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परीक्षा पर चर्चा पर क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पर चर्चा पर बड़ा बयान दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पे चर्चा’ के 7वें संस्करण में देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से बातचीत की। करीब पौने दो घंटे तक पीएम ‘सर’ की मेगा क्लास में बच्चों को परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन से लेकर बेहतर नागरिक बनने के गुर मिले। पीएम ने बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता और शिक्षकों से भी बात की। प्रधानमंत्री ने बेहद सरल और मजेदार अंदाज में बच्चों के हर एक सवाल का जबाव दिया। कैसे बोर्ड परीक्षा की तैयारी की जाए, टाइम मैनेजनेंट कैसे हो, मोबाइल के दुष्प्रभाव से कैसे बचा जाए? इन सभी सवालों का जवाब पीएम मे दिया। उन्होंने ये भी बताया कि वो कैसे इतने पॉजिटिव रहते हैं और प्रधानमंत्री के रूप में आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से छात्रों ने सवाल किया कि वो परीक्षा और सिलेबस के प्रेशर को कैसे हैंडल करें। इसके जवाब में पीएम ने कहा, ‘हमें किसी भी प्रेशर को झेलने के लिए खुद को सामर्थ्यवान बनाना चाहिए। दबाव को हमें अपने मन की स्थिति से जीतना जरूरी है। किसी भी प्रकार की बात हो, हमें परिवार में भी चर्चा करनी चाहिए।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “आपके दोस्त से आपको किस चीज की स्पर्धा है? मान लीजिए 100 नंबर का पेपर है। आपका दोस्त अगर 90 नंबर ले आया तो क्या आपके लिए 10 नंबर बचे? आपके लिए भी 100 नंबर हैं। आपको उससे स्पर्धा नहीं करनी है आपको खुद से स्पर्धा करनी है… उससे द्वेष करने की जरूरत नहीं है। असल में वो आपके लिए प्रेरणा बन सकता है। अगर यही मानसिकता रही तो आप अपने से तेज तरार व्यक्ति को दोस्त ही नहीं बनाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने शिक्षकों को टिप्स देते हुए कहा कि बच्चों के तनाव को कम करने में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। इसलिए शिक्षक और छात्रों के बीच हमेशा सकारात्मक रिश्ता रहना चाहिए। शिक्षक का काम सिर्फ जॉब करना नहीं, बल्कि जिंदगी को संवारना है, जिंदगी को सामर्थ्य देना है, यही परिवर्तन लाता है। परीक्षा के तनाव को विद्यार्थियों के साथ-साथ पूरे परिवार और टीचर को मिलकर एड्रेस करना चाहिए। अगर जीवन में चुनौती और स्पर्धा ना हो, तो जीवन प्रेरणाहीन और चेतनाहीन बन जाएगा। इसलिए कॉम्पटिशन तो होना ही चाहिए, लेकिन हेल्दी कॉम्पटिशन होना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी ने बच्चों को टिप्स देते हुए कहा कि आजकल लोगों की लिखने की आदत कम हो गई है। हम आईपैड वगैरह पर ज्यादा वक्त बिताते हैं। लेकिन जितना लिखेंगे उतनी ही अच्छी तैयारी होगी और कॉन्फीडेंस भी बढ़ेगा। इसलिए आप दिन में जितनी देर पढ़ते हैं उसका कम से कम आधा वक्त नोट्स बनाने में लगाएं। इससे आपको आइडिया लग जाएगा कि परीक्षा में कितनी देर में क्या आंसर लिखना है। अगर आपको तैरना आ जाएगा तो पानी में उतरने में डर नहीं लगेगा, ठीक वैसे ही जब आप लिखने की प्रैक्टिस करेंगे तो आपको टाइम मैनेजमेंट आ जाएगा और जाहिर तौर पर परीक्षा परिणाम में इसका असर दिखेगा। प्रधानमंत्री से एक छात्र ने सवाल किया कि पढ़ाई के साथ-साथ हमारे लिए व्यायाम और खेल कितना जरूरी है। इसके जवाब में पीएम मोदी ने कहा कि जिस तरह मोबाइल को इस्तेमाल करने के लिए उसे चार्जिंग और रिचार्ज की जरूरत है, ठीक वैसे ही हमारे शरीर को रिचार्ज करना जरूरी है। स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है। अगर हम स्वस्थ नहीं रहेंगे तो परीक्षा में बैठने की सामर्थ्य नहीं होगी। कभी कभी सूर्य के प्रकाश में बैठिए। इसके अलावा नींद को महत्व दें, परीक्षा से पहले अच्छी नींद जरूरी है। इसलिए जब भी मम्मी बोलें सो जाओ तो सोना चाहिए। रील्स पर समय बिगाड़ने से नींद को कम आंक रहे हैं।

एक छात्रा ने पीएम मोदी से सवाल किया कि हम अपने मां-बाप को कैसे यकीन दिलाएं कि हम मेहनत कर रहे हैं? इसके जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा ये सोचने का विषय है कि पारवारिक माहौल में माता-पिता या टीचर भरोसा नहीं कर पा रहे। कहीं न कहीं हमें अपने आचरण का एनालिसिस करने की जरूरत है। एक विद्यार्थी के नाते हमें ये सोचना चाहिए कि क्या आप जो कहते हैं उसका सच में पालन करते हैं या नहीं। माता-पिता के मना करने भी अगर हम फोन चला रहे हैं, तो भरोसा तो कम होगा ही। ठीक ऐसे ही मां-बाप को भी बच्चों पर भरोसा करना चाहिए। अगर बच्चों के नंबर नहीं आए हैं, तो इस तरह की बातें, कि तुम पढ़ते नहीं हो, दोस्तों के साथ समय बिताते रहते हो, ऐसी बातें बच्चों और मां-बाप के बीच दूरी बढ़ा देती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी से कुछ अभिभावकों और छात्रों ने सोशल मीडिया और मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल से होने वाले दुष्प्रभाव बचने के उपाय पूछे। इसके जवाब में पीएम मोदी ने कहा कि हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती। हम पेट भरने के बाद अपना मनपसंद खाना नहीं खा सकते है ठीक वैसे ही कितनी भी प्रिय चीज क्यों न आ रही हो, लेकिन मोबाइल की समय सीमा तय करनी पड़ेगी। आजकल तो पूरा परिवार मोबाइल में लगा रहता है, घर में बराबर में बैठकर एक दूसरे को मैसेज करते हैं। मोबाइल के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए पूरे परिवार को नियम बनाने होंगे। हम खाने के वक्त कोई गैजेट्स का इस्तेमाल न करें, ऐसा नियम बना सकते हैं। टेक्नोलॉजी से बचने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसका सही उपयोग सीखना बेहद जरूरी है। हमारे मोबाइल पर लगा पासवर्ड परिवार के सभी सदस्यों को पता होगा, तो काफी सुधार हो जाएगा। इसके अलावा हमें स्क्रीन टाइम अलर्ट को मॉनीटर करना चाहिए।

​चेन्नई के एक छात्र ने पीएम मोदी से सवाल किया कि वो प्रधानमंत्री के रूप में बड़े-बड़े प्रेशर कैसे हैंडल कर पाते हैं? इसके जवाब देते हुए पीएम मोदी ने हंसते हुए छात्र से पूछा कि क्या आप भी PM बनना चाहते हैं। पीएम ने कहा कि मैं चुनौतियों को ही चुनौतियां देता हूं। मैं मानता हूं कि कुछ भी क्यों न हो, मेरे साथ 140 करोड़ देशवासियों का साथ है। मैं अपनी शक्ति देश के सामर्थ्य बढ़ाने में लगा रहा हूं। इसके लिए मैं देश की शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा करता हूं। मैं ये नहीं सोचता कि मैं ये सब कैसे कर पाऊंगा। मैं जिनके लिए काम कर रहा हूं उनपर मेरा अपार भरोसा है। अगर मुझसे कोई गलती भी हो जाती है, तो मैं इसे एक सबक मानता हूं और निराश नहीं होता। कोराना के दौर में मैंने रोजाना देशवासियों से बात की, उन्हें मोटिवेट किया, इससे उनकी सामर्थ्य बढ़ती थी। PM ने कहा, ‘जब कोई निजी स्वार्थ नहीं होता, तो निर्णय लेने में कोई दुविधा नहीं होती। ये मेरी सबसे बड़ी ताकत है। मैं जो करूंगा देश के लिए करूंगा, आपके लिए करूंगा, मेरा क्या होगा इसकी मुझे कोई परवाह नहीं है।’

जब एलन मस्क ने इंसान के दिमाग में की चिप फिट!

