Home Blog Page 945

क्या हिंदुओं को पहले ही मिल जानी चाहिए थी राम जन्मभूमि?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हिंदुओं को पहले ही राम जन्मभूमि मिल जानी चाहिए थी या नहीं! अयोध्या का झगड़ा, राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद बहुत लम्बा चला। 2019 तक, जब सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ किया। अब सवाल उठता है कि क्या इसे पहले ही बातचीत और समझौते से सुलझाया नहीं जा सकता था? राम मंदिर के भव्य उद्घाटन की तैयारी चल रही है, तो ये सोचने का भी मौका है कि अतीत में क्या हुआ था। इस बहस में ये सवाल जरूरी है कि इस विवाद को लम्बा करने में मुसलमानों का क्या रोल था? वो अपनी हक का दावा छोड़ने को क्यों राजी नहीं थे? कुछ कहते हैं कि अगर मुसलमानों ने अपनी हकदारी छोड़ दी होती तो शायद इतिहास अलग होता। वो हिंदू भावनाओं का सम्मान करते हुए एक बड़ा दिल दिखाते। लेकिन कुछ ये भी कहते हैं कि मुसलमानों के लिए तो पीछे हटना ही फायदेमंद होता। उनके लिए तनाव बढ़ाने से रोकना और टकराव से बचना ही अच्छा था। लंबे समय में तो उन्हें ही ज्यादा नुकसान हुआ, जैसा कि अब तक हुआ है। शायद इससे बीजेपी अपनी हिंदुत्व की राजनीति से पीछे नहीं हटती, लेकिन रफ्तार जरूर कम होती और माहौल थोड़ा शांत होता।

साथ ही, विवादित मंदिरों के मामले में 1991 के उपासना स्थल कानून को सख्ती से लागू कर पाते, जिसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जैसा था, वैसे ही रहेगा। संघ पर उदार हिंदुओं की तरफ से इस बात का दबाव बढ़ता कि वे अब दूसरे पुराने ऐतिहासिक विवादों को जिंदा न करे, हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को दुरुस्त करने का सुनहरा मौका था, इस विवाद को सुलझाकर। इससे सबसे ज्यादा फायदा तो कम्युनिटी के नाते मुसलमानों को ही होता। लेकिन समझौते की बात तक न मानने से दरार और गहरी हो गई। दूसरा और शायद ज्यादा अहम कारण, जिसे मुसलमानों को पीछे हटने के लिए प्रेरित करना चाहिए था, वो ये था कि ये विवादित जमीन भगवान राम की जन्मस्थली मानी जाती है। इसलिए हिंदुओं के लिए इसका धार्मिक महत्व कहीं ज़्यादा था। जो लोग हिंदुत्व की राजनीति से सहमत न हों, वो भी इस जगह से गहरा धार्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं। उनके लिए, ये उतना ही पवित्र है जितना मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना और ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी।

मुझे याद है, लखनऊ विश्वविद्यालय के एक विद्वान, जो खुद को गैर-राजनीतिक बताते थे, मुझसे कह रहे थे: ‘राम मंदिर तो बहुत हैं, लेकिन ये जन्मस्थली होने की वजह से खास है।’दूसरी तरफ, मुसलमानों के लिए ये सिर्फ जमीन का झगड़ा था। इसका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व नहीं था। अयोध्या की तंग गलियों में इसे ढूंढना भी मुश्किल था। कई स्थानीय लोगों को सही रास्ता बताने में भी परेशानी होती थी। न ही ये मस्जिद कोई संरक्षित ऐतिहासिक इमारत थी, जिसे दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता था। हां, ये जरूर है कि मुसलमानों को राम जन्मभूमि के बदले दूसरी जगह मस्जिद बनाने का वादा किया गया था। इस्लाम में, ज़रूरत पड़ने पर मस्जिद को दूसरी जगह ले जाने या तोड़ने की मनाही नहीं है। मुस्लिम दुनिया में, सऊदी अरब समेत तमाम मुल्कों में बुनियादी ढांचे के कामों के लिए अक्सर मस्जिदों को हटाया या दूसरी जगह बनाया जाता है।

अयोध्या की विवादित मस्जिद में काफी समय से नमाज नहीं पढ़ी जाती थी। सरकार ने जमीन के झगड़े की वजह से उसे बंद कर रखा था। फैजाबाद के आसपास ऐसी और भी बहुत सारी बेकार पड़ी मस्जिदें थीं। किसी को इसकी कोई खास परवाह नहीं थी। मेरे पैतृक कस्बे रुदौली जो बाराबंकी के पास है, में हद-से-हद कुछ ही लोग उस टूटी-फूटी इमारत को गंभीरता से लेते थे जो अचानक सुर्खियों में आ गई थी। मुसलमानों के लिए अयोध्या जमीन का सवाल था, धर्म, आस्था या इतिहास का नहीं। ये जरूर है कि आम धारणा के विपरीत, मुसलमानों में काफी बड़ा तबका ऐसा था जो झगड़े से बचना चाहता था। वे जानते थे कि हार तय थी, इसलिए एक बड़ा कदम उठाकर, एक ‘पवित्र इशारा’ कर, तनाव कम करना चाहते थे। इनमें उत्तर प्रदेश के कई आम मुसलमान शामिल थे, जिनका जीवन इस तनाव से उथल-पुथल हो गया था। उनका मानना था कि बेकार पड़ी मस्जिद के लिए झगड़ा करना बेमानी है।

उत्तर प्रदेश बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी यूपीबीएमएसी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने समझौता न करने का बचाव करते हुए कहा था, ‘अगर हम हिंदुओं से ये मस्जिद हार गए, तो पहले से ही दबे-सहमे इस अल्पसंख्यक समुदाय के पास इस देश के नागरिक होने का जो बचा-खुचा हौसला है, वो भी टूट जाएगा।’ ये एक अतिवादी दावा था और ये दिखाता था कि मुसलमान नेताओं की समझ हकीकत से कितनी दूर है। ये मुद्दा जल्दी ही अलग-अलग मुस्लिम गुटों के लिए अपनी ताकत दिखाने का जरिया बन गया।

इस बीच, तथाकथित धर्म-निरपेक्ष पार्टियां, खासकर कांग्रेस जो खुद को मुसलमानों का हितैषी मानती है, और पूरा उदारवादी वर्ग, अयोध्या विवाद को हिंदू दक्षिणपंथ के साथ अपने रूढ़िवादी विचारों की लड़ाई लड़ने के लिए इस्तेमाल करने लगा। 1988 के नवंबर में, ‘इंडिया टुडे’ की एक खास रिपोर्ट में फरजंद अहमद और दिलीप अवस्थी ने लिखा कि कैसे मुस्लिम गुट और उनके “धर्म-निरपेक्ष” राजनीतिक साथी, राजनीतिक फायदे के लिए अयोध्या के मुद्दे को हवा दे रहे थे और 1989 के आम चुनावों के लिए बीजेपी से सीधे टकराव में लगे हुए थे।

वक्त समझदारी और जल्दी से विवाद सुलझाने की जरूरत थी, लेकिन मुस्लिम नेताओं का रवैया निराशाजनक था। शहाबुद्दीन से जब बाबरी मस्जिद समन्वय समिति के अगले कदम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ‘हम जल्दी में नहीं हैं। हम सिर्फ शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं, वो भी मस्जिद को हिंदुओं के हवाले किए बिना।’

समस्या ये थी कि इस ‘शांतिपूर्ण समाधान’ को कभी साफ-साफ नहीं बताया गया। असल में, इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति थी ही नहीं। अहंकार और गलत ‘मुस्लिम गर्व’ की भावना ने शांति बहाल करने की जरूरत को दबा दिया। “मस्जिद बचाओ” का पूरा अभियान गलत सोच पर आधारित था और अल्पकालिक फायदे हासिल करने के लिए चलाया गया था, जैसा कि बाद की घटनाओं ने दिखाया। अगर मुसलमान समझौता कर लेते तो क्या चीजें जरूर बदलतीं, ये सवाल इतिहास की कल्पनाओं में ही रह जाएगा।

आखिर क्या है बोइंग सुकन्या प्रोग्राम?

