Sunday, April 12, 2026
Home Blog Page 804

जब पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खोला राम मंदिर का ताला!

एक ऐसा समय जब पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खोला था! अयोध्या पर आज कहा जा रहा है कि राजनीति हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अयोध्या को राजनीतिक एजेंडे के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन, अयोध्या पर राजनीति कब नहीं हुई? यह कोई दावे के साथ नहीं सकता है। राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के लिए मुगल शासक बाबर ने अपने सिपहसालार मीरबाकी के जरिए मंदिर गिरवाई। मस्जिद बनवाया। वह भी तो एक राजनीतिक प्रपंच ही था। अंग्रेजों ने बांटवारा कर भारतीय समाज को दो भागों में बांटा। लोगों को बांटकर 200 सालों तक राज करते रहे। जाते- जाते देश के दो टुकड़े कर गए। तो क्या उसे राजनीतिक नहीं कहेंगे। 1949 में मस्जिद में जब रामलला प्रगट हुए तो उन्हें दोबारा चबूतरे तक लाने में देश- प्रदेश की सत्ता के पसीने छूट गए। तब क्या मुद्दा राजनीतिक नहीं था। लेकिन, धर्म और राजनीति का जो खेल 1984 में शुरू हुआ, वह अलग था। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको आज 1986 का प्रभु रामलला के दर पर लगे ताला खुलने की उस कहानी को सुनती हूं। सुनिए और विचार कीजिए कि क्या बिना राजनीति के इस कार्य को पूरा कराया गया। देश में नई गठित भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक मौके जैसा था। उसने कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व को आधार बनाकर हिंदुत्व की विचारधारा की ऐसी राजनीति की कि अगले 30 सालों में पार्टी ने देश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। 22- 23 दिसंबर की रात बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला के प्रगट होने के बाद विवाद गहरा गया था। फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी परिसर में रामलला और उनके परिजनों की मूर्ति मिलने के बाद वहां ताला लगवाने का आदेश जारी किया। निचली अदालत के आदेश के खिलाफ बार- बार अपील की जाती रही, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी। लेकिन, 1986 में मेरे राम ने अलग ही लीला दिखाई। स्थानीय वकील उमेश चंद्र पांडेय की ओर से एक याचिका दायर की गई। इसमें रामलला का ताला खुलवाने और पूजा की मांग की गई। एक इंटरव्यू में वकील उमेश चंद्र पांडेय ने कहा है कि 1984 में अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद का राम मंदिर निर्माण को लेकर पहला सम्मेलन हुआ। उस समय वकालत के साथ उमेश पत्रकारिता से जुड़े थे। वे भी इसे कवर करने पहुंचे थे।

विश्व हिंदू परिषद के मंच से राम मंदिर को लेकर कई दावे किए गए। इसी क्रम में जस्टिस एसएन काटजू की ओर से कहा गया कि पूजा स्थल पर ताला लगाने का कोई प्रशासनिक आदेश नहीं है। इसके बाद उमेश चंद्र ने रिकॉर्ड खोजना शुरू किया। उन्हें कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिसमें पूजा स्थल पर ताला लगाए जाने का आदेश हो। पूरी पड़ताल करने के बाद 25 जनवरी 1986 को उमेश चंद्र ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में सदर मुंसिफ के सामने ताला खुलवाने की अर्जी दायर की। सदर मुंसिफ ने कोई आदेश जारी नहीं किया। अर्जी पर कहा गया कि इस मामले के सभी दस्तावेज हाई कोर्ट के पास हैं।

28 जनवरी 1986 को सदर मुंसिफ के आदेश पर उमेश चंद्र ने जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट में अपील दायर की। 31 जनवरी 1986 को जिला जज पूरे दिन इस याचिका पर अर्जेंट सुनवाई की। उमेश चंद्र ने कोर्ट से साफ कहा कि उनकी यह अपील प्रशासन के खिलाफ है। वह मुस्लिम पक्ष के खिलाफ नहीं हैं। एक फरवरी को सुनवाई की अगली तारीख दी गई। डीएम इंदु प्रकाश पांडेय और एसपी करमवीर सिंह कोर्ट में तलब किए गए। डीएम और एसपी दोनों ने अदालत में हाजिर हुए। उन्होंने कहा कि हमें ताला खुलने से कोई ऐतराज नहीं है। ताला खुलने से लॉ एंड ऑर्डर को किसी प्रकार का खतरा नहीं होने का दावा किया गया। जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट ने दोनों को सुनने के बाद ताला खोलने का आदेश दे दिया।

जिला जज केएम पांडेय के आदेश का त्वरित पालन कराया गया। आजाद भारत में कोर्ट के आदेश का इस तेजी से पालन का यह पहला मामला था। दरअसल, 1 फरवरी 1986 की शाम 4:40 बजे अदालत का फैसला आया। शाम 5:20 बजे विवादित परिसर का ताला खुल चुका था। दरअसल, अदालत का आदेश जारी होते ही सभी पक्ष बाबरी परिसर पहुंच गया। वहां ताला खोलने की कोशिश शुरू हुई। ताला इतना पुराना था कि खुलना संभव नहीं था। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में ताले को तोड़ दिया गया। इसके बाद से आंगन के अंदर प्रवेश कर पूजा की स्थिति बन गई। विश्व हिंदू परिषद की रथयात्रा भी अयोध्या की सीमा में 1 फरवरी को पहुंच रही थी। ताला खुलवाने को यह रथ यात्रा निकली थी। मकसद पूरा होते ही इस रथ यात्रा को विजय रथ यात्रा का नाम दे दिया गया। तमाम रिपोर्ट्स दावा करती है कि कोर्ट के फैसले के अनुपालन के बाद अयोध्या में कोई हलचल नहीं हुई थी। सबकुछ सामान्य था।

सीनियर पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में इस घटना का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीर बहादुर सिंह से मेरी इस मुद्दे पर उनकी लंबी चर्चा हुई थी। पूर्व सीएम के मुताबिक राजीव गांधी के परामर्श से अरुण नेहरू पूरे मामले का संचालन कर रहे थे। सीएम वीर बहादुर सिंह से कहा गया था कि कोर्ट में सरकार कोई हलफनामा न दे। फैजाबाद के डीएम और एसपी को कोर्ट में हाजिर होकर कहने का आदेश था कि अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई ऐतराज नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट के आदेश के एक सप्ताह के भीतर हाशिम अंसारी ने कोर्ट में ताला खुलवाने के आदेश को चुनौती दी। कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया।

मेरे लिए कोर्ट का यह आदेश खुशियां लाने वाला था। मेरे प्रभु रामलला ताला तोड़कर बाहर निकल आए थे। भक्त अब उनकी पूजा करने का कानूनी अधिकार हासिल कर चुके थे। हालांकि, राजीव गांधी सरकार और यूपी की वीर बहादुर सिंह की सरकार ने जिस तेजी से आदेश का पालन कराया, यह चौंकाने वाला था। इसके पीछे के कारणों पर आज भी बहस होती है। एक वर्ग का दावा है कि विश्व हिंदू परिषद के हिंदुत्व एजेंडे को काटने के लिए यह कदम उठाया गया। 1949 में अयोध्या डीएम के सुझाव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद बल्लभ पंत सरकार ने जिस बाबरी मस्जिद में फेंसिंग करने और श्रद्धालुओं को रामलला के निकट न जाने के लिए पर्याप्त उपाय किए थे।

