Home Blog Page 944

जानिए श्री राम भगवान के सबसे बड़े सबूत राम सेतु की कहानी!

आज हम आपको श्री राम भगवान की सबसे बड़े सबूत रामसेतु की कहानी सुनाने जा रहे हैं! प्रधानमंत्री मोदी रविवार को तमिलनाडु के अरिचल मुनाई पहुंचे और उन्होंने समुद्र तट पर पुष्प अर्पित किए। मोदी ने वहां ‘प्राणायाम’ भी किया। उन्होंने समुद्र का जल हाथों में लेकर प्रार्थना की और अर्घ्य दिया। प्रधानमंत्री ने वहां बने राष्ट्रीय प्रतीक स्तंभ पर भी पुष्पांजलि अर्पित की। रामायण से जुड़े तमिलनाडु के मंदिरों का उनका दौरा सोमवार को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ठीक पहले संपन्न हुआ है। मोदी ने श्री कोठंडारामस्वामी मंदिर में पूजा की और दर्शन किए, जो धनुषकोडी और अरिचल मुनाई की ओर जाने वाले रास्ते पर है, जहां से श्रीलंका कुछ ही दूरी पर है। तमिल में कोठंडारामस्वामी भगवान राम को धनुष और बाण से दर्शाते हैं। मोदी ने रात्रि प्रवास रामेश्वरम में किया था और इसके बाद वह अरिचल मुनाई गए। कहा जाता है कि अरिचल मुनाई वह स्थान है, जहां रामसेतु का निर्माण हुआ था।  राम सेतु एक ऐसा पुल है, जो समुद्र के पार तमिलनाडु में पंबन आइलैंड को श्रीलंका के मन्नार आइलैंड से जाेड़ता है। रामसेतु का संबंध रामायण से है। मान्यता है कि श्रीराम और उनकी वानर सेना ने माता सीता को रावण से मुक्‍त कराने के लिए एक पुल बनाया था, जिसे रामसेतु नाम दिया गया। यह पुल मनुष्‍य द्वारा बनाया गया है या प्राकृतिक है इस बात पर पिछले कई वर्षों से बहस चल रही है। हालांकि राम सेतु आज भी एक रहस्‍य है। यही वजह है कि आज भी लोग इस सेतु के बारे में जानने में दिलचस्‍पी रखते हैं।

प्रोजेक्ट रामेश्वरम नाम के एक अध्‍ययन के जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने कहा है कि 7000 से 18000 साल पहले रामेश्वरम के आइलैंड और श्रीलंका के आइलैंड की खोज हुई थी। यानी ऐसा माना जाता है कि पुल 500-600 साल पुराना है। इस पुल की लंबाई 48 किमी है। रामायण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि पुल तैरते हुए पत्थरों से बनाया गया है। हैरानी की बात यह है कि ऐसे तैरते हुए पत्‍थर आज भी रामेश्वरम में देखे जाते हैं। वाल्मीकि की रामायण में सबसे पहले राम सेतु का उल्लेख किया गया है। पौराणिक रूप से यह पुल भगवान राम की वानर सेना द्वारा निर्मित माना जाता है। सेना के एक वानर नाला ही थे, जिन्होंने सेना के अन्य सदस्यों को पुल बनाने का निर्देश दिया था। रावण से अपनी पत्नी सीता को बचाने के लिए भगवान राम को लंका पहुंचने में मदद करने के लिए पुल का निर्माण किया गया था। दिलचस्‍प बात यह है कि सेतु बनाते समय सभी पत्थरों पर भगवान राम का नाम उकेरा गया था। इससे भी दिलचस्‍प बात ये है कि जब पत्‍थरों पर चलकर पुल पार किया गया, तो यह चमत्‍कार ही था कि पत्‍थर डूबे नहीं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसे भगवान राम ने वानर सेना की मदद से बनवाया था। उन्हें श्रीलंका पहुंचने के लिए इस पुल का निर्माण करना पड़ा। दरअसल, रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण कर उन्हें वहीं कैद कर लिया गया था। हैरानी की बात यह है कि रामायण (5000 ईसा पूर्व) का समय और पुल का कार्बन एनालिसिस का तालमेल एकदम सटीक बैठता है। हालांकि, आज भी ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो यह बताता है कि पुल मानव निर्मित है। 15 वीं शताब्दी तक, पुल पर चलकर जा सकते थे। रिकॉर्ड बताते हैं कि, 1480 तक पुल पूरी तरह से समुद्र तल से ऊपर था।

कई बार विवादों में रहा रामसेतु राम सेतु मुद्दा एक बड़े विवाद में तब फंस गया जब यूपीए सरकार के दौरान सेतुसमुद्रम परियोजना को हरी झंडी दिखाकर सेतु के चारों ओर ड्रेजिंग करने का प्रस्ताव दिया गया, जिसमें दक्षिणपंथी निकायों और तत्कालीन विपक्षी भाजपा ने इसे हिंदू भावनाओं पर हमला बताया। राम सेतु पर विभिन्न अध्ययनों का प्रस्ताव किया गया है, सबसे हाल ही में 2021 में, जब सरकार ने इसकी उत्पत्ति का पता लगाने के लिए एक पानी के नीचे अनुसंधान परियोजना को मंजूरी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अक्टूबर महीने में रामसेतु केस से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना है कि यह एक प्रशासनिक विषय है, जिस पर कोर्ट सुनवाई नहीं करेगा। मामले से जुड़ी याचिका में कहा गया है कि समुद्र का पानी ऊपर आ जाने के चलते राम सेतु के दर्शन में कठिनाई होती है। अगर दोनों तरफ कुछ दूरी तक एक दीवार बना दी जाए, तो रामसेतु आसानी से दिखाई पड़ेगा। यह याचिका हिंदू पर्सनल लॉ बॉर्ड के अध्यक्ष अशोक पांडे ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। याचिका में ये भी कहा गया है कि दीवार बन जाने के बाद दुनिया भर के लोग पुल के दर्शन के लिए धनुषकोडी जा सकेंगे वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि कोर्ट दीवार बनाने का निर्देश कैसे दे सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक अन्य याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राम सेतु को एक नेशनल हैरिटेज घोषित कर दिया जाए।

क्या शाहरुख खान के कम बैक से डर गए हैं बाकी अभिनेता?

वर्तमान में बाकी के अभिनेता शाहरुख खान के कम बैक से डर चुके हैं! बीते साल शाहरुख खान ने अपनी तीन ब्लॉकबस्टर फिल्मों से दुनियाभर में 2500 करोड़ से ज्यादा की कमाई करके सबको हैरान कर दिया। पांच साल बाद ‘पठान’ से कमबैक कर उन्होंने ‘जवान’ और ‘डंकी’ जैसी हिट फिल्में दीं। सभी में उन्होंने जमकर एक्शन किया और दर्शकों को खूब हंसाया। उनका मनोरंजन किया। मगर उनके इस कमबैक से चारों तरफ खलबली मच गई। अब खबर है कि बाकी दोनों खान यानी आमिर और सलमान भी किंग खान की राह पर चलने की प्लानिंग कर रहे हैं।  साल 2023 में लंबे अरसे बाद बॉक्स ऑफिस पर जोरदार वापसी करके शाहरुख खान ने सबको हैरान कर दिया। कहा जा रहा है कि बीते साल दो सुपरहिट व एक हिट फिल्म देने के बाद शाहरुख जल्दी ही अपनी नई फिल्मों की घोषणा करने वाले हैं। जानकारों की मानें, तो सबसे पहले वह अपनी बेटी सुहाना खान के साथ फिल्म ‘द किंग’ में नजर आएंगे। इसके बाद उनके डायरेक्टर विशाल भारद्वाज व डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के साथ फिल्में करने की चर्चा है। साथ ही उनके डायरेक्टर फराह खान, एटली या लोकेश कनगराज में से किसी एक साउथ डायरेक्टर के साथ भी एक फिल्म करने की चर्चा है। वहीं फैंस तो ‘टाइगर वर्सेज पठान’ के अलावा शाहरुख के ‘धूम 4’ भी करने की डिमांड कर रहे हैं। बहरहाल, किंग खान के लंबे ब्रेक के बाद जोरदार वापसी के हिट ट्रेंड को देखते हुए बाकी दोनों खान सितारे भी सलमान और आमिर भी उनकी ही राह पर चलने की प्लानिंग करते नजर आ रहे हैं।

