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क्या नीतीश कुमार के सहारे बीजेपी ने INDIA गठबंधन पर कर दिया है वार?

नीतीश कुमार के सहारे भाजपा ने INDIA गठबंधन पर वार कर दिया है! नशा चढ़ा जो शरीफी का उतार फेंका है, बेशरम रंग कहां देखा दुनिया वालों ने’। दीपिका पादुकोण पर फिल्माए गए गाने की ये लाइनें सियासी पर्दे पर नीतीश के किरदार के लिए एकदम फिट बैठती हैं। राजनीतिक शराफत का रंग तो उन्होंने बहुत पहले ही उतार फेंका था, अब वे अपने सियासी फायदे के लिए सारी हदों को पार कर चुके हैं। उन्हें ना अपने वोटरों की चिंता रही है और ना राजनीतिक शुचिता की। हालांकि जैसा कि उनके करीबी रहे, पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि राजनीति में दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं होते। भाजपा ने अपने घर में उनके लिए एक खिड़की जरूर खुली रखी थी, और इस बार नीतीश कुमार उस खिड़की के जरिये दाखिल होने में कामयाब हो गए। सत्ता की मलाई के लिए नीतीश कुमार कब और कितनी बार पलटी मार चुके हैं, शायद अब लोगों ने ये याद रखना भी छोड़ दिया है। उनको इस तरह की पलटियां मारते रहने की आदत सी पड़ गई है। खुद को समाजवाद का पुरोधा और सिद्धांतों की राजनीति करने का दंभ भरने वाले नीतीश राजनीति के अपने अवसान काल में तमाम रंग दिखा चुके हैं। जॉर्ज फर्नांडीज, जिसके सहारे वो राजनीति की सीढियां चढ़े, उनको भी अपमानित करने से नीतीश ने नहीं छोड़ा। वंशवाद को लेकर नीतीश भले लालू पर निशाना साधते रहे हों लेकिन लालू ने कभी अपनी राजनीतिक लाइन से उस तरह समझौता नहीं किया जिस तरह नीतीश बार-बार अपनी विचारधारा से पलटी मारते दिखे। सत्ता में बने रहने की मजबूरियां क्या-क्या नहीं करातीं, नीतीश को इतिहास उसके एक काले अध्याय के तौर पर याद करेगा। नीतीश खुद जिन कर्पूरी ठाकुर, राममनोहर लोहिया और जेपी के राजनीतिक अनुयायी होने का दावा करते हैं, वो आज अगर उनकी राजनीति को देख रहे होंगे तो शायद ही उन्हें अपने आसपास फटकने देते।

इस पूरे घटनाक्रम पर नीतीश से अलग हम भाजपा की रणनीति पर विचार करें तो भाजपा ने नीतीश के कंधे पर बंदूक रखकर इंडिया गठबंधन पर निशाना साधा है। मोदी और भाजपा के विरोध में इस गठबंधन के सूत्रधार को अपने पाले में करके भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। रफ्तार पकड़ने से पहले ही विपक्ष की धार को मंद कर दिया है। रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि जब उस गठबंधन का सूत्रधार ही उसके बारे में ऐसी बात कह रहा है तो ऐसे गठबंधन का भविष्य ही क्या है। इंडिया गठबंधन के जरिये नीतीश कुमार जहां खुद पीएम कैंडिडेट बनने का सपना पाले थे, अब उसी को पलीता लगाकर मोदी को ऐतिहासिक जीत दिलाने के लिए काम करेंगे।

2022 में नीतीश ने जब भाजपा से मुंह मोड़ा था, तो भाजपा नीतीश के प्रति सख्त थी और उसकी रणनीति थी कि बिहार में अपनी ताकत बढ़ाकर अपने दम पर ही अपनी ही सरकार बनाई जाए। लेकिन बावजूद इसके नीतीश के साथ एक बार फिर जाने के पीछे की बड़ी वजह, एक बड़ा सियासी संदेश देना भी है। मोदी के विरोध में बने गठबंधन के सूत्रधार, जिसकी पहली बैठक उन्हीं की अगुवाई में पटना में आयोजित की गई थी, उसी को अपने पाले में करके मोदी के राजनीतिक विरोधियों पर एक नैतिक जीत की तरह दिखाया जाएगा। नीतीश के मुंह से निकली बातों को इंडिया गठबंधन के खिलाफ प्रचार का हथियार बनाया जाएगा।

मोदी के नेतृत्व में संघ परिवार अपने सभी प्रमुख मुद्दे जैसे राम मंदिर, धारा-370 सुलझाने के बाद अब उन्हें 400 सीटों के साथ हैट्रिक लगाकर ऐतिहासिक विदाई देना चाहता है। बता दें कि मोदी और भाजपा के विरोध में इस गठबंधन के सूत्रधार को अपने पाले में करके भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। रफ्तार पकड़ने से पहले ही विपक्ष की धार को मंद कर दिया है। रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि जब उस गठबंधन का सूत्रधार ही उसके बारे में ऐसी बात कह रहा है तो ऐसे गठबंधन का भविष्य ही क्या है। इंडिया गठबंधन के जरिये नीतीश कुमार जहां खुद पीएम कैंडिडेट बनने का सपना पाले थे, अब उसी को पलीता लगाकर मोदी को ऐतिहासिक जीत दिलाने के लिए काम करेंगे। संघ परिवार उन्हें एक ऐसे गैरकांग्रेसी पीएम की तरह खड़ा करना चाहता है जो नेहरू के बरख्स और उनसे भी बड़ा दिख सके। इंडिया गठबंधन भाजपा के इस लक्ष्य में सबसे बड़ी बाधा बनता दिख रहा था। इस गठबंधन के प्रमुख किरदार को अपने पाले में करके भाजपा ने अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में पहला कदम बड़ा दिया है।

नीतीश कुमार के हटने के बाद INDIA गठबंधन का क्या होगा नया रुख?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि नीतीश कुमार के हटने के बाद INDIA गठबंधन का नया रुख क्या होगा! लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के I.N.D.I.A गठबंधन के लिए एक के बाद एक बुरी खबर आ रही है। बंगाल में ममता बनर्जी और पंजाब में AAP पहले ही लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने की बात कर चुके हैं। ऐसे में नीतीश कुमार ने आज एनडीए का दामन थामकर इंडिया गठबंधन को बहुत बड़ा झटका दे दिया है। जेडीयू ने बिहार में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के टूटने के लिए कांग्रेस की हठ और अहंकार को जिम्मेदार ठहराया है। जेडीयू ने कहा कि कांग्रेस नेता अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे थे, विपक्षी गठबंधन को नहीं। नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें ‘इंडिया’ और ‘महागठबंधन’ में चीजें ठीक नहीं लग रही थीं, इसलिए उन्होंने बीजेपी के साथ नया गठबंधन और नई सरकार बनाने का निर्णय लिया। हालांकि यूपी से इंडिया गठबंधन के लिए राहत की खबर है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 11 सीट देने की घोषणा की है। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने कहा कि कांग्रेस के भीतर का एक गुट ‘इंडिया’ गठबंधन का नेतृत्व हथियाना चाहता था और साजिश के तहत मल्लिकार्जुन खरगे का नाम गठबंधन के अध्यक्ष के तौर पर प्रस्तावित किया गया। इस महीने की शुरुआत में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में खरगे के बारे में लिए गए निर्णय से जेडीयू को झटका लगा था। उधर कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बता दिया तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट तक कह दिया। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने की जगह इंडिया गठबंधन के वजूद को बचाना कांग्रेस के लिए चुनौती बन गया है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उन दावों को खारिज कर दिया कि नीतीश कुमार के बाहर निकलने से विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ कमजोर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे गठबंधन केवल मजबूत होगा, जैसा कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी कहा है। उन्होंने कहा, ‘कुछ दिनों तक सुर्खियों में रहने के अलावा इसका कोई असर नहीं होगा। अगर बीजेपी की सरकार बरकरार रहती है तो हमारे देश-भारत का भविष्य दांव पर है, लेकिन विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का भविष्य दांव पर नहीं है।’ ‘इंडिया’ के गठन में कुमार की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रमेश ने पिछले वर्ष 23 जून को कुमार द्वारा बुलाई गई 18 विपक्षी दलों की बैठक का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की यात्रा 23 जून को पटना से शुरू हुई थी और जिस व्यक्ति ने इस यात्रा को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसने ही धोखा दे दिया। हमें नहीं पता कि उनकी राजनीतिक मजबूरियां क्या थीं, लेकिन बिहार के लोग उन्हें और बीजेपी को करारा जवाब देंगे।’

जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश में खुद को डुबो दिया जिसमें कोई योग्यता नहीं है और विपक्षी गठबंधन को नुकसान पहुंचाता है। माना जा रहा है कि उनका निशाना राहुल गांधी पर था। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने कहा कांग्रेस ने उन राज्यों में कभी सहयोगियों की मदद नहीं की जहां उसकी स्थिति मजबूत है। त्यागी ने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस का एक धड़ा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को हड़पना चाहता है और 19 दिसंबर को अशोका होटल में हुई गठबंधन की बैठक में एक साजिश के तहत गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए मल्लिकार्जुन खरगे का नाम सुझाया गया, जबकि इससे पहले मुंबई की बैठक में सर्वसम्मति से यह तय हुआ था कि यह गठबंधन किसी भी नेता का चेहरा आगे रखे बिना ही काम करेगा।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और पाला बदलने के लिए नीतीश कुमार की आलोचना करते हुए उन्हें विश्वासघात करने में माहिर करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी गठबंधन इंडिया बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला ही उसे ‘धोखा देकर’ एनडीए में शामिल हो रहा है। रमेश ने टिप्पणी की कि राजनीतिक रंग बदलने की कुमार की प्रवृत्ति गिरगिट को भी मात देती है। उन्होंने कहा कि बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल सोमवार को राज्य में प्रवेश करने वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ से ध्यान भटकाने की एक रणनीति है। उन्होंने कहा, ‘बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का इस्तीफा बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि वह समय-समय पर राजनीतिक रंग बदलते रहे हैं और रंग बदलने में तो वह गिरगिटों को भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं। बिहार की जनता उन्हें और उनके इस कदम के लिए जिम्मेदार दिल्ली में बैठे लोगों को करारा जवाब देगी।’ रमेश ने कहा कि यह स्पष्ट है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ से ध्यान भटकाने के लिए बीजेपी ने यह ‘राजनीतिक नाटक’ रचा है।

चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को बड़ा झटका देते हुए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ममता ने कहा है कि वह बंगाल में अकेली चुनाव लड़ेंगी। ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस को दो सीटें देने को कहा था लेकिन अब ममता ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को एक भी सीट नहीं देंगी। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटे हैं और ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर एकला चलो के साथ आगे बढ़ गई हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के गढ़ बीरभूम जिले में ममता बनर्जी ने एक बंद कमरे में संगठनात्मक बैठक की। इस दौरान ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं से अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कहा है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि वह बंगाल में सीटों के बंटवारे का मसला सुलझा लेगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी पंजाब में लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया है। भगवंत मान ने कहा कि वो पंजाब की 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेंगे। वो किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। पंजाब में आप 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। हम समझौता नहीं करेंगे। ममता बनर्जी का अपना फैसला है और हमारा अपना। भगवंत मान ने कहा कि हमने 40 उम्मीदवारों की लिस्ट बना ली है। इन्हीं 40 में से 13 उम्मीदवारों को शार्ट लिस्ट किया जाएगा। भगवंत ने वहीं पंजाब की 13 जीतने का दावा किया। भगवंत मान ने कहा कि इस बार पंजाब में 13-0 से जीतेगी।

एनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। तब इसमें बीजेपी, जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी एलजेपी शामिल थीं। अब नीतीश कुमार वापस एनडीए में आ गए हैं तो बीजेपी की बिहार में वही प्रदर्शन दोहराने की उम्‍मीद बढ़ गई है। बीजेपी के लिहाज से यह एक और कारण से अहम है। भगवा पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 का आंकड़ा पार करने का टारगेट सेट किया है। बिहार में पिछला प्रदर्शन दोहराए बगैर यह लक्ष्‍य हासिल कर पाना मुश्किल होगा।

नीतीश कुमार की पलटी पर क्या बोले राजनेता?

वर्तमान में नीतीश कुमार की पलटी पर राजनेताओं के बयान सामने आ रहे हैं! लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार पलटी मारकर एक बार फिर एनडीए के खेमे में चले गए हैं। नीतीश कुमार की उलट पुलट की राजनीति से इंडिया गठबंधन के नेताओं में काफी नाराजगी है। वहीं इंडिया गठबंधन में जो राजनीतिक दल शामिल नहीं है, वह नीतीश की पलटी पर जमकर मजे ले रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को ठेंगा दिखाकर इंडिया गठबंधन की अबतक तैयारियों पर पानी फेर दिया है। नीतीश कुमार की इस हरकत से बेहद नाराज कांग्रेस ने उन्हें ‘आया राम-गया राम’ कहा है। साथ ही नीतीश की तुलना गिरगिट से की है। वहीं आरजेडी ने भी नीतीश को ‘थका हुआ नेता’ बोलकर अपने दिल की भड़ास निकाली है। आइए जानते हैं नीतीश को लेकर राजनीतिक दलों का क्या प्रतिक्रिया है। तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार पाला बदलने के लिए JDU के अध्यक्ष नीतीश कुमार की आलोचना की। TMC ने कहा कि लोग ऐसी अवसरवादिता का माकूल जवाब देंगे। पार्टी के सांसद सौगत रॉय ने कहा, ‘नीतीश कुमार नियमित अंतराल पर पाला बदलने के लिए जाने जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने विपक्षी गठबंधन को छोड़ने का फैसला किया है। यह गठबंधन के लिए कोई झटका नहीं है। एक अन्य TMC नेता ने नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘पाला बदलने के उनके इतिहास के कारण ही तृणमूल हमेशा उनकी विश्वसनीयता को लेकर आशंकित रहती थी, लेकिन कांग्रेस ने कुमार को बहुत विश्वसनीय साझेदार माना।’ बंगाल सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम ने भरोसा जताया कि आगामी लोकसभा चुनावों में BJP को हराने में विपक्षी गठबंधन सफल होगा। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन के रचनाकारों में से एक हैं और यह गठबंधन संसदीय चुनावों में BJP को हरा देगा।

