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क्या लोकसभा चुनाव से पहले CAA लाना सही है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव से पहले CAA लाना सही है या नहीं! नागरिकता संशोधन कानून लागू किए जाने के बाद पूछा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से ऐन पहले इसे लागू करने की क्या जरूरत थी? यह मजेदार सवाल है। अगर CAA को लागू नहीं किया जाता तो यही विरोधी इसे लेकर केंद्र सरकार की आलोचना करते। वहीं, BJP समर्थकों के मन में प्रश्न यह होगा कि इसे लागू करने में इतना समय क्यों लगा? CAA लागू होने में जो देरी हुई, उसकी कई वजहें हैं। पहली बात तो यह कि कानून पारित होने के बाद ही देश कोरोना महामारी के संकट में फंस गया। तब सरकार की प्राथमिकताएं बदल गईं। दूसरे, इसके विरुद्ध प्रदर्शन शुरू होने से भी दिक्कत आई। तीसरे, विदेशी एजेंसियों और संस्थाओं की भी इसमें भूमिका रही। चौथे, सुप्रीम कोर्ट में CAA के खिलाफ जो याचिकाएं दायर हुईं, उनसे निपटने और भविष्य में कोई और बाधा न आए, इसकी व्यवस्था करने में समय लगना ही था।यह कानून उन हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों और ईसाईयों के लिए है, जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आने को विवश हुए। इस कानून के तहत केवल इन लोगों के लिए नागरिकता लेना आसान बनाया गया है।

 नागरिक कानून 1955 में नागरिकता की खातिर आवेदन के लिए किसी विदेशी का 11 साल तक रहना जरूरी है। वहीं, CAA के दायरे में आने वालों के लिए अवधि 5 वर्ष रखी गई है। दूसरी बात यह कि CAA लागू होने के बाद किसी की नागरिकता खत्म नहीं होगी। बेशक, जिन पीड़ित समुदायों का जिक्र ऊपर किया गया है, CAA लागू होने से उनसे जुड़े और लोग भारत आना चाहेंगे। वहीं, जनवरी 2019 की संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश में वर्षों से ऐसे 31, 313 लोग रह रहे हैं। विपक्षी दल CAA का विरोध कर रहे हैं, लेकिन इस मामले में उनका रुख दोहरा रहा है। कैसे, आइए इसे समझते हैं। राज्यसभा में 18 दिसंबर, 2003 को मनमोहन सिंह ने कहा था, ‘विभाजन के बाद बांग्लादेश जैसे देशों से बहुत सारे लोग भारत आए थे। हमारा रवैया इनके प्रति और उदार होना चाहिए।’

4 फरवरी, 2012 को CPM महाधिवेशन ने बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्धों को नागरिकता देने का प्रस्ताव पारित किया था। 3 जून, 2012 को पार्टी नेता प्रकाश करात ने UPA सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर बांग्लादेश से आए लोगों को नागरिकता देने की मांग की थी। उन्होंने मानवाधिकार के आधार पर ऐसा करने की अपील की थी। वहीं, ममता बनर्जी ने 4 अगस्त , 2005 को लोकसभा में मामला उठाते हुए बांग्लादेश से आए हिंदुओं को नागरिकता देने की मांग की थी। यह मुद्दा आजादी के समय से ही चला आ रहा है। महात्मा गांधी ने 26 सितंबर,1947 को प्रार्थना सभा में कहा था कि हिंदू और सिख वहां नहीं रहना चाहते तो वे भारत आएं। भारत का दायित्व है कि उनके लिए यहां रोजगार सहित अन्य व्यवस्थाएं की जाएं।

डॉ. बाबा साहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज के 17वें वॉल्यूम के पृष्ठ संख्या 366 से 369 तक इस मामले में उनके विचार लिखे हैं।‌ वह लिखते हैं, भारत में अनुसूचित जातियों के लिए निराशाजनक संभावनाओं के बावजूद मैं पाकिस्तान में फंसे सभी से कहना चाहूंगा कि आप भारत आइए… जिन्हें हिंसा के जोर से इस्लाम मानने को मजबूर किया गया है, मैं उनसे कहता हूं कि आप हमारे समुदाय से बाहर नहीं हुए हैं। मैं वायदा करता हूं कि यदि वे वापस आते हैं तो उन्हें अपने समुदाय में शामिल करेंगे और वे उसी तरह हमारे भाई माने जाएंगे, जैसे धर्म परिवर्तन के पहले माने जाते थे।’ भारत के विभाजन के बाद उम्मीद की गई थी कि ये देश अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देंगे। तब पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या 22% के करीब थी, जो आज 2% भी नहीं है। बांग्लादेश में तब 28% हिंदू आबादी थी, जो आज 8% रह गई है। हालांकि, उस वक्त बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था। अफगानिस्तान में जो अप्लसंख्यक थे, या तो उनका धर्म परिवर्तन करा दिया गया या वे मार दिए गए या वहां से निकल भागे।

इसलिए आज भारत में मुसलमानों की संख्या तब के 9.7% से बढ़कर 15% के आसपास हो गई। सवाल यह है कि पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को वहां की मजहबी कट्टरपंथी व्यवस्था के हवाले छोड़ दिया जाए? असल में, CAA से उत्पीड़ित शरणार्थियों को सम्मानजनक जिंदगी का अवसर मिलेगा। उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषायी पहचान की रक्षा होगी। असम में तो BJP को ध्रुवीकरण का सियासी लाभ मिला है, लेकिन पश्चिम बंगाल में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। इसलिए नवंबर, 2023 से जनवरी, 2024 के बीच BJP ने विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों को याद दिलाना शुरू किया कि वह लोकसभा चुनाव में CAA को मुद्दा बनाएगी। फिर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र ने बंगाल के मतुआ बहुल आबादी वाले उत्तरी 24 परगना जिले में कहा कि CAA को लागू करने के लिए नियम का अंतिम मसौदा 30 मार्च तक तैयार हो जाएगा। इसके बाद केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने 28-29 जनवरी को मतुआ समुदाय के बीच पहुंचकर कहा कि CAA सात दिनों में लागू हो जाएगा।

CAA के तहत मात्र तीन पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर 31 दिसंबर, 2014 तक भारत आए गैर-मुस्लिम समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। पड़ोसी बौद्ध देश म्यांमार, श्रीलंका से आए किसी भी समुदाय के लिए CAA में प्रावधान नहीं किया गया है। चार वर्ष बाद आम चुनाव से पहले इसकी अधिसूचना इसलिए लागू की गई क्योंकि BJP को इससे ध्रुवीकरण की गुंजाइश दिख रही है। 1955 में बने नागरिकता कानून में यह छठा संशोधन है और सुप्रीम कोर्ट की सीधी मॉनिटरिंग के बावजूद असम का विवाद नहीं सुलझा है। CAA, 2019 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इन विवादों के कारण केंद्र सरकार को CAA नियम अधिसूचित करने में चार साल से ज्यादा लग गए। इस पर विचार कर रही संसदीय समिति से केंद्र ने 9 बार विस्तार मांगा। संवैधानिक प्रावधान के अनुसार CAA लागू होने के 6 महीने के अंदर केंद्र को नियम बनाने हैं। ऐसा नहीं कर पाने पर अवधि का विस्तार मांगना होता है, जो एक बार में 6 महीने से ज्यादा का नहीं मिलता।

CAA में प्रावधान तो अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी है। मगर यह मामला हिंदू-मुस्लिम तनाव का ही बना। कांग्रेस समेत सभी गैर-BJP दल इसे विभाजनकारी और मतों के ध्रुवीकरण की चाल बता रहे हैं। पूर्वोत्तर में BJP सरकार पर केंद्र की नजर है। इसलिए असम, मेघालय और त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों व अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड, मणिपुर में ILP इनर लाइन परमिट के अंतर्गत वाले क्षेत्रों को CAA से बाहर रखा गया है। नागरिकता का आवेदन करने वालों को पहले के 11 साल के बजाए 6 साल प्रवास का प्रमाण देना होगा। चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट से झटका मिलने के बाद केंद्र सरकार ने चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले नागरिकता आवेदन का पोर्टल लॉन्च किया, ताकि आचारसंहिता बाधक न बने। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने 12 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर CAA अधिसूचना व पोर्टल लॉन्च पर रोक की मांग कर डाली। अब देखने वाली बात है कि अदालत और सरकार इस पर चुनाव से पहले आमने सामने होती हैं, या चुनाव के बाद।