सलमान खान की बीते साल दो फिल्में ‘किसी का भाई किसी की जान’ और ‘टाइगर 3’ रिलीज हुईं। पहली फिल्म 100 करोड़ व दूसरी 200 करोड़ क्लब में एंट्री कर पाई। इससे पहले उनकी फिल्मों राधे व अंतिम को भी अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला था। ऐसे में, चर्चा है कि सलमान भी किंग खान की तर्ज पर धमाकेदार वापसी करने की प्लानिंग कर रहे हैं। यही वजह है कि इस साल उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। जानकारों की अगर मानें, तो फिलहाल भाईजान एक्टिंग से ब्रेक लेकर कड़ी मेहनत में जुटे हैं। चर्चा है कि सलमान ने शेरशाह जैसी हिट फिल्म बना चुके डायरेक्टर विष्णु वर्धन के साथ एक फिल्म द बुल साइन की है, जिसके निर्माता करण जौहर होंगे। सलमान की इस पैन इंडिया फिल्म में साउथ की हीरोइन सामंथा रुथ प्रभु के उनके अपोजिट काम करने की बात कही जा रही है। यह फिल्म भारतीय सेना के एक कमांडो ऑपरेशन पर आधारित होगी। इसके अलावा पिछले दिनों सलमान के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म इंशाअल्लाह पर काम शुरू करने की भी चर्चा हुई थी, जो उनके बीच मतभेदों के चलते कई साल पहले अटक गई थी। स्पाई यूनिवर्स की फिल्म टाइगर वर्सेज पठान के अलावा सलमान के अपने चहेते डायरेक्टर सूरज बड़जात्या के साथ एक पारिवारिक फिल्म प्रेम की शादी में काम करने की चर्चा है। वहीं भाईजान के करीबी सूत्रों का यह भी कहना है कि वह जल्द ही अपनी सुपरहिट फिल्मों के सीक्वल दबंग 4 व किक 2 पर भी काम शुरू कर सकते हैं।

मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान की आखिरी सुपरहिट फिल्म साल 2016 में आई फिल्म दंगल थी। उसके बाद उनकी फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार को भी ठीकठाक रिस्पॉन्स मिला। लेकिन उनकी फिल्मों ठग्स ऑफ हिंदोस्तान व लाल सिंह चड्ढा को फ्लॉप की श्रेणी में शामिल किया गया। ऐसे में आमिर भी ऐक्टिंग से कुछ दिनों का ब्रेक लेकर अपनी आने वाले फिल्मों की तैयारी में जुट गए। पिछले दिनों धूमधाम से अपनी बेटी आइरा की शादी करने वाले आमिर ने अपने प्रॉडक्शन हाउस के बैनर तले राजकुमार संतोषी के साथ एक फिल्म लाहौर 1947 घोषित की है। इसमें लीड रोल में सनी देओल होंगे। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि खुद आमिर भी इसमें नजर आएंगे या नहीं। इसके अलावा सुपरहिट तारे जमीन पर के बाद आमिर ने एक और फिल्म सितारे जमीन पर की घोषणा की है। हालांकि अभी तय नहीं है कि वह इस साल क्रिसमस पर कौन सी फिल्म रिलीज करने वाले हैं। बता दें कि आमिर खान हॉलिवुड फिल्म चैपियंस का रीमेक भी बनाना चाहते थे। लेकिन लाल सिंह चड्ढा की असफलता के बाद शायद वह इसे प्रोड्यूस करने की प्लानिंग कर रहे हैं। साथ ही पिछले दिनों उनके एडवोकेट उज्जवल निकम की बायॉपिक भी करने की खबर आई थी। इन सबके अलावा फैंस आमिर खान से उनकी सुपरहिट फिल्मों 3 इडियट्स, गजनी और पीके के सीक्वल पर भी काम शुरू करने की डिमांड कर रहे हैं। पिछले दिनों आमिर के अपने बेटे जुनैद के लिए भी एक फिल्म बनाने की खबर आई थी। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आमिर ने फिल्मी पर्द पर जबर्दस्त वापसी के लिए क्या प्लानिंग की है।

बीते साल शाहरुख खान ने करीब चार साल के लंबे इंतजार के बाद बड़े पर्दे पर जोरदार वापसी की। इससे पहले आखिरी बार वह साल 2018 में क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्म जीरो में नजर आए थे। उसके बाद किंग खान ने कुछ समय के लिए ग्लैमर की दुनिया से दूरी बना ली थी। जानकारों के मुताबिक शाहरुख ने अपना समय स्क्रिप्ट पढ़ने और लोगों से मिलने में बिताया। तमाम ऑप्शंस में से उन्होंने अपने लिए अलग अलग जॉनर की तीन फिल्मों पठान, जवान और डंकी को चुना। इस फिल्म उन्होंने स्पाई यूनिवर्स की साइन की, तो दूसरी ओर पहली बार साउथ डायरेक्टर एटली के साथ अपने प्रॉडक्शन हाउस के तले फिल्म बनाई। वहीं तीसरी फिल्म उन्होंने हर दिल अजीज डायरेक्टर राजकुमार हिरानी के साथ बनाई। जवान और पठान जहां ब्लॉकबस्टर रहीं। वहीं डंकी ने भी ठीक-ठाक प्रदर्शन किया। इन तीनों फिल्मों के बूते शाहरुख ने एक साल में दुनियाभर में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने का नया रेकॉर्ड बनाया।

इस बार के गणतंत्र दिवस पर क्या कुछ होने वाला है खास?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार के गणतंत्र दिवस पर क्या कुछ खास होने वाला है! गणतंत्र दिवस की तैयारियां शुरू हो गई हैं। रव‍िवार को भारतीय सेना के जवानों ने 26 जनवरी की परेड में दी जाने वाली 21 तोपों की सलामी के लिए रिहर्सल की। जवानों ने अपनी रिहर्सल के लिए स्वदेशी 105 एमएम फील्ड तोप का इस्तेमाल किया। इस तोप का उपयोग पहली बार 2023 में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान 21 तोपों की सलामी के लिए किया गया था। भारतीय तोपों ने ब्रिटिश 25-पाउंडर तोपों की जगह ले ली है। 21 तोपों की सलामी विशेष रूप से डिजाइन किए गए कारतूस या खाली राउंड से दी जाती है। इसका इस्‍तेमाल गोले दागने के बजाय फायरिंग की आवाज पैदा करने के लिए किया जाता है। इस बीच दिल्ली ईस्टर्न रेंज के एडिशनल सीपी सागर सिंह कलसी ने गणतंत्र दिवस से पहले शनिवार को शाहदरा जिले के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। सागर सिंह कलसी ने कहा, ‘गणतंत्र दिवस को देखते हुए हम कई व्यवस्थाएं कर रहे हैं। हमारा सिर्फ एक उद्देश्य है। समारोह का शानदार आयोजन कराना। सभी सीमाओं पर सुरक्षा जांच भी चल रही है।’देश में पहली बार ट्राई-सर्विस कंटिंजेंट इस साल के गणतंत्र दिवस परेड में मार्च करेगा।