तमिलनाडु में सत्तासीन DMK ने कहा कि ‌नीतीश कुमार का I.N.D.I.A. से निकल जाना BJP के लिए नुकसानदेह और विपक्षी गठबंधन के लिए फायदेमंद है। DMK प्रवक्ता जे. कांस्टेडाइन रवींद्रन ने कहा, ‘लोग इस विश्वासघात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। लोग सही वक्त पर नीतीश कुमार को सबक सिखाएंगे। पार्टी के नेता टी. आर. बालू ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि केवल हिंदी बोली जानी चाहिए और हमने I.N.D.I.A. के लिए इसे सहन किया। उधर झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि नीतीश कुमार का इस्तीफा अपेक्षित था, क्योंकि विश्वासघात उनका राजनीतिक चरित्र रहा है। NCP शरद पवार गुट ने कहा कि नीतीश कुमार को राजनीतिक इतिहास में महान पलटू राम के रूप में याद किया जाएगा। पार्टी ने BJP को नीतीश कुमार का मदारी करार दिया और कहा कि वह उसके आदेशों पर कूदना पसंद करते हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने फेसबुक पर तीखी टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया कि कुमार जिनका मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल रहा है उन्हें RSS-‌BJP अपने मोहरे के रूप में इस्तेमाल करेंगे।

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता ने कहा है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव में भाजपा का मुकाबला करने के लिए गठबंधन मॉडल रखा है और दूसरों को भी इसका पालन करना चाहिए। यह बयान जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद आया। रविवार को इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने कहा, ‘जो चुनाव होने जा रहे हैं वह हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को बचाने के लिए हैं। हमारी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कांग्रेस और आरएलडी के साथ सीट बंटवारे की घोषणा करके एक मॉडल पेश किया है। कांग्रेस के साथ दूसरे दौर की बातचीत जारी है। बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए सभी को इसका पालन करना चाहिए। अखिलेश यादव ने शनिवार को घोषणा की थी कि उत्तर प्रदेश में 11 मजबूत लोकसभा सीटों के साथ कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी का गठबंधन अच्छी शुरुआत है।

कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बता दिया तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट तक कहा। खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बताते हुए यहां तक कह दिया, ‘देश में ‘आया राम-गया राम’ जैसे कई लोग हैं। पहले वो और हम मिलकर लड़ रहे थे। जब मैंने लालू यादव और तेजस्वी यादव से बात की तो उन्होंने भी कहा कि नीतीश जा रहे हैं। अगर वह रुकना चाहते तो रुक जाते लेकिन वह जाना चाहते हैं, इसलिए ये बात हमें पहले से ही पता थी, लेकिन इंडिया गठबंधन को बरकरार रखने के लिए हमने कुछ नहीं कहा।’ वहीं जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट बताते हुए एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘बार-बार राजनीतिक साझेदार बदलने वाले नीतीश कुमार रंग बदलने में गिरगिटों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इस विश्वासघात के विशेषज्ञ और उन्हें इशारों पर नचाने वालों को बिहार की जनता माफ़ नहीं करेगी। बिलकुल साफ़ है कि भारत जोड़ो न्याय यात्रा से प्रधानमंत्री और भाजपा घबराए हुए हैं और उससे ध्यान हटाने के लिए यह राजनीतिक ड्रामा रचा गया है।’

क्या बीजेपी ने बिगाड़ दिया है विपक्ष का MY समीकरण?

वर्तमान में भाजपा ने विपक्ष का MY समीकरण बिगाड़ कर रख दिया है! लोकसभा चुनाव से पहले ही बीजेपी ने बिहार में खेला कर दिया। बीजेपी ने महीनों तक इस बात पर जोर दिया कि उसने जेडीयू के लिए दरवाजा बंद कर दिया है। हालांकि, इसके बाद भगवा खेमे ने कई जोड़-घटाव लगाने के बाद आखिरकार अपना मन बदल ही लिया है। इस निर्णय के पीछे बिहार में 40 लोकसभा सीटें और इंडिया गुट को कमजोर करने की दोहरी नीति थी।। नीतीश के एनडीए के साथ आने से, सामाजिक समीकरण एनडीए के पक्ष में होने की संभावना बन रही हैं। इसमें गैर-यादव ओबीसी, उच्च जाति, अति पिछड़ा वर्ग, पासवान, मुसहर और अन्य दलित समुदायों का एक विशाल संयोजन, प्रतिद्वंद्वी गठबंधन की तुलना में अधिक दुर्जेय दिखता है। दूसरी ओर, नीतीश का जाना इंडिया गठबंधन को बिहार में केवल मुस्लिम-यादव संयोजन तक सीमित कर देता है। कई लोगों के लिए, बीजेपी का यह कदम कई दशकों तक जाति की राजनीति की निंदा करने के बाद अचानक कांग्रेस की ओर बढ़ने के लिए उससे बदला लेने का प्रतीक है। जैसे ही बीजेपी पुनर्मिलन के लिए निशाने पर आई, उसके सदस्यों ने स्वीकार किया कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनावों की परिणाम को दोहराने की उम्मीद है। उस समय एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीती थी। अब एनडीए की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि आगामी चुनाव में बिहार में क्लीन स्वीप होगा। शनिवार को पटना में मौजूद भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा ने कहा कि यह खुशी की बात है कि नीतीश एनडीए में लौट आए हैं। उन्होंने कहा कि जेडीयू और बीजेपी का स्वाभाविक गठबंधन है। उन्होंने कहा कि जब भी एनडीए ने सरकार का नेतृत्व किया, राज्य समृद्ध हुआ है।

बीजेपी की इस रणनीति के पीछे बिहार में 40 लोकसभा सीटों पर जीत, विपक्षी धड़े वाले इंडिया गठबंधन को कमजोर करना और कांग्रेस के जाति कार्ड को फेल करना है। ऐसा लगता है कि बीजेपी ने महीनों तक जोर देने के बाद नीतीश कुमार के साथ संबंधों को जोड़ने का मन बनाया है। इससे पहले बीजेपी ने एनडीए में उनकी वापसी के लिए दरवाजे बंद कर दिए थे। बीजेपी 2019 में बिहार से 17 लोकसभा सीटों के अपने स्कोर को बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी। पार्टी कम स्ट्राइक रेट के साथ भी उद्देश्य हासिल करने के लिए आशान्वित थी। उसे राजद और जद (यू) के प्रतिनिधित्व वाले सोशल इंजीनियरिंग वाले गठबंधन से होने वाले संभावित खतरे का अहसास था। बिहार के मतदाताओं में करीब एक तिहाई हिस्सेदारी रखने वाले मुसलमानों और यादवों पर राजद की पकड़ बरकरार है। जहां एक लोकप्रिय ओबीसी पीएम के रूप में पीएम नरेंद्र मोदी के उभरने से बीजेपी को मदद मिलती है, वहीं लगभग एक-चौथाई आबादी वाले सामाजिक समूह, अति पिछड़ी जातियों पर नीतीश का प्रभाव काफी कमजोर हो गया है। नीतीश के शामिल होने के बाद, सामाजिक समीकरण के एनडीए का पक्ष में आने की संभावना है। इसमें गैर-यादव ओबीसी, उच्च जाति, अति पिछड़ा वर्ग, पासवान, मुसहर और अन्य दलित समुदाय का एक विशाल संयोजन प्रतिद्वंद्वी गठबंधन की तुलना में अधिक मजबूत दिखते हैं।