क्या भारत में हो सकता है एक देश, एक चुनाव? जानिए प्रक्रिया?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एक देश, एक चुनाव भारत में हो सकता है या नहीं! लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई वाली समिति की सिफारिश सामने आ गई है। समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। समिति ने पहले चरण के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की, फिर 100 दिनों के भीतर एक साथ स्थानीय निकाय चुनाव कराने की सिफारिश की है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी गई 18 हजार से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि एक साथ चुनाव कराए जाने से विकास प्रक्रिया और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा मिलेगा, लोकतांत्रिक परंपरा की नींव गहरी होगी और देश की आकांक्षाओं को साकार करने में मदद मिलेगी। इसका सत्ता पक्ष ने स्वागत किया तो विपक्ष के कई नेताओं ने विरोधी सुर में बात की। आइए जानते हैं कि आखिर समिति ने रिपोर्ट में ‘एक देश, एक चुनाव’ की जरूरत को लेकर क्या दलीलें दी हैं और यह व्यवस्था लागू करने की क्या रूपरेखा बताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘बार-बार चुनाव, अनिश्चितता पैदा करते हैं, सरकारी मशीनरी को धीमा कर देते हैं।’ इसमें कहा गया है, ‘जब बार-बार चुनाव होते हैं तो अक्सर पांच साल का आधा समय चुनाव प्रचार में बीत जाता है।’ इसके खिलाफ तर्क नहीं दिया जा सकता। साथ ही, चूंकि लगभग हर पार्टी के पास केवल कुछ ही स्टार प्रचारक होते हैं, इसलिए एक साथ चुनाव उन्हें हमेशा चुनाव प्रचार मोड में रहने से बचाते हैं। एक साथ चुनाव से सरकारों को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक काम करने का मौका मिलेगा।

राज्य विधानसभाओं की अवधि और नगर पालिकाओं और पंचायतों की अवधि को बदलने के लिए दो प्रमुख संवैधानिक संशोधन सुझाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले के लिए केवल संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता है, लेकिन दूसरे के लिए राज्यों के अनुमोदन की भी आवश्यकता होगी। पैनल रिपोर्ट के अनुसार, 2 चरणों मेंचरण 1: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराए जाएंगे। इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी, लेकिन राज्यों द्वारा अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी।चरण 2: लोकसभा और विधानसभा चुनावों के 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव कराए जाएंगे। इसके लिए संशोधन के लिए कम-से-कम आधे राज्यों द्वारा अनुमोदन की आवश्यकता होगी।

राष्ट्रपति एक अधिसूचना के जरिए आम चुनाव के बाद लोकसभा के पहले सत्र की तिथि पर एक साथ चुनाव लागू करेंगे। यह ‘अपॉइटेंड डेट’ बन जाती है। इस तिथि के बाद जिन विधानसभाओं के लिए चुनाव होते हैं, उनके कार्यकाल केवल अगले लोकसभा चुनावों जो एक साथ होंगे तक होंगे। यदि कोई राज्य सरकार अपने 5 साल के कार्यकाल के बीच में गिर जाती है, तो दो स्थितियां होंगी। पहला, नए चुनाव के बिना नई सरकार बनाई जा सकती है। उस सरकार का कार्यकाल तब समाप्त होगा जब अगला चुनाव होगा। दूसरा, कोई सरकार नहीं बनाई जा सकती। इसका मतलब है कि या तो विधानसभा का चुनाव होगा या राष्ट्रपति शासन लागू होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्या होना चाहिए, यह तय करना चुनाव आयोग पर निर्भर है। यहां तक कि एक नवनिर्वाचित सरकार का कार्यकाल भी ‘एक देश, एक चुनाव’ के होने पर समाप्त हो जाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘समिति ने पाया कि राज्य चुनाव आयोग ज्यादातर मतदाता सूची तैयार करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त से जानकारियां लेते हैं, कभी-कभी, इस दोहराव से त्रुटियां भी सामने आती हैं।’ चुनाव आयोग के पास डिजिटलाइजेशन प्रॉजेक्ट्स के तहत पहले से ही एक एकीकृत मतदाता सूची UNPER है।सरकार के सभी स्तरों – लोकसभा, राज्यों और नगर पालिकाओं/पंचायतों – के लिए यूएनपीईआर की बहुत जरूरत है। अधिकांश राज्यों में पंचायत चुनावों के लिए अलग-अलग सूचियां हैं। जीडीपी ग्रोथ, सरकारी घाटा, महंगाई, प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के नामांकन जैसे प्रमुख आंकड़ों पर चुनावों के असर के आंकड़े आते रहते हैं। एक देश एक चुनाव के बाद इसमें क्या बदलाव होगा, एक्सपर्ट्स इसका विश्लेषण करेंगे। लेकिन अच्छी बात यह है कि समिति ने चुनावों के बारे में सोचने और बात करने नए तरीके सुझा दिए हैं। इससे अर्थशास्त्रियों के लिए नए और ज्यादा उपयोगी शोध करने का अवसर मिला है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साथ चुनाव ‘मतदाताओं की परेशानी’ भी कम करेंगे और मतदान में सुधार करेंगे। रिपोर्ट में दलील दी गई है कि एक देश, एक चुनाव अधिक मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करेगा क्योंकि उन्हें पता होगा कि हर पांच साल में उन्हें सिर्फ दो बार ही वोटिंग का मौका मिलने वाला है। इससे वोटिंग पर्सेंटेज में काफी इजाफा होगा। रिपोर्ट में उन राज्यों के चुनावों के आंकड़े भी साझा किए जहां विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ हुए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रोजगार या किसी अन्य कारण से अपने गृहनगर से दूर रहने वाले अक्सर वोट देने के लिए घर नहीं जा सकते हैं। समिति का कहना है कि अगर प्रवासी हर बार वोट डालने के लिए घर जाते हैं तो मौजूदा व्यवस्था में उन्हें बार-बार इसकी नौबत आती है। एक साथ चुनाव की व्यवस्था हो जाने पर प्रवासियों को पांच वर्ष में एक बार घर जाने की जरूरत पड़ेगी जो उनके लिए एक त्योहार सा हो जाएगा। प्रॉडक्टिविटी के लिहाज से यह बेहतर स्थिति है। लेकिन इसमें एक लोचा है। रिपोर्ट में सुझाए गए एक साथ चुनाव कार्यक्रम में दूसरे चरण का चुनाव नगर पालिकाएं/पंचायतें, पहले चरण के चुनाव लोकसभा, राज्य विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर होने चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि कौन सा प्रवासी घर में रुककर स्थानीय चुनावों के लिए तीन महीने तक इंतजार करेगा या फिर वो 100 दिन के अंदर दोबारा घर आएगा।

आखिर MIRV टेक्नॉलजी वाली अग्नि V की क्या है खासियत?

आज हम आपको बताएंगे कि MIRV टेक्नॉलजी वाली अग्नि V की क्या खासियत है! भारत ने अग्नि 5 मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अग्नि V मल्टि इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री वीइकल MIRV टेक्नॉलजी से लैस है। अग्नि 5 मिसाइल परीक्षण के दौरान एक साथ कई लक्ष्यों को भेदने की उम्मीद पर खरा उतरी। इसके साथ ही भारत दुनिया के चुनिंदा देशों की एलीट लिस्ट में शामिल हो गया है। 5 से 6 हजार किमी की मारक क्षमता वाली मिसाइल अग्नि V के फ्लाइट टेस्ट खासकर चीन के बेरुखी भरे रवैये के मद्देनजर अहम माना जा रहा है। MIRV यानी मर्व तकनीक पर भारत में लंबे समय से काम चल रहा था। मर्व तकनीक क्या है और यह मिसाइलों को महाबली कैसे बना देती है, इस बारे में आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं! भारत ने अक्टूबर 2021 में अग्नि V का पहला यूजर टेस्ट किया, जो इसके मिसाइल विकास कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। भारतीय सेना के सामरिक बल कमान स्ट्रैटिजिक फोर्स कमांड यानी SFC ने ओडिशा तट पर एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से यह परीक्षण किया था। भारत ने 27 अक्टूबर, 2021 को अग्नि-V इंटरकॉन्टिनेंटल-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का पहला यूजर टेस्ट किया। यह परीक्षण महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने सशस्त्र बलों में इस सिस्टम को जल्द शामिल करने रास्ता साफ किया। कोविड-19 महामारी के कारण टेस्ट फ्लाइट में देरी हुई थी, जिसने मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री वीइकल तकनीक के साथ मिसाइल के परीक्षण को भी प्रभावित किया था।

