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क्या अनमोल होते हैं शजर पत्थर?

आज हम आपको शजर पत्थर के बारे में जानकारी देने वाले हैं! 2024 में अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की प्रतिमा के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर पूरे विश्व में उत्साह का माहौल है। देश में भी गांव-गांव और हर घर में राम मंदिर बनने की खुशी दिखाई पड़ रही है। ऐसे में यूपी के बांदा जनपद के रहने वाले हस्तशिल्पी द्वारिका प्रसाद सोनी ने कड़ी मेहनत के बाद केन नदी में पाए जाने वाले शजर पत्थर से अद्भुत राम मंदिर बनाया है। इस मंदिर में रामलला को भी विराजमान किया है। शनिवार को बनाए गए इस मंदिर को रामलीला मैदान में लोगों को अलोकनार्थ रखा गया। जिसे देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह गया। जिले के केन नदी में पाए जाने वाला शजर पत्थर यूपी में ओडीओपी प्रोडक्ट में शामिल है। यह ए ग्रेड श्रेणी का सबसे मजबूत और महंगा पत्थर है। इसमें पेड़ पौधों और प्राकृतिक छटाओं की सुंदर छवि स्वतः अंकित हो जाती है। नदी में शजर की पहचान कर उसे काटने और तरासने की लंबी प्रक्रिया है। इसके बाद शजर की असली तस्वीर सामने आती है और तभी इसकी कीमत भी तय होती है।

दो दशक पहले इसे तरासने वाले 70- 80 कारखाने थे। अब इनकी संख्या बहुत कम रह गई है। यहां के शजर से बनी ज्वेलरी और बेस कीमती उपहार विदेश तक भेजे जाते थे। शजर की अनोखी और बेहतरीन कारीगरी के लिए यहां के शिल्पकारों को कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी किया जा चुका है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त द्वारिका प्रसाद सोनी भी अपने हुनर से अनेक कलाकृतियां बना चुके हैं। पहले ब्रिटेन के मंत्री को सौंपी थी कफलिंक। 2022 में ब्रिटेन के मंत्री भारत दौरे पर आए थे। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी अगवानी की थी और उन्हें कफलिंक भेंट किया था। तीन जून 2022 को लखनऊ में ब्रेकिंग सेरेमनी कार्यक्रम में देश भर से उद्योगपति आए थे। तब प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में नक्काशी कर तैयार की गईं शजर की कलाकृतियों की सराहना की थी।उनके द्वारा ताजमहल, कालिंजर दुर्ग के अलावा अनेक सजावटी कलाकृतियां बनाई गई हैं। जिसकी विदेश में भी प्रशंसा हुई है। शजर की मांग मुस्लिम देशों में ज्यादा है क्योंकि मुस्लिम इस पत्थर को बहुत शुभ मानते हैं।शनिवार रामलीला ग्राउंड में अपने बनाए गए मंदिर के साथ मौजूद द्वारिका प्रसाद सोनी ने बताया कि जब मुझे राम मंदिर निर्माण जल्दी होने की जानकारी मिली। तभी मेरे मन में शजर पत्थर से राम मंदिर बनाने का विचार आया। इसके बाद मैंने चुन चुन के पत्थर तरासने शुरू किया और मंदिर बनाना भी शुरू किया, करीब डेढ़ साल की कड़ी मेहनत के बाद अंततः राम मंदिर को बनाने में कामयाबी मिल गई।

उनके मुताबिक इस मंदिर में शजर के कई पत्थरों का समागम है। उनका सपना है कि वह अपने हाथों से इस मंदिर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपें, इसके लिए उनका प्रयास जारी है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सानिध्य में यह मंदिर प्रधानमंत्री जी को सौंपने की इच्छा है। बतातें चले कि जी-7 सम्मेलन में भाग लेने जर्मनी गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन को शजर पत्थर का कफलिंक कोट में लगाने वाली बटन दिया था। इसके पहले ब्रिटेन के मंत्री को सौंपी थी कफलिंक। 2022 में ब्रिटेन के मंत्री भारत दौरे पर आए थे। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी अगवानी की थी और उन्हें कफलिंक भेंट किया था। तीन जून 2022 को लखनऊ में ब्रेकिंग सेरेमनी कार्यक्रम में देश भर से उद्योगपति आए थे। तब प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में नक्काशी कर तैयार की गईं शजर की कलाकृतियों की सराहना की थी।

द्वारिका सोनी बताते हैं, 1911 में लंदन में शजर प्रदर्शनी लगी थी। उसमें बांदा के हस्त शिल्पी मोती भार्गव गए थे। बता दें कि मुस्लिम इस पत्थर को बहुत शुभ मानते हैं।शनिवार रामलीला ग्राउंड में अपने बनाए गए मंदिर के साथ मौजूद द्वारिका प्रसाद सोनी ने बताया कि जब मुझे राम मंदिर निर्माण जल्दी होने की जानकारी मिली। तभी मेरे मन में शजर पत्थर से राम मंदिर बनाने का विचार आया। इसके बाद मैंने चुन चुन के पत्थर तरासने शुरू किया और मंदिर बनाना भी शुरू किया, करीब डेढ़ साल की कड़ी मेहनत के बाद अंततः राम मंदिर को बनाने में कामयाबी मिल गई। प्रदर्शनी में रानी विक्टोरिया ने नायाब शजर पत्थर के नगीने को अपने गले का हार बनाया। वह इसे अपने साथ ले गई थीं। विदेश में आज भी शजर की मांग है।

क्या कांग्रेस और पूरे विपक्ष को हरा पाएगी बीजेपी ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी कांग्रेस और पूरे विपक्ष को हरा पाएगी या नहीं! अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में बड़ा सवाल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी वापस आएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह धमाकेदार वापसी करेंगे। बीजेपी लोकसभा की 272 से अधिक जीतेगी या उससे कम। 272 से कम सीट आने की स्थिति में उसे अगले पांच वर्षों तक केंद्र में शासन करने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता हो सकती है। चुनाव परिणाम से ही यह तय होगा कि क्या बीजेपी 1991 के बाद नरसिम्हा राव की तरह शासन कर पाएंगी या 2014-24 की तर्ज पर मोदी की तरह। इंडिया गठबंधन का मानना है कि यदि वह 400-450 सीटों पर बीजेपी के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ें तो तस्वीर बदल सकती है। इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और अलग-अलग क्षेत्रीय सहयोगी साथ आए हैं। विपक्षी गठबंधन का मानना है कि वन टू वन की लड़ाई में उनके पास मोदी को पद से हटाने का मौका है। वे वही करने की उम्मीद कर रही है जो उन्होंने 2004 में किया था। उस समय हर कोई सोचता था कि वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी फिर सत्ता में आएगी लेकिन वह हार गई। हालांकि, मोदी वाजपेयी नहीं हैं, और 2024, 2004 नहीं है। 2004 के विपरीत, अब बीजेपी, सबसे अच्छी स्थिति में है। तब बीजेपी 180 सीटों जीतने वाली पार्टी थी। उसे हमेशा सहयोगियों की आवश्यकता होती थी। अब मोदी की बीजेपी बहुत मजबूत है। उसने हिंदीभाषी राज्यों में अपनी जड़े बहुत गहरी जमा ली हैं। पार्टी न केवल संगठनात्मक रूप से बढ़ी है, बल्कि गरीब-समर्थक योजनाओं, विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं की गहरी पैठ के कारण लोकप्रियता के मामले में भी बढ़ी है। यह बीजेपी को निचले स्तर पर 220-240 से अधिक सीटों वाली राष्ट्रीय पार्टी बनाता है, न कि 180 सीटों वाली। यह याद रखने योग्य है कि 2019 में, अधिकांश प्रमुख राज्यों सहित 16 राज्यों ने बीजेपी को 50% से अधिक लोकप्रिय वोट दिए थे। कुछ ने इसे 60% से भी अधिक वोट दिया था। इसमें गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश भी शामिल हैं। 50% से अधिक वाले लोगों में यूपी, दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहयोगियों के साथ अंतिम दो राज्य थे। इसके अलावा झारखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे मध्यम आकार के राज्य और त्रिपुरा, गोवा और अरुणाचल जैसे छोटे राज्य भी शामिल थे।

