Sunday, April 12, 2026
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क्या चीन से निजात पाएगा ताइवान?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या ताइवान अब चीन से निजात पा सकता है या नहीं! ताइवान के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ने तीसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है। चीन की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कुओमिनतांग के उम्मीदवार होउ यू-यी और नवगठित ताइवान पीपुल्स पार्टी के नेता को वेन-जे को हराकर लाई चिंग-ते विलियम लाई चीनी गणराज्य के राष्ट्रपति चुने गए हैं। लाई को लगभग 40% वोट मिले, जबकि केएमटी और टीपीपी उम्मीदवारों को क्रमशः 33% और 26% वोट मिले। चीन ने लाई को लगातार ‘अलगाववादी’ और ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थक बताया है। इसने ताइवान जलडमरूमध्य में ज्यादा पोत और हवाई जहाज भेजने के साथ नाकेबंदी की मॉक ड्रिल करके सैन्य दबाव भी बढ़ा दिया है। इस ग्रे जोन वॉरफेयर टैक्टिक्स से चीन ने ताइवान को डराने की भरपूर कोशिश की है। मतदान से कुछ ही दिन पहले नववर्ष के मौके पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि एकीकरण एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है और चीन निश्चित रूप से ताइवान के साथ ‘एकीकृत’ होगा। जिनपिंग ने तो यह कहकर दबाव बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि इसका उल्टा असर हुआ है।

ध्यान लाई की जीत के मामूली अंतर पर केंद्रित है। 2016 और 2020 के चुनावों में निवर्तमान डीपीपी अध्यक्ष साई इंग-वेन ने आसानी से बहुमत हासिल किया था। लेकिन तस्वीर ज्यादा बारीक है। भले ही डीपीपी के हिस्से 2020 में 57% के मुकाबले 2024 में घटकर 40% के आसपास ही वोट आए लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि इस वर्ष वास्तव में त्रिकोणीय चुनावी जंग हुई। उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चुनाव में खड़े तीसरे उम्मीदवार को वेन-जे कई सालों तक डीपीपी समर्थक रहे थे। संक्षेप में, 2016 से ही वोटिंग में केएमटी विरोधी वोट लगातार 50% से अधिक रहे हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव ने दो महत्वपूर्ण रुझानों की पुष्टि की है – चीन के साथ तालमेल का केएमटी का संदेश ताइवान के लोगों को पसंद नहीं आ रहा, और यह कि ताइवान के लोगों में स्थानीय पहचान की भावना बढ़ रही है। चीनी गणराज्य से अलग एक ताइवानी पहचान के लिए 2014 में शुरू हुआ सनफ्लावर मूवमेंट की जड़ें बहुत गहरी हो गई हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि ताइवानी चीन से आजादी का ऐलान करने को छटपटा रहे हैं। केएमटी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को अभी भी 33% वोट मिले। राष्ट्रपति चुनाव के साथ हुए संसदीय चुनावों के परिणाम भी इस धारणा को पुष्ट करते हैं, क्योंकि केएमटी ने 113 सीटों में से 52 सीटें हासिल की हैं। यह डीपीपी से एक सीट ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि अधिक से अधिक युवा ताइवानी खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं और उन्हें डर है कि अगर ताइवान का चीन में विलय हो जाएगा तो शायद उन्हें यह आजादी नहीं मिल पाए। डेंग शियाओपिंग ने एक देश दो व्यवस्था के साथ शानदार प्रयोग किए थे। इस व्यवस्था में हॉन्गकॉन्ग, मकाओ और ताइवान के लोगों को अपने-अपने इलाकों पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार करते हुए मर्जी की जिंदगी जीने की अनुमति मिली थी। इस कदम से चीन के लिए हॉन्गकॉन्ग और मकाओ की शांतिपूर्ण वापसी सुरक्षित हो गई। चीन के मौजूदा नेताओं की तरफ से हॉन्गकॉन्ग पर 1997 के साइनो-ब्रिटिश एग्रीमेंट को कठोरता से लागू किया जाना, हॉन्गकॉन्ग के अंब्रेला मूवमेंट पर कार्रवाई और हॉन्गकॉन्ग के लिए नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों ने ताइवानियों में चीन पर भरोसा कम कर दिया है।

चूंकि ताइवानी संसद में कोई भी पार्टी बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं है, इस कारण अगले चार वर्षों तक वहां सभवतः चेक्स एंड बैलेंस का सिस्टम ही बना रहेगा। चयनित राष्ट्रपति इस वास्तविकता को समझते हुए नरम रुख अपना रहे हैं। वो चीन के धौंस का विरोध जरूर कर रहे हैं, लेकिन ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनाए रखने का वादा भी कर रहे हैं। लाई ने घोषणा की कि वह क्रॉस-स्ट्रेट की यथास्थिति बनाए रखेंगे, टकराव को बातचीत से बदलेंगे और चीन के साथ आदान-प्रदान को बढ़ावा देंगे। बीजिंग को कम से कम अगले चार वर्ष तक अपने सबसे खराब विकल्प के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। ताइवान की युवा पीढ़ी को यूनिफाइड चीन को लेकर बहुत कुछ पता नहीं है। कम्युनिस्ट शासन के तहत चीनी समाज में मौलिक बदलाव आ गया है जिसके कारण ताइवानियों लिए चीन के साथ जुड़ना मुश्किल होता जा रहा है। अभी भी केएमटी का समर्थन करने वाले ताइवान के कई नेताओं के पास ‘दोहरी नागरिकता’ है, लेकिन आम ताइवानियों के पास जाने की कोई और जगह नहीं है। बीजिंग इस मजबूत होती पहचान को जीरो सम गेम के रूप में देखता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि 1949 से ही चीन एक मिनट के लिए भी ताइवान पर पैर नहीं जमा सका है।

ताइवान जलडमरूमध्य को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे खतरनाक संभावित विस्फोट बिंदु बनने की वजह अमेरिका की भागीदारी है। वॉशिंगटन का दावा है कि वह ताइवान में लोकतंत्र को संरक्षित रखने की लड़ाई लड़ रहा है। हकीकत यह है कि वह अपने जियो-स्ट्रैटिजिक हितों की रक्षा के लिए लड़ रहा है। अमेरिका दरअसल चीन को प्रशांत में फैलने से रोकने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई द्वीप श्रृंखला को संरक्षित रखना चाहता है। 100 समुद्री मील की दूरी पर स्थित एक द्वीप को नियंत्रित करने में असमर्थता दुनिया के दूसरे सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के लिए बड़ी हताशा का सबसब है। दूसरी तरफ, उसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र की तरफ से उसके जियो-स्ट्रैटिजिक हितों को चुनौती दी जा रही है। ये परिस्थितियां आने वाले वर्षों में तनावपूर्ण माहौल में और इजाफे का संकेत हैं।

क्या गठबंधन करने से मायावती को डर लगता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गठबंधन करने से मायावती को डर लगता है या नहीं! बहुजन समाज पार्टी बीएसपी चीफ मायावती ने आज अपने जन्मदिन पर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। मायावती के इस ऐलान से कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को आस थी कि मायावती I.N.D.I.A गठबंधन का हिस्सा होंगी। लेकिन मायावती ने न केवल अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर भी हमला किया। उन्होंने अखिलेश को गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला बताया। बीएसपी सुप्रीम ने इसके अलावा दावा किया कि गठबंधन करने से बीएसपी को फायदा नहीं होता है और बाकी पार्टियों का वोट बीएसपी को ट्रांसफर नहीं होता है। तो क्या बीएसपी चीफ मायावती के वोट ट्रांसफर नहीं होने के दावे में सच है? आइए समझते हैं। गौरतलब है कि बीएसपी ने 1993 और 2019 में एसपी के साथ गठबंधन करके क्रमश: विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ा था। बीएसपी सबसे पहले सरकारी कर्मचारियों के संगठन के तौर पर शुरू हुआ था। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने BAMCEF पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ का निर्माण किया था। धीरे-धीरे ये संगठन राजनीतिक पार्टी में बदलने लगा। 1982 में BAMCEF ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति DS-4 का गठन किया। बाद में यही आगे चलकर बीएसपी पार्टी बनी। बीएसपी का मकसद मुसलमानों और दलितों को एक करना था। लेकिन इस दल के साथ ओबीसी का साथ कभी नहीं रहा। यहां तक कि मुस्लिमों का समर्थन भी कभी खुलकर इस दल को नहीं मिला। मायावती के मुस्लिमों को भरोसेमंद नहीं बताने वाले बयान के बाद ये अल्पसंख्यक समुदाय बीएसपी से और बिदक गया था।

