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बीसीसीआई के केंद्रीय अनुबंध में शामिल क्रिकेटरों की पूरी सूची.

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बोर्ड के सालाना कॉन्ट्रैक्ट में 30 क्रिकेटर, किसे मिलेगा कितना पैसा?
विराट कोहली, रोहित शर्मा और यशस्वी जयसवाल जैसे क्रिकेटर बोर्ड के सालाना कॉन्ट्रैक्ट पर हैं. इस सूची में कौन-कौन से क्रिकेटर हैं? भारतीय क्रिकेट बोर्ड के साथ वार्षिक अनुबंध पर 30 क्रिकेटर हैं। उस लिस्ट में विराट कोहली, रोहित शर्मा और यशस्वी जयसवाल जैसे क्रिकेटर शामिल हैं। इस सूची में कौन-कौन से क्रिकेटर हैं?

भारतीय बोर्ड क्रिकेटरों को चार श्रेणियों में वार्षिक अनुबंध के तहत रखता है। आइए एक नजर डालते हैं उस लिस्ट पर.

ग्रेड A+ (Tk. 7 करोड़ प्रति वर्ष)

रोहित शर्मा, विराट कोहली, जसप्रित बुमरा और रवीन्द्र जड़ेजा।

ग्रेड ए (Tk. 5 करोड़ प्रति वर्ष)

रविचंद्रन अश्विन, मोहम्मद शमी, मोहम्मद सिराज, लोकेश राहुल, शुबमन गिल और हार्दिक पंड्या।

ग्रेड बी (Tk. 3 करोड़ प्रति वर्ष)

सूर्यकुमार यादव, ऋषभ पंत, कुलदीप यादव, अक्षर पटेल और यशस्वी जयसवाल।

ग्रेड सी (Tk. 1 करोड़ प्रति वर्ष)

रिंकू सिंह, तिलक वर्मा, रुतुराज गायकवाड़, शार्दुल ठाकुर, शिवम दुबे, रवि बिश्नोई, जीतेश शर्मा, वाशिंगटन सुंदर, मुकेश कुमार, संजू सैमसन, अर्शदीप सिंह, श्रीकर भरत, प्रसिद्ध कृष्णा, अबेश खान और रजत पाटीदार। इस वर्ष यशस्वी को बोर्ड अनुबंध पर लाया गया। पिछले साल ऋषभ पंत ग्रेड ए में थे लेकिन इस साल उन्हें ग्रेड बी में डाल दिया गया है। जडेजा ग्रेड ए+ श्रेणी में पहुंच गए हैं।

कई क्रिकेटरों के बोर्ड के साथ वार्षिक अनुबंध पर आने की संभावना है। सरफराज खान, ध्रुव जुरेल, आकाश दीप जैसे क्रिकेटर उस लिस्ट में हैं। वर्षों के बीच उन्हें उनके वार्षिक अनुबंधों में देखा जा सकता है। भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज जीती. अंतिम परीक्षण केवल अंगूठे का नियम है। लेकिन वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप को देखते हुए किसी भी टेस्ट को हल्के में नहीं लिया जा सकता. तो भारत धर्मशाला टेस्ट में भी इंग्लैंड को हराना चाहेगा. और उस टेस्ट में बुमराह टीम में वापसी कर सकते हैं.

बुमराह को रांची में आराम दिया गया। भारत ने उनके बिना ही टेस्ट जीत लिया. बुमराह ने क्रिकेट खेलना जारी रखा है. इसीलिए बोर्ड ने उन्हें आराम देने का फैसला किया. सूत्रों के मुताबिक, पांचवें टेस्ट में बुमराह को फिर से वापस लाया जाएगा. बुमराह इस सीरीज में अब तक 17 विकेट ले चुके हैं. धर्मशाला में यह संख्या बढ़ सकती है.

बुमराह की गैरमौजूदगी में आकाश दीप ने रांची में डेब्यू किया. पहले टेस्ट में बंगाल के तेज गेंदबाज ने सबका ध्यान खींचा। धर्मशाला में टीम में वापसी करने पर बुमराह को बाहर बैठना पड़ सकता है. लेकिन अगर धर्मशाला की पिच तेज़ गेंदबाज़ों के अनुकूल है तो भारत तीन तेज़ गेंदबाज़ों के साथ खेल सकता है। ऐसे में आकाश भी बुमराह और मोहम्मद सिराज के साथ खेल सकते हैं. हालाँकि यह धर्मशाला की पिच पर निर्भर करता है। इंग्लैंड का वज्रपात भारत पर आ गया है. बेन स्टोक्स ने हैदराबाद में पहला मैच जीता लेकिन अगले तीन टेस्ट हार गए। सिराज को इन तीन टेस्ट मैचों के बीच विशाखापत्तनम में आराम दिया गया था. रांची में बुमराह को आराम दिया गया था. दोनों राजकोट में खेले. इंग्लैंड ने वहां बुमराह की गेंदबाजी का जलवा देखा. धर्मशाला में बुमराह और सिराज को एक बार फिर साथ देखने की संभावना है। रणजी ट्रॉफी के सेमीफाइनल से पहले मुंबई को श्रेयस अय्यर को टीम में मिला. रन नहीं बनाने के कारण भारतीय टीम से बाहर किये जाने के बाद उन्होंने रणजी नहीं खेला. यह भी अफवाह थी कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड जुर्माना लगा सकता है. कहा जा रहा है कि श्रेयस को बोर्ड के वार्षिक अनुबंध से बाहर करने की भी बातचीत चल रही है। ऐसे में पता चला है कि श्रेयस स्वस्थ हैं, वह रणजी ट्रॉफी खेलेंगे.

एक अखिल भारतीय मीडिया सूत्र के मुताबिक, श्रेयस ने मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन को बताया कि वह स्वस्थ हैं। मुंबई के लिए रणजी सेमीफाइनल खेलने के लिए भी तैयार हूं।’ भारतीय टीम से बाहर होने के बाद श्रेयस को रणजी क्वार्टर फाइनल में खेलना था। लेकिन उन्होंने कहा कि उनकी पीठ में चोट है. बल्लेबाजी करने में दर्द होता है. हालांकि नेशनल क्रिकेट एकेडमी के मुताबिक श्रेयस स्वस्थ हैं. इसके बाद श्रेयस को लेकर विवाद खड़ा हो गया. ऐसी भी शिकायतें हैं कि वह जानबूझकर रणजी नहीं खेल रहे हैं. दूसरी ओर, राष्ट्रीय टीम के कोच राहुल द्रविड़ ने कहा कि अगर उन्हें टीम से बाहर किया जाता है, तो उन्हें घरेलू क्रिकेट खेलने के बाद ही टीम में वापसी करनी चाहिए।

आखिर क्या है सरोगेसी कानून का नया नियम?

आज हम आपको सरोगेसी कानून का नया नियम बताने जा रहे हैं! क्या आप दंपती हैं जो सरोगेसी किराए की कोख के जरिए माता-पिता बनने का सपना देख रहे हैं? अगर हां, तो आपके लिए एक अच्छी खबर है! केंद्र सरकार ने सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022 में संशोधन किया है, जिससे अब डोनर गेमाइट्स यानी अंडाणु या शुक्राणु का उपयोग करने की अनुमति दे दी गई है, बशर्ते कि साझेदारों में से कोई एक मेडिकल कंडीशन के कारण अपने स्वयं के गेमाइट्स का उपयोग करने में असमर्थ हो। यह बदलाव उन दंपतियों के लिए राहत का संदेश है, जिनके स्वयं के बच्चे नहीं हो सकते हैं, लेकिन वे सरोगेसी के माध्यम से माता-पिता बनना चाहते हैं। सरकार के आदेश सरोगेसी चाहने वाले जोड़ों के लिए राहत लेकर आएंगे। डॉ. शिवानी ने कहा, ‘अधिकांश जोड़े कई बार गर्भपात और असफल आईवीएफ के बाद ही सरोगेसी का विकल्प चुनते हैं। यदि बच्चे पैदा करने का सपना देखने वाली महिला का ओवरी रिजर्व कम है, तो डोनर एग प्राप्त करना ही बच्चा पैदा करने का एकमात्र विकल्प है। मुझे खुशी है कि सरकार ने अपने पिछले फैसले पर पुनर्विचार किया है और इसे अनुमति दी है।’

