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क्या अब अखिलेश यादव भी बनवाएंगे हिंदू मंदिर ?

अब अखिलेश यादव भी हिंदू मंदिर बनवाने जा रहे हैं! अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीति की बिसात ‘मंदिर की पिच’ पर बिछती दिख रही है। भाजपा पहले से ही इस पिच पर खेलने की धुरंधर है। वह योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में राम मंदिर से लेकर प्रदेश भर में हिंदुत्व की राजनीति का जमीन तक प्रसार करने में जुटी हुई है। गांव-गांव से लोगों को मंदिर के दर्शन के लिए लाया जा रहा है। दूसरी तरफ राम को लेकर जनमानस में आस्था का ऐसा असर है कि भाजपा ही नहीं दूसरी पार्टियों के नेता भी मंदिर दर्शन को पहुंच रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में अखिलेश यादव का रुख को लेकर है। एक तरफ वह मंदिर कार्यक्रम को ‘भाजपाई’ बताकर दूरी बनाए रहे। सपा सदस्यों ने विधानसभा में राम मंदिर प्रस्ताव का विरोध किया। स्वामी प्रसाद मौर्य तो प्राण प्रतिष्ठा पर ही सवाल उठाते रहे। वहीं दूसरी तरफ पहली बार समाजवादी पार्टी के दफ्तर में लोगों ने शालीग्राम शिला का स्वागत देखा। खुद अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल के साथ पूजा अर्चना करते नजर आए। पता चला वह इटावा में केदारेश्वर मंदिर बना रहे हैं तो क्या है ये पूरी कवायद? दरअसल राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ही अखिलेश यादव का रुख लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। विश्व हिंदू परिषद की तरफ से अखिलेश यादव को न्योता दिया गया लेकिन अखिलेश यादव ने साफ कहा कि उन्हें न्योता नहीं मिला है। उन्होंने कूरियर नंबर तक मांग लिया। फौरन बाद विश्व हिंदू परिष्ज्ञद की तरफ से अखिलेश को भेजे गए निमंत्रण पत्र का कूरियर नंबर सार्वजनिक कर दिया गया। तो अखिलेश यादव की तरफ से श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को पत्र भेजा गया, जिसमें उन्होंने न्योता देने के लिए ट्रस्ट को शुक्रिया कहा। साथ ही कहा कि वह समारोह में शामिल नहीं होंगे लेकिन बाद में परिवार के साथ रामलला के दर्शन पूजन के लिए आएंगे। अखिलेश यादव के इस रुख पर भाजपा उन्हें घेरती नजर आई। उधर काग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी रामलला के निमंत्रण पर अयोध्या आने से मना कर दिया। कांग्रेस हाईकमान की तरफ से बयान आया कि ये कार्यक्रम पूरी तरह से भाजपा और विश्व हिंदू परिषद का है, इसलिए इसमें वो शामिल नहीं होंगे।

लेकिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ऐन पहले अयोध्या में अलग ही नजारा देखने को मिला। मकर संक्रांति के मौके पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, दीपेंद्र हुड्डा, अविनाश पांडेय, अखिलेश प्रताप सिंह आदि नेता अयोध्या पहुंचे और सरयू में स्नान किया। इस दौरान दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि हमारा मानना है कि राम सबके हैं। यह पहली बार नहीं है जब मैं अयोध्या आया हूं, एक साल पहले मैं रामलला की पूजा करने आया था। वहीं अजय राय ने कहा कि आज हम भगवान राम के दर्शन करेंगे, मकर संक्रांति के शुभदिन हमने सरयू में पवित्र स्नान किया।

दूसरी तरफ दिलचस्प ये रहा कि अखिलेश यादव ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से ऐन पहले एक्स पर एक वीडियो शेयर कर लिखा- उस पावन हृदय में बसते हैं सियाराम, जो करता रीति-नीति-मर्यादा का मान। जनता अखिलेश को अभी समझने का प्रयास ही कर रही थी कि यूपी विधानसभा में राम मंदिर प्रस्ताव पर सपा विधायकों के रुख ने कन्फ्यूजन और बढ़ा दिया। दरअसल प्रस्ताव पर सपा के 14 विधायकों ने विरोध में हाथ उठाया। इसके बाद भाजपा विधायक इन विधायकों का नाम सार्वजनिक करने की मांग करने लगे। मामले ने तूल पकड़ा तो अगले ही दिन विधानसभा में सपा विधायक स्वामी ओमवेश खड़े हुए और उन्होंने सफाई दी कि उन्होंने विरोध में हाथ नहीं उठाए थे। मैंने समर्थन में हाथ उठाया था। मेरे साथ ज्यादती हुई। गलत तरीके से मेरा नाम छापा गया है। मैं रोजाना श्रीराम के हवन करने के बाद प्रभु का नारा लगाता हूं। कार्यवाही से मेरा नाम हटाया जाए। एक तरफ स्वामी ओमवेश खुद को राम भक्त साबित करते नजर आए तो दूसरी तरफ सपा के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्या प्राण प्रतिष्ठा पर ही सवाल खड़े करते नजर आए।

इसी बीच यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और सीएम योगी आदित्यनाथ के आग्रह पर सभी विधायकों का अयोध्या भ्रमण कराया गया और वहां सभी ने रामलला के दर्शन किए। खास बात ये थी कि विधायकों को लग्जरी बसों से लखनऊ से अयोध्या ले जाया गया। इस दौरान राष्ट्रीय लोकदल, बसपा और कांग्रेस के विधायक भी भाजपा विधायकों के साथ दर्शन करने गए। लेकिन सिर्फ समाजवादी पार्टी के विधायक ही नदारद रहे।

एक तरफ राम मंदिर मुद्दे पर सपा का ये रुख देने को मिला, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपने गृह जनपद इटावा में केदारेश्वर मंदिर का निर्माण करा रहे हैं। इसे लेकर बाकायदा शालीग्राम शिला लखनऊ में सपा मुख्यालय पहुंची। उसका धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया गया। ये वीडियो खुद अखिलेश यादव ने शेयर किया और लिखा कि श्री शालिग्राम भगवान का आगमन देश-प्रदेश के लिए मंगलकारी एवं जन-जन के लिए कल्याणकारी हो, इस पावन कामना के साथ हृदय से स्वागत। अगले दिन अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल यादव के साथ सपा दफ्तर में शालीग्राम की पूजा अर्चना करते नजर आए। यही नहीं उनके साथ जया बच्चन और शिवपाल यादव सहित तमाम सपा नेता भी इस दौरान मौजूद रहे। सपा नेता मनोज पांडेय ने बताया कि अखिलेश यादव इटावा लायन सफारी के पास केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर मंदिर बनवा रहे हैं। करीब 10 एकड़ में बन रहे इस मंदिर में शिवलिंग के लिए नेपाल से शाालीग्राम शिला मंगाई गई है। नेपाल से ये शिला पहले लखनऊ पहुंची। यहां से वह इटावा ले जाई जा रही है।

इस बीच राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का मुद्दा सामने आया तो अखिलेश पहले तो उसे नकराते नजर आए लेकिन चूंकि मंदिर को लेकर आस्था ओबीसी समाज में सबसे ज्यादा है लिहाजा उन्होंने अब संतुलन बनाने की कोशिश शुरू की है। अब वे पूरा ख्याल रख रहे हैं कि खुद को आस्थावान दिखा दें लेकिन एक सेक्युलर हिंदू के तौर पर ही, ताकि अल्पसंख्यक वोट उनसे दूर न जाए। यही कारण है कि वह एक तरफ राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा और संघ का कार्यक्रम कहकर नकार रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने जिले में केदारेश्वर मंदिर की स्थापना कर रहे हैं। राम मंदिर के लिए नेपाल से शिला आई थी, उसी तरह केदारेश्वर मंदिर के लिए नेपाल से शालिग्राम की शिला लाई गई है।

दूसरी तरफ कांग्रेस भी कहीं न कहीं इसी पशोपेश में घिरी नजर आ रही है। यूपी में कांग्रेस अपना जनाधार पूरी तरह खोज चुकी है। अजय राय की अगुवाई में अब वापस खड़ी होने का प्रयास कर रही है। पार्टी हाईकमान ने भले ही राम मंदिर समारोह में आने से मना किया लेकिन कांग्रेसी नेता अपने ढंग से राम का पूजन करते नजर जरूर आए। कांग्रेस विधायक भी विधानसभा स्पीकर के न्यौते पर रामलला का दर्शन किए। साफ पता चल रहा है कि यूपी में ‘हिंदुत्व राजनीति’ की तपिश सभी राजनीतिक दल महसूस कर रहे हैं। इसी कारण वह ‘मैं भी हिंदू’ की तर्ज पर संतुलन बिठाते नजर आ रहे हैं।

क्या कर्नाटक सरकार में हो रही है कलह?