भारतीय सेना की कैप्टन शरण्या राव ने बताया कि उन्हें गर्व है कि वह त्रि-सेवा दल की सैन्य यूनिट का नेतृत्व करेंगी। उन्होंने कहा, ‘मैं एक अतिरिक्त अधिकारी हूं और त्रि-सेवा दल की सैन्य यूनिट का नेतृत्व करूंगी। यह एक गर्व का क्षण है। इतिहास में पहली बार त्रि-सेवा दल मार्च करेगा।’ केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रीय कैडेट कोर की ओर से आयोजित गणतंत्र दिवस परेड शिविर में शामिल हुए। सिंह ने एनसीसी छात्रों की प्रशंसा की और कहा, ‘आज आपका प्रदर्शन देखने के बाद मैं कहना चाहूंगा कि यह उत्कृष्ट था। मैं ऐसे अद्भुत सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन के लिए एनसीसी छात्रों को बधाई और आशीर्वाद देना चाहता हूं। आपके समर्पण ने मुझे प्रेरित किया है। मुझे विश्वास है कि एनसीसी का प्रत्येक कैडेट ऐसे समर्पण और प्रतिभा से भरा हुआ है।’ यही नहीं आपको बता दें कि इस साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आ रहे हैं। खबर है कि उनकी यात्रा के दौरान वह दिल्ली के अलावा कई अन्य शहरों की भी सैर करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, तीन दिन की इस यात्रा के दौरान मैक्रों दिल्ली के आसपास किसी दूसरे शहर में भी जा सकते हैं। भारत और फ्रांस इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वह कम से कम समय में किसी दूसरे शहर तक जा सकते हैं। यह भी पता चला है कि गणतंत्र दिवस परेड में फ्रांसीसी सैन्य दल भी शामिल हो सकता है। भारत आने के दौरान मैक्रों 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात करेंगे।

मैक्रों इस साल गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि होंगे। यह भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने का संकेत है। मैक्रों की यात्रा की तैयारियों के लिए उनके राजनयिक सलाहकार ने शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की। एक विश्लेषक ने कहा कि भारत की तरह फ्रांस भी अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा का अनुसरण करता है और पीएम मोदी के मैक्रों के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। इससे पहले 2016 में गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद मुख्य अतिथि थे। मोदी इस साल फ्रांस में राष्ट्रीय दिवस बास्तिल डे समारोह और परेड के मुख्य अतिथि थे। भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ को चिह्नित करने के लिए एक सैन्य बैंड के नेतृत्व में 241 सदस्यीय त्रि-सेवा भारतीय सशस्त्र बल दल ने भी परेड में भाग लिया था। हाल के वर्षों में मेक इन इंडिया पहल के तहत फ्रांस भारत के शीर्ष रक्षा साझेदारों में से एक रहा है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 26 जनवरी, 2024 को गणतंत्र दिवस पर आयोजित होने वाली परेड में मुख्य अतिथि होंगे। इसी के साथ वह छठे फ्रांसीसी नेता बन जाएंगे जिन्हें भारत ने यह सम्मान प्रदान किया है। मैक्रों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आएंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने को लेकर भारत से मिले निमंत्रण पर पीएम मोदी धन्यवाद कहा था। इमैनुएल मैक्रों ने 22 दिसंबर को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, ‘आपके निमंत्रण के लिए धन्यवाद, मेरे प्रिय मित्र भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आपके गणतंत्र दिवस पर मैं आपके साथ जश्न मनाने के लिए रहूंगा!’

आखिर 75 सालों में कितनी बदली है अयोध्या?

आज हम आपको बताएंगे कि 75 सालों में अयोध्या आखिर कितनी बदली है! 23 दिसंबर साल 1949, राम जन्मभूमि चौकी के चौकीदार अब्दुल बरकत को तड़के घंटा-घड़ियाल’ की आवाज और ‘भये प्रगट कृपाला, ‘ के भजन सुनाई देने लगे। बरकत बरबस ही बाबरी मस्जिद की ओर खिंचे चले गए। उन्होंने जो वहां देखा, उसके मुताबिक, पूर्व विश्व हिंदू परिषद उपाध्यक्ष जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल ने अपनी किताब ‘श्री राम जन्मभूमि: ऐतिहासिक और कानूनी परिदृश्य’ में संक्षेप में बताया है। बकौल अब्दुल बरकत, उन्होंने प्रकाश की एक चमक देखी जो सोने की हो गई और तभी उन्होंने वह देखा जो शायद किसी को सपने में भी नसीब न हो। बरकत ने बताया कि उस चमक के साथ उन्हें चार या पांच साल के बहुत सुंदर भगवान जैसे बच्चे का चित्र दिखाई दिया। यही नहीं अब्दुल बरकत को मस्जिद के अंदर सिंहासन पर रखी मूर्ति की आरती करते हुए हिंदुओं की भीड़ भी दिखी। वह 4 या 5 साल का नन्हा बालक कोई और नहीं बल्कि रामलला थे। मतलब साक्षात प्रभु श्री राम। लला या लल्ला अवध क्षेत्र में छोटे लड़कों के लिए एक प्रेमपूर्ण शब्द है। रामलला का प्रकट होना राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के 491 साल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। इसके बाद मुसलमानों ने भगवान राम की उस मूर्ति के चमत्कार पर सवाल उठाया और अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत अभिराम दास पर 9 इंच की मूर्ति रखने का आरोप लगाया। जब जिला मजिस्ट्रेट केके नायर और शहर मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह से मूर्ति हटाने को कहा गया तो उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और यूपी के मुख्यमंत्री जीबी पंत समेत अपने बड़े अधिकारियों की अवज्ञा की। राज्य सरकार ने तब मस्जिद को बंद कर दिया, लेकिन हिंदुओं को बाहर से राम लला विराजमान की पूजा करने की अनुमति दे दी। यहां से मुकदमों की एक श्रृंखला शुरू हुई। हिंदू पक्ष से दिगंबर अखाड़ा के प्रतिनिधियों ने 1950 में और इसके बाद निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। 1961 में, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद और उसके आसपास के कब्रिस्तान पर दावा किया। फिर जुलाई 1989 में, रामलला विराजमान ने जस्टिस अग्रवाल के माध्यम से खुद अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्होंने मस्जिद को हटाने और विवादित जमीन वापस मांगी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से रामलला के दावे को आंशिक रूप से स्वीकार करने और उन्हें निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को 2.77 एकड़ जमीन का एक तिहाई हिस्सा देने से पहले कई साल बीत गए। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर, 2019 के अपने फैसले में राम लल्ला को पूरी जमीन दे दी। इसने इस स्थान को ‘राम का जन्म स्थान’ के रूप में मान्यता दी।

निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने 15 जनवरी, 1885 को विवादित जमीन का आंशिक दावा वापस लेने के लिए पहला मुकदमा दायर किया था। वह मस्जिद के सामने राम चबूतरा नामक चौकी पर एक मंडप बनाना चाहते थे। लेकिन सब-जज हरकिशन सिंह ने उनकी दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे तनाव बढ़ सकता है। जिला जज कर्नल FEA चैमियर अधिक सहानुभूतिपूर्ण थे, उन्होंने स्वीकार किया कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है, लेकिन उन्होंने यथास्थिति बनाए रखते हुए कहा कि 350 साल पहले की गई गलती को सुधारने में बहुत देर हो गई है।

तीन गुंबद वाली बाबरी मस्जिद 1528 ई. में बनाई गई थी। ऐसा माना जाता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने भगवान राम की जन्मस्थली के तौर पर एक मंदिर को गिराया था। तब से हिंदू उस जमीन को वापस पाने की कोशिश कर रहे थे। सम्राट अकबर के समय में उनके लिए राम चबूतरा बनाया गया था, लेकिन उनके परपोते औरंगजेब के शासन में यह विवाद और बढ़ गया। कुछ स्रोतों के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह की सेना भी राम जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए लड़ाई में शामिल हुई थी। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के अधीन, ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर जेम्स आउटराम ने मस्जिद को लेकर सांप्रदायिक संघर्ष की सूचना दी थी। इसलिए 1859 में, जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन आया, तो अदालत ने मस्जिद का आंतरिक प्रांगण मुसलमानों को और चबूतरे वाला बाहरी प्रांगण हिंदुओं को सौंप दिया।

6 दिसंबर, 1992 को कार सेवा को फिर से शुरू करने का दिन तय किया गया था। कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल पर कोई स्थायी निर्माण नहीं होगा। लेकिन उस दिन, 1.5 लाख कार सेवकों ने मस्जिद को ध्वस्त कर दिया, जिससे देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें 2,000 से अधिक लोग मारे गए। केंद्र सरकार की ओर से उनकी सरकार बर्खास्त करने और यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू करने से पहले कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने इसके बाद दो दशकों से अधिक समय तक मंदिर के मुद्दे को जिंदा रखा, जब तक कि 2014 में उसे केंद्र में भारी जनादेश नहीं मिला। 2019 में जब अनुकूल सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब तक नरेंद्र मोदी बड़े जनादेश के साथ पीएम के रूप में दूसरी बार वापस आ चुके थे और यूपी में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री थे, जिनकी गोरखपुर पीठ तीन पीढ़ियों से मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई है।

जानिए आचार्य गिरिराज किशोर की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको आचार्य गिरिराज किशोर की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! पिछले वर्ष देश ने एक सुखद रिकॉर्ड बनाया। रिकॉर्ड है देहदान का। मृत्यु के बाद शरीर के अंगों का उपयोग किसी मरीज के जीवन बचाने या फिर उनके किसी अंग के अभाव को पूरा करने में हो जाए, इसका संकल्प करने वालों की तादाद देश में पहली बार चार अंकों में पहुंच गई। पिछले वर्ष कुल 1,028 लोगों ने देह दान किया। देश में देहदान की परंपरा अभी भी जोर नहीं पकड़ सकी है। इसके पीछे का मूल कारण है धार्मिक नियम। हमारा देश हिंदू बहुल है। हिंदू सनातन धर्म के आदेशों से शासित हैं। सनातन में मोक्ष का सर्वोच्च महत्व है। मृत्यु के बाद आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो, इसके लिए शव का विधिवत दाह संस्कार करने और फिर श्राद्ध का विधान है। इस कारण हिंदुओं में यह धारणा गहरे पैठी है कि शव का अंतिम संस्कार नहीं हो तो मृतक की आत्मा भटकती रहती है, उसे मोक्ष नहीं मिल पाता है। इसी तरह दूसरे धर्मों में भी मृत्यु के बाद शव का क्या किया जाए, इसके अलग-अलग नियम हैं। संबंधित धर्म के लोग मृतक के शव का वही विधान करते हैं जो उन्हें धार्मिक नियम बताते हैं। लेकिन कई ऐसे भी महापुरुष होते हैं जो बदलती परिस्थितियों में समाज को नई दिशा देने के लिए धार्मिक परंपराओं के दायरे से निकल जाते हैं। आचार्य गिरिराज किशोर भी वैसी ही एक महान आत्मा का नाम है। वो अब इस दुनिया में नहीं रहे।

आज जब अयोध्या के राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम से पूरा देश राममय हो गया है और दूसरी तरफ रिकॉर्ड देहदान की खबर आई है, तब आचार्य गिरिराज किशोर को याद करना बेहद प्रासंगिक है। आचार्य गिरिराज किशोर की धार्मिक आस्था इतनी प्रबल थी कि उन्होंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन किया। कर्मकांड के प्रति गहन आस्थावान आचार्य गिरिराज किशोर ने अपने देहदान का संकल्प लिया था और जब उनका निधन हुआ तो उनकी इच्छा के मुताबिक उनके शव का दान कर दिया गया। आचार्य गिरिराज किशोर हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। वो आजीवन कुंवारे रहे और सामाजिक कल्याण के लिए कठोर संघर्ष किया। उन्होंने निराश्रित बच्चों की शिक्षा के लिए विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। दूसरी तरफ, उन्होंने सनातन की रक्षा के लिए ईसाई मिशनरियों से भी खूब लड़ाई लड़ी। इसाई मिशनरी देश के कोने-कोने में धोखाधड़ी से धर्मांतरण करते रहे हैं। यह आज भी धड़ल्ले से जारी है। किशोर ने गोरक्षा आंदोलन का भी नेतृत्व किया।

आचार्य गिरिराज किशोर ने आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल नेताओं की एक पूरी पीढ़ी का मार्गदर्शन किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस में कई प्रमुख योगदान दिए। किशोर हिंदी साहित्य, इतिहास और राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासल की थी। वो साहित्य और संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने आरएसएस के प्रभाव में आजीवन कुंवारे रहने का संकल्प पूरा किया। 1948 में सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया तो किशोर को 13 महीने जेल में बिताने पड़े।आचार्य गिरिराज किशोर ने स्पष्ट कहा, ‘मंदिर निर्माण के द्वारा राष्ट्र का स्वाभिमान जागृत होगा और स्वाभिमानी राष्ट्र ही उन्नति कर सकता है, अन्य कोई नहीं।’ जब चावला ने कहा कि देश का निर्माण आर्थिक प्रगति से होता है तो किशोर ने कहा ऐसा नहीं है। वो कहते हैं, ‘इट इज नॉट द गोल्ड दैट मेक द नेशन, इट इज मैन हू मै द नेशन।’

उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास से ज्यादा जरूरी है व्यक्ति निर्माण का कार्य और मंदिर निर्माण से स्वाभिमान का निर्माण होगा। स्वाभिमानी व्यक्ति ही समाज में साकारात्मक योगदान दे सकता है। आचार्य गिरिराज किशोर ने बाबरी मस्जिद को पराधीनता का चिह्न बताया और पूछा कि आजादी के बाद कांग्रेस की सरकारों को गुलामी के ऐसे चिह्नों को मिटा देना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उस वक्त गिरिराज किशोर विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष थे।

हिंदू अधिकारों, सामाजिक कल्याण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति किशोर की अटूट प्रतिबद्धता ने वीएचपी पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ा। किशोर ने विहिप की युवा शाखा बजरंग दल के प्रमुख संरक्षक के रूप में भी कार्य किया। गिरिराज किशोर का 13 जुलाई, 2014 की रात विहिप मुख्यालय में निधन हुआ था। तब वो 94 वर्ष थे। आचार्य गिरिराज किशोर की इच्छा के मुताबिक उनका शव दधीचि देहदान समिति के माध्यम से दिल्ली के आर्मी मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया गया था।

क्या भारत से नफरत करने लगे हैं मालदीव के राष्ट्रपति?