2019 और 2024 के बीच जो बदलाव आया है वह यह है कि कम से कम दो प्रमुख राज्य, महाराष्ट्र और बिहार, युद्ध के मैदान बन गए हैं। यहां सहयोगियों के साथ भी बीजेपी की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर है। इसके अलावा, तीन अन्य राज्यों, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तेलंगाना में, भाजपा पहले की तुलना में थोड़ी कमजोर दिख रही है। हालांकि कर्नाटक में बीजेपी अभी भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अगर हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में विभाजित करते हैं। वो कैटेगरी जिसमें बीजेपी को 75 से 100 प्रतिशत सीट मिल सकती है। वे कैटेगरी जहां उन्हें 50% से अधिक हिस्सेदारी मिल सकती है। इसके अलावा वे हैं जहां वो 20-25% सीट जीत सकती है। इसके अलावा वे प्रदेश जहां बीजेपी को कुछ भी नहीं मिल सकता है या बस एक या दो सीट जरूर मिल सकती है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड बीजेपी के लिए अधिक सीटें देने वाले राज्य रहे हैं। 2019 में बीजेपी ने इन राज्यों की कुल 239 में से 214 सीटें जीती थीं। बीजेपी यहां इस बार भी 200-207 के आसपास जीत सकती है। अगली श्रेणी के राज्यों, महाराष्ट्र, बिहार और असम हैं। यहां बीजेपी ने 102 सीटों में से 89 सीटें जीती थीं। इस बार यह संख्या 59 या उससे नीचे तक गिर सकती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और गोवा के लिए कम सीट वाले राज्य हैं। यहां बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 2019 में 88 में से 34 सीटें जीतीं। इस बार यह संख्या गिरकर 32-28 हो सकती है।

बीजेपी के कमजोर प्रदर्शन वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों – केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब और उत्तर-पूर्व असम को छोड़कर में बीजेपी ने 114 में से सभी नौ सीटें जीतीं। इस बार वह 10 सीटें जीत सकती है। इससे पता चलता है उपरोक्त परिदृश्य में, भाजपा और सहयोगी दलों के पास कुल 297-308 सीटें हैं। यह उसे आसानी से बहुमत दिलाता है। इसमें बीजेपी के लिए अपने दम पर 272 से अधिक सीटें हैं। ऐसे में केवल महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में बड़ी हार की स्थिति में है, और शायद हिंदी हार्टलैंड में 2019 से अपेक्षित बड़े नुकसान की स्थिति में भी बीजेपी 240-प्लस वाली स्थिति में पहुंचेगी। दूसरी ओर, विपक्ष के लिए सबसे अच्छी स्थिति यह है कि कांग्रेस 100 से अधिक सीटें जीत रही है जो असंभव लगती है। इसके अलावा पांच या छह क्षेत्रीय दल – डीएमके, टीएमसी, जेडी (यू)-आरजेडी – अपने राज्यों में बड़ी जीत हासिल कर रही हैं। एक बार जब भाजपा 240 से नीचे आ जाती है, तो वाईएसआर कांग्रेस, तेलुगु देशम, बीजू जनता दल और वाम मोर्चा जैसी पार्टियों को कम से कम बाहरी समर्थन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और वामपंथी, कांग्रेस और आप आदि के बीच राज्य-स्तरीय हितों के टकराव को देखते हुए, पांच साल तक चलने वाले ऐसे गठबंधन की कल्पना करना मुश्किल है। यह बात अधिकांश मतदाता जानते हैं। यही एक कारण है कि अधिकांश राज्यों में मतदाता स्पष्ट और निर्णायक जनादेश दे रहे हैं।

विपक्ष के पास एक नेता, मोदी-विरोधी बयानबाजी से परे एक स्पष्ट आख्यान और अपने आंतरिक हितों के टकराव को दूर करने के लिए एक गेमप्लान की कमी है। किसी को आश्चर्य होता है कि द्रमुक को समय-समय पर हिंदी भाषियों या सनातन धर्म को क्यों चुनना पड़ता है, यह अच्छी तरह से जानते हुए कि इससे उसके सहयोगियों को मदद नहीं मिलती है। हाल ही में भारत की बैठक में नीतीश कुमार को हिंदी बोलने को मुद्दा क्यों बनाना चाहिए, जबकि तमिलनाडु में यह अच्छा नहीं हो रहा है। चुनाव जीतने के बाद आम आदमी पार्टी या वामपंथी या तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस के समान स्तर पर बने देखना भी मुश्किल है। इससे पता चलता है कि ज्यादातर सट्टेबाज मोदी के नेतृत्व में भाजपा की वापसी के अलावा किसी नतीजे की उम्मीद क्यों नहीं कर रहे हैं। लेकिन हाल ही में भाजपा और विपक्ष के बीच तीव्र कटुता को देखते हुए सुरक्षा उल्लंघन और विपक्षी सांसदों के निलंबन पर संसद में हंगामे पर विचार करें, और साथ ही मई 2024 के बाद की चुनौतियां जो जनगणना, महिला आरक्षण को लागू करने के मामले में सामने हैं। निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद, मोदी को खुद को एक अधिक सर्वसम्मत नेता के रूप में फिर से स्थापित करना होगा। 2019-24 में भी, मोदी का बहुमत कृषि सुधार नहीं कर सका या नागरिकता संशोधन अधिनियम लागू नहीं कर सका। हालांकि अनुच्छेद 370 को सफलतापूर्वक हटा दिया गया।

क्या विपक्षी पार्टियों को फिर से घेरेगी ED?

ED अब विपक्षी पार्टियों को फिर से घेरने के लिए तैयार है! देश में प्रवर्तन निदेशालय ईडी, सीबीआई और आयकर की टीम ने वर्ष 2023 में जबरदस्त हल्लाबोल अभियान चलाया। केंद्रीय एंजेसियों की टीम के निशाने पर ज्यादातर विपक्षी दलों के नेता रहे। विपक्ष इसके लिए हंगामा भी मचाता रहा। सुप्रीम कोर्ट तक बात पहुंची। हालांकि, अदालत ने शिकायतकर्ताओं को कोई राहत नहीं दी। फिर भी इन एजेंसियों से बचने के लिए नेता अलग-अलग कारण बता कर कोर्ट पहुंचते रहे। झारखंड में तो आयकर महकमा की ओर से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य धीरज साहू के ठिकानों से 350 करोड़ रुपए की बरामदगी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी। झारखंड में दो आईएएस अधिकारियों को ईडी ने गिरफ्तार किया। एक चीफ इंजीनियर भी घोटाले के आरोप में पकड़े गए। उनके घर से भी नकदी समेत सौ करोड़ से अधिक संपत्ति की बरामदगी हुई। जांच के दौरान ही ईडी को 1000 करोड़ रुपए के खनन घोटाले का पता चला। सरकारी जमीन की खरीद-बिक्री की जांच में कुछ ऐसे कागजात ईडी के हाथ लगे, जिसके तार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़ते हैं। खनन घोटाले की जांच में जब सीएम हेमंत सोरेन के करीबी पकड़े गए तो इसके तार ईडी ने उनसे भी जोड़ा। एक बार उनसे ईडी ने पूछताछ भी की। जब से जमीन घोटाले का राजफाश हुआ है और कुछ लोग गिरफ्तार हुए हैं, तभी से हेमंत सोरेन को ईडी पूछताछ के लिए बुला रही है। छह नोटिस के बावजूद हेमंत हाजिर नहीं हुए हैं। सातवीं और आखिरी नोटिस ईडी ने उन्हें जारी किया है। ईडी के पास पूछताछ के लिए नेताओं और अफसरों की लंबी फेहरिश्त है। नए साल में केंद्रीय जांच एजेंसियां बिहार-झारखंड में बड़ा कहर बरपाने की तैयारी में हैं। पहली बार झारखंड में ईडी की धमक तब सुनाई पड़ी थी, जब आईएएस पूजा सिंघल के कार्यकाल में हुए मनरेगा घोटाले की जांच शुरू हुई। पहले की सरकारों ने न सिर्फ मनरेगा घोटाले में पूजा सिंघल को क्लीन चिट दे दी थी, बल्कि उन्हें मौजूदा सरकार भी तवज्जो देती रही। ईडी ने जांच के क्रम में पूजा के करीबियों के घर से 19 करोड़ रुपए बरामद किए थे। पूजा और उनके एकाउंटेंट को ईडी ने गिरफ्तार भी किया। जांच के ही दौरान में ईडी को खनन घोटाले की जानकारी मिली। ईडी की टीम संताल परगना के इलाके में पहुंची तो सीएम हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा के घर से हेमंत सोरेन के दस्तखत किए चेकबुक की बरामदगी ने ईडी अधिकारियों को चौंका दिया। उसके बाद जांच तेज हुई और ईडी ने खनन घोटाले में 1000 करोड़ रुपए के खेल का पता लगाया।