वर्तमान में कर्नाटक सरकार में कलह हो रही है! कर्नाटक कांग्रेस की विधायकों को बोर्ड और निगमों में नियुक्त करके खुश करने की रणनीति उल्टी पड़ गई है। कई विधायकों ने नामांकन खारिज कर दिया है और कैबिनेट मंत्री पद की मांग की है। राज्य की राजनीति में आक्रामक हो चुकी बीजेपी इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों के मुताबिक ‘ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम देने में अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को राज्य बीजेपी मामलों में प्रमुखता मिलने से कांग्रेस को चिंताजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सूत्र यह भी बताते हैं कि कई वरिष्ठ विधायक और मंत्री लिंगायतों की उपेक्षा, अधिक डिप्टी सीएम नियुक्त करने, 2.5 साल के बाद गार्ड बदलने और आलाकमान की मनमानी के बारे में बयान जारी करते हैं, लेकिन पार्टी प्रतिक्रिया के डर से कार्रवाई नहीं कर रही है। इससे भी ज्यादा पार्टी नेतृत्व को ‘ऑपरेशन लोटस’ के मंडराते खतरे की चिंता है। सूत्रों ने कहा कि भारत के साधन संपन्न राज्यों में से एक में अपनी स्थिति को खतरे में डालने की किसी भी संभावना से बचने के लिए, आलाकमान ने शीर्ष नेतृत्व की खुली अवज्ञा को सहन करने और सहने का फैसला किया है। इस कैच-22 स्थिति के बीच, बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस विधायकों के विद्रोह ने कर्नाटक में पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों ने पुष्टि की है कि वरिष्ठ विधायक हंपनागौड़ा बदरली और एस.एन. सुब्बा रेड्डी ने उनकी नियुक्तियों को खारिज कर दिया है। मंत्री पद के प्रबल दावेदार तीन बार के विधायक सुब्बा रेड्डी ने अपने समर्थकों की बैठक बुलाई है और निर्णय लेने के लिए तैयार हैं। उन्होंने नियुक्ति आदेश सीएम कार्यालय को वापस भेज दिया।

सुब्बा रेड्डी को कर्नाटक बीज निगम का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। कांग्रेस नेतृत्व पांच बार के विधायक हंपनागौड़ा बदरली को संतुष्ट करने में भी विफल रहा है, जिसने उन्हें राज्य औद्योगिक बुनियादी ढांचा विकास निगम का अध्यक्ष बनाया था। सूत्रों ने कहा कि अकेले उत्तरी कर्नाटक क्षेत्र में 10 से अधिक विधायक, जिनमें से कई प्रमुख नेता हैं, अपनी नियुक्तियों से नाखुश हैं। अधिकांश विधायक फंड नहीं मिलने से असंतुष्ट हैं क्योंकि कांग्रेस सरकार गारंटी योजनाओं को वितरित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। कांग्रेस सरकार ने 26 जनवरी को 34 बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों की घोषणा की और जल्द ही बोर्डों और निगमों के लिए 45 की एक और सूची की घोषणा करने की तैयारी कर रही है।

उधर, कांग्रेस के दिग्गज नेता शमनूर शिवशंकरप्पा का बयान है कि येदियुरप्पा के बेटे बीजेपी सांसद बी.वाई. राघवेंद्र आगामी लोकसभा चुनाव जीत जाना चाहिए, ने पार्टी को शर्मसार कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं उपमुख्यमंत्री डी.के.शिवकुमार ने डैमेज कंट्रोल मोड में कहा कि उनकी पार्टी शिवमोग्गा सीट पर चुनाव लड़ने जा रही है, जिसका प्रतिनिधित्व वर्तमान में सांसद राघवेंद्र कर रहे हैं। येदियुरप्पा और प्रमुख भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के दिग्गज नेता के बयानों का स्वागत किया और शमनूर शिवशंकरप्पा को बधाई दी, इससे कांग्रेस पार्टी काफी नाराज हुई। कर्नाटक में सीएम सिद्धारमैया के समर्थन वाले कांग्रेस मंत्रियों ने हाल ही में आलाकमान की मनमानी को चुनौती दी और उसकी आलोचना की, जिसे राज्य में सत्ता परिवर्तन के संबंध में आने वाले दिनों में सामने आने वाले घटनाक्रम के अग्रदूत के रूप में देखा जा रहा है।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा नियुक्तियों में सीएम सिद्धारमैया का पलड़ा भारी है और आलाकमान को उनकी बात माननी पड़ी। राजनीतिक हलके भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि सीएम सिद्धारमैया के वफादारों द्वारा राष्ट्रीय नेतृत्व की मनमानी पर आपत्ति उनके खिलाफ किसी भी कदम पर पार्टी आलाकमान के लिए एक सूक्ष्म संदेश है। डिप्टी सीएम शिवकुमार, जो सीएम बनने के लिए धैर्यपूर्वक अपना दावा पेश करने का इंतजार कर रहे हैं, और लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए सबसे अधिक सीटें जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, आंतरिक कलह को प्रबंधित करके कार्य हासिल करने के प्रति आश्वस्त हैं। उन्होंने कहा कि बोर्डों और निगमों में नियुक्तियां सभी की राय को ध्यान में रखकर ही की जाती हैं। शिवकुमार ने यह भी कहा कि विपक्ष के कई लोग हैं, जो कांग्रेस के प्रति निष्ठा बदलना चाहते हैं।

सूत्रों ने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी के घटनाक्रम से खुश है और लोकसभा चुनाव के बाद सत्तारूढ़ सरकार को गिराने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पार्टी कर्नाटक में ‘ऑपरेशन लोटस’ में शामिल नहीं हो रही है। लेक‍िन राजनीतिक हलकों ने कहा कि यह कांग्रेस के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए, क्योंकि राजनेता अक्सर जो करना चाहते हैं, उसके विपरीत कहते हैं। विजयेंद्र ने जद (एस)-कांग्रेस सरकार के पतन को सुनिश्चित करने और 2019 में अपने पिता येदियुरप्पा को सीएम पद पर नियुक्त करने में प्रमुख भूमिका निभाई। महाराष्ट्र में जिस तरह से शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार को खत्म किया गया था, उसी तरह से बीजेपी ने कांग्रेस सरकार को खत्म करने पर बहुत पहले ही काम शुरू कर दिया था। निकट भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर दोनों खेमों में असमंजस की स्थिति है।

पीवी नरसिम्हा राव से बीजेपी को क्या होगा फायदा?