ऐसे समय में जब इंडिया गठबंधन अपने ही अंतर्विरोधों के बोझ से जूझ रहा है, तो उसे झटका देने की इच्छा भी बीजेपी की रणनीति का हिस्सा थी। भले ही राहुल गांधी की न्याय यात्रा के बिहार आगमन की पूर्व संध्या पर सरकार गठन का समय महज एक संयोग था, लेकिन नीतीश के पाला बदलने ने इंडिया गठबंधन को बिहार के अधिकांश हिस्सों में मुस्लिम-यादव संयोजन तक सीमित कर दिया है। इसके अलावा एक चुनौती भी दे दी है। कई लोगों के लिए, यह कांग्रेस से इतने दशकों की निंदा करने के बाद अचानक जाति की राजनीति की ओर बढ़ने का बदला लेने का भी प्रतीक है। एनडीए की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि आगामी चुनाव में बिहार में क्लीन स्वीप होगा। शनिवार को पटना में मौजूद भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा ने कहा कि यह खुशी की बात है कि नीतीश एनडीए में लौट आए हैं। उन्होंने कहा कि जेडीयू और बीजेपी का स्वाभाविक गठबंधन है। उन्होंने कहा कि जब भी एनडीए ने सरकार का नेतृत्व किया, राज्य समृद्ध हुआ है।नीतीश की ‘सामाजिक न्याय’ की साख अधिक प्रभावशाली है। उन्होंने जाति की गणना करके और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% की सीमा का उल्लंघन करके ओबीसी/एमबीसी के लिए कोटा बढ़ाकर उन्हें और अधिक चमका दिया है।

क्या कांग्रेस के लिए गठबंधन करना मुश्किल होता जा रहा है?

वर्तमान में कांग्रेस के लिए गठबंधन करना मुश्किल होता जा रहा है! नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ ही इंडिया गठबंधन को अलविदा कह चुके हैं। विपक्षी गुट अब भी यह दावा कर रहा है कि नीतीश कुमार के बाहर निकलने से कोई नुकसान नहीं हुआ। विपक्षी गठबंधन को भरोसा था कि वह बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में बेहतर प्रदर्शन के जरिये 2019 में भाजपा वाली बढ़त को कम कर सकता था। हालांकि, नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद बीजेपी को इसका अधिक फायदा मिलने की उम्मीद है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी में भी इंडिया गुट को झटका दे दिया है। ममता बनर्जी ने घोषणा की है कि तृणमूल अकेले चुनाव लड़ेगी, वहीं कांग्रेस ने महाराष्ट्र में उद्धव की शिवसेना के साथ बने रहने की उम्मीद जताई है। इसमें बहुजन विकास अघाड़ी में शामिल होने की संभावना है। नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ गठबंधन विपक्षी गठबंधन अयोध्या की पृष्ठभूमि में होने वाले कठिन लोकसभा चुनावों के लिए सड़क पर उतरने की उम्मीद कर रहा था। इस बीच विपक्षी गठबंधन के लिए नए सिरे से संकट पैदा हो गया है। इस बीच विपक्षी धड़े वाले इंडिया गठबंधन के भीतर अन्य सहयोगियों के बीच तालमेल नहीं बनने पर अभी स्थिति और गंभीर हो सकती है।

कांग्रेस ने नीतीश कुमार के लिए ‘गिरगिट’ और ‘गद्दार’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया। वहीं, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने ‘अविश्वसनीय’ कुमार के भाजपा के पाले में जाने बारे में जानकारी दी थी। विपक्ष ने बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल को ऐसे राज्यों के रूप में देखा है जहां महागठबंधन 2019 में बीजेपी की सीटों को काफी हद तक कम कर सकता है। नीतीश के जाने से बीजेपी को फायदा मिलना तय माना जा रहा है। पर्यवेक्षकों ने एक पैटर्न का अनुमान लगाया है कि बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगियों को वापस लाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ सूत्रों ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ बने रहने पर विश्वास व्यक्त करके चिंताओं को कम कर दिया है। एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि 48 में से 37 सीटों पर फैसला हो चुका है। मुंबई और मराठवाड़ा में कुछ सीटों पर फैसला होना बाकी है। शहर में सेना के पारंपरिक दावे और कांग्रेस के वहां जीतने के अपने इतिहास को देखते हुए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है। गठबंधन में प्रकाश अंबेडकर की बहुजन विकास अघाड़ी को शामिल करने की उम्मीद के साथ समझौते को कागज पर अंतिम रूप देने के लिए 30 जनवरी को सहयोगियों की बैठक महत्वपूर्ण है।

हालांकि, मुख्य चिंता पश्चिम बंगाल बनी हुई है। यहां कांग्रेस अपने पुराने सहयोगी वाम गुट को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस के लिए तैयार है, लेकिन बाद में उसने अब अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है। कांग्रेस नेताओं ने भरोसा जताया कि ममता बनर्जी नरम पड़ जाएंगी। साथ ही स्थानीय इकाई की तरफ से पैदा की गई उलझनों के कारण ही सख्त रुख अपना रही हैं। भले ही बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों के बीच समझौता है, लेकिन इच्छा के बावजूद सहयोगी दल बदलने में कांग्रेस की विफलता बिहार में पुनर्गठन की पृष्ठभूमि में एक गंभीर झटका के रूप में सामने आएगी। कांग्रेस इसके परिणामों को भलीभांति जानती है।

बिहार के झटके को कम करने के लिए, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने शनिवार को पटना में हुए हंगामे के साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए 11 सीटों की घोषणा की। इसका मकसद इंडिया गठबंधन की चिंताओं को दूर करने और इसकी एकजुटता का संदेश देने के लिए था। सपा ने पहले ही जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी से डील पक्की कर ली है। एसपी ने रविवार को कहा कि कांग्रेस के साथ दूसरे दौर की बातचीत चल रही है। इससे हिस्सेदारी में संभावित बढ़ोतरी का संकेत मिल रहा है। कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि पूर्व सीएम अशोक गहलोत के नेतृत्व में चर्चा सीटवार है। लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि आरएलडी ने ज्यादा सीटें मांगी हैं।

कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि झारखंड में 14 में से 13 सीटें फाइनल हो चुकी हैं। तमिलनाडु गठबंधन ऑटो पायलट पर है। हालांकि, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली पर अभी तक कोई फाइनल नहीं हुआ है। एआईसीसी के एक प्रमुख पदाधिकारी ने कहा कि अगले सप्ताह से घोषणाएं आनी शुरू हो जाएंगी। इससे सभी संदेह दूर हो जाएंगे। हमें महाराष्ट्र को लेकर कोई चिंता नहीं है। हमें उम्मीद है कि टीएमसी भी हाथ मिला लेगी। इस बीच विपक्ष ‘मोदी सरकार की विफलता’, ‘जाति जनगणना’ और स्थानीय मुद्दों पर बिना समय बर्बाद किए एक ठोस रणनीति विकसित करना शुरू कर देगी।

