Sunday, April 12, 2026
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कोर्ट का आदेश और खुल गया था बाबरी मस्जिद का ताला!

एक ऐसा समय भी था जब कोर्ट का आदेश आया और खुल गया था बाबरी मस्जिद का ताला! अयोध्या पर आज कहा जा रहा है कि राजनीति हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अयोध्या को राजनीतिक एजेंडे के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन, अयोध्या पर राजनीति कब नहीं हुई? यह कोई दावे के साथ नहीं सकता है। राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के लिए मुगल शासक बाबर ने अपने सिपहसालार मीरबाकी के जरिए मंदिर गिरवाई। मस्जिद बनवाया। वह भी तो एक राजनीतिक प्रपंच ही था। अंग्रेजों ने बांटवारा कर भारतीय समाज को दो भागों में बांटा। लोगों को बांटकर 200 सालों तक राज करते रहे। जाते- जाते देश के दो टुकड़े कर गए। तो क्या उसे राजनीतिक नहीं कहेंगे। 1949 में मस्जिद में जब रामलला प्रगट हुए तो उन्हें दोबारा चबूतरे तक लाने में देश- प्रदेश की सत्ता के पसीने छूट गए। तब क्या मुद्दा राजनीतिक नहीं था। लेकिन, धर्म और राजनीति का जो खेल 1984 में शुरू हुआ, वह अलग था। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको आज 1986 का प्रभु रामलला के दर पर लगे ताला खुलने की उस कहानी को सुनती हूं। सुनिए और विचार कीजिए कि क्या बिना राजनीति के इस कार्य को पूरा कराया गया। देश में नई गठित भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक मौके जैसा था। उसने कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व को आधार बनाकर हिंदुत्व की विचारधारा की ऐसी राजनीति की कि अगले 30 सालों में पार्टी ने देश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। 22- 23 दिसंबर की रात बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला के प्रगट होने के बाद विवाद गहरा गया था। फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी परिसर में रामलला और उनके परिजनों की मूर्ति मिलने के बाद वहां ताला लगवाने का आदेश जारी किया। निचली अदालत के आदेश के खिलाफ बार- बार अपील की जाती रही, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी। लेकिन, 1986 में मेरे राम ने अलग ही लीला दिखाई। स्थानीय वकील उमेश चंद्र पांडेय की ओर से एक याचिका दायर की गई। इसमें रामलला का ताला खुलवाने और पूजा की मांग की गई। एक इंटरव्यू में वकील उमेश चंद्र पांडेय ने कहा है कि 1984 में अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद का राम मंदिर निर्माण को लेकर पहला सम्मेलन हुआ। उस समय वकालत के साथ उमेश पत्रकारिता से जुड़े थे। वे भी इसे कवर करने पहुंचे थे।

विश्व हिंदू परिषद के मंच से राम मंदिर को लेकर कई दावे किए गए। इसी क्रम में जस्टिस एसएन काटजू की ओर से कहा गया कि पूजा स्थल पर ताला लगाने का कोई प्रशासनिक आदेश नहीं है। इसके बाद उमेश चंद्र ने रिकॉर्ड खोजना शुरू किया। उन्हें कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिसमें पूजा स्थल पर ताला लगाए जाने का आदेश हो। पूरी पड़ताल करने के बाद 25 जनवरी 1986 को उमेश चंद्र ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में सदर मुंसिफ के सामने ताला खुलवाने की अर्जी दायर की। सदर मुंसिफ ने कोई आदेश जारी नहीं किया। अर्जी पर कहा गया कि इस मामले के सभी दस्तावेज हाई कोर्ट के पास हैं।

28 जनवरी 1986 को सदर मुंसिफ के आदेश पर उमेश चंद्र ने जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट में अपील दायर की। 31 जनवरी 1986 को जिला जज पूरे दिन इस याचिका पर अर्जेंट सुनवाई की। उमेश चंद्र ने कोर्ट से साफ कहा कि उनकी यह अपील प्रशासन के खिलाफ है। वह मुस्लिम पक्ष के खिलाफ नहीं हैं। एक फरवरी को सुनवाई की अगली तारीख दी गई। डीएम इंदु प्रकाश पांडेय और एसपी करमवीर सिंह कोर्ट में तलब किए गए। डीएम और एसपी दोनों ने अदालत में हाजिर हुए। उन्होंने कहा कि हमें ताला खुलने से कोई ऐतराज नहीं है। ताला खुलने से लॉ एंड ऑर्डर को किसी प्रकार का खतरा नहीं होने का दावा किया गया। जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट ने दोनों को सुनने के बाद ताला खोलने का आदेश दे दिया।

जिला जज केएम पांडेय के आदेश का त्वरित पालन कराया गया। आजाद भारत में कोर्ट के आदेश का इस तेजी से पालन का यह पहला मामला था। दरअसल, 1 फरवरी 1986 की शाम 4:40 बजे अदालत का फैसला आया। शाम 5:20 बजे विवादित परिसर का ताला खुल चुका था। दरअसल, अदालत का आदेश जारी होते ही सभी पक्ष बाबरी परिसर पहुंच गया। वहां ताला खोलने की कोशिश शुरू हुई। ताला इतना पुराना था कि खुलना संभव नहीं था। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में ताले को तोड़ दिया गया। इसके बाद से आंगन के अंदर प्रवेश कर पूजा की स्थिति बन गई। विश्व हिंदू परिषद की रथयात्रा भी अयोध्या की सीमा में 1 फरवरी को पहुंच रही थी। ताला खुलवाने को यह रथ यात्रा निकली थी। मकसद पूरा होते ही इस रथ यात्रा को विजय रथ यात्रा का नाम दे दिया गया। तमाम रिपोर्ट्स दावा करती है कि कोर्ट के फैसले के अनुपालन के बाद अयोध्या में कोई हलचल नहीं हुई थी। सबकुछ सामान्य था।

सीनियर पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में इस घटना का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीर बहादुर सिंह से मेरी इस मुद्दे पर उनकी लंबी चर्चा हुई थी। पूर्व सीएम के मुताबिक राजीव गांधी के परामर्श से अरुण नेहरू पूरे मामले का संचालन कर रहे थे। सीएम वीर बहादुर सिंह से कहा गया था कि कोर्ट में सरकार कोई हलफनामा न दे। फैजाबाद के डीएम और एसपी को कोर्ट में हाजिर होकर कहने का आदेश था कि अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई ऐतराज नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट के आदेश के एक सप्ताह के भीतर हाशिम अंसारी ने कोर्ट में ताला खुलवाने के आदेश को चुनौती दी। कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया।

मेरे लिए कोर्ट का यह आदेश खुशियां लाने वाला था। मेरे प्रभु रामलला ताला तोड़कर बाहर निकल आए थे। भक्त अब उनकी पूजा करने का कानूनी अधिकार हासिल कर चुके थे। हालांकि, राजीव गांधी सरकार और यूपी की वीर बहादुर सिंह की सरकार ने जिस तेजी से आदेश का पालन कराया, यह चौंकाने वाला था। इसके पीछे के कारणों पर आज भी बहस होती है। एक वर्ग का दावा है कि विश्व हिंदू परिषद के हिंदुत्व एजेंडे को काटने के लिए यह कदम उठाया गया। 1949 में अयोध्या डीएम के सुझाव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद बल्लभ पंत सरकार ने जिस बाबरी मस्जिद में फेंसिंग करने और श्रद्धालुओं को रामलला के निकट न जाने के लिए पर्याप्त उपाय किए थे।

राजीव गांधी सरकार ने इस मामले में बड़ा निर्णय लिया। राजीव सरकार ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर प्रभु रामलला की पूजा को लेकर काम शुरू कर दिया गया। दरअसल, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सबसे बड़ी जीत मिली। पार्टी 404 सीटों पर लोकसभा चुनाव 1984 के चुनाव में जीती थी। बावजूद इसके कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। हालांकि, वर्ष 1986 की इस घटना को राजनीतिक रूप से राजीव गांधी की सबसे बड़ी भूल के रूप में देखा जामा है। इस निर्णय के बाद देश में कांग्रेस के जनाधार में लगातार गिरावट आई। पार्टी कभी भी इस निर्णय के बाद पूर्ण बहुमत हासिल करने में अब तक सफल नहीं हो पाई।

