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जब मौका देख कर सियासी पलटवार करते हैं नीतीश कुमार!

नीतीश कुमार हमेशा से ही मौका देखकर सियासी पलटवार कर देते हैं! यह कहावत काफी चर्चित है- एक अनार, सौ बीमार। बिहार की राजनीतिक हालात में यह कहावत फिट बैठती है। नीतीश कुमार अनार की भूमिका में हैं, तो बीमार बन गए दो राजनीतिक दल- आरजेडी और बीजेपी। आरजेडी भी नीतीश के लिए उतनी ही बेताब है, जितनी बीजेपी। कभी बिहार में एकछत्र राज करने वाले आरजेडी को नीतीश की बैसाखी के बिना खड़ा हो पाना अब असंभव लगता है तो बीजेपी की हालत भी यही हो गई है। नीतीश भी इसे समझ रहे हैं। वह सियासत में अनार बनकर इतरा रहे हैं। अनार के बिना बिहार के सियासी दलों के पास सेहतमंद होने का कोई उपाय भी नहीं दिख रहा है। नीतीश कुमार भी अनार की औकात की वजह से अभी तक सब पर भारी पड़ते रहे हैं। नीतीश की पार्टी कभी अपने बूते सत्ता में नहीं आ पाई। हमेशा उसे दूसरे का सहारा ही लेना पड़ा। कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी नीतीश की पार्टी जेडीयू की चेरी बनते रहे। सर्वाधिक सीटें लाने के बावजूद किसी ने सरकार बनाने की कभी हिम्मत नहीं जुटाई। मोल-तोल करने का नैतिक साहस भी किसी ने नहीं जुटाया। कम सीटों के बावजूद किसी को कभी नीतीश को हड़काने-धमकाने का साहस नहीं हुआ। नीतीश कुमार इसी का फायदा उठाते रहे।

झारखंड में यह अजूबा जरूर हुआ कि एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को सभी दलों ने सीएम बना दिया। दूसरा अजूबा बिहार में नीतीश कुमार ही रहे हैं। सरकार बनाने के लिए 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 122 विधायकों का समर्थन जरूरी है। नीतीश की जेडीयू को कभी इतनी सीटें अकेले नहीं मिलीं, पर वे 18 साल से बिहार के सीएम बने हुए हैं। हद तो तब हो गई, जब 2020 में जेडीयू 43 विधायकों वाली पार्टी बन कर रह गई। फिर भी ताज नीतीश कुमार के सिर पर ही सजा। 80 विधायकों वाली बीजेपी या 79 विधायकों वाला आरजेडी पीछे छूट गए। कहते भी हैं- भाग्यवान का हल भूत भी जोतता है। नीतीश के भाग्य का ही यह कमाल है। भाग्य पर भरोसा नहीं करने वालों को भी इस पर भरोसा करना पड़ गया। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता रहा। नीतीश को ताकतवर दल भी समर्थन करते रहे। नीतीश भी अपनी इस ताकत को जानते हैं। तभी तो वे पल भर में मुंह फुला कर कभी आरजेडी से सट जाते हैं तो झटके में उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल भी फेंकते हैं। बीजेपी की मोनोपोली भी उन्हें रास नहीं आती। वे उसे भी काबू में रखते आए हैं। इसे उनका कौशल कहें या भाग्य का कमाल कि ऐसा ही पिछले 18 साल से होता रहा है।

नीतीश की जेडीयू विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी है। इसके बावजूद ऐंठ ऐसी कि बड़े-बड़े सूरमा उनका पानी भरते हैं। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद अपने को सियासत का धुरंधर मानते रहे हैं। अपने को किंगमेकर मानते रहे हैं। कभी किंग रहे लालू किंगमेकर की हालत में आ गए। अब तो उनसे यह रुतबा भी छीनता नजर आ रहा है। विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी और महागठबंधन बना कर सत्ता से कुछ ही कदम दूर रहने वाले लालू की हेकड़ी नीतीश ने खत्म कर दी है। अब वे भींगी बिल्ली की तरह नीतीश के आगे मिमिया रहे हैं।

बीजेपी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद नीतीश की चेरी बनने को मजबूर हो गई है। नीतीश को बीजेपी की जरूरत है, पर वे अपनी शर्तें उससे मनवा रहे। बिहार की सियासत के लिए नीतीश कुमार अपरिहार्य बन गए हैं। नौटंकी भी उन्हें खूब आती है। चार साल पहले उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान खुलेआम कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। तब वे बीजेपी के साथ थे। आरजेडी के साथ आए तो कह दिया कि अगला चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। अब आरजेडी को ही नीतीश ने पटखनी दे दी है। लालू गिड़गिड़ा रहे हैं तो बीजेपी उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन से खुश करने में लगी है कि उसके साथ आ जाएं। नीतीश की राजनीति के पराभव की भविष्याणी करने वालों की बोलती बंद हो गई है। बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान फेल हो गया है।

पहले रामविलास पासवान को लोग मौसम विज्ञानी कहते थे। पर, नीतीश ने साबित कर दिया है कि उनसे बढ़ कर कोई मौसम विज्ञानी नहीं। कब बीजेपी को साथ लेना है तो कब आरजेडी को पटा लेना है, उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। किसी को काबू में कैसे रखा जाए और कितनी उड़ान भरने की छूट दी जाए, यह नीतीश से बेहतर कोई नहीं जानता। स्वर्गवासी हो चुके जार्ज फर्नांडीज हों या शरद यादव हों, सबको उन्होंने साधा। अपने स्वजातीय आरसीपी सिंह और लव-कुश समीकरण के पुरोधा उपेंद्र कुशवाहा को साधा तो ललन सिंह को भी उन्होंने औकात बता दी। नीतीश किसके हैं और किसके रहेंगे, यह उनके अलावा कोई नहीं जानता। लालू भले उन्हें पलटू राम और आंत में दांत होने की बात कहते रहे, लेकिन आज उसी नीतीश के सामने उनकी औकात भींगी बिल्ली जैसी हो गई है।

आखिर एनडीए में क्यों शामिल हो गए नीतीश कुमार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि नीतीश कुमार एनडीए में फिर से शामिल क्यों हो गए! अगस्त, 2022 में राजधानी पटना में बिल्कुल आज ही की तरह नजारा था। मीडियाकर्मी राजभवन के बाहर राजेंद्र चौक पर डेरा जमाए हुए थे। नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद उन्होंने बताया कि बीजेपी उनकी पार्टी को तोड़ने में लगी थी। इसलिए उन्हें ये फैसला लेना पड़ा। नीतीश कुमार ने उसके बाद आरजेडी के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई। उन्होंने लोगों को ये एहसास दिलाया कि समाजवादी नेता और समाजवादी विचारधारा आगे बढ़नी चाहिए। इतना ही नहीं सत्ता संभालने के ठीक तीन महीने बाद नीतीश कुमार ने ये भी ऐलान कर दिया कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा। अब युवा ही नेतृत्व करेंगे। जनवरी, 2024 के 26 जनवरी के दिन गांधी मैदान में नीतीश कुमार तेजस्वी यादव से दूरी बनाते दिखे। दिन भर उनके पाला बदलने की अटकलें चलती रही। इस बीच आरजेडी राज्यसभा सांसद मनोज झा का सीधा बयान आया। उसके बाद जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार भी जवाब देने के मूड में आ गए। बिहार की राजनीति में स्टार्टिंग से जेडीयू हमेशा बीजेपी का बड़ा भाई बना रहा। जेडीयू की सीटें ज्यादा रही। जेडीयू हर तरीके से आगे रहा। समय के साथ जेडीयू का कुनबा पिछड़ गया। सीटें कम होती गईं। नीतीश कुमार इसलिए भी नाराज रहने लगे कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की सीटें 71 रही। 2020 के विधानसभा चुनाव में सीटों की संख्या मात्र 43 बाद में 45 पर आ गई। वहीं बीजेपी के सीटों की संख्या बढ़ती गई। 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें बढ़ कर 74 हो गईं। राजद के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बीजेपी हो गई। नीतीश कुमार ने लगे हाथों अपने सहयोगियों और गाहे बगाहे मीडिया से बातचीत में एक और बात बोलने लगे। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने साजिश करके चिराग पासवान के जरिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़ा करा दिया। इसकी दोषी बीजेपी है। जेडीयू ने वोट काटने का आरोप चिराग पासवान पर लगाया। बीजेपी पर प्रॉक्सी के रूप में काम करने का आरोप लगा। हालांकि, एलजेपी ने सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की।