हालांकि बीएसपी 1987 में यूपी में तीन विधानसभा उपचुनाव में बड़ी बढ़त मिली और उसे 26.3 फीसदी वोट मिले। यही नहीं, बीएसपी ने आरएलडी और बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा दी और उसके जीत का मार्जिन को 21.93 से घटाकर 0.70 फीसदी कर दिया। वहीं बीजेपी का विनिंग मार्जिन 9.86 से घटकर 0.20 फीसदी रह गया था। ये बीएसपी के उभार का ही परिणाम था कि जनता पार्टी के दिग्गज नेता रहे राम विलास पासवान को 1987 में हरिद्वार लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था और वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। हरिद्वार सीट से बीएसपी की तरफ से मायावती भी चुनाव लड़ी थीं। इस उपचुनाव में कांग्रेस कैंडिडेट राम सिंह 1 लाख 49 हजार 377 वोट लेकर 23 हजार 978 वोटों से जीत दर्ज की थी। दूसरे नंबर पर मायावती रही थीं और उन्हें 1 लाख 25 हजार 399 वो मिले थे। पासवान चौथे नंबर पर खिसक गए थे और उन्हें महज 34 हजार 225 वोट ही मिल पाए थे। यहां से बीएसपी के उभार की कहानी शुरू होती है।

अब मायावती के दावे के सच को भी जानने की कोशिश करते हैं। 1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद चुनाव होते हैं। एसपी और बीएसपी दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। उसी समय ये मशहूर श्लोगन आया था कि ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। इन चुनावों में बीजेपी को हार मिलती है और एसपी-बीएसपी गठबंधन की सरकार बनती है। लेकिन अगर आंकड़े को देखो तो बीजेपी चुनाव भले ही हार गई थी लेकिन 1991 की तुलना में 31.45% 1993 में उसका वोट प्रतिशत लगभग 2 फीसदी बढ़कर 33.3% तक पहुंच गया था। इसके अलावा जिन सीटों पर बीजेपी के उम्मीद्वारों की जमानत जब्त हुई उसकी संख्या में भी कमी आई और वो घटकर आधा हो गया। 1991 में 41 सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई थी जो 1993 में घटकर 20 हो गई थी। 1993 के चुनाव में एसपी और बीएसपी ने 176 सीटों पर जीत दर्ज की थी। एसपी को 109 और बीएसपी को 67 सीटें मिली थीं। एसपी का वोट शेयर 17.9% और बीएसपी की वोट शेयर 11.12% था। 1993 के यूपी विधानसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी में वोट ट्रांसफर हुआ था। दोनों दलों के कैडर एक-दूसरे के कैंडिडेट को जीत दिलाने की पूरी कोशिश की। यानी पहले गठबंधन में तो दोनों दलों में जमकर वोट ट्रांफसर हुआ और यही वजह थी की राम लहर के बाद भी बीजेपी को यूपी में हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, राज्य में ये गठबंधन ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया था।

2019 के लोकसभा चुनाव में एसपी-बीएसपी गठबंधन के कारण दोनों दलों को फायदा तो जरूर हुआ। इसमें सबसे ज्यादा फायदा बीएसपी को हुआ जो 2014 में शून्य सीट से बढ़कर 2019 में 10 सीट पर पहुंच गई। वहीं एसपी को कोई ज्यादा फायदा नहीं हुआ और उसे केवल 5 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। बीएसपी की सीटों में बढ़ोतरी उसके खांटी माने जाने वाले वोटरों की वजह से माना गया। इस चुनाव में एक बात तो साफ रही की एसपी के वोटर्स बीएसपी की तरफ नहीं गए। वहीं बीएसपी के वोटर भी खुलकर एसपी की तरफ नहीं गए। मायावती ने इसके बाद बयान जारी कर कहा था कि एसपी के यादव समुदाय के वोटर्स ने बीएसपी का साथ नहीं दिया था। तो सवाल उठता है कि मायावती का ये दावा कितना सही है? इस बात की खोज करना तो बेहद मुश्किल है कि किसी समुदाय के वोटर ने किसी पार्टी को वोट दिया या नहीं।

बड़ा सवाल उठता है कि 2019 में बीएसपी ज्यादा सीटें कैसे जीत गई। तो इसका सीधा सा उत्तर है कि एसपी और बीएसपी का सीट शेयर की रणनीति। बीएसपी को वैसी सीटें मिलीं जहां एसपी और बीएसपी का वोट प्रतिशत बीजेपी के वोट प्रतिशत से ज्यादा थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी का संयुक्त वोट शेयर 2019 में जिन 38 सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ रही थी उनमें से 23 सीटों पर 60.5 प्रतिशत था। वहीं एसपी के 37 सीटों में से 18 पर दोनों दलों का संयुक्त वोट शेयर 48.6 प्रतिशत था। मामले में निश्चित तौर पर बीएसपी को फायदा हुआ। जबकि एसपी को गठबंधन से ज्यादा लाभ नहीं हुआ। दूसरी तरफ 2019 के चुनाव में एसपी और बीएसपी दोनों 2014 वाले वोट शेयर को बरकरार नहीं रख पाए।

क्या लालू यादव और नीतीश कुमार होंगे दूर?

अब लालू यादव और नीतीश कुमार दूर हो सकते हैं! बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का फिर हिस्सा बनेंगे ? यह सवाल फिलहाल अनुत्तरित है, लेकिन लगातार मिल रहे संकेतों को समझने की कोशिश करें तो इस सवाल का संभावित जवाब तो मिल ही जाएगा। नीतीश कुमार कई बार प्रवाह में बोल जाते हैं कि ‘2005 के पहले बिहार में कुछ था जी। विकास का जो कुछ भी काम हुआ है, वह हम लोगों ने किया है।’ कुछ देर के लिए नीतीश के इस बयान को यह मान कर नजरअंदाज कर सकते हैं कि उनके लंबे समय तक बीजेपी के साथ रहने और आरजेडी की बाट लगाते रहने का उनका रटा रटाया तकिया कलाम जुबान से अभी उतरा नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार ने नवनियुक्त 96,823 शिक्षकों के नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में जो कहा, उससे मौजूदा माहौल में उनका तकिया कलाम मान लेना बड़ी भूल होगी। अब तो बीजेपी विधायक दल के नेता विजय कुमार सिन्हा भी कह रहे हैं कि एनडीए सरकार में जिन कामों के लिए फैसले हुए थे, मौजूदा सरकार उन पर ही अमल कर रही है। इसी बीच पूर्व सीएम और अब एनडीए का हिस्सा बन चुके जीतन राम मांझी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर लिखा- ‘राज्य में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट से कुछ अधिकारियों से ज्यादा राजद-जदयू-कांग्रेस के कार्यकर्ता परेशान हैं। राजद के लोग इस सोच में परेशान हैं कि फ्लैक्स में नीतीश जी का फोटों दें कि ना? वैसे जो भी परिवर्तन होगा, वह राज्यहित में होगा।’

बिहार की राजनीति में बदलाव की बुनियाद अक्सर पर्व-त्यौहारों पर हुए राजनीतिज्ञों के जुटान के बाद पड़ती रही है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, एक महीने के खरमास के बाद ही मकर संक्रांति से नए काम की शुरुआत की परंपरा रही है। नीतीश कुमार के इंडी अलायंस में संयोजक का पद ठुकराए जाने के बाद पहले से चली आ रही आशंका बलवती हो गई है कि वे अब एनडीए में वापसी करेंगे। बीजेपी भी इस बात को खारिज नहीं करती है। मांझी ने तो खुलकर नए समीकरण के संकेत दे दिए हैं। उनका यह कहना कि जो भी होगा, बिहार के हित में होगा, बड़ा संदेश अपने अंदर छिपाए हुए है। हालांकि नीतीश के महागठबंधन के साथ जाने के बाद बीजेपी के नेता कहते रहे हैं कि नीतीश के लिए अब एनडीए में दरवाजे बंद हो चुके हैं। पर, यह सबको पता है कि राजनीति में कोई किसी के लिए दरवाजे-खिड़की स्थायी तौर पर बंद नहीं करता। महागठबंधन ने भी नीतीश के लिए नो एंट्री का बोर्ड दो साल तक टांगे रखा, लेकिन वक्त अनुकूल आने पर बोर्ड किस कबाड़खाने का हिस्सा बन गया, पता नहीं चला।

नीतीश कुमार वर्ष 2005 से जेडीयू को बिना बहुमत मिले सीएम बनते रहे हैं। देखते-देखते 18 साल बीत गए। वे लंबे समय तक बीजेपी के सहारे सरकार चलाते रहे तो दूरी बार आरजेडी के सहारे सत्ता की चाबी अपने पास रखे हुए हैं। नीतीश के पास कौन-सी वह ताकत है, जिसके बिना बिहार में किसी सरकार का बनना-चलना मुश्किल है। यहां तक किसी दल की कामयाबी भी कठिन है। नीतीश को सीएम बनाने के लिए पहली बार बीजेपी साथ आई तो अब साथ छूटने के बाद भी उसके मन से नीतीश की कसक नहीं जा रही है। नीतीश आज की तारीख में 45 विधायकों वाली पार्टी के नेता हैं। उनसे तकरीबन दोगुनी सीटें बीजेपी और आरजेडी के पास हैं। इसके बावजूद नीतीश की अपनी ताकत ही है, जो सबको उन्हें सीएम बनाने को मजबूत करती है। बीजेपी यह कैसे भूलेगी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में अगर बिहार की 40 में 39 सीटें एनडीए की झोली में गईं तो इसके पीछे नीतीश कुमार की ही ताकत थी।