राजीव गांधी ने वर्ष 1989 में राम मंदिर को लेकर बड़ा निर्णय लिया। यूपी के पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवा दिए थे। इसके बाद हिंदुओं को प्रभु रामलला के दर्शन का मौका मिला। शाहबानो केस में घिरे राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे। हिंदू वर्ग में उनके खिलाफ माहौल बन रहा था। इसके अलावा कई घोटालों के आरोप भी राजीव सरकार पर लगने लगे थे। ऐसे में राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव 1989 के भाषणों में अक्सर देश में रामराज लाने का वादा किया। 1989 प्रयाग कुंभ के बाद विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण पर आंदोलन को तेज किया। परिषद की ओर से 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। इस पर काफी विवाद और खींचतान मची।

रामराज लाने का चुनावी वादा करने वाले राजीव सरकार के सामने कोई ऑप्शन नहीं था। वह हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहते थे। राजीव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को मंदिर के शिलान्यास की इजाजत दे दी। तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को उन्होंने शिलान्यास कार्यक्रम में भेजा। विश्व हिंदू परिषद की ओर से बिहार के रहने वाले कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया। राम मंदिर आंदोलन का यह एक अहम पड़ाव था। कई राजनीतिक विश्लेषक दाव करते हैं कि राजीव पर भगवान राम का असर था। भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर 1989 में राजीव सरकार बनती तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती।

हूतियों के लिए क्यों चुप है भारत?

वर्तमान में भारत हूतियों के लिए चुप्पी साधे हुआ है! साल 2023 खत्‍म होने के करीब था। तभी अरब सागर में भारत के पश्चिमी तट पर मालवाहक जहाज एमसी केम प्लूटो पर ड्रोन हमले ने हलचल बढ़ा दी। इसके बाद भारत ने यहां तीन युद्धपोत तैनात कर दिए। इस बीच लाल सागर में भारतीय झंडा लगे एक दूसरे जहाज एमवी साईं बाबा पर एकतरफा ड्रोन हमला हुआ। अमेरिका ने दावा किया कि दोनों ड्रोन ईरान से दागे गए। दूसरी तरफ ईरान ने इस आरोप को बेबुनियाद बताया। बेशक, भारत ने अब तक यही माना है कि हमलों के अपराधियों की पहचान नहीं हुई है। लेकिन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह यह भी कह चुके हैं कि व्‍यापारी जहाजों पर हमलों को अंजाम देने वालों को पाताल से भी खोजकर निकाल लाया जाएगा। उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। दोनों व्‍यापारी जहाजों पर हुए हमलों ने भारत की तेल सुरक्षा के महत्व को उजागर किया है। लाल सागर उन दो मार्गों में से एक है जो भारत की तेल आपूर्ति को सुनिश्‍चित करता है। दूसरा मार्ग फारस की खाड़ी है। लाल सागर में हूतियों के हमलों और अब फारस की खाड़ी में ड्रोन हमलों ने दुनिया की सबसे व्यस्त शिपिंग लाइन की कमजोरी को खोल दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी मर्स्‍क ने अगली सूचना तक लाल सागर के जरिये सभी कंटेनर शिपमेंट को रोक दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत हिंद महासागर में एक क्षेत्रीय शक्ति है। वह क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता है। इस प्रकार उसे यह सुनिश्चित करना है कि समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रहें। यह सही है कि भारत क्षेत्र में व्यापार के समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने की बात करता है। लेकिन, अपने घोषित उद्देश्य के बावजूद वह लाल सागर में सुरक्षा चुनौतियों का समाधान और नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाली समुद्री सुरक्षा पहल ‘ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्डियन’ में शामिल नहीं हुआ।

इसके दो कारण हैं। एक, लंबे समय से चली आ रही गुटनिरपेक्ष विदेश नीति के रुख को देखते हुए भारत हमेशा किसी भी गठबंधन में शामिल होने से सावधान रहा है। फिर अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन की तो बात ही छोड़ दें। अमेरिका-भारत के बीच रिश्‍ते 2008 से लेकर 2022 तक तेजी से फले-फूले हैं। इस दौर में ऐतिहासिक अमेरिका-भारत नागरिक परमाणु समझौते को अंतिम रूप दिया गया तो दोनों के बीच कई तरह की टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर आपसी सहमति बनी। हालांकि, पिछले कुछ समय में स्थिति थोड़ी बदली है। नवंबर 2023 में भारतीय नागरिक पर अमेरिकी धरती पर एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। इसने आपसी रिश्‍तों में कुछ जटिलताएं पैदा की हैं। तब से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने गणतंत्र दिवस समारोह और क्‍वाड शिखर सम्मेलन 2024 के लिए भारत आने का न्‍योता ठुकराया है। शिखर सम्‍मेलन लगातार दूसरे साल भी संकट में दिख रहा है।

दूसरा कारण ईरान के साथ भारत के अपने रिश्ते हैं। साथ ही अतीत में ईरान के प्रति अमेरिकी पॉलिसी से मिले सबक भी। 2018 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना जेसीपीओए से बाहर निकलने के बाद भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन किया था। ऐसा करते हुए उसने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया था। प्रतिबंध से पहले भारत ने 2 करोड़ 35 लाख टन ईरानी क्रूड ऑयल का आयात किया था। यह उसकी 2018-19 की कुल जरूरत का लगभग दसवां हिस्सा था। यही नहीं, भारत ने इसे काफी आकर्षक शर्तों और छूट पर आयात किया था।

जैसे ही भारत ने ईरानी तेल खरीद में कटौती की चीन ने इसका फायदा उठाया। भारत का रणनीतिक प्रतिस्पर्धी और दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड आयातक चीन ईरान का नंबर-1 ग्राहक बन गया। 2020 और 2023 के बीच अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का चीन को ऑयल शिपमेंट तीन गुना से ज्‍यादा हो गया। जबकि इस सबक ने यह सुनिश्चित किया कि भारत यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों पर पश्चिम को फॉलो नहीं करेगा। लेकिन, मिड‍िल ईस्‍ट में तनाव अब भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को खतरे में डाल रहे हैं। खासकर ईरान के साथ। यही कारण है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ईरान का दौरा कर रहे हैं।

भारत ईरान में अपना निवेश बढ़ा रहा है। चाबहार बंदरगाह उसकी दिलचस्‍पी का एक प्रमुख केंद्र है, जहां सालों की मध्यस्थता के बाद भारत भू-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह में एक टर्मिनल विकसित करने के लिए बहु-वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहता है। यह मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है।

यह दिलचस्‍पी भी एकतरफा नहीं है। ईरान भी भारत के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को पुनर्जीवित करने का इच्छुक है। खासकर तब जब भारत बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ कच्‍चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता बन गया है। ओपेक ने 2024 की पहली तिमाही के लिए तेल पर कटौती पर भी जोर दिया है। इसे देखते हुए भारतीय रिफाइनर अपनी तेल आपूर्ति में और विविधता लाएंगे। इससे नई दिल्ली और तेहरान को आपसी संबंधों को मजबूत करने में बढ़ावा मिलेगा।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की घरेलू राजनीति पर काफी असर पड़ता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से घरेलू ईंधन की लागत बढ़ जाती है। इसका असर बड़े पैमाने पर निम्न-आय वर्ग पर पड़ेगा। यह बदले में 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। इस तरह हमलों में ईरान का हाथ होने के अमेरिकी दावों से भारत का सहमत न होना न सिर्फ क्षेत्र में बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी उसके आर्थिक और रणनीतिक हितों से गहराई से जुड़ा है। इसके अलावा इस मामले पर अपनी विदेश नीति की स्थिति बनाए रखना रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है। यह उन लोगों के लिए भी एक रिमाइंडर है जो दुनिया को द्विध्रुवीय लेंस के जरिये देखते हैं। इस विचार के उलट अब एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभर रही है, जो मूल्यों से ज्‍यादा हितों पर आधारित होगी।

जब लाल कृष्ण आडवाणी लाए राम रथ यात्रा!