अग्नि-V रक्षा को अनुसंधान एवं विकास संगठन DRDO और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड को विकसित किया है जो तीन चरणों की ठोस ईंधन वाली मिसाइल है। इसकी रेंज में पूरे एशिया, यूरोप और यहां तक कि अफ्रीका के कुछ हिस्से आ जाते हैं। मिसाइल 1.5 टन का पेलोड ले जा सकती है और सटीक निशाने के लिए एडवांस नेविगेशन सिस्टम से लैस है। अग्नि-V मिसाइल में MIRV तकनीक की शुरुआत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मर्व तकनीक एक मिसाइल को कई परमाणु वॉरहेड ले जाने की अनुमति देती है, जिनमें से प्रत्येक को एक अलग लक्ष्य पर निर्देशित किया जा सकता है। यह मिसाइल की प्रभावशीलता को बढ़ाता है और युद्ध की तैयारी के लिए आवश्यक मिसाइलों की संख्या को कम करता है। मर्व टेक्नॉलजी के साथ अग्नि-V का सफल यूजर टेस्ट का मतलब है कि देश के सशस्त्र बलों को जल्द ही यह ताकतवर वेपन सिस्टम मिलने वाला है।

मिसाइल एक उड़ते हुए बम की तरह है। यह एक ऐसा हथियार है जिसे दूर से एक खास लक्ष्य को भेदने के लिए निर्देशित किया जा सकता है। यह अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले हवा में, समुद्र के नीचे या अंतरिक्ष में यात्रा कर सकता है। यह मिसाइल का दिल है, जो इसे हवा या अंतरिक्ष में ले जाने की शक्ति प्रदान करता है। नेविगेशन सिस्टम :- यह मिसाइल का दिमाग है, जो इसे यह जानने में मदद करता है कि वह कहां है और उसे कहां जाना है। यह अपना रास्ता खोजने के लिए GPS आपके फोन के मैप ऐप की तरह या अन्य सिस्टम का उपयोग कर सकता है। वॉरहेड :- यह मिसाइल का वह हिस्सा है जो नुकसान पहुंचाता है। यह विस्फोटक, रासायनिक या परमाणु भी हो सकता है। एयरफ्रेम :- यह मिसाइल का शरीर है, जो अन्य सभी भागों को एक साथ रखता है और इसे हवा में आसानी से चलने में मदद करता है।

मिसाइलों का उपयोग रक्षा के लिए किया जा सकता है, जैसे दुश्मन के विमानों को मार गिराना, या हमले के लिए, जैसे दूर से किसी लक्ष्य पर हमला करना। उनका उपयोग सेना द्वारा किया जाता है, लेकिन उनका उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है जैसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करना। MIRV का मतलब मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल रीएंट्री वीइकल है। यह एक प्रकार की मिसाइल तकनीक है जो एक मिसाइल को कई वॉरहेड ले जाने की अनुमति देती है, जिनमें से प्रत्येक को एक अलग लक्ष्य पर निर्देशित किया जा सकता है।

एक बस मिसाइल की कल्पना करें जिसमें कई यात्री वॉरहेड हैं। जिस तरह एक बस यात्रियों को अलग-अलग स्टॉप पर उतार सकती है, उसी तरह एक MIRV अपने वारहेड को अलग-अलग लक्ष्यों पर हमला करने के लिए छोड़ सकता है।एक सामान्य मिसाइल की कल्पना करें: यह सिंगल एरो डिलिवरी सिस्टम है। यह एक वॉरहेड को एक लक्ष्य तक ले जाती है।एक MIRV मिसाइल एक मल्टि-एरो डिलीवरी वैन की तरह है, यह कई वॉरहेड ले जाती है, एक-एक छोटे डिब्बे में जिसे री-एंट्री वीइकल कहा जाता है। ये RV अपने खुद के गाइडेंस सिस्टम के साथ अलग-अलग तीर की तरह काम करते हैं। प्रक्षेपण के बाद MIRV अपने बाहरी आवरण को छोड़ देता है, RV को उनके वॉरहेड के साथ छोड़ता है। फिर प्रत्येक RV स्वतंत्र रूप से एक अलग लक्ष्य को भेदने के लिए युद्धाभ्यास करता है।

मर्व टेक्नॉलजी से युक्त मिसाइल में असली वॉरहेड के साथ-साथ कई नकली हथियार भी होते हैं। दुश्मन के रेडार असली और नकली वॉरहेड में फर्क नहीं कर पाते हैं। इसलिए वो धोखा खा जाते हैं और मिसाइल में लगे असली वॉरहेड अपना काम कर जाते हैं। इन नकली हथियारों को अंग्रेजी में डिकॉय कहा जाता है। कुल मिलाकर, मर्व तकनीक में डिकॉय एक प्रकार का नकली हथियार होता है जो दुश्मन की बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली को धोखा देने के लिए उपयोग किया जाता है। डिकॉय को असली मर्व वॉरहेड के समान दिखने और रडार पर समान संकेत देने के लिए डिजाइन किया जाता है, जिससे रेडार को यह निर्धारित करना मुश्किल हो जाता है कि कौन से लक्ष्य वास्तविक हैं और कौन से नहीं। भारत को अपनी अग्नि-V और भविष्य की मिसाइलों के लिए MIRV तकनीक विकसित करने की सूचना है।MIRV तकनीक का भारतीय संस्करण भारत की विशिष्ट रणनीतिक आवश्यकताओं और तकनीकी क्षमताओं को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है। जबकि मर्व की मूल अवधारणा विभिन्न देशों में समान है, इंप्लेमेंटेशन डिटेल्स जैसे वॉरहेड की संख्या, रेंज और गाइडेंस सिस्टम अलग हो सकते हैं। भारत की मर्व तकनीक को विशेष रूप से अपने दोहरे हमले और दुश्मन के मिसाइल अटैक को रोकने की क्षमता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है, विशेष रूप से अपने क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण के संदर्भ में।

क्या फाइटर मूवी ने तोड़ दिए हैं सारे रिकॉर्ड्स?

वर्तमान में फाइटर मूवी ने सारे रिकॉर्ड्स तोड़ दिए हैं! साल 2024 की पहली तिमाही पूरी होने को है। बावजूद इसके अभी तक सिर्फ एक फिल्म ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण की ‘फाइटर’ ही 100 करोड़ क्लब में एंट्री कर पाई है। इस फिल्म ने अभी तक 212.62 करोड़ रुपए की कमाई की है। जैसे-तैसे यह फिल्म 46 दिनों में 200 करोड़ के क्लब में एंट्री कर गई है। वहीं, बात अगर इस साल रिलीज हुई बड़े सितारों की दूसरी फिल्मों की करें, तो अभी तक कोई भी दूसरी फिल्म 100 करोड़ क्लब में नहीं पहुंच पाई है।हालांकि इस दौरान रिलीज हुईं चार फिल्मों ने 50 से 75 करोड़ रुपए के करीब कमाई जरूर की है। इनमें फरवरी के महीने में रिलीज हुई शाहिद कपूर और कृति सेनन की फिल्म ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ ने 35 दिन में 84.35 करोड़ की कमाई की। वहीं अजय देवगन की हालिया रिलीज Shaitaan ने अब तक सात दिन में 79.75 करोड़ रुपए की कमाई की है।फिल्मों की कमाई का आंकड़ा घटते देखकर आजकल जानकार 50 करोड़ क्लब को ही नया 100 करोड़ क्लब मानने की बात कहने लगे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह आजकल दर्शकों ने फिल्मों को सिरे से नकारना शुरू कर दिया है। उसे देखते हुए अगर 50 करोड़ क्लब को ही नया 100 करोड़ क्लब मान लिया जाए, तो कुछ गलत नहीं होगा। दरअसल, पहले किसी भी बड़े सितारे की फिल्म की रिलीज को 100 करोड़ क्लब में एंट्री की गारंटी माना जाता था। लेकिन आजकल दर्शकों ने इस ट्रेंड को भी पूरी तरह पलट दिया है। अब अगर उन्हें किसी बड़े सितारे की फिल्म भी पसंद नहीं आती, तो उसे भी कमाई के लाले पड़े जाते हैं। बहरहाल, फिलहाल हर किसी को इसी बात का इंतजार है कि बीते साल जहां 14 फिल्मों ने 100 करोड़ में एंट्री की थी। अबकी बार यह आंकड़ा कहां तक पहुंचने वाला है। इससे पहले रिलीज हुई यामी गौतम की फिल्म Article 370 ने भी अब तक 21 दिन में 69.05 करोड़ का कारोबार किया है। वहीं जनवरी के महीने में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘हनुमान’ के हिंदी डब वर्जन ने भी 57 करोड़ रुपए की कमाई की। यानी कि इस साल अभी तक 100 करोड़ क्लब में सिर्फ एक फिल्म ने एंट्री मारी हो, लेकिन 50 करोड़ क्लब में 4 फिल्मों ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’, ‘शैतान’, ‘आर्टिकल 370’ और ‘हनुमान’ की एंट्री हो चुकी है।

