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क्या राजीव गांधी ने खोली थी राम मंदिर की राह?

एक समय ऐसा था जब राजीव गांधी ने ही राम मंदिर की राह खोली थी! अयोध्या में बने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की घड़ी ज्यों-ज्यों नजदीक आ रही है, सियासी दलों में इसे लेकर घमासान मचा हुआ है। प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए निमंत्रण पत्र बांटे जा रहे हैं। उद्यमी, व्यवसायी, नेता, समाजसेवी, राजनीति जैसे समाज के विभिन्न तबकों के लोगों को न्योता भेजा जा रहा है। राजनीति तो पानी की तरह है, जहां स्कोप मिला, वहीं पसर गई। इसलिए समाज का कोई अंग, आचार-व्यवहार और यहां तक कि रिश्ते भी राजनीति से अब अछूते नहीं बचे हैं। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होनी है, तो भाजपा विरोधी सभी दल इस चिंता से दुबले हुए जा रहे हैं कि मंदिर निर्माण का श्रेय भाजपा लेना चाहती है। इसलिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिलने पर कुछ दलों ने जाने से साफ मना कर दिया, तो कुछ ऊहापोह की स्थिति में हैं। सबसे ज्यादा ऊहापोह की स्थिति कांग्रेस में है। उस कांग्रेस में, जिसके नेता राजीव गांधी ने राम मंदिर के शिलान्यास की पहल की। बात 1988 की है। भारी बहुमत से बनी राजीव गांधी की सरकार पर बोफोर्स तोप घोटाले में रिश्वतखोरी के आरोप पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लगाए थे। तब वीपी सिंह राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री थे। कांग्रेस की इससे भारी बदनामी हुई और इस बात का खतरा खड़ा हो गया कि अगला चुनाव कांग्रेस जीत भी पाएगी या नहीं। राजीव के करीबियों ने उन्हें सुझाव दिया कि राम मंदिर का शिलान्यास करा देना चाहिए। इससे भाजपा के उभार को रोका जा सकता है। तब संसद में भाजपा दो सदस्यों वाली पार्टी थी।

यह दस्तावेजी सच है कि राजीव गांधी की सरकार ने ही शिलान्यास की इजात दी, लेकिन इसका फायदा कांग्रेस नहीं उठा सकी। चुनाव 1989 के नवंबर में होने थे। इस बीच विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और साधु-संतों ने 9 नवंबर 1989 की तारीख शिलान्यास के लिए तय कर दी। बहरहाल, शिलान्यास और चुनाव प्रचार अभियान में कांग्रेस ने मंदिर के शिलान्यास को मुद्दा नहीं बनाया, लेकिन भाजपा ने इसे अपनी कामायाबी मानी। नवंबर में ही मंदिर के बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आना था। विहिप की कोशिश थी कि फैसला आने से पहले ही शिलान्यस कर देना चाहिए। यही वजह थी कि शिलान्यास की तारीख 9 नवंबर तय हुई। विहिप ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के आदेश के पहले ही स्थितियों को भांपते हुए तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने विश्व हिन्दू परिषद को शिलान्यास की इजाजत दे दी। केंद्र सरकार की सहमति से कोर्ट का फैसला आने के पहले ही विवादित स्थल के बाहर शिलान्यास हो गया। सात घन फुट का गड्ढा खोद कर आधारशिला रख दी गई। आधार शिला के पत्थर बिछाने वालों में अनुसूचित जाति से आने वाले बिहार के कामेश्वर चौपाल भी शामिल थे। यह कहा जाए कि उन्होंने मंदिर की नींव की पहली ईंट रखी तो अनुचित नहीं होगा।

उसके बाद भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सितंबर से अक्टूबर 1990 तक राम रथयात्रा निकाली। रथयात्रा के बहाने भाजपा ने हिन्दुत्व को हवा दी। बिहार में तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी की रथयात्रा रोक दी और उन्हें गिरफ्तार करा दिया। भाजपा को इससे भी हिन्दू समाज की सहानुभूति मिली। भाजपा अगर लोकसभा में सिर्फ दो सदस्यों से बढ़ कर आज 300 सीटों के पार गई है तो इसमें राम और उनकी जन्मस्थली अयोध्या की बड़ी भूमिका है।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तन्मयता से राम मंदिर का निर्माण कराया और 2024 के लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारी की है, उससे विरोधी दलों के कान खड़े हो गए हैं। विरोधी दल समझ नहीं पा रहे कि वे मुस्लिम समुदाय के एकमुश्त तकरीबन 20 प्रतिशत वोटों की तिलांजलि दे दें या भाजपा की तरह इस दलील के साथ अवसर का लाभ उठाएं कि राजीव गांधी की सरकार ने ही मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी थी। प्रसंगवश यह उल्लेख भी जरूरी है कि राजीव गांधी ने वृंदावन जाकर इस बाबत देवरहा बाबा से सलाह मांगी थी। बाबा के कहने पर ही उन्होंने आधारशिला रखने की छूट दी थी।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता मिलने के बाद सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने जाने से साफ मना कर दिया है। नीतीश कुमार और लालू यादव की ओर से भी अभी तक कोई संकेत नहीं मिला है। बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को छोड़ कर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने चुप्पी साध ली है। भाजपा विरोधी अन्य दल भी साफ-साफ कुछ नहीं बोल रहे। कांग्रेस यहां भी राजीव गांधी की तरह चूकती नजर आ रही है। शिलान्यास की छूट दी राजीव गांधी की सरकार ने, लेकिन उसे वह सियासी लाभ का मुद्दा नहीं बना पाए। कांग्रेस की दुर्गति का दौर तभी से शुरू हुआ और अभी तक जारी है। कांग्रेस चाहती तो जनता को यह बता कर अपना झंडा बुलंद कर सकती थी कि प्राण प्रतिष्ठा भले नरेंद्र मोदी की सरकार की देखरेख में हो रही है, पर आधारशिला रखने की छूट उसके ही नेता राजीव गांधी ने दी थी।

कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि वह गलतियों से सीखती नहीं। भाजपा की नकल करने में उसे संकोच नहीं होता। राहुल गांधी मंदिरों में जाते हैं। खुद को ब्राह्मण साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं। अपने को ब्राह्मण कुल का साबित करने के लिए जनेऊधारी बन जाते हैं। यानी भाजपा के हिन्दुत्व की नकल करने में वे संकोच नहीं करते। ममता बनर्जी भी हिन्दुत्व के प्रति आकर्षण जताने के लिए चंडी पाठ करने लगती हैं। पर, मुद्दों को भुनाने की कला में विरोधी दल भाजपा की तरह कामयाब नहीं होते। अयोध्या में हो रहे 22 जनवरी के आयोजन में अगर विरोधी दल सहभागी नहीं बनते तो इसका संकेत साफ है कि वे भाजपा की राह आसान कर रहे हैं। भाजपा उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की पूरी कोशिश करेगी।

जानिए अयोध्या राम मंदिर के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको अयोध्या राम मंदिर के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं! लंबी प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में रामलला के विराजमान होने की घड़ी पास आ रही है। 22 जनवरी को भगवान राम बालस्वरूप में अपने नवनिर्मित मंदिर में विराजित होंगे। लेकिन, 2.70 एकड़ में विकसित किया जा रहा तीन मंजिला मंदिर राम के धाम का महज एक हिस्सा भर है। पूरा धाम जिसे मंदिर परिसर या कॉम्प्लेक्स का नाम दिया गया है, इसे पूरा होने में एक साल से अधिक का समय लगेगा। 70 एकड़ के इस कॉम्प्लेक्स को अध्यात्म, इतिहास और सुविधाओं के संगम के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे यहां आने पर श्रद्धालुओं को त्रेतायुगीन परंपराओं और भव्यता का अनुभव हो सके। प्रधानमंत्री 22 जनवरी को जिस गर्भगृह में प्राण प्रतिष्ठा करेंगे वह ग्राउंड फ्लोर पर है। प्राण प्रतिष्ठा तक ग्राउंड फ्लोर के ही कार्य को अंतिम रूप दिया जा सकेगा, जिस पर 160 खंभे या स्तंभ बने हैं। प्रवेश का मुख्य द्वार जिसे सिंहद्वार कहा गया है, उसका काम भी लगभग पूरा हो चुका होगा। यहां अलग-अलग प्रतिमाओं के स्थापित होने का कार्य चल रहा है। सिंहद्वार के ही समीप बनने वाले प्लाजा पर दीप स्तंभ भी बनाए जाएंगे। फर्स्ट फ्लोर जिस पर राम दरबार स्थापित होना है, उसका काम भी अंतिम चरण में है। साथ ही पांचों मंडप- नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना और कीर्तन मंडप को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है। मंदिर के चारों ओर बन रही सुरक्षा दीवार या 732 मीटर लंबे परकोटे का निर्माण पूरा होने में अभी समय लगेगा।