खनन घोटाले के क्रम में सत्ता से नजदीकी रखने वाले प्रेम प्रकाश के घर ईडी ने दबिश दी। यहां चौंकाने वाला मामला उजागर हुआ। सीएम हेमंत सोरेन की सुरक्षा में तैनात जवानों के हथियार उनके घर में रखे मिले। ईडी ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सेना की जमीन को अवैध तरीके से बेचने के आरोप में वैसे तो कई लोग गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन उल्लेखनीय गिरफ्तारी आईएएस छविरंजन की रही। उनकी संलिप्तता भी उजागर हुई है। जमीन घोटाले की जांच में ही राजस्व महकमे के एक कर्मचारी के घर से कुछ ऐसे कागजात हाथ लगे, जिसके तार सीधे हेमंत सोरेन और दूसरे नेताओं से भी जुड़े बताए रहे हैं। ईडी इसी मामले में हेमंत से पूछताछ भी करना चाहता है। उन्हें बार-बार समन भेज रही है। इस बार तो ईडी ने जो समन भेजा है, उसे अंतिम बताते हुए कहा है कि समय और स्थान आप खुद बताएं। ईडी ने दो दिन की मोहलत दी है, जिसमें एक दिन बीत चुका है।

ईडी सूत्रों से जो जानकारी मीडिया में आती रही है, उसके मुताबिक नेताओं के अलावा चीफ सेक्रेट्री समेत कई अफसरों से भी पूछताछ की तैयारी है। मुख्य सचिव को ईडी ने नोटिस भेज कर पूछा है कि क्या उनके खिलाफ कोई आरोप है? आरोप है तो क्या कार्रवाई हुई? पहले किसी मामले में दंडित तो नहीं रहे हैं? उनके खिलाफ कोई डिपार्टमेंटल प्रोसीडिंग तो नहीं चल रही? मुख्य सचिव से ये सब जानकारी ईडी को क्यों चाहिए, इसका खुलासा नहीं किया गया है। एलबी ख्यांग्ते को हाल ही में राज्य सरकार ने मुख्य सचिव बनाया है। माना जा रहा है कि वे भी वैधानिक तरीके से नोटिस का जवाब देंगे।

ईडी ने अब तक दो आईएएस पूजा सिंघल और छविरंजन को गिरफ्तार किया है। दोनों जेल में हैं। चीफ इंजीनियर वीरेंद्र राम भी ईडी की गिरफ्त में आ चुके हैं। वे भी अभी जेल में ही हैं। जिन मामलों में इन अफसरों की गिरफ्तारियां हुई हैं, उनमें और भी कई लोग पकड़े गए हैं। खनन घोटाले में ईडी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रधान सचिव और गृह सचिव रह चुके आईएएस राजीव अरुण एक्का को भी पहले समन भेज कर बुला चुकी है। एक्का पर आरोप है कि वैसे लोगों से उनके संबंध रहे हैं, जो काले धन का कारोबार करते हैं। काले धन के निवेशक विशाल चौधरी से उनके घनिष्ठ संबंध उजागर हो चुके हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने एक वीडियो क्लिप जारी कर आरोप लगाया था कि वे सरकारी फाइलें भी विशाल चौधरी के घर में बैठ कर निपटाया करते थे। इस बीच बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद शराब कारोबारी योगेंद्र तिवारी के नाम से एक अखबार के प्रधान संपादक को आए फोन का मामला उजागर होने के बाद ईडी ने जेलर प्रमोद कुमार को भी नोटिस देकर दो जनवरी को पूछताछ के लिए बुलाया है।

बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को लैंड फॉर जॉब घोटाले में ईडी ने 5 जनवरी को दिल्ली ऑफिस में तलब किया है। उनके पिता लालू प्रसाद यादव को भी ईडी ने 25 दिसंबर को बुलाया था, लेकिन वे हाजिर नहीं हुए। तेजस्वी का कहना है कि ये सब चुनाव तक चलता रहेगा। उन्हें जब भी बुलाया गया है, वे हाजिर हुए हैं और पूछताछ में सहयोग भी किए हैं।

क्या मल्लिकार्जुन खड़गे बन सकते हैं कांग्रेस पीएम के फेस?

अब मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस पीएम के फेस बन सकते हैं! आजादी के बाद लंबे समय चले एक दलीय शासन के दौर के बाद देश में गठबंधन वाली सरकारों का दौर शुरू हुआ। केंद्र के स्तर पर इसकी शुरुआत 1977 में जनता पार्टी से हुई, जिसमें समाजवादी दलों के साथ तत्कालीन जनसंघ ने भी कदम मिलाया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कई दलों ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने के लिए जनता पार्टी बनाई थी। पहली बार इस सम्मिलित प्रयास का नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस हवा में उड़ गई। नवगठित जनता पार्टी ने 543 लोकसभा सीटों में अकेले 345 सीटें जीती। कांग्रेस को 189 सीटों से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस को पिछले के मुकाबले 217 सीटों का नुकसान हुआ। कांग्रेस के लंबे दौर तक चले शासन के बाद उसके सामने ये सबसे बड़ी चुनौती थी। वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव को आधार बना कर ही इस बार गैर भाजपा 28 विपक्षी दलों ने इंडी अलायंस बनाया है। हालांकि, 1977 में विभिन्न नामधारी समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और जनसंघ बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी ने अपनी पहचान गंवा कर विलय किया और इस तरह जनता पार्टी का उदय हुआ था। इस बार 28 दल तो साथ आ गए हैं, सबका मकसद भी एक है, जैसा 1977 में था। मगर, कोई अपनी पहचान छोड़ने को तैयार नहीं है। सच कहें तो सबको अपनी पहचान दमदार तरीके से उजागर करने की जिद ज्यादा है। सत्ताधारी दल या गठबंधन को चुनौती देने के लिए मोर्चे या गठबंधन बनते रहे हैं। कभी यूपीए बना तो अब एनडीए अस्तित्व में है। भाजपा ने एनडीए बनाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार दूसरा कार्यकाल पूरा करने के मुहाने पर पहुंची है। एनडीए सरकार को सत्ता से बेदखल करना इन 28 दलों के नए मोर्चे या गठबंधन- इंडी अलायंस का मकसद है। लेकिन सीट बंटवारे से पहले ही जैसी स्थिति नजर आ रही है, उससे तो यही लगता है कि चुनाव आते-आते इंडी अलायंस टूट-बिखर न जाए।