बॉक्स ऑफिस के इस नए ट्रेंड के बारे में बात करने पर फिल्मी दुनिया के जानकार कहते हैं कि कोविड के बाद दर्शकों की चॉइस काफी बदल गई है। अगर उन्हें कोई फिल्म पसंद आ रही है, तो उसे वो भरपूर प्यार दे रहे हैं, जिसकी बदौलत वो फिल्में 500 करोड़ क्लब में पहुंच रही हैं। वहीं अगर उन्हें कोई फिल्म पसंद नहीं आ रही, तो वह 100 करोड़ क्लब में भी नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में ऐसी फिल्मों की संख्या बढ़ गई है, जो कि 100 करोड़ क्लब में नहीं पहुंच पाई हैं। लेकिन उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई जरूर की।

फिल्मों की कमाई का आंकड़ा घटते देखकर आजकल जानकार 50 करोड़ क्लब को ही नया 100 करोड़ क्लब मानने की बात कहने लगे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह आजकल दर्शकों ने फिल्मों को सिरे से नकारना शुरू कर दिया है। उसे देखते हुए अगर 50 करोड़ क्लब को ही नया 100 करोड़ क्लब मान लिया जाए, तो कुछ गलत नहीं होगा। दरअसल, पहले किसी भी बड़े सितारे की फिल्म की रिलीज को 100 करोड़ क्लब में एंट्री की गारंटी माना जाता था। किसी को इसी बात का इंतजार है कि बीते साल जहां 14 फिल्मों ने 100 करोड़ में एंट्री की थी। अबकी बार यह आंकड़ा कहां तक पहुंचने वाला है। इससे पहले रिलीज हुई यामी गौतम की फिल्म Article 370 ने भी अब तक 21 दिन में 69.05 करोड़ का कारोबार किया है। वहीं जनवरी के महीने में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘हनुमान’ के हिंदी डब वर्जन ने भी 57 करोड़ रुपए की कमाई की।लेकिन आजकल दर्शकों ने इस ट्रेंड को भी पूरी तरह पलट दिया है। अब अगर उन्हें किसी बड़े सितारे की फिल्म भी पसंद नहीं आती, तो उसे भी कमाई के लाले पड़े जाते हैं।वहीं अगर उन्हें कोई फिल्म पसंद नहीं आ रही, तो वह 100 करोड़ क्लब में भी नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में ऐसी फिल्मों की संख्या बढ़ गई है, जो कि 100 करोड़ क्लब में नहीं पहुंच पाई हैं। लेकिन उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई जरूर की। बहरहाल, फिलहाल हर किसी को इसी बात का इंतजार है कि बीते साल जहां 14 फिल्मों ने 100 करोड़ में एंट्री की थी। अबकी बार यह आंकड़ा कहां तक पहुंचने वाला है।

आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबले कहते हैं, अल्पसंख्यकों की अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत है.

आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने कहा कि भारत के संविधान में ‘अल्पसंख्यक‘ की अवधारणा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नागपुर में आरएसएस की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिधि बैठक में होसबले को अगले तीन वर्षों के लिए दूसरी बार संघ का महासचिव चुना गया। उन्होंने जिम्मेदारी लेते हुए कहा, ”जब किसी को अल्पसंख्यक कहा जाता है तो इससे समाज में विभाजन पैदा होता है.”

नरेंद्र मोदी ने इस बार 370 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है क्योंकि लोकसभा में दो-तिहाई सीटें जीतने के बाद विपक्ष पहले ही बीजेपी नेताओं की टिप्पणियों को संविधान बदलने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर शिकायतें कर चुका है. आज होसबले ने कहा, ”संविधान में अल्पसंख्यकों के विचार पर पुनर्विचार करना जरूरी है. ये देश सबका है. लेकिन पिछले कुछ दशकों से कुछ समुदायों को अल्पसंख्यक कहने का चलन बढ़ गया है। संघ ने सदैव इस अल्पसंख्यक राजनीति का विरोध किया है।

क्या आरएसएस मुसलमानों, ईसाइयों से अल्पसंख्यक का दर्जा छीनकर संविधान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है? होसबले ने कहा, ”आमतौर पर मुसलमानों, ईसाइयों को अल्पसंख्यक कहा जाता है. सभी संघ प्रमुख उनके संपर्क में हैं. उस समुदाय से कई संघ कार्यकर्ता भी हैं. हम उनके साथ शोपीस की तरह व्यवहार नहीं करते। हम राष्ट्रीयता के आधार पर सभी को हिंदू मानते हैं। हम उन लोगों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं जो अपने धर्म के कारण इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।”

विरोधियों का आरोप है कि नागरिकता संशोधन कानून मुसलमानों को छोड़कर धर्म के आधार पर दूसरों को नागरिकता दे रहा है. अयोध्या में राम मंदिर के बाद इस बार काशी में ज्ञानबापी मस्जिद और मथुरा में ईदगा को लेकर हवा गर्म है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि आरएसएस महासचिव पद पर होसबले की वापसी से मोदी सरकार और बीजेपी के साथ संघ का समन्वय आसान हो जाएगा. उनके मुताबिक, इसी सहज समन्वय के कारण सरसंघचालक मोहन भागवत 2021 में मोदी के करीबी होसबेले को आरएसएस महासचिव के पद पर ले आए.

आज होसेबल ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का स्वागत किया। उनके मुताबिक सभी से चर्चा कर पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए. हालांकि, उनकी राय थी कि मथुरा-काशी में अयोध्या की तरह राम जन्मभूमि आंदोलन की जरूरत नहीं है. उनके मुताबिक विश्व हिंदू परिषद, संतों ने मांग उठाई है. लेकिन सभी बीमारियों का दावा एक जैसा नहीं होता. यह दावा करते हुए कि लोकसभा चुनाव में आरएसएस की कोई सीधी भूमिका नहीं होगी, होसबले ने कहा कि आरएसएस राष्ट्रवाद पर जनमत बनाने का काम करेगा। पिछले दस साल में मोदी सरकार के कामकाज पर उनकी टिप्पणी है, ”देश में विकास हुआ है. पूरी दुनिया इस सदी को भारत की सदी कह रही है। इस बार देश की जनता वोट करेगी.

होसेबल आज संदेशखाली से भी जुड़े हुए हैं. उनके मुताबिक महिलाओं पर इस तरह के अत्याचार से समाज में आक्रोश पैदा होता है. होसबले ने यह भी टिप्पणी की कि मणिपुर में हिंसा ने समाज में घाव पैदा किए हैं।

आरएसएस की शताब्दी वर्ष 2025 में शुरू होगी। होसबले ने कहा, इससे पहले उनका लक्ष्य देश के हर कोने में आरएसएस की शाखाएं फैलाने का है. आरएसएस का संगठन और प्रभाव दोनों बढ़ा। इस ‘संगठन के जाल’ और ‘नेटवर्क’ का उपयोग करते हुए, आरएसएस ने राम मंडी के उद्घाटन से पहले केवल 15 दिनों में 20 करोड़ घरों में ‘अक्षत चाल’ पहुंचाई। चुनावी बांड पर बहस में होसबेले ने आज कहा, इसका परीक्षण किया जा रहा है. यदि किसी सुधार की आवश्यकता हो तो किया जा सकता है। आरएसएस अगले साल अपनी सौवीं सालगिरह पूरी करेगा. इससे पहले, उन्होंने टीम के प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रशिक्षण सामग्री को बदलने का फैसला किया। संगठन की ओर से दावा किया गया है कि अल्पसंख्यक भी धीरे-धीरे उनके साथ जुड़ रहे हैं.