मंदिर कॉम्प्लेक्स का दो-तिहाई क्षेत्र करीब 48 एकड़ हरित क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जाएगा, जिससे मंदिर की प्राकृतिक आभा निखर सके। इसके लिए लैंडस्केपिंग और पौधारोपण पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होंगे। परिसर में विकसित की जाने वाली वाटिकाओं का नामकरण भी रामायणकालीन पात्रों के नाम पर होगा। परिसर में जो पौधे लगाए जा रहे हैं, वे भी अलग-अलग नक्षत्रों और ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार चयनित किए गए हैं। मंदिर कॉम्प्लेक्स का एक बड़ा हिस्सा तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं के लिए भी विकसित किया जा रहा है। परिसर में जिन प्राचीन मंदिरों को संरक्षित किया गया है, उन्हें भी लैंडस्केपिंग के जरिए मनोरम बनाया जाना है। इसमें प्राचीन शिवमंदिर से लेकर शेषावतार मंदिर तक शामिल है। अयोध्या राम की जन्मस्थली है, इसलिए वहां उनकी पूजा उनके बालरूप में ही होती है। गर्भगृह में भगवान राम की प्रतिमा उनके बालस्वरूप रामलला के रूप में ही स्थापित की जाएगी। इसलिए, गर्भगृह में वह पांच वर्ष की आयु के बालक के रूप में अकेले ही स्थापित किए जाएंगे। फर्स्ट फ्लोर पर गर्भगृह में रामदरबार बनेगा। यहां भगवान राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ विराजेंगे। उनके चरणों में भगवान शंकर का अवतार माने जाने वाले भक्त हनुमान भी सुशोभित होंगे।

भारतीय सनातन परंपरा में राम सामूहिकता और समरसता के भी आदर्श हैं। इसलिए, उनके मंदिर में भी इस भावना का प्रतिबिंब दिखेगा। मंदिर के चारों ओर परकोटे पर छह मंदिर बन रहे हैं। साथ ही ऋषि मंदिर में महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, ऋषि पत्नी अहिल्या के साथ निषादराज और माता शबरी के मंदिर स्थापित होंगे। मंदिर कॉम्प्लेक्स में राम की परंपरा से जुड़े दूसरे सहयोगियों की धरोहरों को भी संरक्षित और विकसित किया जा रहा है। माना जाता है कि जब प्राचीन काल में यहां मंदिर था तो उसकी स्थापना के साथ चारों ओर भगवान राम के अभियान में सहयोग देने वाले पात्रों से जुड़े स्थान भी स्थापित किए गए थे। इसे सुरक्षा घेरे के तौर पर देखा जाता था। कॉम्प्लेक्स को विकसित करते समय भी इस भावना का ध्यान रखा गया है। किष्किंधा के राजकुमार अंगद के नाम पर स्थापित अंगद टीला और समुद्र पर पुल बनाकर लंका की राह सुगम बनाने वाले नल के नाम पर बना टीला भी कार्ययोजना का हिस्सा हैं। समृद्धि और धन के देवता कुबेर के टीले को भी संरक्षित किया जा चुका है। इस पर गिद्धराज जटायु की प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। परिसर में स्थित सीता कूप को भी संरक्षित किया गया है। मान्यता है कि इसमें सभी तीर्थों का जल समाहित है।

यहां यज्ञशाला का निर्माण हो रहा है। यज्ञ, आहुति सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपादित किए जाएंगे। कर्म क्षेत्र इसे अनुष्ठान मंडप का रूप दिया गया है। यहां श्रद्धालु विभिन्न संस्कार और कार्यक्रम आयोजित कर सकेंगे। गुरु वशिष्ठ पीठिका भगवान राम सहित चारों भाइयों को गुरु वशिष्ठ ने शास्त्रों की शिक्षा दी थी। इसलिए उनके नाम पर पीठिका भी स्थापित की जाएगी। भक्ति टीला मंदिर कांप्लेक्स में टीले को योग, अध्यात्म और प्रार्थना के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां पर श्रद्धालु प्रार्थना और ध्यान कर सकेंगे। प्रसाद मंडप इसका नाम भगवान राम के भाई भरत के नाम पर भरत प्रसाद मंडप रखा गया है। यहां पर प्रसाद, भोग आदि तैयार होंगे, जो पूजन-अर्चन में उपयोग होंगे।

जानिए अयोध्या नगरी का पूरा इतिहास!

आज हम आपको अयोध्या नगरी का पूरा इतिहास बताने वाले हैं! कौशलपुर की राजधानी। वह अयोध्या नगरी, जिसे न कभी जीता जा सका और न कभी जीता जा सकता है। जिसके साथ युद्ध करना असंभव है। रघु, दिलीप, अज, दशरथ और राम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम और शक्ति के कारण उनकी राजधानी को अपराजेय माना जाता था। इसलिए नगरी का ‘अयोध्या’ नाम सर्वदा सार्थक रहेगा। सतयुग के सतकाल को मैंने देखा है। राजा भरत को मैंने देखा। राज हरिश्चंद्र का सुख पाया। त्रेता युग के वैभव को मैंने जिया। मैंने राजा दशरथ के शासन को देखा। उनके काल की विरासत मेरी धमनियों में आज भी बहती है। राजा दशरथ के चार लालों ने मेरी धरती पर पैर रखा मेरी गलियों में घूमे। उनका बचपन, उनकी जवानी और उनकी कहानी मेरी रगों में रची- बसी है। उस राम के वैभव को समेटे मैंने द्वापर और कलियुग का आगमन देखा। भाइयों को आपस में कटते देखा। भ्रष्टाचार को बढ़ते देखा। मुस्लिम शासकों के आक्रमण को झेला। मुगलों के तांडव का साक्षात्कार किया। मेरी धरती पर बने मेरे भगवान के मंदिर को भी टूटते मैंने देखा। उस मंदिर के लिए मेरी धरती पर अपने पुत्रों के खून बहते भी देखा। मेरी आंखों के कोर भी गीले हुए। फिर, अपने प्रभु की मंदिर का निर्माण होते भी देख रहा हूं। मैं अयोध्या हूं और मैं अपनी कहानी आपको खुद सुनाने वाला हूं। कहानी की शुरुआत वर्तमान से करता हूं। आज मेरी गलियां चमक रही हैं। मेरी धरती नई सड़कें बन रही हैं। मेरा वैभव फिर लौट रहा है। मेरे यहां का रेलवे स्टेशन भी प्रभु श्रीराम के रंग में रंगा है तो एयरपोर्ट भी भगवान की आभा झलकती है। आज मेरी भव्यता को देखकर सब हर्षित हो रहे हैं। लेकिन, क्या यह सब इतना आसान था। बिल्कुल नहीं। 500 की लंबी लड़ाई मैंने देखी है। मेरी बात करने वालों पर अत्याचार मैंने देखा है। लेकिन, मैं 9 नवंबर 2019 को कैसे भूल सकता हूं। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का वह आदेश, जिसने मेरी धरती को राम मंदिर से फिर आबाद कर दिया। इसके बाद 5 अगस्त 2020 का वह दिन। मेरी धरती धन्य हुई। मेरे आराध्य प्रभु श्रीराम के वैभव के वापस लौटने की शुरुआत का दिन। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे दर पधारे। मेरी धरती के जिस टुकड़े पर भगवान राम ने जन्म लिया था, वहां मंदिर की नींव रखी गई।

मेरी धरती पर जब नींव का पहला कुदाल चला, मैं कितनी खुश थी। अंदाजा नहीं लगा सकते। मेरी रगों में राम का संचार हो रहा था। वह सपना, वह उम्मीद, वह भरोसा, जो करोड़ों लोगों ने मेरी तरफ नजर टिकाकर रखा था, वह पूरा हो रहा था। राम के मंदिर बनने की शुरुआत हुई। करोड़ों लोगों की भक्ति का वह चरम बिंदु था। मेरे लिए जो भी युद्ध लड़े गए। इस दिन एक बार फिर मैं जीत गई। क्योंकि, मैं अयोध्या हूं।