दरअसल, इंडी अलायंस में जितने दल शामिल हैं, उनकी मंशा तो एक है, मगर इससे अधिक उन्हें अपना अस्तित्व बचाए-बनाए रखने की मजबूरी है। विपक्षी गठबंधन में हर नेता की अपनी महत्वाकांक्षा भी है। गिनाने को कई ऐसे चेहरे मिल-दिख जाएंगे, जिनके मन में पीएम बनने का सपना आता रहा है या अब भी आ रहा होगा। हालांकि, इंडी अलायंस में शामिल और लोकसभा में संख्या बल के हिसाब से तीसरी बड़ी पार्टी तृणमूल कांग्रेस टीएमसी की नेता और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने पीएम के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित कर ऐसे लोगों के मंसूबे पर पानी फेर दिया, जो पीएम पद की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे। इनमें ममता बनर्जी खुद भी शामिल रही हैं। अखिलेश यादव, शरद पवार, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों के मन में पीएम बनने की अकुलाहट रही है।

ममता बनर्जी सबसे पहले 2021 में तीसरी बार बंगाल विधानसभा में परचम लहराने के बाद पीएम मोदी को चुनौती देने के लिए बेचैन हो उठी थीं। दरअसल, विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत भाजपा की पूरी टीम ने बंगाल फतह की उम्मीद में जितनी मेहनत की, उस पर ममता की टीएमसी ने पानी फेर दिया था। लोगों को भी एक बार लगने लगा कि मोदी को विपक्ष का कोई नेता चुनौती दे सकता है तो वो ममता बनर्जी ही हैं। ममता ने अति उत्साह में सबसे पहले विपक्षी दलों को एकजुट करने की पहल की। टीएमसी की राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए कई राज्यों में टीएमसी ने संगठन का ढांचा भी खड़ा किया। इस काम में उन्होंने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की आई-पैक टीम की मदद ली। आई-पैक के लोग राज्यों में घूम-घूम कर वैसे दगे कारतूसों की पहचान-खोज करते रहे, जिनका कभी नाम रहा है। ममता चाहती थीं कि कांग्रेस रहित विपक्ष की गोलबंदी हो। इसके लिए उन्होंने शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे नेताओं से मुलाकात भी की थी। लेकिन शिवसेना (तब अविभाजित) के नेता उद्धव ठाकरे और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने ये कह कर ममता के उत्साह पर पानी फेर दिया कि कांग्रेस को छोड़ कर विपक्षी एकता की बात बेमानी है। उसके बाद तेलंगाना के तत्कालीन सीएम केसी राव के मन में पीएम बनने की महत्वाकांक्षा हिलोरे मारने लगी। उन्होंने शुरुआती कोशिश की। वे पटना आकर महागठबंधन के नए साथी बने नीतीश कुमार से मिले भी। जब उन्हें कहीं से रिस्पॉन्स नहीं मिला तो वे चुप बैठ गए। पीएम बनने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी टीआरएस को राष्ट्रीय लुक देने के लिए बीआरएस भी बना दिया। खैर, अब वे अलग-थलग पड़ गए हैं!

इंडी अलायंस का जन्म जून 2023 को पटना में हुई बैठक में हुआ था। अब तक गठबंधन की चार बैठकें हो चुकी हैं। चौथी बैठक खत्म होते ही इसमें बिखराव के संकेत भी मिलने लगे हैं। नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश में ये पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे पीएम पद के दावेदार नहीं हैं। ये उनकी भलमनसाहत थी, लेकिन उन्हें यकीन तो पक्का रहा होगा कि अलायंस का संयोजक उन्हें बना कर उनके मान-सम्मान की रक्षा तो विपक्षी दल करेंगे ही। नीतीश चूंकि बिहार में कांग्रेस, आरजेडी और वाम दलों के गठबंधन की सरकार चला रहे हैं, इसलिए उन्हें पक्का भरोसा था कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इन दलों का साथ मिलेगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो नीतीश के नाराज होने की खबरें भी आने लगी। अब तो नाराजगी का आलम ये है कि नीतीश चुनाव के पहले ही अलग राह चुन लें तो आश्चर्य की बात नहीं।

इंडी अलायंस में झंझावात की तो ये सिर्फ शुरुआत है। काम जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, मुश्किलें भी सामने आएंगी। गठबंधन में शामिल सभी दल कांग्रेस को बड़ी पार्टी होने के कारण बड़ा दिल दिखाने की नसीहत देते रहे हैं। सैद्धांतिक तौर पर ममता का प्रस्ताव कांग्रेस ने मान भी लिया है। ममता ने कहा था कि सीट बंटवारे का काम राज्य स्तर पर हो और उन्हीं पार्टियों को इसकी जिम्मेवारी दी जाए, जो अपने-अपने राज्यों में प्रभावी हैं। ममता की बात मान ली जाए तो क्या ऐसे दल कांग्रेस को तरजीह देंगे? ये लाख टके का सवाल है। ममता खुद ही कह चुकी हैं कि बंगाल में बीजेपी से सीधा मुकाबला टीएमसी का है। ये भी सूचना है कि कांग्रेस को वे दो-तीन सीटें ही बंगाल में देना चाहती है। यूपी में अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस में इसी बात पर तनातनी है। बिहार भी उलझा हुआ है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी को अकेले 23 सीटें चाहिए। ऐसे में सीट बंटवारा इंडी अलायंस में बिखराव का दूसरा खतरा नजर आ रहा है।

क्या 2024 में कांग्रेस के लिए है करो या मरो की लड़ाई?

2024 में कांग्रेस के लिए करो या मरो की लड़ाई साबित होने वाली है! मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावी हार के झटके झेलने के बाद, कांग्रेस 2024 के लिए कमर कस रही है। इस बार 18वां लोक सभा चुनाव होने जा रहा है। कांग्रेस के लिए ‘कठिन है डगर पनघट की वाला हाल’ है। सीट शेयरिंग पर बात बन नहीं रही है, टीएमसी, AAP और महाराष्ट्र में उद्धव गुट की शिवसेना अलग टेंशन दे रही है। एक और जहां पीएम मोदी पंडित जवाहरलाल नेहरू के तीन बार के प्रधानमंत्री रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे तो वहीं नए साल के शुरुआती 4 महीनों के अंदर होने वाला लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए 138 साल के सफर में सबसे कठिन होने वाला है। 2024 में कांग्रेस, अपनी इस गिरावट को रोकने की उम्मीद के साथ, कई चुनौतियों का सामना करेगी, जिनमें सबसे बड़ी चुनौती है बीजेपी विरोधी इंडिया ब्लॉक के घटकों के साथ सीट-बंटवारे का सौदा तय करना, जिसका अभी तक कोई चुनावी प्रभाव नहीं पड़ा है। कांग्रेस पार्टी आने वाले 2024 के चुनाव के लिए कमर कस रही है। ये साल पार्टी के लिए बेहद अहम है, क्योंकि चार दशक पहले 1984 में इसने लोकसभा में रिकॉर्ड 414 सीटें जीती थीं। लेकिन आज सिर्फ 48 सीटों के साथ पार्टी पिछले 10 सालों से लगातार कमजोर होती चली गई। हिंदी दिल वाले राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए चुनाव हार की वजह से कांग्रेस आगामी गठबंधन वार्ताओं में कमजोर स्थिति में होगी। इन हार से पार्टी का गणित गड़बड़ा गया है, जोकि हिमाचल प्रदेश (2022) और कर्नाटक (2023) में मिली जीत के जोश को कायम रखने की उम्मीद कर रही थी। ये हार 2024 के चुनावों से ठीक पहले पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला पस्त करने वाली भी रही है, क्योंकि हिंदी भाषी राज्यों का नतीजे तय करने में बड़ा रोल होता है। 2019 में, बीजेपी ने हिंदी बेल्ट में 141 सीटें जीती थीं, जो कुल लड़ी गई सीटों का 71% है।

2024 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद अहम हैं, ये जीत-हार का सवाल नहीं बल्कि पार्टी के लिए करो-मरो का सवाल है। सत्ता का फाइनल पार्टी के लिए आखिरी मौका जैसा है। अभी कांग्रेस सिर्फ तीन राज्यों – हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में ही खुद की सरकार चला पा रही है। हिमाचल के चार लोकसभा सीटों के अलावा उत्तर भारत में पार्टी की स्थिति कमजोर है। हालांकि, दक्षिण भारत में वो थोड़ा जोर पकड़ती दिख रही है। हिंदी पट्टी में लगभग सफाया होने के बाद कांग्रेस को वोटरों को लुभाने के नए हथकंडे अपनाने होंगे। बीजेपी ‘मोदी की गारंटी’ और ‘चार जाति – महिलाएं, युवा, गरीब और किसान’ का नारा लगा रही है, जबकि कांग्रेस फ्री स्कीम और जातिगत जनगणना का दांव खेल रही है।