आरएसएस की तीन दिवसीय वार्षिक अखिल भारतीय प्रतिनिधि बैठक आज से नागपुर में शुरू हो गई है। यह अगले रविवार तक जारी रहेगा. आज चर्चा की शुरुआत में प्रेस कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ नेता मनमोहन वैद्य ने कहा, ‘शाखा में हर दिन नए दाखिलों की संख्या बढ़ रही है. हर साल करीब एक लाख लोग शाखा से जुड़ने के लिए आवेदन करते हैं। यहां तक ​​कि जिन्हें समाज में अल्पसंख्यक कहा जाता है वे भी इसमें शामिल हो रहे हैं.”

यह बताते हुए कि अल्पसंख्यक शाखाओं में रुचि क्यों दिखा रहे हैं, वैद्य कहते हैं, “भारत में 1.4 अरब लोग हिंदू हैं। क्योंकि उनके सभी पूर्वज हिंदू थे. धीरे-धीरे अल्पसंख्यक समुदाय के मन में आरएसएस को लेकर गलतफहमियां टूट रही हैं। परिणामस्वरूप, वे करीब आ रहे हैं।” अगले साल आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष पूरा करेगा. इससे पहले संघ ने देश में शाखाओं की संख्या 100,000 तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है.

छह साल बाद एक बार फिर आरएसएस की वार्षिक बैठक नागपुर में हो रही है. यहां उनके विभिन्न शाखा संगठनों के 1529 प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है. बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के भी आने की उम्मीद है. सम्मेलन में संघ राम मंदिर निर्माण पर प्रस्ताव पारित करेगा. संदेशखाली, मणिपुर, हाल ही में भड़के किसानों के विरोध प्रदर्शन जैसे अखिल भारतीय मुद्दों पर भी चर्चा होनी है। लोकसभा चुनाव की तारीख का ऐलान कल होगा. मनमोहन बैद्य ने कहा, ”आरएसएस कार्यकर्ताओं से बड़ी संख्या में मतदान करने का अनुरोध किया जाएगा.”

बीमा को लेकर केंद्र सरकार का बैंकों को संदेश.

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कर्ज लेने गया था. लेकिन बीमा योजना को मजबूर किया गया!— ग्राहक लंबे समय से विभिन्न बैंकों के बारे में शिकायत कर रहे हैं। कई लोग इस बात से नाराज़ हैं कि इसे कभी ग़लतबयानी करके, कभी ज़बरदस्ती थोपा जाता है. कुछ लोगों का दावा है कि कोविड के बाद यह प्रवृत्ति बढ़ी है। इस बार वित्त मंत्रालय के तहत वित्तीय सेवा विभाग इस मुद्दे से जूझ रहा है। राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों को ग्राहकों को कड़े संदेश, गलत बयानी या जबरदस्ती के साथ बीमा योजनाएं बेचने की अनुमति नहीं है।

रविवार को समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में वित्तीय सेवा विभाग के सचिव विवेक जोशी ने कहा कि ऐसी शिकायतें कई दिनों से मिल रही थीं. बैंकों को इसे लेकर संवेदनशील होने की जरूरत है. खाताधारकों के हित को सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए। सचिव की चेतावनी, ग्राहकों को गुमराह कर प्रोजेक्ट बेचने की प्रवृत्ति पर सतर्कता आयोग ने भी आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक बीमा योजनाओं की बिक्री से न सिर्फ बैंक के फील्ड अधिकारियों पर दबाव बढ़ता है बल्कि बैंक के मुख्य कारोबार को भी नुकसान पहुंचता है. सचिव के मुताबिक इस तरह बीमा योजना लेने के लिए दबाव बनाने की प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है. हालाँकि, कई लोग बताते हैं कि निजी बैंकों में भी यही होता है।

सूत्रों के मुताबिक, बैंकों और बीमा कंपनियों के बीच एक व्यापारिक समझौता है। तदनुसार, वे उस कंपनी की शाखा से बीमा योजना बेचते हैं। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में बैंक कर्मचारी बैंक की योजनाओं को गलत बताकर या दबाव में इन्हें बेच देते हैं. यहां तक ​​कि 75 साल से अधिक उम्र के लोगों को भी इस तरह से गुमराह किया गया है. जब शाखा के अधिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन पर उच्च अधिकारियों का दबाव है. कई लोगों को खाता खोलकर या सावधि जमा करके भी इस तरह के जाल में फंसने का अनुभव हुआ है। उदाहरण के लिए, प्रीति मजूमदार, जिन्हें कुछ साल पहले नौकरी मिली थी, ने शिकायत की कि वह एक साधारण काम के लिए बैंक गई थीं . एक बैंक कर्मचारी ने उन्हें जमा योजना के नाम पर 20 साल की जीवन बीमा योजना बेची। जब उन्हें मामला समझ में आया तो करने को कुछ नहीं बचा. वार्षिक प्रीमियम की पहली किस्त 50,000 रुपये का भुगतान किया जा चुका है। प्रीति का दावा है कि हर कोई पैसों के मामलों को समझने में समान रूप से कुशल नहीं है। उन्होंने उस कार्यकर्ता की सरल और शानदार बातों पर विश्वास करके गलती कर दी.

विभिन्न उद्योग निकायों के संयुक्त मंच ‘बैंक बचाओ देश बचाओ’ ने हाल ही में रिजर्व बैंक को एक पत्र भेजकर आरोप लगाया कि बैंक ग्राहकों को गुमराह करके योजनाएं बेच रहा है। संगठन के संयोजक सौम्या दत्ता का दावा है, ”हमने बैंकों से तीसरे पक्ष के उत्पादों की बिक्री में सख्त निगरानी और नियंत्रण का प्रस्ताव दिया है. बैंक कर्मचारियों को बीमा उत्पाद बेचने पर मिलने वाले कमीशन पर भी सीमा तय करने की जरूरत है। उनकी बेहतरी के लिए उन्हें बेचने की बाध्यता खत्म की जानी चाहिए.”

जोशी ने कहा, सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों को भी गोल्ड लोन पर ध्यान देने को कहा गया है। कई मामलों में नियम का पालन नहीं किया जाता है. स्वर्ण बंधक मानदंडों का उल्लंघन. फीस और बकाया नकद वसूली में भी विसंगतियों की शिकायतें आ रही हैं। इस संबंध में सभी सरकारी बैंकों को दिशानिर्देश भेज दिए गए हैं. महंगाई के साथ हर चीज की कीमत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसलिए बीमा की जरूरत भी बढ़ती जा रही है. विशेषज्ञों की सलाह है कि केवल वयस्क ही नहीं, बच्चों का भी समय रहते बीमा कराना चाहिए। यदि आप नए माता-पिता हैं, तो यह ठीक है। अगर बच्चे की उच्च शिक्षा और अन्य जरूरतों को पहले से ही कवर कर लिया जाए तो माता-पिता पर तनाव कम हो जाता है। इस बार एलआईसी बच्चों के लिए खास पॉलिसी लेकर आई है. एलआईसी की इस नई पॉलिसी का नाम ‘अमृतबल चिल्ड्रेन प्लान’ है। यह एक व्यक्तिगत, बचत, जीवन बीमा पॉलिसी है।

संयोग से, एंडोमेंट पॉलिसी एक प्रकार का जीवन बीमा अनुबंध है, जिसके माध्यम से परिवार को एक निर्दिष्ट अवधि के अंत में या उसकी मृत्यु पर एक निश्चित राशि मिलती है। एलआईसी का यह नया बीमा ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से खरीदा जा सकता है। आप इस पॉलिसी को अपने बच्चे के लिए कम से कम 30 दिन और अधिकतम 13 साल की उम्र के लिए खरीद सकते हैं। संस्था का दावा है कि यह पॉलिसी इसलिए बाजार में लाई गई है ताकि माता-पिता पर बच्चे की उच्च शिक्षा और अन्य जरूरतों को पूरा करने का दबाव न रहे।

इस पॉलिसी के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 25 वर्ष है। अल्पकालिक प्रीमियम भुगतान शर्तों के रूप में 5, 6 और 7 वर्ष उपलब्ध हैं। सीमित प्रीमियम भुगतान विकल्प के लिए न्यूनतम पॉलिसी अवधि 10 वर्ष है। एकल प्रीमियम भुगतान की न्यूनतम अवधि 5 वर्ष है। पॉलिसीधारकों को एकल और सीमित दोनों मामलों में ‘मृत्यु पर बीमा राशि’ विकल्प चुनने की सुविधा होगी। जोखिम कवर अवधि के दौरान ‘इन फोर्स डेथ बेनिफिट’ के लिए गारंटीकृत अतिरिक्त लाभ के साथ मृत्यु पर बीमा राशि का भुगतान किया जाएगा।

एड शीरन ने मुंबई कॉन्सर्ट में दिलजीत दोसांझ के साथ पंजाबी में गाना गाया.