मेरी जमीन पर खड़ी की गई मस्जिद- मंदिर की लड़ाई लंबी थी। उबाऊ भी। फिर भी न कोई थका। न हारा। 100 सालों से अधिक की कानूनी लड़ाई लड़ी गई। फिर आया 9 नवंबर 2019 का दिन। श्रीराम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश का दिन। सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबी सुनवाई के बाद मेरे दर को लेकर चल रहे विवाद पर फैसला सुनाया। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में बैठी संवैधानिक पीठ ने अपने आदेश में कहा कि विवादित जमीन पर हिंदुओं का हक है। मेरी जीत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि मुस्लिम पक्ष को अलग से 5 एकड़ जमीन दी जाए। मेरे ही दर पर उन्हें भी जमीन दी गई है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कुछ को कहां मंजूर था। कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं। सुप्रीम कोर्ट में सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। फिर मेरे दर पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई। सरकार के स्तर पर।

आपको यहां बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट के पांचों जजों की सहमति से मेरे घर के जन्मभूमि विवाद पर फैसला सुनाया गया। फैसले में एएसआई की रिपोर्ट का जिक्र किया गया। एएसआई ने मेरी छाती को चीर कर देखा था। विवादित ढांचे के भीतर मेरे भगवान का मंदिर था। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने आदेश में कहा कि एएसआई ने भी विवादित जमीन पर पहले मंदिर होने के सबूत पेश किए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि हिंदू अयोध्या को मेरे राम का जन्मस्थल मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एएसआई नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी।

मेरे प्रभु रामलला की जन्मभूमि पर फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे। आदेश पारित करने के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को रिटायर हो गए। लेकिन, अपने आखिरी बड़े फैसले में उन्होंने मेरी जमीन पर प्रभु रामलला के मंदिर का रास्ता साफ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से मेरी धरती पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। अब तो ग्राउंड फ्लोर बनकर तैयार हो गया है। 22 जनवरी को मंदिर का उद्घाटन होने जा रहा है। मेरे प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान होंगे। मेरी धरती और मेरे राम ने हमेशा भारत की राजनीति को प्रभावित किया। राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि परिसर की पूरी जमीन को एक ट्रस्ट के हवाले करने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया कि केंद्र सरकार ट्रस्ट का निर्माण करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का निर्माण किया। ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास बनाए गए। विश्व हिंदू परिषद से चंपत राय को महासचिव बनाए गए। ट्रस्ट में 15 सदस्य हैं। ट्रस्ट ने राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में राम मंदिर निर्माण कमिटी का गठन किया। मेरी धरती पर राम मंदिर निर्माण कमिटी ने तय समय सीमा में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को पूरा कराने में मदद की है।

22 जनवरी 2024 को मंदिर निर्माण के प्रथम चरण का कार्य पूरा होने के बाद मेरे प्रभु रामलला को अपने भव्य मंदिर में विराजमान किया जाएगा। मेरे दर पर रामलला के नए मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां जोरदार तरीके से चल रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर मेरी धरती पर आएंगे। मेरी सदियों का इंतजार पूरा होगा। मेरे रामलला अपने मंदिर में विराजमान होंगे, वह दिन कितना सुहावन होगा।

नीरज को सुनील की शुभकामनाएँ, सहल को विचार l

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टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने बेहद मजबूत ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ द्वंद्व से पहले सुनील छेत्री को प्रेरित किया। वह पिछले साल मई में दोहा, कतर में डायमंड लीग के चैंपियन बने। भारतीय टीम अगले शनिवार को रेगिस्तान में एएफसी एशियन कप में अपने सफर की शुरुआत करेगी. टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने शक्तिशाली ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ द्वंद्व से पहले सुनील छेत्री का हौसला बढ़ाया।

नीरज ने एक वीडियो संदेश में भारतीय फुटबॉल टीम को बधाई देते हुए कहा, “एएफसी एशियन कप के लिए भारतीय टीम को मेरी शुभकामनाएं। देशवासियों से अनुरोध है कि भारतीय टीम का समर्थन करें। उन्होंने कड़ी मेहनत की. मुझे उम्मीद है कि भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन करेगी।”

हालांकि, एएफसी एशियन कप शुरू होने से पहले भारतीय टीम के कोच इगोर स्टिमैक की मुख्य चिंता फुटबॉलरों की चोटें हैं। सहल अब्दुल समद ने अपना आखिरी मैच 6 दिसंबर को मोहन बागान के लिए खेला था. तब से वह चोट के कारण टीम से बाहर चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले मैच में सहल का प्रदर्शन भी संदेह के घेरे में है. इगोर अपनी जगह अनिरुद्ध थापा या ब्रेंडन फर्नांडीस में से किसी एक को खेल सकते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के अलावा उज्बेकिस्तान और सीरिया भारत के साथ एक ही समूह में हैं। गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू ने कहा, ”हमारा ग्रुप आसान नहीं है. यह एक कठिन लड़ाई होगी.” उनका करियर 19 साल का है. सुनील छेत्री ने इन 19 सालों में भारत के लिए 145 मैच खेले हैं. 93 गोल किये. वह अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गए हैं. लेकिन गोल के प्रति उनकी भूख अभी भी कम नहीं हुई है. हालाँकि, नजरिया बदल गया है। मानसिकता में बदलाव आ रहा है. कतर के दोहा में एएफसी एशियन कप में खेलने उतरने से पहले सुनील ने यह बात कही।

पिछले कुछ महीनों से इस बात को लेकर काफी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सुनील कब संन्यास लेंगे। भारत के कोच इगोर स्टिमाच ने साफ कर दिया है कि आखिरी फैसला सुनील ही लेंगे. उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा. सुनील की जुबान पर भी रिटायरमेंट की बात आ गई है. उन्होंने कहा, ”मैंने एशियन कप से पहले अपनी पत्नी सोनम से बात की थी. उन्होंने कहा, मैं बहुत दबाव झेलता हूं. मुझे एन्जॉय करने को कहा. सोनम एक सांस में सही थी. इस बार मैं वही करने की कोशिश करूंगा जो मुझे बचपन में अच्छा लगता था।’ मैं मैदान पर अतिरिक्त दबाव नहीं लूंगा. रिटायरमेंट से पहले कितने दिन खेलूंगा, इसी मानसिकता के साथ मैदान पर उतरूंगा.

पहले वह मैदान पर जोश में आ जाते थे.’ लेकिन अब वह काफी शांत हैं. गर्म नहीं होता. भारतीय कप्तान ने इस बदलाव का श्रेय अपने बेटे को दिया. उन्होंने कहा, ”अब मैं बहुत खुश और शांत हूं. मेरे पिता बनने के बाद से यह बदल गया है। मैं अपने परिवार के साथ जो समय बिता सकता हूं वह मुझे नए सिरे से क्षेत्र में प्रवेश करने की ऊर्जा देता है। सब कुछ सोनम के लिए हो रहा है. ताकि मैं दिन में 8 घंटे सो सकूं, अच्छी एक्सरसाइज कर सकूं, उस समय का ज्यादातर समय बच्चे की देखभाल कर सकूं।”

सुनील अपनी पिछली तैयारी में कोई कमी नहीं रखना चाहते, भले ही उन्हें मैदान पर उतरने में मजा आया। उनके मुंह से अनुशासन की बात सुनी गई है. सुनील ने कहा, ”अनुशासन का पालन करना चाहिए. क्योंकि फुटबॉल एक टीम गेम है. एक दूसरे की मदद की जरूरत है. यह अनुशासन बेहतर समझ का एक बड़ा साधन है। अभ्यास में कड़ी मेहनत करें मैंने सदैव अनुशासित रहने का प्रयास किया है। आने वाले दिनों में भी मैं ऐसा ही करूंगा।” सुनील दो बार (2011 और 2019) एशियन कप में खेल चुके हैं। यह उनकी तीसरी प्रतियोगिता है. भारत के ग्रुप में ऑस्ट्रेलिया, उज्बेकिस्तान, सीरिया जैसी टीमें हैं. सुनील उन्हें चुनौती देने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा, ”एशियाई कप हमारे लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता है. वहां आपको ऑस्ट्रेलिया और उज्बेकिस्तान जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ खेलना होगा। पिछले 7-8 सालों में हमारे देश में फुटबॉल में काफी सुधार हुआ है. लेकिन प्रतिस्पर्धा यह समझने का सबसे बड़ा मंच है कि वास्तव में कितनी प्रगति हुई है। अगर हम यहां अच्छा प्रदर्शन कर सके तो पूरी दुनिया हमारी तरफ देखेगी।’

2011 एशियन कप में भारत ने पहला मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था. सुनीलेरा 0-4 से हार गए. सुनील ने कहा कि इस बार ऑस्ट्रेलिया के लिए जीतना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा, ”हमारी तैयारी अच्छी रही है. उस समय हम ऑस्ट्रेलियाई फुटबॉलरों के बारे में कुछ नहीं जानते थे। लेकिन अब मैं उनकी ताकत और कमजोरियों को जानता हूं।’ मैंने उसी के अनुसार अपनी योजना बनाई है।’ लेकिन असली बात इसे मैदान पर उतारना है.’ टीम के सभी फुटबॉलर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार हैं. मैं एक समय में एक ही मैच में जाना चाहता हूं।’

एशियन कप में भारत का पहला मैच 13 जनवरी को है. प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलिया है. सुनीलेरा ग्रुप के बाकी दो मैच 18 जनवरी को उज्बेकिस्तान और 23 जनवरी को सीरिया के खिलाफ खेलेंगे।

यमन ने अमेरिका, ब्रिटेन पर किया हमला!