क्या नीतीश कुमार के पलटने से विपक्ष बिखर गया है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नीतीश कुमार के पलटने से विपक्ष बिखरा है या नहीं! नीतीश कुमार वो मुख्यमंत्री हैं जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं जिससे दोबारा मुख्यमंत्री बन सकें। पिछले साल का जून महीना था, तारीख थी 23 । 2024 लोकसभा चुनाव के लिए पहला विपक्षी महाजुटान कराने के पीछे बिहार के सीएम नीतीश कुमार का भी हाथ था। इस बात को अब 7 महीने से ऊपर हो चुके हैं। इस बीच 5 बार एनडीए के खिलाफ तैयार विपक्षी गठबंधन ”इंडिया” की बैठकें हुईं। 4 बार फिजकल तो 1 बार वर्चुअल। लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ही लग रहा है कि ‘इंडिया’ बिखराव की ओर है। ताजा झटका विपक्षी ब्रिगेड को नीतीश के रूप में लगा है। उन्होंने एक बार फिर पाला बदल लिया है। नए गठबंधन से मोह भंग कर एनडीए में वापस आ गए हैं। एक घंटा पहले ही 9वीं बार बिहार के सीएम के रूप में शपथ ली। वही नीतीश जो कल तक कहते थे कि मर जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। खैर, राजनीति यही है और नीतीश इसके मझे हुए खिलाड़ी। वहीं, नीतीश कुमार से पहले ममता बनर्जी ने भी अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने ऐलान किया है। यही नहीं आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अकेले लोकसभा और हरियाणा में अकेले विधानसभा लड़ने वाली है। विपक्ष के लिए एक के बाद एक तीन झटकों ने उसे एनडीए के खिलाफ लड़ाई में कमजोर कर दिया है। बिहार में राजनीतिक घटनाक्रम ने भाजपा को फुल टॉस की तरह एक आसान मौका दे दिया है। ममता, केजरीवाल के ऐलान के बाद नीतीश का वापस एनडीए में जाने से बीजेपी के लिए 2024 की लड़ाई और आसान हो गई है। क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ सीट बंटवारे की व्यवस्था तक पहुंचने के लिए ‘इंडिया’ गुट के भीतर टकराव के बीच बिहार में उलटफेर हुआ है। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सीट बंटवारे की बातचीत के बीच कांग्रेस पर निशाना साधा है और राज्य में इस नए गठबंधन से लगभग दूरी बना ली है। उन्होंने कहा है कि टीएमसी अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी भी गठबंधन पर निर्णय चुनाव के बाद ही लिया जाएगा। कांग्रेस तब से डैमेज कंट्रोल में व्यस्त है और जोर देकर कहा है कि वे एक रास्ता खोजने के लिए काम कर रही है। पंजाब में सीटों के बंटवारे की बातचीत में भी बाधा आई है, जहां मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि AAP अकेले लड़ने की तैयारी कर रही है। हालिया बिहार घटनाक्रम का मतलब है कि भाजपा के लिए लाभ ज्यादा है। यह राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। नीतीश कुमार तो वैसे भी पाला बदलने के लिए जाने जाते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव के पहले उनका यह कदम भाजपा के साथ एनडीए को भी फायदा पहुंचाने वाला है।

नीतीश कुमार के इस्तीफे के कुछ ही समय बाद, उनके करीबी सहयोगी और जद यू के वरिष्ठ नेता के. सी. त्यागी ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए सबसे पुरानी पार्टी पर ‘इंडिया’ गुट को हाईजैक करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि जद यू को गठबंधन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, भले ही नीतीश कुमार विपक्षी ताकतों को एक साथ लाने के लिए सबसे आगे थे। केसी त्यागी ने कहा कि भाजपा की अजेय चुनाव मशीनरी का मुकाबला करने के लिए जिस तरह की तैयारी की आवश्यकता है, वह बड़े चुनाव से महीनों पहले भी कहीं नहीं देखी गई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस अपने गढ़ों में सहयोगियों को चुनाव लड़ने देने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन वह अन्य विपक्षी दलों के प्रभुत्व वाले राज्यों में अधिक सीटों के लिए जोर देती रही। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है और अब यह क्षेत्रीय ताकतों को खत्म करना चाहती है।’ उन्होंने सीट बंटवारे की व्यवस्था को अंतिम रूप देने में देरी को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना साधा।

जद (यू) नेता की टिप्पणी क्षेत्रीय दलों के बार-बार किए गए इस दावे के खिलाफ है कि उन्हें उनके गढ़ों में बड़ी भूमिका दी जानी चाहिए। भारत से जद (यू) के बाहर निकलने से कांग्रेस को और झटका लगेगा क्योंकि क्षेत्रीय दल बिहार के घटनाक्रम का इस्तेमाल सीट बंटवारे में भारी सौदेबाजी के लिए कर सकते हैं। त्यागी ने कहा, ‘कांग्रेस के अहंकार के कारण गठबंधन समाप्त हो गया है।’ उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की कि अन्य क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर हो जाएंगे।नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि राजनीति में ‘आया राम, गया राम जैसे कई लोग हैं और पार्टी को पता था कि ऐसा होगा।

जब से ‘इंडिया’ गठबंधन बना है, तब से भाजपा इस बात पर जोर दे रही है कि इतने सारे सहयोगियों का गठबंधन का अस्थिर होना तय है। भाजपा का कहना है कि ये सारी पार्टियां कई राज्यों में प्रतिद्वंद्वी भी हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि एनडीए ने देश में स्थिरता लाई है। भारत गुट के प्रमुख चेहरों में से एक सीएम नीतीश कुमार के गठबंधन से बाहर निकलने के साथ, विपक्षी गुट की अंतर्निहित अस्थिरता के बारे में भाजपा के दावों को विश्वसनीयता मिली है। जैसे-जैसे देश अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रहा है, वैसे-वैसे भाजपा अब प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे और एक सावधानीपूर्वक चुनाव मशीनरी से लैस एक अजेय ताकत के रूप में दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, ‘इंडिया’ ब्लॉक अभी भी अपने घर को व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

आखिर पटना में कितनी बार पलटी है राजनीति?

आज हम आपको बताएंगे कि पटना में कितनी बार राजनीति पलटी है! नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार की राजनीति का रीसेट बटन दबा दिया है। अब बड़ा सवाल उठता है कि आखिर राजनीति के मौसम वैज्ञानिक ने बीजेपी के साथ जाने का फैसला क्यों किया? और कैसे नीतीश के कारण राज्य के तीन मुख्य राजनीतिक किरदारों के समीकरण बदल जाएंगे? हर साल डेढ़ साल में पिछले करीब एक दशक से सरकार बदल जाती है लेकिन सीएम नीतीशे कुमार होते हैं। बिहार की राजनीति में ये पलटूमार राजनीति से किसे फायदा किसे नुकसान समझिए। नीतीश कुमार करीब दो दशक से बिहार के सीएम बने हुए हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने विकास पुरुष की छवि बनाई थी और हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के साथ चले थे। 2014 में नरेंद्र मोदी के उत्थान के बाद उन्होंने अपना रास्ता बदलना शुरू किया। कोई भी अकेली पार्टी बिना नीतीश के बहुमत के करीब नहीं पहुंच सकती थी। यही एक ऐसी बात थी जिसके बाद वो एक दशक से कम वक्त में अबतक चार बार पाला बदल चुके हैं।

लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नीतीश अपने रास्ते से भटक गए और बीजेपी तथा आरजेडी के साथ समझौता कर सरकार बनाते गए। इससे उनकी छवि को धक्का भी लगा। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी के बाद तीसरे नंबर पर रही थी। सीएसडीएस लोकनीति सर्वे के अनुसार, 2010 में करीब 60 फीसदी लोगों ने नीतीश कुमार को एक और कार्यकाल देने की वकालत की थी लेकिन जबकि 2020 में ये घटकर महज 36 फीसदी रह गया था। यही नहीं, सबसे ज्यादा मुश्किल चीज तो ये थी कि वे लोगों के सीएम के सबसे पसंदीदा चेहरा नहीं थे बल्कि उनके सामने तेजस्वी यादव खड़े हो गए थे। इसके अलावा नीतीश को सवर्णों और अल्पसंख्यकों के समर्थन का भी नुकसान हुआ था। लेकिन नीतीश स्विगं वोटरों के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे। इन वोटर्स में ईबीसी गैर यादव ओबीसी, कुर्मी, कुशवाहा और गैर पासवान दलित वोट शामिल थे।