एक समय ऐसा था जब लाल कृष्ण आडवाणी राम रथ यात्रा लेकर आए थे! देश में 1989 आते- आते हिंदुत्व की राजनीति ने विस्तार लेना शुरू कर दिया था। विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के मुद्दे को लगातार उठा रही थी। वहीं, भारतीय जनता पार्टी देश की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही थी। राजीव गांधी हिंदुत्व की राजनीति के जरिए देश में भारतीय जनता पार्टी के उभार रोकने की कोशिश में जुटे हुए थे। ऐसे में मेरे प्रभु रामललला देश की राजनीति का एक मुद्दा बन चुके थे। विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को उठाकर हिंदू वर्ग को जगाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, इस मुद्दे से लोगों की भावना जुड़ नहीं पा रही थी। 1985 में रामायण के प्रसारण की योजना और फिर 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश ने हिंदुओं के भीतर राम मंदिर मुद्दे की चर्चा शुरू की। 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति देकर राजीव गांधी सरकार ने इस मुद्दे से हिंदू वर्ग को जोड़ दिया। हालांकि, 1984 के चुनाव में रिकॉर्ड जीत करने वाले राजीव गांधी वर्ष 1989 आते- आते अलोकप्रिय हो गए थे। उन पर बोफोर्स घोटाले का दाग लग चुका था। उनके मंत्रिमंडल सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह उनके खिलाफ खड़े हो चुके थे। ऐसे में कांग्रेस हिंदुत्व के मध्यमार्ग को अपनाने की कोशिश करती दिखी। यहीं पर भाजपा को राह दिखी। पार्टी ने राम मंदिर को हिंदुओं का हक बताना शुरू किया। फिर, भाजपा ने इस मुद्दे को ऐसा पकड़ा, जिसने उसे देश की राजनीति में स्थापित कर दिया। सोमनाथ से दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या राम मंदिर निर्माण के रथ पर सवार हुए तो इसके सारथी की भूमिका नरेंद्र मोदी को दी गई। अगले ढाई दशक बाद 2014 में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। मोदी सारथी से देश के प्रधानमंत्री बने। मैं अयोध्या हूं। आज मैं अपने प्रभु रामलला के आंदोलन के इस महत्वपूर्ण मोड़ की कहानी सुनाती हूं। मैंने राम मंदिर के विध्वंस के बाद से पांच शताब्दियां देखी। कई राजाओं के शासन देखे। अंग्रेजों की गुलामी को झेला। आजाद भारत की सरकारों के बदलते रंग देखे। लेकिन, मेरे प्रभु रामलला के मंदिर को लेकर अगर सबसे महत्वपूर्ण काल को पूछें तो वह वर्ष 1989 था। मंदिर की मांग को लेकर लगातार मांगें सदियों से चल रही थी। लेकिन, भावनाओं को आकार 1989 में ही मिला। हिंदुओं की भावनाओं को जागृत होती देख विश्व हिंदू परिषद ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया। राजीव गांधी लोकसभा चुनाव में जा रहे थे। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की उस मांग को मान लिया, जिस पर कोई सुनवाई पिछली पांच शताब्दियों से नहीं हो पा रही थी। प्रयाग कुंभ 1989 में हिंदू संतों ने एक मत से राम मंदिर के निर्माण और शिलान्यास का प्रस्ताव पास किया। 9 नवंबर 1989 को शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की गई। इसी माह में लोकसभा चुनाव होने थे। राजीव गांधी सरकार ने पहले इस कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की।

विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को मनाने की कोशिश की गई। लेकिन, वीएचपी इस निर्णय से पीछे हटने को तैयार नहीं थी। वीएचपी की ओर से कहा गया कि रामलला पांच शताब्दियों से बिना मंदिर के रह रहे हैं। अब हिंदू अपने आराध्य का मंदिर चाहते हैं। वीएचपी ने चुनावी रैलियों में रामराज लाने का वादा करने वाले राजीव गांधी को घेरना शुरू किया। इसके बाद राजीव गांधी के सामने विकल्प नहीं बचा। उन्हें हिंदू वोट बैंक छिटकता दिखा। उन्होंने बाबरी परिसर में राम मंदिर के निर्माण के शिलान्यास कार्यक्रम की इजाजत दे दी। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह इस कार्यक्रम में पहुंचे। मेरे प्रभु रामलला के मंदिर की नींव वीएचपी कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल ने रखी। उस दिन इतना तो तय हो गया कि अब मेरे प्रभु रामलला का मंदिर यहां बनना तय है। वक्त बदलना था।

राम मंदिर का शिलान्यास होने के बाद देश में आम चुनावों की वोटिंग हुई। 22 और 26 नवंबर 1989 को हुई वोटिंग में देश ने एक अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर दी। इस चुनाव में कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन राजीव गांधी लोकसभा में बहुमत के आंकड़े से पिछड़ गए। दरअसल, बोफोर्स घोटाला और पंजाब में बढ़ते आतंकवाद की वजह से राजीव गांधी सरकार की खूब आलोचना हो रही थी। राजीव सरकार में विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त और रक्षा मंत्री थे। वही राजीव गांधी के सबसे बड़े आलोचक हो गए। जनता दल का दामन था। इस चुनाव को भले ही राजीव और कांग्रेस विरोध के नाम पर लड़ा गया, लेकिन भाजपा की नजर राम मंदिर मुद्दे पर मुखर रुख अपनाए जाने के परिणाम पर थी। 1980 में गठित हुई भाजपा जब 1984 के चुनाव में पहली बार उतरी तो पार्टी के घोषणापत्र में राम मंदिर नहीं था। लेकिन, 1986 में राम मंदिर का ताला खुलने और राजीव गांधी के राम मंदिर को लेकर लिए गए निर्णयों को भाजपा ने भांपा। खुलकर मंदिर आंदोलन के पक्ष में आ गई। 1989 के चुनाव में भाजपा ने खुलकर अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनवाने की वकालत की।

बहरहाल, लोकसभा के चुनाव हुए। 1984 के चुनाव में 404 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाने वाली कांग्रेस महज 197 सीटों पर सिमट गई। दरअसल, इस चुनाव में 531 सीटों पर पहले वोटिंग हुई थी। जनता दल 143 सीटों पर जीत करने में सफल रही। कांग्रेस 39.53 फीसदी वोट शेयर के साथ देश की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। वहीं, 17.97 फीसदी वोट शेयर हासिल कर जनता दल दूसरे स्थान पर थी। लेकिन, इस चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को बदल कर रख दिया।

केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। यह एक अनोखी सरकार थी। इस सरकार को भाजपा ने भी समर्थन दिया था और कम्युनिस्ट पार्टी ने भी। हालांकि, पर्दे के पीछे से कांग्रेस का खेल जारी था। जनता दल में सेंधमारी की कोशिश चल रही थी। भाजपा जानती थी कि यह बेमेल गठबंधन अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी ने वर्ष 1990 में रथ यात्रा का ऐलान कर दिया। सोमनाथ से 25 सितंबर 1990 को रथ यात्रा निकालने की तैयारी शुरू हुई। भाजपा तब सरकार का हिस्सा थी। पीएम वीपी सिंह इस रथ यात्रा के आयोजन को होने नहीं देना चाहते थे। आडवाणी की रथ यात्रा के तात्कालिक कारणों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि उस समय तक विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के मुद्दे को गरमा दिया था।