राजीव गांधी सरकार ने इस मामले में बड़ा निर्णय लिया। राजीव सरकार ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर प्रभु रामलला की पूजा को लेकर काम शुरू कर दिया गया। दरअसल, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सबसे बड़ी जीत मिली। पार्टी 404 सीटों पर लोकसभा चुनाव 1984 के चुनाव में जीती थी। बावजूद इसके कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। हालांकि, वर्ष 1986 की इस घटना को राजनीतिक रूप से राजीव गांधी की सबसे बड़ी भूल के रूप में देखा जामा है। इस निर्णय के बाद देश में कांग्रेस के जनाधार में लगातार गिरावट आई। पार्टी कभी भी इस निर्णय के बाद पूर्ण बहुमत हासिल करने में अब तक सफल नहीं हो पाई। कांग्रेस के एजेंडे में शुरुआती दिनों में राम समाहित थे। महात्मा गांधी का भगवान राम से गहरा जुड़ाव था। महात्मा गांधी हमेशा कहा करते थे कि भगवान राम के नाम से मुझे ताकत मिलती है। यह मुझे संकट के क्षणों से राह दिखाती है। नई ऊर्जा से भर देती है। एक सच्चे रामभक्त की तरह उन्होंने पूरे जीवन राम के नाम का जाप किया। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में भी प्रभु श्रीराम के जीवन की सरलता, सादगी और आत्म समर्पण के भावों को अपनाया। राजीव गांधी ने हिंदू वर्ग में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए राम के नाम का इस्तेमाल किया। भगवान राम और रामायण के देश पर प्रभाव का ज्ञान था। यही कारण था कि 1985 में उनके कहने पर दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामायण के प्रसारण की योजना तैयार की गई। वर्ष 1987 से 1988 के बीच इस धारावाहिक का प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया।

राजीव गांधी ने वर्ष 1989 में राम मंदिर को लेकर बड़ा निर्णय लिया। यूपी के पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवा दिए थे। इसके बाद हिंदुओं को प्रभु रामलला के दर्शन का मौका मिला। शाहबानो केस में घिरे राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे। हिंदू वर्ग में उनके खिलाफ माहौल बन रहा था। इसके अलावा कई घोटालों के आरोप भी राजीव सरकार पर लगने लगे थे। ऐसे में राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव 1989 के भाषणों में अक्सर देश में रामराज लाने का वादा किया। 1989 प्रयाग कुंभ के बाद विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण पर आंदोलन को तेज किया। परिषद की ओर से 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। इस पर काफी विवाद और खींचतान मची।

रामराज लाने का चुनावी वादा करने वाले राजीव सरकार के सामने कोई ऑप्शन नहीं था। वह हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहते थे। राजीव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को मंदिर के शिलान्यास की इजाजत दे दी। तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को उन्होंने शिलान्यास कार्यक्रम में भेजा। विश्व हिंदू परिषद की ओर से बिहार के रहने वाले कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया। राम मंदिर आंदोलन का यह एक अहम पड़ाव था। कई राजनीतिक विश्लेषक दाव करते हैं कि राजीव पर भगवान राम का असर था। भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर 1989 में राजीव सरकार बनती तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती।

क्या अब भारत का इसरो प्राप्त करने वाला है नई मंजिलें?

भारत का इसरो अब नई मंजिलें प्राप्त करने वाला है! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने गुरुवार को यहां कहा कि भारत अपनी मौजूदा क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए 2028 तक पहला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना चाहेगा। वह 10वें ‘वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट’ के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के संदर्भ में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। एस सोमनाथ ने कहा, ‘हम अपनी मौजूदा प्रक्षेपण क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए 2028 तक पहला भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना चाहेंगे। और हम इसे प्रयोगशाला में तब्दील करना चाहेंगे जहां आप आएं और प्रयोग करें।’ इसरो प्रमुख ने कहा इसकी स्थापना के बाद इसरो ऐसी कंपनियों और संस्थाओं का पता लगाएगा जो भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का उपयोग कर सकेंगे और इसके माध्यम से आर्थिक गतिविधियां कर सकेंगे। सोमनाथ ने कहा कि उनका मानना है कि यह संभव है। सोमनाथ ने कहा कि चंद्रमा पर मानव के पहुंचने का भी आर्थिक प्रभाव होगा क्योंकि भविष्य में केवल पृथ्वी के इर्दगिर्द ही रणनीतिक गतिविधियां नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि उद्योगों को पृथ्वी पर अनेक कार्यों के लिए अगले 5 से 10 साल में सैकड़ों अंतरिक्षयान बनाने होंगे। यही नहीं आपको बता दें कि नए साल पर भारतीय स्पेस एजेंसी ने देशवासियों को बड़ा सरप्राइज दिया। सोमवार को साल के पहले ही दिन इसरो ने एक्स-रे पोलरिमीटर (XPoSat) सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस सैटेलाइट के लॉन्च करने के बाद भारत अमेरिका के बाद एक इकलौता ऐसा देश बन गया, जिसने ब्लैक होल की स्टडी करने के लिए डेडीकेटेड सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा है। ये सैटेलाइट ब्रह्मांड को बेहतर तरीके समझने में मदद करेगा। सोमवार सुबह 9.10 बजे भारत का सबसे भरोसेमंद माने वाले PSLV रॉकेट अपनी पीठ पर इस सैटेलाइट को बांधकर अंतरिक्ष की ऊंचाई में उड़ गया। इस रॉकेट की ये 60वीं उड़ान थी। PSLV रॉकेट ने XPoSat सैटेलाइट को पृथ्वी की 650 किलोमीटर की ऑर्बिट में स्थापित किया। अपनी तय ऑर्बिट में पहुंचने के बाद PSLV-C58 का अंतिम चरण एक कक्षीय प्रायोगिक मॉड्यूल POEM में बदल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की तारीफ करते हुए कहा, ‘हमारे वैज्ञानिकों की बदौलत 2024 की शानदार शुरुआत! यह लॉन्चिंग अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक शानदार खबर है और इस क्षेत्र में भारत की शक्ति को बढ़ाएगा। भारत को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इसरो के हमारे वैज्ञानिकों और पूरे अंतरिक्ष बिरादरी को शुभकामनाएं।’इसका इस्तेमाल अगले महीने 10 पेलोड की टेस्टिंग के लिए किया जाएगा।

इसरो ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सैटेलाइट को लॉन्च किया। लॉन्चिंग के करीब 22 मिनट बाद PSLV रॉकेट ने XPoSat सैटेलाइट को ऑर्बिट में स्थापित किया। सैटेलाइट लॉन्चिंग की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी हुई। लॉन्चिंग के दौरान इंजनों को निकाला नहीं गया ताकि सैटेलाइट को 6 डिग्री के झुकाव के साथ सटीक रूप से तैनात किया जा सके। XPoSat सैटेलाइट का प्राथमिक उद्देश्य ब्लैक होल, न्यूट्रॉन सितारों और सुपरनोवा जैसे खगोलिय पिंडों द्वारा उत्सर्जित एक्स-रे की स्टडी करना है। इसमें दो पेलोड हैं: पहला रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा डेवलेप पोलिक्स एक्स-रे में पोलारिमीटर इंस्ट्रूमेंट और दूसरा यूआरएससी के अंतरिक्ष खगोल विज्ञान समूह द्वारा विकसित एक्सस्पेक्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी और टाइमिंग।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की तारीफ करते हुए कहा, ‘हमारे वैज्ञानिकों की बदौलत 2024 की शानदार शुरुआत! यह लॉन्चिंग अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक शानदार खबर है और इस क्षेत्र में भारत की शक्ति को बढ़ाएगा। भारत को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इसरो के हमारे वैज्ञानिकों और पूरे अंतरिक्ष बिरादरी को शुभकामनाएं।’

इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने अपनी सैटेलाइट लॉन्चिंग को ‘नए साल का तोहफा’ बताया। उन्होंने XPoSat सैटेलाइट की क्षमताओं और इसरो के वैज्ञानिक उद्देश्यों को आगो बढ़ाने में इसके महत्व पर जोर दिया। एस सोमनाथ ने एस्ट्रोसैट और आदित्य-एल1 जैसे अन्य अंतरिक्ष मिशनों के साथ XPoSat के महत्व को बताया। रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक बयान के अनुसार, XPoSat दुनिया में केवल दूसरा एक्स-रे पोलारिमेट्री मिशन है, जो 2021 में लॉन्च किए गए नासा के इमेजिंग एक्स-रे पोलारिमेट्री एक्सप्लोरर के बाद है। पीएस4 कक्षीय मॉड्यूल में कुल 10 पेलोड हैं, जिसमें एक ईंधन सेल पावर सिस्टम और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र द्वारा विकसित सिलिकॉन-आधारित उच्च ऊर्जा सेल शामिल है। इसरो प्रमुख ने 2024 को गगनयान मिशन की तैयारी का साल बताया और कहा कि इस साल में इसरो 12-14 मिशन लॉन्च करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबित इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने घोषणा की कि भारत का पहला सौर मिशन आदित्य एल-1, 6 जनवरी को अपनी मंजिल यानी सूर्य के L1 पॉइंट पर पहुंच जाएगा।

प्राण प्रतिष्ठा से पहले किस तपश्चार्य का पालन करेंगे पीएम मोदी?