JDU ने RJD के साथ मिलकर थोड़े समय के लिए जो सरकार बनाई थी, उससे हम क्या सीख सकते हैं? अगर सबकुछ ठीक चलता तो ये कोशिश थी एक ऐसा बीच का रास्ता बनाने की कोशिश की जाए जो लोगों को भरोसा दे सके। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि बिहार में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच तेजी से बन रहा दो ध्रुवीय राजनीतिक माहौल JDU के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका था। आसान शब्दों में कहें तो JDU ऐसा बीच का रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा है जो किसी को नाराज न करे और दोनों तरफ के लोगों को आकर्षित करे। लेकिन बिहार में राजनीति बहुत तेजी से दो गुटों में बंट रही है, एक तरफ हिंदुत्व समर्थक और दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के पक्षधर। अगर JDU इस माहौल में अपना वजूद बनाए रखना चाहती है तो उसे कुछ नया करना होगा।

RJD ने JDU के साथ सरकार बनाई तो JDU को नुकसान भी हुआ। क्योंकि RJD मुसलमानों और यादवों के सहारे अपने सामाजिक न्याय के वादे से JDU के वोट खींच सकता था। हालांकि RJD को JDU के मुकाबले तीन बड़े फायदे थे। पहला, मुसलमान और यादव, यानी बिहार की एक तिहाई आबादी, सीधे RJD को वोट देती है। दूसरा, RJD की विचारधारा सामाजिक न्याय पर टिकी है, वहीं JDU सोशल इंजीनियरिंग की बात करती है। तीसरा, तेजस्वी जैसा युवा नेता RJD को आगे ले जा सकते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि 2015 में आरजेडी JDU से वोट प्रतिशत के मामले में 2% आगे था, और 2020 में ये अंतर बढ़कर 8% हो गया था। जेडीयू अब ये दावा कर सकती है कि उसने आरजेडी के साथ गठबंधन में रहते हुए कई अहम उपलब्धियां हासिल कीं। खासकर जाति जनगणना और आरक्षण का कोटा बढ़ाना। इसके जरिए जेडीयू ने ईबीसी और दलितों में अपनी पकड़ को और मजबूत करने का काम किया। इसके अलावा नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ईबीसी नेता कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के बाद नीतीश ने पाला बदलने का पूरा प्लान एक्टिव कर दिया। इसके बदले में जेडीयू को राम मंदिर बनने के बाद बीजेपी के पक्ष में बनी हवा का फायदा तो मिलेगा ही साथ ही साथ वह अपनी लोकसभा सीटें बचाने में भी कामयाब हो सकते हैं।

इस पलटी के बाद ऐसा लगता है कि नीतीश ने आखिरकार प्रधानमंत्री बनने का सपना छोड़ दिया है। वो सोचते थे कि विपक्षी गठबंधन में संयोजक बनकर और त्रिशंकु संसद वाली स्थिति में वे अपनी अच्छी छवि का फायदा उठाकर पीएम बन सकते थे। हालांकि, इस बात की संभावना पहले से ही कम थी। असल में जेडीयू को नुकसान होने का खतरा ज्यादा था। अगर नीतीश कुमार के कमजोर दिखने से जेडीयू को नुकसान होता। नीतीश के कमजोर होने से पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठते। इसके अलावा लोकसभा चुनाव बाद बीजेपी और आरजेडी दोनों से मोलभाव करने की उनकी ताकत कम हो सकती थी। इसलिए वो एकसाथ चुनाव कराने की जिद कर रहे थे।

बीजेपी के लिए बिहार सबसे फायदे का सौदा है। ये एक ऐसा राज्य था जहां एनडीए को लोकसभा चुनाव में बड़ा नुकसान उठाने की उम्मीद थी। एक साल पहले, पटना में विपक्षी पार्टियों की बैठक में कहा गया था कि वे ‘देश को रास्ता दिखाएंगे’। लेकिन अब, पहली बात- नीतीश के वापस आने से बिहार में एनडीए के पक्ष में हवा बदल गई है। दूसरी बात, जिस नेता ने एनडीए से खुद को अलग किया था, उसने ही कांग्रेस की न्याय यात्रा के पंख काट दिए हैं। बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल ये है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व के कारण पार्टी का बिहार में भगवा दल का कोई बड़ा नेता नहीं बन पाया। 20 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन पार्टी अपनी खुद की पहचान नहीं बना पा रही है और हर चीज में नीतीश कुमार पर निर्भर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में, जब जेडीयू और बीजेपी अलग-अलग लड़े थे, तो बीजेपी को ज्यादा ओबीसी और दलित वोट मिले थे। 2015 और 2022 में जेडीयू का आरजेडी के साथ गठबंधन का मुख्य कारण भी यह था कि अपने मुख्य वोटरों को बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी के नेतृत्व से बचाया जा सके।

जेडीयू के छिटकने के बाद आर आरजेडी के लिए मुश्किल बढ़ गई है। पार्टी अब चुनाव में जाति जनगणना के बाद ‘फॉरवर्ड बनाम बैकवर्ड’ की लड़ाई वाली रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाएगी, जैसाकि उसने 2015 के विधानसभा चुनाव में किया था। जेडीयू गैर यादव ओबीसी वोटर्स के लिए सोशल इंजीनियरिंग के जरिए आगे बढ़ती है। ये वोटर्स राज्य में कथित ‘यादव प्रभुत्व’ और ‘जंगल राज’ के लौटने के खौफ के कारण महागठबंधन से छिटकी रहती है। हालांकि, आरजेडी के लिए अभी भी मौका है। वह अब 2025 विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सकती है और सरकार विरोधी लहर का फायदा उठा सकती है। यही नहीं, विपक्ष में रहकर आरजेडी अपने कार्यकर्ताओं को तैयार कर सकती है। तेजस्वी यादव ने महागठबंदन की सरकार में अच्छा काम करके लोगों का भरोसा जीता होगा। लेकिन पूरे देश के चुनावों की बात करें तो, बिहार में एनडीए का गढ़ इतना मजबूत है कि आरजेडी-कांग्रेस का पार पाना मुश्किल लगता है।

आखिर किन-किन लोगों को मिलती है Z प्लस सिक्योरिटी?

आज हम आपको बताएंगे कि Z प्लस सिक्योरिटी किन-किन लोगों को मिलती है! केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनकी सुरक्षा की कैटेगरी बढ़ाकर ‘जेड प्लस’ कर दी गई है। राज्यपाल खान के खिलाफ केरल के कोल्लम जिले में शनिवार को स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। उनके ऐसा करने पर खान अपने वाहन से बाहर निकले। फिर प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़क किनारे एक दुकान के सामने बैठ गए। इस घटना के बाद ही उनकी सिक्‍योरिटी बढ़ाने का फैसला लिया गया। जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी का क्‍या मतलब होता है? किन-किन लोगों को यह मिली हुई है? इस पर क‍ितना खर्च आता है? आइए, यहां इन सवालों के जवाब जानते हैं। देश में Z+ सिक्‍योरिटी अव्‍वल मानी जाती है। यह सुरक्षा की सर्वोच्च श्रेणी है। Z+ सिक्‍योरिटी के तहत 10 से ज्यादा एनएसजी कमांडो और पुलिस कर्मी समेत 55 ट्रेंड जवान मिलते हैं। जिस किसी को यह सिक्‍योरिटी मिलती है, ये सभी कमांडो 24 घंटे उस व्यक्ति के चारों ओर पैनी नजर रखते हैं। सुरक्षा में तैनात हर कमांडो मार्शल आर्ट का स्पेशलिस्ट होता है। ये आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय वित्त मंत्री, मुकेश अंबानी और उनके परिवार, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जैसे कई शीर्ष गणमान्य व्यक्तियों को यह सिक्‍योरिटी कवर मिला हुआ है।खतरे के साथ सुरक्षा श्रेणी बढ़ती है। ऐसे में जाहिर है कि यह उन्‍हें मिलती है जिनकी जान को सबसे ज्‍यादा खतरा होता है। प्रधानमंत्री को मिलने वाले एसपीजी यानी स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप के बाद कह सकते हैं कि यह दूसरा सबसे सख्‍त कवर है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी उन लोगों में हैं जिन्‍हें जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी दी गई है। Z+ सुरक्षा पर एक व्‍यक्ति पर महीने में 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आता है।