आज हम आपको बोइंग सुकन्या प्रोग्राम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बेंगलुरु में विमान बनाने वाली दुनिया की दिग्गज कंपनी बोइंग के परिसर का उद्घाटन किया। बोइंग इंडिया इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलजी सेंटर अमेरिका से बाहर बोइंग का किसी भी देश में अबतक का सबसे बड़ा परिसर है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने बोइंग सुकन्या प्रोग्राम को भी लॉन्च किया। आखिर क्या है ये प्रोग्राम और इससे किस तरह लड़कियों को होगा फायदा, आइए विस्तार से समझते हैं। बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का उद्देश्य देश के बढ़ते एविएशन सेक्टर में देशभर से और अधिक लड़कियों की एंट्री में मदद देना है। ये कार्यक्रम पूरे भारत की लड़कियों और महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कौशल सीखने और एविशन सेक्टर में नौकरियों के लिए प्रशिक्षण पाने के मौके मुहैया करेगा। इस प्रोग्राम के तहत, लड़कियों के लिए STEM साइंस, टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग और मैथ करियर में रुचि जगाने में मदद करने के लिए ये 150 जगहों पर ‘स्टेम लैब’ बनाए जाएंगे। यह कार्यक्रम पायलट बनने के लिए प्रशिक्षण ले रहीं महिलाओं को छात्रवृत्ति भी प्रदान करेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के सरकार के प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार एयरोस्पेस क्षेत्र में महिलाओं के लिए नए अवसरों का सृजन करने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ कहा, ‘चाहे फाइटर पायलट हों या नागरिक उड्डयन, भारत महिला पायलटों की संख्या के मामले में दुनिया में सबसे आगे है।’ उन्‍होंने बताया कि भारत में 15 प्रतिशत पायलट महिलाएं हैं, जो वैश्विक औसत से 3 गुना अधिक है। बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह विमानन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देगा। इसके अलावा दूर-दराज के इलाकों में रहने वालीं गरीब लड़कियों को पायलट बनने के उनके सपने को साकार करने में मदद करेगा। पीएम ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत पायलट के रूप में करियर बनाने के लिए सरकारी स्कूलों में करियर कोचिंग और विकास संबंधी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

लड़कियों के लिए पायलट का करियर चुनने के लिए मुफीद मौके का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने एविएशन सेक्टर में अपनी सरकार की उपलब्धियां भी गिनाई। उन्होंने कहा कि आज भारत में करीब 150 हवाई अड्डे चालू हैं, जबकि 2014 में इनकी संख्‍या लगभग 70 थी। पीएम ने यह भी कहा कि हवाई अड्डों की दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने अर्थव्यवस्था के समग्र विकास और रोजगार सृजन के लिए एयर कार्गो क्षमता में बढ़ोतरी का भी जिक्र किया।

अत्याधुनिक BIETC यानी बोइंग इंडिया इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलजी सेंटर अमेरिका के बाहर बोइंग का सबसे बड़ा निवेश है। ये भव्य परिसर 43 एकड़ में फैला हुआ है और इसे बनाने में 1600 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। BIETC के उद्घाटन के बाद पीएम मोदी ने सुकन्या लाभार्थियों से भी बातचीत की। दुनिया की दिग्गज विमान कंपनी बोइंग के कैंपस खुलने के साथ ही कर्नाटक एक नए एविएशन हब के तौर पर उभर रहा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में इसका जिक्र किया। कर्नाटक में पिछले साल एशिया की सबसे बड़ी हेलीकॉप्टर मैन्यूफैक्चरिंग फैक्ट्री के उद्घाटन को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बोइंग की यह नई सुविधा कर्नाटक के एक नए एविएशन हब के तौर पर उभरने का स्पष्ट संकेत है।

अमेरिका की दिग्गज विमान निर्माता कंपनी बोइंग को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना और महिलाओं को पायलट बनाने में मदद के लिए बोइंग सुकन्या जैसा प्रोग्राम शुरू करना अपने आप में काफी अहम है। इस प्रोग्राम के लॉन्च होने पर बोइंग कंपनी की सीओओ स्टेफ़नी पोप ने पीएम मोदी को शुक्रिया कहा। पीएम मोदी ने बोइंग सुकन्या प्रोग्राम को महिला सशक्तीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण करार दिया। इसके जरिए उन्होंने महिला वोटरों को साधने की कोशिश की। दरअसल, पिछले कई चुनावों से देश की आधी आबादी यानी महिलाएं बीजेपी के लिए नए वोट बैंक के तौर पर उभरी हैं। भाजपा महिलाओं की पसंदीदा पार्टी बनकर उभरी है और इसकी सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियां और उनकी सरकार की स्कीम हैं। दशकों ले लटके ऐतिहासिक महिला आरक्षण बिल को पास कराना हो या तीन तलाक को खत्म करना, बीजेपी इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया कदम मानती है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के अलावा राज्यों की तमाम बीजेपी सरकारें भी महिलाओं को सीधा फायदा पहुंचाने वाली कई तरह की वेल्फेयर स्कीम चला रही हैं। केंद्र सरकार की बात करें तो उसकी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना, जनधन अकाउंट, मिशन पोषण, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन, मैटरनिटी लीव को 12 की जगह 26 हफ्ते करना, मातृवंदन योजना के तहत बच्चे के जन्म पर मां को 5000 रुपये जैसी तमाम योजनाएं महिलाओं पर ही केंद्रित हैं। सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने जैसे कदम से केंद्र ने समान अवसर और समानता का अधिकार देने की कोशिश की है।

उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन का लाभ मिला है। जनधन योजना के तहत 27 करोड़ से अधिक महिलाओं का बैंक में खाता खुला है। बैंक से बिना गारंटी के कर्ज वाली मुद्रा लोन स्कीम के लाभार्थियों में 70 फीसदी महिलाएं हैं। स्टैंड अप इंडिया स्कीम की लाभार्थियों में आधे से ज्यादा महिलाएं हैं। चुनावों में बीजेपी को इन स्कीमों का लाभ मिलता रहा है। एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हालिया चुनाव में पार्टी की जीत के पीछे मोदी सरकार की महिला हितैषी स्कीमों का बड़ा हाथ रहा है। मध्य प्रदेश में तो राज्य सरकार की लाडली बहना योजना को गेमचेंजर माना गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी देशभर में महिलाओं की पसंदीदा पार्टी थी। देशभर में बीजेपी को औसतन 36 प्रतिशत महिलाओं का वोट मिला। कांग्रेस को 20 प्रतिशत और बाकी 44 प्रतिशत वोट TMC, BJD जैसे क्षेत्रीय दलों को मिले थे। पिछले लोकसभा चुनाव में कम से कम 160 सीटें ऐसी थीं जहां महिलाओं का वोटर टर्न आउट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा था और इन सीटों में ज्यादातर पर बीजेपी ने ही जीत हासिल की।

जानिए मुगलों से लेकर वर्तमान तक का राम मंदिर का इतिहास!

आज हम आपको मुगलों से लेकर वर्तमान तक का राम मंदिर का इतिहास बताने जा रहे हैं! आम तौर पर जहां सेनाएं रहती हैं, उन जगहों को छावनी कहा जाता है, लेकिन प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली और मंदिरों की नगरी अयोध्या इस लिहाज से अलग है। यहां छावनियां हैं, लेकिन इनमें पुलिस या सेना के जवान नहीं बल्कि साधु-संत रहते हैं। ये छावनियां भी अपने आराध्य प्रभु राम की अगवानी को तैयार हैं। 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा उत्सव के रंग में ये छावनियां रंग चुकी हैं और इनमें रोज आरती और पाठ हो रहे हैं। यहां ठहरे हुए साधु संत और भक्त कीर्तन-भजन में लीन हैं और इंतजार कर रहे हैं उस वक्त का जब रामलला की उनके भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होगी। मणिरामदास की छावनी में भक्तों और साधुओं का आना-जाना लगा हुआ है। सुबह की शुरुआत यहां रामलला को भोग लगाने के बाद भजन कीर्तन से शुरू होती है। दिन भर भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता है। बड़ी छावनी में भी ऐसा ही है। यहां के मंदिर में दिया बाती के बाद साधु यहां पाठ शुरू कर देते हैं। भक्त भी इसमें शामिल होते हैं। यह आयोजन दोपहर तक चलता रहता है। शाम को एक बार फिर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। तपसी छावनी में भी राम नाम का पाठ चल रहा है। लोग रामलला की स्तुति कर रहे हैं। आम तौर पर शांत रहने वाली इन छावनियों में इन दिनों चहल-पहल भी बढ़ी है और भक्तों और संतों की जुटान भी। सुबह से लेकर शाम तक तमाम आयोजन हो रहे हैं। अयोध्या में साधुओं की इन छावनियों का कोई लिखित इतिहास नहीं है। सबसे अलग-अलग दावे हैं कि ये छावनियां कैसे अस्तित्व में आईं और इन्हें छावनी क्यों कहा जाता है। हालांकि, यह एक बात जरूर सभी में समान है कि साधु-संतों का जमावड़ा धर्म की रक्षा और ईश्वर की स्तुति के लिए हुआ था।