जातिगत जनगणना, राहत पैकेजों और अडानी के खिलाफ मुहिम का ज्यादा फायदा न देखकर कांग्रेस वापस राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दूसरे चरण की तरफ मुड़ गई है। ये यात्रा जनता से जुड़ने की एक और कोशिश है। इस बार का नाम ‘भारत न्याय यात्रा’ रखा गया है और ये बस और पैदल, दोनों तरीकों से चलेगी। 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होकर ये 14 राज्यों से होते हुए महाराष्ट्र तक पहुंचेगी। कुल 6,200 किलोमीटर का ये सफर 85 जिलों को छूएगा। मालिकार्जुन खरगे मणिपुर से इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे और ये नगालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी। 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है। चुनाव अप्रैल-मई में हो सकते हैं और संभव है यात्रा के आखिरी चरण का समय उसी से मिल जाए।

कांग्रेस के अध्यक्ष खरगे ने हाल ही में कहा कि अगर सब एक हो जाएं तो प्रधानमंत्री मोदी कुछ नहीं कर पाएंगे। उन्होंने कहा, ‘जितना आप हमें कुचलने की कोशिश करेंगे, उतना ही हम मजबूत होंगे। हम देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ रहे हैं।’ इस बात को जोरदार तरीके से पेश करते हुए कांग्रेस ने अपनी स्थापना दिवस पर नागपुर में “हैं तैयार हम” नाम की एक बड़ी रैली का आयोजन किया था। पार्टी पिछले कई दिनों से लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए राज्य के नेताओं के साथ लगातार सलाह-मशविरा भी कर रही है और कोई कसर नहीं छोड़ रही है। हालांकि अपनी किस्मत बदलने के लिए पार्टी उत्साहित है, कांग्रेस आने वाली चुनौतियों से भी पूरी तरह वाकिफ है। भारत विरोधी दलों के गठबंधन में छोटे दल कांग्रेस को ये समझने का सुझाव दे रहे हैं कि उन्हें पहले की सोच छोड़कर गठबंधन के लिए थोड़ा ज्यादा त्याग करना पड़ेगा। समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कांग्रेस के रवैये पर खुलकर बोल रहे हैं। उनके मुताबिक कांग्रेस का घमंड मध्य प्रदेश में उनके साथ सीट बंटवारे में अड़चन बन रहा है। इस बीच, टीएमसी और आप ने कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में प्रस्तावित करके विपक्षियों को दुविधा में डाल दिया है। यह जानते हुए कि सबसे पुरानी पार्टी सामूहिक नेतृत्व के पक्ष में है और राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में पीछे छोड़ रही है।

नेतृत्व के मुद्दों के साथ, एक सामान्य न्यूनतम एजेंडा और सीट बंटवारे को अभी तक हल नहीं किया गया है, I.N.D.I.A. गुट वर्तमान में बिखरा हुआ दिखता है, जबकि भाजपा ने का मकसद क्लियर है। यही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने विपक्षी गठबंधन से भी नेताओं को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए आमंत्रित किया है। इसे लेकर भी विपक्षी दलों में डाउट है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी इसके लिए न्योता भेजा गया है। हालांकि इसपर आधिकारिक रूप से कांग्रेस ने कोई जवाब नहीं दिया है। भाजपा ने 2024 के चुनाव के लिए मोदी को एकमात्र चेहरा बना दिया है और विपक्ष को ये चुनौती दी है कि वो अपना पीएम उम्मीदवार बताएं, ताकि चुनाव “मोदी बनाम कौन” बनकर रहे। दूसरी तरफ कांग्रेस कहती है कि वो “हम, मैं नहीं” के नारे के साथ चुनावों में जाएगी और एक सामूहिक नेतृत्व को पेश करेगी। ये देखना दिलचस्प होगा कि बिना नेता वाला विपक्षी गठबंधन मोदी के रथ को रोक पाएगा या नहीं। इस बीच, कांग्रेस 2024 के चुनावों के लिए एक सकारात्मक वैकल्पिक एजेंडा बनाने और भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करने की कोशिश करेगी।

क्या नए साल के मौके पर नए सिरों पर बीजेपी सजायेगी ताज?

नए साल की मौके पर बीजेपी नए सिरों पर ताज सजा सकती है! 2023 का साल बीत गया। पिछला वर्ष किसके लिए कैसा रहा, इसका आकलन हो रहा है तो नए वर्ष में किसके लिए क्या संभावनाएं और चुनौतियां हैं, यह अनुमान लगाने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। देश की राजनीति में छाई भारतीय जनता पार्टी बीजेपी के लिहाज से देखें तो 2023 का वर्ष उतार से ज्यादा चढ़ाव वाला रहा है। पार्टी अब 2024 में कई मोर्चों पर नए इतिहास रचने की तैयारी में है। इसके लिए उसे कुछ बदलाव लाने हैं तो कई जगहों पर निरंतरता का दामन थामे रहना है। हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मुख्यमंत्री चुने गए हैं और उनके नामों से ये संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले लोकसभा चुनावों में पार्टी का एक ‘नया अवतार’ दिखेगा। पार्टी नेताओं का कहना है, ‘देखना होगा कि किसे लोकसभा का टिकट नहीं मिलता है और क्या किसी मुख्यमंत्री को चुनाव लड़ने के लिए कहा जाता है। कई सांसद अपना टिकट खो सकते हैं, कुछ मंत्री भी हटाए जा सकते हैं और चुनाव लड़ने वाले मुख्यमंत्रियों पर नई भूमिका में खरे उतरने की तलवार लटकी रहेगी।’ इनका मकसद केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरा कार्यकाल सुनिश्चित करके नेहरू वाली कांग्रेस पार्टी के रिकॉर्ड की बराबरी करने के का है।

हाल की विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा को केंद्र में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का भरोसा है। एक पार्टी सूत्र के मुताबिक, अगर बीजेपी जीतती है तो नए मंत्रिमंडल पर गौर करना होगा। कुछ पुराने चेहरों को हटाया जा सकता है और नए लोगों को मंत्रालय दिए जा सकते हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी संगठन में भी बदलाव हो सकते हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल जून 2024 तक बढ़ा दिया गया है। कुछ लोगों का कहना है कि संगठन के अनुभवी नेता धर्मेंद्र प्रधान या भूपेंद्र यादव, नड्डा की जगह ले सकते हैं। हालांकि, एक नेता ने कहा कि किसी को भी यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। भाजपा सूत्र ने कहा, ‘कुछ नहीं कहा जा सकता। एमपी और राजस्थान के मुख्यमंत्री चुनाव देखिए। जिन नामों की चर्चा हो रही थी, उनमें से कोई नहीं चुना गया। आज की बीजेपी में किसी अप्रत्याशित नाम को नकारा नहीं जा सकता।’

भाजपा को लोकसभा चुनाव के बाद तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारी करनी होगी। 2024 में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में चुनाव होने हैं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भी सितंबर तक चुनाव कराए जाने हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि विधानसभा वाले राज्यों में भी कुछ चौंकाने वाले फैसले हो सकते हैं। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी सामूहिक नेतृत्व का रास्ता अपनाती है या नहीं। किसान आंदोलन के बाद हरियाणा को जीतना आसान नहीं हो सकता है। जाटों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया था और कांग्रेस के पास जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं। 21 दिसंबर को भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद के लिए बीजेपी सांसद बृज भूषण शरण सिंह के सहयोगी के चुने जाने के बाद सरकार विरोध को कम करने के लिए तेजी से हरकत में आई और तीन दिन बाद कुश्ती संघ को निलंबित कर दिया। ज्यादातर कुश्ती खिलाड़ी जो बृज भूषण पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं, हरियाणा से हैं और बीजेपी के इस कदम को राज्य और खासकर जाट समुदाय को दिए जा रहे संकेत के रूप में लिया गया है कि वह उनके साथ खड़ी है। पार्टी ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कथित अपमान को लेकर विपक्ष पर भी हमला किया है। धनखड़ भी जाट समुदाय से हैं।