ब्रिटिश पॉप स्टार के कॉन्सर्ट में आए दिलजीत को एड शीरन ने बनाया बॉलीवुड में मंच?
ब्रिटिश पॉप स्टार एड शीरन ने पहली बार गाया ये पंजाबी गाना! सौजन्य: भारतीय गायक दिलजीत दोसांझ। उन्होंने शनिवार को मुंबई में एक कॉन्सर्ट में एक साथ परफॉर्म किया। ब्रिटिश पॉप स्टार एड शीरन ने मुंबई में कदम रखने के बाद से ही भारतीय प्रशंसकों का दिल जीत लिया। शनिवार शाम को मुंबई के महालक्ष्मी रेस कोर्स मैदान में कलाकार के संगीत कार्यक्रम में बैठने की कोई जगह नहीं थी। लेकिन दर्शकों को एक अलग ही सरप्राइज का इंतजार था. भारतीय संगीतकार दिलजीत दोसांझ और अरमान मलिक ने एड के साथ गाना गाया।

स्वाभाविक रूप से, इस तरह के संगीत कार्यक्रम में दो लोकप्रिय कलाकारों को एक साथ प्रदर्शन करते देखना दर्शकों के लिए एक अतिरिक्त उपहार था। लेकिन आश्चर्य यहीं ख़त्म नहीं होता. एक समय एड ने स्टेज पर दिलजीत के साथ पंजाबी गाना गाया था. दोनों ने दिलजीत का पॉपुलर गाना ‘लवर’ साथ में गाया। फैंस का उन्माद चरम पर था. ध्यान दें कि यह पहली बार है जब एड को पंजाबी गाना गाते हुए देखा गया है।

वहीं अरमान ने मलिक एड के साथ ‘2 स्टेप’ गाना गाया. एड शीरन के कॉन्सर्ट में बॉलीवुड के कई सितारे भी नजर आए. शाहिद कपूर अपनी पत्नी मीरा के साथ नजर आए. इसके अलावा ओरी, डायना पेंटी, तानिया श्रॉफ भी थीं। दिलजीत और अरमान के बारे में एड ने कहा, ‘मैं नियमित रूप से दिलजीत का म्यूजिक सुनता हूं। मैं अरमान के साथ पहले भी काम कर चुका हूं।’

एड 2017 में एक कॉन्सर्ट के लिए भारत आए थे। इस बार वह मुंबई आये और कई सामाजिक पहल में भाग लिया। पॉप स्टार शाहरुख खान से मिलने ‘मन्नत’ भी गए। भारत आने के बाद एड आतिथ्य सत्कार से प्रभावित हुए। कलाकार ने कहा कि वह अगले साल फिर इस देश में आएंगे.

ब्रिटिश पॉप स्टार एड शीरन मुंबई में कदम रखने के बाद से ही प्रैक्टिस कर रहे हैं। विभिन्न सामाजिक सेवा कार्यों के अलावा वह एक के बाद एक सितारों से भी मुलाकात कर रहे हैं। गायक शनिवार, 16 मार्च को मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में प्रदर्शन करेंगे। इससे पहले ‘शेप ऑफ यू’ मशहूर सिंगर की मुलाकात शाहरुख खान से हुई थी.

दोनों स्टार्स ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक वीडियो शेयर किया है. उस वीडियो में एड को शाहरुख अपना विदेशी पोज सिखाते नजर आ रहे हैं. दोनों साथ-साथ खड़े होकर दोनों हाथ खोलकर ऊपर की ओर देख रहे हैं. वीडियो के बैकग्राउंड में ‘ओम शांति ओम’ गाना बज रहा है. ‘शेप ऑफ यू’ मशहूर संगीतकार ने वीडियो के साथ लिखा, ”हमारा आकार अब ऐसा है. एक साथ प्यार का संदेश फैलाना।” दोनों पसंदीदा सितारों को देखने के लिए प्रशंसक भी उत्साहित हैं। इस वीडियो को देखने के बाद कई लोगों के मन में यह जिज्ञासा है कि क्या शाहरुख और एड निकट भविष्य में किसी प्रोजेक्ट में साथ काम करने वाले हैं? हालाँकि, वह उत्तर अभी भी अस्पष्ट है। सिर्फ शाहरुख ही नहीं, शाहरुख-पत्नी गौरी खान और कोरियोग्राफर फरहा खान भी एड से मिलीं। मालूम हो कि ब्रिटिश स्टार ‘मन्नत’ शाहरुख से मुलाकात करती नजर आईं। एड ने गौरी और शाहरुख से गाना भी करवाया. गौरी ने सोशल मीडिया पर एड के साथ तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ”तुम्हें गाते हुए देखकर मुझे संतुष्टि मिली. हमारे साथ शाम बिताने के लिए धन्यवाद।” गौरी ने एड को आर्यन खान के क्लोथिंग ब्रांड की एक जैकेट भी गिफ्ट की।

एड शीरन 2017 में पहले कॉन्सर्ट के लिए भारत आए थे। उस वक्त कई बॉलीवुड सितारे उनका गाना सुनने के लिए नजर आते थे. फैंस का एक वर्ग अनुमान लगा रहा है कि इस बार भी वही छवि दोहराई जाने वाली है.

ब्रिटिश पॉप स्टार एड शीरन मंगलवार को भारत पहुंचे। गायक 16 मार्च को मुंबई के महालक्ष्मी रेस कोर्स में प्रस्तुति देंगे। मुंबई में कदम रखते ही कलाकार ने फैन्स का दिल जीत लिया है. इस बीच एड ने एक लोकप्रिय भारतीय गायक के साथ गाने की इच्छा जताई है.

करीब छह साल बाद एड एक बार फिर किसी कॉन्सर्ट के लिए भारत आए हैं. हाल ही में एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि अगर मौका मिले तो वह किस भारतीय संगीतकार के साथ गाना पसंद करेंगे? एड दूसरे रास्ते से उत्तर की ओर चला गया। उन्होंने कहा, अगर मौका मिला तो वह भारतीय पॉप स्टार किंग के साथ मिलकर काम करना पसंद करेंगे। एड ने कहा, “मैं पहले भी इसका उत्तर दे चुका हूं। मैं हाल ही में किंग का बहुत सारा संगीत सुन रहा हूं। इसलिए उनके साथ गाना अच्छा रहेगा.

विक्की कौशल, तृप्ति डिमरी, एमी विर्क की फिल्म का नाम बैड न्यूज़ जुलाई में रिलीज़ होगी.