इसे समझने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं। लालू यादव और राबड़ी देवी के 15 साल के शासन को समाप्त कर वर्ष 2005 में नीतीश ने बिहार की सत्ता पहली बार संभाली थी। 2010 आते-आते उन्होंने बिहार से आरजेडी के पांव उखाड़ दिए। पर, नीतीश जब 2015 में आरजेडी के साथ हुए तो ‘मृतप्राय’ आरजेडी को संजीवनी मिल गई। यह ठीक है कि विधानसभा चुनाव में आरजेडी को नीतीश से कुछ अधिक सीटें मिलीं, लेकिन सत्ता का सुख आरजेडी को 10 साल बाद नीतीश की वजह से ही मिला।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नीतीश को अपनी पांच सीटें काट कर दीं तो यह उसका उन पर कोई एहसान नहीं था। सच तो यह है कि बीजेपी को यह मालूम था कि नीतीश जैसा चेहरा बिहार में उसके पास नहीं है। नीतीश साथ आए तो एनडीए ने लोकसभा चुनाव में जीत का रिकॉर्ड बना दिया। बिहार की कुल 40 में 39 सीटें उसे मिल गईं। इंडी अलायंस ने नीतीश की ताकत को ठीक ढंग से समझा नहीं है। उन्हें बार-बार बिदकाने का प्रयास किया गया। जिस तरह वे विपक्षी दलों के संयोजन का काम कर रहे थे, उसे एक मुकाम तक पहुंचा कर दिखा दिया। इसके बावजूद उन्हें आधिकारिक तौर पर संयोजक का पद तक नहीं दिया गया।

उल्टे विपक्षी एकता की कमान संभालने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह कह कर उन्हें और अपमानित कर दिया कि संयोजक बनने का सवाल कौन बनेगा करोड़पती जैसा है। नीतीश की नाराजगी की खबरें जब तूल पकड़ने लगीं तो आधी-अधूरी वर्चुअली जुटी महफिल में उन्हें संयोजक का पद ऑफर किया गया। तुर्रा यह कि राहुल गांधी ने यह भी जोड़ दिया कि ममता बनर्जी तो उन्हें संयोजक बनाने के खिलाफ हैं।

नीतीश कुमार ने शिक्षकों के नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में कहा- ‘हमने कहा था कि 7 निश्चय-2 के तहत 10 लाख युवक-युवतियों को सरकारी नौकरी एवं 10 लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा। अब तक 3 लाख 63 हजार से अधिक लोगों की बहाली हो चुकी है और 5 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। हमलोग शीघ्र ही रिक्त पदों पर बहाली का काम शुरू करेंगे और बहुत जल्द 5 लाख लोगों की बहाली का काम भी पूरा हो जाएगा।’ दरअसल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश कुमार ने सात निश्चय के दूसरे भाग की घोषणा की थी। तब वे एनडीए में थे। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि शिक्षक नियुक्ति जैसे फैसले अगर पिछले डेढ़ साल में हुए तो इसकी घोषणा उन्होंने एनडीए में रहते की थी। यही वह बिंदु है, जहां से नीतीश कुमार के एनडीए में जाने का पुख्ता इशारा मिलता है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2020 में विधानसभा चुनाव अभियान शुरू करने से पहले निश्चय पत्र 2020 जारी किया था। इसमें 7 निश्चय पार्ट 2 की चर्चा थी। उन्होंने कहा था- ‘हम 7 निश्चय पार्ट 2 के बूते सक्षम व स्वावलंबी बिहार बनाएंगे। लोगों की सेवा करना हमारा धर्म है। आप (जनता) सभी को धन्यवाद कि मुझे बिहार की सेवा का मौका दिया। मुझे विश्वास है कि आपके सहयोग और आशीर्वाद से 7 निश्चय पार्ट 2 को क्रियान्वित कर राज्य को और ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए सक्षम एवं स्वावलंबी बिहार बनाएंगे।’ 7 निश्चय पार्ट 2 में पहला था- युवा शक्ति, बिहार की प्रगति। दूसरा- सशक्त महिला, सक्षम महिला, तीसरा- हर खेत को पानी, चौथा- स्वच्छ गांव, समृद्ध गांव, पांचवां- स्वच्छ शहर, विकसित शहर, छठा- सुलभ संपर्कता और सातवां था- सबको अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधा।

नीतीश ने सात निश्चय के तहत शिक्षकों की नियुक्ति की बात कही है। यह बात आरजेडी के गले नहीं उतर रही। क्योंकि तेजस्वी यादव ने 2022 में नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनते ही 10 लाख सरकारी नौकरी की बात कही थी। आरजेडी नेताओं का कहना है कि इसमें सात निश्चय की बात कहां से आ गई। आरजेडी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी, शक्ति यादव समेत कई नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि तेजस्वी यादव ने यह वादा किया था। उनका 15 महीने का कार्यकाल बिहार में पहले की 15 साल की सरकार पर भारी है। यह सबको पता है कि 15 साल तक नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ बिहार में एनडीए की सरकार चलाई। जिस तरह नीतीश कहते हैं कि 2005 के पहले बिहार में कुछ था या होता था क्या, उसी अंदाज में आरजेडी नेताओं ने उन्हें जवाब दिया है कि 15 साल में जो नहीं हुआ, वह 15 महीने में तेजस्वी यादव के कारण हो सका है।

आखिर कौन थे डॉ राम बक्स सिंह?

आज हम आपको डॉ राम बक्स सिंह के बारे में जानकारी देने वाले हैं! यूपी में सीतापुर जिले से ताल्लुख रखने वाले राजेन्द्र सिंह ने अपने पिता डॉ. राम बक्स सिंह को भारत रत्न से नवाजने के लिए केंद्र सरकार से मांग कर दी है। राजेन्द्र सिंह ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय डॉ. राम बक्स सिंह ने बायोगैस के जनक के रूप में वैश्विक मंच पर एक अमिट छाप छोड़ी है। राजेन्द्र सिंह ने दावे के साथ कहा कि अब तक भारत में बायोगैस और गोबर गैस पर जो भी काम हुआ है उसका श्रेय वैज्ञानिक स्व. डॉ. राम बक्श सिंह को ही जाता है। उन्होंने गोबर के अलावा वनस्पति आदि से भी बायोगैस और गोबर गैस की प्रौद्योगिकी, रासायनिक विधि का अविष्कार किया है, जिसने खाद बनाने की प्रक्रिया में Fermentation & Decomposition को गति दी।साथ ही एक मूल्यवान ज्वलनशील गैस का निर्माण भी किया। उन्होंने बताया कि डॉ. सिंह ने दो सौ से अधिक कम लागत वाले डाइजेस्टर विकसित किए हैं। जो पौधों और जानवरों के कचरे को खाद उर्वरक और ईंधन के लिए मीथेन में परिवर्तित करने के लिए डिजाइन किए थे। जिसे भारत समेत 15 से अधिक देशों में बायोगैस और गोबर गैस संयंत्र स्थापित किए गए थे।

यूपी के सीतापुर जिले के रहने वाले राजेन्द्र सिंह ने एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत करते हुए बताया कि उनके पिता डॉ. सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित वैज्ञानिक थे, जिन्होंने न केवल अपनी मातृभूमि में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि 26 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार के अधीन भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार ने डॉ. राम बक्स सिंह के कार्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अमूल्य संग्रह का महत्वपूर्ण अधिग्रहण किया है।यह अधिग्रहण एक अग्रणी वैज्ञानिक के असाधारण योगदान का परिणाम है। यह उनकी विरासत को मजबूत करता है साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी है।डॉ. राम बक्स सिंह ने 1950 के दशक के दौरान साल 9 सितंबर 1957 को सीतापुर जिले के रामनगर में भारत का पहला गोबर गैस संयंत्र डिजाइन कर उसे स्थापित किया था। जिसका उद्घाटन तत्कालीन केंद्रीय सामुदायिक विकास मंत्री एस. के. डे और यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव गोविंद नारायण ने किया था।

इसके बाद साल 1960 में डॉ. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित एशिया के पहले “गोबर गैस रिसर्च स्टेशन” अजीतमल-इटावा में अनुसंधान और संचालन का काम किया। लगभग दो दशकों तक यूपी सरकार के अधीन केंद्र प्लानिंग रिसर्च एंड एक्शन डिवीजन में प्रभारी अधिकारी के रूप में काम किया है। उन्होंने 7 किताबें लिखी है। जिन्हें भारत, यूएस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस वाशिंगटन डीसी. और अन्य देशों के राज्य व केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित है। उनकी किताब को बायोगैस की बाइबिल माना जाता है।इतना ही नहीं, डॉ. राम बक्स सिंह द्वारा किये गए अविष्कार, अनुसंधान, विकास कार्य और उनकी उपलब्धियों को यूएस. सीनेट ने यूएस. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव सीनेट में कार्यवाही के दौरान चर्चा का विषय भी रहा है। साथ ही विश्वविद्यालयों और दुनिया भर में कई अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक संस्थानों में उनके प्रौद्योगिकी को मान्यता भी दी गई है।