आज हम आपको बताएंगे कि पीवी नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने से बीजेपी को क्या फायदा होगा! लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले ही बीजेपी ने विपक्षी दलों को धराशाही करने का मन बना लिया है। बीजेपी का फोकस 400 सीटों पर है, जिसके चलते बीजेपी एक के बाद एक दांव चल रही है। इसी कड़ी में बीजेपी ने शुक्रवार को तेलंगाना और आंध्र को चुनावी तौर पर साधने की कोशिश की है। केंद्र की एनडीए सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का फैसला किया है। 2019 में दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न मिलने के बाद बीजेपी ने एक और दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने के पीछे 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है। इस फैसले से बीजेपी ने गांधी परिवार को निशाने पर लिया है। दरअसल पीएम मोदी कई बार कांग्रेस और गांधी परिवार पर राव को अपमानित करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में जिसका कांग्रेस ने सम्मान नहीं किया, उसका सम्मान बीजेपी कर रही है। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस फैसले के जरिए राव के गृह राज्य आंध्र प्रदेश के मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश भी कर रही है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पी वी नरसिम्हा राव और मशहूर वैज्ञानिक व देश में हरित क्रांति के जनक डॉ एम एस स्वामीनाथन को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को खुद ‘एक्स’ पर पोस्ट के जरिए यह घोषणा करते हुए तीनों के योगदान की सराहना की। इस साल अब तक 5 लोगों को भारत रत्न देने की घोषणा हुई है, जो कि अब तक की सर्वाधिक संख्या है। कुछ दिनों पहले ही सरकार ने जननायक कर्पूरी ठाकुर और पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के लिए भारत रत्न की घोषणा की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘एक प्रतिष्ठित विद्वान और राजनेता के रूप में नरसिम्हा राव ने विभिन्न पदों पर रहते हुए भारत की व्यापक सेवा की। उन्हें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वर्षों तक संसद सदस्य और विधान सभा सदस्य के रूप में किए गए कार्यों के लिए भी याद किया जाता है।’ मोदी ने कहा कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत को आर्थिक रूप से उन्नत बनाने, देश की समृद्धि और विकास के लिए एक ठोस नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री के रूप में नरसिम्हा राव का कार्यकाल महत्वपूर्ण कदमों से भरा था, जिसने भारत को वैश्विक बाजारों के लिए खोला और इससे आर्थिक विकास के एक नए युग की शुरूआत हुई।’ प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अलावा, भारत की विदेश नीति, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान एक नेता के रूप में उनकी बहुमुखी विरासत को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा, ‘नरसिम्हा राव ने न केवल महत्वपूर्ण परिवर्तनों के माध्यम से भारत को दिशा दी बल्कि उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी समृद्ध किया।’ संयुक्त आंध्र प्रदेश में जन्में नरसिम्हा राव वर्ष 1991 से 1996 तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर रहे थे।

कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की घोषणा का शुक्रवार को स्वागत किया। सोनिया गांधी ने कहा, ‘मैं इसका घोषणा स्वागत करती हूं। क्यों नहीं?’ प्रधानमंत्री बनने से पहले राव विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। वे 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। राव का जन्म 28 जून 1921 को करीमनगर में हुआ था जो अब तेलंगाना का हिस्सा है। नरसिम्हा राव भले ही भारत के आर्थिक सुधार के जनक मानते जाते हैं, लेकिन उनकी गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी, लेकिन उनका गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी। यहां तक की बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बार-बार कांग्रेस पर नरसिम्हा राव की उपेक्षा करने और उनकी जयंती नहीं मनाने का आरोप लगाया है। उनके विरोधियों का एक तर्क ये भी है कि 2004 में राव के पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में ले जाने की अनुमति नहीं दी गई थी, जिसका इस्तेमाल वो कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए करते हैं। दिसंबर 2004 में, जब राव का निधन हुआ, उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय के मुख्य द्वार के बाहर रखा गया था और उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। हालांकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी गई थी, लेकिन यह कांग्रेस मुख्यालय के बाहर ही किया गया था। जब से राव का निधन हुआ, उनके परिवार को लगता है कि गांधी परिवार ने उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया।

नरसिम्हा राव, अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता और दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति थे। पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देते हुए इसे भुलाया नहीं था। पीएम मोदी ने ट्वीट किया, ‘नरसिम्हा राव को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्र मंत्री और कई वर्षों तक सांसद और विधायक के रूप में उन्होंने जो काम किया, उसके लिए भी उन्हें याद किया जाता है।’ यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब बीजेपी दक्षिण में अपना दायरा बढ़ाना चाहती है, पार्टी लोकसभा सीटों के मामले में उत्तरी राज्यों में लगभग पूरी तरह से स्थापित है। बीजेपी दक्षिण भारत में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपनी सीटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने पर ध्यान दे रही है।बीजेपी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और अभिनेता-राजनेता पवन कल्याण की जन सेना पार्टी जेएसपी के साथ भी लगातार संपर्क में है।

लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। BJP इस चुनाव में 400 सीटों का लक्ष्य लेकर तैयारियों में जुटी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने 303 सीटें जीती थी। पीएम नरेंद्र मोदी के नाम और नैशनलिज्म की लहर पर सवार BJP ने 2014 के लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा सीट और वोट पर्सेंट हासिल किया। 2014 में 31% वोट और 282 सीटें मिली थीं। 2019 में वोट पर्सेंट बढ़कर 37 हो गया। अब जबकि BJP ने 400 सीटें जीतने का टारगेट रखा है तो जाहिर है कि उसे वोट पर्सेंट भी बढ़ाना होगा, साथ ही नई सीटों पर, जहां बीजेपी पहले नहीं जीती थी, वहां भी जीत हासिल करनी होगी।

तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क और भारत राष्ट्र समिति बीआरएस के अध्यक्ष एवं तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की शुक्रवार को सराहना की। विक्रमार्क ने देश के विकास में नरसिम्हा राव के शानदार योगदान को याद करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना तेलंगाना और कांग्रेस के लिए गर्व की बात है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री को यह पुरस्कार देने के लिए केंद्र को धन्यवाद दिया और कहा कि नरसिम्हा राव द्वारा रखी गई आर्थिक सुधारों की नींव के कारण भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। उन्होंने एक विज्ञप्ति में कहा, ‘मुझे लगता है कि महान राजनेता और बहुभाषाविद् नरसिम्हा राव को भारत रत्न मिलना कांग्रेस और तेलंगाना के लिए गर्व की बात है।’ चन्द्रशेखर राव केसीआर ने कहा कि धरती पुत्र नरसिम्हा राव के लिए भारत रत्न पुरस्कार तेलंगाना के लोगों को दिया गया सम्मान है। उन्होंने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा, ‘केसीआर, बीआरएस की मांग का सम्मान करते हुए पी वी नरसिम्हा राव को भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए केंद्र को धन्यवाद देते हैं।’

जानिए आर्थिक क्रांति की शुरुआत करने वाले नरसिम्हा राव के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको आर्थिक क्रांति की शुरुआत करने वाले नरसिम्हा राव के बारे में बताने जा रहे हैं! एक दौर था, जब ‘भारत रत्न’ से सम्मानित होने का गौरव गिनी-चुनी महान हस्तियों को मिलता था। आज के हालात देखकर लगता है कि इसका इस्तेमाल चुनावी फायदे की खातिर हो रहा है। इस साल भारत रत्न से सम्मानित होने वालों में लालकृष्ण आडवाणी, कर्पूरी ठाकुर, एमएस स्वामीनाथन, चरण सिंह और पीवी नरसिंह राव शामिल हैं। इनमें राव इस सम्मान के सबसे अधिक हकदार थे और चरण सिंह सबसे कम। चरण सिंह यूपी के जाट किसान नेता थे। यूपी की सियासत पर पचास के दशक में अगड़ी जातियों का दबदबा था। राजनीतिक आकांक्षा रखने वाले चरण सिंह उस दबदबे को किसी भी कीमत पर खत्म करना चाहते थे। उन्होंने ‘आया राम गया राम’ वाले सियासी दौर की अगुआई की। यह वह दौर था, जब जन-प्रतिनिधि निजी फायदे के लिए सरकारें गिरा रहे थे। दलबदल की बदौलत चरण सिंह 1967 और 1970 में कुछ समय के लिए यूपी का मुख्यमंत्री बनने में भी कामयाब रहे।