अयोध्या में चार प्रमुख छावनियां हैं- तुलसीदास जी की छावनी, बड़ी छावनी, तपसी जी की छावनी और छोटी छावनी। छोटी छावनी को ही अब मणिरामदास छावनी कहा जाता है। बात तुलसीदास जी की छावनी की करें तो यह अब लगभग वीरान रहती है, या कहें कि इसका अस्तित्व अब खत्म सा हो चुका है। वजह बताई जाती है साधु-संतों की कम आवाजाही। तपसी जी की छावनी या तपस्वी जी की छावनी अयोध्या शहर के रामघाट इलाके में है।

भव्य इमारत और इमारत पर की गई कारीगरी यह बोध करा देती है कि इसका इतिहास काफी उजला रहा होगा। छावनी के वर्तमान महंत जगतगुरु परमहंस आचार्य बताते हैं कि त्रेता युग में जब श्रीराम का जन्म हुआ तब देश भर के साधु-संन्यासी उनका दर्शन करने के लिए अयोध्या आ जुटे थे। पहले तो वे पेड़ के नीचे ही रह लेते थे। यह क्रम चलता रहा। बाद में जब मुगलों का समय आया तो यहां रहने वाले साधु उनसे मुकाबिल हो गए। धर्म की रक्षा के लिए किलेबंदी की गई। उनकी सेनाओं को नगर के भीतर प्रवेश करने से रोका गया। वह दावा करते हैं कि अयोध्या में प्राचीनतम पीठ और सबसे सिद्ध पीठ तपसी जी की छावनी है।

इन छावनियों में केवल साधु-संत ही नहीं रहते, बल्कि भक्त भी रहते हैं। हालांकि दोनों के रहने के स्थान बिल्कुल अलग हैं। बड़ी छावनी अयोध्या नगर से दूर एक किनारे पर लगभग तीन एकड़ जमीन पर आबाद है। चारों तरफ बुलंद चहारदीवारी है। आने-जाने के लिए एक ही दरवाजा है। इसके भीतर दाखिल होने पर आपको संतों के इस स्थान को छावनी क्यों कहा जाता है, उसका बोध हो जाता है। मजबूत किलाबंदी यहां दिखाई देती है।

छावनी के बीच में एक मंदिर है, जिसे हजारा मंदिर कहा जाता है और इसी के चारों तरफ छोटे-छोटे कमरे बने हैं। एक तरफ के कमरों में साधु रहते हैं और दूसरी तरफ के कमरों में भक्त। इस व्यवस्था के बारे में यहां रहने वाले संत बताते हैं कि साधुओं की दिनचर्या अलग होती है, जबकि भक्तों की अलग। दोनों की दिनचर्या में कोई व्यवधान न हो, इसलिए यहां ऐसी व्यवस्था की गई है। यहां के लोग बताते हैं कि एक बार हजार-बारह सौ साधु अयोध्या में रुकने के लिए आए। तब इस छावनी के पहले महंत रहे रघुनाथ दासजी महाराज ने उन साधुओं को यहां एक साल तक रहने के लिए जगह दी। हालांकि तब ये रुके तो फिर वापस नहीं गए। साधु आते-जाते रहे, लेकिन यह जगह वैसे ही छावनी में तब्दील रही। माना जाता है कि इसका क्षेत्रफल सभी छावनियों में सबसे बड़ा है। लिहाजा, इसे बड़ी छावनी कहा जाता है।

यूं तो इसे छोटी छावनी कहा जाता है, लेकिन आज के समय में अयोध्या में इस छावनी का कद सबसे बड़ा है। बाकी छावनियों की तुलना में सबसे ज्यादा चहल-पहल भी यहीं रहती है। सीआरपीएफ के जवान सुरक्षा में तैनात रहते हैं। वजह यह है कि इस छावनी के वर्तमान महंत नृत्यगोपालदास श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष भी हैं। इस छावनी के बारे में भी यही कहा जाता है कि साधु-संतों का जमावड़ा यहां धर्म की रक्षा के लिए मुगल काल में हुआ था, तब यह अस्तित्व में आई थी।

कहा जाता है कि पहले काफी संख्या में साधु छावनियों में रहते थे, लेकिन अब इनमें उतनी संख्या नहीं है। बावजूद इसके 100-200 साधु-संत हर छावनी में रहते हैं। ज्यादातर अपने ही कमरों में रहकर ध्यान करते हैं। कुछ ही लोग हैं, जिनका निकलना सामान्य तौर पर बाहर होता है। ऐसा भी माना जाता है कि त्रेतायुग में जब श्रीराम वनवास को गए तब भी साधुओं ने नगर के आसपास डेरा डाल लिया था। वह अयोध्या के रक्षक के तौर पर यहां रहा करते थे। वह यहीं रहकर राम भजन में लीन रहते थे और श्रीराम के वापस आने का इंतजार करते रहे।

क्या भारत म्यांमार के बीच दीवार खड़ी करना असम के लिए फायदेमंद होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत म्यांमार के बीच दीवार खड़ी करना क्या असम के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है! सीमा पार से घुसपैठ हमारे लिए कितनी बड़ी चुनौती है, यह किसी से छिपा नहीं है। पाकिस्तान लगातार लाइन ऑफ कंट्रोल को पार करने की हिमाकत करता आया है। भारी सुरक्षा के बावजूद उसकी ओर से सैनिक सीजफायर तोड़ते हैं और आतंकवादी आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं। हालांकि हमारी सेना लगातार उन्हें मुंहतोड़ जवाब भी देती आई है। बांग्लादेश की सीमा से पश्चिम बंगाल दाखिल होने वाले लोगों की भी संख्या कम नहीं है। बड़ी संख्या में बांग्लादेशी पश्चिम बंगाल के अलावा देश के अलग-अलग कोनों में फैले हुए हैं। इनके पास भारत का पासपोर्ट, आधार कार्ड के साथ नागरिकता भी होती है। लेकिन इन दो के अलावा एक और बॉर्डर है जहां हाल की घुसपैठ ने चिंता बढ़ा दी है। भारत-म्यांमार बॉर्डर। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अब दोनों देशों के बीच सुरक्षा बढ़ाने के साथ कंटीले तारों के बाड़ भी लगाए जाएंगे। बता दें कि पहले भारत- म्यांमार के बीच खुली सीमा थी, यानी लोग आसानी से आ-जा सकते थे। म्यांमार की भारत के 4 राज्यों से सीमा लगती है। तो क्या मोदी सरकार के इस कदम से असम में घुसपैठ कम होगी। शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम पुलिस कमांडो की पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया था। शाह ने इस दौरान एक महत्वूर्ण बात कही। परेड को संबोधित करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि पहले भारत और म्यांमार के बीच खुली सीमा थी, यानी लोग आसानी से आ-जा सकते थे। लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस सीमा को सुरक्षित करने का फैसला किया है। हम बांग्लादेश की सीमा की तरह ही पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाएंगे। ये बाड़ सीमा को पार करने से रोकेंगे। पहले भारत और म्यांमार के बीच एक समझौता था जिसके तहत सीमावर्ती इलाकों के लोग बिना वीजा के आ-जा सकते थे। लेकिन, अब सरकार इस समझौते पर फिर से बातचीत कर रही है और दोनों देशों के बीच यह खुली आवाजाही बंद करने वाली है। सरकार ने हाल ही में पूरी सीमा पर स्मार्ट जाली लगाने का काम शुरू किया है।

सीमा सुरक्षा बढ़ाने के लिए भारत, म्यांमार सीमा पर जाली लगाएगा और दोनों देशों के बीच खुली आवाजाही बंद कर देगा। भारत और म्यांमार के बीच 1970 में एक समझौता हुआ था, जिसे भारत-म्यांमार फ्री मूवमेंट रिजाइम कहा जाता है। इस समझौते के तहत, भारत और म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग बिना वीजा के एक-दूसरे के देश में आ-जा सकते थे। इस समझौते का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के बीच सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देना था। 1970 के बाद से भारत सरकार लगातार इसे रिन्यू करा देती है। आखिरी बार 2016 में इस एग्रीमेंट को रिन्यू किया गया था।लेकिन, अब इसी को भारत सरकार बंद करा देगी। दोनों देशों की सीमा के बीच एक कंटीली दीवार होगी। बता दें कि दोनों देश लगभग 1600 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं। FMR के मुताबिक, दोनों ओर 25 किलोमीटर तक आने-जाने की सुविधा थी।