महाराष्ट्र में यह देखना होगा कि क्या देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा क्योंकि एनडीए का विस्तार हुआ है और सत्ता के और भी दावेदार हैं। एक भाजपा नेता ने कहा कि नेतृत्व की दावेदारियां बढ़ रही हैं और पार्टी संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है, जो फडणवीस के पक्ष में नहीं हो सकता है। एक ब्राह्मण होने के नाते फडणवीस अल्पसंख्यक जाति से आते हैं और राजस्थान में भजनलाल शर्मा के रूप में पहले ही एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाया जा चुका है। भाजपा झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। भाजपा के झारखंड प्रदेश प्रमुख बाबूलाल मरांडी का ग्राफ हाल के महीनों में बढ़ता हुआ दिख रहा था, लेकिन एक आदिवासी विष्णु देव साई को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बना देने के बाद आदिवासी सीएम कोटा पर गहन विचार हो सकता है। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों को संदेह है कि अगर पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा जेएमएम को हरा देती है तो बाबूलाल मरांडी ही झारखंड के मुख्यमंत्री होंगे, इसकी गारंटी अब नहीं दी जा सकती है।

दिल्ली में 2025 के शुरू में चुनाव होंगे। यहां पार्टी अगले सालभर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी आप पर कथित भ्रष्टाचार पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर कायम रह सकती है, ताकि वह राष्ट्रीय राजधानी में मतदाताओं के बीच आप की छवि बिगाड़ सके। आप गरीबों को सब्सिडी के आधार पर विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने में सफल रही है, हालांकि संसदीय चुनावों में पूरा माहौल बदल जाता है। भाजपा चाहेगी कि मतदाताओं का ध्यान सस्ते बिजली-पानी के मुद्दे से हटाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार की तरफ आकर्षित किया जाए।

एक भाजपा नेता ने कहा, ‘कोई इस बात को लेकर सटीक जानकारी नहीं दे सकता कि 2024 में भाजपा किस तरह के चेहरों में बदलाव देखेगी, लेकिन बड़े पैमाने पर नेतृत्व परिवर्तन होने की उम्मीद है। जिस तरह 2019 में कुछ चेहरे गुमनामी में चले गए और नए चेहरे सामने आए, 2024 में शायद इससे भी बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।’

जानिए एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी!

आज हम आपको एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी सुनाने जा रहे हैं! दोस्त से दगाबाजी और शातिराना प्लानिंग की कहानी चेन्नई के दक्षिण में बसे चेंगलपेट के अल्लानूर गांव से शुरू हुई। गांव की आबादी ज्यादा नहीं है, इसलिए घर भी एक-दूसरे से दूर बने हैं। ऐसी ही एक झोपड़ी में फिजिकल ट्रेनर सुरेश आर. भी रहता था। 38 साल का सुरेश आर. कुछ दिन पहले ही चेन्नई से गांव अल्लानूर लौटा था। 16 सितंबर 2023 को उसकी झोपड़ी में आग लग गई। पुलिस ने जली हुई झोपड़ी से एक पुरुष के जली हुई बॉडी बरामद की। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की। पुलिस ने भी इस आग लगने की घटना मानकर फाइल बंद कर दी। ओराथी पुलिस स्टेशन के अफसरों ने मान लिया था कि झोपड़ी में लगी आग में अपनी मां से अलग रहने वाले सुरेश की मौत हो चुकी है। करीब तीन महीने बाद दिसंबर में इस कहानी में नया मोड़ आया। तमिलनाडु में एन्नोर थाने की पुलिस 39 साल के दिल्ली बाबू की गुमशुदगी की जांच रही थी। दिल्ली बाबू सुरेश की कथित मौत से एक सप्ताह पहले संदिग्ध हालात में गायब हो गया था। 23 सितंबर को एन्नौर थाने में परिजनों ने दिल्ली बाबू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी जब दिल्ली बाबू का अता-पता नहीं चला तो उसके परिजन शिकायत लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचे और कोर्ट में वाद भी दायर कर दिया। इसके बाद एन्नौर पुलिस ने तफ्तीश शुरू की। पुलिस दिल्ली बाबू के बड़े भाई पलानी से पूछताछ की। पलानी ने पुलिस को बताया कि उसके भाई की दोस्ती अल्लानूर में रहने वाले सुरेश आर. से थी। गायब होने से पहले वह अक्सर सुरेश के साथ घूमता था। चेंगलपेट में अचारपक्कम पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आर शिवकुमार ने बताया कि पलानी के बयान के बाद जांच सुरेश की ओर मुड़ी, जिसकी कथित तौर से झोपड़ी में आग लगने मौत हो गई थी। पुलिस को सबसे बड़ा क्लू उस समय हाथ लगा, जब दिल्ली बाबू के मोबाइल फोन की लास्ट लोकेशन सुरेश की झोपड़ी के पासअल्लानूर गांव में मिली।

इसके बाद से पुलिस सुरेश आर और दिल्ली बाबू के रिश्तों को खंगालने लगी। कई लोगों से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान यह सामने आया कि झोपड़ी वाले हादसे के दौरान सुरेश को तीन लोगों के साथ दिखा था। उनमें एक की पहचान हरिकृष्णन के तौर पर हुई। अब पुलिस हरिकृष्ण के पीछे पड़ी। पुलिस की टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर पहुंची। वेल्लोर में हरिकृष्ण के पिता ने बताया कि वह कई हफ्तों से नहीं घर आया है। पुलिस ने उनसे हरिकृष्ण का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और फिर उसे ट्रेस करती रही। इंस्पेक्टर शिवकुमार ने बताया कि फोन नंबर को ट्रेस करते हुए पुलिस टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर के पास अराकोणम के एक घर में पहुंची। वहां जब पुलिस ने हरिकृष्णन को दबोचने के लिए दरवाजा खुलवाया तो हैरान रह गई। वहां सुरेश आर. भी जिंदा मिला, जिसकी कथित मौत झोपड़ी वाले हादसे में हो चुकी थी। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

अब बारी दोनों से पूछताछ की थी। जब पुलिस ने सुरेश आर. का मुंह खुलवाया तो दिल्ली बाबू की गुमशुदगी से भी पर्दा उठ गया। झोपड़ी में जलकर मरने वाला दिल्ली बाबू ही था, जिसे सुरेश अपनी लंबी प्लानिंग के बाद अपने साथ ले गया था। सुरेश ने अपने दो दोस्तों हरिकृष्णन और कीर्ती राजन के साथ उसकी हत्या की थी। कीर्ती राजन वेल्लोर में टैक्सी चलाता था। सुरेश ने पुलिस को बताया कि उसने एक करोड़ का जीवन बीमा कराया था। अपने लाइफ इंश्योरेंस के प्रीमियम के तौर पर पिछले दो साल में 50 हजार रुपये जमा किए थे। वह इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने अपनी मौत की स्क्रिप्ट लिखी। इंश्योरेंस कंपनी की तसल्ली के एक लाश की जरूरत थी। इसके लिए उसने पहले लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले संस्थाओं से बातचीत की, मगर काम नहीं बना। इस बीच उसकी मुलाकात अपने पुराने दोस्त दिल्ली बाबू से हुई। बाबू दस साल पहले अपने परिवार के साथ सुरेश के मकान में बतौर किरायेदार रहता था।

सुरेश को वह शख्स मिल गया, जिसकी हत्या के बाद पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को गुमराह किया जा सकता था। सुरेश ने प्लानिंग के तहत फिर से बाबू से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया। दोनों एक दशक बाद फिर एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। फिर उसने हत्या की साजिश रची। अपनी प्लानिंग में उसने हरिकृष्णन और टैक्सी ड्राइवर कीर्ती राजन को शामिल किया। 9 सितंबर को तीनों ने मिलकर हत्या की स्क्रिप्ट लिखी। प्लानिंग के तहत 15 सितंबर 2023 की शाम को तीनों पार्टी करने के नाम पर दिल्ली बाबू को धोखे से अपनी झोपड़ी में लाए। वहां उन्होंने बाबू को जमकर शराब पिलाई। जब बाबू नशे में मदहोश हो गया तो तीनों ने मिलकर जेनरेटर के तार से उसका गला घोंट दिया। बाबू की मौत के बाद सुरेश ने अपनी झोपड़ी में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी और तीनों वहां से चलते बने। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की तो उन्हें लगा कि प्लान सक्सेस हो गया है। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर राजन, हरिकृष्णन और सुरेश आर को गिरफ्तार कर लिया है।

क्या राम मंदिर से पीएम मोदी की बदलेगी सियासी फिजा?