इमरजेंसी के दौरान उन्हें दूसरे गैर-कांग्रेसी नेताओं के साथ जेल में डाला गया। 1977 में जब इंदिरा विरोधी मंच के जरिये जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में जीत मिली तो पहले वह गृह मंत्री और बाद में उप-प्रधानमंत्री बने। चरण सिंह इस पर भी खुश नहीं हुए और 1979 में फिर दलबदल कर इंदिरा के सहयोग के दम पर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी हथियाने में कामयाब हुए। बगैर सिद्धांतों की राजनीति की यह इंतहा थी। लोगों ने जनता पार्टी को इंदिरा विरोध के नाम पर चुना था। लेकिन चरण सिंह ने इस बात को ताक पर रखकर उन्हीं की मदद ली और प्रधानमंत्री बने। यह बात और है कि इस कुर्सी पर वह ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाए क्योंकि इंदिरा ने कुछ ही हफ्तों में समर्थन वापस ले लिया। इसलिए चरण सिंह की सबसे बड़ी सफलता यही कही जा सकती है कि कोई सिद्धांत न हो तो दलबदल कर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पाई जा सकती है।

नरसिंह राव की बात अलग है। वह देश के बेहतरीन प्रधानमंत्रियों में थे। 1991 में वह इस कुर्सी पर तब बैठे, जब राजीव गांधी की हत्या हो गई और सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से इनकार कर दिया। उस वक्त कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने ‘कमजोर राव’ को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें जरूरत पड़ने पर हटाया जा सकता था। राव तब अल्पमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी पार्टी के पास बहुमत नहीं था और विरोधियों के साथ आने पर उसके गिरने का डर बना हुआ था। 1991 में भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया और उसे वित्तीय मदद के लिए IMF के पास जाना पड़ा। यह वह दौर है, जब सोवियत संघ बिखर चुका था। इन हालात में समाजवादी धारा वाली कांग्रेस को अपनी सोच बदलने की जरूरत थी। राव की दिक्कत यह थी कि वह ऐसी कमजोर सरकार के नेता थे, जिसकी विचारधारा दुनिया में प्रभाव गंवा चुकी थी। सख्त से सख्त नेता के लिए यह मुश्किल घड़ी थी। वहीं, राव की सियासत में बड़ी हैसियत नहीं थी, न ही उनके पास संसद में बहुमत था।

देश को दिवालिया होने से बचाने के लिए उन्हें सोना गिरवी रखने का फैसला करना पड़ा। लेकिन राव चतुर राजनेता थे। उन्होंने मौके का फायदा उठाकर देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत कर दी। इसी की बदौलत भारत मिरैकल इकॉनमी जादुई अर्थव्यवस्था बना। राव का मास्टरस्ट्रोक टेक्नॉक्रैट मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाना था। व्यापक आर्थिक सुधार तब देश की जरूरत थी। राव ने मनमोहन से कहा था, ‘अगर सुधार कामयाब होते हैं तो हम दोनों उसका श्रेय लेंगे। लेकिन अगर ये नाकाम होते हैं तो हम इसके लिए आपको दोष देंगे और वित्त मंत्री के पद से हटा देंगे।’ विपक्षी दल तब आरोप लगाते थे कि राव सरकार वर्ल्ड बैंक और IMF के निर्देश पर सारे आर्थिक सुधार कर रही है। उनका यह भी कहना था कि सत्ता में आने पर वे इन सुधारों को वापस ले लेंगे। लेकिन ये सुधार कामयाब हुए और इसकी बदौलत 1994 से 1997 के बीच देश की GDP ग्रोथ 7 प्रतिशत रही। इसलिए राव के बाद जो भी सरकारें सत्ता में आईं, उन्होंने आर्थिक सुधारों को जारी रखा।

1991 में सबसे बड़ा रिफॉर्म औद्योगिक क्षेत्र में लाइसेंस-परमिट राज का खात्मा था। इसकी घोषणा तत्कालीन उद्योग मंत्री ने मनमोहन सिंह के पहला बजट पेश करने से कुछ घंटे पहले की। इसलिए अखबारों ने अगले दिन जब बजट के साथ इसकी खबर दी तो लोगों को लगा कि दोनों के ही पीछे मनमोहन सिंह का हाथ है।

सवाल यह है कि तब उद्योग मंत्री कौन थे और इस क्रांतिकारी सुधार के पीछे कौन था? असल में यह नरसिंह राव ही थे। उद्योग मंत्रालय उनके पास था, लेकिन वह खुद को इस जोखिम भरे सुधार से जोड़ना नहीं चाहते थे। खैर, उनकी यह रणनीति काम आई। पार्टी के अंदर के आलोचकों के निशाने पर आने से वह बच गए और आर्थिक उदारीकरण में कामयाब रहे। अफसोस कि 1996 लोकसभा चुनावों में उनकी हार हुई। आलोचक कहते हैं कि राव ने BJP को बाबरी मस्जिद तोड़ने दी। लेकिन आज यह बात जाहिर है कि BJP की हिंदुत्व की राजनीति आखिर इसमें कामयाब होती। बाबरी मस्जिद की जगह देर-सबेर राम मंदिर बनना तय था। 1998 में सोनिया गांधी ने टूट से बचाने के लिए कांग्रेस का नेतृत्व संभालना मंजूर किया। 2004 और 2009 में उन्होंने कांग्रेस को जीत भी दिलाई। लेकिन गांधी परिवार को यह बात कभी पसंद नहीं आई कि देश में आर्थिक क्रांति की शुरुआत एक गैर-गांधी नेता ने की थी। इसलिए गांधी परिवार ने पार्टी के इतिहास से राव का नाम मिटाने की कोशिश की। आज हालात ऐसे हैं कि गांधी परिवार ही गुमनामी की दहलीज पर है।

क्या वर्तमान की राजनीति हो चुकी है सरकारी नौकरी?

वर्तमान की राजनीति अब सरकारी नौकरी जैसी लगती है! सकर्मक क्रिया- राजनीतिक रूप से इतना हिलना कि पेंडुलम को शर्मिंदा होना पड़े। पिछले हफ्ते, टर्नकोट शब्दकोष में एक और शब्द जोड़ा गया जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने एक दशक से कुछ अधिक समय में चार बार पाला बदला है। नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन को बैकफुट पर रखते हुए अपनी पार्टी का समर्थन बीजेपी को देने का वादा कर दिया है। नीतीश की कलाबाजियों ने उन्हें पहले ही ‘पलटूराम’ कुमार का उपनाम दे दिया था। बिहार में एक और ‘मौसम वैज्ञानिक’ राम विलास पासवान थे, जिन्हें मौसम को भांप लेने और जो भी उन्हें मंत्री पद देता था, उसे स्वीकार करने की उनकी क्षमता के कारण यह सम्मान मिला था। मूल उपनाम ‘आया राम, गया राम’ हरियाणा से आया है और अभी भी प्रचलन में है क्योंकि दलबदल एक ऐसी समस्या है जिससे राजनीतिक दल छुटकारा नहीं पा सकते हैं। शर्म के इस हॉल में सबसे पहले प्रवेश करने वाले हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में निर्दलीय चुनाव जीता था। वह एक दिन में चार बार पार्टियां बदलने में कामयाब रहे थे। कांग्रेस से जनता पार्टी में, फिर कांग्रेस में, फिर नौ घंटे के बाद जनता पार्टी में। इसके बाद फिर से कांग्रेस में वापसी। तत्कालीन पार्टी नेता राव बीरेंद्र सिंह, जिन्होंने गया लाल को कांग्रेस में शामिल करने की योजना बनाई थी, उन्हें एक संवाददाता सम्मेलन में ले आए। उस समय उन्होंने घोषणा की कि ‘गया राम अब आया राम हैं। उसके दो सप्ताह के भीतर, वह संयुक्त मोर्चे में चले गS। आर्य सभा और भारतीय लोक दल अन्य पार्टियां भी थीं, जिनके साथ वह बीच में गए थे। यह केवल पाला बदलने के घटना की शुरुआत थी। 1967 से 1972 की अवधि में, कुल 4,000 विधायकों में से लगभग 2,000 ने दलबदल किया और एक दल से दूसरे दलों में शामिल हुए। विधायी प्रक्रियाओं में सुधार लाने के उद्देश्य से दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, संसद में 142 दलबदल की घटना हुई हैं जबकि बाकी दलबदल विभिन्न राज्य विधानसभाओं के हैं।

राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि भारतीय राजनीति में दलबदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले पांच-सात वर्षों में पाला बदलने वालों की संख्या बढ़ी है। राजनेता अब राजनीति को एक करियर के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि एक पार्टी एक कंपनी की तरह होती है, यदि आप व्यक्तिगत विकास नहीं देखते हैं तो आप पार्टी बदलते हैं जैसे आप नौकरी बदलते हैं। चुनावी और राजनीतिक सुधार पर काम करने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक सदस्य जगदीप एस छोकर कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक विचारधारा का कोई महत्व नहीं रह गया है। राजनीतिक मान्यताओं पर सीमाएं धुंधली होने के साथ, सीमा पार करना एक ‘न्यू नॉर्मल’ बन गया है। ‘नेता, राजनेता, नागरिक: भारत की राजनीति को प्रभावित करने वाले पचास आंकड़े’ सहित कई पुस्तकों के लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि पहले किसी कांग्रेस या वामपंथी राजनेता के लिए भाजपा के खेमे में जाना अकल्पनीय था लेकिन अब यह सच नहीं है। यह पार्टियों और मतदाताओं दोनों को स्वीकार्य है।

चुनावी मौसम में दलबदल की रफ्तार और बढ़ जाती है। असंतुष्ट उम्मीदवार जो अपनी पार्टी की तरफ उपेक्षित महसूस करते हैं वे अवसरों की तलाश में रहते हैं। ऐसे में पार्टियां उन लोगों को चुन लेती हैं जो ‘जीतने योग्य’ होते हैं। उदाहरण के लिए, 2023 में, कर्नाटक के एक भाजपा विधायक, जगदीश शेट्टार, जिन्होंने थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री का पद भी संभाला था, ने चुनाव से पहले टिकट से इनकार किए जाने के बाद अप्रैल में पार्टी छोड़ दी। वह कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन हुबली-धारवाड़ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव हार गए। नौ महीने कांग्रेस में रहने के बाद वह भाजपा में लौट आए। वह अकेले नहीं हैं। पंजाब में, कांग्रेस विधायक बलविंदर सिंह लाडी दिसंबर 2021 में भाजपा में शामिल हो गए। छह दिन बाद, कांग्रेस के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने टिकट के वादे पर लाडी को फिर से कांग्रेस में शामिल होने के लिए मना लिया। हालांकि, कांग्रेस को उस निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक और उम्मीदवार मिल गया, जिसमें लाडी ने रुचि व्यक्त की थी। इसलिए उन्होंने घोषणा की कि उन्हें ‘पार्टी व्यवस्था में घुटन’ महसूस हो रही थी और उन्होंने तुरंत दो महीने से भी कम समय में इसे छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो गए। कभी-कभी, इसके साथ नाटकीयता भी हो सकती है। जैसे कि जब सपा के संस्थापक सदस्य अंबिका चौधरी, जो 2017 में बसपा में शामिल हो गए थे। वे 2021 में अपने समर्थकों के साथ सपा में लौट आए और प्रेस कॉन्फ्रेंस में वास्तविक आंसू बहाए। दिनेश त्रिवेदी, रीता बहुगुणा जोशी और जगदंबिका पाल जैसे अन्य लोग हैं जिन्होंने कई पार्टियों को कवर किया है। रीता बहुगुणा जोशी ने अपना राजनीतिक सफर 1985 में सपा सदस्य के रूप में शुरू किया था लेकिन बाद में कांग्रेस में शामिल हो गईं। वह अक्टूबर 2016 में बीजेपी में शामिल हो गईं। इसी तरह, यूपी के राजनेता जगदंबिका पाल ने विद्रोही अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस तिवारी में शामिल होने के लिए कांग्रेस छोड़ दी। 1997 में, उन्होंने अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया लेकिन 2014 में भाजपा में शामिल हो गए।

चुनाव के बाद की हरकतों ने उस चीज को जन्म दिया है जिसे ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहा जाता है। यह आमतौर पर तब किया जाता है जब विधायकों को उस पार्टी द्वारा घेरने की आवश्यकता होती है जो विधान सभा में अपना बहुमत साबित करना चाहती है। ऐसे में यह आशंका रहती है कि विधायक प्रतिद्वंद्वी दलों या समूहों के साथ पर्दे के पीछे बातचीत कर सकते हैं। शनिवार को, झामुमो विधायकों को, बेशकीमती चीतों की तरह, उनके ‘पोचिंग’ को रोकने के लिए रांची से हैदराबाद के एक होटल में ले जाया जा रहा था। गोवा में 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले, कांग्रेस ने अपने चुनावी उम्मीदवारों को ‘तीर्थयात्रा’ पर भेजा। 2019 के दलबदल की यादें अभी भी ताजा होने के कारण, पार्टी आलाकमान और भी उच्च शक्तियों तक पहुंच गया। कुछ उम्मीदवारों को महालक्ष्मी मंदिर और होली क्रॉस श्राइन ले जाया गया। जबकि समूह के अन्य लोगों को हमजा शाह दरगाह में यह प्रतिज्ञा दिलाने के लिए ले जाया गया कि यदि वे चुने गए, तो वे दलबदल नहीं करेंगे। लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद भगवान का डर भी आखिरी वक्त की तकरार को नहीं रोक सका। किदवई का कहना है कि चुनाव लड़ने की लागत भी एक भूमिका निभाती है। एक उम्मीदवार पर जीतने का दबाव होता है ताकि वह चुनाव लड़ने की लागत वसूल कर सके। यह दल बदलने के लिए एक प्रोत्साहन है। सूत्रों का कहना है कि संसदीय चुनाव लड़ने के लिए अनुमानित 5 करोड़ रुपये और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए 2 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।

भारत में एक दल-बदल विरोधी कानून है जो व्यक्तिगत सांसदों/विधायकों को एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने से दंडित करता है, लेकिन सांसदों/विधायकों के एक समूह दो-तिहाई को दल-बदल के लिए जुर्माना लगाए बिना किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करने की अनुमति देता है। कानून राजनीतिक दलों को दलबदलू विधायकों को प्रोत्साहित करने या स्वीकार करने के लिए दंडित नहीं करता है। यह बात नीतीश कुमार जैसे लोगों पर भी लागू नहीं होती। छोकर कहते हैं कानून ने हमारे राजनेताओं की नवीनता की आशा नहीं की थी। यह खुदरा व्यापार पर रोक लगाता है लेकिन थोक व्यापार की अनुमति देता है। संजय कुमार दल बदलने वाले उम्मीदवारों को अगला चुनाव लड़ने से रोकने का सुझाव देते हैं। छोकर कहते हैं, दबाव डालने का दूसरा तरीका यह है कि दलबदलुओं को विधायिका से हटा दिया जाए और उनकी सीट खाली घोषित कर दी जाए। वे कहते हैं कि किसी विशेष पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने के बाद दलबदल करना मतदाताओं की तरफ से उस उम्मीदवार पर व्यक्त किए गए भरोसे के साथ बहुत गंभीर विश्वासघात है। साथ ही, सभी राजनीतिक दलों के वित्त को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।

