलहाल बीजेडी को किसी पार्टनर की जरूरत नहीं है. बीजेडी अगर पार्टनर से हाथ मिलाती है तो अपनी शर्तों पर हाथ मिला लेगी. किसी और की शर्तों पर नहीं. भाजपा ने ओडिशा की 21 लोकसभा सीटों में से 13-14 सीटों पर और एक साथ होने वाले 147 विधानसभा चुनावों में कम से कम 57 सीटों पर चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। फिलहाल राज्य में बीजेपी के आठ सांसद और 23 विधायक हैं. बीजेडी के पास लोकसभा में 12 सीटें हैं. विधानसभा में उनकी सीटों की संख्या 112 है. नतीजतन नवीन पटनायक की टीम संख्या के मामले में काफी आगे है. बीजेडी नेतृत्व सीट समझौते की बातचीत में बीजेपी को लोकसभा की आठ सीटें और विधानसभा की 30 से ज्यादा सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है. बीजेपी को वह समीकरण बिल्कुल पसंद नहीं है.

इसके अलावा, राज्य भाजपा नेतृत्व ओडिशा में अकेले चुनाव लड़ने के पक्ष में है। केंद्रीय नेतृत्व को बताया गया है कि नरेंद्र मोदी की छवि से राज्य में पार्टी को मजबूत करने में मदद मिली है. नतीजा ये हुआ कि पार्टी के वोट धीरे-धीरे बढ़ते गए. बीजेपी प्रदेश नेतृत्व का मानना ​​है कि अगर पार्टी इस सफर में अकेले लड़े तो उसे लोकसभा में 10-12 सीटें और विधानसभा में करीब 60 सीटें मिल सकती हैं. इससे पार्टी जमीनी स्तर पर मजबूत होगी. अगर गठबंधन हुआ तो बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर जायेगा. अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे।

इसी तरह बीजेडी नेतृत्व को बीजेपी के प्रस्ताव से कोई राजनीतिक फायदा होता नहीं दिख रहा है. इसलिए गठबंधन की बातचीत शुरू होने के बाद भी रुकी हुई है. बीजद नेता वीके पांडियन ने कहा, ”जिस तरह हमें ओडिशा में सरकार बनाने के लिए भाजपा की जरूरत नहीं है, उसी तरह हमें केंद्र में सरकार बनाने के लिए भी भाजपा की जरूरत नहीं है। दोनों दलों के दो राजनेता ही राजनीति से ऊपर उठकर दोस्ती को ध्यान में रखते हुए गठबंधन के सवाल पर फैसला कर सकते हैं। लेकिन अब जब सीट समझौते की बात सामने आ गई है तो दोनों दलों के नाराज नेता गठबंधन छोड़कर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में शामिल हो जाएंगे. कांग्रेस का दावा है कि इसलिए बिखराव को रोकने के लिए दोनों दल अभी गठबंधन को लेकर कोई घोषणा नहीं करना चाहते हैं. कांग्रेस को डर है कि बाकी बीजेपी और बीजेडी उस राज्य में अपने उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद ही अपने गठबंधन की घोषणा करेंगे. बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की तीसरी सूची की घोषणा कर दी है. सूची में तमिलनाडु की 14 लोकसभा सीटों और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की एकमात्र लोकसभा सीट के लिए उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। हालाँकि, दूसरी और तीसरी सूची की तरह, पश्चिम बंगाल से किसी भी उम्मीदवार को चौथी सूची में नहीं रखा गया।

2 मार्च को बीजेपी उम्मीदवारों की पहली सूची में घोषित 195 उम्मीदवारों में से 20 को राज्य में सीटें मिलीं. लेकिन 13 मार्च को 72 उम्मीदवारों में से पश्चिम बंगाल से किसी का नाम घोषित नहीं किया गया. इसी तरह गुरुवार को घोषित 39 लोगों की तीसरी सूची में भी बंगाल से कोई नहीं था. उम्मीदवारों की पहली सूची में आसनसोल से घोषित उम्मीदवार पवन सिंह ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है. दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य की 23 सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार की घोषणा होना बाकी है. अभिनेता सरथकुमार की पत्नी राधिका तमिलनाडु में भाजपा उम्मीदवार की सूची में हैं। पुडुचेरी में बीजेपी सत्तारूढ़ पार्टी एनआर कांग्रेस के साथ गठबंधन में है. मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी की पार्टी ने वहां एकमात्र सीट पद्मा छोड़ दी. बीजेपी ने पुडुचेरी में पूर्व कांग्रेस नेता और गृह मंत्री ए नामशीबायन को मैदान में उतारा है.