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यमन ने अमेरिका, ब्रिटेन पर किया हमला! मिसाइलों से विद्रोही हाउती विद्रोहियों के कई शिविर नष्ट हो गएनवंबर से अशांत लाल सागर। गाजा में फिलिस्तीनियों पर इजरायल के हमलों के विरोध में हमास समर्थक हौथिस ने वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया है। लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर सिलसिलेवार हमलों के बाद अमेरिका ने यमन के हौथी विद्रोहियों को “अंतिम चेतावनी” जारी की है। उसके बाद, ईरान द्वारा समर्थित शिया सशस्त्र समूह को “संयमित” न होने के कारण पश्चिमी दुनिया ने खारिज कर दिया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट है कि यमन में हौथिस के कई ठिकानों पर लाल सागर में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों ने हमला किया है. अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने कहा कि हाउथिस द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर किया गया हमला इस प्रतिकार का कारण है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने गुरुवार रात एक बयान में कहा कि ”जरूरत पड़ने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.” दूसरी ओर, हौथी विद्रोहियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया के हमलों का ‘जवाब’ देने की भी चेतावनी दी है. संयोग से, पिछले 19 नवंबर से, अशांत लाल सागर। क्योंकि गाजा में इजराइल पर हमले के विरोध में घोषित हमास समर्थित हाउथिस ने एक के बाद एक वाणिज्यिक जहाजों पर हमला करना शुरू कर दिया। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात 2015 से ईरान समर्थित शिया विद्रोही समूह हौथिस के खिलाफ अभियान में यमनी सरकारी बलों की मदद कर रहे हैं। इसके चलते उन्होंने कई बार उन दोनों देशों पर हमला किया है। हाल ही में, यमन की राजधानी सना के उत्तर में हौथी विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाकों में यमन के सरकारी बलों ने एक अभियान शुरू किया है।

5 दिसंबर को अमेरिकी संसद में एक गंभीर निर्णय लिया गया – उस देश को यह स्वीकार करना होगा कि यहूदी राज्य आंदोलन की आलोचना यहूदी-विरोध का नाम है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने खुद एक भाषण में खुद को यहूदी-राज्य आंदोलन का भागीदार होने का दावा किया है. स्वाभाविक रूप से, इस खबर से संपूर्ण मुस्लिम जगत और फिलिस्तीन समर्थक लोगों में आक्रोश है। वे इसमें ‘इस्लामोफोबिया’ या मुस्लिम-घृणा का भूत देखते हैं। यह नफरत तो है, लेकिन इसमें और भी बहुत कुछ है। सच तो यह है कि अरब-इजरायल संघर्ष में पश्चिमी दुनिया हमेशा इजराइल के साथ रही है। पश्चिम में प्रोटेस्टेंट वामपंथी कोई अपवाद नहीं हैं। फिलीस्तीनी दार्शनिक एडवर्ड सईद अरब-फिलिस्तीनी दुर्दशा के प्रति फ्रांसीसियों की उदासीनता से सिमोन डी ब्यूवोइर या जीन-पॉल सात्रे के समान ही नाराज थे। जो लोग वियतनाम मुक्ति युद्ध के पक्षधर हैं वे फ़िलिस्तीन मुक्ति युद्ध के बारे में चुप क्यों हैं?

हम इज़राइल के प्रति पश्चिमी दुनिया के इस अवांछित पूर्वाग्रह को कैसे समझा सकते हैं? इजराइल की भूमि, एक ओर, फिलिस्तीनियों की भूमि में यहूदियों का अन्यायपूर्ण जबरन उपनिवेशीकरण है, और दूसरी ओर, यह यहूदियों की आत्म-स्थापना का प्रतीक है, जो हजारों लोगों पर अत्याचार कर रहे हैं। वर्षों का. असीरियन, बेबीलोनियन और यूनानी साम्राज्यों द्वारा उत्पीड़न और अंततः यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने के बाद, इब्राहीम की संतानें रोमनों द्वारा पीछा करते हुए पश्चिमी एशिया से लेकर पृथ्वी के छोर तक बिखर गईं। तभी से यहूदी का अर्थ बेघर, अछूत हो गया। यहूदियों का अर्थ है ‘यहूदी बस्ती’ का निर्वासन।

पूर्व-फ्रांसीसी क्रांतिकारी यूरोपीय समाज में, यदि कोई यहूदी पैदल यात्री सड़क पर चलता था, तो ईसाई न केवल उसकी छाया को रौंद देते थे, बल्कि खुले दिन के उजाले में उसका अपमान भी करते थे। यूरोपीय उपनिवेशों में अश्वेतों की तरह नफरत किए जाने वाले यहूदियों को पहली बार फ्रांस में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान पूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त हुए। 19वीं सदी की शुरुआत में जर्मनी के प्रशिया राज्य ने भी यहूदियों की मुक्ति की घोषणा की। यह ऐसा है जैसे यहूदियों के हाथ में चाँद लग गया हो। लेकिन मुक्ति की यह चाहत जल्द ही मैदान में दम तोड़ गई. फ्रांसीसी क्रांति के दौरान मिले पंख को नेपोलियन ने दोबारा काट दिया। प्रशिया का वादा भी भ्रामक साबित हुआ। यहूदियों को सरकार या सेना में ज़िम्मेदार पद संभालने का कोई अधिकार नहीं था।

सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर अपंग, यहूदी राष्ट्रवादी आकांक्षाएं उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुईं, जो एक यहूदी राज्य की योजना में परिणत हुईं, जिसे ‘ज़ायोनीवाद’ या यहूदी-राज्य आंदोलन के रूप में जाना जाता है। इस आंदोलन के संस्थापक थियोडोर हर्ज़ल थे। अपने लेखन में, हर्ज़ेल का दावा है कि उन्होंने हजारों वर्षों के पारंपरिक साहित्य में व्यक्त यहूदी दर्द-आशा-इच्छा के सार पर प्रकाश डाला है। बाइबिल की व्याख्या के अनुसार, भविष्य का यहूदी राज्य वास्तव में सपने देखने वाले की मंदिर-निर्माण परियोजना की तरह, इज़राइल की भूमि और यहूदियों के बीच एक दैवीय समझौते का परिणाम है।

मंत्री सुजीत के मोहल्ले में केंद्रीय बलों का रूट मार्च, अव्यवस्था दिखने पर डंडा उठाने का आदेश

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लेकटाउन के श्रीभूमि में अग्निशमन मंत्री सुजीत बोस के पड़ोस में केंद्रीय बल सुबह से ही लाठी-डंडों और बंदूकों के साथ गश्त कर रहे हैं। रूट मार्ट चल रहा है. क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था की अनुमति नहीं है। जमावड़ा हटाया जा रहा है. राज्य के अग्निशमन मंत्री सुजीत बोस के क्षेत्र में गुरुवार सुबह मतदान की काफी हलचल रही. केन्द्रीय सेना के जवान हाथों में लाठियाँ और कन्धे पर बन्दूकें लटकाये घूम रहे हैं। क्षेत्र में एकत्र होने की अनुमति नहीं है. जब उन्हें कहीं थोड़ी भीड़ जमा होती दिखती है तो वे आगे बढ़ जाते हैं। जाकर इकट्ठे होने का कारण पूछा। इसके बाद इलाके से भीड़ को हटाया जा रहा है. केंद्रीय बल सुबह से ही इलाके में लगातार गश्त कर रहे हैं. यह तस्वीर राज्य में विधानसभा या पंचायत चुनाव के दौरान देखने को मिलती है. बाहरी लोगों के प्रवेश को रोकने और मतदाताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए केंद्रीय बलों के जवान हथियारों के साथ इस तरह गश्त करते थे.