वर्तमान में मालदीव के राष्ट्रपति भारत से नफरत करने लगे हैं! नफरत जहर है। खुद को ही मारता है। किसी से नफरत में अंधापन खुद को ही नुकसान पहुंचाता है। लेकिन शख्स को पता नहीं चलता क्योंकि आंखों पर नफरत की पट्टी जो बंधी होती है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू का भी यही हाल है। भारत की नफरत में वह इतने अंधे हो चुके हैं कि अपने ही नागरिकों की जान जाने का कोई परवाह नहीं है। मालदीव में एक 13 साल का बच्चा तड़प-तड़पकर मर गया। अगर समय पर इलाज मिलता तो उसकी जान बच सकती थी। लेकिन इलाज में देरी हुई क्योंकि मालदीव की सरकार मेडिकल इमर्जेंसी में भारत के भेजे हेलिकॉप्टरों और प्लेन का इस्तेमाल नहीं करना चाहती जबकि ये भेजे ही इसीलिए गए हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि चीन की गोद में बैठे मुइज्जू को भारत से नफरत है। लेकिन इतनी भी क्या नफरत मिस्टर मुइज्जू कि एक मासूम तड़प-तड़पकर मर जाए? कुछ लोकल मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है मुइज्जू ने बच्चे को एयरलिफ्ट करने के लिए भारत के भेजे डोर्नियर विमान का इस्तेमाल करने को मंजूरी नहीं दी। मुइज्जू चीन के कठपुतली हैं ये जगजाहिर है। वह भारतविरोधी हैं ये भी जाहिर है। लेकिन विरोध तक तो ठीक है। मुइज्जू के लिए ये विरोध तो भारत के प्रति नफरत में तब्दील हो गया है। अंधी नफरत में। लोकल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 13 साल के बच्चे को ब्रेन ट्यूमर था। वह एक सुदूरवर्ती द्वीप विलमिंगटन का रहने वाला था जो गाफ अलिफ विलिंगिली द्वीपसमूह का हिस्सा है। वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधा मौजूद नहीं हैं। ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित बच्चे को स्ट्रोक आया था और परिवार इलाज के लिए उसे एयरलिफ्ट कर राजधानी माले ले जाना चाहता था। वाकया बुधवार रात का है। बच्चे का परिवार अधिकारियों और दफ्तरों में गुहार लगाता रहा कि उसके बच्चे को बचा लीजिए, एयरलिफ्ट करा दीजिए लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बच्चे की हालत बिगड़ती चली गई। गाफ अलिफ विलिंगिली के जिस अस्पताल में बच्चे का इलाज चल रहा था वहां लोग सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने लगे। बच्चे को एयरलिफ्ट करने में हो रही देरी से लोगों में रोष था। आखिरकार 16 घंटे बाद गुरुवार सुबह उसे एयरलिफ्ट किया गया लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और बच्चा बचाया नहीं जा सका। भारत ने मालदीव को जो हेलिकॉफ्टर और डोर्नियर विमान दिए हैं उनका काम ही मानवीय मदद करना है। रेस्क्यू की जरूरत पड़ने या मेडिकल इमर्जेंसी की स्थिति में उनका इस्तेमाल होता है। लेकिन वह बच्चा तड़प-तड़पकर मर गया और उसे समय से एयरलिफ्ट नहीं किया जा सका क्योंकि मुइज्जू नहीं चाहते कि मेडिकल इमर्जेंसी में भारत के भेजे हेलिकॉप्टर या विमानों का इस्तेमाल हो।

मुइज्जू ने पिछले साल हुए चुनाव में ‘इंडिया आउट’ का अभियान चलाया था। उन्होंने मालदीव से भारतीय सैनिकों को बाहर निकालने के वादे के साथ चुनाव लड़ा था। ये सैनिक प्राकृतिक आपदा या किसी भी मुश्किल के वक्त में मानवीय मदद पहुंचाने और ट्रेनिंग देने के लिए मालदीव में हैं। मालदीव सरकार ने भारतीय सैन्यकर्मियों को उनके ऑपरेशन और मेंटिनेंस की जिम्मेदारी से हटने को कहा है। इससे मालदीव में भारतीय हेलिकॉप्टर और विमानों के इस्तेमाल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत से 15 मार्च तक अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए कहा है। हालांकि, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में आपसी सहमति से समाधान निकालने के लिए दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब मुइज्जू की भारत से अंधी नफरत की बेदी पर किसी मासूम की बलि चढ़ी है। कुछ दिन पहले ही एक और लड़के की इस वजह से मौत हो गई थी क्योंकि मुइज्जू ने डोर्नियर विमान को तैनात करने की इजाजत नहीं दी थी। मुइज्जू सरकार की इस हरकत के खिलाफ मालदीव के लोगों में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। स्थानीय लोगों ने अस्पताल के बाहर मुइज्जू सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा दिखा। आम लोगों के साथ-साथ राजनेताओं और बुद्धिजीवियों में भी नाराजगी दिख रही है। मालदीव के सांसद मिकैल नसीम ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘भारत के प्रति राष्ट्रपति की दुश्मनी को संतुष्ट करने के लिए लोगों की जान नहीं ली जानी चाहिए।’ संयुक्त अरब अमीरात में मालदीव के पूर्व डेप्युटी एम्बेसडर रहे मोहम्मद फैजल ने लिखा, ‘कुछ ही दिन पहले, एक अद्दू फैमिली ने समुद्र के पास अपने बेटे को इसलिए खोया कि मुइज्जू ने डोर्नियर की तैनाती से इनकार कर दिया था। आज जीए विलिंगिली के एक और युवा लड़के को अपनी जान गंवानी पड़ी जबकि डोर्नियर संभवतः उसे बचा सकता था। मुइज्जू के तुच्छ अभिमान के लिए और कितनी जिंदगियां कुर्बान होंगी।’ लोगों में रोष है। आक्रोश है। एक राष्ट्रपति का किसी देश के प्रति नफरत में अंधा हो अमानवीय हो जाना दुखद है।

मिस्टर मुइज्जू, भारत से इतनी भी क्या नफरत? कम से कम मानवता का ही ध्यान रखे होते। नफरत में अपने ही लोगों पर अमानवीय हो जाना कहां तक ठीक है? नफरत के अंधेपन में मानवीय गरिमा को तो ताक पर मत रखिए मिस्टर मुइज्जू! हम तो सिर्फ इतना ही कहेंगे- गेट वेल सून मुइज्जू। ईश्वर आपको सद्बुद्धि दें।