वहीं डॉ. राम बक्स सिंह को अपने 40 वर्षों के कार्यकाल में डेनमार्क, ईरान, जर्मनी, नेपाल, अमेरिका, सीलोन समेत 15 देशों में 1000 से अधिक बायोगैस और गोबर गैस सिस्टम का डिजाइन विकसित और स्थापित करने का अवसर भी मिला है। जून 1972 में संयुक्त राज्य अमेरिका में राल-जिम-फार्म, बेन्सन, वर्मोंट में पहला बायो गैस संयंत्र बनाया गया। जिसका उद्घाटन अलास्का के सीनेटर माइक ग्रेवल ने किया था। वहीं बायोगैस और गोबर गैस की दिशा में किए गए शोध को देखते हुए स्व. डॉ. राम बक्स सिंह ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा 3 बार बायोगैस सलाहकार के रूप में प्रतिनिधित्व किया।

डॉ. राम बक्स सिंह उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रहने वाले थे। उनका जन्म साल 1925 में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने 18 सितंबर 2016 को लखनऊ में अंतिम सांस ली थी। डॉ. सिंह ने 1963 में दिल्ली के एशिया इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। इसके बाद 1979 में कैलिफोर्निया की पेसिफिक वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इतना ही नहीं, अक्षय-उर्जा में लगातार शोध एवं कार्य में योगदान के लिए डॉ. राम बक्स सिंह को पेसिफिक वेस्टर यूनिवर्सिटी कैलिफोर्निया द्वारा मास्टर ऑफ एप्लाइड साइंस एवं डॉक्टर ऑफ टेक्नोलॉजिकल फिलॉसफी की मानद उपाधि भी प्रदान की गई थी।

डॉ. राम बक्स सिंह के बेटे राजेन्द्र सिंह ने पिता को उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए भारत रत्न की मांग करते हुए कहा कि जब हमारा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, ऐसे में मां भारती के लाल महान वैज्ञानिक स्व. डॉ. राम बक्श सिंह को राष्ट्रीय पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित करके हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि आज जब समूचा विश्व स्वच्छ उर्जा ग्रीन एनर्जी अथवा गैर परंपरागत उर्जा के उत्सर्जन और उपयोग व इसके स्रोत पर हर अंतरराष्ट्रीय मंचों में इस विषय को गंभीरता से ले रहा है। इतना ही नहीं भारत सरकार भी इस दिशा में तेज़ी के साथ काम कर रही है। सीतापुर के मूल निवासी राजेन्द्र सिंह ने बताया कि हाल ही में जर्मनी में हुए G7 बैठक में ग्रीन एनर्जी एलाइंस एवं जीरो कार्बन एमिशन & G21 मीटिंग इन दिल्ली की महत्ता को भारत के प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर उल्लेखित किया था। ऐसे में स्व. राम बक्स सिंह जिन्होंने अपनी ऊर्जा और सारा समय देश हित में गैर-परंपरागत ऊर्जा बायोगैस और गोबर गैस के शोधकर्ता के रूप में समर्पित किया है। अमेरिकी सरकार द्वारा प्रदत्त यूएस ग्रीन कार्ड के बावजूद उन्होंने भारत में रहने का निर्णय लिया और यहां रहकर ग्रामीण भारत की ऊर्जा उपयोगिता में आत्मनिर्भरता और ग्रामीण भारत के सतत विकास का काम लगातार करते रहे।

जब कारसेवकों पर हुई दनादन गोलीबारियाँ!

एक ऐसा समय जब कारसेवकों पर दनादन गोलीबारियाँ की गई! 1853, 1858 से 1934 और 1949 का वक्त भी जिया। लेकिन, 90 के दशक ने मेरी धरती को राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिया। राजीव गांधी जिस सॉफ्ट हिंदुत्व की विचारधारा के साथ हिंदू और मुस्लिम वर्ग के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे थे। राजनीति कहीं उससे काफी आगे बढ़ चुकी थी। देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने राजीव के छोड़े गए हिंदुत्व की डोर को थामा और मंदिर आंदोलन के मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से राम मंदिर का रथ लेकर निकाले थे। उनके रथ को बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव ने रोक दिया। अयोध्या पहुंचने से पहले रथ यात्रा रुक चुकी थी। वैदिक काल में अश्वमेध यज्ञ की परंपरा थी। इसमें यज्ञ कराने वाला राजा घोड़े छोड़ता था और अगर कोई राजा उसे पकड़ता तो अश्वमेध यज्ञ करने वाले राजा से उसे युद्ध करना होता था। रामायण काल में भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ का जिक्र आता है। उनके छोड़े घोड़े को उनके ही वन में रह रहे पुत्रों लव और कुश ने पकड़ा था। इस घोड़े को छुड़वाने के लिए प्रभु राम को स्वयं अपने पुत्रों से युद्ध करने मैदान में उतरना पड़ा। हालांकि, अब राजतंत्र नहीं था। भाजपा केंद्र की सत्ता में साझीदार थी। मतलब पावर में थी। अश्वमेध यज्ञ की तरह उनका रथ देश के तमाम हिस्सों से होते 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचनी थी। लालू यादव ने 23 अक्टूबर 1990 को ही आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ रथ रोक दिया। इसके बाद युद्ध यानी आक्रोश का प्रदर्शन तय था। लालू के रथ रोकने के कदम को चैलेंज माना गया। हालांकि, जिस हिंदुत्व के एजेंडे को सेट करने के लिए यह रथ यात्रा निकली थी, वह आडवाणी की 2गिरफ्तारी से पूरा होता दिखा। विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में मैदान सजा रखा था। आजाद देश में सबसे बड़ी कारसेवा का ऐलान किया गया था। वहीं, यूपी की मुलायम सिंह यादव की सरकार किसी भी स्थिति में कारसेवा को पूरी नहीं होने देना चाहती थी। यह मेरे प्रभु राम के मंदिर आंदोलन के लंका कांड की शुरुआत थी।

बिहार में लालू सरकार ने राम मंदिर रथ यात्रा को रोक कर मंदिर आंदोलन को बाधित करने का संदेश दिया। वहीं, यूपी की मुलायम सरकार ने दावा किया कि 30 अक्टूबर 1990 को प्रस्तावित कारसेवा को किसी भी स्थिति नहीं होने दिया जाएगा। यहां कारसेवा के मतलब को समझ लेना आवश्यक है। दरअसल, राजीव सरकार ने 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर का शिलान्यास करने की अनुमति दे दी थी। यह मंदिर आंदोलन का सबसे अहम पड़ाव था। एक प्रकार से राजीव सरकार ने मंदिर के अस्तित्व को मान्यता दे दी थी। लेकिन, विवादित स्थल खड़ा था। वहां जर्जर मस्जिद थी। इसमें हर शुक्रवार को जुमे की नमाज पढ़ी जाती थी। हिंदू पक्ष यहां पर मंदिर बनाने की योजना तैयार कर रहा था। इसी मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा होनी थी। बाहर में अंग्रेजों के जमाने में निर्धारित राम चबूतरे से निर्माण कार्य शुरू किया जाना था, लेकिन तत्कालीन केंद्र की वीपी सिंह और यूपी की मुलायम सिंह सरकार विवादित स्थल पर किसी प्रकार का निर्माण नहीं होने देना चाहती थी।

विश्व हिंदू परिषद ने रामभक्तों को जुटाकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया। सितंबर 1990 में विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शिवसेना की ओर से मंदिर पुननिर्माण के लिए आंदोलन चलाया। अब हिंदुओं के भीतर भी मंदिर को एक अलग भाव पैदा होने लगा। लोग सवाल करने लगे कि हमारी आस्था की कद्र सरकारें क्यों नहीं कर रही हैं? जवाब कहीं से नहीं मिल रहा था। वीएचपी, आरएसएस और भाजपा लगातार लोगों को अयोध्या में जुटकर अपने भगवान को जनमानस के सामने लाने की अपील कर रहे थे। 30 अक्टूबर 1990 को आडवाणी की रथ यात्रा अयोध्या पहुंचनी थी। लेकिन, पहले ही आडवाणी गिरफ्तारी के साथ राम मंदिर रथ रुक चुका था। विश्व हिंदू परिषद का अभियान जारी था। अयोध्या में रामभक्तों का जुटान होने लगा। भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी और विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने रामभक्तों को अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया। देशभर में इसको लेकर हलचल तेज हो गई। उस समय यूपी में मुलायम सिंह यादव सरकार थी। मुलायम सरकार ने विवादित परिसर की सुरक्षा का वादा किया। बाबरी मस्जिद परिसर और अयोध्या शहर को सुरक्षा बलों के हवाले दे दिया गा। मुलायम ने साफ कहा था कि अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। मुलायम के दावों पर रामभक्तों का जोश उबाल मार रहा था। हर रामभक्त प्रभु रामलला के मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर घर से निकलने लगा। पहली बार देशभर से 21 अक्टूबर 1990 से अयोध्या में रामभक्त कारसेवकों का जुटान शुरू हुआ। हर दिन के साथ उनकी संख्या बढ़ रही थी। कारसेवा की तिथि पहले से 30 अक्टूबर निर्धारित थी।