भारत सरकार की ओर से फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि इस वक्त सीमा पार म्यांमार से 600 से ज्यादा सैनिक भारत में भगकर आ गए हैं। सैनिक म्यांमार से लगती मिजोरम की सीमा से अंदर दाखिल हुए हैं और वहीं लांग्टलाई जिले के तुईसेंटलांग में असम राइफल्स के पास शरण ले रखी है। म्यांमार में सैनिकों के ठिकानों पर पश्चिमी म्यांमार राज्य के रखाइन में एक हथियारबंद विद्रोही गुट अराकन आर्मी के उग्रवादियों ने कब्जा कर लिया है। इसलिए सैनिक भारी मात्रा में भारत भाग रहे हैं। म्यांमार सरकार ने इन सैनिकों से भारत सरकार की ओर से अपने सैनिकों को वापस मांगा है। सैनिको के अलावा आतंकवादी, हथियारों और ड्रग्स के तस्करों की भी एंट्री इस आसान आवाजाही के चलते सरल हो गई थी। असम में सीमा पार से घुसपैठ एक गंभीर समस्या है। यह समस्या कई वर्षों से असम के लिए एक चुनौती रही है। असम भी घुसपैठ की समस्या से जूझता आया है। असम की सीमा हालांकि म्यांमार से नहीं लगती। लेकिन उसे भी बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों से समस्या होती आई है। सीमा के पास वाले इलाकों में बांग्लादेशियों की बढ़ती संख्या का वहां के लोगों ने भी विरोध किया था। लोगों का कहना था कि असमिया संस्कृति नष्ट हो रही है। असम में म्यांमार से भले करीब न हो लेकिन, मिजोरम, मणिपुर से उसकी सीमा लगती है और म्यांमार से मिजोरम, मणिपुर दोनों की सीमाएं पास है। इस वजह से मणिपुर, मिजोरम के रास्ते म्यांमार से भागे लोग असम में अपनी गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। शाह का यह फैसला असम के हित का काम करेगा। NRC और CAA की इसलिए सबसे ज्यादा जरूरत असम के लिए बताई जाती है।

अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि हम बांग्लादेश की सीमा की तरह ही पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाएंगे। शाह का यह कहना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल के रास्ते पूरे भारत में बांग्लादेशी घुसपैठिए शरण ले चुके हैं। वह यहां आतंकवादी, तस्कर, गलत धंधों को अंजाम देते हैं। पश्चिम बंगाल में तो इन्होंने अपना बसेरा बनाने के साथ भारत के अलग-अलग हिस्सों में फैले हैं। हाल के महीनों में भारत की सुरक्षा जांच एजेंसियों ने दिल्ली, पुणे, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई, गुजारात सहित कई राज्यों से इनकी गिरफ्तारी भी हुई। बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और प्रदेश के बड़े शहरों में रहते हैं। इनकी खास बत यह है कि ये लोग आम लोगों की भाषा और बोल-चाल को जल्दी अपनाकर काफी घुलमिल जाते हैं। अपने गैरकानूनी कामों को अंजाम देने के लिए इन्होंने भारत की नागरिकता के साथ हर प्रमाणपत्र मौजूद है। ऐसे में पहचान और भी मुश्किल हो जाती है।

जब राम मंदिर बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आया निर्णय!

एक ऐसा समय जब राम मंदिर बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्णय आ गया था! 16वीं शताब्दी से 21वीं शताब्दी तक राम मंदिर के लिए हिंदुओं की तड़प देखी है। आज जब हिंदु वर्ग का सबसे बड़ा सपना पूरा हो रहा है, मैं साक्षी हूं। अयोध्या में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीरबाकी के अत्याचार को मैंने सहा है। हिंदुओं का पांच शताब्दियों तक अपने आराध्य वर्गों के लिए तड़प को मैं जीती रही हूं। विभिन्न वर्गों में विभाजित हिंदू जनमानस को एकजुट होने में 500 साल लग गए। वर्गों में बंटे हिंदू जब एक रामलला के सामने दीन भाव से खड़े हुए तो भग्वतवत्सल भगवान ने भी उन्हें वापस लौटने का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। राम की जीवनी हमें हमेशा प्रेरित करती रही है। राम हर युग में प्रासंगिक रहे हैं। राम मंदिर पर हो रही राजनीति से घबराने की जरूरत नहीं है। यह तो मैं त्रेतायुग से देखती आ रही हूं। राजनीति तो तब भी रची गई थी, जब भगवान श्रीराम बाल्यकाल को पार कर जवानी में कदम रख चुके थे। राजा दशरथ उनके राज्याभिषेक की तैयारी में जुट गए थे। इस दौरान राजा दशरथ के ही महल में रहने वाली दासी मंथरा ने साजिश रची। माता कैकेई के बुद्धि पर अपनी राजनीति का ऐसा मायाजाल फेरा, प्रभु श्रीराम को सत्ता संभालने की जगह 14 वर्ष तक वनवास के लिए जाना पड़ा। इसलिए, प्रभु राम के कार्य में राजनीति न हो, यह संभव नहीं है। हालांकि, तमाम राजनिति के पार प्रभु श्रीराम रामराज्य की स्थापना करते हमेशा दिखाई देते हैं। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। कई राज्यों में सांप्रदायिक दंगे हुए। बाद में, वोट बैंक की राजनीति में समाज को एक बार फिर विभिन्न वर्गों में बांट दिया गया। राम मंदिर का मुद्दा अब चुनावी भाषणों और भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में दिखता था। इस बीच में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश और केंद्र में भी सत्ता में आ चुकी थी। लेकिन, गठबंधन धर्म ने भाजपा को राम मंदिर मामले में कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले पाई। विपक्षी दलों के लिए राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को घेरने का अस्त्र बन गया था। एक बार पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेई ने लोकसभा में कहा था कि राम मंदिर का मुद्दा हमारी पार्टी से जुड़ा मुद्दा है, जिसे हम कभी नहीं छोड़ सकते। आज हम गठबंधन धर्म का पालन कर रहे हैं, जिस दिन हम उस काबिल होंगे, राम मंदिर जरूर बनेगा। हालांकि, मामला कोर्ट में था। अब यह मामला श्री राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद के नाम से जाना जाने लगा। फैजाबाद कोर्ट से होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट तक मामला पहुंच चुका था।

1990 में विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने कारसेवा के दौरान अयोध्या विवादित परिसर के आसपास के एएसआई सर्वे का खूब जिक्र किया था। दरअसल, 1975-76 में एक सर्वे हुआ था। इसमें राम मंदिर के अवशेष खुदाई में मिलने के दावे किए गए थे। 1990 में इससे संबंधित कुछ मामला आया और उसके बाद विवाद गहराना शुरू हुआ। विश्व हिंदू परिषद और भाजपा इस मुद्दे को लगातार उठा रही थी। कारसेवा के दौरान भी यह मुद्दा खास गरमाया। लेकिन, राम मंदिर के जमीन पर कब्जे में एएसआई सर्वे एक बड़ी भूमिका निभाने वाला था। यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वर्ष 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एएसआई सर्वे का मामला उठाया गया। कोर्ट ने सुनवाई की और एएसआई को खुदाई कर अपनी रिपोर्ट देने का आदेश दिया। यहीं से बाबरी विवाद की कहानी बदलनी शुरू हुई। आज मैं हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चली राम मंदिर विवाद की कहानी सुनाने जा रही हूं।

6 दिसंबर की घटना के बाद रााज जन्मभूमि का मामला जमीन विवाद बन गया था। दरअसल, 1949 में बाबरी परिसर में रामलला प्रगट हो गए थे। मामला कोर्ट तक पहुंच चुका था। वर्ष 1975- 76 आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एएसआई जन्मभूमि विवाद में एंट्री ली। दावा किया जाता है कि यह सर्वे आरएसएस के इशारे पर कराया गया था। बाबरी परिसर के अगल- बगल में एएसआई पहले भी तीन बार सर्वे कर चुकी थी। एएसआई के पहले निदेशक एलेग्जेंडर कनिंघम ने 1862-63 में अयोध्या का सबसे पहली बार परिसर का सर्वे किया था। यह सर्वे आदेश अंग्रेजी सरकार के वर्ष 1858 में बाबरी परिसर को दो भागों में बांटने के बाद आया था। इसके बाद अलोइस फ्यूरर के नेतृत्व में 1889 से 1891 के बीच विवादित परिसर का दूसरी बार एएसआई ने सर्वे किया। 1969- 70 में प्रो. एके नारायण के नेतृत्व में एएसआई ने विवादित परिसर की तीसरी बार खुदाई की। 1975 में प्रो. बीबी लाल ने चौथी बार खुदाई की। इस बार उनके नेतृत्व में विशेषज्ञों ने साइट के नजदीक पहुंच कर सर्वे किया।