बीजेपी ने दावा किया था कि लोकसभा चुनाव कार्यक्रम जारी होने से पहले ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी जाएगी. वह एपिसोड शुरू हो चुका था. लेकिन यह अभी ख़त्म नहीं हुआ है. 2 अप्रैल को पहली सूची में देश की 194 सीटों में से पश्चिम बंगाल की 20 सीटें थीं। हालांकि, एक सीट के उम्मीदवार ने अपना नाम वापस ले लिया है. नतीजतन, राज्य की 23 सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होनी बाकी है. दूसरे चरण में देश की 72 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची 13 मार्च को जारी की गई थी, लेकिन इसमें बंगाल की एक भी सीट नहीं थी. गुरुवार की तीसरी लिस्ट में नहीं है बांग्ला!

स्मृति मंधाना और ऋचा घोष हंड्रेड ड्राफ्ट के दौरान खरीदार पाने वाली एकमात्र भारतीय खिलाड़ी थीं.

0

महिला प्रीमियर लीग ने जीता पुरस्कार, दो भारतीयों को विदेशी प्रतियोगिता में टीम मिली, बंगाल की रिचाओ 17 भारतीय महिला क्रिकेटरों ने इंग्लैंड में ‘द हंड्रेड’ प्रतियोगिता ड्राफ्ट में पंजीकरण कराया। केवल दो टीमों को ही यह मिला. उनमें से एक हैं बंगाल की विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा। स्मृति मंधाना और ऋचा घोष ने महिला प्रीमियर लीग में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर को चैंपियन का पुरस्कार दिलाया। ये दोनों इंग्लैंड की ‘द हंड्रेड’ प्रतियोगिता में टीम में जगह बनाने वाले एकमात्र भारतीय थे। हरमनप्रीत कौर, दीप्ति शर्मा, जेमिमा रोड्रिग्ज, श्रेयंका पटेल ने भी क्रिकेटरों के नाम बताए। लेकिन मंधाना और ऋचा के अलावा किसी भी भारतीय क्रिकेटर ने इंग्लिश प्रतियोगिता की फ्रेंचाइजी में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. हालांकि, अगर कोई विदेशी क्रिकेटर चोटिल होता है तो अगली बार हरमनप्रीत को मौका मिलने की संभावना है.

भारतीय महिला उप-कप्तान मंधाना और विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा महिला प्रीमियर लीग में अच्छी फॉर्म में थीं। मंधाना ने 10 मैचों में 300 रन बनाए. अर्द्धशतक की दो पारियां हैं. उनका स्ट्राइक रेट 133.92 रहा. वहीं बंगाल की ऋचा ने 10 मैचों में 257 रन बनाए. उनके बल्ले से दो अर्धशतक भी निकले. रिचर्स का स्ट्राइक रेट 141.98 रहा. मंधाना को साउदर्न ब्रेव वुमेन द्वारा भर्ती किया गया है। ऋचा को बर्मिंघम फीनिक्स वुमेन ने साइन किया था। ऋचा इंग्लैंड की 100 बॉल प्रतियोगिता में भी खेल चुकी हैं। उस समय वह लंदन स्पिरिट के लिए खेले थे। मंधाना पहले भी साउदर्न के लिए ‘द हंड्रेड’ खेल चुकी हैं। प्रतियोगिता में कुल 17 भारतीय क्रिकेटरों को शामिल किया गया था। हरमनप्रीत कौर, दीप्ति शर्मा, जेमिमा रोड्रिग्ज, श्रेयंका पटेल ने भी क्रिकेटरों के नाम बताए। लेकिन मंधाना और ऋचा के अलावा किसी भी भारतीय क्रिकेटर ने इंग्लिश प्रतियोगिता की फ्रेंचाइजी में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. हालांकि, अगर कोई विदेशी क्रिकेटर चोटिल होता है तो अगली बार हरमनप्रीत को मौका मिलने की संभावना है.