एक्शन डे यानी 30 अक्टूर 1990 को लेकर रामनगरी में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व की गई थी। पुलिस ने अयोध्या के लिए सभी बस और ट्रेन सेवाओं पर रोक लगा दी थी। सीमाओं को सील कर दिया गया। कारसेवकों को किसी भी स्थिति में अयोध्या नहीं पहुंचने देने की कोशिश सरकार के स्तर पर की गई। ऐसे में अधिकांश कारसेवक पैदल ही अयोध्या की तरफ कूच कर गए। एक रिपोर्ट तो यहां तक दावा करती है कि कई कारसेवक तो सरयू की तेज धार को तैरकर अयोध्या पहुंच गए थे। यूपी पुलिस ने विवादित ढांचे की करीब डेढ़ किलोमीटर पहले से बैरिकेडिंग लगा दी। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। अयोध्या में अब एक्शन डे आ गया था। कारसेवा की शुरुआत 30 अक्टूबर 1990 सुबह 10 बजे से हुई। सुबह 10 बजे महंत नृत्य गोपाल दास और विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल कारसेवकों के एक बड़े समूह के साथ विवादित स्थल की तरफ बढ़े। पुलिस ने कारसेवकों को रोकने की कोशिश की। लेकिन, कारसेवक आगे बढ़ते रहे। इसी दौरान लाठीचार्ज का आदेश दे दिया गया। कारसेवकों पर लाठियां बरसने लगी। एक लाठी अशोक सिंघल के सिर पर लगी। उनके सिर में चोट लगने की खबर कारसेवकों के बीच आग की तरफ फैली और वे उग्र हो गए। इसके बाद पुलिसकर्मियों और कारसेवकों के बीच भिड़ंत शुरू हो गई। करीब एक घंटे तक अयोध्या में युद्ध जैसी स्थिति बनी रही। सुबह करीब 11 बजे पुलिस और कारसेवकों के बीच भिड़ंत के बीच एक साधु ने कॉन्स्टेबलों की एक बस को अपने नियंत्रण में ले लिया।

आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर ले जाने के लिए यह बस वहां खड़ी की गई थी। कारसेवकों को गिरफ्तार कर इसमें रखा जा रहा था। पुलिस ने राम जन्मभूमि रोड पर बैरिकेडिंग कर रखी थी। साधु ने बस को कब्जे में लेने के बाद तेज गति से आगे की तरफ भगाना शुरू कर दिया। सुरक्षाकर्मी जब तक कुछ समझते बस बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए आगे की तरफ निकल गई। इससे अन्य लोगों के लिए पैदल चलने का रास्ता साफ हो गया। सुरक्षाकर्मी सतर्क थे। विवादित स्थल के पास भारी सुरक्षा बंदोबस्त थे। इसके बाद भी वहां तक करीब 5000 कारसेवक पहुंच चुके थे। पुलिस उनके पीछे-पीछे दौड़ रही थी। रुकने को कह रही थी। कारसेवक दौड़ते आगे बढ़ रहे थे।

रामभक्तों पर दो दिनों में दूसरी बार गोली चली। हनुमानगढ़ी से लेकर विवादित परिसर के बीच रामभक्तों को गोलियों से निशाना बनाया जाने लगा। फायरिंग शुरू होने के बाद कारसेवक इधर- उधर भागने लगे। सुरक्षा बलों के लिए आज कारसेवकों की जान लेना मकसद बन गया था। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि इस दिन हनुमानगढ़ी के आसपास की गलियां खून से लाल हो गई थी। नालियों में खून बह रहा था। सुरक्षाकर्मी इस भीड़ में 30 अक्टूबर को बाबरी मस्जिद पर भगवा झंडा फहराने वाले कोठारी बंधुओं को ढूंढ़ रहे थे। सुरक्षाबलों ने एक घर में छिपे कोठारी बंधुओं को खींचकर सड़क पर लाए। बीच सड़क पर उन्हें गोली मारे जाने का दावा प्रत्यक्षदर्शियों की ओर से किया जाता है।

कोठारी बंधुओं के अलावा जोधपुर के सेठाराम माली, गंगानगर के रमेश कुमार, फैजाबाद महावीर प्रसाद, अयोध्या के रमेश पांडेय, मुजफ्फरपुर के संजय कुमार, जोधपुर के प्रो. महेंद्रनाथ अरोड़ा, राजेंद्र धारकर, बाबूलाल तिवारी और एक अनाम साधु के इस घटना में मारे जाने का रिकॉर्ड मिलता है। हिंदू संगठनों का दावा है कि पुलिस ने उस दिन सैकड़ों कारसेवकों की हत्या की। कई शवों का अज्ञात स्थानों पर दाह संस्कार कराया। बड़ी संख्या में लाशों को बोरे में भरकर सरयू नदी में भी प्रवाहित करने का आरोप भी पुलिस पर है।

अयोध्या मंदिर आंदोलन में आज भी कोठारी बंधुओं का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। राजकुमार कोठरी और शरद कोठारी दो भाई थे। कलकत्ता में संघ से जुड़े हुए थे। वे आरएसएस की शाखाओं में शामिल होते थे। उन्होंने दूसरे साल तक का प्रशिक्षण लिया हुआ था। वीएचपी की 30 अक्टूबर की कारसेवा की घोषणा होते ही दोनों ने अयोध्या जाने की जिद शुरू कर दी। उनके पिता हीरालाल कोठारी ने दोनों भाइयों को भाग लेने की अनुमति दे दी। दिसंबर 1990 में उनकी बहन की शादी होने वाली थी। फिर भी दोनों भाई कारसेवा के लिए निकल पड़े। बहन को वादा किया कि शादी तक वापस आ जाएंगे। कोलकाता से वाराणसी पहुंचने पर उन्हें पता चला कि अयोध्या के लिए ट्रेन सेवा बंद है। रास्तों को बंद कर दिया गया है। दोनों ने टैक्सी ली और आजमगढ़ पहुंच गए। वहां से उन्होंने पैदल अयोध्या जाने का फैसला किया। करीब 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर 30 अक्टूबर 1990 को दोनों भाई अयोध्या पहुंच गए। 30 अक्टूबर की कारसेवा में बाबरी पर भगवा फहरा कर वे सुर्खियों में आ गए।

2 नवंबर 1990 की कारसेवा में कोठारी बंधु दिगंबर अखाड़ा की तरफ से निकल रहे कारसेवकों के हुजूम में शामिल थे। दोनों भाई बजरंग दल के संस्थापक अध्यक्ष विनय कटियार के नेतृत्व में सड़क पर दोबारा उतरे। पुलिस ने इस दौरान कारसेवकों पर फायरिंग शुरू कर दी। दोनों भाई एक मकान में छिप गए। दावा किया जाता है कि एक पुलिस अधिकारी ने शरद कोठारी को घर से पकड़ लिया। सड़क पर खड़ाकर उन्हें गोली मार दी गई। बड़े भाई राजकुमार कोठारी उस समय शरद को बचाने के लिए दौड़े। उन्हें भी गोली मार दी गई। 4 नवंबर 1990 को दोनों भाइयों का सरयू तट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान कारसेवकों की भारी भीड़ सरयू तट पर उमड़ी। इसी भीड़ में मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम कहकर संबोधित किया गया था।

क्या अब बिगड़ने वाले हैं भारत मालदीव के रिश्ते?

अब भारत मालदीव के रिश्ते बिगड़ सकते हैं! मालदीव ने भारत को उनके देश से भारतीय सैनिक हटाने के लिए डेडलाइन दे दी है। मालदीव ने भारत से कहा है कि 15 मार्च से पहले अपने सैनिक हटा लें। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की चीन यात्रा से लौटते ही मालदीव ने अपने तेवर सख्त करने शुरू किए हैं। इससे पहले शनिवार को ही मुइज्जू ने कहा था कि हमारा देश भले ही छोटा है लेकिन हमें बुली करने का लाइसेंस किसी के पास नहीं है। उन्होंने किसी देश का नाम तो नहीं लिया लेकिन माना जा रहा था कि उनका इशारा भारत की तरफ था। मालदीव की पिछली सरकार के अनुरोध पर ही मालदीव में भारत की सेना की एक छोटी टुकड़ी है। आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि 15 मार्च अभी काफी दूर है और इस बीच कुछ भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि मालदीव यह कहकर कि भारत की मिलिट्री वहां तैनात है, राजनीति खेल रहा है। वहां भारत के जो सैनिक हैं वे ट्रेनर हैं, जो मालदीव की नैशनल डिफेंस फोर्स को ट्रेनिंग देते हैं। इससे मालदीव का ही फायदा है। अगर मालदीव नहीं चाहता कि वे वहां रहें तो भारत को इससे क्या दिक्कत हो सकती है।