राम मंदिर को लेकर लोगों में एक प्रकार से भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। विश्व हिंदू परिषद की ओर से 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कारसेवा की घोषणा कर दी गई थी। विश्व हिंदू परिषद का दावा था कि इस कारसेवा में 40 हजार लोग पहुंचेंगे। गुजरात के सोमनाथ से निकलने वाली आडवाणी की रथ यात्रा विभिन्न राज्यों से होते हुए 30 अक्टूबर के दिन ही अयोध्या पहुंचनी थी। भाजपा की मांग अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत कराने की थी। विश्व हिंदू परिषद की कारसेवा का उद्देश्य यही था।

लालू यादव ने इसके बाद आडवाणी के रथ को सासाराम में रोकने की योजना बनाई। यहां भी अधिकारियों ने इस योजना को लीक कर दिया। लालू दो बार अपने अभियान में फेल हो चुके थे। ऐसे में एक फुलप्रूफ प्लान तैयार किया गया। पटना में बैठे लालू ने समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कराने की योजना बनाई। इस प्लान में कोई गड़बड़ी नहीं हो, इसके लिए उन्होंने अपने स्तर पर पूरी योजना तैयार की। दिन था 23 अक्टूबर। आडवाणी का रथ समस्तीपुर पहुंचा तो इसका भव्य स्वागत किया गया। देर रात तक समस्तीपुर सर्किट हाउस में रथी आडवाणी से मिलने वालों का तांता लगा रहा। लालू की प्लानिंग आडवाणी को रात में गिरफ्तार कराने की थी, ताकि कानून व्यवस्था प्रभावित न हो। लालू ने अधिकारियों को निर्देश दे रखे थे, लेकिन इंतजार करने का भी निर्देश दिया था। सिग्नल लालू की तरफ से आना था।

23 अक्टूबर रात 2 बजे समस्तीपुर सर्किट हाउस का फोन बजा। सर्किट हाउस में आडवाणी के सहयोगी ने फोन उठाया। फोन पर एक पत्रकार ने लालकृष्ण आडवाणी के बारे में जानकारी मांगी। सहयोगी ने कहा कि आडवाणी जी सो रहे हैं। पत्रकार ने सवालिया लहजे में पूछा, वहां सब ठीक तो है? कितने लोग हैं? इस पर उस सहयोगी ने कहा कि सभी लोग जा चुके हैं। आडवाणी जी अभी अकेले विश्राम कर रहे हैं। यह लालू यादव थे, जो पत्रकार बनकर सर्किट हाउस का भेद पता कर रहे थे। लालू को जैसे ही सर्किट हाउस की स्थिति की जानकारी मिली, उन्हें आभास हो गया कि लाइन क्लीयर है। इसके बाद अधिकारियों को सिग्नल गया और आडवाणी गिरफ्तार कर लिए गए।

लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बवाल मच गया। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रुक चुकी थी। भारतीय जनता पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा का विषय माना। 23 अक्टूबर 1990 को ही भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इस ऐलान के बाद वीपी सरकार पर संकट के बादल गहरा दिए। वहीं, भाजपा समर्थकों का आक्रोश चरम पर था। राम मंदिर का मुद्दा चिंगारी से आग बन चुकी थी। विश्व हिंदू परिषद के कारसेवा का ऐलान पहले से था। उसे किसी भी स्थिति में नहीं रुकने देने के दावे किए जा रहे थे। बिहार में लालू यादव के कारनामे के बाद जनता पार्टी में उनका कद बड़ा हो गया था। मुलायम सिंह यादव ने भी तब ऐलान कर दिया कि अयोध्या में 30 नवंबर 1990 को प्रस्तावित कार सेवा नहीं होने दी जाएगी। अयोध्या में सुरक्षा ऐसी होगी कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा हर हाल में कारसेवा को लेकर तैयार बैठी हुई थी। अब संग्राम तय था।

आखिर मिलिंद देवड़ा ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?

हाल ही में कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ दी है! राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से पहले कांग्रेस का एक बड़ा युवा चेहरे ने पार्टी छोड़ दी है। ऐसी अटकलें हैं कि पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा कांग्रेस का दामन छोड़कर एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, कुछ दिन पहले ही देवड़ा ने ऐसी अटकलों को खारिज करते हुए कहा था कि वह कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। उन्हें लेकर पहले भी पिछले कुछ साल से जब-तब इस तरह की अटकलें लगती रही हैं। लेकिन इस बार उनकी नाराजगी की वजह मुंबई साउथ लोकसभा सीट पर शिव सेना उद्धव बाल ठाकरे की दावेदारी है। देवड़ा इस सीट को अपनी पारंपरिक सीट मानते हैं और यहां से खुलकर अपनी दावेदारी की है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा अगले हफ्ते से मणिपुर से शुरू होने जा रही है जो 20 मार्च को मुंबई में ही खत्म होगी। इस दौरान अगर देवड़ा पार्टी छोड़ते हैं तो ये कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी के लिए भी बड़ा झटका साबित होगा। देवड़ा को गांधी का करीबी माना जाता है। मिलिंद देवड़ा मुंबई साउथ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन इस सीट पर कांग्रेस के सहयोगी उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली शिवसेना यूबीटी ने भी दावा ठोक दिया है। महाराष्ट्र में कांग्रेस की एनसीपी और शिवसेना यूबीटी के साथ गठबंधन है। तीनों विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. में भी शामिल हैं। विपक्षी गठबंधन में अभी सीट बंटवारे पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। इसे लेकर बातचीत ही चल रही है कि किस राज्य में कौन सी पार्टी कितने सीटों पर लड़ेगी और किन-किन सीटों पर लड़ेगी। लेकिन देवड़ा की परेशानी ये है कि उद्धव ठाकरे ने हाल ही में मुंबई साउथ के गिरगांव में हुई अपनी रैली में सार्वजनिक तौर पर इस सीट पर अपनी पार्टी का दावा ठोक दिया। इस सीट से शिवसेना यूबीटी के अरविंद सावंत पिछले दो चुनाव से लगातार जीत रहे हैं। दिल्ली में हाल में हुई कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना यूबीटी की मीटिंग में भी इस सीट को लेकर चर्चा हुई थी। माना जा रहा है कि मुंबई साउथ सीट शिवसेना यूबीटी के खाते में जा सकती है।

उद्धव ठाकरे की दावेदारी के बाद मिलिंद देवड़ा ने भी बीते रविवार को मुंबई साउथ लोकसभा सीट पर अपना दावा ठोका था। उन्होंने कहा था कि उनके परिवार ने पिछले 50 वर्षों से इस क्षेत्र की सेवा की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर दो मिनट का एक वीडियो स्टेटमेंट भी जारी किया था। चूंकि सीट शेयरिंग फॉर्म्युले के तहत मुंबई साउथ सीट शिवसेना यूबीटी के खाते में जा सकती है, इसलिए देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की अटकलों को बल मिला है। माना जा रहा है कि वह एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो सकते हैं और मुंबई साउथ सीट से विपक्षी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार को चुनौती दे सकते हैं। बता दें कि वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर मिलिंद देवड़ा ने लिखा कि ‘आज वह अपनी राजनीतिक यात्रा के अहम अध्याय का अंत कर रहे हैं। मैंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही कांग्रेस पार्टी से अपने परिवार के 55 साल पुराने रिश्ते का भी अंत कर रहा हूं। मैं सभी नेताओं, सहयोगियों और पार्टी कार्यकर्ताओं का उनके इतने सालों के समर्थन के लिए शुक्रगुजार हूं।’ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि मिलिंद देवड़ा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में देवड़ा के शिवसेना के टिकट पर दक्षिण मुंबई सीट से चुनाव लड़ने की भी चर्चाएं हैं। 

गौरतलब है कि मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की अटकलें बीते कई दिनों से चल रहीं थी। हालांकि उन्होंने इसे अफवाह बताकर कांग्रेस छोड़ने की बात से इनकार किया था। मिलिंद देवड़ा ने ये बात स्वीकार की थी कि वह अपने समर्थकों से चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। मिलिंद देवड़ा मुंबई की दक्षिण मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार गठबंधन के तहत शिवसेना यूबीटी दक्षिण मुंबई सीट पर अपनी दावेदारी कर रही है। ऐसे में देवड़ा को अपना टिकट कटने की आशंका थी।

दक्षिण मुंबई सीट पर देवड़ा परिवार का दबदबा रहा है। हालांकि पिछले दो आम चुनाव में शिवसेना के अरविंद सावंत इस सीट से जीत दर्ज कर रहे हैं। यही वजह है कि इस बार भी शिवसेना इस सीट पर अपना दावा जता सकती है और गठबंधन के चलते हो सकता है कि कांग्रेस को यह सीट छोड़नी पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि इसी के चलते देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया है।

क्या मल्लिकार्जुन खड़गे बने गठबंधन के संयोजक!