हाल ही में एलन मस्क ने इंसान के दिमाग में चिप फिट करना शुरू कर दिया है! एलन मस्क ने एक्स पर लिखे पोस्ट में ऐलान किया है कि उनकी कंपनी न्यूरालिंक ने रविवार को एक मरीज के दिमाग में एक चिप को फिट किया है। इस प्रोडक्ट को टेलिपैथी नाम दिया गया है। मस्क ने एक्स पर लिखा कि टेलिपैथी की मदद से कोई व्यक्ति किसी फोन या कंप्यूटर को सिर्फ सोचकर नियंत्रित कर लेगा। आपने सिर्फ सोचा और आपके कंप्यूटर या मोबाइल ने वह कर दिखाया! सिलसिलेवार पोस्ट्स में मस्क ने बड़े उत्साहित हकर अपने इस अति महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि शुरुआती उपयोगकर्ता वे होंगे, जिन्होंने अपने अंगों का इस्तेमाल खो दिया है। कल्पना कीजिए कि स्टीफन हॉकिंग एक स्पीड टाइपिस्ट या नीलामीकर्ता की तुलना में तेजी से संवाद कर पाए होते।’ इंसानी दिमाग में चिप इम्प्लांट को क्रांतिकारी माना जा रहा है। ये तमाम रोगियों के लिए वरदान साबित हो सकता है। लेकिन इसे लेकर तमाम आशंकाएं भी उठने लगी हैं। दिमाग में चिप फिट करना इंसान की सबसे बड़ी गलती है या फिर वरदान, इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है। बहस भी क्यों न छिड़े। ट्रांसह्मयूमनिज्म के हिमायती प्रकृति को ही चुनौती दे रहे हैं। इससे मानवता तक के खत्म होने की आशंका गहरा रही है। न्यूरालिंक की स्थापना 2016 में हुई थी। इसे पिछले साल यूएस फूड ऐंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन से ह्यूमन ट्रायल यानी इंसानी दिमाग में चिप फिट करने की इजाजत मिली थी। इससे पहले न्यूरालिंक ने बंदरों पर इस तकनीक का ट्रायल किया था जो सफल रहा था। इस तकनीक को ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस कहा जाता है। ट्रायल के दौरान बंदरों ने कंप्यूटर के कर्सर को सिर्फ सोचकर नियंत्रित कर लिया। आखिर वो चिप कैसा है जिसे पहली बार किसी इंसान के दिमाग में फिट किया गया है? उस छोटे से चिप को लिंक के नाम से जाना जाता है जिसे सर्जरी के जरिए खोपड़ी में इम्प्लांट किया गया है। इससे बहुत महीन तार जुड़े हुए हैं जो इंसान के बाल से भी पतले हैं। इसे बहुत ही सावधानी से ब्रेन के एक खास हिस्से में फिट किया गया है। इंसानी दिमाग में चिप इम्प्लांट तमाम ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित हो सकता है जो दिमाग से जुड़ीं बीमारियों से जूझ रहे हैं। इससे कई बीमारियों के इलाज में मदद मिल सकती है।

मोटर न्यूरॉन डिसीज जैसे एएलएस एमियोट्रोफिक लैटरल स्क्लिेरोसिस और मेरु रज्जू यानी स्पाइल कॉर्ड में चोट की स्थिति में ये वरदान साबित हो सकता है। ऐसे मरीज जो अपने अंगों पर नियंत्रण खो चुके हों, वे इसके जरिए अपने अंगों को नियंत्रित कर सकेंगे। कई बीमारियों में कोई व्यक्ति चलने-फिरने में असमर्थ होता है क्योंकि उसका अंगों पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। ऐसे लोग इसकी मदद से फिर चल-फिर सकेंगे। मान लीजिए, किसी हादसे में किसी व्यक्ति ने हाथ या पैर खो दिया हो, लेकिन इस तकनीक के जरिए वह अपने रोबॉटिक आर्म या लेग को कंट्रोल कर सकेगा। वह सामान्य तौर पर चल-फिर सकेगा और मशीनी हाथ का भी आसानी से इस्तेमाल कर सकेगा। लकवा, पार्किंसन, ब्रेन इंजरी, मिर्गी के दौरों, डिप्रेशन, अंधेपन या बहरेपन वगैरह का भी इलाज हो सकेगा।

न्यूरालिंक अभी जिस टेलीपैथी तकनीक का ह्यूमन ट्रायल कर रही है, उसका अगले 5-6 वर्षों में कॉमर्शियल यूज करने का लक्ष्य है। कई बीमारियों के इलाज में ये तकनीक वरदान तो साबित हो सकती है लेकिन एक दूसरा पहलू भी है। ये तकनीक वरदान की जगह अभिशाप भी साबित हो सकती है, विनाशकारी भी हो सकती है। इससे प्राइवेसी को खतरा रहेगा। चिप के जरिए किसी इंसान के दिमाग पर भी कंट्रोल किया जा सकेगा। इस तरह तो इंसान और मशीन का फर्क ही मिट जाएगा। इंसान एक रोबॉट की तरह हो जाएगा जिसे कोई दूसरा इंसान नियंत्रित कर रहा होगा। हालांकि, ये आशंका अभी दूर की बात है। लेकिन न्यूरालिंक के प्रोजेक्ट से जो तात्कालिक आशंका है, वो है प्राइवेसी से जुड़ा हुआ। अगर मान भी लिया जाए कि इस तकनीक का सिर्फ सदुपयोग ही होगा तब भी आशंकाएं हैं। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिसमें वह अपने हाथ पैर या बाकी अंगों को नियंत्रित करने में असमर्थ है। अगर उसके दिमाग में चिप फिट किया गया तो ये उसके लिए वरदान तो होगा ही लेकिन कुछ सवाल भी हैं। चिप के जरिए मिलने वाले डेटा पर किसका नियंत्रण होगा? दूसरा व्यक्ति बिना इजाजत उस डेटा का मिसयूज भी तो कर सकता है? चिप इंप्लांट के जरिए कोई शख्स किसी दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क पर नियंत्रण भी तो कर सकता है। अगर नियंत्रण नहीं भी कर पाए तो ये तो जान ही पाएगा कि वह क्या सोच रहा है, उसके दिमाग में क्या चल रहा है।

एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक जिस उद्देश्य से काम कर रही है, वे ट्रांसह्यूमनिज्म के कॉन्सेप्ट से प्रेरित हैं। ये विचार अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके इंसान की मौलिक क्षमताओं को बढ़ाने की वकालत करता है। मौत को शाश्वत सत्य कहा जाता है लेकिन ट्रांसह्यूमनिस्ट इसे झुठलाने में यकीन रखते हैं। वे इस दिशा में काम कर रहे हैं कि व्यक्ति की मौत ही न हो। बूढ़ा ही न हो। कभी बीमार ही न हो। यानी ये सीधे-सीधे प्रकृति की सत्ता को चुनौती है। अभी ये भले ही किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कल्पना जैसी लग रही हो लेकिन आने वाले वक्त में ये हकीकत की शक्ल भी अख्तियार कर सकती है। आसान शब्दों में कहें तो ट्रांसह्यूमनिज्म इंसान को एक तरह से सुपर ह्यूमन बनाने का कॉन्सेप्ट है। सुपर ह्यूमन का कॉन्सेप्ट ही मानवता के लिए बड़े खतरे की दस्तक है। इससे मानवता तक खत्म हो सकती है। मशीन और इंसान का फर्क मिट सकता है। एक तो दुनिया में पहले से ही काफी असमानता है। कुछ लोग हैं जिनके पास हर तरह के साधन हैं तो तमाम लोग ऐसे हैं जो वंचित हैं और बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जो समर्थ हैं, साधन संपन्न हैं वे तकनीक के इस्तेमाल से सुपर ह्यूमन में तब्दील हो सकते हैं। इससे ये खतरा बढ़ जाएगा कि कुछ मुट्ठीभर सुपरह्यूमन विशाल आबादी को नियंत्रित कर लेंगे। उन्हें गुलाम बना सकते हैं।

क्या तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन पाएगा भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत अब तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन पाएगा या नहीं! भारत ने अपने सामने बड़े लक्ष्‍य रख दिए हैं। उन्‍हें पाने के लिए वह पूरी ताकत से दौड़ लगा रहा है। तमाम अनुमान भी संकेत देते हैं कि भारत नहीं रुकने वाला है। तीन साल में वह 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बन जाएगा। 2030 तक उसकी अर्थव्‍यवस्‍था का आकार 7 ट्रिलियन डॉलर हो जाने के आसार हैं। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बनने को तैयार है। इसके उलट चीन लड़खड़ाता दिख रहा है। ग्‍लोबल जीडीपी में उसकी हिस्‍सेदारी घट गई है। जानकारों का मानना है कि चीन की अर्थव्‍यवस्‍था में जो गिरावट शुरू हुई है उसमें वापसी की गुंजाइश कम ही है। इसके पीछे कई तरह की वजह हैं। इनमें वर्किंग पॉपुलेशन का कम होना सबसे बड़ा कारण है। उधर, चीन की आक्रामकता भी कई देशों को अखर रही है। यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में चीन विरोधी लहर है। अब इन सबके बीच एक बड़ा सवाल है। वह यह है कि क्‍या भारत इस मौके का फायदा उठा सकता है? अभी उसे क्‍या करने की जरूरत है? ग्‍लोबल जीडीपी में चीन की हिस्‍सेदारी 1990 में 2 फीसदी हुआ करती थी। 2021 तक यह बढ़कर करीब 18.4 फीसदी पर पहुंच गई। इसके पीछे उसकी तमाम आर्थिक नीतियां रहीं। हालांकि, अब ग्‍लोबल जीडीपी में चीन की हिस्‍सेदारी फिर घटने लगी है। यह घटकर 17 फीसदी रह गई है। इसकी एक सबसे बड़ी वजह ड्रैगन की कामकाजी आबादी की हिस्‍सेदारी घटना है। यह एक दशक से घट ही रही है। यह घटकर करीब 19 फीसदी रह गई है। अगले तीन दशकों में इसके घटकर 10 फीसदी रह जाने के आसार हैं। यानी चीन की सुस्‍ती स्‍थायी दिखती है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो अर्थव्‍यवस्‍था के दोबारा तेजी से भागने के आसार कम ही हैं।

इसके उलट भारत की तस्‍वीर सुनहरी दिख रही है। अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष आईएमएफ ने 2024-25 के लिए भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमानों में बदलाव किया है। आईएमएफ ने इसे बढ़ाकर 6.5 फीसदी कर दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था 2024-25 में भी सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक रहने की उम्मीद है। भारत के पास न तो टैलेंट की कमी है। न उसके पास काम करने वाले युवा हाथों की किल्‍लत है। भारत तेजी से एक बड़ी डिजिटल इकनॉमी बन रहा है। निर्माण जैसे क्षेत्रों में बढ़ोतरी से रोजगार के मौके भी बढ़ने के आसार हैं। वित्त मंत्रालय की ओर से हाल में जारी रिपोर्ट में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्‍वीर दिखाई गई है। यह रिपोर्ट कहती है कि तीन साल में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। 2030 तक इसके 7 ट्रिलियन डॉलर हो जाने की उम्‍मीद है। पिछले 10 सालों में भारत की अर्थव्यवस्था 7.4 फीसदी की औसत रफ्तार से बढ़ी है। भारत अभी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसके सामने तीन सबसे बड़े खतरे वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी, ब्याज दरों में बढ़ोतरी और महंगाई के हैं। हालांकि, भारत को भरोसा है कि वह इन चुनौतियों से निपट लेगा।

ग्‍लोबल इकनॉमी में चीन का घटता कॉन्ट्रिब्‍यूशन उभरते बाजारों के लिए मौके तैयार करेगा। सच तो यह है पिछले साल भारत, इंडोनेशिया, मेक्सिको और ब्राजील का ग्‍लोबल अर्थव्‍यवस्‍था में हिस्‍सा बढ़ा है। यानी फायदा मिलना तय है। लेकिन, अभी कई ऐसी चीजें हैं जिन्‍हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। चीन को अभी कुछ सालों में भारत रिप्‍लेस नहीं कर पाएगा। ऐसे में उसे धीरे-धीरे मजबूत कदम बढ़ाने होंगे। सबसे पहले तो उसे अपनी क्षमता का विस्‍तार करना होगा। इसके लिए देश के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर सेक्‍टर में बड़े निवेश की जरूरत होगी। सरकार के साथ इसमें निजी सेक्टर को भी उतरना होगा। दूसरा, उसे दुनिया के झंझावातों से दूरी बनाकर अपने हितों को देखना होगा। पॉलिसी लेवल पर कोई भी गलत कदम उसे अपने लक्ष्‍य से बहुत दूर पहुंचा देगा। तीसरा, उसे अपनी वर्किंग पॉपुलेशन को पूरी तरह से इस्‍तेमाल करने का बंदोबस्‍त करना होगा। सरकार को सुनिश्चित करना होगा एक भी युवा बिना काम और रोजगार के नहीं रहे। वर्किंग पॉपुलेशन किसी भी अर्थव्‍यवस्‍था की पूंजी होती है। भारत अभी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उसके सामने तीन सबसे बड़े खतरे वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी, ब्याज दरों में बढ़ोतरी और महंगाई के हैं। हालांकि, भारत को भरोसा है कि वह इन चुनौतियों से निपट लेगा।इस पूंजी को ज्‍यादा से ज्‍यादा इस्‍तेमाल करना होगा। युवा आबादी, बढ़ता मध्‍यम वर्ग, डिजिटल अर्थव्‍यवस्‍था, सर्विस सेक्‍टर, स्‍टार्टअप इकोसिस्‍टम, व‍िदेशी न‍िवेश, सरकार की ‘ईज ऑफ डूइंग’ की पॉल‍िसी और मजबूत बैंकिंग प्रणाली भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की बड़ी ताकत हैं।

आखिर किन-किन जातियों को दिया गया है नीतीश कैबिनेट में स्थान?