आज हम आपको बताएंगे कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले पीएम मोदी किस तपश्चार्य का पालन करने वाले हैं! राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में अब केवल कुछ दिन ही बचे हैं। अयोध्या में इसके लिए पूरी तैयारी चल रही है। पीएम नरेंद्र मोदी ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले 11 दिन का विशेष अनुष्ठान भी शुरू कर दिया है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी है। पीएम मोदी इसके लिए तमाम पूजा प्रक्रिया करेंगे। पीएम मोदी के इस 11 दिवसीय अनुष्ठान को लेकर अब कयासबाजी का भी शुरू हो गई है। पीएम मोदी ने अपने अनुष्ठान की शुरुआत पंचवटी के नासिक से कर रहे हैं। माना जा रहा है कि पीएम मोदी इस अनुष्ठान के बाकी बचे 10 और दिन भगवान राम के समय से जुड़ी जगहों पर जा सकते हैं। हालांकि, अभी ये पूरी तरह से अटकलें और इसपर आधिकारिक पुष्टि नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि जिस तरीके से पीएम मोदी ने रामयण काल से जुड़ी जगहों से शुरुआत की है तो हो सकता है कि वह अन्य जगहों पर भी जाएं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के लिए पीएम मोदी ने पूजा के लिए अनुशासन व्यवस्था शुरू कर दी है। पीएम आज से 11 दिन का विशेष अनुष्ठान शुरू कर रहे हैं। पीएम मोदी ने ट्वीट कर रहा कि अब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में केवल 11 दिन ही बचे हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु ने मुझे प्राण प्रतिष्ठा के दौरान सभी भारतवासियों का प्रतिनिधित्व करने का निमित्त बनाया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए वह आज से 11 दिन का विशेष अनुष्ठान शुरू कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने पंचवटी से अपने अनुष्ठान की शुरुआत कर दी है। पौराणिक मान्यता है कि अपने वनवास के दौरान भगवान राम पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ यहां कुछ वक्त गुजारा था। पंचवटी का नाम पंच और वती से बना है। पंच का अर्थ पांच से होता है जबकि वती का अर्थ बरगद के पेड़ से है। यहीं पर सीता की गुफा भी स्थित है। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा विशेष मुहूर्त में होगी। ये 84 सेकेंड का मुहूर्त है। राम मंदिर में ये शुभ समय 22 जनवरी 2024 को 12 बजकर 29 मिनट 8 सेकेंड से लेकर 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकेंड तक रहेगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त, मृगशीर्ष नक्षत्र, अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के संगम पर हुआ था। 22 जनवरी को ये सारे शुभ समय एक साथ होंगे। इसीलिए रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का ये समय सबसे आदर्श बन जाता है।

प्राण प्रतिष्ठा के दिन पीएम मोदी सबसे पहले रामलला की प्रतिमा का नेत्र आवरण खोलेंगे। इसी समय भगवान राम की प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराया जाएगा। इसके बाद भगवान राम को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया जाएगा। फिर पीएम मोदी सिंहासन पर अचल मूर्ति स्थापित करेंगे। मूर्ति की स्थापना के बाद पीएम नरेंद्र मोदी एक विशाल सभा को भी संबोधित करेंगे। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया मंदिर के सामने केंद्रीय शिखर और दो पार्श्व शिखरों तथा खुले मंच पर कुर्सियां लगाई जाएंगी। उन्होंने बताया कि कुल 6 हजार कुर्सियां लगाई जाएंगी।

यही नहीं, रामलला का पुरानी मूर्ति की पूजा होगी। रामलला की पुरानी मूर्ति को पहले रखा जाएगा और इसे राम उत्सव कहा जाएगा। 16 जनवरी के एक दो दिन बाद दोनों मूर्तियां नए राम मंदिर में रख दी जाएंगी। राम मंदिर के गर्भगृह में 5 वर्षीय रामलला की मूर्ति रखी जाएगी। मंदिर समिति ने 5 साल के भगवान राम की मूर्ति का चयन किया है। ये मूर्ति काले पत्थरों की होगी। मिश्रा ने कहा कि रामायण में रामलला के लिए श्याम रंग का जिक्र है इसलिए काले पत्थर की मूर्ति का चयन किया गया है। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम 16 जनवरी से 22 जनवरी तक चलेगा। 7 जनवरी को श्रीविग्रह का परिसर भ्रमण कराया जाएगा। इसके बाद गर्भगृह का शुद्धिकरण होगा। 18 जनवरी से अधिवास प्रारंभ होगा। जिसमें सुबह और शाम जलाधिवास, सुगंध और गंधाधिवास भी होगा। 19 जनवरी से फल अधिवास और फिर धान्य अधिवास होगा।विशाल सभा को भी संबोधित करेंगे। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया मंदिर के सामने केंद्रीय शिखर और दो पार्श्व शिखरों तथा खुले मंच पर कुर्सियां लगाई जाएंगी। उन्होंने बताया कि कुल 6 हजार कुर्सियां लगाई जाएंगी। 20 जनवरी को पुष्प और रत्न एवं शाम को धृत अधिवास होगा। 21 जनवरी को सुबह में शर्करा, मिष्ठान और मधु अधिवास फिर औषधि एवं शैय्या अधिवास होगा। 22 जनवरी को रामलला की आंखों से पट्टी हटाई जाएगी फिर उन्हें दर्पण दिखाया जाएगा।

जानिए कौन है चार शंकराचार्य जिन्होंने किया मोदी सरकार का विरोध?

आज हम आपको चार शंकराचार्य के बारे में बताएंगे जिन्होंने मोदी सरकार का विरोध किया है!अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर ‘प्राण प्रतिष्ठा’ अभिषेक समारोह होना है। खास बात है कि इस समारोह से चार शंकराचार्य शामिल नहीं होंगे। हालांकि, इन चार शंकराचार्य में से दो लोगों ने अब इस आयोजन को अपना समर्थन देने की बात कही है। इससे पहले एक वीडियो संदेश में जोशीमठ के ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा था कि चारों शंकराचार्यों में से कोई भी अयोध्या में समारोह में शामिल नहीं होगा क्योंकि यह मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने से पहले किया जा रहा है। इस संबंध में विश्व हिंदू परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने गुरुवार को कहा कि प्राण प्रतिष्ठा का स्वागत करने वाले द्वारका और श्रृंगेरी शंकराचार्यों के बयान पहले से ही सार्वजनिक हैं। उन्होंने कहा कि पुरी शंकराचार्य भी इस समारोह के पक्ष में हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वारनंद ने राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का वीडियो शेयर हो रहा है। इसमें कहा गया है कि चारों शंकराचार्य वहां पर नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये लोग किसी राग या द्वेष के कारण नहीं जा रहे ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्यों का यह दायित्व है कि वे शास्त्रविधि का पालन करें और करवाएं। वहां पर शास्त्र विधि की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि सबसे पहली उपेक्षा यह है कि मंदिर अभी पूरा बना नहीं है और प्रतिष्ठा की जा रही है। कोई ऐसी परिस्थिति नहीं है कि अपने को अचानक कर देना पड़े। ये हमको कहना ही पड़ेगा पूछे जाने पर कि यह ठीक नहीं है।

गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद स्वामी महाराज का कहना है कि मेरा हृदय ऐसा नहीं कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का निमंत्रण मिले तो मैं फूल जाऊं। वहीं, निमंत्रण नहीं मिलने पर कुपित हो जाऊं। उन्होंने कहा कि राम जी शास्त्रों के हिसाब से प्रतिष्ठित हों, ये आवश्यक है। उनका कहना है कि अभी प्रतिष्ठा शास्त्रों के हिसाब से नहीं हो रही है, इसलिए मेरा उसमें जाना उचित नहीं है। स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि आमंत्रण आया है। इसमें कहा गया है कि एक व्यक्ति के साथ आ सकते हैं। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि कौन मूर्ति का स्पर्श करे कौन ना करे, इसका ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुराणों में लिखा है कि देवता मूर्ति तब प्रतिष्ठित होते हैं, जब विधिवत हों। अगर ये ढंग से ना किया जाए तो देवी देवता क्रोधित हो जाते हैं। शंकराचार्य ने कहा कि ये खिलवाड़ नहीं है। ढंग से किया जाए तभी देवता का तेज सबके लिए अच्छा रहता है वरना विस्फोटक हो जाता है। उनका कहना था कि मोदी जी लोकार्पण करेंगे, मूर्ति का स्पर्श करेंगे और मैं वहां ताली बजा के जय-जय करूंगा क्या? मुझे अपने पद की गरिमा का ध्यान है। ऐसे में मैं वहां गया तो मोदी अधिक से अधिक नमस्कार कर देंगे। अयोध्या से मुझे परहेज नहीं है। इस अवसर पर जाना उचित नहीं है।

श्रृंगेरी मठ की ओर से बयान जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि शंकराचार्य भारतीतीर्थ की तस्वीर के साथ एक संदेश शेयर किया जा रहा है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि श्रृंगेरी शंकराचार्य प्राण प्रतिष्ठा का विरोध कर रहे हैं। हालांकि, ऐसा कोई संदेश शंकराचार्य की ओर से नहीं दिया गया है। ये गलत प्रचार किया जा रहा है। श्रृंगेरी शंकराचार्य की इस संबंध में एक अपील भी की गई है। इसमें कहा गया है कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हों। हालांकि शंकराचार्य स्वयं अयोध्या में कार्यक्रम में शामिल होंगे या नहीं, इस बारे अभी साफ तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है।

राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर शारदापीठ के शंकराचार्य की ओर से भी सोशल मीडिया पर बयान शेयर किया गया है। इसमें कहा गया है कि शंकराचार्य सदानंद महाराज की ओर से कोई बयान नहीं दिया गया है। राम मंदिर के लिए हमारे गुरुदेव ने कई कोशिशें की थीं, 500 साल बाद ये विवाद खत्म हुआ है। बयान में कहा गया है कि हम चाहते हैं कि राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह वेद, शास्त्र, धर्म की मर्यादा के पालन के साथ हों। हालांकि, बयान में यह नहीं बताया गया है कि द्वारका मठ के शंकराचार्य खुद प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होंगे या नहीं?

आखिर क्या है सोमनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की कहानी?

आज हम आपको सोमनाथ मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की कहानी सुनाने जा रहे हैं! कांग्रेस ने अयोध्‍या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम में नहीं जाने का फैसला किया है। राम मंदिर ट्रस्‍ट की ओर से पार्टी को कार्यक्रम में शामिल होने का न्‍योता मिला था। कांग्रेस ने इसे बीजेपी और आरएसएस का इवेंट बताकर अस्‍वीकार किया है। न्योते को ठुकराए जाने के बाद सियासत गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने इसका कनेक्‍शन 73 साल पहले सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन से जोड़ दिया है। इसे लेकर बीजेपी और कांग्रेस में वार-पलटवार शुरू हो गया है। बीजेपी ने कांग्रेस पर राम विरोधी होने का आरोप लगाया है। सात दशक पहले की याद दिलाते हुए उसने पूरे मामले में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी लपेट लिया है। तब नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने से रोका था। दोनों के बीच इसे लेकर खुलकर मतभेद सामने आ गए थे। क्‍या था वो किस्‍सा? आइए, यहां जानते हैं। बात सात दशक पहले की है। माहौल कमोबेश अभी जैसा बन गया था। तारीख थी 11 मई 1951। गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन था। यह 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से एक है। आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।

11 मई 1951 को भारत के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ही मंदिर में ज्‍योतिर्लिंग को स्‍थापित किया था। कार्यक्रम में राजेंद्र प्रसाद के शामिल होने पर नेहरू ने आपत्ति जताई थी। नेहरू ने इसमें शामिल होने से साफ मना कर दिया था। नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी लिखकर नाखुशी जाहिर की थी। साथ ही उनसे यह भी कहा था कि वह भी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करें। सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम से करीब तीन महीने पहले नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को चिट्ठी लिखी थी। यह चिट्ठी 13 मार्च 1951 को लिखी गई थी। उन्‍होंने लिखा था- अगर आपको लगता है कि निमंत्रण अस्‍वीकार करना आपके लिए सही नहीं होगा तो मैं दबाव नहीं डालूंगा। नेहरू ने लिखा था कि प्रसाद की सोमनाथ मंदिर यात्रा राजनीतिक महत्‍व ले रही है। यह सरकारी कार्यक्रम नहीं है। लिहाजा, उन्‍हें इसमें नहीं जाना चाहिए।

दरअसल, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्‍ट्रपति पद पर रहते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद किसी धार्मिक कार्यक्रम का हिस्‍सा बनें। बता दें कि आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्‍ताव रखा था। बता दें कि नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। इसी के चलते नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को रोकने की कोशिश की। यह और बात है कि प्रसाद ने नेहरू की एक नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए।

नेहरू की चिट्ठी के जवाब में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी पत्र लिखा था। प्रसाद ने लिखा था- मैं अपने धर्म को बहुत मानता हूं और इससे खुद को अलग नहीं कर सकता। फिर न केवल वह उद्घाटन में शामिल हुए। अलबत्‍ता कार्यक्रम के अनुसार, शिवलिंग की स्‍थापना भी की। तारीख थी 11 मई 1951। गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन था। यह 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से एक है। आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है।तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्‍ताव रखा था। बता दें कि नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। इसी के चलते नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को रोकने की कोशिश की। यह और बात है कि प्रसाद ने नेहरू की एक नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए। इसे लेकर उन्‍होंने महात्‍मा गांधी को पत्र लिखा था। गांधी ने इस प्रस्‍ताव की सराहना की थी। लेकिन, शर्त रखी थी कि इसमें सरकारी धन खर्च नहीं होना चाहिए। पटेल ने इस शर्त का अक्षरश: पालन किया था।

क्या हूती बन चुके है भारत के लिए नई चुनौती?