इस सुरक्षा का खर्च केंद्रीय गृह मंत्रालय उठाता है। हालांकि, अंबानी परिवार का उदाहरण लें तो वही इसका खर्च उठाता है। खतरे के साथ सुरक्षा श्रेणी बढ़ती है। ऐसे में जाहिर है कि यह उन्‍हें मिलती है जिनकी जान को सबसे ज्‍यादा खतरा होता है। प्रधानमंत्री को मिलने वाले एसपीजी यानी स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप के बाद कह सकते हैं कि यह दूसरा सबसे सख्‍त कवर है। वहीं अगर बात राम मंदिर की करे तो अयोध्या में नव-निर्मित राम मंदिर में कल ही प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इससे पहले मंदिर परिसर की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिक्योरिटी, फेसिलिटी मैनेजमेंट और कैश लॉजिस्टिक कंपनी एसआईएस को सौंपी गई है। इस बात की घोषणा खुद कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर ऋतुराज सिन्हा ने की है। इस खबर के बाहर आते ही कंपनी के शेयर रॉकेट हो गए। कल बीएसई में इसके शेयर 10 फीसदी से भी ज्यादा चढ़ते हुए 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए।

एसआईएस की तरफ से यहां जारी एक बयान में बताया गया कि राम मंदिर ट्रस्ट अयोध्या ने एसआईएस को ऑफिशियल प्राइवेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में नियुक्त किया है। हालांकि जब वहां मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था, तभी से कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड वहां तैनात थे। मतलब कि वहां मई 2022 से कंपनी के जवान सुरक्षा व्यवस्था संभाले हुए हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जैसे कई शीर्ष गणमान्य व्यक्तियों को यह सिक्‍योरिटी कवर मिला हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी उन लोगों में हैं जिन्‍हें जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी दी गई है। Z+ सुरक्षा पर एक व्‍यक्ति पर महीने में 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आता है।लेकिन इस बात की औपचारिक घोषणा अभी की गई है। सिक्योरिटी गार्ड का आमतौर पर मतलब लगाया जाता है सिर्फ मैनपावर से। लेकिन अयोध्या में एसआईएस ने लेटेस्ट टेक्नोलोजी का उपयोग करने की योजना तैयार की है। कंपनी से मिली जानकारी के अनुसार उसने मंदिर परिसर में और उसके आसपास सुरक्षा जनशक्ति की तैनाती के अलावा, भीड़ प्रबंधन में शामिल कर्मियों के लिए बॉडी कैमरे, सीसीटीवी वीडियो के लिए एआई सहित श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ तकनीक भी तैनात की है। इसमें अपनी सहयोगी कंपनी StaqU का भी साथ लिया गया है। तभी तो वहां सीसीटीवी वीडियो एनालिटिक्स में एआई का उपयोग हो रहा है। इसी के साथ वहां कस्टमाइज्ड ट्रेनिंग डिलीवरी के लिए एमट्रेनर वैन भी तैनात किये गए हैं। इसके साथ ही MySIS ऐप से भी इसकी जानकारी ली जा सकेगी।

जानिए लालू यादव और मुलायम यादव की दोस्ती की कहानी!

आज हम आपको लालू यादव और मुलायम यादव की दोस्ती की कहानी सुनाने जा रहे हैं! देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की अपनी छाप रही है। मंडल आंदोलन के बाद इन दोनों नेताओं की साख देश भर में बढ़ी। यूपी से मुलायम और बिहार से लालू प्रसाद यादव गैर कांग्रेसी, गैर भाजपाई दलों की सबसे बड़ी आवाज बने। दोनों के बीच दोस्ती भी खूब रही। लेकिन दोस्ती निभाने की बारी आई तो मुलायम यहां लालू से आगे निकल गए। लालू प्रसाद यादव कई बार मुलायम सिंह यादव के सपनों के बीच आए। कई बार उन्हें झटके दिए। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुलायम हमेशा लालू के साथ खड़े ही नजर आए। 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर के सवाल पर बीजेपी से टकराव का फैसला कर लिया था, इसलिए एक तरफ समझौते से पीछे हटते हुए वीपी सिंह सरकार ने अधिग्रहण अध्यादेश वापस ले लिया। हेमंत शर्मा अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखते हैं कि दूसरी तरफ 23 अक्टूबर, 1990 की सुबह बिहार के समस्तीपुर में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी गई। उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया। आडवाणी को सरकारी जहाज से पहले दुमका ले जाया गया, फिर सड़क के रास्ते मंसानझोर डाक बंगले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कैद किया गया। बिहार पुलिस ने उनका रथ कब्जे में ले लिया। अब टकराव तय था। इधर उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार ने अयोध्या को सील कर रखा था। सभी जिलाधिकारियों को आदेश थे कि वे अपने-अपने जिले से निकलने वाले कारसेवकों को रोकें। राज्य की सीमा पर भी कारसेवकों को रोकने के पुख्ता इंतजाम थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने देवरिया से बिहार जाने वाले राजमार्ग पर सेवरही के पास 40 फीट चौड़ी खाई खुदवा दी थी, क्योंकि इसी रास्ते से आडवाणी की रथयात्रा को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना था।

वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए, पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना था। मुलायम सिंह यादव रथ रोकने वाले नेता बनते। वीपी सिंह को यह मंजूर नहीं था। अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पास ही न रहे। संकर्षण ठाकुर भी अपने किताब ‘बंधु बिहारी’ में लिखते हैं, राम रथ को रोकने की तार्किक जगह उत्तर प्रदेश ही होनी चाहिए थी, शांति और व्यवस्था के नाम पर। लेकिन प्रधानमंत्री वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं। दरअसल यूपी ही वीपी सिंह की भी कर्मभूमि थी और वो अपने लिए सियासी जमीन बचाए रखना चाहते थे। वीपी सिंह धर्मनिरपेक्षता का ताज मुलायम सिंह यादव को कतई नहीं देना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने लालू यादव को आडवाणी का रथ रोकने के लिए कहा। ये वही लालू यादव थे, जिन्हें कभी वीपी सिंह सीएम बनाने के खिलाफ थे। लालू ने मौके हाथ से जाने नहीं दिया। आडवाणी की गिरफ्तारी होने के बाद लालू ने वीपी सिंह को जानकारी दी। लालू अब तक देश की सियासत में धर्मनिरपेक्षता के मसीहा के तौर पर छा चुके थे।