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (आरसीबी) 16 साल के लंबे समय के बाद भी आईपीएल नहीं जीत पाई है। लेकिन वे WPL के दूसरे सीज़न में ट्रॉफी घर ले आए। स्मृति मंधाना की कप्तानी वाली टीम ने क्रिकेट फैंस को चौंका दिया है. बेंगलुरु के लोग आखिरकार ट्रॉफी पाकर बेहद खुश थे। यह ट्रॉफी जीतना लंबी योजना और कार्यान्वयन का परिणाम है। यहाँ पाँच कारण हैं:

मंधाना को स्पष्ट संदेश

पिछले WPL में शुरुआती पांच मैच हारने के बाद आरसीबी का ट्रॉफी जीतने का सपना शुरुआत में ही टूट गया. सीज़न के अंत में, टीम के दो-प्रमुख अध्यक्ष पिशेष मिश्रा और उपाध्यक्ष राजेश मेनन ने कप्तान मंधाना से मुलाकात की। उनसे कहा गया, ये आपकी पार्टी है. इसे स्वयं अपना बनाएं। सफलता इसलिए क्योंकि मंधाना ने इसका अक्षरशः पालन किया।

ल्यूक विलियम्स को टीम में लाना

ल्यूक ने इंग्लैंड की ‘द हंड्रेड’ या ऑस्ट्रेलिया की बिग बैश लीग में सफलता हासिल की है. ‘द हंड्रेड’ खेलने के दौरान मंधाना को ल्यूक की मदद मिलती है। टीम संस्कृति का निर्माण करने और सफलता प्राप्त करने के लिए बेन ने सॉयर की जगह ल्यूक को कोच नियुक्त किया। मंधाना के बाद टीम थी. अपनी बुद्धिमत्ता और योजना का उपयोग करते हुए, ल्यूक ने अपने पहले वर्ष में ट्रॉफी प्रदान की।

गुप्त बैठक

ल्यूक को लाने से काम ख़त्म नहीं हुआ। मंधाना की उनके साथ नियमित ‘गुप्त बैठकें’ होती थीं। नीलामी से पहले दोनों ने योजना के मुताबिक क्रिकेटर को ले लिया। ‘द हंड्रेड’ के अनुभव से भी मदद मिली. सूची का प्रारूप तैयार किया गया। जब मंधाना अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रही थीं तो ल्यूक ने ऑस्ट्रेलिया की ओर से पूरी जिम्मेदारी संभाली। ‘गुप्त मीटिंग’ भी हुई, बीबीएल छोड़कर देश के क्रिकेट पर फोकस

डब्ल्यूपीएल से कई साल पहले ऑस्ट्रेलिया में महिला बिग बैश लीग की शुरुआत हुई थी। परिणामस्वरूप, पहले WPL में BBL में खेलने वाले क्रिकेटरों का दबदबा था। लेकिन पिछली नीलामी में आरसीबी ने घरेलू क्रिकेटरों पर जोर दिया. साथ ही पार्टी में जो लोग गुमनाम थे, उनसे भी निपटा गया है. आशा शोभना, सब्बीनेनी मेघना, श्रेयंका पाटिल को ढूंढना उनका उत्पाद है।

आरसीबी नेतृत्व

पार्टी नेताओं ने महिला टीम का साथ नहीं छोड़ा. भले ही वह हार गया, फिर भी वह उसके साथ खड़ा रहा। सुना भरोसा कोई दबाव नहीं। टीम में हर किसी ने सकारात्मक और उत्साहित रहने का ख्याल रखा है। वही सफलता है. केवल दो टीमों को ही यह मिला. उनमें से एक हैं बंगाल की विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋचा। स्मृति मंधाना और ऋचा घोष ने महिला प्रीमियर लीग में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर को चैंपियन का पुरस्कार दिलाया। ये दोनों इंग्लैंड की ‘द हंड्रेड’ प्रतियोगिता में टीम में जगह बनाने वाले एकमात्र भारतीय थे।

टी20 वर्ल्ड कप 2024 में आईपीएल टीम इंडिया को कैसे मदद कर सकता है?