स्मृति पटनायक कहती हैं कि मालदीव की मौजूदा सरकार का चुनावी प्रचार ही जब भारत के विरोध में था तो अब वह जो स्टैंड ले रहे हैं या जिस तरह के स्टेटमेंट दे रहे हैं यह आश्चर्यजनक नहीं है। वहां काफी पोलराइज माहौल है और वहां चीन बनाम भारत की राजनीति हो रही है। मालदीव इस मसले को एक हद तक ही ले जा सकता है लेकिन यह नहीं लगता कि ये भारत और मालदीव के रिश्ते के ब्रेकडाउन तक जाएगा। मालदीव ने चीन से टूरिस्ट भेजने का आग्रह किया है। लेकिन मालदीव जाने वाला ज्यादातर हाईएंड टूरिस्ट वेस्टर्न टूरिस्ट और बॉलिवुड यानी भारत से जाते हैं, जिससे मालदीव की कमाई होती है। कॉमन चीनी टूरिस्ट से मालदीव कितना कमा सकता है यह देखना होगा।मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह वादा किया था कि मालदीव में सरकार बनाते ही वह विदेशी सेना को अपने देश से बाहर करेंगे। मालदीव में इस वक्त करीब 70 भारतीय सैनिक हैं। भारतीय सैनिकों के पास कुछ सर्विलांस एयरक्राफ्ट भी हैं जो हिंद महासागर की निगरानी करते हैं। आपदा राहत के साथ ही मेडिकल हेल्प भी भारतीय सैनिकों के जरिए पहुंचाई जाती है। इंडियन नेवी का डॉर्नियर हेलिकॉप्टर और दो दूसरे हेलिकॉप्टर भी वहां हैं।

बता दे कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने चीन से वापस आने के बाद ही अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। मालदीव वापस लौटते ही उन्होंने एक बार फिर भारत से अपने सैनिकों को वापस बुलाने को कहा है। हालांकि इस बार मामला काफी सीरियस हो गया है, क्योंकि मुइज्जू की ओर से अब इसे लेकर एक समय सीमा दे दी गई है। मालदीव ने कहा कि भारत के सैन्यकर्मियों को 15 मार्च तक देश छोड़ देना चाहिए। शी जिनपिंग के साथ मुलाकात के बाद से ही मुइज्जू के तेवर बदले-बदले लग रहे हैं। मालदीव राष्ट्रपति कार्यालय में सार्वजनिक नीती सचिव अब्दुल्ला नाजिम इब्राहिम ने कहा, ‘भारतीय सैन्यकर्मी मालदीव में नहीं रह सकते। यह राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू और इस प्रशासन की नीति है।’ रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्तमान में मालदीव में 88 भारतीय सैन्यकर्मी हैं। लगभग दो महीने पहले भी राष्ट्रपति मुइज्जू ने भारतीय सैनिकों की वापसी की बात कही थी। मोहम्मद मुइज्जू भारत विरोध के लिए जाने जाते हैं और ‘इंडिया आउट’ प्रचार के जरिए वह सत्ता में आए हैं।

मालदीव और भारत ने सैनिकों की वापसी पर बातचीत करने के लिए एक हाई लेवल कोर ग्रुप बनाया है। इस ग्रुप ने रविवार को माले में विदेश मंत्रालय मुख्यालय में अपनी पहली बैठक की। रिपोर्ट के मुताबिक इस मीटिर में भारतीय उच्चायुक्त मुनु महावर भी मौजूद रहे। नाजिम ने इस मीटिंग की पुष्टि की है और कहा कि बैठक के एजेंडे में 15 मार्च तक सैनिकों को वापस बुलाने का अनुरोध किया गया। मालदीव से भारतीय सैनिकों की वापसी मुइज्जू का प्रमुख चुनावी वादा रहा है। पांच दिनों की चीन यात्रा से लौटने के बाद मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने शनिवार को भारत के खिलाफ एक कड़ा बयान दिया। इसमें उन्होंने कहा कि उनका देश छोटा हो सकता है, लेकिन ‘इससे किसी को हमें धमकाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।’ मुइज्जू ने यह बयान ऐसे समय में दिया है, जब मालदीव के मंत्रियों की ओर से पीएम मोदी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की गई थी। इसने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों को खराब किया है।

चीन की यात्रा से लौटने पर उन्होंने मीडिया से किसी देश का नाम लिए बिना कहा, ‘हमारे पास इस महासागर में छोटे द्वीप हैं, लेकिन हमारे पास 9,00,000 वर्ग किलोमीटर का एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र है। मालदीव इस महासागर का सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले देशों में से एक है।’ नवंबर में पदभार संभालने के बाद मुइज्जू की यह पहली चीन यात्रा है। भारत पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए राष्ट्रपति मुइज्जू ने कहा, ‘यह महासागर किसी विशिष्ट देश का नहीं है। यह हिन्द महासागर इस क्षेत्र में स्थित सभी देशों का है।’ 

बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता के लिए क्या बोले शशि थरूर?

हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता के लिए एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव को बमुश्कल दो से तीन महीने बाकी हैं। पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए और विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A दोनों मैदान में हैं। बीजेपी का कहना है कि इस बार आंकड़ा 400 को भी पार कर जाएगा। लेकिन तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने जो कहा है वो एनडीए को परेशान कर सकता है। थरूर ने कहा कि 2024 के आम चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है लेकिन, सहयोगियों से उसे झटका लग सकता है। सहयोगियों से शशि थरूर का मतलब एनडीए के साथी दलों से था। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के बारे में बोलते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि भारत एक विविधतापूर्ण देश है और यह देश उस स्थिति के साथ रहने के लिए पूरी तरह से तैयार है, जहां उसके पास सभी राज्यों में 100 प्रतिशत सहमति नहीं है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘इंडिया: द फ्यूचर इज नाउ’ सत्र में कहा कि मुझे अब भी लगता है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। लेकिन, मेरा मानना है कि उनकी भाजपा संख्या को उस स्तर तक कम किया जा सकता है, जहां सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या जुटाने के वास्ते उनके संभावित सहयोगी समर्थन करने के इच्छुक नहीं होंगे। हो सकता है कि एनडीए से अलग होकर सहयोगी दल हमारे साथ सहयोग करने को तैयार हों। इसलिए हमें इसे आजमाना होगा।

शशि थरूर ने इंडिया गठबंधन पर बोलते हुए कहा कि इस गठबंधन में सीटे बंटवारे को लेकर कठिनाइयां हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्हें अधिक से अधिक राज्यों में पर्याप्त समझौता होने की उम्मीद है ताकि हार की किसी भी आशंका से बचा जा सके। थरूर के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस देश के लोगों को ध्यान रखने की जरूरत है, वह यह है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को वोट दें क्योंकि मोदी, मोदी का नारा लगाने वालों को पता होना चाहिए कि केवल वाराणसी के लोग ही प्रधानमंत्री मोदी को वोट कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘हर किसी को अपनी सीट पर उस सबसे अच्छे उम्मीदवार को वोट देना होगा, जिसे लेकर उन्हें लगता है कि वे उनका अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। और, अगर वे केवल मोदी के लिए वोट करना चाहते हैं तो यह उनकी पसंद है।’

इस कार्यक्रम में इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल, नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, अमेरिकी चिकित्सक एवं लेखक अब्राहम वर्गीस और मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन समेत 400 प्रसिद्ध हस्तियों ने भाग लिया। केएलएफ रविवार को समाप्त हुआ। बता दें कि बीजेपी 2024 लोकसभा चुनाव के लिए उन राज्यों के तरफ देख रही है, जहां से पहले सफलता नहीं मिली। भारत से पांच दक्षिणी राज्यों में कुल 129 लोकसभा सीटें हैं और 2019 में को केवल 29 सीटों पर सफलता मिली। कर्नाटक की 25 और तेलंगाना की चार सीटों के अलावा बाकी बचे तीन राज्य केरल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में बीजेपी का खाता भी नहीं खुला। अब बीजेपी 20 लोकसभा सीट वाले केरल का मिथक तोड़ने और दक्षिण के 5 राज्यों में सीट दोगुना करने की प्लानिंग कर रही है। अभी तक के चुनावी इतिहास में भारतीय जनता पार्टी को केरल में एक लोकसभा सीट पर भी जीत नसीब नहीं हुई। पिछले दिनों पीएम मोदी ने त्रिशूर ने रोड शो और रैली कर अपनी मंशा जता दी । अब बीजेपी नेता तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में कैंपेन शुरू करने वाले हैं। कर्नाटक में बीजेपी का आधार है, पिछले चुनाव में वहां से 25 सीटें मिली थीं। जेडी एस से समझौते के बाद इस बार भी पीएम मोदी कर्नाटक में बड़ी जीत की उम्मीद कर रहे हैं।

केरल एक ऐसा राज्य है, जहां हिंदुओं की आबादी 54 फीसदी से अधिक है। इस राज्य में 26.56 आबादी मुस्लिम और 18 फीसदी ईसाई है। बीजेपी हिंदू वोटर वाले इलाके में फोकस कर रही है। यहां बीजेपी की उम्मीद आरएसएस की मौजूदगी के कारण जिंदा है, मगर पार्टी के कार्यकर्ता ग्राउंड पर कम ही नजर आते हैं। अभी तक के चुनावों में मजबूत दावेदारी नहीं होने के कारण राइट विंग के वोटर कांग्रेस को वोट देते रहे। पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने एक्टर सुरेश गोपी, के पी श्रीसन, कुम्मनम राजशेखरन और ओ राजगोपाल जैसे नेताओं को मैदान में उतारकर अपनी मजबूत मौजूदगी का एहसास कराया है। जीत के लिए बीजेपी एझावा समुदाय और क्रश्चियन वोटरों के बीच अपनी बैठ बना रही है। इस चुनाव में पार्टी कई सीटों पर एझावा समुदाय के नेताओं को मैदान में उतार सकती है। बीजेपी की नजर त्रिशूर, मध्य केरल में पथानामथिट्टा, एटिंगल और तिरुवनंतपुरम लोकसभा पर टिकी है।