अंदर की सूत्रों की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक नीतीश कुमार सरकार के निर्माण में बीजेपी की शर्तों से असहज रहे। नीतीश डिप्टी सीएम रेनू देवी और तारकिशोर प्रसाद को लेकर सहज महसूस नहीं करते थे। उनके साथ 13 साल तक डिप्टी सीएम रहे सुशील कुमार मोदी की तरह इन लोगों से उनका तालमेल अच्छा नहीं रहा। जेपी आंदोलन के जमाने से सुशील मोदी से नीतीश का रिश्ता है। दोनों के बीच की घनिष्टता किसी और नेता से ज्यादा है। उस वक्त जेडीयू के नेता आरसीपी सिंह, जो केंद्र में मंत्री थे। उनका उपयोग करके सुशील मोदी को हटा दिया गया। नीतीश कुमार सुशील मोदी के डिप्टी सीएम नहीं बनने से काफी असहज थे। सुशील मोदी हमेशा नीतीश कुमार की मंशा को समझते थे। सुशील मोदी बिहार बीजेपी के उन नेताओं पर लगाम लगाने में सफल हो जाते थे। जो नेता नीतीश के खिलाफ गलत बयानी करते थे। सुशील मोदी हमेशा नीतीश कुमार के पक्ष में खड़े रहते थे।

जेडीयू के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार के कांग्रेस, इंडिया गठबंधन और आरजेडी से मोहभंग होने के कई कारण हैं। इसका सबसे मुख्य कारण है वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में नीतीश द्वारा खुद को असहज महसूस किया जाना। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले जेडीयू के कम से कम सात सांसद बीजेपी के संपर्क में हैं। इन सभी सांसदों का मानना है कि 2019 में उन्हें जीत एनडीए के सामाजिक संयोजन और मेहनत की वजह से मिली। सांसदों को पता है कि आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर खड़े होने पर लोगों का ऐसा समर्थन नहीं मिलेगा। जेडीयू के ललन सिंह को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश नेता बीजेपी के साथ गठबंधन बनाने के पक्ष में थे। नीतीश कुमार को ये एहसास हो गया कि यदि उन्होंने कार्रवाई नहीं कि तो पार्टी विभाजित हो जाएगी। उसके बाद उन्होंने पिछले महीने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह की जगह खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। कहा जा रहा है कि ललन सिंह की लालू से बढ़ रही नजदीकी भी नीतीश कुमार को पसंद नहीं थी।

दूसरी तरफ जेडीयू ने अपना पिछला इतिहास देखा। जेडीयू 2019 में लोकसभा चुनावों में एनडीए के साथ लड़ी गई 17 सीटों में से 16 पर जीत हासिल की थी। पार्टी की ओर से एक आंतरिक सर्वेक्षण कराया गया। जिसका परिणाम उत्साहजनक नहीं आया। नीतीश कुमार ने अनुमान लगाया कि यदि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी जीत की संभावना देख रही है, तो इसमें हर्ज क्या है। उसके अलावा जेडीयू को ये भी महसूस हुआ कि अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन मोदी की लोकप्रियता को और आगे बढ़ा रहा है। लगे हाथों उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न भी दे दिया। मोदी की जीत में इन सबकी हिस्सेदारी ज्यादा होगी। इस वक्त बीजेपी के साथ रहकर इन सबका थोड़ा बहुत श्रेय भी लिया जा सकता है।

नीतीश कुमार ने बड़े अरमानों के साथ विपक्षी एकता की कवायद शुरू की थी। लेकिन वो सफल नहीं हुई। उन्हें इस गठबंधन में एक महत्वपूर्ण पद की उम्मीद थी। हुआ बिल्कुल उल्टा। इंडिया गठबंधन अपनी-डफली और अपनी राग बजाने लगा। टीएमसी और केजरीवाल की पार्टियों की बेचैनी ने ऐसा होने नहीं दिया। वे लोग अलग राग अलापने लगे। 2017 में महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश ने आरजेडी को इसका जिम्मेदार ठहराया था। इस बार कांग्रेस को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से अपनाया जा रहा अलग रास्ता भी विवाद का कारण बना है। राहुल गांधी द्वारा गठबंधन के बारे में बात करने के बजाय कांग्रेस की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की गई है। ये यात्रा बिल्कुल कांग्रेस की अपनी और अलग यात्रा है। इसलिए जेडीयू को अब महागठबंधन में रहने का कोई कारण नजर नहीं आया। इंडिया गठबंधन एकजुट रहने और मोदी को जवाब देने में पूरी तरह विफल रहा। वैसे में नीतीश ने अपनी पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक व्यवहारिक निर्णय लिया है। जिसका सियासी गलियारों में स्वागत भी हो रहा है।

क्या कांग्रेस का साथ छोड़ देंगे सभी क्षेत्रीय दल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस का साथ छोड़ेंगे या नहीं! लोकसभा चुनाव में अब बमुश्किल दो-ढाई महीने बचे हैं। नरेंद्र मोदी की निगाह पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद दूसरा ऐसा प्रधानमंत्री बनने पर है जो लगातार तीन बार सत्ता के सिंहासन पर बैठा। अयोध्या में भव्य राम मंदिर से पैदा हुई हिंदुत्व लहर पर सवार बीजेपी जाति को साधने में भी पीछे नहीं है। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान हो चुका है। दलितों को लुभाने के लिए बड़ा अभियान शुरू करने का प्लान भी तैयार हो चुका है। दूसरी तरफ विपक्ष खासकर उसके सबसे बड़ा गठबंधन I.N.D.I.A. की नजर हर हाल में मोदी के विजय रथ को रोकने पर है। लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ही विपक्ष का I.N.D.I.A. हांफने लगा है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिसकी पहल पर विपक्षी गठबंधन ने आकार लिया, वही नीतीश कुमार अब पलटी मारने जा रहे हैं। ये वैसे ही है जैसे युद्ध शुरू होने से ऐन पहले सारथी ही पाला बदल ले। नीतीश के संभावित यू-टर्न के अलावा ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस को आंख दिखा रहे हैं। कई और राज्यों में भी विपक्षी गठबंधन के भविष्य पर सवालिया निशान लगा हुआ है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यूपी ही नहीं, तकरीबन पूरे देश में एक तरह ही लहर सी पैदा हुई है, जिसे ‘राम लहर’ कह सकते हैं। चुनाव में इसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा क्योंकि इससे उसका हिंदुत्व वोट बैंक सध रहा है। लेकिन बीजेपी सिर्फ इतने से संतुष्ट नहीं है। हिंदुत्व वोट के साथ-साथ वह जातिगत समीकरणों को भी साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अगले ही दिन मोदी सरकार ने समाजवादी दिग्गज कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान किया। इसके जरिए बीजेपी ने पिछड़े वर्ग और उसमें भी खासकर अत्यंत पिछड़ी जातियों पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने की कोशिश की है। इसके अलावा जल्द ही पार्टी देशभर में दलित समुदाय को साधने के लिए बड़ा अभियान छेड़ने जा रही है। उनके लिए जगह-जगह सम्मेलन होंगे। बीजेपी के कार्यकर्ता दलित समुदाय तक पहुंचेंगे और उनके हित में लिए गए मोदी सरकार के फैसलों को बताएंगे। जाहिर है लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी युद्धस्तर पर तैयारी कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट करने की कवायद करने वाले नीतीश कुमार के अब खुद यू-टर्न लेने की चर्चा है। जेडीयू चीफ और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही पिछले साल जून में पटना में विपक्षी दलों की महाजुटान की थी। उनकी पहल पर ही विपक्ष के तमाम दल मतभेदों के बावजूद एक प्लेटफॉर्म पर आने को तैयार हुए ताकि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विपक्ष की तरफ से साझा उम्मीदवार उतारा जा सके। लेकिन जब चुनाव एकदम सिर पर आ गया तो नीतीश कुमार ही पाला बदलने जा रहे। तिनका-तिनका जोड़कर विपक्षी एकजुटता का ताना-बाना तैयार करने वाले जेडीयू चीफ ऐन वक्त पर खुद ही गठबंधन से दूर होने जा रहे हैं। ये विपक्षी इंडिया गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका है।

ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार ने विपक्षी गठबंधन की नाव में पहला छेद किया है। उनसे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी विपक्षी I.N.D.I.A. की नाव में छेद कर चुकी हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बंगाल में प्रवेश करने से पहले ही ममता ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी टीएमसी लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी 42 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उनके इस ऐलान को कांग्रेस ने ‘स्पीड ब्रेकर’ बताकर ये जताने की कोशिश की कि दीदी को जल्द ही मना लिया जाएगा। लेकिन दीदी के तेवरों से ऐसा लगता तो बिल्कुल नहीं है। खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ममता को खत लिखकर उनसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल होने की गुजारिश की थी। ममता ने उनके अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया। दो टूक कह दिया कि वह राहुल की यात्रा में ‘5 मिनट तक के लिए भी’ शामिल नहीं हो सकतीं। वह ‘एकला चलो’ की राह पर निकल चली हैं। टीएमसी एमपी डेरेक ओ ब्रायन इसके लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जो लगातार ममता बनर्जी पर हमलावर रहे हैं। सुष्मिता देव तो अधीर को बीजेपी का एजेंट तक बता रही हैं। जवाब में अधीर ने जोश-जोश में डेरेक ओ ब्रायन को ‘विदेशी’ कह दिया लेकिन अब उस बयान के लिए माफी मांग रहे हैं। उनका माफीनामा बता रहा है कि कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल में विपक्षी एकजुटता की उम्मीद नहीं छोड़ी है।

सिर्फ नीतीश या ममता ही नहीं, आम आदमी पार्टी भी विपक्षी गठबंधन की नाव में छेद करती दिख रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान दावा कर रहे हैं कि आम आदमी पार्टी पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों को जीतेगी यानी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। मान इतना बड़ा ऐलान खुद से नहीं कर सकते, अरविंद केजरीवाल की सहमति जरूर ली होगी। दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में भी कांग्रेस से अपने लिए लोकसभा सीटों की मांग कर रही है। दिल्ली की 7 सीटों को लेकर तो दोनों पार्टियों में बात बन सकती है लेकिन पंजाब का मामला फंस चुका है। दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस की राज्य इकाई भी आम आदमी पार्टी से किसी तरह का गठबंधन नहीं चाहती लेकिन आलाकमान के स्तर पर सीटों के तालमेल की कोशिश की जा रही थी।

सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य यूपी में भी विपक्षी एकजुटता के चिथड़े उड़ चुके हैं। मायावती की बहुजन समाज पार्टी पहले ही विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. का हिस्सा नहीं है। अखिलेश की समाजवादी पार्टी और जयंत चौधरी की आरएलडी भले ही कांग्रेस के साथ विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं लेकिन सीट शेयरिंग पर बात बनती नहीं दिख रही। इतना ही नहीं, अखिलेश यादव ने तो कांग्रेस का इंतजार किए बिना जयंत चौधरी के साथ सीट शेयरिंग का ऐलान भी कर दिया। यूपी में कांग्रेस करीब 2 दर्जन सीटें चाह रही है लेकिन अखिलेश 2 से ज्यादा सीट देने के मूड में नहीं थे। हालांकि, शनिवार को अखिलेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि यूपी में कांग्रेस 11 सीटों पर लड़ेगी।

ऐसा ही हाल महाराष्ट्र का है। यूपी के बाद लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें महाराष्ट्र में ही हैं। यहां महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की अगुआई वाले एनसीपी का गुट शामिल है। यहां सीट शेयरिंग पर पेच कितनी बुरी तरह फंसा हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसकी वजह से ही कांग्रेस के बड़े युवा चेहरों में शुमार रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने पार्टी छोड़ दी और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना का दामन थाम लिया। देवड़ा जिस मुंबई साउथ सीट से लड़ना चाह रहे थे, उस पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने दावा ठोक रखा है। 48 लोकसभा सीट वाले महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) अकेले अपने लिए 23 सीटों पर अड़ी है। यानी बाकी कांग्रेस, एनसीपी और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के लिए सिर्फ 25 सीटें ही बचेंगी। जाहिर है, महाराष्ट्र में सीट शेयरिंग बहुत ही उलझा हुआ है।

क्या दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे पाएंगे भारत के स्वदेशी हथियार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत के स्वदेशी हथियार दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे पाएंगे या नहीं! 26 जनवरी को 75वें गणतंत्र दिवस की परेड में स्वदेशी हथियारों का जोरदार प्रदर्शन हुआ, जिसमें LCH प्रचंड चॉपर, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, नाग एंटी-टैंक मिसाइल और स्वाथी हथियार खोजी रडार शामिल थे। बेशक ये सब देखने में शानदार हैं, लेकिन क्या ये काफी हैं? स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत 2018 से 2022 के बीच दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था। इतनी मात्रा में हथियारों का आयात करना भारत की वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में रक्षा तैयारियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हाल ही में, जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के नियमों को संशोधित किया है ताकि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के माध्यम से यूक्रेन को पैट्रियट मिसाइलों के निर्यात की अनुमति मिल सके। इसी महीने, जनरल इलेक्ट्रिक के एक वरिष्ठ कार्यकारी ने पुष्टि की कि एलसीए लड़ाकू कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण, भारत को जीई404 इंजन की आपूर्ति में एक साल का विलंब होने वाला है। कुछ हफ्ते पहले, भारत में निर्मित 155 मिमी के तोपखाने के गोले यूक्रेनी सेना की ओर से इस्तेमाल किए जाने की खबरें आई थीं। यहां साझा विषय वैश्विक स्तर पर सेनाओं का पुनर्पूंजीकरण और मौजूदा सैन्य औद्योगिक परिसर एमआईसी की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए उत्पादन को बढ़ाने में असमर्थता है। यही कारण है कि पश्चिमी शक्तियों को यूक्रेन की आपूर्ति के लिए अपने स्वयं के भंडार को ही खाली करना पड़ रहा है।

आंकड़े खुद बोलते हैं। फाइनेंशियल टाइम्स ने 15 रक्षा ठेकेदारों का विश्लेषण किया, जिससे पता चला कि 2022 में इन कंपनियों के ऑर्डर बैकलॉग 777 बिलियन डॉलर से अधिक हो गए, जो दो साल पहले की तुलना में 10% अधिक है। 2022 में यूरोप ने कई पीढ़ियों में सैन्य खर्च में सबसे तेज वृद्धि देखी – लगभग 30%। रूस और चीन के आंकड़े उतनी बारीकी से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन हाल के वर्षों में चीन के नौसेना के निर्माण को देखते हुए, चीनी रक्षा ठेकेदारों के साथ ऑर्डर बैकलॉग बहुत बड़े होने की संभावना है। SIPRI के अनुसार, वैश्विक सैन्य व्यय वास्तविक रूप से 3.7% बढ़कर 2022 में 2.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। बचाव में, बढ़त का समय अधिक होता है। सैद्धांतिक परिवर्तनों से लेकर बजट प्रतिबंधों तक, प्लेसमेंट के आदेश से लेकर वास्तविक उत्पादन तक। यही कारण है कि वर्तमान में वास्तविक व्यय भविष्य में कम होने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर जीडीपी के % के रूप में सैन्य व्यय 2.2-2.3% बॉलपार्क में बना हुआ है। मुद्दा आपूर्ति श्रृंखला और कुशल श्रम क्षमता का है जिसके परिणामस्वरूप आपूर्ति मांग को पूरा करने में विफल रहती है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है? पहली सीख तो यह है कि घरेलू आपूर्ति के लिए नो प्लान बी है, विशेष रूप से गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स जैसी उपभोग्य सामग्रियों के लिए सच है। महंगे, बहुअरब डॉलर के प्लेटफॉर्म जो जनता की कल्पना को उत्तेजित करते हैं जैसे राफेल लड़ाकू विमान या एस400 एसएएम अगर उनकी जरूरत खत्म हो जाती है तो वे बेकार हो जाते हैं। हाल के दशकों में कई बार यह एक दर्दनाक सबक के रूप में हमें सीख दे गया है। कारगिल में, भारतीय वायु सेना के पास 100 से भी कम आयातित सटीक निर्देशित गोला-बारूद थे, जिनमें से प्रत्येक को विशेष रूप से उच्च मूल्य के लक्ष्य के लिए निर्धारित किया गया था। एर्गो, ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे आसानी से बख्शा जा सके।