0

आईपीएल के बाद फिर महरान, टी20 वर्ल्ड कप टीम चुनने में भारत को कितना फायदा? आईपीएल बता सकता है कि कौन सा क्रिकेटर फॉर्म में है. भारतीय टीम के चयनकर्ताओं के लिए भी यह आईपीएल टीम चयन के लिए अहम रहने वाला है. नतीजतन, यह क्रिकेटरों के लिए एक आईपीएल है। आईपीएल फाइनल की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक फाइनल 26 मई को हो सकता है. गौतम गंभीर भी इस तारीख को अपनी टीम को मैदान पर देखना चाहते हैं. वहीं टी20 वर्ल्ड कप 2 जून से शुरू हो रहा है. कभी-कभी केवल छह दिन। यानी आईपीएल में आप समझ सकते हैं कि कौन सा क्रिकेटर फॉर्म में है. भारतीय टीम के चयनकर्ताओं के लिए भी यह आईपीएल टीम चयन के लिए अहम रहने वाला है. नतीजतन, यह क्रिकेटरों के लिए एक आईपीएल है।

कुछ क्रिकेटर टी20 वर्ल्ड कप खेलेंगे. जैसे भारत के कप्तान रोहित शर्मा. भले ही वह आईपीएल में कप्तानी नहीं करेंगे, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप में कप्तानी करेंगे. भारतीय क्रिकेट बोर्ड के सचिव ने इसकी घोषणा की. नतीजतन, रोहित के लिए यह आईपीएल निश्चित रूप से टीम में बने रहने की लड़ाई नहीं है। हालांकि वह आईपीएल खेलकर टी20 वर्ल्ड कप की तैयारी करना चाहेंगे. यशप्रीत बुमरा, हार्दिक पंड्या भी इस करोड़पति लीग में टी20 वर्ल्ड कप की तैयारी करना चाहेंगे. ये सभी मुंबई इंडियंस के लिए खेलते हैं। परिणामस्वरूप, आप एक साथ खेलकर समझ बढ़ा सकते हैं।

इस बार का आईपीएल मुंबई के ईशान किशन के लिए बेहद अहम होने वाला है. उन्हें भारत की सभी तरह की टीमों से बाहर कर दिया गया है. घरेलू क्रिकेट नहीं खेलने के कारण उन्हें बोर्ड के वार्षिक अनुबंध से भी हटा दिया गया है। आईपीएल ही ईशान के लिए टी20 वर्ल्ड कप टीम में आने का एकमात्र मौका है. अगर वह मुंबई के लिए ओपनिंग करने के लिए बड़े रन बनाते हैं, तो राष्ट्रीय टीम के लिए फिर से दरवाजे खुल सकते हैं। हालांकि कई लोगों के मुताबिक जिस तरह से उन्होंने बोर्ड को नजरअंदाज किया है, उन्हें राष्ट्रीय टीम में दोबारा मौका नहीं मिलना चाहिए। यह आईपीएल एक और विकेटकीपर ऋषभ पंत के लिए भी बड़ा मौका होने वाला है। वह 14 महीने बाद क्रिकेट में वापसी कर रहे हैं. कार हादसे के बाद पंत पहली बार खेलते नजर आएंगे। बोर्ड ने जानकारी दी है कि उनके लिए विकेटकीपर के तौर पर खेलने पर कोई रोक नहीं है. ऐसे में टी20 वर्ल्ड कप से पहले पंथ के पास बड़ा मौका है. वह दिल्ली कैपिटल्स का नेतृत्व करेंगे. अगर पंत ठीक हो गए तो वह भारतीय टीम के लिए विकेटकीपर के तौर पर भी वापसी कर सकते हैं। यह सब इस पर निर्भर करता है कि पंत कैसा खेल रहे हैं।’

श्रेयस अय्यर पर भी रहेगी नजर. केकेआर के कप्तान को बोर्ड के कॉन्ट्रैक्ट से भी बाहर कर दिया गया है. देखते हैं श्रेयस इस बार आईपीएल में कैसा खेलते हैं. केकेआर के कप्तान को न सिर्फ टीम के लिए बल्कि अपने लिए भी खेलना होगा. रन तो बनने ही चाहिए, नहीं तो टी20 वर्ल्ड कप का दरवाजा नहीं खुलेगा.