मल्लिकार्जुन खड़गे विपक्ष के गठबंधन के संयोजक बन चुके हैं! विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. इंडियन नैशनल डिवेलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन का चेयरपर्सन चुना है। ये फैसला शनिवार को गठबंधन की हुई वर्चुअल बैठक में लिया गया गया। इंडिया ब्लॉक की इस पांचवीं मीटिंग में 10 पार्टियों के नेता शामिल हुए। इसमें शामिल सभी दलों ने खरगे को इंडिया ब्लॉक का चीफ बनाए जाने पर सहमति दे दी है। हालांकि, इसका औपचारिक ऐलान गठबंधन के बाकी नेताओं से चर्चा के बाद किया जाएगा। शनिवार को हुई वर्चुअल मीटिंग में न तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल हुई थीं और न ही उनकी पार्टी टीएमसी से कोई और प्रतिनिधि शामिल हुआ। इसी तरह समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवसेना यूबीटी के प्रमुख उद्धव ठाकरे भी शामिल नहीं हुए। बैठक से पहले ये अटकलें थीं कि इसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाए जाने का फैसला हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आखिर खरगे को इंडिया गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने का मतलब क्या है? मल्लिकार्जुन खरगे को इंडिया ब्लॉक का चीफ बनाने का कहीं ये मतलब तो नहीं कि वह विपक्ष की तरफ से लोकसभा चुनाव में पीएम पद के उम्मीदवार होंगे? वैसे भी पिछली मीटिंग में अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने खरगे को गठबंधन की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि दलित समुदाय से आने वाले खरगे को पीएम फेस बनाने से चुनाव में विपक्ष को फायदा होगा। तो क्या खरगे को विपक्ष की तरफ से पीएम पद का उम्मीदवार माना जा सकता है? इसका जवाब है- नहीं। गठबंधन का चेयरपर्सन होना अलग बात है, पीएम पद के लिए दावेदार होना अलग। यूपीए के दौरान सोनिया गांधी गठबंधन की चेयरपर्सन थीं लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। इसलिए गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने को पीएम पद की उम्मीदवारी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

इंडिया ब्लॉक का संयोजक या मुखिया कौन होगा, ये तय करना एक बड़ी चुनौती थी। विपक्ष इस बड़ी चुनौती से पार पा लिया है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो सीट शेयरिंग की है। लोकसभा चुनाव में बमुश्किल 3-4 महीने बचे हैं लेकिन विपक्षी गठबंधन अबतक यही नहीं तय कर पाया है कि किस राज्य में कौन सी पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी। अभी यह तय हो जाए तो आगे ये तय करना भी चुनौती होगी कि किन-किन सीटों पर कौन पार्टी लड़ेगी। हालांकि, इसे लेकर बातचीत चल रही है। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभाव है इसलिए वह सीट शेयरिंग को लेकर क्षेत्रीय दलों के साथ अलग-अलग बैठकें कर रही है। शनिवार की बैठक में नीतीश कुमार ने भी सीट शेयरिंग को सबसे बड़ी चुनौती बताया। ममता बनर्जी के बैठक में शामिल नहीं होने को भी सीट शेयरिंग की जटिलता से जोड़कर देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में सीट शेयरिंग फॉर्म्युला तय करना विपक्ष के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है। ये मामल इतना जटिल है कि अगर इसे सही से हल नहीं किया गया तो चुनाव से पहले हो सकता है कि कुछ पार्टियों की राह गठबंधन से अलग भी हो जाए।

मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन का चेयरपर्सन बनाए जाने के बाद अब गठबंधन का कोई संयोजक भी चुना जाएगा, इसकी संभावना कम है। वैसे चेयरपर्सन और कन्वेनर यानी संयोजक ये दोनों पद एक साथ भी रह सकते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में गठबंधनों पर नजर डालें तो इसकी संभावना बहुत कम है। कांग्रेस की अगुआई में इससे पहले जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) था, उसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी थीं। यूपीए में कोई संयोजक नहीं था। दूसरी तरफ, अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से बीजेपी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में संयोजक का पद रहा है, चेयरपर्सन का नहीं। जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता एनडीए के संयोजक रह चुके हैं। फिलहाल उसमें संयोजक पद खाली है। अब खरगे को चेयरपर्सन बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनाए जाने को लेकर चलने वालीं अटकलों पर विराम लग गया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मीटिंग के दौरान सोनिया गांधी समेत कुछ बड़े नेताओं ने नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने की पेशकश की लेकिन नीतीश ने उसे ठुकरा दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने ही सबसे पहले विपक्षी दलों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया। असल में वही इंडिया गठबंधन के शिल्पकार हैं। इसलिए समय-समय पर उन्हें गठबंधन का संयोजक बनाए जाने की अटकलें लगती रहती थीं। ये भी अटकलें लगती थीं कि इसमें देरी की वजह से नीतीश कुमार नाराज हैं। अब गठबंधन की पांचवीं बैठक से साफ हो गया कि वह संयोजक नहीं बनने वाले तो क्या इससे बिहार के सीएम वाकई नाराज हैं? कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि मीटिंग के दौरान नीतीश कुमार ने ही कहा कि कांग्रेस से ही किसी नेता को गठबंधन का चेयरपर्सन बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी पद में दिलचस्पी नहीं है, वह अपने लिए कोई पद नहीं चाहते हैं। वह सिर्फ ये चाहते हैं कि गठबंधन मजबूत हो। नीतीश कुमार ने कहा कि एकजुटता जरूरी है।

श्री राम प्राण प्रतिष्ठा के लिए VHP ने किस-किस को दिया न्योता?

श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा के लिए VHP ने दिग्गजों को न्योता दे दिया है! राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को अब बमुश्किल 9 दिन ही बचे हैं। 22 जनवरी को अयोध्या नगरी में दीवाली पहले ही आ गई। 22 जनवरी को भगवान राम अपने घर लौट रहे हैं। अयोध्या सहित पूरा भारत जश्न के मूड में आ गया है। इस बीच वीआईपी लोगों को निमंत्रण देने का क्रम जारी है। इसी कड़ी में शनिवार को विश्व हिंदू परिषद ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, एक्टर अरुण गोविल को न्योता भेजा गया है! विश्व हिंदू परिषद ने अमित शाह, जेपी नड्डा और राजनाथ सिंह को आज राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण भेजा है। वीएचपी ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा, भारत के रक्षा मंत्री व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री राजनाथ सिंह और भारत के गृह मंत्री एवं जिनका राम मंदिर की वर्तमान स्थिति लाने में महत्वपूर्ण योगदान है श्री अमित शाह को 22 जनवरी को श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण सौंपा। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी ने निमंत्रण स्वीकार किया और कहा कि वह आएंगे। श्री अमित शाह और श्री राजनाथ सिंह ने मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से चर्चा करके आने व दर्शन करने की तिथि शीघ्र तय करेंगे। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे।

देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी राम मंदिर का निमंत्रण मिला है। वीएचपी ने बताया कि भारत की महामहिम राष्ट्रपति आदरणीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी को 22 जनवरी को श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण सौंपा। उन्होंने इस पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि अयोध्या आने व दर्शन करने का शीघ्र समय तय करेंगी। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री राम लाल, विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे। विश्व हिंदू परिषद ने इसके अलावा 14 जनवरी को मास्टर-ब्लास्टर के नाम से मशहूर और पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर को भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का न्योता दिया है। कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली के बाद सचिन तीसरे क्रिकेटर हैं जिन्हें राम मंदिर का न्योता दिया गया है। रोहित और कोहली के भी शामिल होने की उम्मीद है।

राम के किरदार से हर भारतवासी के दिल में बसने वाले एक्टर अरुण गोविल को भी राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिला है। इस अवसर पर अरुण गोविल ने कहा कि मुझे बड़ी खुशी है कि मुझे राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिला, और मैं इस कार्यक्रम को देखने के लिए अयोध्या जाने को बहुत उत्साहित हूं। अरुण गोविल ने रामानंद सागर की रामायण में भगवान राम का किरदार निभाया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चीफ मोहन भागवत को भी इससे दो दिन पहले राम मंदिर कार्यक्रम का न्योता मिल चुका है। विश्व हिंदू परिषद ने विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार और अयोध्या राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने दिल्ली में यह निमंत्रण सौंपा। भागवत को दिल्ली में निमंत्रण मिला है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर और वरिष्ठ नेताओं में से एक लालकृष्ण आडवाणी 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होंगे। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने इसकी पुष्टि कर दी है। अमित शाह और श्री राजनाथ सिंह ने मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया तथा कहा कि वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र से चर्चा करके आने व दर्शन करने की तिथि शीघ्र तय करेंगे। पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर को भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का न्योता दिया है। कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली के बाद सचिन तीसरे क्रिकेटर हैं जिन्हें राम मंदिर का न्योता दिया गया है। रोहित और कोहली के भी शामिल होने की उम्मीद है।इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार व मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष श्री नृपेंद्र मिश्रा उपस्थित रहे।हालांकि आलोक कुमार ने यह भी बताया कि ज्यादा उम्र होने की वजह से आडवाणी मंदिर से जुड़े सभी कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाएंगे लेकिन 22 जनवरी को वह उपस्थित रहेंगे। उनके स्वास्थ्य को देखते हुए वहां हर तरह की व्यवस्था कर दी गई है।

आखिर नीतीश कुमार क्यों नहीं बन पाए विपक्ष के INDIA गठबंधन के संयोजक?

हाल ही में नीतीश कुमार विपक्ष के INDIA गठबंधन के संयोजक नहीं बन पाए! बिहार के सीएम और जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने I.N.D.I.A गठबंधन का संयोजक बनने से इनकार कर दिया है। नीतीश ने शनिवार को विपक्षी गठबंधन की वर्चुअल बैठक में साफ कर दिया कि उनकी किसी पद में कोई दिलचस्पी नहीं है। जदयू की ओर से बैठक में नीतीश के अलावा ललन सिंह और प्रदेश के मंत्री संजय झा शामिल हुए थे। कांग्रेस ने नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस पर बिहार के सीएम ने कह दिया कि कांग्रेस को ही ब्‍लॉक का चेयरमैन बनना चाहिए। फिर कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को विपक्षी गठबंधन का चीफ बनाने पर मुहर लग गई।इसी तरह की स्थिति कई दूसरे राज्‍यों में भी है। कहीं नीतीश को यह एहसास तो नहीं होने लगा है कि इन्‍हें साथ लाने में ही बहुत वक्‍त निकल जाएगा। साथ आने के बाद भी बीजेपी को इन दलों से कितनी टक्‍कर मिल पाएगी, यह भी कह पाना मुश्किल है। नीतीश के फैसले के बाद अब हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है। आखिर नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से क्‍यों मना कर दिया? आइए, यहां समझने की कोशिश करते हैं कि यह फैसला लेते हुए उनके मन में क्‍या बातें हो सकती हैं। नीतीश कुमार राजनीति के पुराने घाघ हैं। अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता। नीतीश पाला बदलने के लिए भी जाने जाते हैं। नीतीश ने संयोजक का पद ठुकराकर लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में जाने का विकल्‍प खुला रखा है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो यह ऑप्‍शन उनके लिए बंद हो जाता। फिर उन पर पूरे गठबंधन को साथ लेकर चलने की मजबूरी बन जाती। अब गठबंधन से जुड़े रहने की मजबूरी से वह मुक्‍त हो गए हैं।

शुरू से ही विपक्षी गठबंधन के भविष्‍य को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस गठबंधन में ऐसे तमाम दल हैं जो आपस में कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। वैचारिक रूप से भी ये हमेशा अलग रहे हैं। बंगाल का ही उदाहरण लेते हैं। राज्‍य में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों में हमेशा ठनी रही है। इनका आपस में कोई गठजोड़ होना ही टेढ़ी खीर है। इसी तरह की स्थिति कई दूसरे राज्‍यों में भी है। कहीं नीतीश को यह एहसास तो नहीं होने लगा है कि इन्‍हें साथ लाने में ही बहुत वक्‍त निकल जाएगा। साथ आने के बाद भी बीजेपी को इन दलों से कितनी टक्‍कर मिल पाएगी, यह भी कह पाना मुश्किल है।

बेशक, I.N.D.I.A ब्‍लॉक की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए किसी चेहरे का ऐलान नहीं हुआ है। लेकिन, नीतीश कुमार का नाम हमेशा इससे जोड़कर देखा जाता है। उनकी पार्टी के कई नेता बार-बार उन्‍हें पीएम के चेहरे के तौर पर पेश करते रहे हैं। कन्‍वीनर के पद को ठुकराकर वह कहीं यह संकेत तो नहीं दे रहे कि अब प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश करने से कम कुछ भी काम नहीं करने वाला है। संयोजक पद को ठुकराने के फैसले को तमाम नीतीश कुमार की ओर से अपने अपमान के जवाब के तौर पर भी देख रहे हैं। उन्‍हें लगता है कि नीतीश I.N.D.I.A गठबंधन के सहयोगियों के व्यवहार से दुखी थे। इससे पहले हुई बैठक में ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने विपक्ष की ओर से पीएम पद के लिए मल्लिकार्जुन खरगे के नाम का प्रस्‍ताव किया था।अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता। नीतीश पाला बदलने के लिए भी जाने जाते हैं। नीतीश ने संयोजक का पद ठुकराकर लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में जाने का विकल्‍प खुला रखा है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो यह ऑप्‍शन उनके लिए बंद हो जाता। नीतीश के फैसले के बाद अब हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है। आखिर नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से क्‍यों मना कर दिया? आइए, यहां समझने की कोशिश करते हैं कि यह फैसला लेते हुए उनके मन में क्‍या बातें हो सकती हैं। नीतीश कुमार राजनीति के पुराने घाघ हैं। अपने कदमों से वह बड़े-बड़ों को कन्‍फ्यूज कर देते हैं। वह कब क्‍या कदम उठा जाएं कोई नहीं जानता।फिर उन पर पूरे गठबंधन को साथ लेकर चलने की मजबूरी बन जाती। अब गठबंधन से जुड़े रहने की मजबूरी से वह मुक्‍त हो गए हैं। यह और बात है कि इसे लेकर कोई सहमति नहीं बनी थी। हालांकि, इसे लेकर जदयू के नेताओं की ओर से आक्रामक प्रतिक्रियाएं आई थीं।