दूसरा सबक यह है कि वृद्धि क्षमताओं का निर्माण करना और भी कठिन है। यदि यह अमेरिकी एम. आई. सी. के लिए कठिन है, तो यह एक नए भारतीय संस्करण के लिए कई गुना कठिन है। घरेलू ठेकेदारों के पास एक स्थिर आपूर्ति श्रृंखला को चिकनाई देने के लिए पर्याप्त ऑर्डरबुक की आवश्यकता होती है जिसे आपात स्थितियों में बढ़ाया जा सकता है। यहां एक ऑर्डर के बाद तीन साल में एक और और 7 साल बाद तीसरा ऑर्डर आपूर्ति श्रृंखला को नाजुक रखता है।

1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद से, यह माना जाता है कि पारंपरिक युद्ध छोटे और तेज होंगे। नतीजन, भारत के युद्ध अपव्यय भंडार को नंगे-हड्डियो के स्तर पर रखने के लिए जाना जाता है। सीमा पर तनाव होने पर बार-बार गोला-बारूद की “आपातकालीन खरीद” की ओर से मान्य किया जाता है। इतने सारे पैसे और बड़े प्लेटफार्मों-टैंक, लड़ाकू विमानों, जहाजों पर खर्च किए गए ध्यान के साथ-इन प्लेटफार्मों के लिए निर्वाह क्षमता के Bare Bones Level के स्तर का होना आत्म-पराजय है। यह हाल ही में है कि भारत 155 मिमी गोला-बारूद में आत्मनिर्भर हुआ और वो भी भारतीय सेना की ओर से पहली 155 मिमी बंदूक को शामिल करने के लगभग चार दशक बाद।

क्या ASI सर्वे की रिपोर्ट मानेगी अदालत? क्या कहता है कानून!

वर्तमान में व्यास जी तहखाना में पूजा करने की एक सफलता हिंदू पक्ष को मिल चुकी है, लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अदालत ASI सर्वे की रिपोर्ट मानेगी या नहीं और कानून क्या कहता है! अयोध्या में रामलला अपने घर विराज चुके हैं। इसके पीछे है 500 सालों का संघर्ष और बलिदान जो बताता है कि अयोध्यापति इतनी आसानी से अपनी नगरी को नहीं लौटे। अपने राम के लिए लड़ाई लड़ने वाले हिंदू समाज ने अदालतों में लड़ाई लड़ी। जिला अदालत से इलाहाबाद हाई कोर्ट और फिर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की लड़ाई चली और आखिर तय हो गया कि वहां पहले राम का मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। अयोध्या के बाद भगवान शंकर की नगरी काशी में कुछ ऐसा ही विवाद चल रहा है। वहां हिंदू भव्य मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाने की बात कहते हैं तो मुस्लिम पक्ष इस बात से इनकार करता आया है। हालांकि, फैसला कोर्ट को लेना है। लेकिन एक दिन पहले पुरातत्व विभाग ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई कर रहे जिला जज को इस विवाद से जुड़े सबूत दिए हैं। इन सबूतों के आधार पर कहा जा रहा है कि वहां भव्य मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी। शनिवार को विश्व हिंदू परिषद ने ASI की बात को सही ठहराया है। वीएचपी के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अलोक कुमार ने कहा कि एएसआई की ओर से ज्ञानवापी मस्जिद से जुटाए गए सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस भव्य मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी। मंदिर का एक हिस्सा, खासकर पश्चिमी दीवार, हिंदू मंदिर का बचा हुआ हिस्सा है। रिपोर्ट यह भी साबित करती है कि पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों, जिनमें स्तंभ और पिलर शामिल हैं, को संशोधित करके मस्जिद के दायरे को बढ़ाने और सभन के निर्माण में इस्तेमाल किया गया था। वीएचपी का कहना है कि जिसे वजुखाना कहा जाता था, उसमें शिवलिंग इस बात में कोई संदेह नहीं छोड़ता है कि संरचना में मस्जिद जैसा चरित्र नहीं है। उन्होंने कहा कि संरचना में पाए गए शिलालेखों में जनार्दन, रुद्र और उमेश्वर सहित नामों की खोज इस बात का प्रमाण है कि यह एक मंदिर है। आलोक कुमार ने यह भी कहा कि एकत्र किए गए साक्ष्य और एएसआई की ओर से प्रदान किए गए निष्कर्ष यह साबित करते हैं कि इस पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में था और जैसा कि वर्तमान में एक हिंदू मंदिर का है। इस प्रकार, पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की धारा 4 के अनुसार भी, संरचना को हिंदू मंदिर घोषित किया जाना चाहिए। ASI के जिला जज को सौंपे सबूत भले वहां मंदिर होने की बात कहते हों लेकिन आखिरी फैसला कोर्ट को करना है।

भारत के पुरातत्व विभाग ने पिछले महीने वाराणसी जिला अदालत को ज्ञानवापी मस्जिद के बारे में अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी। उनसे ये पता लगाने को कहा गया था कि क्या मस्जिद किसी पुराने हिंदू मंदिर के ऊपर बनी है। इस रिपोर्ट की कॉपियां गुरुवार को दोनों पक्षों को दे दी गईं। हिंदू पक्ष का दावा है कि मौजूदा मस्जिद 17वीं सदी में असली काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर उसी जगह बनाई गई। एएसआई ने पुष्टि की है कि मस्जिद एक पहले से मौजूद मंदिर के ऊपर बनाई गई थी जिसमें एक बड़ा केंद्रीय कक्ष था और क्रमशः उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में कम से कम एक कक्ष था। काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर पर चल रहे मुकदमे में यह रिपोर्ट कितनी महत्वपूर्ण है? इसपर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और क्या है!

800 पन्नों की एएसआई रिपोर्ट को विशेषज्ञ साक्ष्य माना जाएगा जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, और इसे केवल अंकित मूल्य पर लेने की आवश्यकता नहीं है। दीवानी मुकदमे में पक्ष गवाहों को गवाही देने के लिए लाएंगे, जिनसे दूसरे पक्ष की ओर से जिरह की जाएगी। इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, पुरालेखविदों, तथ्यों के गवाहों और धार्मिक ज्ञान वाले विशेषज्ञ गवाहों को अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मामले में, चूने की सुरखी के उपयोग पर पुरातत्व विभाग के निष्कर्षों की दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग व्याख्या की गई थी। मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया कि चूने की सुरखी इस्लामी संरचनाओं में उपयोग की जाने वाली एक विशिष्ट सामग्री है। हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने इसका विरोध किया और विशेषज्ञों की गवाही से साक्ष्य का हवाला दिया था। हिंदू पक्ष ने पुरातत्वविद् सूरज भान के बयानों पर भरोसा किया जिन्होंने कहा कि यह कहना सही है कि चूने के पानी का उपयोग तीसरी शताब्दी ईस्वी में तक्षशिला और पाकिस्तान में कुषाण काल के दौरान किया गया था और पुरातत्वविद् डॉ जया मेनन जिन्होंने कहा कि ‘निश्चित रूप से चूने के गारे का उपयोग नवपाषाण काल से किया जाता था।’