त्रिशूर लोकसभा सीट से एक बार फिर पूर्व राज्यसभा सांसद सुरेश गोपी को पार्टी अपना उम्मीदवार बना सकती है। 2019 के चुनाव में सुरेश गोपी ने 28.2 फीसदी वोट हासिल किए थे। इसके अलावा तिरुवनंतपुरम सीट पर भी कांग्रेस नेता शशि थरूर के मुकाबले के लिए बड़े चेहरे को उतारा जा सकता है। तिरुवनंतपुरम सीट से चौथी बार शशि थरूर मैदान में होंगे। 2009, 2014 और 2019 के चुनावों में बीजेपी ने इस सीट से चुनाव हारी तो जरूर, मगर हर चुनाव में वोटों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की। 2019 के चुनाव में बीजेपी के नेता कु्म्मनम राजशेखरन को 31 फीसदी और कांग्रेस नेता शशि थरूर को 41 फीसदी वोट मिले थे। पथानामथिट्टा सीट पर भी बीजेपी का वोट शेयर 28 फीसदी के करीब पहुंचा था। एटिंगल लोकसभा सीट पर भी पार्टी को 24 फीसदी वोट मिले थे। बीजेपी को उम्मीद है कि केरल में सवर्ण माने जाने वाले नायर, गैर कैथोलिक क्रिश्चियन और एझावा समुदाय के करीब जाकर इन सीटों को जीता जा सकता है।

भारत जोड़ो न्याय यात्रा के लिए क्या बोली बीजेपी?

हाल ही में बीजेपी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर एक बयान दिया है! भारतीय जनता पार्टी भाजपा ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ को ‘भारत तोड़ो यात्रा’ बताते हुए रविवार को हमला बोला। बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस को राहुल गांधी को आगे बढ़ाने और नेहरू-गांधी परिवार की पकड़ बनाए रखने पर जोर देने के बजाय पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और अपनी पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा प्रताड़ित लोगों को न्याय दिलाना चाहिए। अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी रविवार को मणिपुर से मुंबई की यात्रा पर निकले। रविवार को ही पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवरा ने कांग्रेस छोड़ी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं।केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने यात्रा को धोखा बताया और कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को न्याय नहीं मिल रहा है और वे दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। ठाकुर ने कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, हिमंत विश्व शर्मा, हार्दिक पटेल, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आर पी एन सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का जिक्र किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ऐसे नेताओं की एक लंबी सूची है जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उन्हें पार्टी में न्याय नहीं मिला। अब, मिलिंद देवरा ने भी कांग्रेस छोड़ दी है।’ ठाकुर ने कहा, ‘कांग्रेस की न्याय यात्रा एक धोखा है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी लोगों को न्याय देने की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस नेता खुद न्याय से वंचित हैं।’

अनुराग ठाकुर ने कहा कि इसके विपरीत भाजपा में हर किसी को उचित सम्मान मिलता है और यही कारण है कि ‘पार्टी में कोई मुख्यमंत्री है, कोई केंद्रीय मंत्री है, कोई सांसद है और कोई विधायक है।’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास जताया है और उनके साथ जुड़ने के इच्छुक हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रीजीजू ने सवाल किया कि यात्रा का उद्देश्य भारत को एकजुट करना है या इसे विभाजित करना। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘राहुल गांधी पूर्वोत्तर जा रहे हैं लेकिन क्या उन्होंने उन गिरोहों का समर्थन करने के लिए माफी मांगी है जो खुले तौर पर पूर्वोत्तर को देश को बाकी हिस्सों से काटना चाहते हैं?’

अरुणाचल पश्चिम के सांसद रीजीजू ने पूर्वोत्तर पर छात्र नेता शरजील इमाम की टिप्पणी का एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि गांधी ने टुकड़े-टुकड़े गिरोह का समर्थन किया इसलिए वह भारत जोड़ो यात्रा का नाटक कर रहे हैं। शरजील अभी जेल में हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने पार्टी में वंशवाद बनाए रखने और गांधी को आगे बढ़ाने के लिए दक्षिण से उत्तर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के महीनों बाद पूर्व से पश्चिम की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू की है।

दुष्यंत गौतम ने मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी की कांग्रेस छोड़ने वाले सभी लोग महात्मा गांधी की आत्मा को शांति पहुंचा रहे हैं जो चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए। गौतम ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘मुझे नहीं पता कि जब वह बोलते हैं तो किस तरह की भावना हावी हो जाती है। वह जो कहते हैं उसे कोई नहीं समझता। मुझे लगता है कि यह महात्मा गांधी की आत्मा है जो उन्हें बार-बार कांग्रेस को खत्म करने के लिए कहती है।’ उन्होंने सवाल किया कि यह कैसी ‘न्याय यात्रा’ है। उन्होंने पूछा, ‘क्या आप यह उन लाखों लोगों को न्याय देने के लिए कर रहे हैं जो आपके पूर्वजों द्वारा देश के विभाजन के कारण मारे गए, उन लोगों को जो भोपाल गैस रिसाव की घटना में मारे गए, या उन सिखों को जो 1984 के दंगों में मारे गए?’ भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ऐसे नेताओं की एक लंबी सूची है जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उन्हें पार्टी में न्याय नहीं मिला। अब, मिलिंद देवरा ने भी कांग्रेस छोड़ दी है।’ ठाकुर ने कहा, ‘कांग्रेस की न्याय यात्रा एक धोखा है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी लोगों को न्याय देने की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस नेता खुद न्याय से वंचित हैं।’गौतम ने कहा, ‘वे सभी उनसे न्याय की मांग कर रहे हैं।’ भाजपा नेता ने दावा किया कि कांग्रेस का पूरा प्रयास यह रहता है कि मां और बेटे को न्याय मिले और गांधी किसी भी तरह आगे बढ़ें।

क्या अब भारत की दृष्टि से बचेगा पाकिस्तान?

अब पाकिस्तान का भारत की दृष्टि से बचना मुश्किल होगा! भारत ने पाकिस्‍तान की हर नापाक हरकत पर नजर रखने का बंदोबस्‍त कर लिया है। इसके लिए आदमी नहीं, टेक्‍नोलॉजी का काम करेगी। भारतीय सेना ने पंजाब सेक्‍टर में फॉरवर्ड बेस पर मध्यम-ऊंचाई और लंबे समय तक टिकने वाले ड्रोनों को तैनात करने का फैसला किया है। इनका नाम दृष्टि-10 है। इन्‍हें जल्‍द ही काम पर लगाने की तैयारी है। इन ड्रोन से भारतीय सेना की सर्विलांस क्षमता को बढ़ावा मिलने की उम्‍मीद है। भारत के सामने सुरक्षा के लिहाज से इस समय पाकिस्‍तान और चीन के रूप में दोहरी चुनौती है। यही कारण है कि सेना सुरक्षा तैयारियों में किसी भी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहती है। भारतीय फर्म एडडिफेंस की ओर से इन ड्रोन को अगले दो से तीन महीनों में बल में शामिल किए जाने की उम्मीद है। भारतीय सेना ने इमरजेंसी प्रावधानों के तहत फर्म से इनमें से दो ड्रोन के लिए ऑर्डर दिए हैं। इन प्रावधानों के अनुसार, विक्रेताओं की ओर से आपूर्ति की जाने वाली प्रणालियां 60 फीसदी से ज्‍यादा स्वदेशी होनी चाहिए। इन्‍हें डिफेंस में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत होना चाहिए।

सैन्य अधिकारियों ने बताया कि भारतीय सेना की इन ड्रोनों को पंजाब सेक्टर में तैनात करने की योजना है। इससे सेना रेगिस्तानी सेक्टर के साथ पंजाब के उत्तर के इलाकों सहित एक बड़े क्षेत्र पर नजर रख सकती है। भारतीय सेना पहले से ही हेरॉन मार्क 1 और मार्क 2 ड्रोन ऑपरेट कर रही है। उसने बलों के लिए सरकार से अनुमोदित आपातकालीन खरीद की अंतिम किश्त के तहत दृष्टि-10 या हर्मीस-900 ड्रोन के लिए ऑर्डर भी दिए हैं।

अडानी डिफेंस ने ड्रोनों के लिए टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर इजरायली फर्म एल्बिट के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। भारतीय कंपनी ने कहा था कि उसने 70 फीसदी तक इनका स्‍वदेशीकरण कर लिया है। इसे और बढ़ाने के लिए वह और काम करेगी। भारतीय सेना ने इजरायल से और ज्‍यादा सैटेलाइट-इनेबल्‍ड ड्रोनों को भी शामिल किया है। उसके पास इजरायली विमान उद्योगों के साथ सीधे सौदे में खरीदे गए कुछ हेरॉन मार्क 2 ड्रोन पहले से हैं।