भारत चीन सीमा विवाद पर क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में भारत चीन सीमा विवाद पर विदेश मंत्री ने बयान दिया है! विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने बेबाक बोल के लिए जाने जाते हैं। हाजिरजवाबी में उनका कोई सानी नहीं है। देशी हो या विदेशी मंच, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उनके जवाब सुनने लायक होते हैं। इसी कड़ी में विदेश मंत्री जयशंकर आज नागपुर के टाउन हॉल में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनसे चीन के साथ चल रहे मसले और दुनिया में भारत की ताकत से संबंधित सवाल पूछा गया। जयशंकर ने दोनों का ही बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया। चीन के साथ रिश्तों पर जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि सीमा पर तनाव का हल निकलने तक भारत-चीन के रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। दुनिया में भारत की बढ़ती धाक पर कहा कि दुनिया का कोई बड़ा मसला ऐसा नहीं है, जिस पर फैसला लेने से पहले भारत से राय-मशविरा न किया जाए। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया में बढ़ती भारत की धमक से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कहा कि अब दुनिया का कोई बड़ा मसला तय नहीं होता, जिसमें नई दिल्ली से सलाह-मशविरा न हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत बदल चुका है और दुनिया इसे पहले की तरह नहीं देखती। जयशंकर ने आगे कहा कि भारत का स्वभाव ‘स्वतंत्र’ रहने का है। इसी वजह से हमें अलग-अलग लोगों के साथ अपने हितों को साधना होता है, न कि किसी और के अधीन बनना होता है। जयशंकर ने आगे कहा कि भारत का कद लगातार बढ़ रहा है और आज दुनिया उसे पहले की तरह नहीं देखती। उन्होंने कहा, ‘आज कई देश हमारी ताकत और प्रभाव को देखते हैं। हम 10 साल पहले दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे, अब हम पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और कुछ ही सालों में हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। हम बदल गए हैं और दुनिया का नजरिया भी हमारे बारे में बदल गया है।’

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘अमृत काल’ की बात करते हैं, तो समझिए ये 10 साल नींव का काम करेंगे। इन्हीं 10 सालों पर अगले 25 सालों की इमारत खड़ी होगी। उनसे पूछा गया कि भारत कैसे अलग-अलग संगठनों का हिस्सा बनकर काम करती है जैसे क्वाड और ब्रिक्स में जो परस्पर विरोधी हितों वाले देशों के समूह हैं? इस सवाल पर विदेश मंत्री ने कहा कि भारत स्वतंत्र है और उसे अलग-अलग लोगों के साथ तालमेल बिठाकर अपने हितों को साधने का तरीका सीखना होगा। जयशंकर ने आगे कहा कि हम कम से कम 5000 साल पुरानी सभ्यता हैं, दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश, दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। हमारा स्वभाव आजाद रहने का है। हम किसी और के अधीन या उनकी कंपनी का हिस्सा नहीं बन सकते, न ही बनना चाहिए। क्योंकि हम स्वतंत्र हैं, हमें अलग-अलग लोगों के साथ संबंध बनाकर अपने हितों की रक्षा करनी सीखनी होगी।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन को दो टूक शब्दों में क्लियर मैसेज दे दिया। नागपुर के कार्यक्रम में जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि बॉर्डर पर तनाव का हल निकलने तक भारत-चीन के रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। जयशंकर ने याद दिलाया कि 2020 में चीन ने सीमा समझौते का उल्लंघन करते हुए लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर सैनिकों की तैनाती बढ़ाई थी। इस वजह से सीमा पर अब भी तनाव बना हुआ है। जयशंकर ने कहा कि मैंने अपने चीनी समकक्ष को साफ कह दिया है कि सीमा पर हल निकलने तक रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। अगर सीमा पर तनाव बना रहेगा, तो आप उम्मीद न करें कि बाकी रिश्ते भी अच्छे रहेंगे। यह सोचना गलत है कि आप लड़ाई करेंगे और साथ ही हमारे साथ व्यापार भी करेंगे। ऐसा नहीं हो सकता।

जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत और चीन के बीच तनावपूर्ण संबंध दोनों देशों के बीच के महत्वपूर्ण रिश्ते को प्रभावित करेंगे, तो उन्होंने समझाया कि 1962 के युद्ध के बाद से ही दोनों देशों के बीच कुछ समझौते हुए हैं। हालांकि, चीन ने उन समझौतों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ सालों में भारत और चीन के बीच संबंध अच्छे या आसान नहीं रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे पास उनके साथ कुछ लिखित समझौते थे, जिनका उन्होंने उल्लंघन किया है।’ जयशंकर ने भारत-चीन संबंधों के इतिहास पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए थे। इतने तनावपूर्ण कि हमें चीन में अपना राजदूत भेजने में 14 साल लग गए। उन्होंने आगे कहा, ‘युद्ध 1962 में हुआ था और हमें वहां राजदूत भेजने में 14 साल लग गए। और फिर 26 साल बाद पहली बार हमारे प्रधान मंत्री राजीव गांधी चीन गए थे।’

विदेश मंत्री ने कहा कि 2020 में चीन ने समझौते का उल्लंघन किया और एलएसी पर सैनिकों को लाया। जयशंकर ने आगे कहा कि 2020 में, उन्होंने समझौते के बावजूद इसका उल्लंघन किया। उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बड़ी मात्रा में सैनिकों को तैनात किया । कोविड के दौरान भी, हमने वहां एक बड़ी सेना तैनात की और अपनी सेना को स्थानांतरित कर दिया और तब से, दोनों पक्षों की सेनाएं एक-दूसरे के खिलाफ हैं। इस बात पर जोर देते हुए कि भारत ने इसकी शुरुआत नहीं की। जयशंकर ने कहा कि अगर वे अपने सैनिकों को हमारे सामने लाते हैं, तो हमें उनका मुकाबला करना होगा।

आखिर शुरू हो ही गई राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा?

राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू हो चुकी है! लोकसभा चुनाव की हलचल के बीच कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में मणिपुर की राजधानी इंफाल से ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू करने जा रही है। यह यात्रा इंफाल के निकट थोबल से शुरू होगी और मार्च के तीसरे सप्ताह यानी 20 मार्च को मुंबई में इसका समापन होगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे। ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा ‘ शुरू करने से पहले राहुल गांधी थोबल में खोंगजोम युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे। यह एक ऐतिहासिक स्मारक है, जिसका उद्घाटन 2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया था। यात्रा के दौरान राहुल गांधी हर दिन दो सभाओं को संबोधित करेंगे। इसके अलावा, वह हर दिन समाज के विभिन्न वर्गों के 20 से 25 लोगों से मिलेंगे। वह सामाजिक संगठनों के सदस्यों के साथ भी बातचीत करेंगे। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि अगले 11 दिनों के दौरान यात्रा पूर्वोत्तर के पांच राज्यों से होकर गुजरेगी। 23 जनवरी को राहुल गांधी घोषणापत्र के सिलसिले में गुवाहाटी में लोगों से जनसंवाद करेंगे। कांग्रेस ने इस यात्रा के लिए विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के अपने सहयोगी दलों के नेताओं को भी आमंत्रित किया है और उसे उम्मीद है कि विभिन्न राज्यों में इस गठबंधन से जुड़े दलों के प्रमुख नेता यात्रा का हिस्सा बनेंगे। रमेश ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शनिवार को ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के नेताओं को यात्रा में भाग लेने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया।

कांग्रेस का कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले निकाली जा रही यह यात्रा 67 दिन में 15 राज्यों और 110 जिलों से होकर गुजरेगी।‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान लगभग 6,700 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी। यात्रा ज्यादातर बस से होगी, लेकिन कहीं-कहीं पदयात्रा भी होगी। ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सात सितंबर 2022 से 30 जनवरी 2023 तक कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाली थी। उनकी 136 दिन की इस पदयात्रा में 12 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों और 76 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए 4,081 किलोमीटर की दूरी तय की गई थी।