प्रो. लाल उस समय एएसआई के महानिदेशक थे। सर्वे के बाद प्रो. लाल के दावों ने राम मंदिर विवाद को सुलगा दिया। 1990 में राम मंदिर आंदोलन के जोर पकड़ने के दौरान प्रो. बीबी का एक लेख पत्रिका मंथन में छपा। अपने लेख में प्रो. लाल ने दावा किया कि मस्जिद के नीचे उन्हें मंदिर जैसे खंभे मिले थे। उन्होंने दावा किया कि जब मैंने बाबरी साइट का सर्वे किया तो मस्जिद की नींव के पास मंदिर का एक खंभा दिखा। यह बहुत ही पुराना था। प्रो. लाल के इस दावे को विश्व हिंदू परिषद और हिंदूवादी संगठनों ने जमकर उठाया। उनकी ओर से कहा गया कि यह पिलर प्राचीन राम मंदिर के हैं। हालांकि, प्रो. लाल के दावों पर आर्कियोलॉजिस्ट्स ने भी सवाल खड़े कर दिए। विवाद तब अधिक गहराया जब 1993 के वर्ल्ड आर्कियोलोजिक कांग्रेस में प्रो. लाल को बाबरी परिसर में किए सर्वे के रिसर्च पेपर को रखने नहीं दिया गया।

आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट प्रक्रिया फेल होने के बाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई। इसके बाद 27 सितंबर 2018 को केस संविधान पीठ को भेजने पर बहस के बाद फैसला आया। मामले की सुनवाई तीन जजों की ही पीठ में कराए जाने की बात कही। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर 2018 को रिटायर हो गए। 8 जनवरी 2019 को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग करते हुए, विवाद को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंप दिया। 8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को आठ सप्ताह में मध्यस्थता का प्रयास करने का आदेश दिया। मध्यस्थता की कार्यवाही 13 मार्च को शुरू हुई और मई तक पूरा किया जाना था। कई पक्षों के अनुरोध पर अदालत ने 10 मई को मध्यस्थता अवधि 15 अगस्त तक बढ़ा दी गई। राम जन्मभूमि पक्षकार गोपाल सिंह विशारद ने 9 जुलाई को कोर्ट से हर रोज सुनवाई की मांग की। कोर्ट में उन्होंने मध्यस्थता के सुस्त होने की रिपोर्ट दी।

सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की आखिरी कोशिश विफल होने के बाद 6 अगस्त से श्रीराम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर ऐतिहासिक सुनवाई शुरू हुई। यह सुनवाई 40 दिनों तक चली। इसमें कोर्ट ने बाबरी मस्जिद कमिटी, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान समेत अन्य पक्षों को सुना। चीफ जस्टिस ने 18 अक्टूबर तक बहस पूरी करने का अनुरोध सभी पक्षों से किया। 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ऐतिहासिक बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अब्दुल नजीर, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने पांच शताब्दियों से चले आ रहे विवाद पर 9 नवंबर 2019 को बड़ा फैसला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से देवता श्रीरामलला विराजमान को टाइटल प्रदान किया। विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला विराजमान को दिए जाने का आदेश दिया गया। इसके अलावा मुस्लिम पक्ष सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन अयोध्या में किसी स्थान पर देने का आदेश दिया गया। जनवरी 1993 में अधिग्रहित भूमि भी रामलला को मंदिर निर्माण के लिए दी गई। केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाकर मंदिर का संचालन करने और राम मंदिर का निर्माण कराने का आदेश दिया गया। इस फैसले ने उस नारे को सही साबित कर दिया, मंदिर वहीं बनाएंगे। इस फैसले के बाद मंदिर का उसी राम जन्मभूमि पर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

क्या बढ़ने वाली है देश में ठंड?

देश में अब ठंड और भी बढ़ने वाली है! दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में इन दिनों शीतलहर और कोहरे का सितम जारी है। मौसम विभाग ने उत्तर भारत के इलाकों में अगले तीन से पांच दिनों के लिए कड़ाके की ठंड और कोहरे का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने रेड अलर्ट जारी करते हुए कहा कि अगले पांच दिनों के दौरान उत्तर भारत में घने कोहरे की स्थिति बनी रहने की संभावना है, जबकि अगले तीन दिनों के दौरान उत्तर भारत में ठंडे दिन की स्थिति बनी रह सकती है। शीतलहर के चलते कई जगहों पर स्कूलों को बंद किया गया है। दिल्ली, यूपी, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जहां शीतलहर का अलर्ट है, तो वहीं हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी को लेकर अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग ने कहा कि समुद्र तल से 12.6 किमी ऊपर 130-140 समुद्री मील नॉट की ‘जेट स्ट्रीम हवाएं’ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में चल रही हैं। IMD के अनुसार इसी मौसमी बदलाव की वजह से बर्फीली हवाएं नीचे की तरफ आ रही हैं और उत्तर भारत में शीत लहर/ठंडे दिन की स्थिति बढ़ रही है। अगले 3-4 दिनों में जेट स्ट्रीम की इसी तरह की तीव्रता जारी रहने की संभावना है।’

मौसम विभाग ने अपने बुलेटिन में कहा कि उत्तरी राजस्थान, दक्षिण हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में न्यूनतम तापमान 2-5 डिग्री सेल्सियस और पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों, राजस्थान और मध्य प्रदेश के शेष हिस्सों में 6-10 डिग्री सेल्सियस के बीच है। IMD ने कहा, ‘दक्षिण हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में यह सामान्य से 2-4 डिग्री सेल्सियस नीचे है। शुक्रवार को बीकानेर पश्चिमी राजस्थान और कानपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे कम न्यूनतम तापमान 2.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।’

मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के कई हिस्सों में शनिवार सुबह तक और कुछ हिस्सों में रात/सुबह में कुछ घंटों के लिए और अगले चार दिनों तक कुछ हिस्सों में घने कोहरे की स्थिति बनी रह सकती है। वहीं उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में शुक्रवार और रविवार की सुबह कुछ घंटों के लिए और अगले तीन दिनों तक अलग-अलग हिस्सों में रात/सुबह में घने कोहरे और शीतलहर की स्थिति बनी रहने की संभावना है। बिहार के कुछ हिस्सों में 24 जनवरी तक और पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के कुछ हिस्सों में रविवार तक ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी। IMD के अधिकारी ने बताया कि अगले तीन दिनों के दौरान पूर्वी भारत के कई हिस्सों में न्यूनतम तापमान में 2-3 डिग्री सेल्सियस की गिरावट होने की संभावना है और उसके बाद कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होगा। दक्षिण हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में यह सामान्य से 2-4 डिग्री सेल्सियस नीचे है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में भी मौसम में काफी बदलाव देखा गया है. वहां पर भी कड़ाके की ठंड जारी है. देखा जाए तो गाजियाबाद, कानपुर समेत कई शहरों में ठंडी हवा के साथ-साथ सुबह कोहरा देखा गया. IMD के मुताबिक, यूपी की राजधानी लखनऊ की बात करें तो यहां पर मिनिमम टेंपरेचर 11 डिग्री सेल्सियस और मैक्सीमम टेंपरेचर 25 डिग्री रहने की संभावना है. IMD ने यहां भी घने कोहरे का अलर्ट जारी किया है.  शुक्रवार को बीकानेर पश्चिमी राजस्थान और कानपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे कम न्यूनतम तापमान 2.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।’बिहार में भी मौसम जल्द ही मिजाज बदलने वाला है. बिहार की राजधानी पटना समेत राज्य में नए साल पर बारिश की संभावना बै. IMD के अनुसार, 29 दिसंबर से पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने की वजह से नए साल में पटना सहित कई राज्यों में 2 या 4 जनवरी को भारी बारिश हो सकती है. IMD के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बहुत घना कोहरा छा सकता है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा के कुछ हिस्सों, मध्य प्रदेश और उत्तर पूर्व भारत में नृत्य कोहरा संभव है. जम्मू कश्मीर का गुलमर्ग बर्फबारी से गुलजार हुआ है. वहीं हिमाचल के पर्वतीय इलाकों में भी कड़ाके की ठंड है. आईएमडी ने अगले पांच दिनों के दौरान उत्तर भारत के बाकी हिस्सों में न्यूनतम तापमान में कोई महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना नहीं होने की भी भविष्यवाणी की है। आईएमडी ने कहा, ‘शनिवार और रविवार को पंजाब और हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में शीतलहर जारी रहने की संभावना है। रविवार तक उत्तराखंड में अलग-अलग स्थानों पर पाला पड़ने की संभावना है।