बंगाल के कोच लक्ष्मीरतन शुक्ला का मानना ​​है कि आईपीएल देखने के बाद टी20 विश्व कप टीम चुनने का फैसला बहुत प्रभावी है. उन्होंने कहा, ”टी20 वर्ल्ड कप टीम चुनने का फैसला बहुत अच्छा है, यह देखकर कि कौन अच्छा खेल रहा है. क्रिकेटरों में देखने को मिलेगी भूख. हर कोई अपने आप से मेल खाने की कोशिश करेगा. ऐसा ही होना चाहिए. हमने उस नाम को टीम में लिया, लेकिन वह रन नहीं बना रहा, विकेट नहीं ले रहा, ऐसा नहीं होना चाहिए.’ बोर्ड ने बहुत अच्छा फैसला लिया है.” केकेआर के नितीश राणा क्रिकेटरों के बीच भूख को लेकर स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा, ”हर कोई देश के लिए खेलना चाहता है. बहुत से लोगों की ऐसी चाहत होती है. मैं भी टी20 वर्ल्ड कप टीम में रहना चाहता हूं. इसलिए अभी मैं आईपीएल के बारे में सोच रहा हूं।’

कई लोग आईपीएल के बाद होने वाले टी20 वर्ल्ड कप के बारे में सोच रहे हैं. कई लोग क्रिकेटरों की थकान के बारे में सोच रहे हैं. लक्ष्मी ने कहा, “थकान का इससे कोई लेना-देना नहीं है। सभी प्रोफेशनल क्रिकेटर हैं. उन्हें खेलने के लिए पैसे मिल रहे हैं. आपको खुद को वैसा बनाना होगा. हमने कभी सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ को आराम करते नहीं देखा. मैं आजकल के क्रिकेटरों को बार-बार आराम करते हुए देखता हूं।’ यह सही नहीं है।”

आखिर मेरठ में कैसे चलती है सियासी परियां?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि मेरठ में सियासी परियां कैसे चलती है! मेरठ क्रांति की धरा है और कौशल की भी। यहां के बने बल्लों से खेलकर बल्लेबाजों ने बहुत से गेंदबाजों का गुमान तोड़ा है तो एथलेटिक्स सहित विभिन्न खेलों में यहां के खिलाड़ियों ने भारत के हिस्से सोना जोड़ा है। क्रिकेट के मैदान की तरह सियासत के मैदान में भी मेरठ को लंबी पारी और साझेदारी भाती रही है। यही वजह है कि यहां से कुछ चेहरे कई बार संसद तक पहुंचे। इस बार भी यहां काबिज भाजपा लगातार चौथी पारी खेलने के लिए मैदान में है तो विपक्ष उसे ‘आउट’ करने के लिए।मेरठ लोकसभा सीट के शुरुआती नतीजे देखें तो आजादी के बाद के पहले तीन चुनाव कांग्रेस के पक्ष में गए और संसद पहुंचने वाला चेहरा थे शाहनवाज खान। शाहनवाज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेना में जनरल थे। 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के रूप में विपक्षी एकता का गठजोड़ बना तो शाहनवाज पिछड़ गए और जीत महाराज सिंह भारती को मिली। हालांकि, 71 में शाहनवाज फिर जीते। 77 में जनता पार्टी की लहर रही तो 1980 और 1984 में मोहसिना किदवई कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचीं। 89 में बाजी जनता दल के हरीश पाल ने जीती। इस समय इनके बेटे नीरज पाल सपा में टिकट की संभावना तलाश रहे हैं।91 के चुनाव में 21 उम्मीदवार मैदान में थे। 20 मई को मतदान होना था। मतदान के दिन दोपहर तक बूथ कैप्चरिंग, बवाल और हिंसा की खबरें आने लगीं। चुनाव आयोग की रिपोर्ट कहती है कि उसके शिकायत प्रकोष्ठ में लगे सभी 20 फोन की घंटी मेरठ से आ रही शिकायतों के लिए बज रही थीं। दोपहर तक चुनावी हिंसा ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। आरोप था कि कुछ हिस्सों में वोट नहीं डालने दिया जा रहा था। दोपहर बाद तीन थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगाना पड़ा, जिसके तहत 70 पोलिंग स्टेशन आते थे। 2 बजे के बाद मेरठ कैंट और मेरठ शहर विधानसभा क्षेत्र के अधिकतर हिस्सों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। हिंसा में 12 लोग मारे गए। उस समय चुनाव आयोग की कमान टीएन शेषन के हाथ में थी। शेषन ने 21 मई को पूरे मेरठ का चुनाव रद्द कर दिया। भाजपा उम्मीदवार अमरपाल सिंह सहित कुछ और प्रत्याशियों ने आदेश के खिलाफ प्रत्यावेदन दिया, जिसे आयोग ने नकार दिया। मामला हाई कोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। लगभग तीन साल की कानूनी कसरत के बाद चुनाव आयोग ने वहां प्रभावित बूथों पर पुनर्मतदान और शेष बूथों पर 1991 में पड़े वोटों की गिनती करवाकर रिजल्ट घोषित करने के निर्देश दिए। अमरपाल सिंह जनता दल के उम्मीदवार से 85 हजार वोटों से जीते और पहली बार यहां भाजपा का खाता खुला।