आज हम बताएंगे कि नीतीश कैबिनेट में किन-किन जातियों को स्थान दिया गया है! बिहार में नई सरकार बनी, जिसमें नीतीश कुमार 9वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए। सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा डिप्टी सीएम बने। इसके अलावा 6 मंत्री बने। मंत्रिपरिषद में शपथ लेने वाले मंत्रियों में जातीय अंकगणित को ध्यान में रखा गया। लेकिन किसी ब्राह्मण, मुस्लिम और महिला विधायक को जगह नहीं मिली। उपमुख्यमंत्री पद के लिए कोइरी समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी और भूमिहार समुदाय के विजय कुमार सिन्हा को मौका मिला। जो भाजपा की पसंद सवर्ण जाति के मूल आधार को बरकरार रखते हुए ओबीसी तक पहुंच बनाने की ओर इशारा करता है। नीतीश कुमार के मंत्रिपरिषद के सदस्यों के रूप में रविवार को शपथ लेने वालों में भाजपा नेता सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा और प्रेम कुमार शामिल रहे। जदयू नेता विजय कुमार चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार ने मंत्री पद की शपथ ली। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न उजागर किए जाने की शर्त पर बताया कि राजग सहयोगियों ने नई सरकार के लिए मंत्रियों को चुनते समय हिंदुओं के सभी सामाजिक समूहों को खुश करने के लिए एक आदर्श संतुलन बनाया। प्रेम कुमार कहार जाति से आते हैं तो विजेंद्र यादव, यादव समुदाय से।हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नेता संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय विधायक सुमित कुमार सिंह भी ओथ लेने वालों में शामिल रहे। नीतीश कुमार, सम्राट चौधरी और संतोष कुमार सुमन, तीनों बिहार विधान परिषद के सदस्य एमएलसी हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, नीतीश कुमार मंत्रिमंडल को अंतिम रूप देते समय एनडीए के सहयोगी दलों के शीर्ष नेताओं ने बेहतर जातीय संतुलन बनाया है। हालांकि अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अन्य जातियों, ब्राह्मण, मुस्लिम और महिला विधायकों को समायोजित करने के लिए एक या दो दिन में कैबिनेट का विस्तार किया जाएगा। नए मंत्रिमंडल में तीन उच्च जाति के मंत्री हैं, जिनमें भूमिहार समुदाय से विजय चौधरी और विजय सिन्हा, राजपूत से सुमित कुमार सिंह निर्दलीय शामिल हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा श्रवण कुमार भी कुर्मी जाति से हैं। हाल ही में संपन्न जाति सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में कुर्मियों की कुल संख्या 37.62 लाख है, जो बिहार की कुल आबादी का 2.87 प्रतिशत है। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न उजागर किए जाने की शर्त पर बताया कि राजग सहयोगियों ने नई सरकार के लिए मंत्रियों को चुनते समय हिंदुओं के सभी सामाजिक समूहों को खुश करने के लिए एक आदर्श संतुलन बनाया। प्रेम कुमार कहार जाति से आते हैं तो विजेंद्र यादव, यादव समुदाय से।

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नेता संतोष सुमन महादलित समुदाय से आते हैं। जदयू नेता ने कहा कि मंत्रियों के जाति विभाजन से पता चलता है कि राजग सहयोगियों ने नए मंत्रिमंडल में सभी महत्वपूर्ण सामाजिक समूहों को शामिल करने के लिए पर्याप्त प्रयास किया। बता दें कि अब यादव जाति को तटस्थ करने के लिए जदयू नेता विजेंद्र यादव को मंत्री बनाया गया। वोटिंग टेंडेंसी को लेकर बिहार की सबसे आक्रामक जाति को एनडीए से जोड़ने के लिए दो-दो भूमिहार को मंत्री बनाया है। भाजपा ने तो भूमिहार नेता विजय सिन्हा को डिप्टी सीएम बना दिया और जदयू की तरफ से विजय चौधरी को भी मंत्री बनाया गया। अतिपिछड़ा जाति के लिए भाजपा ने कहार जाति के प्रेम कुमार को भी मंत्री बनाया है। एनडीए के रणनीतिकार ने बड़ी चालाकी से सरकार के भविष्य का भी ख्याल रखा। ऐसा इसलिए कि राजद जिस मैजिक नंबर के पीछे भाग रही थी, उसके आंकड़ों में हम के चार विधायक और निर्दलीय विधायक सुमित कुमार को भी शामिल किया जा रहा था। एनडीए ने राजद नेतृत्व के उस मंसूबे को ध्वस्त किया और साथ ही दलित और राजपूत जाति को भी संतुष्ट करने में सफलता पाई। 

संवैधानिक प्रावधान के मुताबिक, बिहार में एक मुख्यमंत्री अधिकतम 35 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकता है। रविवार को केवल आठ मंत्रियों ने ही पद की शपथ ली। आगे आने वाली मंत्रियों की सूची से बाकी बचे जातीय समीकरण को भी तुष्ट किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। रविवार की शाम सीएम समेत 9 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें नीतीश कुमार के साथ 2 उपमुख्यमंत्री और 6 कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। बीजेपी से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा डिप्टी सीएम होंगे। इसके अलावा प्रेम कुमार शामिल हैं। जदयू से विजय चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार ने शपथ ली। जबिक हम से जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय सुमित सिंह मंत्री बने।उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व अगले विस्तार में ब्राह्मण, मुस्लिम समुदाय, महिला विधायकों और अन्य जातियों का ख्याल रखेगा।

क्या बिहार के कैबिनेट में है जातीय आधार?

वर्तमान में बिहार के कैबिनेट में जातीय आधार है! आगामी राजनीति की सुध लेते बिहार में एनडीए की सरकार बनी। जातीय तुष्टिकरण के साथ-साथ राजद नेता तेजस्वी यादव के ए-टू-जेड समीकरण को भी ध्वस्त करने के सूत्र भी तलाश लिए गए। सीएम नीतीश कुमार के साथ शपथ लेने वालों में 8 मंत्रियों से ये स्पष्ट हो गया कि एनडीए आगामी चुनाव में किन ‘जातीय वीर’ के साथ चुनाव में उतरने जा रही है। हालांकि, आगे आने वाली मंत्रियों की सूची से बाकी बचे जातीय समीकरण को भी तुष्ट किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। रविवार की शाम सीएम समेत 9 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें नीतीश कुमार के साथ 2 उपमुख्यमंत्री और 6 कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। बीजेपी से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा डिप्टी सीएम होंगे। इसके अलावा प्रेम कुमार शामिल हैं। जदयू से विजय चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार ने शपथ ली। जबिक हम से जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय सुमित सिंह मंत्री बने।

एनडीए के मंत्रिपरिषद की जो पहली तस्वीर आई है, उसमें बिहार के प्रमुख और आक्रामक जातियों की झलक दिख गई। ऐसा लगा कि एनडीए के रणनीतिकार तेजस्वी के ए-टू-जेड फॉर्मूला को शिकस्त देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस मंत्रिपरिषद पर ध्यान दें तो सबसे ज्यादा जोर लव-कुश समीकरण पर दिया गया है। सीएम नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सी-एम सम्राट चौधरी और जदयू के श्रवण कुमार लव-कुश समीकरण को पुष्ट करते देख रहे हैं। ऐसे भी राज्य के सबसे बड़ी आबादी यादव के 14 प्रतिशत वोट के विरुद्ध लव-कुश समीकरण से ही एनडीए राजद को मात देते रही है।

अब यादव जाति को तटस्थ करने के लिए जदयू नेता विजेंद्र यादव को मंत्री बनाया गया। वोटिंग टेंडेंसी को लेकर बिहार की सबसे आक्रामक जाति को एनडीए से जोड़ने के लिए दो-दो भूमिहार को मंत्री बनाया है। भाजपा ने तो भूमिहार नेता विजय सिन्हा को डिप्टी सीएम बना दिया और जदयू की तरफ से विजय चौधरी को भी मंत्री बनाया गया। अतिपिछड़ा जाति के लिए भाजपा ने कहार जाति के प्रेम कुमार को भी मंत्री बनाया है। एनडीए के रणनीतिकार ने बड़ी चालाकी से सरकार के भविष्य का भी ख्याल रखा।बीजेपी नेतृत्व के फलसफे पर भाजपा की राजनीति के सुर बदलने आगे। अटल आडवाणी को सॉफ्ट नेताओं के विरुद्ध नरेंद्र मोदी के हाथ भाजपा और देश का नेतृत्व आया। इस धरातल पर नरेंद्र मोदी के प्राथमिकता वाले नेताओं में न नीतीश कुमार थे और न ही सुशील मोदी।