ईडी गुरुवार सुबह तड़के लेकटाउन के श्रीभूमि इलाके में सुजीत के घर पहुंची। उनके एक ही इलाके में दो घर हैं. पुर नियोग ‘भ्रष्टाचार’ मामले की जांच के लिए उन दोनों घरों की तलाशी ली जा रही है. हालांकि, इस बार ईडी फूंक-फूंक कर कदम रख कर मैदान में उतरी है. कुछ दिन पहले संदेशखाली में तृणमूल नेता शाहजहां शेख के घर की तलाशी के दौरान मिले अनुभव से सीख लेकर इस बार अधिकारी तैयार होकर आये हैं. उनके साथ सीआरपीएफ की संख्या इस बार से कहीं ज्यादा है.

सुबह से ही देखा जा रहा है कि सेंट्रल आर्मी के जवान इलाके में गश्त कर रहे हैं. उनके पास लाठी-डंडों और बंदूकों के अलावा आंसू गैस सेल भी हैं. अगर उन्हें कहीं गड़बड़ी दिखती है तो उनका सवाल होता है, ‘आप यहां क्यों खड़े हैं?’ यानी ईडी कहीं भी लोगों को इकट्ठा नहीं होने देना चाहती. मंत्री के घर के सामने भी अगर कोई बेवजह बैठा दिख रहा है तो उसे हटाया जा रहा है.

संदेशखाली में उन्होंने शिकायत की कि शाहजहां के घर में घुसने से पहले 800 से 1000 लोग बाहर जमा थे. ईडी के मुताबिक, शाहजहां ने ही समर्थकों को अंदर से बुलाया था. इसके बाद वह पिछले दरवाजे से भाग गया। उस दिन गुस्साई भीड़ ने ईडी अधिकारियों की पिटाई कर दी थी. तीन लोगों को अस्पताल में भी भर्ती कराया गया. शाहजहाँ अभी तक नहीं मिला है।

श्रीभूमि सुजीत का क्षेत्र. वह वहां काफी प्रभावशाली हैं. नतीजा यह है कि इलाके में उनके अनुयायियों की संख्या कम नहीं है. संदेशखाली की तरह सुजीत के लिए भी लोग श्रीभूमि में ईडी के खिलाफ रैली कर सकते हैं, केंद्रीय संस्था उनके लिए पहले से ही तैयार है. क्षेत्र में गश्त करने वाला हर व्यक्ति हेलमेट पहन रहा है। यदि कोई हमला करता है तो यह प्रणाली सिर पर गंभीर चोट लगने से बचाने के लिए है। इससे पहले, ईडी राशन से लेकर शिक्षक भर्ती या सार्वजनिक भर्ती तक कई ‘भ्रष्टाचार’ मामलों की जांच के लिए राज्य के मंत्रियों और विधायकों के घरों की तलाशी लेने गई थी। फिरहाद हकीम से लेकर मदन मित्रा, ज्योतिप्रिय मल्लिक तक, ईडी ने किसी के घर की तलाशी लेने की तैयारी नहीं की. सभी मामलों में ईडी के पास केंद्रीय जवानों की संख्या नाममात्र थी. जिस घर की तलाशी चल रही है उसके सामने कुछ सैनिक पहरा दे रहे हैं. ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि केंद्रीय बल ईडी की तलाश पर फोकस करते हुए पूरे इलाके में रूट मार्च कर रहे हैं. वे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. केंद्रीय एजेंसी के तलाशी अभियान के संदर्भ में यह सक्रियता अभूतपूर्व है.

पीयूआर मामले में ईडी गुरुवार को बारानगर विधायक तापस रॉय के घर भी गयी. सुबह से ही वहां तलाश जारी है. इसके अलावा ईडी ने तृणमूल पार्षद सुबोध चक्रवर्ती के विरती स्थित घर पर भी छापेमारी की.

हालांकि, ईडी सूत्रों ने कहा कि इस मामले में विवरण जानने के लिए आगे की जांच की आवश्यकता है। शुरुआती तौर पर जो पता चला है वह यह है कि इस ग्रुप का ‘एडमिन’ अयान शील था, जो पहले ही भर्ती मामले में पकड़ा जा चुका था। हालांकि, जांचकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या अयान ने ही इस ग्रुप को खोला था, या पर्दे के पीछे कोई और ‘बड़ा मुखिया’ था। ईडी सूत्रों के मुताबिक, इस व्हाट्सएप ग्रुप में राज्य की कई नगर पालिकाओं के अधिकारी भी थे. सूत्र ने बताया कि इस ग्रुप का पता अयान के फोन की जांच के बाद चला.

कुछ जांचकर्ताओं का मानना ​​है कि इस व्हाट्सएप ग्रुप में नगर पालिका के अलावा नगर निगम प्रशासन भी समानांतर रूप से संचालित होता था. इस ग्रुप में भर्ती से जुड़े कई फैसले भी लिए गए. लेकिन ईडी इस बात की जांच कर रही है कि क्या केवल एक समूह था या कई समूह थे, वास्तव में समूह के ‘सदस्य’ कौन थे।

शुरुआती भर्ती घोटाले में गिरफ्तार कुंतल घोष और शांतनु बनर्जी के सूत्रों से प्रमोटर अयान शील का नाम सामने आया था. घटना की शुरुआत बीते 19 मार्च को हुई. ईडी ने साल्ट लेक स्थित अयान के दफ्तर और हुगली स्थित उसके घर की तलाशी ली. उस वक्त जांचकर्ताओं को डिस्टा डिस्टा आंसर शीट (ओएमआर शीट) के साथ 28 पन्नों का एक दस्तावेज मिला था. जाहिर तौर पर, शुरू में इसे एक भर्ती दस्तावेज़ माना गया था, लेकिन बाद में यह पाया गया कि दस्तावेज़ में कई नगर पालिकाओं के लिए उम्मीदवारों की सूची और उस संबंध में सिफारिशें शामिल थीं। जब्त किए गए दस्तावेजों में जांच अधिकारियों को उम्मीदवार सूची में नामों के साथ कई ‘कोड वर्ड’ भी मिले।

मैदान पर रोहित शर्मा की एक और छवि देखने को मिली!

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मैच के बाद गुस्साए रोहित ने गिल को माफ कर दिया, कप्तान ने पांच सेकेंड के अंदर ही शुभमन को फिर मारा
मोहाली में अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 158 रन बनाए. उस रन का पीछा करते हुए भारत ने दूसरी ही गेंद पर विकेट खो दिया. रोहित रन आउट हो गए. मैच के अंत में उन्होंने क्या कहा? रोहित शर्मा मैदान में शुभमन गिल से नाराज थे. रन आउट होने के बाद वह अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए बाहर चले गए. मैच के अंत में हालांकि भारतीय कप्तान काफी संभले. उन्होंने माफ़ी मांगते हुए कहा, ‘ऐसा हो सकता है.’ लेकिन कुछ ही सेकंड में कप्तान एक और कारण से फिर से उस इच्छा पर अटक गए।

मोहाली में अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 158 रन बनाए. उस रन का पीछा करते हुए भारत ने दूसरी ही गेंद पर विकेट खो दिया. रोहित रन आउट हो गए. मैच के बाद जब रोहित से उस घटना के बारे में पूछा गया तो भारतीय कप्तान ने कहा, ”ऐसी घटना हो सकती है. ऐसा होने पर बहुत निराशा होती है. क्योंकि हर कोई टीम के लिए रन बनाना चाहता है. यदि आप ऐसा नहीं कर सकते, तो आप निराश होंगे।” चार या पांच सेकंड के भीतर, रोहित ने शुबमन को फिर से मारा। क्योंकि शुबमन खुद बड़े रन नहीं बना सके. रोहित ने कहा, ”लेकिन मैं चाहता था कि शुभमन बड़े रन बनायें. वह बहुत अच्छा खेल रहा था. लेकिन वह पारी लंबी नहीं चली।”

हालांकि, मैदान पर रोहित की एक और छवि देखने को मिली. फारूकी की दूसरी गेंद पर फजल हक ने मिड ऑफ की ओर रन के लिए बुलाया और रोहित दौड़ने लगे। लेकिन शुबमन ने उस कॉल का जवाब नहीं दिया और गेंद को देख रहे थे. उसने ध्यान ही नहीं दिया कि रोहित उसकी ओर आया है। उन्होंने फ़ॉल क्रीज़ नहीं छोड़ी. रोहित विपरीत दिशा में चला गया। रोहित को अफगानिस्तान ने रन आउट किया. भारतीय कप्तान को शून्य रन पर लौटना पड़ा. इसके बाद रोहित को गुस्सा आ गया. वह अपना हाथ उठाता है और शुबमन से कहता है कि उसे रन लेना चाहिए था। कमेंटेटर्स ने ये भी कहा कि शुभमन को रोहित की कॉल का जवाब देना चाहिए था और दौड़ना चाहिए था. लेकिन युवा ओपनर ने ऐसा नहीं किया. वह खुद 12 गेंदों पर 23 रन बनाकर आउट हो गए. अफगानिस्तान के खिलाफ 6 विकेट से मैच जीतने के बाद खुश रोहित। भारत ने 15 गेंद शेष रहते ही विजयी रन बना लिया। शिवम दुबे ने 40 गेंदों पर 60 रन बनाए. उन्होंने एक विकेट भी लिया. जीतेश शर्मा ने 20 गेंदों पर 31 रनों की अहम पारी खेली. तिलक वर्मा तीसरे नंबर पर उतरे और 22 गेंदों पर 26 रन बनाकर भारत की पारी बनाने में मदद की। रोहित ने कहा, ”इस मैच में कई सकारात्मक बातें हैं. शिवम दुबे, जीतेश शर्मा ने अच्छा खेला. तिलक ने अच्छा खेला. रिंकू सिंह फॉर्म में हैं।”