जानिए कैसी हुई अयोध्या धाम की सुरक्षा?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर अयोध्या धाम की सुरक्षा कैसे की गई! आखिरकार लंबे इंतजार के बाद वो शुभ घड़ी आ गई जब श्रीरामलला अपने टेंट से भव्य और दिव्य मंदिर में स्थापित हो गए । 22 जनवरी को प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है। उधर इस कार्यक्रम के मद्देनजर अयोध्या की सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य किले में तब्दील हो गई है। अयोध्या का सुरक्षा कवच इतना बेजोड़ है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। क्योंकि राम नगरी में जल, जमीन से लेकर आसमान तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं। यूपी के स्पेशल डीजी प्रशांत कुमार ने बताया यूपी पुलिस के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण है। जितनी बड़ी चुनौती है, उतनी ही बड़ी अपॉर्चुनिटी भी है। उन्होंने बताया कि व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। ट्रैफिक का डायवर्जन अयोध्या के आसपास के जिलों से ही कर दिया गया है। बीते शाम से अयोध्या में सिर्फ वही गाड़ियां जा रही है, जिनको जिला प्रशासन ने जाने की अनुमति दी है या फिर जिन वीवीआईपी को ट्रस्ट की ओर से आमंत्रित किया गया है। इसके साथ प्रशांत कुमार ने बताया कि जो कैटिगराइज्ड वीआईपी है, उनके लिए पुलिस स्कॉट की व्यवस्था लखनऊ या फिर अयोध्या एयरपोर्ट से ही किया गया है।

स्पेशल डीजी एलओ ने बताया कि कार्यक्रम में बैठने की व्यवस्था ट्रस्ट की ओर से की गई है। लेकिन वहां पर पुलिस की व्यवस्था भी रहेगी। उन्होंने बताया कि सेक्टर की तरह बांटकर विभिन्न भाषायों का ज्ञान रखने वाले अधिकारियों को वहां पर तैनात किया जाएगा। इसके अतिरिक्त वहां जो भी अधिकारी रहेंगे उसमें अधिकतर लोग सादे कपड़ों में रहेंगे। साथ ही कुछ आवश्यक अधिकारी शस्त्र के साथ भी वहां मौजूद रहेंगे। प्रशांत कुमार ने बताया कि राम मंदिर परिसर और उसके आसपास के इलाकों में सीसीटीवी लगाए गए हैं। उसमें एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। पूरे अयोध्या जिले में लगभग 10000 सीसीटीवी कैमरा लगाए गए हैं।

अयोध्या में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी वीआईपी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। प्रशांत कुमार ने बताया कि इस बार पुलिस व्यवस्थाओं में टेक्नोलॉजी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। केंद्र व राज्य सरकार की एजेंसियों के साथ पूरी तरह से समन्वय बनाकर रियल टाइम इन्फॉर्मेशन शेयरिंग है। इसके साथ ही सीमलेस इन्फॉर्मेशन उनके साथ है। इसके अलावा सरयू नदी के रास्तों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्ट्रीट बोट की व्यवस्था की गई है। डीजी एलओ ने कहा कि सुरक्षा के लिए एंटी ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही भीड़ को मैनेज करने के लिए ड्रोन इत्यादि का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। वहीं अयोध्या के लता मंगेशकर चौक पर रैपिड एक्शन फोर्स के जवान भी तैनात कर दिए गए हैं।

वहीं सूत्रों के मुताबिक अयोध्या में कल होने वाले प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए त्री-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। प्रदेश सरकार द्वारा मंदिरों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के लिए गठित स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स, सीआरपीएफ और यूपी पुलिस 22 जनवरी को श्रीराम मंदिर की सुरक्षा में तैनात रहेगी। वहीं एनएसजी द्वारा ट्रेंड एसएसएफ के लगभग 100 कमांडो मंदिर परिसर और उसके आसपास की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके साथ ही सीआरपीएफ के जवान रामलला के गर्भगृह वाले मुख्य मंदिर में तैनात रहेंगे। साथ ही एसएसएफ के 1400 के करीब जवान मंदिर के बाहर रेड जोन में सुरक्षा में तैनात रहेंगे। इसके साथ ही यलो जोन में यूपी पुलिस और पीएसी के जवान तैनात रहेंगे। इसमें एसएसएफ के जवान भी गश्त करते रहेंगे। यूपी पुलिस की अतिरिक्त बल, ड्रोन, सीसीटीवी से भी सुरक्षा की निगरानी करेगी।

वहीं इस कार्यक्रम में पीएम मोदी समेत 8 हजार के करीब मेहमानों के पहुंचने की उम्मीद है। इसमें कई वीवीआईपी गेस्ट भी शामिल है। इसको देखते हुए ट्रैफिक डायवर्जन से लेकर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किया गया है। शहर के एंट्री प्वाइंट से लेकर राम मंदिर तक चप्पे-चप्पे पर पुलिस, सीसीटीवी और एटीएस के कमांडो तैनात किए जा रहे हैं। छावनी में तब्दील हुई राम नगरी में ब्लैककैट कमांडो, बख्तरबंद गाड़ियां और ड्रोन की व्यवस्था की गई है।

श्रीराम लला प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों के वाहनों की पार्किंग के लिए पुख्ता इंतजाम किये हैं। अयोध्या धाम में पार्किंग के लिए 51 स्थानों को चिन्हित किया गया है। इन पार्किंग में 22,825 वाहनों को पार्क किया जा सकेगा। पार्किंग स्थलों को गूगल मैप पर अपलोड कर दिया गया है। वहीं पार्किंग स्थलों को वीवीआईपी, वीआईपी और अन्य मेहमानों के लिए भी रिजर्व किया गया है। इन पार्किंग को वायरलेस और पीए सिस्टम से लैस किया गया है। रामपथ और भक्ति पथ स्थित 6 पार्किंग स्थानों को वीवीआईपी मेहमानों के वाहनों के लिए रिजर्व किया गया है। यहां पर वीवीआईपी मेहमानों की 1225 गाड़ियां पार्क हो सकेंगी।

इसके अलावा धर्म पथ मार्ग और परिक्रमा मार्ग पर नौ पार्किंग स्थानों को वीआईपी के लिए रिजर्व किया गया है। यहां पर वीआईपी की दस हजार से अधिक गाड़ियों को पार्क किया जाएगा। इसके अलावा प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों के लिए अलग-अलग स्थानों पर पार्किंग को रिजर्व किया गया है। वहीं पुलिस फोर्स के लिए एनएच-27 में आठ पार्किंग स्थानों को रिजर्व किया गया है। यहां पुलिस की दो हजार से अधिक गाड़ियों को पार्क किया जाएगा। साथ ही यहां पर सुरक्षा के लिहाज से काफी पुख्ता इंतजाम किये गये हैं। इन पार्किंग स्थल की निगरानी ड्रोन से की जाएगी।

क्या भारत जोड़ो न्याय यात्रा के अलावा भी प्रचार प्रसार करेंगे कांग्रेसी नेता ?