 ऐसा इसलिए कि राजद जिस मैजिक नंबर के पीछे भाग रही थी, उसके आंकड़ों में हम के चार विधायक और निर्दलीय विधायक सुमित कुमार को भी शामिल किया जा रहा था। एनडीए ने राजद नेतृत्व के उस मंसूबे को ध्वस्त किया और साथ ही दलित और राजपूत जाति को भी संतुष्ट करने में सफलता पाई। बता दें कि सम्राट चौधरी हार्ड कोर नेता माने जाते हैं। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार को मेमोरी लॉस सीएम बताया। नीतीश को हमेशा कहते रहे हैं कि वो बिहार संभालने लायक नहीं हैं। वे डरपोक नेता हैं। यहां तक कि 2023 में सिर पर भगवा रंग का मुरेठा बांधते यह कसम भी खाई कि नीतीश कुमार के पद से हटने के बाद ही वह मुरैठ खोलेंगे। उधर, भाजपा ने नीतीश कुमार का इंतज़ाम सदन के बाहर भी कर दिया है। नरेंद्र मोदी के हनुमान चिराग पासवान ने खुलेआम कहा कि नीतीश कुमार से मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। पर नरेंद्र मोदी नीत नीतियों को वह फलीभूत होने नहीं देंगे तो उन्हें चिराग पासवान का विरोध झेलना होगा। 

 

बिहार मंत्रिपरिषद की ये अंतिम तस्वीर नहीं है। आने वाले मंत्रियों की सूची में ब्राह्मण, वैश्य, अन्य पिछड़ी जातियां, दलित और मुस्लिम कोटे को भी तुष्ट किया जाएगा। तेज तर्रार नेताओं को सीएम नीतीश कुमार के अगल-बगल खड़ा किया है। याद होगा विधान सभा अध्यक्ष रहते विजय सिन्हा ने सीएम नीतीश कुमार से टकराहट भरी भाषा के साथ सवाल जवाब किया था। मसला लखीसराय का था। एक गिरफ्तारी को लेकर तब वे दोनों आमने-सामने हो गए थे। ये वही विजय सिन्हा हैं जिन्होंने नीतीश को मेंटल, बंधुआ मजदूर तक कहा था।पिछली एनडीए सरकार के कई मंत्री अभी आगामी सूची के लिए इंतजाररत हैं। मिली जानकारी के अनुसार आने वाले मंत्रियों की सूची हर संभव जातीय तुष्टिकरण की पुष्ट तस्वीर भी परोसने जा रही है।

अब बिहार में किसका रहेगा दबदबा जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि बिहार में अब किसका दबदबा रहेगा! बिहार में डबल इंजन की सरकार चल पड़ी है, राज्य में फिर से नीतीशे सरकार है, पर इस बार डबल इंजन की सरकार में समान पावर के इंजन लगे हैं। एनडीए की यह सरकार न तो 2005 या कि 2010 या फिर साल 2017 वाली एनडीए सरकार कतई नहीं होने जा रही है। इस बार सीएम नीतीश कुमार के सारे दाव पेंच को दुरुस्त करने के इंतजाम बीजेपी ने एनडीए सरकार की नींव डालते ही कर दिया है। जानिए क्या है बीजेपी की रणनीति। इस बार हमेशा की तरह बीजेपी के रणनीतिकारों ने सॉफ्ट नेताओं को डेप्युटी सीएम की जिम्मेदारी नहीं दी। 2005 में राज्य के डेप्युटी सीएम बने सुशील मोदी। नीतीश कुमार की पसंदीदा नेताओं में से एक रहे। डबल इंजन की सरकार अपनी गति से चल रही थी। लेकिन बाद में बीजेपी के भीतर से ही सुशील मोदी का विरोध इसलिए शुरू हो गया कि उन्हें नीतीश कुमार की हितों का रक्षक नेता माना जाने लगा। वैसे भी नीतीश कुमार या सुशील मोदी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के पसंदीदा नेताओं में शुमार किए जाते रहे। लेकिन देश में बीजेपी नेतृत्व के फलसफे पर भाजपा की राजनीति के सुर बदलने आगे। अटल आडवाणी को सॉफ्ट नेताओं के विरुद्ध नरेंद्र मोदी के हाथ भाजपा और देश का नेतृत्व आया। इस धरातल पर नरेंद्र मोदी के प्राथमिकता वाले नेताओं में न नीतीश कुमार थे और न ही सुशील मोदी।

लेकिन 2017 में एनडीए की सरकार बनी तो रेणु देवी और तार किशोर प्रसाद को डेप्युटी सीएम बनाया गया। ये भी नीतीश कुमार के आगे प्रभावहीन ही रहे। इस बार भाजपा ने बड़ी सोच समझकर अनुभवी और तेज तर्रार नेताओं को सीएम नीतीश कुमार के अगल-बगल खड़ा किया है। याद होगा विधान सभा अध्यक्ष रहते विजय सिन्हा ने सीएम नीतीश कुमार से टकराहट भरी भाषा के साथ सवाल जवाब किया था। मसला लखीसराय का था। एक गिरफ्तारी को लेकर तब वे दोनों आमने-सामने हो गए थे। ये वही विजय सिन्हा हैं जिन्होंने नीतीश को मेंटल, बंधुआ मजदूर तक कहा था।

सम्राट चौधरी हार्ड कोर नेता माने जाते हैं। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार को मेमोरी लॉस सीएम बताया। नीतीश को हमेशा कहते रहे हैं कि वो बिहार संभालने लायक नहीं हैं। वे डरपोक नेता हैं। यहां तक कि 2023 में सिर पर भगवा रंग का मुरेठा बांधते यह कसम भी खाई कि नीतीश कुमार के पद से हटने के बाद ही वह मुरैठ खोलेंगे। उधर, भाजपा ने नीतीश कुमार का इंतज़ाम सदन के बाहर भी कर दिया है। नरेंद्र मोदी के हनुमान चिराग पासवान ने खुलेआम कहा कि नीतीश कुमार से मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। पर नरेंद्र मोदी नीत नीतियों को वह फलीभूत होने नहीं देंगे तो उन्हें चिराग पासवान का विरोध झेलना होगा।

बता दे कि बिहार में महागठबंधन की सरकार का अंत हो गया है। नीतीश कुमार के शब्दों में उन्होंने पिछली सरकार को खत्म कर दिया है। उन्होंने ये भी कहा कि अब यहीं रहेंगे। सियासी जानकार मानते हैं कि बीजेपी इन दिनों अपना हर कदम फूंक-फूंक कर उठा रही है। जानकारों की मानें, तो पार्टी ने सबसे पहले दो नेताओं को नीतीश के आगे-पीछे डिप्टी सीएम के रूप में लगा दिया है। पहले नेता विजय कुमार सिन्हा हैं। ये भूमिहार समाज से आते हैं। दूसरे नेता सम्राट चौधरी, जो लव-कुश समीकरण को साधते हैं। अपनी आक्रामक बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। जाहिर है, बीजेपी ने ओबीसी और ऊंची जाति के संयोजन के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है। बीजेपी को पता है कि लोकसभा चुनाव मुश्किल से कुछ महीने दूर हैं।

नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए ने 2020 का विधानसभा चुनाव भी एक साथ जीता था। जिसके बाद भाजपा ने ओबीसी वैश्य नेता तारकिशोर प्रसाद और ईबीसी नोनिया नेता रेनू देवी को डिप्टी सीएम नियुक्त किया था। वे अगस्त 2022 तक अपने पद पर बने रहे। उसके बाद 9 अगस्त, 2022 को नीतीश कुमार आरजेडी के पाले में चले गए। तब तक दोनों नेता डिप्टी सीएम बने रहे। बीजेपी का पिछला ओबीसी-ईबीसी प्रयोग असफल रहा था। पार्टी ने नीतीश पर लगातार हमला करने वाले सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा को डिप्टी सीएम बना दिया है। चौधरी अब काम में व्यस्त रहेंगे। पार्टी को उम्मीद है कि अपनी नई भूमिका में ये लोग नीतीश के प्रतिनिधि के रूप में काम करेंगे। अपनी आक्रामकता भी कम करेंगे। जरूरत पड़ने पर पार्टी का इशारा होते ही, जेडीयू प्रमुख यानी नीतीश कुमार को काबू में भी रखेंगे।

बीजेपी से जुड़े सूत्र कहते हैं कि चौधरी को आगे बढ़ाने का भाजपा का एक कारण उन्हें राज्य की राजनीति में आगे किए रहना है। सम्राट चौधरी को बीजेपी बहुत कुछ सोच समझकर आगे बढ़ा रही है। सम्राट को इस बार महत्वपूर्ण भूमिका देना जरूरी था। इससे कार्यकर्ताओं में एक अच्छा संदेश जाएगा। दूसरी बात की पार्टी नीतीश को अपने साथ लेकर लोकसभा चुनाव को साधने की कवायद में जुटी है। इसका ताजा प्रमाण है, जेपी नड्डा का बयान जो उन्होंने पटना में दिया। नड्डा ने कहा कि डबल इंजन की सरकार से बिहार के विकास को गति मिलेगी। अब बिहार विकास की ओर अग्रसर होगा। नड्डा ने कहा कि बिहार में जनता ने एनडीए को जनादेश दिया था और अब डबल इंजन की सरकार राज्य का विकास करेगी। उन्होंने प्रसन्नता जताते हुए कहा कि नीतीश कुमार फिर से एनडीए में आ गए हैं। उन्होंने कहा कि जब भी बिहार में एनडीए की सरकार बनी है स्थिरता आई है और डबल इंजन का बेहतर प्रभाव रहेगा। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि एनडीए लोकसभा चुनाव में स्वीप करेगी तथा विधानसभा चुनाव में भी एनडीए की सरकार बनेगी।

क्या अखिलेश यादव का कन्नौज से लड़ना बीजेपी के लिए खतरनाक है?

अगर अखिलेश यादव कन्नौज से चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी के लिए खतरा पैदा हो सकता है! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन में सीटों को बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस को 11 सीटें देने के एकतरफा ऐलान के बाद स्थितियां और कठिन हो चली हैं। उधर राष्ट्रीय लोकदल भी 7 सीटों से ज्यादा की उम्मीद सपा से कर रहा है। इस बीच समाजवादी पार्टी भी संभावित प्रत्याशियों को लेकर रणनीति बनाने में जुटी है। जिलों-जिलों से फीडबैक प्रॉसेस चल रहा है। खुद अखिलेश यादव के इस बार कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी तरह डिंपल यादव मैनपुरी और शिवपाल यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अखिलेश यादव कन्नौज की अपनी पुरानी सीट से दावेदारी करते हैं तो भाजपा के लिए मुकाबला कठिन होना तय है। बता दें अखिलेश यादव लगातार कन्नौज का दौरा कर रहे हैं। अभी तक आधिकारिक तौर पर कुछ ऐलान नहीं हुआ है लेकिन क्षेत्र में चर्चाएं तेज हैं कि अखिलेश यादव यहीं से मैदान में उतरेंगे। अखिलेश यादव यहां से तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं। कन्नौज के बारे में कभी कहा जाता था कि यहां से यादव परिवार को चुनाव जीतने के लिए कैंपेन करने की भी जरूरत नहीं है। 1998 से 2019 तक इस सीट पर यादव परिवार का दबदबा रहा। कन्नौज लोकसभा सीट पर भाजपा के चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू ने 1996 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की छोटी सिंह यादव को मात देकर सीट अपने नाम की थी। लेकिन इसके बाद 1998 में समाजवादी पाटीं ने प्रदीप कुमार यादव की अगुवाई में इस सीट पर अपना कब्जा बना लिया। इसके बाद 1999 में ये सीट यादव परिवार की हो गई।

1999 में मुलायम सिंह यादव यहां से जीते, फिर 2000 में उनकी जगह उपचुनाव में अखिलेश यादव ने ली। अखिलेश ने इसके बाद 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावा आसानी से जीत लिए। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री हो गए और उन्होंने ये सीट अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए खाली कर दी। डिंपल ने 2012 का उपचुनाव निविर्रोध जीत लिया। फिर 2014 में मोदी लहर के बीच भी डिंपल यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं। लेकिन 2019 तक स्थिति बदल चुकी थी। लगातार प्रयास के बाद आखिरकार 23 साल बाद भाजपा यहां भगवा फहराने में सफल रही। भाजपा से सुब्रत पाठक ने सपा ही नहीं पूरे यादव कुनबे को चौंकाते हुए 12353 वोटों से मात दे दी।

जातिगत समीकरण की बात करें तो इस सीट पर हमेशा से मुस्लिम और यादव वोटबैंक का दबदबा रहा है। दोनों का वोट प्रतिशत 16-16 फीसदी के करीब है। वहीं उसके बाद ब्राह्मण मतदाता हैं, जिनकी 15 फीसदी हिस्सेदारी है। राजपूत यहां 10 फीसदी के करीब हैं और अन्य जातियां कुल मिलाकर 39 फीसदी हैं, जिनमें गैर यादव पिछड़ी जातियां और दलित शामिल हैं। वैसे तो मुस्लिम यादव वोटबैंक हर चुनाव में अपना असर डालता रहा। लेकिन 2019 के लाेकसभा चुनाव में भाजपा ने अन्य जातियों के वोटबैंक में तगड़ी सेंध लगा दी। सुब्रत पाठक की जीत में इसी अन्य फैक्टर ने विशेष योगदान दिया। अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी ऐसा होगा? हालांकि टिकट अभी फाइनल नहीं हुआ है।

जानकारों के अनुसार कन्नौज सीट पर अखिलेश यादव ने पिछले काफी समय से ध्यान लगाया है। यहां वह वोटरों से सीधे संपर्क के साथ ही अपनी पीडीए रणनीति के तहत वोटरों को जोड़ने के प्रयास में हैं। वह सांसद सुब्रत पाठक पर भी लगातार हमलावर रहे हैं। दोनों तरफ से तल्ख बयानबाजियों के कई दौर चल चुके हैं। यहां भाजपा मजबूत जरूर है लेकिन अखिलेश यादव की छवि बड़ी चुनौती साबित होगी। जानकार ये भी कहते हैं कि रणनीति के लिहाज से हो सकता है भाजपा यहां से टिकट बदल भी सकती है। वैसे भाजपा के लिए इस सीट पर एक अन्य बड़ा पहलू भी पक्ष में दिख रहा है। दरअसल कन्नौज लोकसभा के तहत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों मे भी भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। कन्नौज लोकसभाा क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें छिबरामऊ से अर्चना पांडेय, तिर्वा से कैलाश राजपूत, सदर सुरक्षित सीट से असीम अरुण हैं। एक सीट कानपुर देहात की रसूलाबाद एससी भी है, जहां से भाजपा की पूनम संखवार विधायक हैं। वहीं एक सीट औरैया की बिधूना है, जहां से रेखा वर्मा सपा विधायक हैं।

होने वाले राज्यसभा चुनाव में किस पार्टी को होने वाला है सबसे ज्यादा फायदा?