अनिवार्य रूप से, अदालतों को पहले यह निर्धारित करना होगा कि क्या ASI रिपोर्ट पर निर्णायक रूप से भरोसा किया जा सकता है, और फिर, 15 अगस्त, 1947 को मस्जिद के धार्मिक चरित्र के लिए हिंदू मंदिर के अस्तित्व का क्या अर्थ है। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मुकदमे में 2003 की एक एएसआई रिपोर्ट का हवाला दिया गया था, और अपने 2019 के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से इस पर भरोसा नहीं किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ASI प्राप्त पुरातात्विक निष्कर्षों पर शीर्षक की खोज कानूनी रूप से आधारित नहीं हो सकती है। बारहवीं शताब्दी के बीच, जिसमें अंतर्निहित संरचना दिनांकित है और सोलहवीं शताब्दी में मस्जिद का निर्माण, चार शताब्दियों की एक मध्यवर्ती अवधि है। (i) अंतर्निहित संरचना को तोड़ने का कारण और (ii) क्या पहले से मौजूद संरचना को मस्जिद के निर्माण के लिए ध्वस्त किया गया था, इस पर कोई सबूत उपलब्ध नहीं है। जमीन का मालिकाना हक तय किए गए कानूनी सिद्धांतों और साक्ष्य मानकों को लागू करने पर तय किया जाना चाहिए। सबसे पहले, रखरखाव का प्रारंभिक मुद्दा, क्या इस तरह का मुकदमा भी दायर किया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की ओर से निर्णायक रूप से तय किया जाना होगा। हालाँकि, यह मुद्दा पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के भविष्य पर निर्भर करता है। पूजा स्थल अधिनियम की धारा 3 और 4 1991 में रामजन्मभूमि आंदोलन के मद्देनजर अधिनियमित की गई थी। यह धाराएं अनिवार्य रूप से घोषणा करती हैं कि किसी पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र वही रहेगा जो 15 अगस्त, 1947 को था और यह कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय के किसी भी पूजा स्थल को किसी अन्य संप्रदाय या धारा में परिवर्तित नहीं करेगा। अयोध्या में उस समय मौजूद विवादित ढांचा इस कानून का एकमात्र अपवाद था। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट शीर्षक मामले के लिए सबूत नहीं है क्योंकि 1991 के अधिनियम द्वारा निर्धारित समय सीमा स्वतंत्रता की तारीख है।

अदालत ने कहा, ‘राज्य ने कानून बनाकर संवैधानिक वचन को मजबूत किया है और सभी धर्मों की समानता और धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा किया है, जो संविधान के मूलभूत स्वरूप का एक हिस्सा है।’ कोर्ट ने आगे कहा कि पूजा स्थल अधिनियम भारतीय संविधान के तहत धर्मनिरपेक्षता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को लागू करने की एक न हटने वाली बाध्यता लागू करता है। यह कानून इसलिए भारतीय राजनीति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की रक्षा के लिए बनाया गया कानूनी उपकरण है, जो संविधान के मूलभूत स्वरूपों में से एक है। अदालत ने आगे कहा कि गैर-वापसी मूलभूत संवैधानिक सिद्धांतों का एक मूलभूत लक्षण है, जिनमें से धर्मनिरपेक्षता एक प्रमुख घटक है। इस प्रकार, पूजा स्थल अधिनियम एक विधायी हस्तक्षेप है जो हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के एक आवश्यक तत्व के रूप में गैर-वापसी को संरक्षित करता है।”

विपक्ष ने केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर चर्चा की मांग की.

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दूसरी नरेंद्र मोदी सरकार का आखिरी लोकसभा सत्र कल से शुरू हो रहा है। विपक्ष उस अंतरिम बजट सत्र में केंद्रीय जांच एजेंसी के दुरुपयोग, बेरोजगारी, महंगाई, मणिपुर में अशांति, सांप्रदायिक अशांति जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की मांग कर रहा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या विपक्ष को आखिरकार मुद्दों पर अलग से चर्चा करने का मौका मिलेगा? क्योंकि, इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव और बजट पर चर्चा होनी है. इन दोनों मुद्दों पर चर्चा के लिए आठ दिन का समय दिया गया है. हालांकि विपक्ष चर्चा के दौरान पिछले पांच साल में सरकार की विफलता को उजागर करने की योजना बना रहा है.

आज की सर्वदलीय बैठक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नदारद रहे. उनकी जगह सत्ताधारी खेमे के वरिष्ठ मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह मौजूद थे. ये थे केंद्रीय संसदीय मंत्री प्रह्लाद जोशी. उन्होंने कहा कि अगले आठ दिनों में संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण और बजट पर चर्चा होगी. आज बैठक में मौजूद रहे तृणमूल के राज्यसभा प्रमुख सुखेंदुशेखर रॉय ने कहा कि समय की कमी के कारण अगले शुक्रवार को प्राइवेट मेंबर बिल पर चर्चा की बजाय राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करने की जानकारी दी गयी है.

आज, अधिकांश विपक्षी दल, चाहे वे किसी भी दल से जुड़े हों, केंद्रीय जांच ब्यूरो के दुरुपयोग को लेकर मुखर हैं। यहां तक ​​कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद पर भी विपक्ष को दबाने के लिए ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है. इस मामले पर चर्चा की भी मांग की गई. विपक्ष ने बेरोजगारी और महंगाई पर भी चर्चा की मांग की. बैठक में तृणमूल नेता सुदीप बनर्जी ने कहा, ”बेरोजगारी की समस्या चरम सीमा पर पहुंच गयी है. पिछली सर्वदलीय बैठक में इस पर चर्चा का वादा किया गया था, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ.

कई विपक्षी दलों ने भी भारत-चीन संबंधों पर चर्चा की मांग उठाई है. बैठक में कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा, ”चीन लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में घुस आया है. भूटान जैसे देश भी गरीब हैं. तो क्या यह मान लिया जाए कि विदेश मंत्रालय अपने पड़ोसियों के साथ संबंध बनाए रखने में विफल हो रहा है।” मणिपुर में नौ महीने से ज्यादा समय से जारी अशांति की चर्चा में कई पार्टियां भी शामिल हो गई हैं.

बैठक में शामिल हुए आप नेतृत्व ने केंद्र पर अरविंद केजरीवाल सरकार के काम में हस्तक्षेप करने और संघीय ढांचे को नष्ट करने का आरोप लगाया। तृणमूल ने संघीय ढांचे में केंद्रीय हस्तक्षेप का मुद्दा भी उठाया. वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस ने केंद्र विरोधी राह पर न चलते हुए क्रमशः आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए विशेष पैकेज की मांग की। हाल ही में एनडीए में शामिल हुई जेडीयू ने बिहार के लिए विशेष पैकेज की मांग की है.

एनडीए सहयोगी शिवसेना (शिंदे खेमा) ने कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने और राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार को धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने देश में समान नागरिक संहिता को शीघ्र लागू करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया। लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्या विपक्ष को मुद्दों पर अलग से चर्चा करने का मौका मिलेगा। क्योंकि, इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव और बजट पर चर्चा होनी है. इन दोनों मुद्दों पर चर्चा के लिए आठ दिन का समय दिया गया है. हालांकि विपक्ष चर्चा के दौरान पिछले पांच साल में सरकार की विफलता को उजागर करने की योजना बना रहा है.

आज की सर्वदलीय बैठक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नदारद रहे. उनकी जगह सत्ताधारी खेमे के वरिष्ठ मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह मौजूद थे. ये थे केंद्रीय संसदीय मंत्री प्रह्लाद जोशी. उन्होंने कहा कि अगले आठ दिनों में संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण और बजट पर चर्चा होगी. आज बैठक में मौजूद रहे तृणमूल के राज्यसभा प्रमुख सुखेंदुशेखर रॉय ने कहा कि समय की कमी के कारण अगले शुक्रवार को प्राइवेट मेंबर बिल पर चर्चा की बजाय राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करने की जानकारी दी गयी है.

आज, अधिकांश विपक्षी दल, चाहे वे किसी भी दल से जुड़े हों, केंद्रीय जांच ब्यूरो के दुरुपयोग को लेकर मुखर हैं। यहां तक ​​कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद पर भी विपक्ष को दबाने के लिए ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है. इस मामले पर चर्चा की भी मांग की गई. विपक्ष ने बेरोजगारी और महंगाई पर भी चर्चा की मांग की. बैठक में तृणमूल नेता सुदीप बनर्जी ने कहा, ”बेरोजगारी की समस्या चरम सीमा पर पहुंच गयी है. पिछली सर्वदलीय बैठक में इस पर चर्चा का वादा किया गया था, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हुआ.

कई विपक्षी दलों ने भी भारत-चीन संबंधों पर चर्चा की मांग उठाई है. बैठक में कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा, ”चीन लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में घुस आया है. भूटान जैसे देश भी गरीब हैं. तो क्या यह मान लिया जाए कि विदेश मंत्रालय अपने पड़ोसियों के साथ संबंध बनाए रखने में विफल हो रहा है।” मणिपुर में नौ महीने से ज्यादा समय से जारी अशांति की चर्चा में कई पार्टियां भी शामिल हो गई हैं.