अब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के अलावा भी कांग्रेस नेता प्रचार प्रसार करने जा रहे हैं! आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। एक तरफ जहां राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकाल रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं में चुनाव को लेकर जोश भरने के लिए आने वाले दिनों में कुछ सभाएं करने की योजना बनाई है। इस कवायद का मकसद अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश के साथ लोगों के बीच जाकर संपर्क और संवाद बनाना है। बताया जाता है कि कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को चुनाव के मद्देनजर आगामी रणनीति और तैयारियों से जुड़े गुरु मंत्र देने की योजना बनाई है। सूत्रों के मुताबिक, इसमें पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया जाएगा कि उन्हें जमीन पर पार्टी की बात, उसका संदेश, उसकी विचारधारा किस तरह लेकर जानी है। यह भी बताया जाएगा कि किन मुद्दों को जनता के बीच लेकर जाना है, किस तरह से बीजेपी के दुष्प्रचार की काट करनी है। कहा जा रहा है कि इस कवायद का एक मकसद अलग-अलग राज्यों में अपने वर्कर्स को I.N.D.I.A गठबंधन और घटक दलों के साथ मिलकर विपक्षी खेमे का प्रचार करने के लिए तैयार करना है। इसके मद्देनजर खरगे 31 जनवरी से शुरू हो रहे आगामी बजट सत्र से पहले कुछ राज्यों में सभाएं और बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं।

इस सिलसिले में रविवार को खरगे असम के कलियाबोर नागांव में एक विशाल रैली को संबोधित करेंगे, जहां राहुल गांधी की अगुवाई में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ भी मौजूद रहेगी। बताया जा रहा है कि असम में कांग्रेस के साथ गठबंधन में मौजूद कुछ क्षेत्रीय पार्टियां भी रैली का हिस्सा बन सकती हैं। कांग्रेस की योजना है कि यात्रा के दौरान हर प्रदेश में कम से कम एक ऐसी बड़ी रैली का आयोजन किया जाए, जहां राहुल गांधी के साथ-साथ खरगे भी मौजूद रहें। वहीं, आगामी 25 जनवरी को हैदराबाद में एक बड़ा आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष तेलंगाना राज्य भर से आए अपने बूथ वर्कर्स को संबोधित करेंगे। इस दौरान हैदराबाद में एक जनसभा का आयोजन भी हो सकता है। जबकि आगामी 27 जनवरी को तमिलनाडु में और 28 जनवरी को उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष सभाएं लेंगे। इन दोनों ही राज्यों में खरगे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की जनसभा में कांग्रेस के साथ सत्तारूढ़ डीएमके और वीसीके जैसे सहयोगी दल भी भाग ले सकते हैं।

बता दे कि सूत्रों के मुताबिक, बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव और भारत न्याय यात्रा को लेकर दिए गए तमाम तरह के निर्देश दिए। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा इन सभी से भी से अपने अपने इलाके में जुटने के लिए कहा गया। ये तमाम कॉर्डिनेटर्स केंद्रीय नेतृत्व और जिला इकाई के बीच समन्वय के तौर पर काम करेंगे। इन लोगों को बताया गया कि इस दौरान वॉर रूम कैसे काम करेगा, कैसे समन्वय करना है। उल्लेखनीय है कि यह तमाम समन्वय हर सीट पर इस तरह से काम करेंगे कि उस सीट पर पार्टी की स्थिति, संभावनाएं क्या हैं? अगर उस सीट पर पार्टी का प्रत्याशी है तो उसके लिए माहौल बनाना या फिर अगर गठबंधन का उम्मीदवार है तो उस दल के साथ कॉर्डिनेशन करना भी इन्हीं की जिम्मेदारी रहेगी। इनका काम चुनाव की शुरुआत से लेकर चुनाव प्रचार व वोटिंग तक रहेगा। उल्लेखनीय है कि ये लोग पार्टी के अलावा गठबंधन को भी फीडबैक देंगे।

वहीं दूसरी ओर इन समन्वयकों से कहा गया कि यह अपने अपने इलाकों में राहुल गांधी नीत भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना सुनिश्चित करें। यात्रा के उद्देश्य, सोच व संदेश तक जमीन तक लोगों के बीच ले जाएं। शुक्रवार को सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस की गठबंधन के घटक दलों के साथ भी मीटिंग होनी है।28 जनवरी को उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष सभाएं लेंगे। इन दोनों ही राज्यों में खरगे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की जनसभा में कांग्रेस के साथ सत्तारूढ़ डीएमके और वीसीके जैसे सहयोगी दल भी भाग ले सकते हैं। इनमें एसपी व आम आदमी पार्टी के साथ बैठक होनी है। यूपी को लेकर कांग्रेस की गठबंधन समिति की एसपी नेताओं के साथ मुलाकात होनी है। वहीं आप के साथ दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों पर चर्चा होनी है।

राम मंदिर के इतिहास में क्यों खास है 1 फरवरी 1986 का दिन?

राम मंदिर के इतिहास में 1 फरवरी 1986 का दिन बेहद ही खास है! रामचरित मानस के बालकांड की यह चौपाई आज सही साबित हो रही है। कई वर्षों के संघर्षों और बलिदान के बाद भगवान राम अपने घर, अपनी अयोध्या वापस आ रहे हैं। राम नगरी की सुंदरता तो जैसे इस समय देखते ही बनती है। अयोध्या से लेकर यूपी और पूरे देश में बस रामा-राम ही हो रहा है। 22 जनवरी 2024 की तारीख देश के इतिहास में दर्ज हो जाएगी वो भी सुनहरे अक्षरों से। दोपहर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के बाद राम और उनकी अलौकिक मूर्ति वहां सदा के लिए विराजमान हो जाएगी। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने अपनी किताब कुछ ऐसा लिखा है कि हमें इतिहास में दोबारा लौटना होगा। ज्यादा पीछे नहीं बस 38 साल पहले। मतलब साल 1986 जब वहां विवादित बाबरी मस्जिद थी और वहां के दरवाजे खोले गए थे। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के काल में यह हुआ था। अय्यर की किताब में इस बात का जिक्र है। बकौल मणिशंकर अय्यर राम मंदिर बाबरी मस्जिद को तब हिंदू मंदिर ही कहते थे का ताला खुलवाने के लिए राजीव गांधी जिम्मेदार नहीं थे बल्कि कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार थी। इस बात के बाद हम आपको उस तारीख की बात बताएंगे। राम मंदिर का ताला खुलने के पीछे की इनसाइड स्टोरी बताएंगे। इसे फिर से समझने के लिए हमें दोबारा फ्लैसबैक में जाना होगा। घटना आज से 38 साल पहले 31 जनवरी 1986 की है। तब केंद्र में इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी सत्ता संभाल रहे थे। उत्तर प्रदेश में भी उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। वीर बहादुर मुख्यमंत्री थे। यूपी के फैजाबाद के एक वकील उमेश चंद्र ने राम मंदिर का ताला खुलवाने के लिए जिला अदालत में एक याचिका दायर कर रखी थी। याचिका को मंजूर करते हुए जिला अदालत ने मंदिर खोलने का आदेश दे दिया। इसके बाद 1 फरवरी को राम मंदिर के ताले 37 साल बाद से जो बंद पड़े थे खोल दिए गए। ताला खुलते ही बड़ी संख्या में हिंदू तीर्थयात्री, जो जानबूझकर इकट्ठे हुए थे, अंदर आ गए और राजीव को इसके बारे में कुछ नहीं पता था। तब गृह राज्य मंत्री अरुण नेहरू थे। अरुण नेहरू ने उस समय एक बयान देकर सियासी हलकों में भूचाल ला दिया। अरुण कुमार ने कहा कि ये ताले राजीव गांधी ने खुलवाए थे। इस बयान के आने के बाद एक समुदाय राजीव गांधी को दोष देना लगा जबकि राजीव गांधी को फैजाबाद जिला अदालत के इस फैसले के बारे में कुछ पता ही नहीं था।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अरुण कुमार के इस बयान का खंडन उस समय पीएमओ में सचिव रहे वजाहत हबीबुल्लाह ने किया था। हबीबुल्लाह ने बताया कि राजीव गांधी ने ताला खोलने को नहीं कहा था। क्योंकि राजीव को अजदालत के आदेश की जानकारी ही नहीं थी। यह भी सच है कि अरुण कुमार ने कभी वजाहत हबीबुल्लाह के इस बयान का खंडन नहीं किया। इसका जिक्र मणिशंकर अय्यर ने अपनी किताब ‘द राजीव आई न्यू एंड व्हाय ही वाज़ इंडियाज मोस्ट मिस अंडरस्टॉड प्राइम मिनिस्टर’ में कही हैं। अय्यर ने लिखा कि बाबरी मस्जिद के दरवाजे खोलने के लिए पार्टी जिम्मेदार थी, न कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और इसमें भाजपा की ओर से पोषित तब के गृह राज्य मंत्री अरुण नेहरू का हाथ था। अय्यर ने अपनी किताब में आगे बताया है कि हां, ताला खोलने में कांग्रेस का हाथ था, लेकिन कांग्रेस के व्यक्ति को पता था कि राजीव गांधी ने कभी भी उन ताले को खोलने की अनुमति नहीं दी होगी। अय्यर ने आगे लिखा कि अरुण नेहरू भाजपा में शामिल हो गए और इसलिए वह भाजपा की ओर से प्लांट किए गए थे।