आज हम आपको बताएंगे कि होने वाले राज्यसभा चुनाव में किस पार्टी को सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है! 27 फरवरी को राज्यसभा की खाली हो रही 56 सीटों के लिए चुनाव होंगे। बिहार, महाराष्ट्र में सियासी उलटफेर और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद नए समीकरण बन गए हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत के बाद ऐसी संभावना जताई गई कि राज्यसभा में बीजेपी को ज्यादा फायदा होगा। मगर ऐसा नहीं है। 15 राज्यों में मौजूदा विधायकों के आधार पर बीजेपी के सांसदों की संख्या में बड़ा बदलाव नहीं होगा। अप्रैल में बीजेपी के 28 राज्यसभा सांसद रिटायर होंगे, मगर इस चुनाव में भी 28 सीटें ही जीतेगी। एनडीए के सहयोगियों को 4 सीटें मिलेंगी। ऐसा ही कांग्रेस का है, तेलंगाना और हिमाचल जीतने के बाद भी वह सिर्फ 8 सीटें हासिल कर पाएगी, जबकि उसके 10 सांसद रिटायर हो रहे हैं। इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के खाते में 9 सीटें आएंगी। बाकी की 7 सीटों में से बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस के खाते में 3-3 सीट जाएगी। तेलंगाना में चुनाव हारने वाली बीआरएस को सिर्फ एक सीट से संतोष करना होगा। 238 सदस्यों वाली राज्यसभा में बीजेपी और एनडीए के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। एनडीए के पास 109 और इंडिया गठबंधन के पास 89 सीटें हैं। बाकी बची सीटें बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, टीडीपी, सपा, आरएलडी और बीआरएस के पास है। राज्यसभा में अभी बीजेपी के 93 और कांग्रेस के 30 सांसद हैं। तृणमूल कांग्रेस के पास 13, आम आदमी पार्टी और डीएमके के पास 10-10 सीटें हैं। बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस के 9 राज्यसभा सांसद हैं। अभी आरजेडी के 6 और बीआरएस के 7 सांसद हैं। अप्रैल में 56 सीटें खाली होने वाली है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा, अनिल बलूनी, मनसुख मंडाविया, प्रकाश जावेडकर, अश्विनी वैष्णव, भूपेंद्र यादव, वी मुरली धरन, नारायण राणे जैसे दिग्गज समेत पार्टी के 28 सांसद की विदाई होगी। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, इस बार पार्टी नए चेहरों को राज्यसभा भेज सकती है। केंद्रीय मंत्री रहे नेताओं को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारा जाएगा। कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी रिटायर होने वाले हैं। यह उनकी राजनीति की आखिरी पारी हो सकती है। इसके अलावा सपा सांसद जया बच्चन भी अप्रैल में रिटायर हो जाएंगी।

कर्नाटक और तेलंगाना में जीत हासिल करने के बाद भी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को दो सीटों का नुकसान होगा, जबकि भाजपा सदस्यों की संख्या उतनी ही रहेगी। सबसे बड़ा नुकसान के.चंद्रशेखर राव की पार्टी बीआएस को होगी। तेलंगाना चुनाव हारने के बाद अब दो सीटें कांग्रेस के खाते में चली जाएगी। यूपी विधानसभा में बेहतर प्रदर्शन के बाद भी बीजेपी को दो सीटों का नुकसान होगा। विधानसभा में बीजेपी के 255 सदस्य हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 312 सीटें मिली थीं। 2022 में बीजेपी ने 55 सीटें गंवा दी, जबकि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने कुल 111 सीटें जीतीं। सपा ने नई 64 सीटों पर कब्जा किया। इसका फायदा उसे राज्यसभा चुनाव में मिलेगा। यूपी से खाली हुई 10 सीटों में से 3 सपा और 7 बीजेपी के खाते में जाएगी। उत्तराखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ की एक-एक सीट बीजेपी के पास ही रहेगी।

नीतीश कुमार के पलटी मारने से बीजेपी को खास फायदा नहीं होगा। वहां खाली होने वाली 6 सीटों में से दो बीजेपी, दो आरजेडी, एक जेडी यू और एक कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। महाराष्ट्र में भी 6 सीटें खाली हो रही हैं, जहां महायुति में शामिल अजित पवार और एकनाथ शिंदे भी अपने गुट के लिए राज्यसभा सीट चाहते हैं। संख्या बल के आधार पर महायुति को 5 और कांग्रेस को एक सीट मिल सकती है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी फिलहाल इस चुनाव में बीजेपी को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खास फायदा नहीं होगा। मध्यप्रदेश में बीजेपी के चार सांसद रिटायर हो रहे हैं। इस चुनाव में वह चार लोगों को ही राज्यसभा भेज सकती है। एक सीट कांग्रेस के खाते में रहेगी। राजस्थान में भी दो बीजेपी और एक कांग्रेस सांसद रिटायर हो रहे हैं। यहां भी बीजेपी-कांग्रेस का रिजल्ट 2-1 ही रहेगा। पश्चिम बंगाल में खाली होने वाली पांच सीटों में चार पर टीएमसी और एक पर कांग्रेस काबिज थी। इस बार कांग्रेस को नुकसान होगा। पांचवीं सीट विधानसभा में विपक्षी दल बनी बीजेपी के पास ट्रांसफर हो गई है। विधानसभा चुनाव से पहले ओडिशा में बीजेडी को 3 राज्यसभा सीटों पर कब्जा करेगी। ऐसा ही आंध्र प्रदेश में होगा, जहां जगनमोहन रेड्डी अपने तीन समर्थकों को राज्यसभा भेजेंगे। हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस एक सांसद को चुनेगी।

क्या अखिलेश यादव भी छोड़ सकते हैं INDIA गठबंधन?

आने वाले समय में अखिलेश यादव भी INDIA गठबंधन छोड़ सकते हैं! इंडिया गठबंधन में सब ठीक नहीं है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में खुद को ‘अकेला’ कर चुकी हैं। अब नीतीश कुमार के भी एनडीए में जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस बड़े राजनीतिक उठा-पटक के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव पर सबकी नजरें हैं। उनके नीतीश कुमार पर दिए गए ताजा बयान के भी सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल अखिलेश यादव कई बार इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका पर अपनी निराशा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने साफ कह दिया कि नीतीश की पहल पर ये गठबंधन बना था लेकिन कांग्रेस ने इसे लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई। अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में रहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं चाहता हूं कि वह इसका हिस्सा बने रहें। दरअसल इंडिया गठबंधन का जब ऐलान हुआ तो यूपी से राष्ट्रीय लोकदल के साथ समाजवादी पार्टी इसमें शामिल हुई। लेकिन समय बीतने के साथ कांग्रेस और अखिलेश यादव में रिश्ते बिगड़ते चले गए। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनावों में सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी सबने देखी। फिर कांग्रेस का बसपा की तरफ ‘सॉफ्ट’ अप्रोच ने संतुलन और कठिन कर दिया। अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया कि अगर बसपा को गठबंधन में लाने की कवायद हाेती है तो समाजवादी पार्टी के लिए भी ऑप्शन खुले हैं। ताजा स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी में इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग फार्मूला भी तय नहीं हो पा रहा है। दरअसल कांग्रेस चाहती है कि यूपी में 2009 के उसके प्रदर्शन के आधार पर उसे सीटें दी जाएं, जबकि अखिलेश इस पर राजी नहीं हैं। सपा की तरफ से पहले ही संदेश दिया जा चुका है कि यूपी में सपा ही प्रमुख पार्टी है और जो भी सीटें दी जाएंगीं, वह सपा ही अपने पास से देगी।

दूसरी तरफ यूपी कांग्रेस का रुख भी समाजवादी पार्टी से अलग अपनी राह बनाने का दिख रहा है। एक तरफ प्रदेश भर में यात्राएं कर जनाधार मजबूत करने की कवायद चल रही है। वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में सरयू स्नान भी कर संदेश देने की कोशिश हुई। वहीं सपा और कांग्रेस के बीच भी दोनों ही तरफ से तल्ख बयानबाजी सामने आ चुकी हैं। हालांकि अखिलेश यादव सीधे-सीधे कुछ भी कहने से बचते रहे हैं। ताजे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन में सब ठीक नजर नहीं आ रहा। ममता बनर्जी पहले ही पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी का रुख भी पंजाब को लेकर ऐसा ही नजर आ रहा है। अब नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव भी अलग राह पकड़ेंगे?