बैठक में शामिल हुए आप नेतृत्व ने केंद्र पर अरविंद केजरीवाल सरकार के काम में हस्तक्षेप करने और संघीय ढांचे को नष्ट करने का आरोप लगाया। तृणमूल ने संघीय ढांचे में केंद्रीय हस्तक्षेप का मुद्दा भी उठाया. वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस ने केंद्र विरोधी राह पर न चलते हुए क्रमशः आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए विशेष पैकेज की मांग की। एनडीए में शामिल हुए जेडीयू ने बिहार के लिए विशेष पैकेज की मांग की है.

एनडीए सहयोगी शिवसेना (शिंदे खेमा) ने कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने और राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार को धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए जल्द जरूरी कदम उठाने का अनुरोध किया.

वैश्विक भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में 180 देशों में भारत 93वें स्थान पर है.

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एक साल में भारत में बढ़ा भ्रष्टाचार! दुनिया के 180 देशों में अब कहां है स्थान?वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, डेनमार्क दुनिया का सबसे भ्रष्टाचार मुक्त देश है, जो आर्थिक पारदर्शिता या अस्पष्टता के विभिन्न संकेतकों का सर्वेक्षण करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का वादा किया है. हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भारत दुनिया के शीर्ष देशों के करीब भी नहीं है। 2023 ‘विश्व भ्रष्टाचार सूचकांक’ (भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक या सीपीआई) मंगलवार को प्रकाशित हुआ। 180 देशों की इस सूची में भारत 93वें स्थान पर है.

दरअसल, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामले में भारत की रैंकिंग में पिछले साल के दौरान और गिरावट आई है। 2022 में इस रिपोर्ट में भारत 85वें स्थान पर था. आर्थिक पारदर्शिता या अपारदर्शिता पर विभिन्न संकेतकों के एक सर्वेक्षण के अनुसार, डेनमार्क दुनिया का सबसे भ्रष्टाचार मुक्त देश है। अगले तीन स्थान क्रमशः फिनलैंड, न्यूजीलैंड और नॉर्वे हैं। यानी दुनिया के पहले चार भ्रष्टाचार-मुक्त देशों में से तीन यूरोप के स्कैंडिनेवियाई क्षेत्र से हैं। जर्मनी की बर्लिन स्थित भ्रष्टाचार निगरानी एजेंसी की रिपोर्ट कहती है कि आर्थिक पारदर्शिता के मामले में दक्षिण एशिया के कुछ पड़ोसी देश भारत से आगे हैं! हालाँकि, वित्तीय संकट से जूझ रहे पाकिस्तान (133) और श्रीलंका (115) की स्थिति भारत से भी बदतर है। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के अलावा भारत में मौलिक अधिकारों में सरकारी हस्तक्षेप पर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है, ”भारत में दूरसंचार विधेयक के पारित होने से नागरिक अधिकारों का दायरा और संकुचित हो गया है। जो मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की राह में एक ‘गंभीर समस्या’ बन सकती है.” मेयर के आदेशों की अनदेखी कर बिना टेंडर के स्कूली बच्चों के लिए करीब 74 लाख रुपये के रेनकोट की खरीदारी पर पहले ही हंगामा हो चुका है. सवाल यह खड़ा हो गया है कि नगर निगम में इतने बड़े भ्रष्टाचार की खबर मेयर को क्यों नहीं हुई. छह साल पहले हुई इस घटना में तब से कोलकाता पुरभान में नगर निगम शिक्षा विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर आलोचना की आंधी चल रही है. इसलिए इस बार कोलकाता नगर पालिका उन सभी लोगों को दिखाने जा रही है जिन्होंने बिना टेंडर के मानसून घोटाले की संबंधित फाइल पर हस्ताक्षर किए थे।

नगर पालिका के तत्कालीन मेयर परिषद (शिक्षा) अभिजीत मुखोपाध्याय ने भी फाइल पर हस्ताक्षर किये. अभिजीत वर्तमान में मेयर परिषद (सड़क) के प्रभारी हैं। सवाल ये है कि क्या अभिजीत को भी दिखाया जाएगा? या फिर उन्हें तृणमूल और मेयर परिषद का सदस्य होने के कारण छूट मिलेगी? बरसठी-कांड में भ्रष्टाचार की तस्वीर बदरंग होने के बाद से नगर पालिका के लगभग हर विभाग के कर्मचारी-अधिकारी इसमें शामिल हो गए हैं। उनका साफ कहना है, ”मेयर की फाइल पर ‘नहीं’ लिखने के बावजूद बरसाती सीजन में लाखों रुपये की खरीदारी कैसे कर ली गयी? इस मामले में मेयर काउंसिल (शिक्षा) को सारी जिम्मेदारी लेनी होगी!” हालांकि इस संबंध में अभिजीत को रविवार को बुलाया गया था, लेकिन उन्होंने कहा, ”मैं अभी एक बैठक में हूं. बातचीत करना
मैं नहीं कर सकता।”

छह माह पहले नगर पालिका के आवासीय ऑडिट अधिकारी ने आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि मानसून खरीद में सभी नियमों का पालन नहीं किया गया। इसके बदले बिना टेंडर के एक विशेष एजेंसी को सुविधा दे दी गयी. रिपोर्ट मिलने के बाद नगर पालिका के आला अधिकारियों ने मानसून से जुड़ी फाइल खोली तो दंग रह गए। उनके ध्यान में आया कि 2018 में शिक्षा विभाग ने कई विसंगतियों के कारण पुर प्राइमरी स्कूल के छात्रों के लिए स्कूल यूनिफॉर्म की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दी थी। बाद में, फ़ाइल दोषपूर्ण निविदा प्रक्रिया में ‘छूट’ के अनुरोध के साथ मेयर फ़िरहाद हकीम के पास गई। लेकिन मेयर द्वारा फाइल पर ‘नहीं’ लिखने के बाद भी आरोप है कि नगर शिक्षा विभाग द्वारा 73 लाख 83 हजार रुपये के 2040 मानसून खरीदे गए!

इस दिशा में, भ्रष्टाचार को प्रकाश में लाने के लिए नगर निगम अधिकारियों की निगरानी के बारे में कई शिकायतें सामने आई हैं। सवाल उठाया गया है कि मेयर बरसाती द्वारा खरीदारी की फाइल में ‘नहीं’ लिखने के बाद भी यह इतने समय तक छिपा कैसे रहा? मेयर की जानकारी के बिना इतना बड़ा घोटाला कैसे हो गया? तो क्या नगर निगम अधिकारियों का एक वर्ग ‘सीधे तौर पर’ भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है? मेयर को क्यों नहीं पता कि छह साल पहले क्या हुआ था? तो क्या मेयर को अधिकारियों का भरोसा नहीं है? नगर पालिका के करीबी सूत्रों के अनुसार, फिरहाद उस प्रक्रिया में शामिल था जिसके द्वारा मेयर को ‘अंधेरे में’ रखते हुए वर्साथी को खरीदा गया था। उनके स्पष्ट शब्द थे, ”मैं किसी भी तरह से भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करूंगा. ”मैं इसका अंत देखूंगा.” नगर पालिका सोच रही है कि उसका शोक कैसे मनाया जाए। नगर निगम के एक शीर्ष अधिकारी ने रविवार को कहा, “जिन लोगों ने मेयर के ‘ना’ कहने के बाद भी फाइल पर हस्ताक्षर किए हैं, उन्हें शोकॉज किया जाएगा।”

वाराणसी कोर्ट ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी मस्जिद के सीलबंद क्षेत्र के अंदर पूजा करने की अनुमति दी.