इससे पहले, अधिनियम के तहत बनाए गए नियम 7 में ‘सरोगेट मां की सहमति और सरोगेसी के लिए समझौता’ पर बात की गई थी, जिसमें पति के शुक्राणु द्वारा डोनर ओओसाइट्स के निषेचन को मैंडेटरी बनाया गया था। इस संशोधन से पीड़ित कई महिलाओं ने राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनमें से अधिकांश को शीर्ष अदालत के समक्ष अपनी मेडिकल रिपोर्ट पेश करके इस प्रावधान से छूट मिल गई, जिसमें दिखाया गया है कि वे विभिन्न चिकित्सीय स्थितियों के कारण अंडे का उत्पादन करने में असमर्थ थीं। हालांकि, कानून के अन्य प्रावधान जो अविवाहित महिलाओं को सरोगेसी की अनुमति नहीं देते हैं, को भी चुनौती दी गई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर असहमतियां जताई हैं और कहा है कि देश में विवाह संस्था को संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए क्योंकि यहां उन पश्चिमी देशों जैसे हालात की अनुमति नहीं दी जा सकती है जहां विवाह से इतर बच्चों का जन्म होना आम बात है।

सरोगेसी नियमों में संशोधन हुआ है, जिससे डोनर गेमाइट्स का उपयोग करने की अनुमति मिल गई है। डिस्ट्रिक्ट मेडिकल बोर्ड द्वारा यह प्रमाणित होना जरूरी है कि दंपती में से किसी एक को चिकित्सीय स्थिति के कारण अपने गेमाइट्स का उपयोग करने में असमर्थता है। सरोगेसी के जरिए जन्म लेने वाले बच्चे में कम से कम एक गेमाइट इच्छुक दंपती का होना चाहिए। अकेली महिलाएं विधवा या तलाकशुदा को सरोगेसी प्रक्रिया का लाभ उठाने के लिए अपने अंडे और डोनर स्पर्म का उपयोग करना होगा। यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के बाद किया गया है, जिसमें मेडिकल रिपोर्टों के आधार पर डोनर गेमाइट्स के उपयोग की अनुमति मांगी गई थी। डॉक्टरों का कहना है कि यह बदलाव सरोगेसी का सहारा लेने वाले दंपतियों के लिए राहत लेकर आएगा। 2021 में भारत ने सरोगेसी रेग्युलेशन एक्ट पारित किया था क्योंकि अनैतिक प्रथाओं, सरोगेट माताओं के शोषण, सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों को त्यागने और मानव गेमाइट्स और भ्रूणों के आयात की रिपोर्टें सामने आ रही थीं।मार्च 2023 में जारी एक अधिसूचना ने सरोगेसी का सहारा लेने वाले दंपतियों के लिए डोनर गेमाइट्स के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद कई याचिकाएं दायर की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सरोगेसी नियमों में संशोधन करने के लिए प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप हाल ही में किए गए बदलाव आए हैं।

सरोगेसी विनियमन अधिनियम की धारा 2 एस में ‘इच्छुक महिला’ को कानून के तहत एक भारतीय महिला के रूप में परिभाषित किया गया है जो 35-45 वर्ष आयु वर्ग की विधवा या तलाकशुदा है और सरोगेसी का लाभ उठाना चाहती है। इसका मतलब है कि एक अविवाहित महिला को सरोगेसी के माध्यम से मां बनने की अनुमति नहीं है। इस प्रावधान को चुनौती देते हुए एक याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह भेदभावपूर्ण है और इसे रद्द कर दिया जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट आश्वस्त नहीं हुआ और कहा, ‘यहां मां बनना विवाह संस्था के भीतर ही आदर्श स्थिति है। विवाह संस्था के बाहर मां बनना आदर्श नहीं है। हम इस बारे में चिंतित हैं। हम बच्चे के कल्याण के लिहाज से बात कर रहे हैं। क्या देश में विवाह संस्था बचनी चाहिए या नहीं? हम पश्चिमी देशों की तरह नहीं हैं। विवाह संस्था को संरक्षित करना होगा। आप हमें कट्टरपंथी कह सकते हैं। हम आपके आरोप को स्वीकार करेंगे।’

क्या पाकिस्तान को खतरे में डाल सकता है आईएनएस गाजी?

इस गाजियाबाद पाकिस्तान को खतरे में डाल सकता है क्योंकि अब आईएएनएस गाजी के मलवे मिल चुके हैं! कितने गाजी आए, कितने गाजी गए… लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ‘टाईनी’ ढिल्‍लों की किताब का यह टाइटल पाकिस्तान को रह-रहकर दर्द देता है। दरअसल 1971 की भारत-पाक जंग में युद्ध की तस्वीर बदलने वाला असली फैक्टर भारत का आईएनएस विक्रांत था। इस लड़ाई में पाकिस्तान ने आईएनएस विक्रांत को डुबोने के लिए अपनी नेवल सबमरीन गाजी को भेजा था, जिसे आईएनएस राजपूत ने 3 और 4 दिसंबर 1971 की मध्यरात्रि को डुबो दिया था। आज बरसों बाद फिर से गाजी के डूबने के दर्द से पाकिस्तान कराह रहा है। दरअसल भारतीय नौसेना ने अपनी नई अंडरवाटर खोज और बचाव तकनीक ‘डीप सबमरजेंस रेस्क्यू व्हीकल’ की मदद से विशाखापत्तनम शहर के तट के पास पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस-गाजी के मलबे का पता लगाया है।  पाकिस्तान के पास गाजी एक ऐसी पनडुब्बी थी जिसमें समुद्री एरिया में जाकर टारगेट को निशाना बनाने की क्षमता थी। पाकिस्तान को भी यह पता था कि यदि वो विक्रांत को नुकसान पहुंचाने में कामयाब हुआ तो वह भारत पर युद्ध में बढ़त बना लेगा। 8 नवंबर 1971 को पीएनएस गाजी के कप्तान के पास यह मैसेज पहुंचता है कि आईएनएस विक्रांत को तबाह करने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई है। 1971 स्टोरीज ऑफ ग्रिट एंड ग्लोरी फ्रॉम इंडो पाक वॉर में लिखा गया है कि बंबई से एक पाकिस्तानी जासूस ने अपने हैंडलर्स आईएनएस विक्रांत की जानकारी दी। 8 नवंबर 1971 को जब भारतीय मेजर की ओर से ढाका और कराची के बीच जाने वाले संदेशों को सुनने की कोशिश की गई और अचानक उस दिन कई मैसेज जा रहे थे। भारत को इसका आभास तो हो गया कि कुछ बड़ा होने वाला है लेकिन बात पूरी तरह डिकोड नहीं हो पा रही थी कि आखिर पाकिस्तान की चाल क्या है। 10 नवंबर को वो कोड डिकोड हो गया। वहीं पहली बार यह पता चला कि पाकिस्तानी नौसेना कैसे भारतीय पोत आईएनएस विक्रांत को डुबो देना चाहता है।