क्या इस साल बॉक्स ऑफिस पर लौट पाएगी रौनक?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस साल बॉक्स ऑफिस पर रौनक लौट पाएगी या नहीं! नया साल 2024 शुरू हो चुका है, लेकिन बॉक्स ऑफिस अभी भी रौनक नहीं लौटी है। हालांकि यह भी सच है कि फिलहाल उत्तर भारत में जबरदस्त ठंड के चलते भी दर्शक सिनेमाघरों का रुख कम कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि बॉक्स ऑफिस के ठंडा पड़े होने की एक वजह जबरदस्त सर्दी है, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि पिछले काफी अरसे से कोई ऐसी फिल्म भी रिलीज नहीं हुई है, जिसे देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों के बाहर लाइनें लगा लें। बता दें कि बीते साल के क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों शाहरुख खान की ‘डंकी’, प्रभास की ‘सलार’ और जेसन मोमोआ की ‘एक्वामैन एंड द लॉस्ट किंगडम’ को दर्शकों की ओर से उम्मीद के मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिला। उसके बाद नए साल में रिलीज हुई विजय सेतुपति और कटरीना कैफ की फिल्म ‘मैरी क्रिसमस’ को भी दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया। हर किसी को शाहरुख की ‘डंकी’ से भी कुछ ऐसा ही धमाकेदार प्रदर्शन करने की उम्मीद थी, लेकिन यह फिल्म ऐसा कमाल नहीं कर पाई। ‘डंकी’ ने जहां घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए की कमाई की, वहीं दुनियाभर में यह महज 460 करोड़ रुपए ही कमा पाई। वहीं, प्रभास की ‘सलार’ ने जरूर दुनियाभर में 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।हालांकि, तेजा सज्जा की ‘हनुमान’ ने जरूर थोड़ी उम्मीद जगाई है। बावजूद इसके फिलहाल बॉक्स ऑफिस ठंडा ही नजर आ रहा है।

बॉक्स ऑफिस के जानकार कहते हैं कि क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों ‘सलार’ व ‘डंकी’ को देखने दर्शक तो पहुंचे, लेकिन इन फिल्मों के लिए दिसंबर महीने की पहली तारीख को रिलीज हुई रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ जैसा क्रेज देखने को नहीं मिला। घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 550 करोड़ रुपए से ज्यादा और दुनियाभर में 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने वाली फिल्म ‘एनिमल’ ने रणबीर कपूर को सुपरस्टार की कैटिगरी में लाकर खड़ा कर दिया। इससे पहले सिर्फ शाहरुख खान ‘जवान’, ‘पठान’ और सनी देओल की ‘गदर 2’ ने ही बीते साल बॉक्स ऑफिस पर इतना जोरदार प्रदर्शन किया था। हालांकि, हर किसी को शाहरुख की ‘डंकी’ से भी कुछ ऐसा ही धमाकेदार प्रदर्शन करने की उम्मीद थी, लेकिन यह फिल्म ऐसा कमाल नहीं कर पाई। ‘डंकी’ ने जहां घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए की कमाई की, वहीं दुनियाभर में यह महज 460 करोड़ रुपए ही कमा पाई। वहीं, प्रभास की ‘सलार’ ने जरूर दुनियाभर में 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।

बहरहाल, बीते साल घरेलू बॉक्स ऑफिस पर चार फिल्मों ‘जवान’, ‘पठान’, ‘गदर 2’ व ‘एनिमल’ के घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने के बाद अब हर किसी को इस साल घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ रुपए और दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म का इंतजार है। बता दें कि बीते साल बॉक्स ऑफिस पर पहली 500 करोड़ी फिल्म शाहरुख खान की ‘पठान’ जनवरी में ही मिल गई थी। ऐसे में, अब हर किसी की नजरें ऋतिक रोशन की फिल्म ‘फाइटर’ हैं। इसके बाद अप्रैल के महीने में अक्षय कुमार की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ के अलावा साउथ सिनेमा की कई बड़ी फिल्में रिलीज होंगी। इनमें जूनियर एनटीआर की ‘देवरा’ से लेकर चियान विक्रम की ‘थंगालान’ और सूर्या की ‘कंगुवा’ की काफी चर्चा है।प्रभास की ‘सलार’ और जेसन मोमोआ की ‘एक्वामैन एंड द लॉस्ट किंगडम’ को दर्शकों की ओर से उम्मीद के मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिला। उसके बाद नए साल में रिलीज हुई विजय सेतुपति और कटरीना कैफ की फिल्म ‘मैरी क्रिसमस’ को भी दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया। हालांकि, तेजा सज्जा की ‘हनुमान’ ने जरूर थोड़ी उम्मीद जगाई है।

क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों ‘सलार’ व ‘डंकी’ को देखने दर्शक तो पहुंचे, लेकिन इन फिल्मों के लिए दिसंबर महीने की पहली तारीख को रिलीज हुई रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल‘ जैसा क्रेज देखने को नहीं मिला। घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 550 करोड़ रुपए से ज्यादा और दुनियाभर में 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने वाली फिल्म ‘एनिमल’ ने रणबीर कपूर को सुपरस्टार की कैटिगरी में लाकर खड़ा कर दिया। बावजूद इसके फिलहाल बॉक्स ऑफिस ठंडा ही नजर आ रहा है। वहीं, प्रभास की अगली फिल्म ‘कल्कि 2898 AD’ की रिलीज डेट मई में घोषित हो चुकी है। जबकि इंडिपेंडेंस डे पर साल का सबसे बड़ा क्लैश अजय देवगन की ‘सिंघम अगेन’ और अल्लू अर्जुन की ‘पुष्पा 2’ के बीच होने वाला है।

राम आंदोलन और नाथ संप्रदाय में क्या है संबंध?

आज हम आपको बताएंगे कि राम आंदोलन और नाथ संप्रदाय में क्या संबंध है! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियों का जायजा लेने जाते हैं तो उनसे ज्यादा खुश कोई और नहीं होता होगा। इसका पहला कारण तो साफतौर पर पेशेवर है। एक तो यूपी सरकार के प्रमुख के रूप में वह अयोध्या में व्यापक परिवर्तन के सूत्रधार रहे हैं। दूसरी वजह उनके दिल के काफी करीब और निजी है क्योंकि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण और वहां भगवान की प्राण प्रतिष्ठा उनके गुरू अवेद्यनाथ की आखिरी इच्छा थी, जो अब पूरी होने जा रही है। नाथ संप्रदाय पर कई किताबें लिख चुके लेखक प्रदीप कुमार राव कहते हैं कि साल 2010 से 2014 तक अपने अंतिम वर्षों में महंत अवेद्यनाथ ने बहुत कम बात की लेकिन जब भी उन्होंने बात तो वह ज्यादातर राम मंदिर के बारे में थी। स्वाभाविक तौर पर योगी आदित्यनाथ के लिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह एक भावनात्मक क्षण है। आख़िरकार, नाथ संप्रदाय में ‘गुरु की आज्ञा’ का पालन सर्वोपरि है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘गुरु गोरखनाथ के अनुयायियों के लिए राम मंदिर एक सपने के सच होने जैसा है। अपने खून-पसीने और संसाधनों से उन्होंने इसकी लौ को जीवित रखा।’

साल 1935 में ‘महंत’ के रूप में नियुक्त हुए दिग्विजय नाथ ने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसने गोरखनाथ मठ को दक्षिणपंथी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया। यह अयोध्या में विवादित परिसर में राम मंदिर बनाने का एक संवेदनशील मुद्दा था। साल 1937 में दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा में शामिल हो गए और राम मंदिर के लिए हिंदुओं को एकजुट करना शुरू कर दिया। 1949 में उन्होंने अयोध्या में स्वयंसेवकों की एक टीम का नेतृत्व किया। बलरामपुर के तत्कालीन राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह और एक प्रमुख संत स्वामी करपात्री महाराज के साथ इस मुद्दे पर मीटिंग भी की। 22-23 दिसंबर 1949 की आधीरात को जब भगवान राम की मूर्ति तत्कालीन विवादित ढांचे में रखी गई थी, तब दिग्विजय नाथ अयोध्या में थे। यहां उन्होंने स्वयंसेवकों को प्रार्थना शुरू करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि तत्कालीन राज्य सरकार ने डीएम को मूर्ति हटाने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इस कदम से सांप्रदायिक हिंसा हो सकती है। राव कहते हैं कि मूर्ति की स्थापना को आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है। इसके बाद से भगवान एक मूर्त वास्तविकता बन गए जिसने आंदोलन को बढ़ावा दिया और भक्तों और साधुओं को मंदिर के लिए लड़ाई तेज करने के लिए प्रेरित किया। महंत दिग्विजय नाथ ने 1969 में अपनी मृत्यु तक इस आंदोलन को बढ़ावा देना जारी रखा।