मेरठ की सियासी तासीर 90 के दशक से बदलने लगी थी। ध्रुवीकरण व जातीय समीकरण अब आकार लेने लगे थे। अमरपाल ने 91 के बाद 96 और 98 में भी यहां कमल खिलाया। 98 में सपा यहां दूसरे नंबर पर रही जो अब तक सीट पर उसकी सबसे अच्छी पोजिशन रही। साइकल यहां कभी नंबर एक की मंजिल नहीं छू पाई है। इस चुनाव में दो बार सांसद रहीं मोहसिना किदवई 40 हजार वोट भी पार नहीं कर पाईं। 99 में कांग्रेस की किस्मत फिर चमकी और अवतार सिंह भड़ाना भाजपा पर 25 हजार वोटों से भारी पड़ गए। सपा को महज 13 हजार वोट मिले। मुस्लिमों के साथ दलित वोटरों की बहुतायत वाली इस सीट पर नई ताकत के तौर पर बसपा उभरी। वह तीसरे पायदान पर रही और उसके उम्मीदवार हाजी याकूब को 2.27 लाख वोट मिले। बसपा ने इस फॉर्म्युले को 96, 99, 2004, 2014 और 2019 में भी अपनाया। 2004 में उसे जीत मिली और 2014 और 2019 में वह दूसरे नंबर पर रही। 2009 में भी बसपा के गैर-मुस्लिम चेहरे मलूक नागर दूसरे नंबर पर थे। सपा ने भी 2009 और 2014 में मुस्लिम चेहरे के तौर पर शाहिद मंजूर को उतारा लेकिन वह तीसरे स्थान से आगे नहीं बढ़ सके। 2009 में राजेंद्र अग्रवाल ने कमल खिलाने का सिलसिला शुरू किया, जो अब तक बरकरार है। पिछले चुनाव में सपा-बसपा के साथ आने से जीत फिसलती दिख रही थी, लेकिन 4700 वोटों से वह मैदान मार ले गए।

24 के चुनाव के लिए पक्ष या विपक्ष किसी भी ओर से अब तक उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ है। इसलिए, समीकरणों के साथ यहां चेहरों की तलाश जारी है। भाजपा से मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल दावेदारी कर रहे हैं। पार्टी ने यूपी की जिन 51 सीटों पर उम्मीदवार तय किए हैं, उसमें मेरठ नहीं है। इसलिए, राजेंद्र अग्रवाल के नाम पर संशय बढ़ गया है। सपा और कांग्रेस का गठबंधन है और सीट सपा के खाते में हैं। इसका भी चेहरा तय होना बाकी है। मेरठ में असरदार रही बसपा भी अपना चेहरा तय नहीं कर पाई है। भाजपा इस बार लगातार चौथी जीत दर्ज करने के लिए दावा ठोंकेगी। इस बार रालोद का भी साथ है। यहां लगभग 4 लाख वोटर वैश्य, ठाकुर ब्राह्मण बिरादरी के हैं। 1-1 लाख जाट व गुर्जर हैं। भाजपा इनको अपने खाते में गिन रही है। 3 लाख से अधिक दलित बिरादरी के वोटर हैं, जिनमें लाभार्थीपरक योजनाओं के जरिए सेंधमारी पर भी पार्टी की नजर है। सपा की नजर 5 लाख से अधिक मुस्लिम वोटरों पर है। ऐसे में यहां से वह मुस्लिम या गुर्जर उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रही है, जिससे कोर अल्पसंख्यक वोटों के साथ सामाजिक समीकरणों को साध राह बेहतर की जा सके। बसपा ने यहां अधिकतर दलित-मुस्लिम समीकरण को तरजीह दी है। हार के बाद भी उसका यहां दमखम दिखता है। वह भी कोई अल्पसंख्यक चेहरा ही तलाश रही है। त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा की उम्मीदें ध्रुवीकरण व अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव पर भी टिकी हैं।