भारत को जब यह पता चल गया तो उसकी ओर से भी पाकिस्तान को चकमा देने की तैयारी की गई और उसे ऐसा जख्म दिया गया जिसे वो आज तक भूल नहीं पाया है। भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान को चकमा दिया और आईएनएस राजपूत को आईएनएस विक्रांत बनाकर पेश किया। पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी आईएनएस राजपूत को भी तबाह नहीं कर पाया उसके विपरीत गाजी ही तबाह हो गया। पाकिस्तानियों को यह इनपुट था कि विक्रात विशाखापट्टनम में खड़ा है। भारत को यह पूरी जानकारी हो गई थी कि पाकिस्तान आखिर चाहता क्या है। पाकिस्तान को चकमा देने के लिए ऐसी तैयारी भारत ने बहुत जल्द की जिसकी उसकी भनक भी नहीं लगी। 1971 की भारत-पाक जंग के दौरान 4 दिसंबर को पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS-गाजी डूब गई। इस पनडुब्बी में 93 लोग सवार थे, जिसमें 11 अधिकारी और 82 नाविक सवार थे। यह घटना तब हुई जब पनडुब्बी विशाखापत्तनम के तट के पास थी, जिसे विज़ाग के नाम से भी जाना जाता है। इस हादसे के बाद छोटा सा मछली पकड़ने वाला शहर विजाग दुनियाभर में चर्चा में आ गया था। इस घटना को उस युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है, जिसके परिणामस्वरूप 1972 में बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। विजाग ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था। पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS गाजी के डूबने को भारत की पहली बड़ी और निर्णायक सैन्य जीत के तौर पर देखा जाता है।

पाकिस्तान ने अमेरिका से बनी पनडुब्बी गाजी को भारत के पूर्वी तट पर माइन बिछाने और भारतीय युद्धपोत INS विक्रांत को नष्ट करने के लिए भेजा था। गाजी ने 14 नवंबर, 1971 को कराची से चलकर चुपके से भारतीय प्रायद्वीप के चारों ओर 4,800 किलोमीटर की यात्रा की और विज़ाग तट पर पहुंची। भारतीय नौसेना ने अपने विध्वंसक INS राजपूत को भेजा, जिसने गाजी का पीछा किया और उस पर गहराई के बम गिराए, जिससे वह डूब गई। भारतीय नौसेना के विशेष पनडुब्बी बचाव यान, DSRV ने PNS गाजी के मलबे को लगभग 100 मीटर की गहराई में और विशाखापत्तनम तट से करीब 2 से 2.5 किलोमीटर दूर खोज निकाला है। हालांकि, भारतीय नौसेना के जवान भारतीय नौसेना की परंपराओं के अनुसार और शहीदों के सम्मान में मलबे को नहीं छूते हैं।

71 में पूर्वी कमान के चीफ वाइस एडमिरल एन कृष्णन ने अपनी आत्मकथा अ सेलर्स स्टोरी में लिखा है कि आईएनएस राजपूत को विशाखापट्टनम से 160 KM की दूरी पर ले जाया गया और आईएनएस विक्रांत के कॉल साइन का प्रयोग करे। विक्रांत की रेडियो फ्रीक्वेंसी पर उससे भारी मात्रा में रसद की मांग करने को कहा गया जो एक बड़े जहाज के लिए जरूरी होता है। आईएनएस राजपूत को पाकिस्तान INS विक्रांत समझने की गलती कर बैठा। गाजी को लेकर अलग-अलग दावे भी किए जाते हैं। एक बात यह भी है कि भारत-पाकिस्तान का युद्ध शुरू होने से पहले ही भारत ने गाजी को तबाह कर दिया। 3 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो चुका था। इंडियन नेवी भी इसमें शामिल थी। 4 दिसंबर को इंडियन नेवी की ओर पाकिस्तान नेवी पर हमला किया गया। 4 दिसंबर को आईएनएस निर्घट ने पाकिस्तान के जहाज पीएनएस खैबर पर मिसाइल दागी। एक हमले से अभी कुछ समझ पाते कि दूसरी मिसाइल से खैबर डूब गया। पीएनएस शाहजहां पर भी हमला किया गया और उसे भी बहुत नुकसान पहुंचा। नेवी ने इस पूरे ऑपरेशन को ऑपरेशन ट्राइटेंड का नाम दिया। भारत को इस ऑपरेशन में कोई नुकसान नहीं पहुंचा लेकिन पाकिस्तान की ओर भारी तबाही हुई!

आखिर सत्यपाल मलिक के दावे कितने सच है कितने झूठ है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि सत्यपाल मलिक के दावे कितने सच और कितने झूठ है! बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मणिपुर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक ने कई ऐसा बयान दिए जिन पर विवाद हो गया। हैरत की बात है कि कई बार उन्होंने अपने बयानों के लिए माफी मांगी, खुद को ही झूठा बताया और माना कि उनसे गलती हुई, ऐसा नहीं करना चाहिए था। सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर से ट्रांसफर किया गया तो वह जैसे भड़क गए और मोदी सरकार पर गंभीर से गंभीर आरोपों की झड़ी लगा दी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जवानों की लाशों पर राजनीति करने का आरोप लगाया तो अमित शाह की तरफ से गलत दावा कर दिया। यह अलग बात है कि मलिक ने आगे जाकर माफियां भी मांगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में उन्हें 300 करोड़ रुपये घूस का ऑफर मिला था। मलिक एक इंटरव्यू में ऐसा आरोप मढ़ते हैं और दूसरे इंटरव्यू में माफी मांग लेते हैं। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि बार-बार हुआ है। आरोपों-प्रत्यारोपों से इतर मलिक ने नेताओं के खिलाफ आतंकियों और किसानों को भड़काने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्या का हवाला देकर सरकार को धमकी देने और किसानों को भड़काने के प्रयास किए। अब उनके ही एक बयान के मामले में सीबीआई ने जो मामले दर्ज किए थे, उसी सिलसिले में उनके ठिकानों पर छापेमारी की। मलिक आज भी खुद को ही सर्टिफिकेट दे रहे हैं कि वो तो खांटी ईमानदार हैं जितना कि चौधरी चरण सिंह थे। खैर, आइए जानते हैं सत्यपाल मलिक ने कैसे-कैसे दावे किए और कब-कब माफियां मांगीं। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक ने दावा किया था कि सीआरपीएफ ने जवानों के मूवमेंट के लिए एयरक्राफ्ट मांगा था लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय देने से इनकार कर दिया था। मलिक ने कहा कि उनसे मांग की जाती तो सीआरपीएफ को हर हाल में ही एयरक्राफ्ट दिया जाता। पांच विमानों की ही तो जरूरत थी। मलिक ने दावा किया था, ‘पीएम मोदी ने पुलवामा अटैक के बाद जिम कॉर्बेट पार्क से मुझे कॉल किया था तो मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि यह हमारी गलती से हुआ है। इस पर उन्होंने मुझसे कहा कि तुम चुप रहो और किसे से कुछ नहीं कहो।’ मलिक ने यह भी दावा किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल ने भी उन्हें चुप रहने को कहा था। उन्होंने कहा, ‘तभी मैं समझ गया था कि सरकार पूरा ठीकरा पाकिस्तान पर फोड़ने वाली है।’ ध्यान रहे कि 14 फरवरी, 2019 को दोपहर बाद करीब 3 बजे जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने श्रीनगर-जम्मू नैशनल हाइवे पर सीआरपीएफ के काफिले को बम विस्फोट से उड़ा दिया था। इस हमले में सीआरपीएफ ने अपने 40 जवान खो दिए थे। वो यहीं नहीं रुके और यहां तक कह दिया था कि पीएम मोदी ने पुलवामा हमले की त्रासदी का चुनावों में फायदा उठाया और लोगों से कहा कि जब वो वोट दें तो पुलवामा को याद रखें। उन्होंने कहा, ‘मैं जनता से एक बार फिर कहता हूं कि इस बार वोट करते समय पुलवामा के शहीदों को याद रखें।’