राहुल गांधी की ये यात्रा जिन 15 राज्यों से गुजरेगी, उन राज्यों में लोकसभा की कुल मिलाकर 357 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन को देखें तो इन राज्यों में कांग्रेस की स्थिति बहुत ही खराब है। कितनी खराब इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इन 357 सीटों में पार्टी महज 14 पर ही जीत हासिल कर पाई थी। भारत जोड़ो न्याय यात्रा वाले राज्यों में से 5 तो ऐसे हैं जहां 2019 में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी। ये हैं- मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल, राजस्थान और गुजरात। इतना ही नहीं, सियासी लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे यूपी समेत यात्रा रूट के 7 राज्यों में कांग्रेस पिछली बार महज 1 सीट पर सिमट गई थी। इस यात्रा के जरिए कांग्रेस अपना सियासी वजूद मजबूत करने की कोशिश करेगी।

इस यात्रा को आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में होने की संभावना है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ कोई चुनावी यात्रा नहीं है, बल्कि देश के लिए न्याय की मांग करना है। हालांकि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से एक सप्ताह पहले आरंभ हो रही उसकी इस यात्रा को लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय से जुड़ा विमर्श खड़ा करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया, ‘आजकल प्रधानमंत्री देश को अमृतकाल के सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि पिछले 10 साल अन्याय काल निकले। अन्याय काल की कोई बात नहीं होती, सिर्फ अमृतकाल की बड़ी बड़ी बातें होती हैं।’ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सात सितंबर 2022 से 30 जनवरी 2023 तक कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाली थी। उनकी 136 दिन की इस पदयात्रा में 12 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों और 76 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए 4,081 किलोमीटर की दूरी तय की गई थी। यात्रा रूट के 7 राज्यों में कांग्रेस पिछली बार महज 1 सीट पर सिमट गई थी। इस यात्रा के जरिए कांग्रेस अपना सियासी वजूद मजबूत करने की कोशिश करेगी। कहना है कि यह यात्रा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अन्याय के खिलाफ है। रमेश ने कहा, ‘संविधान की बुनियाद न्याय है, इसलिए ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकाली जा रही है।’

आखिर बिलकिस बानो केस क्यों था महत्वपूर्ण?

वर्तमान में बिलकिस बानो केस को बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है! पिछले हफ्ते मानवाधिकारों से जुड़े सभी लोगों को खुशी हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों में बिलकिस बानो के परिवार के 11 दोषी बलात्कारी-हत्यारों को वापस जेल भेज दिया। इसके साथ ही सजा में छूट देने के लिए गुजरात हाई कोर्ट की खिंचाई की। जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों ने बढ़ती उम्र और ‘अच्छे व्यवहार’ के आधार पर 14 साल की सजा काटने के बाद रिहाई की मांग की थी। क्या जेल में अच्छा व्यवहार 2002 में उनके राक्षसी व्यवहार की भरपाई कर सकता है? गर्भवती बिलकिस बानो उस समय अपने माता-पिता से मिलने जा रही थी। हत्यारों में परिवार के पड़ोसी शामिल थे। बिलकिसस कहती हैं कि उनमें से एक ने मेरी बेटी को मेरी गोद से छीन लिया और उसे जमीन पर पटक दिया। इससे उसका सिर पत्थर से टकरा गया। बिलकिस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उसकी चचेरी बहन, जिसने दो दिन पहले बच्चे को जन्म दिया था, के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। उसके नवजात बच्चे को भी मार दिया गया। हमलावरों ने परिवार के कम से कम 14 सदस्यों की हत्या कर दी। बिलकिस बेहोश हो गई और हमलावरों ने उसे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया। अकेले सिर्फ उसकी ही जान बच गई थी। अपने परिवार के नरसंहार के बाद, बिलकिस पुलिस के पास गई, लेकिन उस समय के सांप्रदायिक माहौल में, उन्होंने उसके परिवार के हत्यारों के पीछे जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में बिलकिस ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा नए सिरे से जांच का आदेश दिया। इससे हत्यारों के अपराध के स्पष्ट सबूत सामने आए। गुजरात न्याय प्रणाली की समस्याओं और बिलकिस को धमकियों के कारण, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में ट्रांसफर कर दिया। साथ ही मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने हत्यारों को दोषी पाया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हममें से कई लोगों ने सराहना की। हत्यारों की शीघ्र रिहाई के लिए कोई भी याचिका महाराष्ट्र हाई कोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी जिसने उन्हें जेल में डाल दिया था। इसके बजाय, दोषियों ने गुजरात की अदालतों का दरवाजा खटखटाया, जिन्हें पहले न्याय देने के लिए अयोग्य माना गया था। व्यापक आक्रोश के कारण, उन अदालतों ने 11 दोषी हत्यारों को रिहा कर दिया। इससे भी बदतर, दोषियों की रिहाई का जश्न मनाया गया। स्थानीय राजनेताओं ने उन्हें माला पहनाई और नायकों की तरह व्यवहार किया। बिलकिस बानो की पीड़ा बहुत अधिक थी।

इस स्तंभकार ने स्वामीनॉमिक्स में ‘जो लोग फांसी के फंदे के लायक हैं उन्हें माला नहीं पहनाई जानी चाहिए’ शीर्षक से लेख लिखा था। इसमें कहा गया था कि भारत में न्याय की गुणवत्ता अप्रत्याशित हो सकती है, और कभी-कभी बुराई की जीत होती है और निर्दोष लोग जेल में बंद हो जाते हैं। लेकिन क्या हम अन्याय से इतने स्तब्ध हो गए हैं कि हम भय महसूस करने की अपनी क्षमता खो रहे हैं? सौभाग्य से, सुप्रीम कोर्ट ने भय महसूस कराने की अपनी क्षमता नहीं खोई है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि गुजरात हाई कोर्ट ने कानून की प्रारंभिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। चूंकि सजा महाराष्ट्र अदालत द्वारा पारित की गई थी, इसलिए किसी भी शीघ्र रिहाई को उसी अदालत में भेजा जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात न्याय प्रणाली के पूर्वाग्रहों की आलोचना पहली बार नहीं की है।

2008 में, गुजरात पुलिस-न्याय प्रणाली में पक्षपात के आरोपों से चिंतित, सुप्रीम कोर्ट ने नौ प्रमुख दंगा मामलों की फिर से जांच करने के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल एसआईटी नियुक्त किया। एसआईटी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बरी कर दिया, जबकि निचले स्तर के अन्य लोगों को अभियोजन के योग्य पाया। इसके बाद हजारों मुकदमे चले। हालांकि, आलोचकों ने कहा कि एसआईटी वास्तव में स्वतंत्र नहीं थी, क्योंकि इसके तत्कालीन प्रमुख आरके राघवन के अलावा, आधे सदस्य गुजरात पुलिस से थे। एसआईटी ने पाया कि गुजरात की एक मंत्री, माया कोडनानी, नरोदा पाटिया में भीड़ को ‘उकसाने’ की दोषी थीं। कोडनानी पर मुकदमा चलाया गया और एक सेशन कोर्ट ने उसे दंगे का ‘सरगना’ कहा था। उसे दोषी पाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि, उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में अपील की, जिसने उन्हें 2018 में बरी कर दिया। पिछले साल अहमदाबाद की विशेष सुनवाई अदालत ने उन्हें दूसरे दंगों के मामले में भी बरी कर दिया था। मामलों में बरी होने के साथ, वह राजनीति में फिर से प्रवेश कर सकती हैं। गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की है।

2002 के दंगों के हर मामले को दूसरे राज्यों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। लेकिन निश्चित रूप से निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सबसे प्रमुख मामलों की सुनवाई राज्य के बाहर की जानी चाहिए, जैसा कि बिलकिस मामले में हुआ। वैकल्पिक तौर पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट ले जाया जाना चाहिए। एक और हाई-प्रोफाइल मामला गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट का है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। इसमें आरोप लगाया गया कि गुजरात पुलिस को 2002 में हिंदू दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए कहा गया था। गुजरात सरकार ने हिरासत में मौत के मामले में पर्यवेक्षी अपराध के 1990 के पुराने मामले के लिए भट्ट को निलंबित कर दिया और मुकदमा चलाया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें गुजरात में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया था। इसे गुजरात हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। भट्ट और कोडनानी दोनों पर अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को देना चाहिए।