हूती अब भारत के लिए नई चुनौती बन चुके हैं! लाल सागर के जहाजों पर लगातार हमले होने के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मजबूरन एक प्रस्ताव पारित करना पड़ा। इस प्रस्ताव में इन व्यवधानों को रोकने की मांग की गई है।जब तक उन्हें बलपूर्वक रोका नहीं जाता। हूती निकट भविष्य में लाल सागर के जहाजों को बाधित करते रहने की क्षमता रखते हैं। उनके पास हथियार, दक्षता और इच्छाशक्ति है। वे जो मिसाइल और ड्रोन जहाजों पर दाग रहे हैं, वे अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा उन्हें मार गिराने के लिए आवश्यक हथियारों की तुलना में बहुत सस्ते हैं। हूती अगर सटीक और सीधा निशाना नहीं लगा पाएं तो भी वो जहाजों की आवाजाही रोक तो सकते ही हैं। सबसे बढ़कर वो लाल सागर में हुड़दंग करते रहने की मंशा रखते हैं। वो अपने हमलों से खुद पर और फिलिस्तीनियों पर विश्व का ध्यान आकर्षित करने में जुटे हैं। हूती बिना बाहरी मदद के इतना बड़ा काम नहीं कर सकते। उन्हें ईरान से हथियार, प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी मिलती है। यमनी गृह युद्ध के दौरान ईरान का प्रभाव काफी बढ़ गया है, जो सितंबर 2014 में राजधानी सना पर हूतियों के कब्जे के बाद से ही जारी है। ईरान हूतियों को प्रतिरोध की आवाज के रूप में पेश करता है, लेकिन हूती सीधे तौर पर ईरान की ओर से काम नहीं कर रहे हैं। लाल सागर में हमले करने के उनके अपने भी कारण हैं। यहां तक कि अगर ईरान अगर हूतियों से समर्थन वापस ले ले तो भी आंशका है कि वे अपने हथियार खत्म होने तक तांडव करते रहेंगे।

लाल सागर के पास अपनी जियोपॉलिटिकल लोकेशन के कारण वैश्विक व्यापार को बाधित करने में हूती ज्यादा सक्षम हैं। इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिहाज से वो हिज्बुल्ला जैसे इस्लामी आतंकी समूहों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। इसके अलावा, हिज्बुल्ला को इजरायल से जमीनी लड़ाई लड़नी पड़ती है जिससे उसके अपने नागरिकों पर भी खतरा रहता है। हूती विद्रोही समुद्री क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाते हैं, इजरायल या किसी और देश पर हमला नहीं कर रहे। इस कारण जवाब में कोई नागरिक आबादी संघर्ष के असर में नहीं आती है और इजरायल पर दबाव बनाने की मंशा भी सध जाती है। लाल सागर में हमले से हूतियों के कई हित सधते हैं- घरेलू, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय। घरेलू स्तर पर हूती खुद को फिलिस्तीन के रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं। इस कारण उन्हें लड़ाकों की भर्ती करने में सुविधा होने लगी है। क्षेत्रीय तौर पर, इससे सऊदी अरब के साथ चल रही बातचीत में उनका प्रभाव बढ़ जाता है, जो यमन युद्ध से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अपने और फिलिस्तीन के समर्थन में अधिकतम प्रॉपगैंडा फैला पा रहा है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दुनिया गाजा में इजरायली एक्शन प्रभावों को महसूस करे। हूतियों के आक्रमण से इजरायल, अमेरिका और उसके सहयोगियों के सैन्य अभियान में भी खलल पड़ती है क्योंकि उन्हें रेड सी में भी अपने सैनिक भेजने पड़ते हैं।

अमेरिका के पास कुछ ही विकल्प बचे हैं। इसने क्षेत्र में अपनी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेना को मजबूत किया है। हूतियों की फंडिंग पर अंकुश लगाया है और चेतावनी जारी की है। इनमें से कोई भी उपाय अभी तक हूती हमलों पर लगाम लगाने में सफल नहीं हुआ है, उदाहरण के लिए, हूतियों ने इस सप्ताह ड्रोन और मिसाइलों का सबसे बड़ा हमला किया। हूतियों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन ओमान उनके साथ मध्यस्थता करने में मददगार हो सकता है। यदि ओमान इस प्रयास में विफल रहता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी सैन्य कार्रवाई को मजबूर हो सकते हैं।

यदि सभी पक्ष एक-दूसरे की खींची सीमा के भीतर काम करते हैं, तो लाल सागर में चल रही जैसा को तैसा की कार्रवाई पर काबू पाया जा सकता है। अमेरिका ने तब साफ कर दिया कि उसकी बर्दाश्त की क्षमता कितनी है जब 31 दिसंबर को एक कंटेनर जहाज पर हूतियों के चढ़ने के प्रयास के बाद उसने तीन हूती नौकाओं को डुबो दिया। हालांकि हूतियों ने अपने हमले जारी रखे हैं, लेकिन तब से उन्होंने किसी और जहाज का अपहरण नहीं किया है। भारत जैसे देश जिनके चालक दल या जहाजों को हूतियों ने निशाना बनाया है, स्वाभाविक रूप से बदले की एकतरफा कार्रवाई करने से बचना चाहते हैं। उनके पास कोई अच्छे विकल्प नहीं हैं। वे कोई कदम नहीं उठाने को सही साबित करने के लिए हूतियों के किसी हमले से अपना संबंध होने की बात खारिज कर सकते हैं, लेकिन खुद को कमजोर दिखने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। भविष्य में वो हूतियों के टार्गेट न बनें, इसके लिए वो तटस्थ दिखने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन अन्य राजनयिक प्रभाव का जोखिम उठा नहीं सकते। अगर हूतियों ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा तो फिर भारत, अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय समुद्री सेना में शामिल हो सकता है।

क्या वर्ल्ड बैंक लिस्ट में भारत है अब भी पीछे?

वर्ल्ड बैंक लिस्ट में भारत अब भी पीछे ही है! भारत दुनिया के उन देशों में है जो कम मध्यम आय समूह में आते हैं। वर्ल्ड बैंक की जून 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चार आय वर्ग में से ऊपर से तीसरे और नीचे से दूसरे स्थान पर है। विश्व बैंक दुनिया के देशों को चार आय समूहों में रखता है- कम आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय और उच्च आय। क्या आप जानना चाहेंगे हमारे पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार किस आय समूह में आते हैं? खैर, ये जान लीजिए कि मालदीव इनकम ग्रुप के मामले में हमसे ऊपर है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 1980 के दशक के अंत से आय वर्गीकरण के लिहाज से देशों की स्थिति में काफी बदलाव आया है। 1987 में रिपोर्ट करने वाले 30% देशों को कम आय वाले समूह में रखा गया था जबकि 2022 में केवल 12% इस श्रेणी में आए। यह गिरावट दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है, उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में कम आय वाले देशों का अनुपात 2022 में 74% से गिरकर 46% हो गया है। वहीं, पूर्वी एशिया प्रशांत में 26% से घटकर 3% और दक्षिण एशिया 100% से घटकर 13% हो गया है क्योंकि अर्थव्यवस्थाएं इस अवधि के दौरान उच्च श्रेणियों में चली गई हैं।

कोविड-19 महामारी से उबरने के साथ 2022 में आय समूह बदलने वाले देशों में लगभग सभी हाई लेवल इनकम ग्रुप में चले गए। प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के पैमाने पर लगभग 80% देशों ने 2022 में महामारी पूर्व की अवधि 2019 की तुलना में सुधार दिखाया। बीते वर्ष गुयाना और अमेरिकी समोआ दोनों उच्च-मध्यम से उच्च आय वर्ग में जा रहे हैं। गुयाना के प्रति व्यक्ति जीएनआई में बड़ी वृद्धि तेल और गैस उत्पादन की बढ़ती मात्रा के कारण है, जो 2022 में दोगुनी से अधिक हो गई है। 2021 में अल साल्वाडोर, इंडोनेशिया और वेस्ट बैंक एवं गाजा का जीएनआई ऊपरी मध्य आय सीमा के बहुत करीब था, इसलिए 2022 में मामूली जीडीपी ग्रोथ इन अर्थव्यवस्थाओं को इस श्रेणी में लाने के लिए पर्याप्त थी। साल्वाडोर की अर्थव्यवस्था में 2.6% रीयल जीडीपी वृद्धि देखी गई, जबकि इंडोनेशिया ने महामारी के बाद अपनी मजबूत सुधार जारी रखा और वास्तविक जीडीपी में 5.3% की वृद्धि हुई। 2021 में महामारी के बाद की मजबूत वृद्धि 7.9% के बाद 2022 में 3.9% की वृद्धि के दम पर वेस्ट बैंक और गाजा हाई मिडल इनकम ग्रुप में आ गया। पिछले वर्ष 2023 में गिनी और जाम्बिया निम्न आय से निम्न मध्यम आय वर्ग में चले गए। पिछले वर्ष जॉर्डन एकमात्र ऐसा देश रहा, जो आय समूह वाले वर्गीकरण में नीचे खिसक गया। ध्यान रहे कि ये वर्गीकरण हर साल 1 जुलाई को पिछले कैलेंडर वर्ष के प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय जीएनआई के आधार पर अपडेट किए जाते हैं। जीएनआई को अमेरिकी डॉलर में दर्शाया जाता है। वर्ल्ड बैंक का आय वर्गीकरण का उद्देश्य किसी देश के विकास के स्तर को दर्शाना है।