भारत का अगला मैच रविवार को है. भारत-अफगानिस्तान के बीच वह मैच इंदौर में खेला जाएगा. उस मैच से पहले विराट कोहली के टीम से जुड़ने की उम्मीद है रोहित शर्मा ने गुरुवार को ‘शतक’ लगाया. हालाँकि स्कोरबोर्ड ऐसा नहीं कहेगा। वहां ये दिखेगा कि उसने जीरो कर लिया है. लेकिन रोहित का नाम विश्व क्रिकेट में देश के लिए 100 मैच जीतने वाले पहले क्रिकेटर के तौर पर रिकॉर्ड बुक में लिखा जाएगा. इससे पहले किसी भी क्रिकेटर ने देश के लिए इतने मैच नहीं जीते हैं. भारत ने अफगानिस्तान के खिलाफ 6 विकेट से मैच जीत लिया. रोहित ने 14 महीने बाद टी20 क्रिकेट में वापसी की. उनके नेतृत्व में भारत ने आखिरी मैच 2022 टी20 वर्ल्ड कप में खेला था. भारत वह मैच 10 विकेट से हार गया. 14 महीने बाद रोहित ने युवा भारतीय टीम के साथ अफगानिस्तान के खिलाफ जीत हासिल की. हालांकि उस मैच में वह बल्ले से कोई रन नहीं बना सके थे. शुबमन गिल शून्य रन पर बुल रन में रन आउट हो गए. भारत को मैच जीतने में कोई दिक्कत नहीं हुई.

रोहित के 100 मैच जीतने के रिकॉर्ड के आसपास भी कोई नहीं पहुंच सका. दूसरे स्थान पर हैं शोएब मलिक. उन्होंने 86 मैच जीते. हालांकि अब वह पाकिस्तान के लिए खेलते नजर नहीं आते हैं. विराट कोहली तीसरे स्थान पर हैं. उन्होंने 73 मैच जीते. विराट के लिए भी रोहित को छू पाना मुश्किल है. रोहित ने भारत के लिए 149 टी20 मैच खेले हैं. सबसे पहले 2007 टी20 वर्ल्ड कप में खेले. महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में भारत ने ट्रॉफी जीती। 2024 में रोहित टी20 वर्ल्ड कप में भारत की कप्तानी करते नजर आ सकते हैं.

लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन में कमल का ‘तीसरा’ रुख, क्या शाह के निर्देश?

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पिछले विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद से ही भाजपा में विरोध शुरू हो गया था। गेरुआ शिबिर लोकसभा चुनाव में इसकी पुनरावृत्ति नहीं चाहते हैं। फॉर्मूला कैसा होगा ये केंद्रीय नेतृत्व ने तय कर लिया है. जमीनी स्तर पर बूढ़े-युवा संघर्ष पहले ही पैदा हो चुका था। हालाँकि, लोकसभा चुनाव के साल की शुरुआत के बाद से वह आग बुझ गई है। पार्टी के स्थापना दिवस पर वरिष्ठों और नवागंतुकों में टिप्पणियों की जंग शुरू हो गई. वह मतभेद अभी तक पूरी तरह से सुलझ नहीं पाया है.

तृणमूल नेताओं के एक वर्ग का मानना ​​है कि उस बहस की छाप लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवार के चयन में देखी जा सकती है. संयोग से, राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा में भी ‘आदि-नव्या’ विवाद पुराना है। उस विवाद से बचने के लिए गेरुआ खेमे ने लोकसभा चुनाव में तीसरा रास्ता सोचा है. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के दौरे पर राज्य नेतृत्व को उम्मीदवार चयन फॉर्मूले पर अपनी और केंद्रीय नेतृत्व की राय से अवगत कराया है. उन्होंने कहा कि 35 सीटों पर लड़कर कोई ‘रिस्क’ नहीं लिया जा सकता. जिस उम्मीदवार के जीतने की संभावना सबसे अधिक होगी उसे नामांकित किया जाएगा।

प्रदेश भाजपा के 16 सांसदों में से एक को उम्र के लिहाज से ‘वरिष्ठ’ कहा जा सकता है। वह हैं 70+ सांसद एसएस अहलूवालिया। बर्दवान-दुर्गापुर निर्वाचन क्षेत्र के वर्तमान सांसद 2014 में दार्जिलिंग से जीते और केंद्र में मंत्री बने। अब तक बीजेपी की योजना का पता चल चुका है कि 2019 में चुने गए सांसद इस बार भी उम्मीदवार होंगे. लेकिन सीटें बदल सकती हैं. जैसा कि 2019 में अहलूवालिया के मामले में हुआ था। परिणामस्वरूप, भाजपा के मामले में, उम्मीदवार चयन की अटकलें मुख्य रूप से पिछली बार हारी हुई सीटों पर आधारित हैं। उन सीटों के अलावा आसनसोल, जिस पर उपचुनाव में तृणमूल ने कब्जा कर लिया था और अर्जुन सिंह की बैरकपुर, जो कि तृणमूल में शामिल हो गये थे, पर भी अटकलें लगाई जा रही हैं. आसनसोल से बाबुल सुप्रियो लगातार दो बार जीते. आसनसोल पर कब्ज़ा बीजेपी के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि बाबुल दो बार केंद्रीय मंत्री बने। फिर, गेरुआ खेमे के कई लोग सोचते हैं कि अर्जुन के उम्मीदवार बनने पर बैरकपुर जैसी ‘कठिन’ जमीन पर कमल खिल गया। बीजेपी के अंदर दो और सीटों पर उम्मीदवारों को लेकर उत्सुकता है. हुगली के दक्षिण में आरामबाग और मालदह। बीजेपी ये दोनों सीटें बहुत कम अंतर से हार गई. क्रमश: 1,142 और 8,222 वोट. हालांकि पार्टी में अटकलें हैं कि आरामबाग में तपन रॉय को फिर से उम्मीदवार बनाया जाएगा या मूल नेता मधुसूदन बाग को, लेकिन यह तय है कि मालदा दक्षिण में इंग्लिशबाजार के वर्तमान विधायक श्रीरूपा को उम्मीदवार बनाया जाएगा। साथ ही दार्जिलिंग के मौजूदा सांसद राजू बिस्ता को दूसरे राज्य में भेजा जा सकता है और उस सीट पर नया उम्मीदवार लाया जा सकता है.

सुकांत ने पार्टी की नीति स्पष्ट की, हालांकि शाह यह नहीं बताना चाहते कि कोलकाता आने पर उन्होंने इस संबंध में क्या निर्देश या सुझाव दिये थे. उन्होंने आनंदबाजार ऑनलाइन से कहा, ”जीतने की क्षमता सबसे बड़ी योग्यता मानी जाएगी. उम्मीदवारों के चयन में हम किसी अन्य बात पर विचार नहीं करेंगे। केंद्रीय नेतृत्व ने इस नीति को न सिर्फ बंगाल में बल्कि पूरे देश में अपनाया है. इस बार हमारा लक्ष्य 400 सीटें पार करना है.

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान कई लोगों को पार्टी में शामिल होने से ही टिकट मिल गया था. जो लोग लंबे समय से बीजेपी के उम्मीदवार बनना चाहते थे वो नाराज थे. बीजेपी को इस बात को लेकर काफी नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है कि पार्टी के बुरे वक्त के साथियों को छोड़कर नए लोगों को मौका क्यों दिया जा रहा है. क्या इस बार आदिरा को मिलेगा ‘अतिरिक्त लाभ’? इस सवाल के जवाब में उम्मीद के मुताबिक सुकान्त ने कहा, ”बीजेपी में आदि या नव्या जैसी कोई चीज नहीं है. अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सभी एकजुट होकर लड़ने को तैयार हैं. सभी को यह स्वीकार करना होगा कि पार्टी उसी उम्मीदवार को अपना उम्मीदवार बनाएगी जो जीत हासिल कर सके. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन कितने समय से बीजेपी कर रहा है!