अपने गुरु की विरासत को आगे बढ़ाते हुए महंत अवेद्यनाथ ने आंदोलन से जुड़े सभी हिंदू संगठनों और साधुओं को एक मंच पर लाने के लिए 1984 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। राव कहते हैं, ‘उन्होंने सितंबर 1984 में मंदिर की मुक्ति के लिए बिहार के सीतामढ़ी से अयोध्या तक एक महत्वपूर्ण मार्च का आयोजन किया और लोगों से उस पार्टी या नेता को वोट देने का आह्वान किया जो मंदिर निर्माण का समर्थन करता है।’

31 अक्टूबर 1985 को कर्नाटक के उडुपी में धर्म संसद के दौरान अवेद्यनाथ और दिगंबर अखाड़े के महंत रामचन्द्र दास परमहंस ने मस्जिद का ताला खोलने की मांग की ताकि भक्त प्रार्थना कर सकें। मांग को आगे बढ़ाने के लिए एक समिति अखिल भारतीय संघर्ष समिति का भी गठन किया गया। राव याद करते हैं, ‘1 फरवरी 1986 को जब फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने ताला खोलने का आदेश दिया, तब अवेद्यनाथ अयोध्या में थे।’ 22 सितंबर 1989 को दिल्ली की एक रैली में अवेद्यनाथ ने घोषणा की कि राम जन्मभूमि पर ‘शिलान्यास’ 9 नवंबर, 1989 को होगा। 1990 में हरिद्वार में एक बैठक में उन्होंने घोषणा की कि साधु मंदिर निर्माण शुरू करने के लिए अयोध्या जाएंगे, लेकिन कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह और तत्कालीन यूपी सीएम नारायण दत्त तिवारी ने उनसे इस कार्यक्रम को स्थगित करने का आग्रह किया था। जब पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया तो अवेद्यनाथ ने इस मुद्दे पर उनसे मिलने के लिए प्रतिनिधिमंडल को लीड किया था। बाद में उन्होंने घोषणा की कि 30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में धर्म संसद आयोजित की जाएगी और 2 दिसंबर 1992 को कार सेवा शुरू की जाएगी।

मंदिर आंदोलन ने युवा अजय सिंह बिष्ट को 1992 में गोरखपुर के गोरखनाथ मठ की ओर आकर्षित किया था। महंत अवेद्यनाथ से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने परिवार को त्याग दिया और नाथ संप्रदाय के संन्यासी का जीवन अपना लिया और अपने नए जीवन में योगी आदित्यनाथ के रूप में जाने गए। आदित्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की बैठकों में भाग लिया। उनके गुरु की अध्यक्षता में हुई बैठक में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा के नेताओं के अलावा अयोध्या के संतों ने भी भाग लिया।

योगी को ये बैठकें आयोजित करने का काम दिया गया जिसके लिए उन्हें हिंदू नेताओं और विद्वानों से सराहना मिली। उनकी क्षमताओं से प्रभावित होकर महंत अवेद्यनाथ ने 1996 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। राव कहते हैं कि 1997-98 में जब राम मंदिर आंदोलन यूपी के अन्य हिस्सों में चमक खोने लगा तो आदित्यनाथ ने गोरखपुर और आसपास के जिलों में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से इस मुद्दे को पूर्वांचल में जीवित रखा। साल 1998 में महंत अवेद्यनाथ ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया और आदित्यनाथ के लिए गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का रास्ता बनाया, जहां से उन्होंने चार बार जीत हासिल की थी। साल 1998 में लोकसभा में पदार्पण करने वाले आदित्यनाथ ने सदन में राम मंदिर का मुद्दा उठाया।

साल 2017 का साल राम मंदिर आंदोलन के निर्णायक वर्षों में से एक है। इस साल गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने यूपी के मुख्यमंत्री का पद संभाला। राव का कहना है कि सीएम के तौर पर योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या को इस महान दिन के लिए तैयार करने के प्रयास शुरू कर दिए थे। राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रफेसर मनोज दीक्षित कहते हैं, ‘अयोध्या में बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं को शुरू करने के अलावा योगी आदित्यनाथ का सबसे बड़ा योगदान ‘दीपोत्सव’ का आयोजन करना है, जिसने अयोध्या की लार्जर दैन लाइफ छवि बनाई है।’

इससे पहले कि रामलला को अपना ‘महल’ वापस मिल पाता, योगी ने महामारी के दौरान उन्हें एक ढांचे में ट्रांसफर कर दिया। हनुमानगढ़ी के पुजारी महंत राजू दास कहते हैं कि अयोध्या को ‘नव्यता, दिव्यता, भव्यता’ की ओर ले जाने का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जाता है। एक समय था जब योगी जी साल में 4-5 बार अयोध्या आते थे और संतों से चर्चा करते थे कि मंदिर कैसे बनाया जाए? अब सीएम के रूप में वह मंदिर निर्माण कार्य का जायजा लेने और विकास परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए महीने में 5-6 बार आते हैं।

जानिए बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने वाले जज केएम पांडेय की कहानी!

आज हम आपको बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने वाले जज केएम पांडेय की कहानी सुनाने जा रहे हैं! राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह की जोर-शोर से तैयारी है। 22 जनवरी को लेकर अयोध्या दुल्हन की तरह सजाई जा रही है। समारोह काे लेकर लोगों को खूब उत्साह देखा जा रहा है। सियासी दल भी अपने-अपने हिसाब से राजनीति करने में व्यस्त हैं। इस बीच राम मंदिर आंदोलन की चर्चा खूब है। देश भर के तमाम कारसेवक अपनी कहानियां बता रहे हैं। कोई दशकों के उपवास के बाद राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के साथ अन्न ग्रहण करने की तैयारी कर रहा है तो कई दर्शन के लिए पैदल ही अयोध्या रवाना हो चुके हैं। इसी बीच मंदिर आंदोलन की अहम कड़ी बाबरी मस्जिद का ताला खुलने के जिला जज के फैसले और उसके बाद के घटनाक्रम की कहानी आपको बताते हैं। बताते हैं कि कैसे इस फैसले के पीछे एक काला बंदर था? फिर उन जज कृष्ण मोहन पांडेय केएम पांडेय का क्या हुआ? वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपनी किताब “युद्ध में अयोध्या” में लिखते हैं कि 28 जनवरी 1986 को फैजाबाद के मुंसिफ मजिस्ट्रेट हरि शंकर दुबे, एक वकील उमेश चंद्र पांडेय की राम जन्मभूमि का ताला खोलने की मांग करने वाली अर्जी को खारिज कर देते हैं। दो दिन बाद ही फैजाबाद के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय की अदालत में पहले से चल रहे मुकदमा संख्या 2/1949 में उमेश चंद्र पांडेय एक दूसरी अर्जी दाखिल करते हैं। जिला जज बेहद तेज रफ्तार से दूसरे ही रोज जिला कलेक्टर और पुलिस कप्तान को तलब कर उनसे इस सवाल पर प्रशासन की मंशा पूछते हैं। इस मामले पर हलफनामा देने की बजाए इन दोनों अफसरों ने मौखिक जवाब दिया कि ताला खाेलने से कोई गड़बड़ी नहीं होगी। न ही कानून और व्यवस्था की कोई समस्या खड़ी होगी। दरअसल यह फैसला जिला प्रशासन के जरिए केंद्र सरकार का था, जिसे राज्य और जिला प्रशासन लागू करा रहा था। दोनों अफसरों के इस बयान से जज को फैसला लेने में आसानी हुई।

वह आगे लिखते हैं कि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के कानूनी दावे का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुश्ताक अहमद सिद्दीकी ने इस अर्जी पर अदालत से अपनी बात रखने की पेशकश की थी। जज ने कहा, उन्हें सुना जाएगा। लेकिन उन्हें बिना सुने ही उसी शाम 4 बजकर 40 मिनट पर जज साहब ने फैसला सुना दिया। इस फैसले में कहा गया, “अपील की इजाजत दी जाती है। प्रतिवादियों को गेट संख्या ओ और पी पर लगे ताले तुरंत खोले जाने का निर्देश दिया जाता है। प्रतिवादी आवेदक और उनके समुदाय को दर्शन और पूजा आदि में कोई अड़चन या बाधा नहीं डालेंगे।” दरअसल इस इमारत के दो गेट थे, जिसमें जिला प्रशासन ने अपनी सुविधा के लिए गेट के नाम ओ और पी रखे थे। जिला जज के फैसले के फौरन बाद डीएम और एसएसपी जिला जज को पहुंचाने उनके घर जाते हैं। उनकी सुरक्षा बढ़ा दी जाती है। फिर 40 मिनट के अंदर ही पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ दिया जाता है और अंदर पूजा-पाठ, कीर्तन शुरू हो जाता है। दिलचस्प बात ये है कि जज साहब के इस फैसले के पीछे भावना, आस्था और भगवान के रूप में एक बंदर भी था।