1986 में ताला खुलवाने के विवाद के बाद 1989 आते-आते कांग्रेस सरकार कई घोटालों जैसे बोफोर्स दलाली के मुद्दे पर घिरती चली गई। वोट शेयर से लेकर सीट तक कम होने लगीं। और आखिर में 1989 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार गिर गई। ताला खुलवाने से नाराज मुसलमान भी छिटक गए। कांग्रेस एमपी, यूपी, राजस्थान और बिहार समेत कई राज्यों में हार गई। इसके बाद राम मंदिर का मुद्दा उछला जिसे भारतीय जनता पार्टी ने लपक लिया। लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या से सोमनाथ तक राम रथयात्रा निकालकर राम मंदिर के मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया। मणिशंकर अय्यर ने लिखा कि मेरा एकमात्र मुद्दा यह है कि चुनाव के बीच में ‘शिलान्यास को छोड़कर इस सब में शामिल नहीं होने वाला एकमात्र व्यक्ति राजीव था। उन्होंने ताला नहीं खोला, उन्होंने भाजपा के साथ बातचीत नहीं की और जब गुंबदों को गिराया जा रहा था तो वे चुप नहीं बैठे। राजीव को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, बल्कि कांग्रेस को दोषी ठहराया जाना चाहिए।

क्या आने वाले चुनाव के लिए तैयार है कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस आने वाले चुनाव के लिए तैयार है या नहीं! कांग्रेस ने शनिवार को आरोप लगाया कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान असम के उत्तर लखीमपुर शहर में इसके कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया। उनके वाहनों में तोड़फोड़ की गई। बैनर फाड़ दिए गए। मुख्य विपक्षी दल ने घटना से संबंधित कुछ वीडियो जारी करते हुए यह दावा भी किया कि यह हमला भाजपा सरकार के सहयोग से किया गया। उसने कहा कि यह मुख्यमंत्री हिमंत बिस्‍वा सरमा और भाजपा की घबराहाट को दिखाता है। कांग्रेस की असम इकाई के प्रमुख भूपेन कुमार बोरा ने कहा कि शहर में यात्रा का स्वागत करने के लिए लगाए गए सभी होर्डिंग और पोस्टर शुक्रवार रात फाड़ दिए गए और बैनर लगाने पहुंचे पार्टी के सदस्यों की पिटाई की गई।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘डिस्प्ले ले जाने के लिए पार्टी की ओर से इस्तेमाल किए गए दो वाहनों को भी उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वहां से तुरंत नहीं जाने पर गंभीर अंजाम भुगतने की धमकी भी दी।’ बोरा ने कहा, ‘हमने पुलिस में दो शिकायतें दी हैं -एक हमारे कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और वाहनों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है और दूसरी शिकायत, पोस्टर फाड़े जाने से संबंधित है।’ उन्होंने दावा किया कि जिस कार से उपद्रवी घटनास्थल पर पहुंचे थे वह एक ऐसे व्यक्ति की है जो स्थानीय भाजपा विधायक का करीबी माना जाता है।

इस बीच, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि इस तरह के हमले से कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी डरने वाले नहीं हैं। खरगे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘हम असम के लखीमपुर में भाजपा के गुंडों की ओर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा के वाहनों पर हुए शर्मनाक हमले और कांग्रेस पार्टी के बैनर-पोस्टर फाड़े जाने की कड़ी निंदा करते हैं। पिछले 10 वर्षों में भाजपा ने भारत के लोगों को संविधान से दिए गए हर अधिकार और न्याय को कुचलने और ध्वस्त करने का प्रयास किया है। वह भाजपा लोकतंत्र का उल्लंघन कर उनकी कांग्रेस आवाज दबाना चाहती है।’ उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस पार्टी असम में भाजपा सरकार की ओर से अपनाई गई हमले और धमकी की इस रणनीति से डरने वाली नहीं है। कांग्रेस पार्टी भाजपा के इन पिट्ठुओं के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करेगी। हमारी लड़ाई और राहुल गांधी की न्याय के प्रति प्रतिबद्धता अटूट है।’

कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी वेणुगोपाल ने घटना से संबंधित वीडियो फुटेज साझा करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा से ‘सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री’ हिमंत बिस्‍वा सरमा कितने डरे हुए हैं, क्या इसका और सबूत चाहिए? देखो उनके गुंडे कांग्रेस के पोस्टर फाड़ रहे हैं और वाहनों को तोड़ रहे हैं! यात्रा के भारी प्रभाव से वह इतना घबरा गए हैं कि वह किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं।’ कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने नयी दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा को मिल रहे समर्थन से भाजपा और इसके नेता घबरा गए हैं। असम के लखीमपुर में जिस तरह से हमला किया गया, उससे पता चलता है कि भाजपा इस यात्रा को मिल रहे समर्थन से घबरा गई है।’ उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा घबराहट के कारण और भाजपा में अपनी वफादारी साबित करने के लिए इस तरह की हरकत पर उतर आए हैं। माकन ने ‘हमले’ की निंदा करते हुए कहा, ‘राहुल गांधी और कांग्रेस इस तरह के हमलों से डरने और घबराने वाले नहीं हैं। यात्रा जारी रहेगी।’ उन्होंने आरोप लगाया कि हमला असम की भाजपा सरकार के सहयोग से हुआ।

कांग्रेस की असम इकाई की मीडिया कमेटी के प्रमुख भरत नाराह ने कहा कि भाजपा नीत राज्य सरकार यात्रा में व्यवधान डाल रही है ताकि लोगों को इसमें भाग लेने से रोका जा सके। हमने पुलिस में दो शिकायतें दी हैं -एक हमारे कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और वाहनों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है और दूसरी शिकायत, पोस्टर फाड़े जाने से संबंधित है।’ उन्होंने दावा किया कि जिस कार से उपद्रवी घटनास्थल पर पहुंचे थे वह एक ऐसे व्यक्ति की है जो स्थानीय भाजपा विधायक का करीबी माना जाता है।‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ फिलहाल अरुणाचल प्रदेश में है और रविवार को फिर से असम में दाखिल होगी। यह यात्रा 67 दिन में 6,713 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और 15 राज्यों के 110 जिलों से गुजरते हुए 20 या 21 मार्च को मुंबई में समाप्त होगी।