चुनावी चंदे पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी चंदे पर बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चुनावी बॉन्ड योजना और उससे जुड़े सभी संशोधनों को रद्द कर दिया है। केंद्र सरकार ने 2017 में इस योजना को शुरू किया था, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति एसबीआई से चुनावी बॉन्ड खरीदकर किसी भी रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को गुप्त चंदा दे सकता था। लेकिन अदालत ने माना कि यह योजना सूचना के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। अदालत ने पांच बड़े प्रशासनिक और विधायी अधिनियमों को असंवैधानिक घोषित किया है। इनमें पूरी चुनावी बॉन्ड योजना, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में किया गया वह संशोधन शामिल है जिसके तहत पार्टियों को चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देने से छूट मिली हुई थी। इसके अलावा, आयकर अधिनियम 1961 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत चुनावी बॉन्ड को ’20 हजार रुपये से ज्यादा के स्वैच्छिक योगदान’ की श्रेणी से बाहर रखा गया था, जिसके लिए पार्टियों को दानदाताओं का रिकॉर्ड रखना होता है। कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत कंपनियों को उन पार्टियों के बारे में जानकारी देने के हुए इस बात पर जोर दिया कि इसे मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अदालत ने सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस योजना का उद्देश्य काले धन पर लगाम लगाना था। अदालत ने कहा कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए कम प्रतिबंधात्मक तरीके भी हैं।प्रावधान को हटा दिया गया था जिन्हें वो चंदा देते हैं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी रद्द कर दिया जिसके तहत कॉरपोरेट चंदे की सीमा को हटा दिया गया था।

अदालत ने माना कि इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है, जो कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने कहा कि अगर नागरिकों को राजनीतिक दलों के फंडिंग के स्रोत के बारे में अंधेरे में रखा जाता है तो वे स्वतंत्र रूप से वोट देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अदालत ने कंपनियों के लिए राजनीतिक दलों को चंदे की रकम अपने नेट एग्रिगेट प्रॉफिट के 7.5% तक सीमित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असीमित कॉरपोरेट चंदा और घाटे में चल रही कंपनियों को चंदा देने की अनुमति समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों से पार्टियों पर कंपनियों का प्रभाव बढ़ता है और बदले में कुछ पाने की संभावना बढ़ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए आनुपातिकता परीक्षण पद्धति लागू किया। अदालत ने दानदाताओं की निजता की रक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि इसे मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अदालत ने सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस योजना का उद्देश्य काले धन पर लगाम लगाना था। अदालत ने कहा कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए कम प्रतिबंधात्मक तरीके भी हैं।

इस फैसले ने सूचना के अधिकार को राजनीतिक दलों तक भी बढ़ा दिया है, जिससे मुख्य सूचना आयुक्त के 2013 के उस आदेश के खिलाफ मामला कमजोर हो गया है जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए। अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना के विकल्प भी सुझाए हैं, जैसे कि चुनावी ट्रस्ट जो दानदाताओं को की पहचान गुप्त नहीं रखते और चुनावी खर्चों के लिए सार्वजनिक फंडिंग। निष्कर्ष के रूप में,जिसके तहत चुनावी बॉन्ड को ’20 हजार रुपये से ज्यादा के स्वैच्छिक योगदान’ की श्रेणी से बाहर रखा गया था, जिसके लिए पार्टियों को दानदाताओं का रिकॉर्ड रखना होता है। कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत कंपनियों को उन पार्टियों के बारे में जानकारी देने के प्रावधान को हटा दिया गया था जिन्हें वो चंदा देते हैं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी रद्द कर दिया जिसके तहत कॉरपोरेट चंदे की सीमा को हटा दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम और उससे जुड़े संशोधनों को रद्द कर दिया है, जिसमें सूचना के अधिकार और समानता के अधिकार के उल्लंघन का हवाला दिया गया है। इस फैसले के भारत में राजनीतिक दलों के फंडिंग और चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने वाले हैं।

आजादी के बाद उत्तराखंड बना भारत का पहला UCC राज्य, आखिर क्या है UCC?

हाल ही में उत्तराखंड आजाद भारत का पहला UCC धारक राज्य बन चुका है… जानकारी के लिए बता दे कि उत्तराखंड की विधानसभा में UCC विधेयक बिल यानि समान नागरिक संहिता विधेयक बिल पारित हो गया है… लेकिन एक सवाल कि आखिर समान नागरिक संहिता होती क्या है और यह कैसे सभी धर्म को एक बनाती है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि आजादी के बाद देश का पहला समान नागरिक संहिता विधेयक उत्तराखंड 2024 विधानसभा में पास हो गया। दो दिन लंबी चर्चा, बहस और तर्कों के बाद बुधवार की शाम सदन में विधेयक ध्वनिमत से पास हुआ। विपक्ष ने चर्चा के दौरान बिल प्रवर समिति को भेजने की सिफारिश की थी। उसका यह प्रस्ताव भी ध्वनिमत से खारिज हो गया। इसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस बिल से समाज का भेदभाव, कुरीतियां खत्म होंगी। कहा, इस कानून में संशोधन की भी गुंजाइश होगी। पास होने के बाद अब बिल राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजा जाएगा, जहां से मुहर लगने के बाद यह कानून राज्य में लागू हो जाएगा। सभी विधिक प्रक्रिया और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यूसीसी लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनेगा। लेकिन एक सवाल कि आखिर यह UCC यानि समान नागरिक संहिता क्या होती है… तो आज हम आपको यही बताने वाले हैं… आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यूनिफॉर्म सिविल कोड में देश में सभी धर्मों, समुदायों के लिए एक सामान, एक बराबर कानून बनाने की वकालत की गई है. आसान भाषा में बताया जाए तो इस कानून का मतलब है कि देश में सभी धर्मों, समुदाओं के लिए कानून एक समान होगा. यानी मजहब और धर्म के आधार पर मौजूदा अलग-अलग कानून एक तरह  से निष्प्रभावी हो जाएंगे…. यूनिफॉर्म सिविल कोड संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आती है. इसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे. इसी अनुच्छेद के तहत इस यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश में लागू करने की मांग की जा रही है. इसके पीछे जनसंख्या को बिगड़ने से रोकना और जनसांख्यिकी को नियंत्रित करने की तर्क दी जाती है… यह मुद्दा एक सदी से भी ज्यादा समय से राजनीतिक नरेटिव और बहस के केंद्र बना हुआ है. बीजेपी ने हमेशा इसे अपने प्राइमरी एजेंडे में शामिल किया है. बीजेपी 2014 में सरकार बनने से ही UCC को संसद में कानून बनाने पर जोर दे रही है. 2024 चुनाव आने से पहले इस मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है. बीजेपी सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा था…. आइए जानते हैं कि UCC क्या है… तो बता दे कि विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति में सभी के लिए एक नियम रखेगा UCC… यही नहीं परिवार के सदस्यों के आपसी संबंध और अधिकारों में समानता.. जाति, धर्म या परंपरा के आधार पर नियमों पर समानता.. एवं सभी धर्मों के लिए समान नियम और कानून रखता है, समान नागरिक संहिता… बता दे कि सिविल कोड की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया, विशेष रूप से सिफारिश की गई कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को संहिताकरण के बाहर रखा जाए। भारत में जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून और मैरिज एक्ट हैं। इसके कारण सामाजिक ढ़ांचा बिगड़ा हुआ है। यही कारण है कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग उठती रही है जो सभी जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय को एक ही सिस्टम में लेकर आए। एक कारण यह भी है कि अलग-अलग कानूनों के कारण न्यायिक प्रणाली पर भी असर पड़ता है। वर्तमान समय में लोग शादी, तलाक आदि मुद्दों के निपटारे के लिए पर्सनल लॉ बोर्ड ही जाते हैं। इसका एक खास उद्देश्य महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित अम्बेडकर द्वारा परिकल्पित कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है, साथ ही एकता के माध्यम से राष्ट्रवादी उत्साह को बढ़ावा देना है। जब यह कोड बनाया जाएगा तो यह उन कानूनों को सरल बनाने का काम करेगा जो वर्तमान में धार्मिक मान्यताओं जैसे हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून और अन्य के आधार पर अलग-अलग हैं। UCC के तहत शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेने जैसे मामले शामिल होते हैं… हर धर्म में शादी, तलाक के लिए अब एक ही कानून होगा…जो कानून हिंदुओं के लिए, वहीं दूसरों के लिए भी होगा… अब बिना तलाक के एक से ज्यादा शादी नहीं कर पाएंगे. यही नहीं शरीयत के मुताबिक जायदाद का बंटवारा नहीं होगा… अब ये सभी चीज़े समान नागरिक संहिता के अनुसार होगी…. जैसे ही समान नागरिक संहिता का नाम आता है लोगों के मन में थोड़ा सा विश्वास कम हो जाता है… तो आज हम आपको बताते हैं कि समान नागरिक संहिता से क्या-क्या परिवर्तित नहीं होगा… तो आपको बता दें कि धार्मिक मान्यताओं पर कोई फर्क नहीं ना ही धार्मिक रीति-रिवाज पर असर पड़ेगा….ऐसा नहीं है कि शादी पंडित या मौलवी नहीं कराएंगे.. सारे काम वैसे ही होंगे जैसे पहले होते हैं बस नियम और कानून बदल जाएंगे… साथ ही खान-पान, पूजा-इबादत, वेश-भूषा पर भी प्रभाव नहीं पड़ेगा… यानी सीधी सी बात यह है कि समान नागरिक संहिता सभी नागरिकों को समान नियम पालन करने के लिए कहता है… जिसमें शादी, विरासत, तलाक एवं गोद लेने जैसे मामले शामिल है… आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है तोशाखाना मामला? जिसके तहत पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई जेल?