बता दे कि विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2023-24 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी की वृद्धि दर के अनुमान को 6.3 प्रतिशत पर बरकरार रखा है और कहा है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल की पृष्ठभूमि में देश ने अपने प्रदर्शन में लचीलापन दिखाना जारी रखा है। विश्व बैंक ने अप्रैल की अपनी रिपोर्ट में 2023-24 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान को पहले के 6.6 प्रतिशत से घटाकर 6.3 प्रतिशत कर दिया था। विश्व बैंक की मंगलवार को जारी ताजा भारत विकास अद्यतन आईडीयू के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान की प्रमुख छमाही रिपोर्ट में कहा गया है कि महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत 2022-23 में 7.2 प्रतिशत की दर से सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहा।विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “भारत की वृद्धि दर जी-20 देशों में दूसरी सबसे अधिक और उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के औसत से लगभग दोगुनी है। यह लचीलापन मजबूत घरेलू मांग, मजबूत सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निवेश और मजबूत वित्तीय क्षेत्र से प्रेरित था।जुलाई को पिछले कैलेंडर वर्ष के प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय जीएनआई के आधार पर अपडेट किए जाते हैं। जीएनआई को अमेरिकी डॉलर में दर्शाया जाता है। वर्ल्ड बैंक का आय वर्गीकरण का उद्देश्य किसी देश के विकास के स्तर को दर्शाना है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का बैंक ऋण 15.8 प्रतिशत बढ़ा जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इसमें 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। भारत के सेवा क्षेत्र की गतिविधि 7.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ मजबूत रहने की उम्मीद है और निवेश वृद्धि भी 8.9 प्रतिशत पर मजबूत रहने का अनुमान है।

बेटे की कातिल माँ ने किए कई बड़े खुलासे!

हाल ही में बेटे की कातिल माँ ने कई बड़े खुलासे कर दिए हैं! गोवा में अपने 4 साल के बेटे की हत्या करने वाली ‘कातिल मां’ सूचना सेठ अपने पति से इतनी नफरत करने लगी थी कि उसके दिल में अपने मासूम बेटे के लिए भी ममता नहीं उमड़ी। जैसे-जैसे दिन गुजर रहा है वैसे-वैसे इस हत्यारिन मां की करतूत सामने आ रही है। पति से बदले की आग में जल रही सूचना ने अपने मासूम बेटे को केवल इसलिए मार दिया क्योंकि वह उसे उसके पिता से नहीं मिलने देना चाह रही थी। मारने से पहले इस कुमाता ने अपने बच्चे को लोरी भी सुनाई थी। गोवा मर्डर केस में आज हमको आपके ऐसे राज बताएंगे जो चौंकाने वाले हैं। गोवा पुलिस को गुरुवार को सूचना सेठ की हस्तलिखित चिट्ठी मिली है। ये चिट्ठी सूचना के गोवा के किराए वाले घर से मिली है। इस चिट्ठी में सूचना ने लिखा था, ‘मैं कोर्ट के उस आदेश को बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूं जिसमें मेरे पति को बेटे से मिलने की इजाजत है।’ पुलिस ने इस चिट्ठी को सील कर उसे FSL भेज दिया है। ताकि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट इसकी जांच कर सके। सूचना ने चिट्ठी में लिखा है कि कोर्ट और मेरा पति मेरे बेटे की कस्टडी मुझसे छीनना चाहते हैं। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं। सूचना ने लिखा है कि मेरा पूर्व पति हिंसक है। वो मेरे बेटे को गलत चीजें सिखाता था। मैं अपने बेटे की कस्टडी एक दिन के लिए भी उसे नहीं दे सकती हूं।

सूचना ने पुलिस की पूछताछ में बताया कि उसने मारने से पहले अपने बेटे को लोरी सुनाई थी। ताकि वह सो जाए और फिर उसका वो गला घोंट सके। पुलिस सूत्रों ने बताया कि सूचना अपने बेटे को मारने से पहले अपने डॉक्टर से संपर्क में थी। पुलिस ने बताया कि वो सूचना की कॉल डिटेल को खंगाल रही है ताकि ये पता चल पाए कि हत्या के बाद उसने किसे कॉल किया था।

पुलिस को सूचना के कमरे से कफ सिरफ की बोतल मिली। सूचना ने पूछताछ में बताया कि उसने अपने बेटे को बेसुध करने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। सूत्रों ने बताया सूचना अपने बेटे को हर रविवार को उसके पिता वेंकट रमन से मिलने देने के आदेश से नाराज थी। इसके अलावा कोर्ट में दाखिल तलाक याचिका से ये पता चलता है कि सूचना ने रमन से हर महीने 2.5 लाख गुजारा भत्ता मांगा था। सूचना ने वेंकट की महीने की कमाई 9 लाख रुपये बताते हुए ये मांग की थी।

गोवा में जिस अपार्टमेंट में सूचना रुकी थी वहां से पुलिस को चाकू, तौलिया और तकिया मिला है। ये तीन सबूत पुलिस को इस हत्या मामले का खुलासा करने में मदद करेंगे। सूचना इस अपार्टमेंट में 6 जनवरी को आई थी और 8 जनवरी तक रुकी थी। उसने अपने बेटे की हत्या कर उसका शव बैग में रखकर कर्नाटक के लिए निकल गई थी। पुलिस ने बताया कि सूचना पूछताछ में सहयोग कर रही है। लेकिन उसके चेहरे पर अपने बेटे की हत्या या इसमें उसकी भूमिका को लेकर कोई पछतावा नहीं दिख रहा है। जांच के दौरान पूछताछ में सूचना ने पुलिस को बताया कि उनसे 6 जनवरी को अपने पति वेंकट रमन को मैसेज भेजा था। सूचना ने वेंकट को कहा था कि वह अपने बेटे से अगले दिन मिल सकता है। लेकिन जब वेंकट वहां पहुंचा तो कोई भी घर में नहीं था।

सूचना और वेंकट के तलाक के कागजात से पता चलता है कि सूचना ने अपने पति के खिलाफ अगस्त 2022 में घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवाया था। सूचना सेठ ने आरोप लगाया था कि वेंकट उसे और उसके बेटे को मारता है। हालांकि, वेंकट ने कोर्ट में इस आरोप से इनकार कर चुके हैं। पहले कोर्ट ने वेंकट उसके पत्नी के घर जाने से रोक दिया था। रविवार को उसके पिता वेंकट रमन से मिलने देने के आदेश से नाराज थी। इसके अलावा कोर्ट में दाखिल तलाक याचिका से ये पता चलता है कि सूचना ने रमन से हर महीने 2.5 लाख गुजारा भत्ता मांगा था। सूचना ने वेंकट की महीने की कमाई 9 लाख रुपये बताते हुए ये मांग की थी।यही नहीं, कोर्ट ने उन्हें पत्नी सूचना और बच्चे से भी बात करने से मना कर दिया था। हालांकि, बाद में अदालत ने वेंकट को हर रविवार को अपने बेटे से मिलने की इजाजत दे दी थी। इसी से सूचना काफी नाराज थी।

जब उच्चतम न्यायालय में पहली बार आया राम मंदिर का केस!