बीजेपी का आदि बनाम नव्या विवाद अक्सर खुलकर सामने आ जाता है, भले ही सुकांत इसे स्वीकार नहीं करना चाहते हों. दूसरी पार्टियों से सबसे ज्यादा लोगों को बीजेपी में शामिल कराने वाले दिलीप घोष कई बार आदिवासियों के ‘मुखपत्र’ रहे हैं. हालांकि, विधानसभा चुनाव से पहले ‘जोड़न मेला’ आयोजित करने को लेकर दिलीप का तर्क था, ”पार्टी बड़ी हो रही है.” इसलिए अधिक नेताओं की जरूरत है. कम समय में नेता नहीं बनाया जा सकता. इसलिए अन्य पार्टी के नेताओं को लिया गया है.

लेकिन इस बार बीजेपी कोई गलती नहीं करना चाहती. जबकि सुकांत ने पार्टी की नीति को स्पष्ट रूप से नहीं बताया, राज्य के एक शीर्ष भाजपा नेता ने कहा कि उन्होंने समझाया कि पार्टी का ‘जीतने की क्षमता’ से क्या मतलब है। उनके शब्दों में, “प्रत्येक सीट की एक अलग जनसंख्या संरचना होती है। स्थानीय लोग और कार्यकर्ता उत्साहित हैं. उन सभी को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। फिर, बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिद्वंद्वी कैसा है।

उसी नेता ने याद दिलाया कि बंगाल के नेता कुछ भी सोचें, उम्मीदवार चयन की असली ‘हड़बड़ी’ केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में होगी. शायद शाह ही इस राज्य के जिम्मेदार नेताओं और प्रदेश नेतृत्व से सलाह-मशविरा कर तय करेंगे कि क्या करना है. राज्यों से सूची मांगने के साथ ही केंद्रीय नेतृत्व भी सूची बनायेगा. ‘नमो’ ऐप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से मौजूदा सांसद के अलावा हर लोकसभा क्षेत्र में तीन वैकल्पिक बीजेपी नेताओं के नाम जानने को कहा गया है. बीजेपी नेताओं का मानना ​​है कि यह भी विचार का एक मापदंड हो सकता है. हालाँकि, जो लोग उम्मीदवार बनना चाहते हैं, उन्होंने न केवल भाजपा नेताओं, बल्कि पार्टी के राज्य कार्यालय में भी ‘बायोडाटा’ जमा करना शुरू कर दिया है।

क्या किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर सकती है ED? जानिए नियम!

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ED किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर सकती है या नहीं! एक बार फिर जांच एजेंसी ईडी और विपक्षी नेताओं के बीच टकराव तेज हो गया है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को ईडी का समन मिला, लेकिन वे नहीं गए। दोनों ने अंदेशा जताया कि ईडी उन्हें अरेस्ट कर सकती है। तब से यह सवाल उठा है कि ईडी किसी मामले में समन कब करती है? कितनी बार करती है? अरेस्ट करने के पीछे क्या तर्क होता है? क्या किसी सीएम को भी ईडी अरेस्ट कर सकती है? एक बार फिर इन सवालों के इर्द-गिर्द सियासत भी शुरू हो गई है। ईडी कथित शराब घोटाले में केजरीवाल को तीन बार समन भेज चुकी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी ईडी जमीन सौदे से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सात पर समन भेज चुकी है। दिल्ली और झारखंड के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि केंद्र ईडी का गलत इस्तेमाल कर रही है और उन्हें राजनीतिक वजहों से समन भेजा जा रहा है। दोनों का यह दावा है कि लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, जिससे वे चुनाव प्रचार ना कर सकें। दिल्ली सरकार के दो मंत्री मनीष सिसोदिया और संजय सिंह पहले ही शराब घोटाला मामले में जेल में है। केजरीवाल ने दिल्ली में लोगों की राय भी लेनी शुरू की है कि अगर वह गिरफ्तार होते हैं तो क्या उन्हें सीएम रहना चाहिए। इससे पहले उनकी पार्टी के विधायक प्रस्ताव पास कर चुके हैं कि केजरीवाल को सीएम रहना चाहिए। झारखंड में भी हेमंत सोरेन ने जेल जाने की सूरत में नेतृत्व को लेकर पार्टी के साथ मीटिंग कर ली है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के वक्त वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के करीबियों पर भी ईडी की तरफ से छापेमारी की गई थी। पिछले कुछ वर्षों में ईडी ने कांग्रेस नेता नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी सहित तेजस्वी यादव, संजय राउत, अभिषेक बनर्जी सहित कुछ और लोगों पर शिकंजा कसा है। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी विपक्षी एकता से डर रही है। विपक्ष को परेशान करने के लिए जांच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल कर रही है। बीजेपी इसे करप्शन पर वार करार दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में करप्शन के खिलाफ जंग का जिक्र करते हैं। वह विपक्ष पर तंज कसते हुए कहते हैं कि जिन लोगों के करप्शन की दुकान बंद हो रही है वे परेशान हैं। बीजेपी करप्शन के खिलाफ जंग को एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी बना रही है।

प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA का सेक्शन 50 जांच एजेंसी ईडी को किसी भी व्यक्ति को समन जारी करने का अधिकार देता है। इस सेक्शन के तहत डायरेक्टर, अडिशनल डायरेक्टर, जॉइंट डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर या असिस्टेंट डायरेक्टर स्तर के अधिकारी के पास समन जारी करने की शक्ति होती है। सेक्शन 50 के तहत किसी भी व्यक्ति को समन जारी करने और दस्तावेजों को पेश करने और बयान दर्ज करने की जरूरत होती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फैसले के मुताबिक गिरफ्तार करने की शक्ति PMLA के सेक्शन 50 में मौजूद ही नहीं हैं। हालांकि सेक्शन 19 ईडी के अधिकारियों को शर्तों को पूरा करने पर किसी शख्स को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। इसके अलावा समन के बाद भी किसी शख्स के पेश न होने पर ईडी कोर्ट को भी अप्रोच कर सकती है और किसी के खिलाफ गैर जमानती वारंट हासिल कर सकती है। इसके लिए ईडी को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि प्रथम दृष्टया उसके पास सबूत हैं। जिसके खिलाफ समन किया गया है, वह जांच में बिल्कुल सहयोग नहीं कर रहा है।

लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य का कहना है कि ईडी शक होने पर PMLA के अंदर समन जारी कर सकती है। किसी मामले में जानकारी हासिल करने के लिए गवाह के तौर पर भी बुला सकती है। अब सवाल यह है कि समन इशू करने पर अगर कोई नहीं आते हैं तो क्या अरेस्ट किया जा सकता है? एजेंसी को लिखित में बताना होता है कि आखिर किन कारणों के चलते एक्शन लिया जा रहा है, ऐसा नहीं है कि किसी को केवल शक के आधार पर अरेस्ट कर लो। एजेंसी को दिखाना पड़ेगा कि किस ग्राउंड पर ईडी को शक हुआ है। लिखित में शक के आधार को बताना होगा। किस हैसियत से बुलाया है, गवाह या आरोपी के तौर पर बुलाया है, ये साफ करना होगा। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि कितनी बार समन जारी किया जा सकता है। सीएम को अरेस्ट करने का कोई प्रोटोकॉल नहीं है।

पूर्व सचिव, भारत सरकार विजय शंकर पाण्डेय का कहना है कि ये जितनी भी जांच होती है, सब एक्ट, रूल्स में दिए हुए है। आपको जांच के लिए बुलाया जा रहा है, तो आपकी ये जिम्मेदारी है कि जाएं और जो भी सवाल पूछे जा रहे हैं बताएं। यह स्थितियों पर निर्भर करता है कि एजेंसी किसी के घर जाकर पूछताछ कर लें। जहां तक दिल्ली और झारखंड के सीएम को समन की बात है तो उनको सवालों के जवाब देने ही होंगे। सीएम को एजेंसी के सामने अपीयर होना पड़ेगा और अगर ऐसा नहीं होता है तो एजेंसी उनको अरेस्ट भी कर सकती है। कोर्ट में जाकर बता सकती है कि जांच में सहयोग नहीं हो रहा है या एजेंसी खुद भी अरेस्ट कर सकती है।

क्या पुलवामा अटैक के बाद बौखला गया था पाकिस्तान?