अब राम मंदिर से पीएम मोदी की सियासी फिजा भी बदल सकती है! अयोध्या राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल अभी तक इसी उधेड़बुन में फंसे है कि राम मंदिर के उद्घाटन में जाना है या नहीं। देश की पूरी राजनीति राम मंदिर के आसपास आकर ठहर सी गई है। राम मंदिर को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों को डर सता रहा है कि राम मंदिर बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा ना दे दे। वहीं बीजेपी भी राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटर्स पर फोकस करने की रणनीति बना सकती है। राम मंदिर पर सियासत के बीच आज पीएम मोदी का अयोध्या दौरा भी काफी अहम है। दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा अयोध्यावासियों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी के इस दौरे से भी बीजेपी लोकसभा चुनावों में फायदा मिल सकता है, क्योंकि पीएम मोदी 15,700 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। श्रीराम की नगरी से देश के विभिन्न शहरों के लिए भी सौगातों का पिटारा खुलेगा। पीएम मोदी देश के अलग अलग स्टेशनों से संचालित होने वाली छह वंदे भारत और दो अमृत भारत ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इससे पहले पीएम मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। प्रशासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन राष्ट्र को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी श्री माता वैष्णो देवी कटरा-नई दिल्ली, अमृतसर-नई दिल्ली, कोयम्बटूर-बेंगलुरु, मंगलूरु-मडगांव, जालना-मुंबई एवं अयोध्या-आनंद विहार टर्मिनल के बीच छह वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ ही अयोध्या-दरभंगा और मालदा टाउन-बेंगलुरु के बीच दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके अलावा पीएम मोदी महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करेंगे।

राम की नगरी अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। अयोध्या एयरपोर्ट की शुरुआत होते ही यूपी में एयरपोर्ट्स की संख्या 9 से बढ़कर 10 पहुंच जाएगी। वहीं यूपी को रफ्तार देने के लिए अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या का दौरे से पहले शहर को ‘दिव्य रूप’ देने के लिए फूलों से सजाया जा रहा है। पुनर्विकसित मार्ग ‘राम पथ’ के मध्य में स्थापित बिजली के खंभों के चारों ओर नारंगी और पीले रंग के गेंदे के फूलों की माला लपेटी जा रही हैं। इन खंभों के शीर्ष पर बने डिजाइन धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई श्रमिक राम कथा पार्क में फूलों से कलात्मक आकार बना रहे हैं। सजावट के लिए भगवान राम, उनके धनुष एवं तीर, भगवान हनुमान, धार्मिक तिलक आदि की छवियों से प्रेरणा ली गई है। अयोध्या में फूलों से कई सजावटी डिजाइन बनाए गए हैं, जिनमें धनुष और तीर पकड़े हुए भगवान राम की पुष्प छवि भी शामिल है। इन सजावटी संरचनाओं का उपयोग राम पथ, धर्म पथ, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर सजावट के लिए किया जाएगा। सैकड़ों कर्मचारी सजावट के काम में जुटे हैं और लगभग 300 क्विंटल फूल कोलकाता, दिल्ली, गाजीपुर और अन्य स्थानों से लाए गए हैं।

आज पीएम मोदी अयोध्या पहुंच रहे है। वह एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन तक करीब 8 किलोमीटर लंबा रोड शो निकालेंगे। रोड शो के दौरान 51 जगहों पर पीएम नरेंद्र मोदी का स्वागत होगा। इसमें 12 जगहों पर संत-महंत उनका स्वागत करेंगे।एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है। 21 संस्कृत विद्यालयों के 500 वैदिक छात्र वेद मंत्र और शंख ध्वनि से स्वागत करेंगे। इन रोड शो वाले मार्गों को फूलों से सजाया गया है। इसमें थाईलैंड, मलेशिया, कोलकाता, बेंगलुरु, देहरादून, उत्तराखंड और दिल्ली से फूल और आगरा के पत्ते मंगाए गए हैं।

क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा या नहीं! मैरिटल रेप के मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का अलग-अलग फैसला आया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुनवाई होने वाली है। ऐसे में पिक्चर सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई के बाद ही साफ हो जाएगी। गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कहा कि बलात्कार तो बलात्कार है और भले ही किसी महिला के पति ने उसके साथ किया हो। भारत में महिलाओं के खिलाफ जो सेक्सुअल अपराध होता है, उस पर मौन तोड़ने की जरूरत है। वहीं इस महीने की शुरुआत में ही एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मैरिटल रेप में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC के तहत वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना जा सकता है। मैरिटल रेप मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का फैसला भी अलग-अलग है। वैसे मैरिटल रेप का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है और इस पर सुनवाई होनी है जिसके बाद ही इस मामले में पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी। IPC की धारा-375 या फिर भारतीय न्याय संहिता की धारा-63 में रेप को परिभाषित किया गया है। कानून कहता है कि अगर कोई शख्स किसी भी महिला के साथ उनकी मर्जी के खिलाफ संबंध बनाता है तो वह रेप होगा। साथ ही बालिग पत्नी के साथ जबरन संबंध रेप का अपवाद होगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अक्टूबर में एक मामले में फैसला दिया था कि पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाने का केस नहीं चल सकता है, क्योंकि रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है और रेप कानून की नई परिभाषा ज्यादा व्यापक है और अप्राकृतिक संबंध भी रेप के दायरे में है। ऐसे में पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध का केस नहीं चलेगा क्योंकि मैरिटल रेप अपराध नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC तहत पति के खिलाफ मैरिटल रेप का केस नहीं बनेगा। आरोपी को अप्राकृतिक अपराध के मामले में बरी करते हुए यह टिप्पणी की गई। कोर्ट ने कहा कि धारा-377 के तहत जो अपराध है वह रेप की परिभाषा में शामिल है और मैरिटल रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है। गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि रेप तो रेप होता है, भले ही रेप करने वाला पति ही क्यों न हो। अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की वास्तविक घटनाएं संभवतया आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। महिलाओं को ऐसे वातावरण में रहना पड़ता है जहां वह हिंसा को झेलती हैं। केरल हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ जाकर अगर पति संबंध बनाता है यानी मैरिटल रेप करता है तो यह तलाक का मजबूत आधार होगा। कोर्ट ने कहा कि यह मानसिक और शारीरिक क्रूरता के दायरे में है और यह तलाक का आधार है।

दिल्ली हाई कोर्ट में मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए अर्जी दाखिल की गई थी। वहीं, केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट को बताया था चूंकि इस मामले का सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए केंद्र परामर्श प्रक्रिया के बाद ही अपना पक्ष रखेगा। दिल्ली हाई कोर्ट ने 11 मई को इस मामले में जो फैसला दिया वह बंटा हुआ था। दो जजों की बेंच में एक जज ने इसे अपराध की श्रेणी में लाने की बात कही तो दूसरे ने इसके विपरीत आशय जाहिर किया। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है।