ये पहला मौका नहीं था जब मुलायम को सियासत में अपने मित्र लालू प्रसाद यादव से तगड़ा झटका मिला था। 6 साल बाद 1996 में कांग्रेस सिर्फ 141 सीटें जीत सकी। अटल बिहारी वाजपेयी के अगुवाई में 161 सीटें जीतकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। सरकार बनाने का न्यौता भी मिला। लेकिन अटल सरकार सिर्फ 13 दिन ही चल सकी। इसके बाद नई सरकार को लेकर जोड़तोड़ शुरू हुआ। 141 सीटें जीतने वाली दूसरी सबसे बड़ी पार्टी गठबंधन सरकार बनाने के मूड में नहीं थी। तब वीपी सिंह का नाम सामने आया लेकिन उन्होंने बंगाल के सीएम ज्योति बसु का नाम आगे बढ़ाया। ज्योति बसु के नाम के प्रस्ताव को पोलित ब्यूरो ने नामंजूर कर दिया। अब सबकी निगाहें मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव पर आ टिकीं। लालू के खिलाफ चारा घोटाला चल रहा था लिहाजा वह पहले ही रेस से बाहर हो गए। वामदल के बड़े नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने मुलायम सिंह यादव के नाम की पैरवी की। माना जाने लगा कि मुलायम ही प्रधानमंत्री बनेंगे। शपथ ग्रहण की तैयारी भी हो गई थी। लेकिन अचानक लालू और शरद यादव ने अड़ंगा लगा दिया। इन्होंने मुलायम के नाम का विरोध कर दिया। मुलायम को जीवन भर इस बात का मलाल भी रहा। उन्होंने एक रैली में कहा था कि लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्रबाबू नायडू और वीपी सिंह के चलते वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।

तीन साल बाद एक बार फिर ऐसा ही मौका आया। 1999 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने संभल और कन्नौज से चुनाव जीता। उनका नाम दोबारा पीएम की रेस में आया लेकिन इस बार भी लालू, शरद आदि यादव नेताओं ने समर्थन नहीं दिया और एक बार फिर उनका सपना पूरा न हुआ। बाद में मुलायम ने अपनी जीत कन्नौज सीट बेटे अखिलेश यादव के छोड़ दी और अखिलेश पहली बार इस सीट से सांसद बने।

इतना सब होने के बाद भी दिलचस्प ये है कि मुलायम सिंह यादव राजनीति और व्यक्तिगत रिश्तों में विशेष संतुलन बनाने में माहिर थे। भले ही लालू से उन्हें कई बार बड़े सियासी झटके मिले, उनके सपने टूटे लेकिन दोस्ती बरकरार रही। यही दोस्ती बाद में रिश्तेदारी बनी और लालू की बेटी राजलक्ष्मी मुलायम के खानदान की बहू बनीं। उनके पोते तेज प्रताप यादव लालू के दामाद बने।

क्या अब INDIA गठबंधन से अखिलेश यादव भी होंगे दूर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब अखिलेश यादव भी INDIA गठबंधन से दूर होंगे या नहीं! इंडिया गठबंधन में सब ठीक नहीं है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में खुद को ‘अकेला’ कर चुकी हैं। अब नीतीश कुमार के भी एनडीए में जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस बड़े राजनीतिक उठा-पटक के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव पर सबकी नजरें हैं। उनके नीतीश कुमार पर दिए गए ताजा बयान के भी सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल अखिलेश यादव कई बार इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका पर अपनी निराशा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने साफ कह दिया कि नीतीश की पहल पर ये गठबंधन बना था लेकिन कांग्रेस ने इसे लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई। अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में रहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं चाहता हूं कि वह इसका हिस्सा बने रहें। दरअसल इंडिया गठबंधन का जब ऐलान हुआ तो यूपी से राष्ट्रीय लोकदल के साथ समाजवादी पार्टी इसमें शामिल हुई। लेकिन समय बीतने के साथ कांग्रेस और अखिलेश यादव में रिश्ते बिगड़ते चले गए। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनावों में सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी सबने देखी। फिर कांग्रेस का बसपा की तरफ ‘सॉफ्ट’ अप्रोच ने संतुलन और कठिन कर दिया। अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया कि अगर बसपा को गठबंधन में लाने की कवायद हाेती है तो समाजवादी पार्टी के लिए भी ऑप्शन खुले हैं। ताजा स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी में इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग फार्मूला भी तय नहीं हो पा रहा है। दरअसल कांग्रेस चाहती है कि यूपी में 2009 के उसके प्रदर्शन के आधार पर उसे सीटें दी जाएं, जबकि अखिलेश इस पर राजी नहीं हैं। सपा की तरफ से पहले ही संदेश दिया जा चुका है कि यूपी में सपा ही प्रमुख पार्टी है और जो भी सीटें दी जाएंगीं, वह सपा ही अपने पास से देगी।

दूसरी तरफ यूपी कांग्रेस का रुख भी समाजवादी पार्टी से अलग अपनी राह बनाने का दिख रहा है। एक तरफ प्रदेश भर में यात्राएं कर जनाधार मजबूत करने की कवायद चल रही है। वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में सरयू स्नान भी कर संदेश देने की कोशिश हुई। वहीं सपा और कांग्रेस के बीच भी दोनों ही तरफ से तल्ख बयानबाजी सामने आ चुकी हैं। हालांकि अखिलेश यादव सीधे-सीधे कुछ भी कहने से बचते रहे हैं। ताजे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन में सब ठीक नजर नहीं आ रहा। ममता बनर्जी पहले ही पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी का रुख भी पंजाब को लेकर ऐसा ही नजर आ रहा है। अब नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव भी अलग राह पकड़ेंगे?

दरअसल अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन की ताजा स्थिति का लेकर कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की पहल पर भी गठबंधन को बनाया गया था। लेकिन पहली बैठक में ही कांग्रेस ज्यादा तत्पर नहीं दिखी। गठबंधन में पीएम पद के लिए किसी का भी नंबर लग सकता है। नीतीश कुमार को बड़ा पद भी दिया जा सकता था, वह प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं अभी भी चाहता हूं कि वह गठबंधन का हिस्सा बने रहें। हालांकि अखिलेश यादव ने ये भी साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं। लेकिन यूपी में कांग्रेस के राहुल गांधी के साथ वह प्रचार करेंगे या नहीं इस पर उन्होंने बात समय पर छोड़ दी है।

पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि यूपी में इंडिया गठबंधन होता है तो अखिलेश के साथ आने से कांग्रेस को ही फायदा होगा। वर्तमान में सिर्फ रायबरेली ही उसके पास है। अमेठी भाजपा छीन चुकी है। समाजवादी पार्टी से सीट शेयरिंग होती है तो कहीं न कहीं कांग्रेस को उसके वोट बैंक का लाभ मिलेगा। वहीं अगर गठबंधन नहीं होता है तो कांग्रेस के लिए राहें आसान नहीं हैं। जमीन पर संगठन की उपस्थिति न के बराबर है। भाजपा का संगठन इस समय सबसे मजबूत स्थिति में है। रायबरेली में भी इस बार कांग्रेस के लिए आसान मुकाबला होने नहीं जा रहा। वहीं बसपा भी बेहद कमजोर स्थिति में है। सपा के साथ गठबंधन के चलते ही वह 2019 में 10 सीटें जीत सकी थी। बसपा का हाल ये है कि वह विधानसभा में सिर्फ एक विधायक लेकर खड़ी है। मुस्लिम मतदाता पिछले विधानसभा चुनावों में अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं कि वह सपा के ही साथ हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग की कमान अखिलेश यादव के पास ही है।