सत्यपाल मलिक ने जनवरी 2022 में हरियाणा के दादरी में दावा किया कि पीएम मोदी ने किसानों के मुद्दे पर उनसे बड़ी घमंड से बात की थी। उन्होंने कहा ‘वो बहुत घमंड में थे। जब मैंने उनसे कहा, हमारे 500 लोग मर गए। पीएम ने कहा तुम तो *** मरती है तो चिट्ठी भेजते हो। मेरे लिए मरे हैं? मैंने कहा आपके लिए ही तो मरे थे क्योंकि आप उनकी वजह से राजा बने हुए हो, इसको लेकर मेरा उनसे झगड़ा हो गया।’ मलिक ने दावा किया कि इसके बाद प्रधानमंत्री ने उनसे अमित शाह से मिलने को कहा। उन्होंने दावा किया, ‘अमित शाह ने कहा सत्यपाल इनकी अक्ल मार रखी है लोगों ने, तुम बेफिक्र रहो, तुम आते रहो हमसे मिलते रहो…’ इसके बाद उन्होंने कहा कि वो ईमानदार हैं, इसलिए अबतक आईटी और ईडी की कार्रवाई से बचे हैं। बाद में अंग्रेजी वेबसाइट द वायर को 14 फरवरी, 2023 को दिए इंटरव्यू में अमित शाह के बयान के अपने दावे पर पलट गए और खुद से स्वीकार किया कि उन्होंने झूठ बोला था। मलिक ने कहा, ‘मैंने अमित शाह से संबंधित बयान के बारे में पूरी तरह झूठ बोला था। उन्होंने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। मैं इस बयान को वापस लेता हूं। उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा।’ इसी मुद्दे को लेकर जब इंटरव्यू ले रहे करण थापर ने मलिक से दोबारा पूछा तो उन्होंने फिर स्वीकार किया कि उन्होंने झूठ बोला था।

मलिक ने 17 अक्टूबर, 2021 को राजस्थान के झुंझनू में कहा था कि जब वो जम्मू-कश्मीर के गवर्नर थे तो दो फाइलों पर साइन करने के लिए उन्हें 300 करोड़ रुपये की डील का ऑफर मिला था। मलिक के इस दावे के पीछे आरएसएस, बीजेपी, पीडीपी और अंबानी का नाम जुड़ा। उन्होंने बताया कि दो फाइलों पर साइन करने के लिए उन्होंने 150-150 करोड़ रुपये रिश्वत का ऑफर मिला था। उन्होंने कहा कि उन तक यह ऑफर सचिवों के जरिए पहुंचा था। मलिक ने दावा किया उन्होंने इस ऑफर के जवाब में कहा था, ‘पांच जोड़ी कुर्ता-पायजामा लेकर आया था और उन्हें लेकर वापस चले जाएंगे, लेकिन रिश्वतखोरी नहीं करूंगा।’ बाद में दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में मलिक ने आरएसएस से माफी मांग ली। उन्होंने कहा कि जिस शख्स ने मुझे फाइल दी थी, उसने खुद को आरएसएस से जुड़ा बताया था, इसलिए मैंने आरएसएस का नाम लिया। उन्होंने मान कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। फिर उन्होंने बताया, ‘मैंने प्रधानमंत्री मोदी को इसकी पूरी जानकारी दे दी थी और उन्होंने मेरे फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार पर समझौता करने की कोई जरूरत नहीं है।’

तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद सत्यपाल मलिक का एक वीडियो नवंबर 2021 में वायरल हुआ। उस वीडियो में मलिक कह रहे थे कि यदि कृषि कानून वापस नहीं लिए गए होते तो उनका हाल इंदिरा गांधी जैसा होता। उस वीडियो में मलिक के बयान से साफ हो रहा था कि वो इंदिरा गांधी और जनरल वैद्य की हत्या को जायज ठहराते हुए हत्यारों की तारीफ कर रहे थे। उन्होंने धमकी देते हुए कहा था किअगर आपको लगता है कि किसान प्रदर्शनकारी अपने आप वापस चले जाएंगे तो ये आपकी गलतफहमी है।

सत्यपाल मलिक के विवादित बयानों का पुराना इतिहास रहा है। जब जयप्रकाश नारायण जेपी का आंदोलन जोरों पर था, तब सत्यपाल मलिक उत्तर प्रदेश के विधायक थे। उन्होंने तब विधानसभा में दावा किया कि 22-23 जून, 1974 को जेपी इलाहाबाद अब प्रयागराज आए थे तो प्रदेश की हेमवती नंदन बहुगुणा सरकार ने उनके सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने में बाधा डाली और आयोजन असफल करवाने का प्रयास किया। मलिक के इस दावे पर बहुगुना सरकार की किरकिरी होने लगी। बहुगुणा ने न केवल सदन में मलिक के दावे को खारिज किया बल्कि जेपी को पत्र लिखकर भी शिकायत की। जेपी ने भी चिट्ठी से ही जवाब दिया और मलिक के दावे पर हैरानी जताई। जेपी ने अपनी चिट्ठी में लिखा, ‘मुझे याद नहीं पड़ता कि सत्यपाल मलिक से मेरी अलग से कोई बातचीत हुई थी। अगर हुई भी हो, तो भी यह असंभव है कि मैंने उससे वैसा कुछ कहा हो जो बयान उसने असेंबली में दिया। उस बयान का मैंने विरोध नहीं किया क्योंकि मैं ऐसे लोगों के साथ वाद-विवाद में पड़ना ठीक नहीं समझता।’

क्या कांग्रेस नहीं कर रही है आयकर नियमों का पालन?

वर्तमान में कांग्रेस आयकर नियमों का पालन नहीं कर रही है ऐसा बीजेपी का कहना है! कांग्रेस के बैंक अकाउंट फ्रीज किए जाने के आरोपों पर बीजेपी ने रिएक्ट किया है। बीजेपी ने कांग्रेस के उस दावे को झूठा बताकर खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि सरकार ने 2018-19 के आयकर रिटर्न को आधार बनाकर ये कार्रवाई की। पार्टी ने साथ ही आरोप लगाया कि चुनावों में कांग्रेस की हार जितनी अधिक होती है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ‘गालियां’ देने में उतनी ही आक्रामक हो जाती है। एक आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने बाद में कांग्रेस को अगले सप्ताह आगे की सुनवाई लंबित रहने तक अपने खातों को संचालित करने की अनुमति दी। बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आयकर विभाग की कार्रवाई एक नियमित प्रक्रिया है। कांग्रेस ने टैक्स दाखिल करने या अपील के संबंध में नियमों का पालन करने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह एक नियमित इनकम टैक्स विभाग की प्रक्रिया है। हम कांग्रेस की ओर से फैलाए जा रहे झूठ की निंदा करते हैं।

कांग्रेस के यह कहने के तुरंत बाद कि उसके खातों पर रोक लगा दी गई है, इसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में सरकार पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने कहा कि डरो मत मोदी जी, कांग्रेस धन की ताकत का नहीं, जन की ताकत का नाम है। हम तानाशाही के सामने न कभी झुके हैं, न झुकेंगे। भारत के लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कांग्रेस कार्यकर्ता जी जान से लड़ेगा। रविशंकर प्रसाद ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर लोगों ने कांग्रेस को वोट नहीं देने का मन बना लिया है तो विपक्ष को बीजेपी या पीएम मोदी को दोष नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्या कांग्रेस के पास पीएम मोदी और बीजेपी के लिए गालियों के अलावा कुछ नहीं बचा है। यह पूरी तरह से हताशा का संकेत है। वे जितना पराजित होते हैं, वे उतने ही आक्रामक होते जाते हैं। कांग्रेस आयकर की कार्रवाई आगे बढ़ाने में सबसे अधिक लापरवाही बरत रही है।

बीजेपी नेता ने कहा कि एक विशेष टैक्स लगाया जाता है और आप उसका भुगतान नहीं करते हैं। आप रोक के लिए प्रयास करते हैं लेकिन उसकी प्रक्रिया का पालन नहीं करते हैं। अगर आप आईटी कानूनों की प्रक्रिया का पालन नहीं करते हैं, तो परिणाम भुगतना पड़ता है। यह एक साधारण मामला है। उन्होंने कहा कि चूंकि पार्टी को अब कुछ राहत मिली है, इसलिए उसे प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। बता दें कि इनकम टैक्स विभाग ने कहा कि कांग्रेस के खिलाफ साल 2018-19 के लिए 135 करोड़ रुपये का बकाया मांग लंबित है। इसका मूल्यांकन करने पर 103 करोड़ रुपये की डिमांड और 32 करोड़ का ब्याज भी शामिल है। ऐसे में जरूरी प्रावधानों का पालन नहीं करने के कारण कार्रवाई की गई। कांग्रेस से कुल मांग का 20 फीसदी भुगतान करने के लिए कहा गया था, लेकिन उनकी ओर से 78 लाख रुपये का भुगतान किया गया। सीआईटी(ए) और आईटीएटी के समक्ष अपील खारिज होने के बाद, आयकर विभाग ने बैंक खातों से पैसे निकालकर वसूली की है।