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कोर्ट ने ज्ञानबापी की ‘सीलबंद’ कब्र में हिंदुओं को पूजा की इजाजत दी, कब शुरू होगी पूजा? 25 जनवरी को, हिंदू पक्ष द्वारा एक एएसआई रिपोर्ट जारी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि ज्ञानबापी मस्जिद की वर्तमान संरचना से पहले क्षेत्र में एक बड़े हिंदू मंदिर की उपस्थिति के सबूत थे। कोर्ट ने हिंदुओं को ज्ञानबापी मस्जिद के सीलबंद तहखाने में पूजा करने की इजाजत दे दी। वाराणसी की जिला अदालत ने बुधवार को यह आदेश दिया. वहीं, वाराणसी जिला प्रशासन को सात दिनों के भीतर पूजा शुरू कराने की व्यवस्था करने को कहा गया है. तहखाना मस्जिद के नीचे का भूमिगत कमरा या तहखाना है। ज्ञानबापी मस्जिद के नीचे ऐसे चार तहखाने हैं। इस बीच दक्षिण की ओर का तहखाना अभी भी व्यास परिवार के स्वामित्व में है। इसलिए तहखाना का नाम ‘व्यास की तहखाना’ है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष को इस ‘व्यास की तहखाना’ में पूजा करने की इजाजत दे दी.

बुधवार को हिंदू पक्ष की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन कोर्ट में पेश हुए. उन्होंने कोर्ट के फैसले के बारे में बताया. जैन ने कहा, जिला मजिस्ट्रेट को ‘व्यास का तहखाना’ में हिंदुओं के प्रार्थना करने के लिए सभी व्यवस्थाएं करनी चाहिए। वह सात दिन के अंदर कब्र पर कब्जा कर लेंगे. इस बीच उन्हें पूजा का आयोजन भी करना है. ज्ञानबापी मामले में दूसरे पक्ष साथ ही उसे बेसमेंट के अंदर की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होता है और वहां कुछ भी बदला न जाए.

चूँकि कब्र व्यास परिवार की है, वे चाहते थे कि उनके परिवार के सदस्य को कब्र में प्रवेश करने और पूजा करने की अनुमति दी जाए। हालांकि कोर्ट की ओर से मस्जिद लागो काशी के विश्वनाथ मंदिर के अची पार्षद को पुजारी की व्यवस्था करने को कहा गया है.

25 जनवरी को हिंदू पक्ष की ओर से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि ज्ञानबापी मस्जिद की वर्तमान संरचना से पहले क्षेत्र में एक बड़े हिंदू मंदिर की उपस्थिति के प्रमाण मिले थे। इसके अलावा मस्जिद की नई और पुरानी संरचनाओं में देवनागरी लिपि भी पाई गई है। जहां हिंदू देवी-देवताओं के नामों का उल्लेख किया गया है। इस रिपोर्ट के बाद ही हिंदू पक्ष ने ज्ञानबापी मस्जिद के ‘सील’ इलाके को खोलने का अनुरोध किया था. उन्होंने इस संबंध में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस बीच वाराणसी की जिला अदालत ने ज्ञानबापी मामले में एक विशेष आदेश दिया.

हिंदू पक्ष की ओर से आदेश का स्वागत करते हुए वकील जैन ने कहा, ”यह आदेश ऐतिहासिक है. मैं कहूंगा कि 1983 में अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद परिसर के दरवाजे खोलने का न्यायमूर्ति कृष्णमोहन पांडे का आदेश उतना ही महत्वपूर्ण है। वहीं, वाराणसी जिला प्रशासन को सात दिनों के भीतर पूजा शुरू कराने की व्यवस्था करने को कहा गया है. तहखाना मस्जिद के नीचे का भूमिगत कमरा या तहखाना है। ज्ञानबापी मस्जिद के नीचे ऐसे चार तहखाने हैं। इस बीच दक्षिण की ओर का तहखाना अभी भी व्यास परिवार के स्वामित्व में है। इसलिए तहखाना का नाम ‘व्यास की तहखाना’ है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष को इस ‘व्यास की तहखाना’ में पूजा करने की इजाजत दे दी.

दूसरी ओर, ज्ञानबापी मामले में दूसरे पक्ष अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी के वकील अखलाख अहमद ने कहा कि वह आदेश को चुनौती देते हुए ऊपरी अदालत में अपील करेंगे. इस संबंध में मस्जिद कमेटी की एक अर्जी पर कोर्ट ने सुनवाई की तारीख 8 फरवरी तय की है.

संयोग से, सोमवार को हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ज्ञानबापी मस्जिद के शौचालय की ‘सील’ खोलने का अनुरोध किया था. उन्होंने मांग की कि एएसआई को वहां के जलाशय में पाए जाने वाले ‘शिवलिंग’ (वैकल्पिक रूप से फव्वारा) को नुकसान पहुंचाए बिना निवास का विस्तृत सर्वेक्षण करने के लिए कहा जाए। 2022 में फव्वारे के शिवलिंग होने का दावा किए जाने के बाद ही वाराणसी की निचली अदालत ने फव्वारे को ‘सील’ करने का आदेश दिया था। तब से शौचालय बंद है। चूँकि कब्र व्यास परिवार की है, वे चाहते थे कि उनके परिवार के सदस्य को कब्र में प्रवेश करने और पूजा करने की अनुमति दी जाए। हालांकि कोर्ट की ओर से मस्जिद लागो काशी के विश्वनाथ मंदिर के अची पार्षद को पुजारी की व्यवस्था करने को कहा गया है.

बिग बॉस की जीत के जश्न में अवैध ड्रोन का इस्तेमाल करने पर मुनव्वर फारुकी के खिलाफ एफआईआर दर्ज.

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वह पेशे से एक कॉमेडियन हैं। हालांकि, उस पेशे में आने के बाद मुनव्वर फारुकी को खोखले में नहीं पड़ना पड़ा. हिंदुत्व की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में उन्हें एक बार जेल भी जाना पड़ा था. उन्हें देश के कई राज्यों में प्रदर्शन करने से भी रोका गया. मुनव्वर को एक हास्य अभिनेता के रूप में जीविकोपार्जन के रास्ते में बार-बार ठोकर खानी पड़ी है। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे खुद को एक कॉमेडियन से सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर बना लिया। कंगना रनौत ने ‘लॉक अप’ नाम के रियलिटी शो में हिस्सा लिया था. मुनव्वर ने जीता पहला रियलिटी शो इसके बाद मौका आता है ‘बिग बॉस 17’ का। उन्होंने वह मौका नहीं छोड़ा. करीब साढ़े तीन महीने के सफर के बाद मुनव्वर ने विजेता का खिताब जीता. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने दांव नहीं काटा. ‘बिग बॉस’ का घर छोड़ने के बाद मुनव्वर एक बार फिर कानूनी मुसीबत में फंस गए हैं। रविवार को ‘बिग बॉस 17’ के फिनाले के बाद मुनव्वर सोमवार को मुंबई के डोंगरी लौट आए। वह डोंगरी में पले-बढ़े। सफलता हासिल करने के बाद वह अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते थे। जब मुनव्वर डोंगरी पहुंचे तो उनके प्रशंसकों ने बेलगाम उत्साह से उन्हें घेर लिया. उन्होंने मुनव्वर के साथ विजय जुलूस शुरू किया. उस जश्न की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पेजों पर फैल गए। मुंबई पुलिस ने दावा किया कि जिन ड्रोन के जरिए तस्वीरें और वीडियो लिए गए, वे पंजीकृत नहीं थे। इस आरोप में कैमरामैन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. उनका कैमरा और ड्रोन भी जब्त कर लिया गया. हालांकि, इस घटना पर मुनव्वर की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

बिग बॉस 17 पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुआ था। पिछले रविवार को फिनाले में मौजूदा सीज़न के विजेता की घोषणा की गई। मुनव्वर ने लोकप्रिय टेलीविजन अभिनेत्री अंकिता लोखंडे, प्रियंका चोपड़ा की बहन और दक्षिण अभिनेत्री मन्नारा चोपड़ा को हराकर ट्रॉफी अपने नाम की। हालांकि, मुनव्वर का दावा है कि उस जीत के लिए उन्हें काफी लकड़ियाँ जलानी पड़ीं। उन्होंने कहा कि ‘बिग बॉस’ के घर में रहते-रहते उनकी मानसिक सेहत खराब हो गई है।

जब मन्नारा चोपड़ा ने ‘बिग बॉस 17’ के घर में प्रवेश किया, तो उनकी पहचान प्रियंका की बहन के रूप में की गई। यह रियलिटी शो रविवार को खत्म हो गया. ‘बिग बॉस’ के इस गेम में उन्होंने बिना किसी परिचय के टॉप थ्री में जगह बनाई। मन्नारा अपनी पर्सनैलिटी के दम पर ही शो में अपनी जगह बना पाए हैं, उन्हें दर्शकों का प्यार मिला है. लेकिन इस बीच मन्नारा का को-कंटेस्टेंट मुनव्वर फारूकी से खास रिश्ता बन गया है. ‘बिग बॉस’ के घर के अन्य प्रतियोगियों ने दावा किया कि यह रिश्ता अब दोस्ती तक सीमित नहीं है। मुनव्वर और मन्नारा की केमिस्ट्री दर्शकों को देखने को मिल रही है. फैंस पहले ही सोशल मीडिया पेज पर उनकी जोड़ी को ‘मुन्नारा’ के नाम से सील कर चुके हैं। लेकिन मुनव्वर ने उस मन्नार के नाम पर छुपकर किस करने का आरोप लगाया. जब वे शो से बाहर निकले तो हैरान रह गए. उसने क्या दावा किया?