आज हम आपको उसे कहानी के बारे में बताएंगे जिसमें पुलवामा अटैक के बाद पाकिस्तान बौखला गया था! 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में आतंकियों ने अपनी नापाक हरकतों को अंजाम दिया था। इस आतंकी हमले के बाद भारत ने आक्रामक कूटनीति से पाकिस्तान को दिन में तारे दिखा दिए थे। भारत के आक्रामक रवैये ने पाकिस्तान को इतना डरा दिया कि उसे अपनी आतंकी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। घबराए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने आधी रात पीएम मोदी को फोन किया, लेकिन उन्होंने बात करने से मना कर दिया। उस रात की इनसाइड स्टोरी आज हम बता रहे हैं। भारतीय सेना किसी भी क्षण हमले करने के लिए तैयार थी। पाकिस्तान की तरफ 9 भारतीय मिसाइलों ने निशाना साध लिया था। पाकिस्तान को जब इसकी खबर हुई तो वो पूरी पाक सरकार घबरा गई। आनन फानन में आधी रात को तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया के दरवाजे पर पाक के अधिकारियों ने दस्तक दी, ताकि बातचीत से स्थिति को शांत किया जा सके। पाकिस्तानी पीएम इमरान खान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करना चाहते थे। ये कहानी जिस रात की है उसे पीएम मोदी ने खुद ‘कत्ल की रात’ बताया है। ये रात थी 27 फरवरी 2019 की। ये वो रात थी जिसमें भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान पाकिस्तान की हिरासत में थे। अटकलें लगाई जा रही थी कि भारत कभी भी हवाई हमला कर सकता है। इस घटना का जिक्र अजय बिसारिया ने अपनी किताब एंगर मैनेजमेंट में किया है। उन्होंने भारत की शानदार कूटनीति का जिक्र करते हुए विंग कमांडर अभिनंदन वाले मामले के बारे में बताया है कि कैसे भारत की कूटनीति के चलते पाक ने अभिनंदन को दो दिन में ही रिहा कर दिया।

बिसारिया ने खुलासा किया कि उन्हें आधी रात को इस्लामाबाद में भारत में पाकिस्तान के तत्कालीन उच्चायुक्त सोहेल महमूद का फोन आया, उन्होंने कहा कि इमरान पीएम मोदी से बात करना चाहते हैं। बिसारिया ने दिल्ली में लोगों से पूछताछ की और वापस महमूद के पास पहुंचे और कहा कि मोदी उस समय उपलब्ध नहीं थे और कोई भी जरूरी संदेश खुद उच्चायुक्त को दिया जा सकता है। उस रात बिसारिया ने महमूद से दोबारा बात नहीं की। अगले दिन, 28 फरवरी को इमरान खान ने अभिनंदन को रिहा करने के पाकिस्तान के फैसले की घोषणा करते हुए संसद में कहा, उन्होंने शांति के हित में मोदी को फोन करने की कोशिश की थी, लेकिन इसके बारे में विस्तार से नहीं बताया। पाकिस्तान ने मूंछों वाले भारतीय लड़ाकू पायलट की रिहाई को शांति संकेत कहा, लेकिन भारत और पाकिस्तान में अमेरिका और ब्रिटेन के दूतों सहित पश्चिमी राजनयिकों ने इस्लामाबाद को बताया कि पायलट को नुकसान पहुंचाने पर हालात कितने खराब हो सकते थे। भारत की धमकी कितनी गंभीर थी, इसका अंदाजा पाक को हो गया था। पाकिस्तान वास्तव में डरा हुआ लग रहा था। पाकिस्तान ने 26 फरवरी की घटनाओं के बाद इनमें से कुछ राजनयिकों को लगातार तीन बार तलब किया था।

इनमें से कुछ राजदूतों ने रात भर भारत के विदेश सचिव को फोन करके बताया कि पाकिस्तान न केवल अभिनंदन को रिहा करने के लिए तैयार है, बल्कि भारत के पुलवामा डोजियर पर कार्रवाई करने और आतंकवाद के मुद्दे पर बात करने के लिए भी तैयार है। उन्होंने उनसे कहा कि इमरान खान अगले दिन संसद में ये घोषणाएं करेंगे। बिसारिया के अनुसार, अमेरिका और ब्रिटेन के दूतों ने डीजी आईएसआई असीम मुनीर वर्तमान सेना प्रमुख और विदेश सचिव तहमीना जंजुआ के साथ बातचीत में पाकिस्तान के इस दावे को खारिज कर दिया कि यह एक फेक ऑपरेशन था। उन्होंने न केवल पाकिस्तानी राजनयिकों को बल्कि जीएचक्यू, रावलपिंडी को भी भारत के कड़े संदेश से अवगत कराया।

बिसारिया कहते हैं, ‘भारत की आक्रामक कूटनीति प्रभावी थी, भारत की पाकिस्तान और दुनिया से अपेक्षाएं स्पष्ट थीं, संकट को बढ़ाने के विश्वसनीय संकल्प द्वारा समर्थित थी।’ किताब में यह भी खुलासा किया गया है कि कैसे इमरान के एक करीबी दोस्त ने एससीओ शिखर सम्मेलन के इतर बिश्केक में इमरान और मोदी के बीच मुलाकात और बातचीत के लिए बिसारिया से संपर्क किया था, जिसके जरिए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान प्रधानमंत्री मोदी को ये बता सकें कि आतंकवाद से निपटने के लिए वो कितने ईमानदारी से काम कर रहे हैं। सैन्य कार्रवाई का संकेत देते हुए 2019 में एक चुनावी रैली में पीएम मोदी ने कहा था कि सौभाग्य से पाकिस्तान ने अभिनंदन को रिहा कर दिया वरना वह कत्ल की रात होती।

भारत ने आधिकारिक तौर पर कभी नहीं कहा कि अभिनंदन की रिहाई के लिए उसने पाकिस्तान पर मिसाइलें दागीं, लेकिन बिसारिया ने खुलासा किया कि कैसे इस खतरे ने सेना और इमरान सरकार को परेशान कर दिया था। जंजुआ ने अभिनंदन के पकड़े जाने के बाद भारत की मांगों पर चर्चा के लिए 27 फरवरी को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांसीसी दूतों को बुलाया था। बैठक के बीच में, शाम करीब 5.45 बजे, जंजुआ ने सेना का एक संदेश पढ़ने के लिए बातचीत रोक दी कि भारत के पास पाकिस्तान की ओर 9 मिसाइलें हैं, जिन्हें उस दिन किसी भी समय लॉन्च किया जा सकता है। उन्होंने दूतों से इस विश्वसनीय जानकारी को अपनी राजधानियों में रिपोर्ट करने और भारत पर तनाव न बढ़ाने के लिए दबाव डालने को कहा। इनमें से एक दूत ने उनसे इसे सीधे भारत के साथ उठाने के लिए कहा, जिसके तुरंत बाद भारतीय कार्यवाहक उच्चायुक्त को भी बुलाया गया। इसके बाद इमरान खान ने मोदी से बात करने की कोशिश की।

अल कायदा ने अपने ऑपरेटिव जाकिर मूसा की हत्या का बदला लेने के लिए यह हमला किया था। मुनीर के नेतृत्व में आईएसआई स्पष्ट रूप से न केवल सैन्य स्तर पर इस पर चर्चा करने के लिए उत्सुक थी, बल्कि यह भी चाहती थी कि इसे भारत सरकार तक पहुंचाने के लिए इसे उच्चायुक्त तक पहुंचाया जाए। यह एक गुप्त सूचना थी, यह तब स्पष्ट हो गया जब हमला अनुमानित समय और स्थान के आसपास हुआ। बिसारिया ने निष्कर्ष निकाला कि इनपुट या तो पाकिस्तान द्वारा एक और पुलवामा नहीं चाहने का नतीजा था या बाजवा उस साल जून में एससीओ शिखर सम्मेलन से पहले माहौल को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे थे।

किताब में बालाकोट एयर स्ट्राइक से पहले भारत सरकार के भीतर हुई बातचीत का भी जिक्र किया गया है। बिसारिया ने मोदी और तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दोनों को बताया था कि पुलवामा जैसे आतंकी हमले से निपटने में भारत के राजनयिक विकल्प सीमित थे। जहां स्वराज ने उन्हें बताया कि कुछ कड़ी कार्रवाई होने वाली है, वहीं सेना प्रमुख बिपिन रावत ने उन्हें बताया कि भारत का जवाबी हमला 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक से कहीं बड़ा होगा। हालांकि रावत इस बात से सहमत थे कि बाजवा भारत के साथ शांति में रुचि रखते थे, लेकिन अक्सर आईएसआई और पाकिस्तान कोर कमांडरों को एजेंडा तय करने देते थे, जो बाजवा के सिद्धांत से खुश नहीं थे।