एक ऐसा समय जब उच्चतम न्यायालय में पहली बार राम मंदिर का कैसे आया था! मुगल आक्रांता बाबर की सेना ने तो एक बार मेरी छाती को छलनी कर मेरे प्रभु रामलला के मंदिर को तहस- नहस किया। लेकिन, अगले 500 सालों तक सत्ता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई में बार- बार मेरी छाती पर घाव लगे। मेरे प्रभु के अस्तित्व पर ही सवाल उठाया गया। जिस राम का प्रवाह भारतीय संस्कृति की रग- रग में रक्त सा संचारित होता है, उस राम को कभी काल्पनिक तक करार दिया गया। मेरे प्रभु की जन्मस्थली को लेकर विवाद हुआ है। मैं देखती रही। सहती रही। चुपचाप खामोश। मुझे उम्मीद थी, समय का पहिया जरूर घूमेगा। वक्त कभी एक- सा तो नहीं रहता। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको अपने भगवान राम के अस्तित्व की लड़ाई की कहानी सुनाती हूं। मंदिर- मस्जिद को लेकर जब अयोध्या की धरती लाल हुई तो भगवान को कानूनी मदद पहुंचाने का प्रयास शुरू हुआ। भगवान राम के नाम पर रामलला विराजमान खुद कोर्ट पहुंचे। केस दायर किया। अपनी जन्मभूमि की जमीन पर हक हासिल करने की कानूनी लड़ाई। लेकिन, क्या आपको पता है कि राम के नाम पर कानूनी लड़ाई कब शुरू हुई थी। स्वतंत्र भारत में 1950 में। लेकिन, इससे 65 साल पहले 1885 में फैजाबाद कोर्ट में एक और केस दायर हुआ था।  मेरे प्रभु श्री राम के नाम पर 1853 में पहली बार अयोध्या की धरती लाल हुई। राम जन्मभूमि को गिराने पहुंचे हिंदुओं और मुस्लिम समुदाय की हिंसक झड़प हुई। इस प्रकार की झड़प अगले पांच साल चलती रही। 1859 में ब्रिटिश सरकार ने विवाद का हल निकालने की कोशिश की। राम जन्मभूमि विवाद को शांत करने के लिए मस्जिद के सामने एक दीवार बना दी गई। परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी गई। हिंदू पक्ष इस बंटवारे से सहमत नहीं था। हिंदू साधु बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे राम की जन्मस्थली बताकर उस पर अपने अधिकार का दावा करते रहे। 1885 में हिंदू साधु महंत रघुवर दास ने इस विवाद का कानूनी हल निकालने की कोशिश शुरू की। वे फैजाबाद कोर्ट पहुंचे। बाबरी मस्जिद पर हिंदुओं के अधिकार का दावा किया।

1528 में मुगल सिपहसालार मीरबाकी के मस्जिद बनाने के 330 साल बाद 1858 में मामला लड़ाई कानूनी हो गई। पहली बार बाबरी परिसर में हवन और पूजन करने के लिए प्राथमिकी दर्ज की गई। अवध के थानेदार शीतल दुबे को दर्ज एफआईआर का जांच अधिकारी बनाया गया। अयोध्या रिविजिटेड किताब में इस घटना का जिक्र किया गया है। किताब में जिक्र किया गया है कि 1 दिसंबर 1858 को थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट दी। इसमें लिखा गया कि विवादित परिसर में चबूतरा बना हुआ है। यह पहला कानूनी दस्तावेज है, जिसमें बाबारी परिसर के भीतर प्रभु रामलला के प्रतीक होने के प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेजी सरकार ने इस रिपोर्ट के आधार पर विवादित भाग को दो भागों में बांट दिया। विवादित भूमि के आंतरिक परिसर में मुस्लिमों और बाहरी परिसर में हिंदुओं को इबादत का अधिकार दिया गया।

बाबरी परिसर को दो भाग में बांटने के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि की लड़ाई कोर्ट पहुंच गई। निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया। महंत दास ने बाबरी ढांचे के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने की मांग की। इस पर छत डालने की अर्जी दी गई। जज इस मामले में फैसला सुनाया कि वहां हिंदुओं को पूजा- अर्चना का अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि डीएम के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

कोर्ट के फैसले से निराश हिंदू पक्ष सड़क पर इंसाफ पाने की कोशिश में जुटा। आजादी की लड़ाई के बीच 1934 में मेरे दर पर एक बार फिर घमासान हुआ। करीब 40 हजार हिंदू जुटे। मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाने की नीयत से यह भीड़ आई थी। मस्जिद पर हमला हुआ। तीनों गुंबद तोड़ दिए गए। अंग्रेजी सरकार को जैसे ही इस हमले की जानकारी मिली। फैजाबाद प्रशासन की मदद से भीड़ को हटाया गया। इसके बाद तोड़े गए गुंबद की मरम्मत फैजाबाद डीएम ने करवा दिया। इसके बाद 1949 में रामलला बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे प्रगट हो गए। इस बार फैजाबाद डीएम के असहयोग के कारण रामलला को मस्जिद से बाहर निकाला जाना संभव नहीं हुआ। हालांकि, डीएम के सुझाव पर केंद्र की जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद वल्लभ पंत सरकार ने रामलला को सींखचों में कैद कर दिया।

रामलला अपने जन्मस्थान तक तो पहुंच चुके थे, लेकिन बेड़ियों में कैद थे। सामान्य भक्त की पहुंच से दूर। मेरे प्रभु के दर्शन करने वाले वाले भक्तों को यह अखड़ने लगा। देश में संविधान लागू हुआ तो सभी धर्म के लोगों को अपने- अपने आराध्य की अराधना का अधिकार दिया गया। हिंदू पक्ष अपने भगवान की पूजा का अधिकार चाहता था। उनके दर्शन करना चाहता था। केंद्र और यूपी सरकार किसी प्रकार का विवाद नहीं होने देना चाहती थी। ऐसे में आजाद देश में पहली बार मेरे राम एक बार फिर कोर्ट पहुंचे। रामलला विराजमान की ओर से 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज, फैजाबाद कोर्ट में अपील दायर की। याचिका में भगवान राम की पूजा की इजाजत मांगी गई। करीब 11 माह बाद 5 दिसंबर 1950 को महंत रामचंद्र दास ने मस्जिद में हिंदुओं की ओर से पूजा जारी रखने की याचिका दायर की। इसी दौरान पहली बार बाबरी मस्जिद को ढांचा कहकर संबोधित किया गया। 3 मार्च 1951 को गोपाल विशारद केस में कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को पूजा- अर्चना में बाधा न डालने की हिदायत दी। इसी प्रकार का आदेश महंत दास की याचिका पर भी दिया गया।

धर्मो रक्षति रक्षित: यानी जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, सूत्र वाक्य के साथ एक संगठन अस्तित्व में आया। इसका नाम रखा गया विश्व हिंदू परिषद। हिंदुत्व की विचारधारा के साथ इस संगठन ने अपना विस्तार शुरू किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुसांगिक इकाई के तौर पर इसकी पहचान बनी। बाद में विश्व हिंदू परिषद ने अपनी पहचान अलग संगठन के तौर पर बनाई। वर्ष 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई। इसके संस्थापकों में स्वामी चिन्मयानंद, एसएस आपटे, मास्टर तारा सिंह शामिल थे। 21 मई 1964 में मुंबई के संदीपनी साधनाशाला में वीएचपी का पहला सम्मेलन हुआ।

आरएसएस सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने यह बैठक बुलाई थी। सम्मेलन में हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के प्रतिनिधियों की मौजूदगी थी। गोलवलकर ने इस सम्मेलन में सभी मतों के लोगों को एकजुट होने की बात ही। हिंदू को सभी धर्मों से ऊपर करार दिया। इसक हिंदुस्तानियों के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द से जोड़ा। वर्ष 1966 में प्रयाग के कुंभ मेले में विश्व सम्मेलन के साथ इसका स्वरूप सामने आया। इस गैर राजनीतिक संगठन का मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज को मजबूत करना था। राम मंदिर का मुद्दा जब गरमाने लगा तो वीएचपी ने इसे टेकओवर किया। इसके बाद से यह संगठन आज तक राम मंदिर से जुड़ा हुआ है।

क्या लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तैयारी हो चुकी है तेज?