आयकर विभाग के सूत्रों ने कांग्रेस नेता अजय माकन ने इस दावे का भी खंडन किया कि बैंक अकाउंट का ऑपरेशन या एक्टिविटी रोकी गई। यह एक नियमित प्रक्रिया है और इससे पार्टी के खातों के संचालन पर कोई असर नहीं पड़ा है। इससे पहले, कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने दावा किया था कि पार्टी के मुख्य बैंक खातों को कमजोर आधार पर फ्रीज कर दिया गया। जिससे आगामी आम चुनावों से पहले उनकी राजनीतिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। अजय माकन ने कहा था कि भारतीय युवा कांग्रेस के खाते सहित चार मुख्य बैंक खातों को 2018-19 के लिए 210 करोड़ रुपये की आयकर मांग के कारण फ्रीज कर दिया गया था। अजय माकन ने इस कार्रवाई को पार्टी की ओर से आयकर रिटर्न कुछ दिनों की देरी से दाखिल करने के लिए जिम्मेदार ठहराया। हालांकि, आयकर विभाग के सूत्रों ने खातों को फ्रीज करने को नियमित प्रक्रिया बताया है। एक अधिकारी ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के खिलाफ 2018-19 के लिए 135 करोड़ रुपये की बकाया मांग लंबित है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13ए के तहत छूट को अस्वीकार करते हुए मूल्यांकन पूरा किया गया था। इसमें तय प्रावधानों का पालन नहीं किया गया था और आय का रिटर्न देर से दाखिल किया गया था।

विभाग की ओर से बताया कि सीआईटी(ए) के समक्ष INC की ओर से दायर अपील खारिज कर दी गई, और आईटीएटी के समक्ष दूसरी अपील दायर की गई। आईएनसी के विभिन्न बैंक खातों से पैसे निकालकर 115 करोड़ रुपये की वसूली की गई है, और आयकर विभाग की ओर से इसको नियमित माना जाता है। खातों का संचालन बंद नहीं किया गया है, और आईएनसी के पास अपनी गतिविधियों के लिए अन्य खाते भी हैं। हालांकि, कांग्रेस नेता अजय माकन ने इस दावे का खंडन किया कि खाते अनफ्रीज कर दिए गए हैं।

राजनीतिक पार्टियां कैसे बताएंगे चंदे देने वाले का नाम?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि राजनीतिक पार्टियां चंदे देने वाले का नाम कैसे बताएगी! सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाल के फैसले में चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इसके साथ ही भारतीय स्टेट बैंक को इसके जारी करने पर रोक लगाने के भी निर्देश दिए हैं। इस संबंध में बैंक को बॉन्ड खरीदने वाले, बॉन्ड खरीद की तारीख, बॉन्ड के मूल्य वर्ग की जानकारी देनी होगी। वहीं, चुनाव आयोग को बैंक से प्राप्त जानकारी के अलावा चंदा पाने वाले राजनीतिक दलों की जानकारी देनी होगी। हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा बैंकिंग नियम चुनावी बॉन्ड के लिए सब्सक्राइबर के नामों के खुलासे में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। यह योजना राजनीतिक दलों के लिए फंडिंग सिस्टम को साफ करने और वैधानिक फंड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई थी। सरकारी अधिकारी वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अध्ययन कर रहे हैं। इसके निहितार्थों को लागू करने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। ऐसी चिंताएं हैं कि आदेश से कानूनी चुनौतियां और संवेदनशील विवरणों का संभावित प्रकाशन हो सकता है। हाल ही में एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित कर दिया। शीर्ष अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक को इन्हें जारी करना बंद करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, अदालत ने चुनाव आयोग को बॉन्ड खरीदारों, बॉन्ड प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों, खरीद की तारीखों, खरीदारों के नाम और उनकी वेबसाइट पर मूल्यवर्ग की जानकारी का खुलासा करने का आदेश दिया। इन उपायों का उद्देश्य राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाना है।

अतीत में, सरकार ने राजनीतिक फंडिंग से काले धन को मिटाने के लिए विभिन्न तरीकों का पता लगाया। चुनावी बॉन्ड की शुरुआत ऐसी ही एक पहल थी, जो राजनीतिक उद्देश्यों के लिए वैध धन के उपयोग को सुनिश्चित करती थी। हालांकि, इस बात को लेकर चिंता बनी हुई है कि आगामी आम चुनावों के दौरान काला धन एक बार फिर राजनीतिक दलों की फंडिंग में घुसपैठ कर सकता है। जब सरकार ने चुनावी बॉन्ड पेश किए, तो उसने निर्दिष्ट किया कि वे धारक साधनों के रूप में कार्य करेंगे, जो कि वचन पत्रों के समान हैं, और उन पर ब्याज नहीं लगेगा। केवल भारतीय नागरिक या भारत में निगमित संस्थाएं ही इन बॉन्ड को खरीदने के पात्र थे। आर्थिक मामलों के विभाग ने कहा कि बॉन्ड एसबीआई की नामित शाखाओं से 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, 1,00,000 रुपये, 10,00,000 रुपये और 1,00,00,000 रुपये के मूल्यवर्ग में प्राप्त किए जा सकते थे। अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए, खरीदार को अपने बैंक खाते से सभी मौजूदा अपने ग्राहक को जानें आवश्यकताओं को पूरा करना अनिवार्य था। विशेष रूप से, बॉन्ड में भुगतानकर्ता का नाम नहीं होता था, जिससे लेन-देन की गुमनामी बनी रहती थी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड पर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया है। शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड की बिक्री पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने इस संबंध में गुरुवार को फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को 2019 से अब तक चुनावी बॉन्ड से जुड़ी पूरी जानकारी देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि चुनावी बांड योजना, आयकर अधिनियम की धारा 139 द्वारा संशोधित धारा 29(1)(सी) और वित्त अधिनियम 2017 द्वारा संशोधित धारा 13(बी) का प्रावधान अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन है। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि चुनावी बांड जारी करने वाला बैंक, यानी भारतीय स्टेट बैंक, चुनावी बांड प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों का विवरण और प्राप्त सभी जानकारी जारी करेगा। उन्हें 6 मार्च तक भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को सौंप देगा। ईसीआई इसे 13 मार्च तक आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा। साथ ही राजनीतिक दल इसके बाद खरीददारों के खाते में चुनावी बांड की राशि वापस कर देंगे। जानते हैं आखिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मायने क्या हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार पर क्या असर पड़ेगा।

चुनावी बांड ब्याज मुक्त धारक बांड या मनी इंस्ट्रूमेंट था जिन्हें भारत में कंपनियों और व्यक्तियों द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अधिकृत शाखाओं से खरीदा जा सकता था। ये बांड 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, 1 लाख रुपये, 10 लाख, और 1 करोड़ रुपये के गुणकों में बेचे जाते थे।किसी राजनीतिक दल को दान देने के लिए उन्हें केवाईसी-अनुपालक खाते के माध्यम से खरीदा जा सकता था। राजनीतिक दलों को इन्हें एक निर्धारित समय के भीतर भुनाना होता था। दानकर्ता का नाम और अन्य जानकारी दस्तावेज पर दर्ज नहीं की जाती है और इस प्रकार चुनावी बांड को गुमनाम कहा जाता है। किसी व्यक्ति या कंपनी की तरफ से खरीदे जाने वाले चुनावी बांड की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी। सरकार ने 2016 और 2017 के वित्त अधिनियम के माध्यम से चुनावी बांड योजना शुरू करने के लिए चार अधिनियमों में संशोधन किया था। ये संशोधन अधिनियम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम , 1951, (आरपीए), कंपनी अधिनियम, 2013, आयकर अधिनियम, 1961, और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम, 2010 (एफसीआरए), 2016 और 2017 के वित्त अधिनियमों के माध्यम से थे। 2017 में केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को वित्त विधेयक के रूप में सदन में पेश किया था। संसद से पास होने के बाद 29 जनवरी 2018 को इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की अधिसूचना जारी की गई थी।

बीजेपी को मिले चंदे के लिए क्या बोली कांग्रेस?

हाल ही में कांग्रेस ने बीजेपी को मिले चंदे के लिए एक बयान दे दिया है! कांग्रेस ने सरकार पर जांच एजेंसियों के माध्यम से 30 कंपनियों को ‘ब्लैकमेल करके’ बीजेपी को 335 करोड़ रुपये का चंदा दिलवाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘श्वेत पत्र’ लाना चाहिए। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने दावा किया कि ‘मोदी राज’ में बीजेपी को दिया गया ‘अवैध चंदा’ और चुनावी बॉन्ड ही कारोबारी सुगमता की गारंटी है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र पर ‘हफ्ता वसूली सरकार’ होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस मामले की उच्चतम न्यायालय की निगरानी में जांच जरूरी है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर सवाल किया कि क्या सरकार इस मामले पर ‘श्वेत पत्र’ लाने जा रही। क्या हर प्वाइंट पर स्पष्टीकरण देने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच के लिए तैयार है? इस प्रकरण पर फिलहाल भारतीय जनता पार्टी या सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। राहुल गांधी ने पूरे मामले को लेकर सोशल मीडिया साइट ‘एक्स’ पर एक पोस्ट किया।

राहुल गांधी ने लिखा, ‘क्या आपको प्रधानमंत्री की ‘चंदा दो, बेल और बिजनेस लो’ योजना के बारे में पता है? देश में प्रधानमंत्री ‘वसूली भाई’ की तरह ईडी, आयकर और सीबीआई का दुरुपयोग कर ‘चंदे का धंधा’ कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘खबरों में सामने आया है कि वसूली एजेंट बन चुकी एजेंसियों की जांच में फंसी 30 कंपनियों ने बीजेपी को जांच के दौरान 335 करोड़ रुपये का चंदा दिया। चंदे का धंधा इतनी बेशर्मी से चल रहा है कि एक डिस्टिलरी के मालिकों ने बेल मिलते ही बीजेपी को चंदा दिया। मित्र की कंपनी को बेईमानी से फायदा और बाकियों के लिए अलग कायदा?’

राहुल गांधी ने आरोप लगाया, ‘मोदी राज में भाजपा को दिया ‘अवैध चंदा’ और चुनावी बॉन्ड ही कारोबारी सुगमता की गारंटी है।’ जयराम रमेश ने कहा कि हफ्ता वसूली और ब्लैकमेल की राजनीति हो रही है। ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है। निजी कंपनियों से चंदा लेने के लिए एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। उन्होंने दावा किया, ‘वर्ष 2018 -19 से 2022-2023 में 30 कंपनियों से 335 करोड़ रुपये वसूले गए। यह हफ्ता वसूली है… यह ब्लैकमेल की राजनीति है।’ जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि यह ‘हफ्ता वसूली सरकार’ है। उनके मुताबिक, इन 30 कंपनियों में से 23 कंपनियों ने वर्ष 2018 से पहले भाजपा को कोई चंदा नहीं दिया था, लेकिन 2018 के बाद इन 23 कंपनियों ने सत्तारूढ़ पार्टी को करीब 188 करोड़ रुपये का चंदा दिया। रमेश ने कहा कि अगर किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है तो कार्रवाई हो, लेकिन धमकी देकर चंदा वसूलना सही नहीं है।

वेणुगोपाल ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर ‘BJP को 30 कंपनियों से मिले चंदे’ का ब्यौरा दिया और कहा कि क्या आप भाजपा के धन पर एक ‘श्वेत पत्र’ लाएंगी। न केवल स्रोतों पर, बल्कि इस पर भी कि आपने कॉर्पोरेट कंपनियों के खिलाफ जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके उन्हें चंदा देने के लिए कैसे मजबूर किया?’ उन्होंने कहा कि अगर आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो क्या आप उन घटनाओं की ‘क्रोनोलॉजी’ पर बिंदुवार खंडन पेश करने को तैयार हैं, जिनके कारण बीजेपी का खजाना भरा?

वेणुगोपाल ने पत्र में यह भी कहा कि अगर आप तथ्यों के आधार पर स्पष्टीकरण देने को तैयार नहीं हैं, तो क्या आप बीजेपी के लिए चंदा लूटने के इन संदिग्ध लेन-देन की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच के लिए खुद को पेश करने को तैयार हैं? उन्होंने कांग्रेस के आयकर रिटर्न से जुड़े मामले का हवाला देते हुए कहा कि देश देख रहा है कि कैसे आप तुच्छ आरोपों के आधार पर कांग्रेस को आयकर नोटिस देकर और वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीयकृत बैंकों को हमसे पैसा वसूलने के लिए मजबूर करके लोकतंत्र को खत्म कर रही हैं। यह सारा पैसा भारत के लोगों की ओर से दिए गए छोटे-छोटे चंदे से आया है। इन 30 कंपनियों में से 23 कंपनियों ने वर्ष 2018 से पहले भाजपा को कोई चंदा नहीं दिया था, लेकिन 2018 के बाद इन 23 कंपनियों ने सत्तारूढ़ पार्टी को करीब 188 करोड़ रुपये का चंदा दिया। रमेश ने कहा कि अगर किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है तो कार्रवाई हो, लेकिन धमकी देकर चंदा वसूलना सही नहीं है।वेणुगोपाल ने दावा किया कि यह और कुछ नहीं बल्कि चुनाव से ठीक पहले लोकतंत्र में मिलने वाले समान अवसर को खत्म करने की साज़िश है।

क्या बीजेपी ला पाएगी 370 से अधिक सीट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी 370 से अधिक सीट ला पाएगी या नहीं! क्या 2024 लोकसभा चुनाव में एनडीए को 400 सीटें आएंगी, पीएम मोदी के टारगेट पर अब प्रशांत किशोर ने चुप्पी तोड़ी है। राम मंदिर मुद्दे का कितना असर चुनावों में दिखेगा उन्होंने इस पर भी चुप्पी तोड़ी। इसके साथ ही उन्होंने राहुल गांधी के भारत जोड़ो न्याय यात्रा की टाइमिंग पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिस समय INDI गठबंधन पर फैसला होना चाहिए उसे छोड़कर राहुल गांधी यात्रा कर रहे। वहीं नीतीश कुमार के बीजेपी संग जाने से क्या असर होगा इस पर भी प्रशांत किशोर ने रिएक्ट किया। प्रशांत किशोर ने जातीय जनगणना के मुद्दे पर दो टूक कहा कि ये कोई नैरेटिव नहीं है। जातीय जनगणना से किसी को कोई फायदा नहीं मिलने जा रहा। वहीं एनडीए के 400 पार के नारे को भी उन्होंने पब्लिक का नैरेटिव नहीं है। वो बीजेपी का चुनावी नारा है। इस चुनाव में नैरेटिव पीएम मोदी हैं, वो कैसे काम करते हैं इस पर वोटरों की निगाहें रहेंगी। राहुल गांधी की यात्रा पर प्रशांत किशोर ने कहा कि यात्राओं का एक अपना महत्व है। यात्रा से पब्लिक कनेक्ट का कुछ न कुछ फायदा तो होता है। लेकिन यात्रा का फायदा चुनाव परिणाम में दिख जाए ये जरूरी नहीं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि इस देश में सबसे चर्चित यात्रा लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रही। हालांकि, उससे बीजेपी को मजबूती तो मिली लेकिन चुनाव में उस तरह से फायदा नहीं मिला। इसी तरह उन्होंने राहुल गांधी की यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि इससे भले ही कांग्रेस को कर्नाटक और तेलंगाना में फायदा मिला, लेकिन एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला। पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। अब राहुल गांधी की जो दूसरी यात्रा चल रही इसका कोई बड़ा फायदा उन्हें मिलता नहीं दिख रहा। अब उनकी ये यात्रा की टाइमिंग गलत है। आप इंडी अलायंस के साथ होने चाहिए, किसे टिकट मिलेगा, क्या सीट शेयरिंग फॉर्मूला होगा इस पर चर्चा करनी चाहिए तो वो यात्रा में व्यस्त हैं। ऐसे में उनकी इस यात्रा की टाइमिंग पर सवाल उठना लाजमी है।इंडिया गठबंधन सही समय पर नहीं बना। इस गठबंधन के लिए पहले से तैयारी करनी चाहिए थी। 2024 चुनाव की तैयारी बीजेपी ने काफी पहले से शुरू कर दी थी। यही वजह है कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम ठीक चुनाव से पहले रखा गया। इसके लिए केंद्र सरकार ने तीन साल पहले ही प्लानिंग की होगी।