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2019 में करण जौहर द्वारा निर्मित फिल्म ‘गुड न्यूज’ में निर्देशक राज मेहता ने एक सामाजिक संदेश देने की कोशिश की। फिल्म में अक्षय कुमार, करीना कपूर, दिलजीत दोसांझ और कियारा आडवाणी ने अभिनय किया था। निर्माताओं ने सोमवार को इस फिल्म की ‘फ्रेंचाइजी’ के रूप में घोषणा की। फिल्म का सीक्वल जल्द ही आने वाला है. हालांकि इस बार नए कलाकारों के साथ फिल्म का काम आगे बढ़ाया जाएगा। इस फिल्म में विक्की कौशल और तृप्ति डिमरी एक साथ काम कर रहे हैं। ‘गुड न्यूज’ में पंजाबी संगीतकार और एक्टर दिलजीत थे। इस बार पंजाबी संगीतकार अमरिन्दरपाल विर्क उर्फ ​​एमी विर्क होंगे। फिल्म का निर्देशन आनंद तिवारी करेंगे। गौरतलब है कि निर्माता नए अभिनेताओं और निर्देशकों के साथ नई कहानियां बताने के लिए तैयार हैं। फिल्म ‘गुड न्यूज’ में, समान उपनाम वाले एक जोड़े ने आईवीएफ के माध्यम से बच्चे की योजना बनाते समय उत्पन्न होने वाली जटिलताओं के बारे में बड़े पर्दे पर एक कॉमेडी प्रस्तुत की। हालांकि, इस बार क्या कहानी उस फॉर्मूले के आधार पर आगे बढ़ेगी, इसका जवाब फिलहाल मेकर्स ने गुप्त रखा है।

विक्की कौशल बॉलीवुड के एक प्रमुख अभिनेता हैं। वहीं तृप्ति फिलहाल फिल्म ‘एनिमल’ में बिजी हैं। दर्शकों को यह जानने का इंतजार है कि उनकी इक्वेशन स्क्रीन पर कितना जमती है. दूसरी ओर, इंडस्ट्री के एक वर्ग को लगता है कि एमी उनके साथ दर्शकों को आश्चर्यचकित कर सकती हैं। पिछले साल क्रोएशिया में ली गई विक्की-तृप्ति की कुछ तस्वीरें नेट वर्ल्ड पर वायरल हो गई थीं। कई लोगों को लगता है कि ये ‘बैड न्यूज’ के किसी खास हिस्से की शूटिंग की तस्वीरें हैं.

फिलहाल तृप्ति ने कार्तिक आर्यन स्टारर ‘भूलबुलैया 3’ की शूटिंग शुरू कर दी है। वहीं विक्की फिल्म ‘छावा’ की तैयारी कर रहे हैं। मेकर्स ने कहा है कि ‘बैड न्यूज’ जुलाई में रिलीज होगी. ‘एनिमल’ रिलीज करने वाले निर्देशक संदीप रेड्डी बंगा को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। फिल्म के कंटेंट की वजह से रणबीर कपूर को व्यंग्य से छुटकारा नहीं मिला. लेकिन इस फिल्म में अगर सराहना का पलड़ा सबसे भारी है तो वो हैं तृप्ति डिमरी. ‘एनिमल’ में कैमियो रोल निभाया। लेकिन लंबे समय तक पर्दे पर नहीं रहने के बावजूद वह देशभर में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। ‘एनिमल’ में एक्टिंग से तृप्ति रातों-रात पॉपुलर हो गईं। जिन लोगों ने ये फिल्म देखी है उन्हें फिल्म के हीरो रणवीर के साथ क्लोजअप सीन के बारे में पता है. हालांकि तृप्ति को यह पसंद आया, लेकिन रणवीर के साथ बेड सीन में उनकी परफॉर्मेंस की भी कम आलोचना नहीं हुई। अपनी बेटी को ऐसे किरदार में देखकर तृप्ति के माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?

साहसी दृश्यों में अभिनय का यह पहला मौका नहीं है. इससे पहले तृप्ति ने फिल्म ‘बुलबुल’ में रेप सीन में काम किया था। कई इंटरव्यू में इस बात पर तसल्ली हुई कि ‘बुलबुल’ के सीन को पर्दे पर उतारना जितना मुश्किल था, ‘एनिमल’ में रणवीर के साथ स्क्रीन पर करीब रहना उतना मुश्किल नहीं था। लेकिन ‘एनिमल’ में तृप्ति को देखने के बाद उनके माता-पिता हैरान रह गए। तृप्ति ने कहा, ”इस सीन को लेकर माता-पिता ने मुझसे लंबी चर्चा की. मैंने समझाया कि यह दृश्य फिल्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।”

तृप्ति के माता-पिता ने उनकी बेटी को बार-बार कहा कि ऐसे दृश्यों में अभिनय करने से बाद में उनके करियर पर असर पड़ सकता है। हालांकि तृप्ति ने कहा, ”मैंने उन्हें समझाया कि मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. मैंने जो भी किया, मुझे करना पड़ा क्योंकि यह मेरे किरदार के अनुकूल था।” ‘एनिमल’ पिछले साल के अंत में रिलीज़ हुई थी। लेकिन इस तस्वीर को लेकर चलन और चर्चा अभी भी जारी है. फिल्म पर स्त्रीद्वेष और पितृसत्ता का जश्न मनाने का भी आरोप लगाया गया है। फिल्म के निर्देशक संदीप रेड्डी बंगा की आलोचना की गई है. रणवीर भी कटाक्ष से अछूते नहीं रहे. लेकिन जैसे-जैसे आलोचना आई है, वैसे-वैसे प्रशंसा भी आई है। रणवीर के अभिनय की सराहना की गई है. निर्देशक संदीप की प्रतिभा का अभ्यास किया गया है। लेकिन इन सबके बीच तृप्ति डिमरी ने ध्यान खींचा है। ‘एनिमल’ में एक कैमियो कई लोगों को याद है। सुडौल और चिकनी त्वचा वाली अभिनेत्रियों के चलन का कोई अंत नहीं है। क्या फिल्म की नायिका रश्मिका मंदाना थोड़ी निराश हो गई हैं क्योंकि वह संतुष्टि के बारे में कुछ और अभ्यास कर रही हैं?

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी नहीं बनना चाहते लोकसभा चुनाव 2024 में अमेठी-रायबरेली से उम्मीदवार.

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यदि न तो राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के अमेठी-रायबरेली से चुनाव लड़ते हैं, तो समाजवादी पार्टी चाहती है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तर प्रदेश की गारंटी वाली सीटों में से एक से चुनाव लड़ें।

समाजवादी पार्टी के मुताबिक, अगर गांधी परिवार से कोई भी उत्तर प्रदेश से चुनाव नहीं लड़ता है, तो यह संदेश जाएगा कि ‘भारत’ ने देश के सबसे बड़े राज्य में पहले ही हार मान ली है. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष को उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार होना चाहिए. कांग्रेस की हिंदी मंडली में पहले ही यह बात बैठ चुकी है कि कांग्रेस की ताकत सिर्फ दक्षिण भारत में है. यदि कांग्रेस अध्यक्ष स्वयं उत्तर प्रदेश से लोकसभा जीतते हैं तो यह विचार गलत साबित होगा। हालाँकि, खड़गे राज्यसभा में सांसद हैं और वहां विपक्ष के नेता हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, अब तक राहुल और प्रियंका में से कोई भी अमेठी या रायबरेली से उम्मीदवार नहीं बनना चाहता है। मंगलवार शाम को कांग्रेस केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक हो रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से हार गए थे. जीत केरल के वेनार से लोकसभा में गए।
कांग्रेस ने पहले ही वेनाड के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में उनके नाम की घोषणा कर दी है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी अब अमेठी से चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं. उनके मुताबिक दो सीटें जीतने के बाद एक सीट छोड़ने से खराब संदेश जाता है.

वहीं, प्रियंका भी सोनिया गांधी की सीट रायबरेली से उम्मीदवार नहीं बनना चाहती हैं. सोनिया ने रायबरेली छोड़ दिया और राज्यसभा जीतकर सांसद बन गईं। प्रियंका ने कांग्रेस नेताओं से कहा कि अगर सोनिया, राहुल के साथ वह भी उम्मीदवार बनती हैं या संसद जीतती हैं तो वह कांग्रेस से गांधी परिवार की तीसरी सदस्य बनेंगी. परिणामस्वरूप, भाजपा के लिए परिवारवाद पर उंगली उठाना आसान हो जाएगा। बीजेपी जहां उपहास कर रही है, वहीं पिछली बार राहुल के अमेठी में स्मृति ईरानी से हारने के बाद कांग्रेस को इस बार भी रायबरेली में जीत का भरोसा नहीं है. इसलिए राहुल-प्रियंका उम्मीदवार नहीं बनना चाहते.

बीजेपी खेमे में इस बात को लेकर अटकलें चल रही हैं कि क्या बीजेपी इस बार गांधी परिवार के दूसरे खेमे के दो सदस्यों, वरुण गांधी और मेनका गांधी को पिलीवित और सुल्तानपुर से मैदान में उतारेगी. केंद्रीय चुनाव समिति इस सप्ताह बीजेपी उम्मीदवारों की सूची पर बैठक करेगी. मेनका पिछले बीस साल से बीजेपी की सांसद हैं. इससे पहले वह जनता दल के टिकट पर या फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर सांसद बने थे. वरुण 2009 से बीजेपी सांसद भी हैं. लेकिन किसान आंदोलन के बाद से वह कई मुद्दों पर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ उतर आए हैं. अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार बीजेपी उन्हें मैदान में उतारेगी या नहीं. हालांकि, वरुण ने हाल ही में अपने सुर नरम किए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम की तारीफ की.