वर्तमान में लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तैयारी तेज हो चुकी है! आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने तैयारियां तेज कर दी हैं। जमीन पर पकड़ मजबूत बनाने और जमीन पर चुनावी स्थितियां, संभावनाएं व राजनीतिक समीकरण को जानने-समझने के लिए पिछले दिनों कांग्रेस ने देश की सभी लोकसभा सीटों के लिए जो कॉडिनेटर्स बनाए थे, उनके साथ गुरुवार को कांग्रेस ऑफिस में शीर्ष नेतृत्व ने एक बैठक की। कॉडिनेटर्स की नियुक्ति के बाद यह पहली बैठक थीं। गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे व संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल ने इस बैठक की अगुवाई की। पहली बैठक में तेलंगाना, कर्नाटक, पुडुचेरी, लक्षद्वीप, तमिलनाडु, ओडिशा के समन्वयक मौजूद थे। खरगे व वेणुगोपाल के अलावा इन राज्यों के प्रभारी भी मौजूद थे। इनमें रणदीप सुरजेवाला, दीपा दास मुंशी, अजय कुमार जैसे लोग शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव और भारत न्याय यात्रा को लेकर दिए गए तमाम तरह के निर्देश दिए। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा इन सभी से भी से अपने अपने इलाके में जुटने के लिए कहा गया। ये तमाम कॉर्डिनेटर्स केंद्रीय नेतृत्व और जिला इकाई के बीच समन्वय के तौर पर काम करेंगे। इन लोगों को बताया गया कि इस दौरान वॉर रूम कैसे काम करेगा, कैसे समन्वय करना है। उल्लेखनीय है कि यह तमाम समन्वय हर सीट पर इस तरह से काम करेंगे कि उस सीट पर पार्टी की स्थिति, संभावनाएं क्या हैं? अगर उस सीट पर पार्टी का प्रत्याशी है तो उसके लिए माहौल बनाना या फिर अगर गठबंधन का उम्मीदवार है तो उस दल के साथ कॉर्डिनेशन करना भी इन्हीं की जिम्मेदारी रहेगी। इनका काम चुनाव की शुरुआत से लेकर चुनाव प्रचार व वोटिंग तक रहेगा। उल्लेखनीय है कि ये लोग पार्टी के अलावा गठबंधन को भी फीडबैक देंगे।

वहीं दूसरी ओर इन समन्वयकों से कहा गया कि यह अपने अपने इलाकों में राहुल गांधी नीत भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना सुनिश्चित करें। यात्रा के उद्देश्य, सोच व संदेश तक जमीन तक लोगों के बीच ले जाएं। शुक्रवार को सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस की गठबंधन के घटक दलों के साथ भी मीटिंग होनी है। इनमें एसपी व आम आदमी पार्टी के साथ बैठक होनी है। यूपी को लेकर कांग्रेस की गठबंधन समिति की एसपी नेताओं के साथ मुलाकात होनी है। वहीं आप के साथ दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों पर चर्चा होनी है।

बता दे कि कांग्रेस में गुरुवार को अहम बैठकें होंगी। इसमें राहुल गांधी की अगुआई में निकलने वाली भारत न्याय यात्रा के रूट के बारे में संबंधित राज्यों के नेताओं से चर्चा होगी। आगामी आम चुनावों को लेकर राज्यों के साथ मंथन किया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ बैठकों को दौर कांग्रेस ऑफिस में सुबह 11 बजे से शुरू होगा। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे, संगठन महासचिव के. सी. वेणुगोपाल, राज्यों के प्रभारी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधायक दल के नेता भाग लेंगे। कांग्रेस की मैनिफेस्टो कमिटी की बैठक भी होगी, जिसके अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम हैं। गुरुवार को यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेताओं की बैठक में यात्रा के रूट को अंतिम रूप दिया जाएगा। पार्टी के एक अहम सूत्र के मुताबिक, 8 जनवरी के रूट की जानकारी साझा करने के साथ ही लोगो और टैगलाइन भी जारी की जाएगी। 12 जनवरी को यात्रा का थीम सॉन्ग लॉन्च होगा, जो हिंदी और अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में भी होगा। बैठक में तय किया जाएगा कि यात्रा किस राज्य में कितने जिलों या शहरों से गुजरेगी। कहां-कहां रैली या सभाएं होंगी, किस जगह पर पैदल मार्च होगा। यह यात्रा लगभग 55 दिन की होगी, जिसमें रोज लगभग 120 किमी की दूरी तय की जाएगी। लगभग रोज एक बड़ी सभा होगी और हर दिन लगभग पांच से सात किमी पैदल यात्रा चलेगी।

दूसरी अहम मीटिंग आगामी चुनाव को लेकर होनी है। इसमें प्रमुख चर्चा अलग-अलग राज्यों में गठबंधन के घटक दलों के साथ सीट शेयरिंग को लेकर चर्चा होनी है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा बनाई गई गठबंधन समिति ने पिछले दिनों विभिन्न राज्यों के प्रदेश नेतृत्व के साथ राज्यवार तालमेल और सीटों के बंटवारे को लेकर एक दौर की चर्चा कर हर राज्य में तालमेल की गुंजाइश और प्रदेश इकाई उसके बारे में क्या सोच रही है, इसे लेकर एक फीडबैक आधारित अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंपी। कांग्रेस पर इंडिया गठबंधन के घटक दलों की ओर से तालमेल का काम जल्द से जल्द निपटा लिए जाने का दबाव बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि गुरुवार की मीटिंग में सीटों के तालमेल के अलावा, राज्यों में पार्टी की चुनाव की तैयारियों जैसी चीजों पर फोकस रहेगा। सूत्रों के मुताबिक, गठबंधन समिति ने विभिन्न इकाइयों के साथ मंथन कर राज्यवार अपनी रिपोर्ट पेश की है। बताया जाता है कि इस कवायद के बाद कांग्रेस नेतृत्व सीट बंटवारे पर सहयोगी दलों से बात करेगा। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने तय किया है कि 2019 के चुनाव में देश में दूसरे नंबर पर रहने वाली सीटों पर किसी के साथ तालमेल नहीं होगा। यहां पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। गठबंधन को लेकर यूपी, पंजाब, दिल्ली, वेस्ट बंगाल जैसे राज्यों में तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।

यूपी में कांग्रेस अपने लिए 21 सीटें मांग रही है। यहां कांग्रेस एसपी, आरएलडी जैसे दलों के साथ गठबंधन चाह रही है। बताया जाता है कि एसपी कांग्रेस को दस सीटें देने के लिए तैयार है। चर्चा यह भी है कि 15 सीटों पर बात बन सकती है। कांग्रेस के एक अहम सूत्र के मुताबिक, कांग्रेस अमेठी, रायबरेली, बरेली, फूलपुर, सहारनपुर, झांसी, कुशीनगर, बहराइच, महाराजगंज, फर्रुखाबाद, बाराबंकी, शाहजहांपुर जैसी सीटें प्रमुख हैं। इन सीटों के पीछे कांग्रेस की सोच साल 2009 में जीती हुई सीटें हैं। बंगाल में टीएमसी के तेवर को देखते हुए तालमेल को लेकर चुनौती बनी हुई है। बताया जाता है कि कांग्रेस अपने लिए झारखंड में सात सीटें, महाराष्ट्र 18, बंगाल में चार, दिल्ली में तीन, केरल में 16, तमिलनाडु में 12 से 14 सीटें चाह रही है।