प्रशांत किशोर ने किसान आंदोलन पर भी रिएक्ट किया। उनसे एक छात्र ने सवाल किया कि क्या ये आंदोलन राजनीतिक तौर पर प्रभावित है तो उन्होंने साफ कहा कि ऐसा है। चुनाव के दौरान अगर कोई आंदोलन हो रहा तो कुछ असर जरूर होगा। उन्होंने कहा कि मेरा किसी भी पॉलिटिकल पार्टी या नेता से कोई संबंध नहीं है। पीएम मोदी के 370 टारगेट पर कहा कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा। अगर ऐसा होता है तो मैं शॉक्ड जरूर होऊंगा।

आगामी चुनाव में क्या कांग्रेस 100 पार करती दिख रही, प्रशांत किशोर ने दो टूक कहा कि ऐसा लग नहीं रहा। कांग्रेस की सीटें बढ़ने की संभावना नहीं, हालांकि, उनकी सीटें घट सकती हैं। बीजेपी के अकेले 370 सीट के टारगेट पर पीके ने कहा कि मुझे लगता है कि इसकी संभावना जीरो है। ये टारगेट अमित शाह ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए सेट किया है। बंगाल में बीजेपी को अच्छी सीटें आ सकती हैं। दक्षिण के राज्यों में बीजेपी को फायदा मिल सकता है। खास तौर पर तमिलनाडु में इनका वोट शेयर बढ़ सकता है। हालांकि, सीट पर उन्होंने साफ तौर पर कुछ नहीं कहा।

प्रशांत किशोर ने इस दौरान कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के चेहरे 10-15 साल में बदलने चाहिए।ऐसे में उनकी इस यात्रा की टाइमिंग पर सवाल उठना लाजमी है।इंडिया गठबंधन सही समय पर नहीं बना। इस गठबंधन के लिए पहले से तैयारी करनी चाहिए थी। 2024 चुनाव की तैयारी बीजेपी ने काफी पहले से शुरू कर दी थी। यही वजह है कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम ठीक चुनाव से पहले रखा गया। इसके लिए केंद्र सरकार ने तीन साल पहले ही प्लानिंग की होगी। बिहार, बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल समेत कई राज्यों में पार्टी 2019 के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन करेगी। हालांकि, उन्होंने ये दो टूक कहा कि ऐसा नहीं कि कोई मोदी को चुनौती नहीं दे सकता। हालांकि, 2024 में पीएम मोदी को हराना आसान नहीं।

क्या सुप्रीम कोर्ट खड़ी कर देगा विपक्षी दलों के लिए मुसीबत?

सुप्रीम कोर्ट अब विपक्षी दलों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है! लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की जांच को लेकर ऐसी टिप्पणी की है, जिससे विपक्षी दलों के उन नेताओं की मुश्किलें बढ़ेंगी, जो ईडी की रडार पर हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि राज्य सरकार के अधिकारियों को मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ सहयोग करना चाहिए। कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर भी सवाल उठाया जिसमें ईडी द्वारा तमिलनाडु के पांच जिला कलेक्टरों को अवैध रेत खनन के मामलों में तलब किए जाने पर रोक लगा दी गई थी। यह टिप्पणी विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में चल रही जांचों को प्रभावित कर सकती है। लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केंद्र सरकार को और मजबूती देगा। दरअसल, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, टीएमसी और समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों के नेता केंद्र पर ईडी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार ईडी और सीबीआई जांच के जरिए उनकी आवाज को दबाने की कोशिश कर रही हैं। विपक्षी दल का आरोप है कि ईडी, केंद्र के इशारों पर जांच करती है और झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल में डालती है। ऐसे में अब जब सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की जांच को लेकर जो साकारात्मक टिप्पणी की है, उससे विपक्षी दलों को झटका लगना तय है।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को हाल ही में ईडी ने गिरफ्तार कर किया है। जमीन घोटाला प्रकरण में सोरेन 15वें आरोपित हैं। इनसे पहले 14 आरोपित गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

दिल्‍ली सरकार में पूर्व उपमुख्‍यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया को ईडी ने फरवरी 2022 में गिरफ्तार किया था। उन्‍हें शराब घोटाले में मुख्‍य आरोपी बनाया गया है।

दिल्ली शराब घोटाला मामले में ही ईडी ने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को 7वां समन भेजा है। केजरीवाल को 26 फरवरी को पेश होने के लिए कहा गया है। केजरीवाल को इससे पहले ईडी 6 समन भेज चुकी है, लेकिन दिल्ली सीएम किसी ना किसी वजह से ईडी के सामने पेश नहीं हुए हैं।

आम आदमी पार्टी के ही एक और नेता संजय सिंह को ED ने 4 अक्‍तूबर को ग‍िरफ्तार‍ किया था। दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथ‍ित घोटाले में उन पर भी मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। दिनेश अरोड़ा नाम के एक शख्‍स ने उनके ख‍िलाफ गवाही दी है, जिसकी वजह से संजय सिंह जेल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। आम आदमी पार्टी सरकार में दिल्ली के मंत्री रहे सत्‍येंद्र जैन को भी ED ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में पिछले साल 30 मई को गिरफ्तार किया था। उन चार कंपनियों के जरिए धनशोधन का आरोप है, जो कथित तौर पर उनसे ही जुड़ी हुई थीं।

तृणमूल कांग्रेस के नेता और पश्चिम बंगाल के मंत्री रहे ज्‍योत‍ि प्र‍िया म‍ल‍िक को 30 अक्‍टूबर को ED ने गिरफ्तार किया था। करोड़ों रुपये के राशन वितरण घोटाले में उनकी संल‍िप्‍तता पाई गई है।

पश्च‍िम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभ‍िषेक बनर्जी हैं। बंगाल स्कूल रोजगार घोटाले की जांच के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय ने 9 नवंबर को उनसे पूछताछ की था की। प्राथमिक स्कूल नौकरी घोटाले में पैसे के लेन-देन की जांच के संबंध में एजेंसी ने उनसे पूछताछ की थी।

राजद नेता और लालू यादव के पुत्र तेजस्‍वी यादव भी ईडी की रडार पर हैं। हाल ही में ईडी ने नौकरी के बदले जमीन घोटाला मामले में उनसे 10 घंटे तक पूछताछ की थी। कहा जा रहा था कि ईडी की टीम ने 60 से अधिक सवालों की लिस्ट तैयार की थी। इससे पहले लालू यादव से भी इसी मामले में पूछताछ की गई थी।सुनवाई की शुरुआत में, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और पंकज मित्तल की पीठ ने कहा, ‘राज्य यह रिट याचिका कैसे दायर कर सकता है? किस कानून के तहत…आप हमें संतुष्ट करें कि राज्य को इसमें क्या दिलचस्पी है और वह प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ यह रिट याचिका कैसे दायर कर सकता है। राज्य को क्या नुकसान हुआ है?’ तमिलनाडु सरकार का कहना है कि ईडी की जांच अगर सही तरीके से नहीं हो रही है तो उसे अपने अधिकारियों को उससे बचाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि चाहे जो हो, राज्य को ईडी की जांच में सहयोग करना चाहिए।