बता दे कि बार एंड बेच की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस दिव्येश जोशी ने अपने 8 दिसंबर को आदेश में अमेरिकी राज्यों, तीन ऑस्ट्रेलियाई राज्यों, न्यूजीलैंड, कनाडा, इज़राइल, फ्रांस, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे, सोवियत संघ, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया का जिक्र करते हुए कि करीब 50 देशों में मैरिटल रेप अपराध है। कई देश इसे अपराध घोषित करने की जा रहे हैं। जस्टिस दिव्येश जोशी ने टिप्पणी की कि ‘लड़के ही लड़के रहेंगे’ के सामाजिक रवैये को बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो पीछा करने और छेड़छाड़ के अपराधों को सामान्य बनाता है। जोशी ने कहा कि भारीय दंड संहिता काफी तरह तक यूके से प्रेरित है। उसने भी पति को रेप से छूट देने को हटा दिया है।

जस्टिस दिव्येश जोशी ने आदेश में कहा गया है कि अगर कोई पुरुष किसी महिला का यौन उत्पीड़न करता है या उसे टेप करता है, तो आईपीसी की धारा 376 के तहत सजा दी जा सकती है। जस्टिस ने काफी मामलों में ऐसा देखा गया है कि एक पति जब दूसरे व्यक्ति की तरफ इस तरह का कृत्य करता है तो उसे छूट दे दी जाती है। मेरी अपनी राय है कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बलात्कार बलात्कार है, चाहे वह किसी भी पुरुष द्वारा किया गसा हो। चाहे पति हो और महिला पत्नी हो। जोशी ने कहा कि इस बारे में सामाजिक रवैया बदले की जरूरत है।

जस्टिस दिव्येश जाेशी ने ये कड़ी टिप्पणियों राजकोट के उस मामले कीं जिसमें एक महिला ने अपने पति-सास और ससुर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि उन्हें न सिर्फ नग्न वीडियो रिकॉर्ड किए बल्कि उन्हें अश्लील साइट पर अपलोड किया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़िता की तरफ दलील दी गई कि पति ये सब हरकतें अपने माता-पिता की शह पर कर रहा था। पीड़ित की ओर से कहा गया है कि इस सब के पीछे का मकसद पैसा कमाना और अपने होटल को बेचने से बचना था क्योंकि वे आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। ऐसा उन्होंने अधिक रुपये कमाने के लिए किया। कोर्ट ने इस मामले में तमाम आरोपियों की जमानत खारिज कर दी।

नागपुर रैली में बीजेपी के लिए क्या बोले राहुल गांधी?

हाल ही में राहुल गांधी ने नागपुर रैली में बीजेपी के लिए एक बयान दिया है! कांग्रेस के 139वें स्थापना दिवस पर आयोजित ‘हैं तैयार हम’ रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने बीजेपी पर बड़ा हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि देश में दो विचारधाराओं की लड़ाई की चल रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह लड़ाई नागपुर से शुरू हुई थी। इसलिए हम यहां आए हैं। राहुल गांधी ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि केंद्र की सत्ता में आने पर कांग्रेस पार्टी देश में जाति जनगणना कराएगी। राहुल गांधी ने कहा कि देखने में कह सकते हैं कि लड़ाई राजनैतिक है सत्ता के लिए है, लेकिन सही में यह लड़ाई दो विचारधाराओं की है। राहुल गांधी ने कांग्रेस से बीजेपी में गए नेता जो सांसद है से बातचीत की बातचीत का हवाला देकर निशाना साधा। राहुल गांधी ने कहा कि कहा उन्होंने मुझसे छुपकर और डरकर मुलाकात की और कहा कि मैं बीजेपी का सांसद हूं लेकिन मेरा दिल कांग्रेस में है। राहुल गांधी ने कहा कि उस सांसद ने बताया कि बीजेपी में गुलामी चलती है। ऊपर से जो आर्डर आता है उसे करना पड़ता है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस में सभी सुनी जाती है। नीचे से आवाज आती है, लेकिन बीजेपी में ऐसा नहीं है। राहुल गांधी ने कहा वे सभी की बात सुनते हैं। कई बार असहमति भी व्यक्त करते हैं। राहुल गांधी ने कहा आजादी से पहले राजाओं और अंग्रेजों का शासन था। गन सलूट दिए जाते थे। वे जो चीज अच्छी लगती थी उसे ले लेते थे। राहुल गांधी ने कहा कि लोगों के अधिकारों की रक्षा अंबेडकर और गांधी जी ने की। संविधान बनाया। राहुल गांधी ने आज आरएसएस के लोग झंडे के सामने खड़े हो जाते हैं और सैल्यूट मारते हैं। सालों तक उन्होंने ऐसा नहीं किया है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई के बाद लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित किया था। संविधान के जरिए बराबर अधिकार दिया। एक वोट का बराबर अधिकार दिया।

राहुल गांधी ने कांग्रेस की कार्यकाल में हुए कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि आज चार दशक में सर्वाधिक बेरोजगारी है। उन्होंने पूछा कि आप बताइए कि मोदी सरकार ने कितने लोगों के रोजगार दिया। उन्होंने बेरोजगारी के चलते आज कई-कई घंटे तक युवा सिर्फ मोबाइल देखते हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 1 लाख 50 हजार युवाओं को हिंदुस्तान की सेना और एयरफोर्स एक्सेप्ट कर लिया था। फिजिकल परीक्षा पास कर ली थी। मोदी सरकार ने अग्निवीर योजना लागू की और 1.50 युवाओं को उन्होंने आर्मी में नहीं आने दिया। राहुल गांधी इनमें से कुछ युवा मिले। वो रो रहे थे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इससे देश का फायदा नहीं होने वाला है। राहुल गांधी ने एक बार फिर कहा कि केंद्र सरकर कुछ चुने हुए लोगों को देश का धन दे रही है।

राहुल गांधी नागपुर की रैली में एक बार फिर भागीदारी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा सरकार से लेकर देश की शीर्ष 100 से 200 कंपनियों में ओबीसी, दलित और आदिवासियों की उपस्थिति नगण्य है। राहुल गांधी ने कहा कि मैं जब जाति जनगणना की मांग उठाई तो पीएम मोदी ने अपना भाषण बदल दिया। वे अब कहते हैं कि सिर्फ एक जाति है गरीब। राहुल गांधी ने कहा कि दिल्ली में जैसे ही सरकार आएगी हम जाति जनगणना कराएंगे। इसे करके दिखा देंगे। राहुल गांधी ने कहा कि मैं फिर से कहता हूं कि यह विचारधारा की लड़ाई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमें दो हिंदुस्तान नहीं चाहिए। हमें एक ही हिंदुस्तान चाहिए। एक हिन्दुस्तान सपने का है। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। हिंदुस्तान के युवाओं को रोजगार की जरूरत है। राहुल गांधी ने कहा कि यह काम सिर्फ I.N.D.I.A अलायंस कर सकता है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नागपुर की धरती नमन किया है। उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर और महात्मा गांधी को याद किया। इसके बाद उन्होंने कहा कि आरएसएस का जन्म भी नागपुर से हुआ। उन्होंने कहा कि अंबेडकर और गांधी की भूमि है। खरगे ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस ने पिछले 10 सालों में तंग करके रख दिया है। खरगे ने कहा देश का संविधान भी खत्म हो जाएगा। खरगे ने कहा जिस देश में वोटिंग का अधिकार नहीं था। वह अधिकार संविधान से मिला। खरगे ने बाकी लोग अपनी संपत्ति को बचाने और बढ़ाने में लगे हैं। खरगे ने कहा कि जब हम अंग्रेजों से नहीं डरे तो बीजेपी और आरएसएस से क्या डरेंगे? उन्होंने कहा कि हम पीएम मोदी से नहीं डरेंगे। खरगे ने पूछा कि क्या देश के आजादी 2014 में मिली है? खरगे के कहा देश को आजादी मिलने के बाद गद्दी पर बैठे हैं। खरगे ने रैली में कुछ देर मराठी में संबाेधन दिया।