इस लोकप्रिय नेट इन्फ्लुएंसर ने शो के दौरान मन्नारा के शीर्ष पांच में पहुंचने के बारे में विस्फोटक दावे किए। मुनवा के कमरे में रहते हुए, अंकिता लोखंडे को बताती है कि मन्नारा ने उसे चूमा। ये कहते हुए मुनावा ने उसके गाल पर किस करने का इशारा किया. हालांकि अंकिता बीच में आकर कहती हैं कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं देखा है। मुनव्वर ने पलटवार करते हुए कहा कि उन्होंने इतने दिनों तक किसी को जानकारी नहीं दी. मुनव्वर ने कहा कि वह मन्नारा के ऐसे व्यवहार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे.

इस बीच एक्ट्रेस ने मुनव्वर को अपना करीबी दोस्त और अपना परिवार बताया है. घर से निकलते ही उसने मुनव्वर की शिकायत सुनी. वह थोड़ा चौंका. मन्नारा ने कहा, ”मैं सोच नहीं सकता. ऐसा कुछ नहीं हुआ. ऐसी किसी घटना का कोई रिकॉर्ड नहीं है. अगर उन्होंने सच में ऐसा कहा है तो उन्हें दर्शकों के सामने माफी मांगनी चाहिए।” उन्हें देश के कई राज्यों में प्रदर्शन करने से भी रोका गया. मुनव्वर को एक हास्य अभिनेता के रूप में जीविकोपार्जन के रास्ते में बार-बार ठोकर खानी पड़ी है। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे खुद को एक कॉमेडियन से सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर बना लिया। कंगना रनौत ने ‘लॉक अप’ नाम के रियलिटी शो में हिस्सा लिया था. मुनव्वर ने जीता पहला रियलिटी शो इसके बाद मौका आता है ‘बिग बॉस 17’ का। उन्होंने वह मौका नहीं छोड़ा.

विक्की जैन को अंकिता लोखंडे के बिना बिग बॉस ओटीटी 3 का बुलावा आया.

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टेलीविजन पर सबसे लोकप्रिय रियलिटी शो में से एक है ‘बिग बॉस’। सलमान खान द्वारा होस्ट किए जाने वाले इस रियलिटी शो पर लगातार विवाद के बावजूद छोटे पर्दे का यह शो पिछले 18 सालों से दर्शकों का मनोरंजन कर रहा है। ‘बिग बॉस’ का 17वां सीजन हाल ही में खत्म हुआ है। ‘बिग बॉस 17’ पिछले साल अक्टूबर से शुरू हुआ था। करीब साढ़े तीन महीने के सफर के बाद पिछले रविवार को ‘बिग बॉस 17’ का फिनाले था। ‘बिग बॉस’ के इस सीजन के प्रतियोगियों में टेलीविजन अभिनेत्री अंकिता लोखंडे, प्रियंका चोपड़ा की चचेरी बहन मन्नारा चोपड़ा, कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी शामिल थे। मुनव्वर ने अंकिता और मन्नारा को हराकर विजेता ट्रॉफी अपने नाम की। अंकिता सूखे मुंह और खाली हाथों के साथ ‘बिग बॉस’ के कमरे से बाहर आईं। इससे पहले अंकिता के पति विक्की जैन को निष्कासित कर दिया गया था. ‘बिग बॉस 17’ के बाद इस बार यह ‘बिग बॉस ओटीटी’ का तीसरा सीजन है। खबर है कि विक्की को रियलिटी शो के ओटीटी वर्जन के लिए बुलाया गया है. अंकिता पिछले रविवार को ही ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर निकली हैं। भले ही अंकिता विजेता की ट्रॉफी नहीं जीत पाईं, लेकिन विक्की ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक पोस्ट लिखा कि उन्हें उन पर बहुत गर्व है। कुछ ही दिनों में खबर आई कि विक्की को प्रोड्यूसर्स ने ‘बिग बॉस ओटीटी 3’ के लिए बुलाया है। हालांकि, अंकिता को अभी तक इस बारे में कोई प्रपोजल नहीं मिला है। अंकिता और विक्की ने ‘बिग बॉस 17’ के घर में कपल के तौर पर एंट्री की थी। क्या अंकिता को छोड़ अकेले ‘बिग बॉस ओटीटी 3’ के घर में कदम रखेंगे उनके पति?

वहीं अंकिता ने भी ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आकर खुशखबरी सुनाई। हाल ही में अंकिता ने सोशल मीडिया पर बताया कि वह फिल्म ‘स्वतंत्र वीर सावरकर’ में रणदीप हुडा के साथ नजर आने वाली हैं। फिल्म का टीजर शेयर करते हुए अंकिता ने लिखा, ”वह ‘बिग बॉस’ का घर छोड़कर कुछ नया शुरू करके खुश हैं।’ हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि वह रणदीप की फिल्म में कौन सा रोल निभाएंगे। फिल्म 22 मार्च को रिलीज हो रही है.

2018 से प्यार. टेलीविजन एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे ने तीन साल के प्यार के बाद 2021 में बिजनेसमैन विक्की जैन से शादी कर ली। शादी के कुछ साल बाद अंकिता और विक्की ने ‘बिग बॉस’ के घर में बतौर कपल एंट्री की। जब से सलमान खान रियलिटी शो में आए हैं, तब से उनकी शादीशुदा जिंदगी पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। विक्की और अंकिता अन्य प्रतियोगियों के सामने एक-दूसरे का अपमान करने से नहीं चूके। अंकिता कई बार विक्की के साथ तलाक की राह पर चलने की चेतावनी भी दे चुकी हैं। फिनाले से पहले विक्की ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर हो गए थे। ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर निकलने के बाद अंकिता के पति ने पूर्व महिला प्रतियोगियों के साथ जमकर पार्टी की। वहीं अंकिता विनर के खिताब के लिए संघर्ष कर रही हैं. दोनों के बीच चल रही उथल-पुथल के दौरान विक्की और अंकिता की मां ‘बिग बॉस’ के घर में आईं। उस वक्त अंकिता की सास ने बौमा पर आरोपों का पहाड़ खड़ा कर दिया था. विक्की की मां ने साफ कहा कि उन्होंने अपने बेटे के प्रति अंकिता के व्यवहार को हल्के में नहीं लिया. उन्होंने विक्की से यहां तक ​​कहा कि उन्होंने अंकिता से शादी करने से पहले उन्हें चेतावनी दी थी. इस बार विक्की ने अपनी मां की शिकायत खुलकर बताई.

विक्की ने कहा कि उनके और अंकिता के बीच हुए झगड़े के बारे में न तो उनकी मां को पता था और न ही अंकिता की मां को. बाहर से देखने पर उन्हें लग रहा था कि शायद उनके और अंकिता के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं. बड़े होने के नाते वे इस बात से चिंतित थे। विक्की का दावा है कि उनकी मां अंकिता से बहुत प्यार करती हैं। विक्की ने कहा कि उनके और अंकिता के बीच हुए झगड़े के बारे में न तो उनकी मां को पता था और न ही अंकिता की मां को. बाहर से देखने पर उन्हें लग रहा था कि शायद उनके और अंकिता के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं. बड़े होने के नाते वे इस बात से चिंतित थे। विक्की का दावा है कि उनकी मां अंकिता से बहुत प्यार करती हैं।