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अगर बीजेपी अंततः वरुण को मैदान में नहीं उतारती है, तो वह अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के समर्थन से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़े हो सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी सीट समझौते के फॉर्मूले पर अमल करते हुए वरुण का समर्थन करना होगा. उत्तर प्रदेश में सीटों के समझौते में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए 17 सीटें छोड़ी हैं. लेकिन अखिलेश के करीबी लोगों का कहना है कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने के लिए राजी हो जाते हैं तो वे एक और सीट छोड़ सकते हैं, जहां जीत की संभावना ज्यादा है. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल पुलिस के डीजी राजीव कुमार के साथ-साथ छह राज्यों के गृह सचिवों को भी हटा दिया।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का राज्य गुजरात और योगी आदित्यनाथ का राज्य उत्तर प्रदेश शामिल है। संयोग से, मोदी उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सांसद हैं। जिन छह राज्यों में गृह सचिवों को हटाया गया है उनमें से चार में बीजेपी और उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं. चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के गृह सचिवों को हटाने के आदेश जारी कर दिए गए हैं. , हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड। गुजरात और उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड में भी बीजेपी सत्ता में है. बिहार में जेडीयू-बीजेपी का गठबंधन. हिमाचल में कांग्रेस और झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में है. इसके अलावा मिजोरम और हिमाचल प्रदेश के सामान्य प्रशासनिक विभाग के सचिवों को भी हटा दिया गया है. एक समय भाजपा की सहयोगी रही जेडपीएम पूर्वोत्तर मिजोरम में सत्ता में है।

आखिर क्या है मध्यप्रदेश के भोजशाला का इतिहास?

आज हम आपको मध्यप्रदेश के भोजशाला का इतिहास बताने जा रहे हैं! हाईकोर्ट के फैसले के बाद धार जिले स्थित भोजशाला परिसर में गहमागहमी बढ़ गई है। हिंदू संगठन के लोग वहां जश्न मना रहे हैं। वहीं, दूर-दूर से लोग अब भोजशाला को देखने आने लगे हैं। हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला में पहले की तुलना में गहमागहमी बढ़ गई है। हिंदू संगठन के लोग हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। भोजशाला परिसर का विवाद 800 साल पुराना है। यहां के खंभों पर हिंदू धर्म से जुड़ी आकृतियां हैं। इसके बाद हिंदू पक्ष कहता है कि राजा भोज द्वारा बनवाया गया है, यह भोजशाला है। वहीं, मुस्लिम पक्ष के लोग इस कमाल मौला मस्जिद बताते हैं। उनका कहना है कि हम 800 साल से यहां नमाज पढ़ रहे हैं। हमें हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्ण विश्वास है। बनारस के ज्ञानवापी में पूजा का अधिकार दिए जाने के बाद हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ट्रस्ट ने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपनी याचिका के बीच अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें धार की भोजशाला में तथ्य और प्रमाणों के लिए ASI भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सर्वे कराने के निर्देश देने बाबत मांग की थी। 11 मार्च 2022 को इसे लेकर फैसला आ गया है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि ASI के महानिदेशक या अतिरिक्त महानिदेशक के नेतृत्व में ASI के 5 या 5 से ज्यादा अधिकारियों की एक विशेष समिति बनाए। यह भोजशाला की ऐतिहासिकता का वैज्ञानिक और तकनीकी सर्वे करें। सर्वे पर एक डॉक्यूमेंट रिपोर्ट छह हफ्ते के अंदर अदालत को सौंपे।

मई 2022 में हिंदू संगठन हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की तरफ से एक याचिका लगाईं गई थी, जिसमें भोजशाला को मंदिर बनाए जाने, वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करने, विधिवत पूजा अर्चना करने और नमाज बंद करने जैसी मांग की गई थी। जिस पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए धार की ऐतिहासिक भोजशाला का ज्ञानवापी की तर्ज पर सर्वे कराने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने सोमवार को इस मुद्दे पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को पांच विशेषज्ञों की टीम बनाने को कहा है। इस टीम को छह सप्ताह में रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपनी होगी। हिन्दू फ्रंट का मानना है कि ASI सर्वेक्षण के दौरान खुदाई में कई मूर्तियां, चिह्न और संकेत ऐसे पाए जाएंगे, जिससे यह साफ हो सकेगा कि यह मस्जिद नहीं बल्कि पूर्णतः मंदिर ही था।

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के संयोजक आशीष गोयल ने नवभारत टाइम्स.कॉम से बात करते हुए कहा कि लंबी मेहनत के बाद हमें सफलता मिली है। कोर्ट में हमने सारे साक्ष्य दिए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सारे पक्षों को नोटिस जारी किया था। सारी पार्टियों ने धीरे-धीरे जवाब दिया था। पांच फरवरी 2024 में हमने एक याचिका लगाई थी कि कोर्ट भोजशाला परिसर की एक साइंटिफिक सर्वे कराए। कोर्ट ने सबकी सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वाग्देवी की मूर्ति ब्रिटिश संग्रहालय में है। इसे लाकर यहां फिर से स्थापित किया जाए। साथ ही अवैध रूप से हो रहे नमाज को बंद किया जाए। कोर्ट ने सर्वे के दौरान फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने के निर्देश दिए हैं। हमारी मांग है कि हमें 24 घंटे 365 दिन यहां पूजा की अनुमति दी जाए। सर्वे 50 मीटर की परिधि में होगी। इसमें तमाम आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाएगा। वहीं, उन्होंने कहा कि यहां साक्ष्य की क्या जरूरत है। मंदिर के खंभों के मूर्तियां बनी हुई है। यहां चांद पीठ और सूर्य पीठ बने हुए हैं। ये चीजें हिंदू और सनातन परंपरा में होती है। ऐसे में यह निश्चित रूप से हिंदू परंपरा का केंद्र रहा है। भोजशाला का हर साक्ष्य अपने आप में बोलता है। भोजाशाल में लगी शिलालेख भी इसकी गवाही देती है। गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों से धार की भोजशाला को लेकर कई बार हिंसा की घटनाएं और कर्फ्यू जैसे हालात भी बन चुके हैं। हर साल बसंत पंचमी पर भोजशाला को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनाव की स्थिति बनती है। अप्रैल 2003 में कोर्ट के निर्देशों के बाद धार की भोजशाला में प्रति मंगलवार को हिंदू समाज के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। जबकि शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति होती है। वसंत पंचमी पर हिंदू समाज को पूरे दिन पूजा-अर्चना की अनुमति होती है।

वहीं, अदालत ने स्मारक अधिनियम, 1958 की धारा 16 पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसका उद्देश्य पूजा स्थलों को दुरुपयोग, प्रदूषण और अपवित्रता से बचाना है। कोर्ट ने इस धारा के तहत इसके प्राथमिक उद्देश्य को समझने के लिए पूजा स्थल के चरित्र को निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक पूजा स्थल का चरित्र या प्रकृति निर्धारित नहीं हो जाती, तब तक मंदिर का उद्देश्य रहस्य में डूबा रहता है। कोर्ट का निर्णय इन पवित्र स्थलों के उद्देश्य के बारे में स्थिति स्पष्ट करेगी।

कोर्ट ने माना है कि स्मारक की प्रकृति और चरित्र को समझने और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उसने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जिम्मेदारी है कि वह रहस्यों को उजागर करे और स्थल से जुड़े भ्रम को दूर करे। अदालत ने यह भी नोट किया है कि राज्य सरकार और ASI ने चल रहे विवाद और उससे निपटने से जुड़ी चुनौतियों को स्वीकार किया है। अदालत के अनुसार, स्मारक से जुड़ी उलझनों और परस्पर विरोधी कहानियों को सुलझाने का काम अदालत का नहीं, बल्कि ASI का है। अदालत की ये टिप्पणियां संबंधित पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों के दौरान की गईं।