दरअसल अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन की ताजा स्थिति का लेकर कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की पहल पर भी गठबंधन को बनाया गया था। लेकिन पहली बैठक में ही कांग्रेस ज्यादा तत्पर नहीं दिखी। गठबंधन में पीएम पद के लिए किसी का भी नंबर लग सकता है। नीतीश कुमार को बड़ा पद भी दिया जा सकता था, वह प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं अभी भी चाहता हूं कि वह गठबंधन का हिस्सा बने रहें। हालांकि अखिलेश यादव ने ये भी साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं। लेकिन यूपी में कांग्रेस के राहुल गांधी के साथ वह प्रचार करेंगे या नहीं इस पर उन्होंने बात समय पर छोड़ दी है।

पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि यूपी में इंडिया गठबंधन होता है तो अखिलेश के साथ आने से कांग्रेस को ही फायदा होगा। वर्तमान में सिर्फ रायबरेली ही उसके पास है। अमेठी भाजपा छीन चुकी है। समाजवादी पार्टी से सीट शेयरिंग होती है तो कहीं न कहीं कांग्रेस को उसके वोट बैंक का लाभ मिलेगा। वहीं अगर गठबंधन नहीं होता है तो कांग्रेस के लिए राहें आसान नहीं हैं। जमीन पर संगठन की उपस्थिति न के बराबर है। भाजपा का संगठन इस समय सबसे मजबूत स्थिति में है। रायबरेली में भी इस बार कांग्रेस के लिए आसान मुकाबला होने नहीं जा रहा। वहीं बसपा भी बेहद कमजोर स्थिति में है। सपा के साथ गठबंधन के चलते ही वह 2019 में 10 सीटें जीत सकी थी। बसपा का हाल ये है कि वह विधानसभा में सिर्फ एक विधायक लेकर खड़ी है। मुस्लिम मतदाता पिछले विधानसभा चुनावों में अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं कि वह सपा के ही साथ हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग की कमान अखिलेश यादव के पास ही है।

क्या समाजवादी पार्टी की चुनावी लिस्ट में शामिल होंगे अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग?

समाजवादी पार्टी की चुनावी लिस्ट में अब अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग शामिल होने वाले हैं! समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी कर दी है। पार्टी ने इस लिस्ट में 16 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है। सपा ने अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को मैनपुरी से चुनावी मैदान में उतारा है। सपा की लिस्ट में परिवार के साथ अखिलेश यादव के बताए गए पीडीए की झलक साफ दिखायी दे रही है। लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नए तरीके से कैडर को मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटी है। पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और दलित और अल्पसंख्यकों को साधने का फुल प्रूफ प्लान तैयार किया है। पिछले कुछ महीनों से अखिलेश यादव आए दिन अपनी रैलियों और सभाओं में इस बात का जिक्र करते नजर आते हैं कि पीडीए ही 2024 में बीजेपी को हराएंगे। वहीं जब सपा ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है तो उसमें पीडीए साफ नजर आ रहा है। 16 उम्मीदवारों की जो लिस्ट समाजवादी पार्टी ने जारी की है, उसमें 11 OBC, 1 मुस्लिम, 1 दलित, 1 ठाकुर, 1 टंडन और 1 खत्री। वहीं OBC उम्मीदवारों में देखें तो 4 कुर्मी, 3 यादव, 2 शाक्य, 1 निषाद और 1 पाल शामिल हैं। दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह यादव को सपा का वोट बैंक माना जाता है। इस समुदाय में भी बीजेपी ने सेंधमारी की है, जबकि, तीसरे बड़े जातीय वर्ग ब्राह्मणों का समर्थन मौजूदा दौर में बीजेपी के साथ रहा है। बाद में यह वोट बैंक बसपा और सपा का भी साथ दे चुका है।वहीं सपा ने अयोध्या लोकसभा सामान्य सीट पर दलित वर्ग के पासी प्रत्याशी को टिकट दिया।

अखिलेश यादव आए दिन अपनी रैलियों और सभाओं में इस बात का जिक्र करते नजर आते हैं कि पीडीए ही 2024 में बीजेपी को हराएंगे। हालांकि, वह अपनी सभाओं में अगड़े यानी बड़ी जाति, आधी आबादी यानि महिलाएं और आदिवासियों का भी जिक्र करते हैं। उनका खास फोकस पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों पर है। मुलायम सिंह के दौर में यादव-मुस्लिम समुदाय को समाजवादी पार्टी का कोर वोटर माना जाता था, लेकिन अब अखिलेश यादव इससे आगे बढ़कर पीडीए को साध रहे हैं। यूपी में सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनावों के लिए लिस्ट जारी की है 16 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया लेकिन इनमें से तीन उम्मीदवार तो अखिलेश के परिवार से ही हैं। इसमें डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव जैसे नाम शामिल हैं। मैनपुरी से डिंपल तो फिरोजाबाद से अक्षय, वहीं बदायूं से अक्षय को उतारा गया है। इसका मतलब यह है कि परिवार से तीन लोगों के नाम तो सपा की पहली ही लिस्ट में हैं।

राज्य की सबसे बड़ी हिन्दू आबादी जाटव को बसपा मायावती का कोर वोट बैंक समझा जाता रहा है। हाल के दो चुनावों में इसमें बड़े पैमाने पर सेंधमारी हुई है। हालांकि, दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह यादव को सपा का वोट बैंक माना जाता है। इस समुदाय में भी बीजेपी ने सेंधमारी की है, जबकि, तीसरे बड़े जातीय वर्ग ब्राह्मणों का समर्थन मौजूदा दौर में बीजेपी के साथ रहा है। बाद में यह वोट बैंक बसपा और सपा का भी साथ दे चुका है।

राज्य की सबसे बड़ी 19 फीसदी मुस्लिम आबादी का झुकाव सपा और बसपा के बीच घटता-बढ़ता रहा है। कभी यह कांग्रेस का कोर वोट बैंक हुआ करती थी लेकिन मुलायम सिंह यादव और मायावती ने अपने राजनीतिक पैंतरे से उसे तहस नहस कर दिया। सपा की लिस्ट में परिवार के साथ अखिलेश यादव के बताए गए पीडीए की झलक साफ दिखायी दे रही है। लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नए तरीके से कैडर को मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटी है। पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और दलित और अल्पसंख्यकों को साधने का फुल प्रूफ प्लान तैयार किया है।अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि मौजूदा सियासी परिस्थितियों में इस समुदाय का झुकाव उनकी पार्टी की तरफ है। बता दें कि जब सपा ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है तो उसमें पीडीए साफ नजर आ रहा है। 16 उम्मीदवारों की जो लिस्ट समाजवादी पार्टी ने जारी की है, उसमें 11 OBC, 1 मुस्लिम, 1 दलित, 1 ठाकुर, 1 टंडन और 1 खत्री। वहीं OBC उम्मीदवारों में देखें तो 4 कुर्मी, 3 यादव, 2 शाक्य, 1 निषाद और 1 पाल शामिल हैं। वहीं सपा ने अयोध्या लोकसभा सामान्य सीट पर दलित वर्ग के पासी प्रत्याशी को टिकट दिया। सपा प्रमुख का यह भी मानना है कि यादवों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियां, जो 2014 और 2019 में बीजेपी की तरफ चली गई थीं, भी उनकी तरफ आ गई हैं।