हाल ही में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी बीवी को 14 साल की जेल हो चुकी है…. यह मामला तोशाखाना मामला है… जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री को और उनकी धर्मपत्नी को सजा मिली है… लेकिन एक सवाल कि आखिर यह तोशाखाना मामला क्या है? जिसके तहत पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को 14 साल की सजा सुनाई गई है… तो आज हम आपको इसी मामले के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी को सरकारी उपहारों की अवैध बिक्री से संबंधित एक मामले में 14 साल जेल की सजा सुनाई गई है, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है पाकिस्तान के सूचना मंत्री के अनुसार, घड़ियों में सबसे कीमती, “मास्टर ग्राफ़ सीमित संस्करण” की अनुमानित कीमत $300,000 हैउनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने बुधवार को कहा,”खान पर प्रधानमंत्री रहते हुए महंगे सरकारी उपहार अपने पास रखने का आरोप लगाया गया है.”.. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है….

आइए अब आपको बताते हैं कि आखिर यह मामला है क्या? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तोशखाना नियम – राज्य के खजाने से उपहारों से संबंधित है – कहते हैं कि सरकारी अधिकारियों को तब तक उपहार रखने की अनुमति है जब तक वे उनके लिए कीमत चुकाते हैं. हालांकि, उपहार पहले जमा किए जाने चाहिए. यानी ये उपहार पहले सरकार के खजाने में जाने चाहिए. तोशाखाना कैबिनेट डिवीजन के अंतर्गत एक विभाग है जो सभी सार्वजनिक अधिकारियों को मिले उपहारों और महंगी चीज़ों को रखता है. नियम कहते हैं कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति 30,000 पीकेआर से कम कीमत वाले उपहार अपने पास रख सकते हैं… बता दें कि विवाद पहली बार तब उजागर हुआ जब पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के तहत बनी गठबंधन सरकार ने अगस्त 2022 में खान के खिलाफ मामला दर्ज किया. PML-N ने दावा किया कि खान ने तोशाखाना को दिए गए उपहारों के बारे में जानकारी का खुलासा नहीं किया और इसका सहारा भी लिया. कुछ उपहारों की “अवैध” बिक्री भी की. जब खान 2018 में सत्ता में आए थे तो उन्होंने अन्य देशों से मिले उपहारों का खुलासा करने के संबंध में प्रतिरोध दिखाया और कहा कि इससे विदेशी संबंधों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है….

सत्ता में रहते हुए, खान ने पाकिस्तान चुनाव आयोग (ईसीपी) को एक पत्र लिखकर कम से कम चार उपहार बेचने की बात स्वीकार की थी. हालांकि, उन्होंने दावा किया कि उन्होंने सरकार को कीमत का एक प्रतिशत भुगतान करके उन्हें खरीदा है. इन गिफ्ट में मंहगे कफलिंक्स, रोलेक्स घड़ियां, अंगूठी और महंगे पेन थे. बता दे कि खान पर प्रधानमंत्री रहते हुए महंगे सरकारी उपहार अपने पास रखने का आरोप लगाया गया है.”.. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है पाकिस्तान के सूचना मंत्री के अनुसार, घड़ियों में सबसे कीमती, “मास्टर ग्राफ़ सीमित संस्करण” की अनुमानित कीमत $300,000 है…. यानी सीधी सी बात यह है कि अब इमरान खान का शासन खत्म हो चुका है, जब वह प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि शायद वह भारत के लिए एक अच्छा पड़ोसी मुल्क साबित होंगे… लेकिन जैसा कि पाकिस्तान की रंगत और नियत है, वैसा ही हमें भी देखने को मिला… खैर, यह था पाकिस्तान का सबसे चर्चित तोशाखाना मामला… आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाना? जिसमें जिला अदालत ने दी पूजा करने की अनुमति!

हाल ही में वाराणसी की जिला अदालत के द्वारा ज्ञानव्यापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाने में पूजा करने की हिंदू पक्ष को अनुमति दे दी गई है… जिसके बाद हिंदू पक्ष खुश नजर आ रहा है… लेकिन एक सवाल कि आखिर ज्ञानवापी परिसर में स्थित यह व्यास जी तहखाना आखिर है क्या और इसमें कब से पूजा बंद हुई थी और यह अदालत की लड़ाई कब से चलती आ रही है? तो आज हम आपको उस पूरे घटनाक्रम के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि ज्ञानवापी मामले में बुधवार को बड़ा फैसला आया है। वाराणसी जिला अदालत ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यास तहखाने में पूजा करने की इजाजत दे दी है। अब व्यास परिवार तहखाने में पूजा पाठ करेगा। सोमनाथ व्यास का परिवार 1993 तक तहखाने में पूजा पाठ करता था। बता दें कि ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यासजी तहखाना में पूजा की मांग को लेकर वर्षों से अदालती लड़ाई चल रही है। ताजा फैसले में बताया गया कि वादी हिंदू पक्ष ने बताया कि मंदिर भवन के दक्षिण दिशा में स्थित तहखाने में मूर्ति की पूजा होती थी। दिसम्बर 1993 के बाद पुजारी व्यासजी को इस प्रांगण के बेरिकेट वाले क्षेत्र में प्रवेश करने से रोक दिया गया। इस कारण तहखाने में होने वाले राग-भोग आदि संस्कार भी रुक गये। हिंदू पक्ष ने दलील दी कि इस बात के पर्याप्त आधार है कि वंशानुगत आधार पर पुजारी व्यासजी ब्रिटिश शासन काल में भी वहां कब्जे में थे।  व्यासजी ने दिसम्बर 1993 तक वहां भवन में पूजा अर्चना की है। पूजारी द्वारा पूजा किया जाना नियंत्रित करे और उसका प्रबंध करे। न्यायालय में 17 जनवरी 2024 को पारित एक आदेश में रिसीवर की नियुक्ति तो कर दी लेकिन तहखाने में पूजा-अर्चना के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। हिंदू पक्ष ने अपनी दलील में कहा था कि तहखाने में मौजूद मूर्तियों की पूजा नियमित रूप से की जानी आवश्यक है।बाद में तहखाने का दरवाजा हटा दिया गया। हिन्दू धर्म की पूजा से सम्बन्धित सामग्री बहुत सी प्राचीन मूर्तियां और धार्मिक महत्व की अन्य सामग्री उस तहखाने में मौजूद हैं। हिंदू पक्ष ने कहा कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने बगैर किसी विधिक अधिकार के तहखाने के भीतर पूजा दिसम्बर 1993 से रोक दी। 