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार और महानिदेशक आर्मी एविएशन लेफ्टिनेंट जनरल अजय सूरी ने ड्रोनों का अनावरण इस सप्ताह की शुरुआत में हैदराबाद में किया था। भारतीय नौसेना इन्‍हें पाकिस्तान के साथ समुद्री सीमा के अलावा ऊंचे समंदरों पर नजर रखने के लिए पोरबंदर में तैनात करने जा रही है। इसका कारण यह है कि इनमें 30 घंटे से ज्‍यादा समय तक उड़ान भरने और एक बार में लगभग 2,000 किमी की दूरी तय करने की क्षमता है।

बता दे कि अडाणी ग्रुप की कंपनी ने भारतीय नौसेना के लिए ड्रोन स्वदेशी ड्रोन बनाया है। इस स्वदेशी ड्रोन का नाम UAV दृष्टि-10 रखा गया है। ये स्टारलाइनर ड्रोन है, जिसे आज अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारतीय नौसेना को सौंप दिया। इस स्वदेशी ड्रोन के शामिल होने के बाद भारतीय नौसेना का ताकत और ज्यादा बढ़ गई है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित ये ड्रोन काफी एडवांस है। बुधवार को हैदराबाद में फ्लैगऑफ कार्यक्रम में नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने ड्रोन का अनावरण किया। UAV दृष्टि-10 ड्रोन किस तरह से नौसेना की ताकत बढ़ाएगा आइए बताते हैं। हैदराबाद में फ्लैगऑफ कार्यक्रम में नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने भारतीय नौसेना की जरूरतों के साथ अपने रोडमैप को बताया। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए अडाणी ग्रुप की सराहना की। नौसेना प्रमुख ने कहा, ‘यह ISR टेक्नॉलजी और समुद्री वर्चस्व में आत्मनिर्भरता की ओर एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। अडाणी ग्रुप ने न केवल मैन्युफेक्चरिंग में बल्कि ड्रोन के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल में भी मदद की है। हमारे नौसैनिक अभियानों में दृष्टि-10 का एकीकरण हमारी क्षमताओं को बढ़ाएगा, समुद्री निगरानी में ये ड्रोन हमारी मदद करेगा।’

अडानी एंटरप्राइजेज से जुड़े जीत अडानी ने हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं के मद्देनजर खुफिया, निगरानी और टोही प्लेटफार्मों के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। उन्होंने प्रभावी सूचवा प्रसार के लिए खुफिया तंत्र,बेहतर कम्युनिकेशन, ड्रोन जैसी मानव रहित तकनीक और साइबर टेक्नॉलजी की जरूरत पर जोर दिया। दिया। वहीं अडाणी ने कहा कि वह भारतीय सुरक्षा बलों की जरूरतों को पूरा करने और भारत को वैश्विक निर्यातक के रूप में स्थान देने के लिए तीनों सेनाओं और सीमा पर तैनात सुरक्षाबलो के लिए खुफिया और निगरानी के लिए प्लेटफॉर्म के विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने कहा, हमें भारतीय नौसेना की सेवा करने और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने पर गर्व है’।

आखिर राम मंदिर क्यों नहीं जा रही कांग्रेस?

कांग्रेस राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में नहीं जा रही है! अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण को ठुकराते हुए कांग्रेस ने 22 जनवरी को वहां जाने से इनकार कर दिया है। निमंत्रण, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अलावा सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी को मिला था। लेकिन, पार्टी ने इसे BJP-RSS का कार्यक्रम बता दिया। कई अन्य विपक्षी नेताओं ने भी निमंत्रण के बावजूद कार्यक्रम से दूरी बना ली है। इसके बाद यह बड़ा सवाल सामने है कि कांग्रेस और विपक्ष के अधिकतर नेताओं ने यह सियासी जोखिम क्यों लिया? क्या है इसके पीछे उनकी रणनीति? आम चुनाव में वे इसे किस तरह काउंटर करेंगे‌? राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में नहीं जाना सियासी जोखिम भरा फैसला माना जा रहा है। जानकारों के अनुसार, पार्टी आगे किस तरह के संदेश देगी, यह इस पर तय करेगा कि जोखिम कितना होगा। कांग्रेस का कहना है कि 22 जनवरी के कार्यक्रम से भले वह अलग रहेगी लेकिन उससे पहले और उसके बाद पार्टी के तमाम नेता राम मंदिर दर्शन करने जरूर जाएंगे। पार्टी सूत्रों का दावा है कि आम चुनाव से पहले तमाम नेता वहां एक बार जाएंगे। ऐसी भी चर्चा है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वह राम मंदिर भी जा सकते हैं। लेकिन, चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख के अनुसार, इसमें जोखिम तो है। उन्होंने कहा कि पिछले कई मौकों पर हम देख चुके हैं कि विपक्षी दल जनमानस की नब्ज समझने में या तो विफल रहे या इसमें देरी की। वे बालाकोट स्ट्राइक पर भी चूक गए। उन्होंने कहा कि राम मंदिर ऐसा मुद्दा है जो BJP को फायदा पहुंचाएगी, जिसके जवाब में कम से कम अभी विपक्ष के पास कोई कारगर रणनीति नहीं दिखती है।

कांग्रेस नेताओं का दावा है कि इस कदम से कोई सियासी नुकसान नहीं होगा। पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा NBT से कहते हैं कि पार्टी ने मंदिर जाने से इनकार ही कब किया है? पार्टी ने बस BJP-RSS के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार किया है। वह दावा करते हैं कि इससे उलटे उन्हें समर्थन ही मिलेगा कि उन्होंने धर्म में राजनीति करने की मंशा नहीं दिखाई। हालांकि पार्टी के अंदर इसे लेकर बेचैनी तो है। पार्टी को यह जरूर लगता है कि दक्षिण में इसका कोई असर नहीं होगा, जहां वह इस बार पूरी ताकत झोंक रही है, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र में आने वाले दिनों में अपनी बात को सावधानी से रखना होगा। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के अलग-अलग नेताओं को राम मंदिर पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से परहेज करने को कहा गया है।

अब यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्ष खासकर सॉफ्ट हिंदुत्व के एप्रोच को बदलकर सेकुलर राजनीति को अपनाने की ओर बढ़ेगा? यह सवाल इसलिए क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से इस मसले पर कांग्रेस का एप्रोच उलझन भरा रहा है। दरअसल, 2014 से लेकर अब तक कांग्रेस ने कई प्रयोग किए लेकिन अब तक इन मुद्दों की काट खोजने में सफलता नहीं मिली। 2014 के बाद जब कांग्रेस ने करारी हार के बाद एके एंटोनी के नेतृत्व में इसकी समीक्षा की तो पाया था कि हिंदू में बड़ा तबका ऐसा महसूस कर रहा है कि कांग्रेस बहुत हद तक उनके हितों को अनदेखा करता है और पूरा फोकस अल्पसंख्यकों पर रखता है। रिपोर्ट में कहा गया कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और हिंदुओं का बड़ा तबका उनके साथ आया। सुधार करते हुए एंटोनी कमिटी ने सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर लौटने की सलाह दी थी। लेकिन छिटपुट मौकों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियां इस धारणा को बदलने में विफल रहीं। राष्ट्रवाद का मुद्दा इसमें शामिल होने के बाद तो विपक्ष और बैकफुट पर चला गया। बीच में जहां कांग्रेस की सरकारें बनीं, मसलन छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों, या राजस्थान में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार, वहां पार्टी ने खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग किया। लेकिन तब भी पार्टी के अंदर इस मसले पर दो तरह की राय थी। कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने एनबीटी को दिए इंटरव्यू में कहा गया था- सॉफ्ट हिंदुत्व क्या होता है? सॉफ्ट या हार्ड हिंदुत्व जैसी कोई चीज नहीं होती है। हम धर्मनिरपेक्ष देश में हैं, जहां संविधान हर नागरिक को समान अधिकार की बात करता है। कांग्रेस बस इसी संविधान को मानती है और इसी अनुरूप चलती है। सभी को सम्मान, सभी को हक और सभी को सुरक्षा का अहसास दिलाना हमारा दायित्व है। हम असल मायने में सेकुलर हैं। पूजा करना सभी की आस्था है। मैं भी हिंदू हूं। पूजा करता हूं। इसका मतलब नहीं है कि मैं आरएसएस के हिंदुत्व को स्वीकार करूं। धर्मनिरपेक्षता ही हमारा रास्ता है। वहीं अयोध्या मसले पर भी पार्टी के आधिकारिक स्टैंड के इतर कुछ नेताओं ने राय दी। मतलब पिछले कुछ वर्षों से सॉफ्ट हिंदुत्व के मसले पर जो कांग्रेस के अंदर उलझन और दो राय थी, इस बार वह मजबूती से सामने आई है।