ईडी ने 17 नवंबर को वेल्लोर, तिरुचिरापल्ली, करूर, तंजावुर और अरियालूर जिलों के कलेक्टरों को तलब किया था, लेकिन तमिलनाडु सरकार ने साथ ही प्रभावित अधिकारियों ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर ईडी द्वारा उनके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया था।अदालत ने फिलहाल जांच रोक दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसमें कहा गया था कि ईडी ‘जानकारी और सबूत इकट्ठा करके यह पता लगाने के मछली पकड़ने के अभियान में जुटा है कि क्या उन्हें आगे अन्य स्रोतों से संसाधित किया जा सकता है ताकि अपराध का पता लगाया जा सके’ ताकि वे पीएमएलए के तहत आगे बढ़ सकें।

राज्य और अधिकारियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अमित आनंद तिवारी ने कहा कि जबकि अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाएं स्वीकार्य हैं क्योंकि वे पीड़ित पक्ष हैं, राज्य भी अपने अधिकारियों को अवैध जांच से बचाने के लिए बाध्य है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने वाली थी, लेकिन रोहतगी ने पीठ द्वारा उठाए गए प्रारंभिक विरोध को खारिज करने के लिए समय की मांग करते हुए सुनवाई को 26 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि ईडी द्वारा जांच शुरू करने के लिए मामले में कोई आधारभूत अपराध नहीं था और हाईकोर्ट तलब को रोकने में सही था। ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जिला कलेक्टर इस मामले में आरोपियों में शामिल नहीं हैं और उन्हें केवल गवाह के रूप में बुलाया गया था।

विक्रांत मैसी अरित्रा दास द्वारा निर्मित एक नई हिंदी फिल्म में काम कर सकते हैं.

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इससे पहले उन्होंने बंगाली डायरेक्टर की फिल्म में काम किया था। कोंकणा सेनशर्मा द्वारा निर्देशित ‘ए डेथ इन द गंज’ में विक्रांत मसर के अभिनय को सराहा गया। इस बार एक्टर किसी बंगाली प्रोड्यूसर की फिल्म में काम कर सकते हैं. टोलीपारा निर्माता अरित्रा दास ने पहल की। फिलहाल विक्रांत फिल्म ‘ट्वेल्थ फेल’ की प्रैक्टिस कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, उनके पास पटकथाओं की संख्या भी अधिक है। लेकिन पता चला है कि ये फिल्म हिंदी में होने वाली है. फिल्म की पटकथा वास्तविक भ्रष्टाचार पर आधारित बनाई जा रही है। अरित्री मुख्य रूप से टॉलीवुड और बॉलीवुड में काम करती हैं। आनंदबाजार ऑनलाइन द्वारा संपर्क किए जाने पर, निर्माता ने इस खबर पर मुहर लगा दी। अरित्रा ने कहा, ”हमने प्राथमिक स्तर पर बातचीत की है। फिल्म का कंटेंट जानने में रुचि व्यक्त की. स्क्रिप्ट लिखे जाने के बाद विक्रांत ने कहा कि वह इसे पढ़ेंगे। इसमें अभी भी काफी समय लगेगा।”

हालांकि, अरित्रा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने विक्रांत की हालिया लोकप्रियता के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, ‘दरअसल, कंटेंट देखने के बाद मैंने उनके बारे में सोचा। साथ ही, एक निर्माता के रूप में, मैं मजबूत अभिनेताओं की तलाश में रहूंगा।” फिल्म का निर्देशन नए निर्देशक नितेश प्रधान करेंगे। टोलीपारा में अफवाह, फिल्म की शूटिंग कोलकाता में हो सकती है. लेकिन निर्माता ने कहा कि उन्होंने इस फिल्म को मुंबई के विभिन्न स्थानों पर शूट करने की योजना बनाई है। ध्रुवज्योति पाल अरित्रा के साथ मिलकर फिल्म का निर्माण कर रहे हैं। फिलहाल फिल्म की स्क्रिप्ट और कास्टिंग फाइनल होने में तीन महीने लगेंगे। इसके बाद फिल्म की शूटिंग शुरू होगी. इसके अलावा, अरित्रा वर्तमान में भारत-बांग्लादेश संयुक्त निर्माण में एक बंगाली फिल्म में व्यस्त हैं। उस फिल्म में पूजा बनर्जी, मधुरिमा बसाक और बांग्लादेशी अभिनेता जॉय चौधरी होने वाले हैं। पांच साल पहले सोशल मीडिया पर किया गया एक पोस्ट. इस बार एक्टर विक्रांत मासे ने सार्वजनिक तौर पर इसके लिए माफी मांगी है. हाल ही में, अभिनेता को ‘ट्वेल्थ फेल’ में उनके प्रदर्शन के लिए काफी प्रशंसा मिली है। साथ ही वह पिता भी बन गए हैं. लेकिन सोशल मीडिया किसी को नहीं बख्शता, विक्रांत के माफी मांगने की घटना इसी तरफ इशारा करती दिख रही है.

2018 में, विक्रांत ने जम्मू-कश्मीर में 8 साल की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार के विरोध में अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर पोस्ट किया था। वहां राम और सीता का कैरिकेचर था. अभिनेता ने यह भी लिखा, ”नकदी आलू और आधे-अधूरे राष्ट्रवादी केवल दर्द का कारण बनते हैं।” अब यह पोस्ट अभिनेता ने हटा दी है। इसके बजाय एक और पोस्ट किया. वहीं एक्टर ने लिखा, ”मैं 2018 में अपने एक पोस्ट के बारे में बात करना चाहता हूं. लेकिन मैं किसी भी तरह से हिंदू समुदाय का अपमान नहीं करना चाहता था या उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था।” जिन लोगों को ठेस पहुंची है, उनसे मैं माफी मांगता हूं।” अभिनेता ने कहा कि केवल लोग गलतियों से सीखते हैं। इस मामले में उनसे गलती हो गई.

हाल ही में एक इंटरव्यू में एक्टर ने बताया कि उनके परिवार में चार लोग अलग-अलग धर्मों को मानते हैं. विक्रांत ने कहा कि उनके पिता ईसाई हैं, वह उस धर्म के रीति-रिवाजों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं। मां सिख हैं. उसका भाई मुस्लिम है. उनके भाई ने 17 साल की उम्र में इस्लाम अपना लिया और अपना नाम बदलकर मोइन रख लिया। लेकिन विक्रांत खुद हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, यही उनका झुकाव है।

बॉलीवुड एक्टर विक्रांत मासे 7 फरवरी को पिता बने। एक्टर के घर बेटे का आगमन हुआ है। बच्चे के जन्म के करीब दो हफ्ते बाद विक्रांत ने अपने बेटे की तस्वीर जारी की. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि उनके बेटे का नाम क्या है. विक्रांत ने शुक्रवार रात दो तस्वीरों का एक कोलाज पोस्ट किया। एक तस्वीर में विक्रांत अपनी पत्नी शीतल टैगोर और अपने इकलौते बच्चे को गोद में लिए हुए हैं। दूसरी तस्वीर में बेटे का नाम. इसके अलावा, अरित्रा वर्तमान में भारत-बांग्लादेश संयुक्त निर्माण में एक बंगाली फिल्म में व्यस्त हैं। उस फिल्म में पूजा बनर्जी, मधुरिमा बसाक और बांग्लादेशी अभिनेता जॉय चौधरी होने वाले हैं। पांच साल पहले सोशल मीडिया पर किया गया एक पोस्ट. इस बार एक्टर विक्रांत मासे ने सार्वजनिक तौर पर इसके लिए माफी मांगी है. हाल ही में, अभिनेता को ‘ट्वेल्थ फेल’ में उनके प्रदर्शन के लिए काफी प्रशंसा मिली है। साथ ही वह पिता भी बन गए हैं. लेकिन सोशल मीडिया किसी को नहीं बख्शता, विक्रांत के माफी मांगने की घटना इसी तरफ इशारा करती दिख रही है.