हिंदू पक्ष ने अदालत से अनुरोध किया कि वह रिसीवर को नियुक्त करे जो तहखाने में पूजारी द्वारा पूजा किया जाना नियंत्रित करे और उसका प्रबंध करे। न्यायालय में 17 जनवरी 2024 को पारित एक आदेश में रिसीवर की नियुक्ति तो कर दी लेकिन तहखाने में पूजा-अर्चना के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। हिंदू पक्ष ने अपनी दलील में कहा था कि तहखाने में मौजूद मूर्तियों की पूजा नियमित रूप से की जानी आवश्यक है।

जिसके बाद बुधवार को जिला जज की कोर्ट ने अपने एक आदेश में व्यासजी के तहखाने में पूजा की अनुमति दे दी। ज्ञानवापी स्थित व्यासजी के तहखाने में पूजा किए संबंधी आवेदन पर जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में दोनों पक्ष की तरफ से मंगलवार को बहस पूरी कर ली गई थी। अदालत ने इस प्रकरण में बुधवार को अपना आदेश सुनाया। तहखाने में पूजा करने की अनुमति मिल गई है। हिंदू पक्ष के वकील सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा व्यासजी के तहखाने में पूजा करने का अधिकार दिया गया है और कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर आदेश का अनुपालन करने का आदेश जिला अधिकारी को दिया है। वादी अधिवक्ताओं ने कहा है कि व्यासजी के तहखाने को डीएम की सुपुर्दगी में दिया गया है। अधिवक्ताओं के अनुरोध पर कोर्ट ने नंदी के सामने की बैरिकेडिंग को खोलने की अनुमति दी है। बता दें कि ज्ञानवापी मामले में बुधवार को बड़ा फैसला आया है। वाराणसी जिला अदालत ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यास तहखाने में पूजा करने की इजाजत दे दी है। अब व्यास परिवार तहखाने में पूजा पाठ करेगा। सोमनाथ व्यास का परिवार 1993 तक तहखाने में पूजा पाठ करता था। बता दें कि ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यासजी तहखाना में पूजा की मांग को लेकर वर्षों से अदालती लड़ाई चल रही है। ऐसे में अब तहखाने में 1993 के पहले के जैसे पूजा के लिए अदालत के आदेश से आने- जाने दिया जाएगा। तो यह था वह फैसला जो वाराणसी जिला अदालत के द्वारा ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाना के लिए दिया गया है…. खैर, आपको इस बारे में जानकर कैसा लगा अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है आम बजट और अंतरिम बजट में अन्तर? इस साल क्यों पेश किया जा रहा है अंतरिम बजट?

1 फरवरी, 2024 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा अंतरिम बजट पेश किया गया… लेकिन अगर आम सालों की बात की जाए, तो हर साल आम बजट पेश किया जाता है, लेकिन इस साल अंतरिम बजट पेश किया गया है… तो सवाल यह कि आखिर आम बजट और अंतरिम बजट में अंतर क्या होता है? और इस साल अंतरिम बजट क्यों पेश किया गया है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि जिस साल देश में आम चुनाव होने होते हैं उस वर्ष सरकार अंतरिम बजट का उपयोग देश की मशीनरी को बिना किसी अड़चन के आगे बढ़ाने के लिए करती है। भारत सरकार हर साल फरवरी के पहले दिन केंद्रीय आम बजट पेश करती है और यह बजट आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक वित्तीय ब्लूप्रिंट के रूप में कार्य करता है। हालांकि, 2024 में होने वाले आम चुनावों के कारण, केंद्र सरकार इस साल पूर्ण बजट पेश नहीं करेगी, बल्कि इस बार 1 फरवरी को अंतरिम बजट पेश किया गया! आई अब आपको आम बजट यानी पूर्ण वित्तीय बजट के बारे में और अंतरिम बजट के बारे में जानकारी देते हैं… तो आपको बता दें कि वार्षिक बजट हर साल फरवरी में पेश किया जाता है और यह आगामी वित्तीय वर्ष के लिए 1 अप्रैल से 31 मार्च तक का पूर्ण वित्तीय विवरण होता है। इस दस्तावेज़ में करों और अन्य उपायों के माध्यम से सरकार के राजस्व स्रोतों की एक व्यापक सूची शामिल होती है। इसके अलावे इसमें बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किए जाने वाले, सुझाए गए व्यय भी शामिल होते हैं।यह दस्तावेज आने वाले पूरे वित्तीय वर्ष के लिए देश के लिए एक विस्तृत वित्तीय रोडमैप प्रदान करता है, देश के वित्तीय लक्ष्यों व नीतिगत पहलों को निर्धारित करता है और देश के आर्थिक ढांचे को आकार देता है। नियमित बजट में पारित होने से पहले व्यापक संसदीय बहस, जांच, संशोधन और चर्चा भी की जाती है। तो ये होता है आम बजट…. आइए अब आपको अंतरिम बजट के बारे में बताते है…. बता दें कि देश में जिस वर्ष आम चुनाव होते हैं उस साल सरकार अंतरिम बजट का उपयोग देश की मशीनरी को बिना किसी अड़चन के आगे बढ़ने में मदद करने के लिए करती है। अंतरिम बजट भी फरवरी में पेश किया जाता है, हालांकि, यह आने वाले पूरे वित्तीय वर्ष के बजाय, चालू वित्त वर्ष के बचे महीनों को कवर करता है। अंतरिम बजट यह सुनिश्चित करने के लिए पेश किया जाता है कि वेतन, पेंशन और कल्याण कार्यक्रमों जैसी आवश्यक सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रह सकें। अंतरिम बजट में सरकार किसी भी बड़ी नीतिगत घोषणा या कराधान में किसी बड़े बदलाव से बचती है, ताकि चुनावी मौसम से पहले मतदाताओं को किसी भी तरह से प्रभावित करने से बचा जा सके। अंतरिम बजट निवर्तमान सरकार के कार्यकाल के शेष महीनों के लिए एक अस्थायी वित्तीय रोडमैप के रूप में कार्य करता है। अंतरिम बजट में शामिल अनुमोदन प्रक्रिया भी कम जटिल है। इस पर बहुत अधिक संसदीय चर्चा भी नहीं होती है। यानी अंतरिम बजट आसानी से पेश किया जा सकता है…. हालांकि, एक बार चुनाव संपन्न होने और नया वित्तीय वर्ष शुरू होने के बाद, नई सरकार के गठन और आधिकारिक रूप से कार्यभार संभालने से पहले एक छोटी अवधि होती है। इस महत्वपूर्ण अवधि में सिस्टम कैसे काम करता है यह भी जानना जरूरी है। इसके लिए लेखानुदान की जानकारी जरूरी है। चुनाव संपन्न होने और नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद देश के सिस्टम में निरंतरता सुनिश्चित करने और प्रशासन व संचालन में किसी भी प्रकार की रुकावट से बचने के लिए ‘लेखानुदान’ का इस्तेमाल किया जाता है। यह सुविधा देश का प्रशासनिक और आर्थिक इंजन चलता रहे यह सुनिश्चित करने के लिए है। यह एक अस्थायी उपाय है और नई सरकार को एक सीमित अवधि के लिए भारत की समेकित निधि से धन का उपयोग (आमतौर पर दो महीने के लिए) करने का अधिकार देता है। इसका प्रावधान इस लिए किया गया है ताकि वेतन और जारी कल्याण कार्यक्रमों जैसे तत्काल खर्चों का प्रबंधन किया जा सके। यह उपाय पूर्ववर्ती सरकार के बजट या अंतरिम बजट पर आधारित होता है। तो यह है आम बजट और अंतरिम बजट में अंतर… आपको यह जानकारी कैसी लगी अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!