किताब में आगे लिखा गया है कि जज कृष्ण मोहन पांडेय धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक थे और पीसीएस ज्यूडिशियल परीक्षा 1959 के टाॅपर थे। 1960 में वह एडिशनल मुंसिफ के तौर पर उन्होंने नौकरी शुरू की थी। 17 अगस्त 1985 को वह फैजाबाद के जिला जज बने। ताला खुलवाने के फैसले का असर उन्हें अपने कॅरियर में भी काफी झेलना पड़ा। फैसले के बाद उन्हें स्टेट ट्रांसपोर्ट अपील प्राधिकरण में चेयरमैन पद पर भेज दिया गया। यही नहीं जब उनके हाईकोर्ट जज बनने की बात चली तो वीपी सिंह सरकार ने पेंच फंसा दिया। उनकी फाइल में प्रतिकूल टिप्पणी कर दी गई।

वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव ने भी उनके हाईकोर्ट का जज बनने का विरोध किया। फिर केंद्र में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और डॉ सुब्रहमण्यम स्वामी उनकी सरकार में कानून मंत्री बने। स्वामी के अनुसार वीपी सिंह और उनके समय के ताकतवर अधिकारी रहे भूरेलाल केएम पांडेय को हाईकोर्ट का जज बनाने के खिलाफ थे। वहीं मुलायम सिंह यादव भी उन्हें जज नहीं बनने देना चाहते थे। उनकी फाइल में राज्य सरकार ने लिख दिया कि इन्होंने 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का विवादित फैसला दिया था इसलिए इन्हें हाईकोर्ट में जज नहीं बनाया जाए। लेकिन सुब्रहमण्यम स्वामी ने केएम पांडेय की फाइल फिर से खोली और काफी कोशिश की बाद आखिरकार केएम पांडेय 24 जनवरी 1991 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बने। लेकिन एक महीने बाद ही उनका 22 जनवरी 1991 को ट्रांसफर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए कर दिया गया।

जान लीजिए बच्चों की कोचिंग के नए नियम!

आज हम आपके बच्चों की कोचिंग के नए नियम बताने वाले हैं! प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे बेस्ट बनें। बचपन की बेफिक्री वाली उम्र में ही बच्चों पर हम उम्मीदों का बोझ डाल देते हैं कि बड़ा अफसर बनना है, डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है। कई बार हम अपने अधूरे सपनों को बच्चों में जीने लगते हैं। पैरेंट्स की इस सोच का दोहन करने के लिए बड़े शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक धड़ल्ले से कोचिंग सेंटर उग रहे हैं जहां बेचे जाते हैं सपने। सपने डॉक्टर बनाने के, इंजीनियर बनाने के, सीए बनाने के, अफसर बनाने के, टॉपर बनाने के। अपेक्षाओं के बोझ से बने दबाव से स्टूडेंट्स के टूटने और खुदकुशी करने जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं। दूसरी तरफ, तमाम कोचिंग सेंटर भी फर्जी और गुमराह करने वाले दावों से स्टूडेंट और पैरेंट्स के साथ खिलवाड़ करते हैं। ‘कोटा फैक्ट्री’ नाम की चर्चित वेब सीरीज में इस समस्या को दिखाने की कोशिश हुई थी। हाल ही में आई चर्चित फिल्म ’12th फेल’ में भी इस समस्या की झलक दिखाने की कोशिश हुई थी। फिल्म में दिखाया गया कि यूपीएससी की तैयारी कराने वाला एक कोचिंग सेंटर अपने विज्ञापनों में उन टॉपरों के नाम और तस्वीर का भी इस्तेमाल करता है जो उसके यहां कभी पढ़े ही नहीं थे। अब भारत सरकार ने कोचिंग सेंटरों के लिए कड़े नियम तय किए हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की तरफ से जारी ‘कोचिंग सेंटरों के पंजीकरण और नियमन के लिए दिशानिर्देश 2024’ का मुख्य उद्देश्य कोचिंग सेंटरों के रजिस्ट्रेशन का फ्रेमवर्क तैयार करना और उनकी मनमानी पर रोक लगाना है। शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी इन व्यापक दिशानिर्देशों से कोचिंग संस्थानों को रेग्युलेट करने, स्टूडेंट्स की चिंताओं को दूर करने और प्राइवेट कोचिंग सेक्टर के अनियंत्रित विकास पर लगाम लगाना है। कोचिंग सेंटरों के लिए अब 16 साल से कम उम्र के स्टूडेंट्स का दाखिला लेने की मनाही है।

गाइडलाइंस के मुताबिक, ‘कोचिंग सेंटर’ का मतलब उस संस्थान से है जो किसी व्यक्ति द्वारा स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी स्तर के छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं या अकादमिक सहायता के लिए कोचिंग देने के लिए स्थापित, चलाया या संचालित किया जाता है। और जिसमें 50 से ज्यादा स्टूडेंट हों। सरल शब्दों में कहें तो, अगर कोई संस्थान 50 से ज्यादा छात्रों को किसी भी तरह की पढ़ाई, परीक्षा या स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के काम में मदद दे रहा है, तो उसे ‘कोचिंग सेंटर’ माना जाएगा। स्टूडेंट्स की खुदकुशी के बढ़ते मामलों, आग लगने की घटनाओं और कोचिंग सेंटरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ-साथ उनके पढ़ाने के तरीकों में कमी से जुड़ीं तमाम शिकायतों के बाद सरकार को ये गाइडलाइंस लानी पड़ीं। पिछले साल देश में कोचिंग सेंटर का हब कहे जाने वाले कोटा में 26 कोचिंग स्टूडेंट ने खुदकुशी की थी। ये हाल के वर्षों में कोटा या किसी भी शहर में स्टूडेंट्स की खुदकुशी का अबतक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

गाइडलाइंस में स्पष्ट किया गया है कि कोचिंग सेंटर किसी भी तरह के गुमराह करने वाले वादे जैसे रैंक की गारंटी या अच्छे मार्क लाने के जैसे वादे नहीं करेंगे। इसके अलावा वे अपनी कोचिंग क्वॉलिटी और सुविधाओं को लेकर गुमराह करने वाले विज्ञापन जारी नहीं करेंगे। कोचिंग सेंटर किसी भी ऐसे ट्यूटर या व्यक्ति को भर्ती नहीं कर सकते जो किसी अदालत की तरफ से किसी अपराध के दोषी ठहराए गए हों। इसके अलावा, ट्यूटर के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी तय कर दी गई है। अगर कोई व्यक्ति स्नातक और उसके समतुल्य योग्यता नहीं रखता तो उसे कोचिंग सेंटर ट्यूटर के तौर पर नहीं रख सकते हैं।

कोचिंग सेंटरों के लिए अपनी वेबसाइट पर ट्यूटरों के क्वॉलिफिकेशन से जुड़े डीटेल, कोर्सेज, पाठ्यक्रम और शुल्क वगैरह से जुड़े डीटेल को अपडेट रखना अनिवार्य किया गया है। कोई भी शख्स अगर कोचिंग इंस्टिट्यूट की वेबसाइट पर जाए तो उसे वहीं पर जानकारी मिल जाए कि वहां किन-किन कोर्सेज की पढ़ाई हो रही है। फीस क्या है, जो ट्यूटर हैं उनकी योग्यता क्या है। इससे पैरंट्स और स्टूडेंट्स को फैसला लेने में आसानी होगी। अलग-अलग कोर्स के लिए वसूली जाने वाली ट्यूशन फी वाजिब और तार्किक होनी चाहिए। गाइडलाइंस के मुताबिक, कोचिंग सेंटर जो भी फीस चार्ज करेंगे उसका रसीद उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। अगर कोई स्टूडेंट कोर्स पूरा होने से पहले ही उसे छोड़ता है तो कोचिंग सेंटर को उसे 10 दिनों के भीतर प्रो-राटा आधार यानी आनुपातिक आधार पर रीफंड देना होगा। गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करने के लिए उसमें कोचिंग सेंटरों पर पेनाल्टी लगाना भी प्रस्तावित है। अगर कोई कोचिंग सेंटर नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। उस पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, कोचिंग सेंटर का रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है।

सभी कोचिंग सेंटरों को जो पहले से मौजूद हों या फिर नई हों, उनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। कोई कोचिंग सेंटर गाइडलाइंस का उल्लंघन तो नहीं कर रहा, ये देखना राज्य सरकार का काम होगा। कोचिंग सेंटरों की निगरानी करने, रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी मानदंडों पर वे खरी उतरती हैं या नहीं और गाइडलाइंस का पालन हो रहा है या नहीं, ये देखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी।