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क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन को तोड़ेगी बीजेपी?

बीजेपी अब विपक्ष के INDIA गठबंधन को तोड़ सकती है! चुनावों से पहले बहुत कुछ होता है। तमाम तरह के जोड़तोड़ होते हैं। सेंधमारी होती है। कब कौन किधर हो जाए कुछ पता नहीं चलता। सब कुछ अचानक ही होता है। अगला लोकसभा चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहने वाला। यही कारण है कि हर ऐक्‍शन के मायने निकाले जाने लगते हैं। फिर चाहे प्रतिद्वंद्वियों की आपसी मुलाकात हो या उनका एक-दूसरे के लिए सॉफ्ट होना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उदयनिधि स्टालिन से मुलाकात के बाद शुक्रवार को ममता बनर्जी को बर्थडे विश करना उसी चश्‍मे से देखा जा रहा है। उदयनिधि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम द्रमुक पार्टी के नेता हैं। वह तमिलनाडु के सीएम एमके स्‍टालिन के बेटे और मंत्री भी हैं। ममता बनर्जी बंगाल की मुख्‍यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस चीफ हैं। दोनों विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के घटक दल हैं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पीएम के इस जेस्‍चर की क्‍या वजह हो सकती है? आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को उनके जन्मदिन पर बधाई दी। बनर्जी इस दिन 69 वर्ष की हो गईं। पीएम मोदी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में कहा, ‘पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं। मैं उनके लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए प्रार्थना करता हूं।’

इसके पहले तमिलनाडु के मंत्री और द्रमुक पार्टी के नेता उदयनिधि स्टालिन ने गुरुवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात की। उन्होंने प्रधानमंत्री को इस महीने के अंत में चेन्नई में होने वाले खेलो इंडिया यूथ गेम्स के उद्घाटन समारोह के लिए न्‍योता दिया। उदयनिधि ने कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी से भी मुलाकात की। पीएम से मुलाकात के बाद उदयनिधि ने पोस्ट में लिखा, ‘हमारे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के अनुरोध के अनुसार मैंने तमिलनाडु के बाढ़ प्रभावित जिलों में व्यापक राहत, बहाली और पुनर्वास कार्य करने के लिए प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय आपदा राहत कोष को तत्काल जारी करने का अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने हमें आश्वासन दिया कि वह आवश्यक कदम उठाएंगे।’ उदयनिधि स्‍टालिन की इस मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु का दौरा किया था। इस दौरान उन्‍होंने कई योजनाओं का उद्घाटन किया था। तमाम की आधारशिला रखी थी। एमके स्‍टालिन के साथ कई अवसरों पर पीएम मंच साझा करते दिखे थे।

लोकसभा चुनाव से पहले विरोधियों के साथ पीएम के इस रुख के मतलब निकाले जाने लगे हैं। द्रमुक और टीएमसी स्‍थानीय दल हैं। इनका अपने-अपने क्षेत्रों में जबर्दस्‍त प्रभाव है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A में सीट शेयरिंग का अब तक कोई ठोस फॉर्मूला नहीं निकल पाया है। ऐसे में सभी तरह के विकल्‍प खुले हुए हैं। ममता वैसे भी कांग्रेस और राहुल गांधी को कुछ खास पसंद नहीं करती हैं। कई मौकों पर यह बात सामने भी आ चुकी है। बंगाल में वह कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग को लेकर बिल्‍कुल भी नरम नहीं पड़ने वाली हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले कई तरह के समीकरण बन सकते हैं। कुछ चौंकाने वाले भी! यह बीजेपी की विरोधी खेमे में फूट डालने की कोशिश का हिस्‍सा भी हो सकता है। कुछ विरोधी दलों के साथ नरम रुख रखकर बीजेपी की मंशा I.N.D.I.A खासतौर से कांग्रेस में खलबली पैदा करना भी हो सकती है। भगवा पार्टी का यह दिखाने का प्रयास भी हो सकता है कि मौका पड़ने पर वह इनमें से किसी दल के साथ जुड़ने में परहेज नहीं करने वाली है। यही नहीं, दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के ल‍िए पार्टी पूरी तरह से खुली हुई है। यहां तक उसने इसके ल‍िए सम‍ित‍ि तक बनाई है।

पीएम मोदी का विरोधी दलों के नेताओं के साथ इस तरह का व्‍यवहार स्‍वस्‍थ राजनीति का भी संदेश देता है। इससे लोगों में बीजेपी के लिए अच्‍छी छवि तैयार होती है। ऐसे में यह बीजेपी की इमेज बिल्डिंग का हिस्‍सा भी हो सकता है। संसद के पिछले सत्र के दौरान बीजेपी ने बड़ी संख्‍या में विपक्ष के सांसदों के निलंबन को उनके अनुचित व्‍यवहार के साथ जोड़ा था। वह दिखाना चाहती है कि विचारों में मतभेद हो सकता है। लेकिन, मनभेद अच्‍छी बात नहीं। पीएम भी कहते रहे हैं कि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना देश को नुकसान पहुंचा सकता है। इस बात में शक नहीं कि लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी किसी भी और दल से ज्‍यादा आक्रामक दिख रही है। वह छोटी से छोटी चीज पर ध्‍यान देने में लगी है। पार्टी किसी के लिए कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती है। अभी इस तरह की आक्रामकता दूसरे दलों में नहीं दिख रही है।

जानिए भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में पूरी बातें!

आज हम आपको भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में पूरी बातें बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस भारत जोड़ो न्याय यात्रा को लेकर अंतिम तैयारियों में जुटी हुई है। गुरुवार को कांग्रेस के नेताओं की मीटिंग में फैसला लिया गया कि 14 जनवरी से शुरू होने वाली यात्रा का नाम ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ होगा। पहले पार्टी ने इसे भारत न्याय यात्रा नाम दिया था। अब यह यात्रा 14 राज्यों में नहीं बल्कि 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश को भी शामिल किया गया है। यात्रा 6200 किमी की बजाय 6700 किमी की दूरी तय करेगी। मणिपुर की राजधानी इंफाल से शुरू होने वाली यात्रा के बारे में जयराम रमेश का कहना था कि राहुल गांधी की अगुआई में निकली पहली भारत जोड़ो यात्रा ब्रैंड बन चुकी है। गुरुवार की मीटिंग में ज्यादातर लोगों की राय थी कि न्याय यात्रा में भारत जोड़ो आना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में पार्टी महासचिवों, तमाम राज्यों के प्रभारियों, प्रदेश इकाई प्रमुखों और कांग्रेस विधायक दल के नेताओं की बैठक में यात्रा को लेकर कई मुद्दों पर चर्चा हुई। रमेश ने कहा कि अब यह यात्रा 14 राज्यों में नहीं बल्कि 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश को भी शामिल किया गया है। यह यात्रा 6700 किमी की दूरी तय करेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश में तय की जाने वाली 55 किलोमीटर की दूरी भी शामिल रहेगी। अरुणाचल प्रदेश पहले भी यात्रा के रूट में था, लेकिन सुरक्षा संबंधी मुद्दों के सुनिश्चित होने के बाद ही पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश के नाम का ऐलान करने का फैसला किया। 6,713 किलोमीटर से अधिक की यह यात्रा बसों के जरिए और पैदल तय की जाएगी। यात्रा में राहुल गांधी रोजाना कम-से-कम दो सभाएं करेंगे। राज्य में जनाधार बुरी तरह से खो चुकी कांग्रेस एक बार फिर देश के सबसे बड़े सूबे में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल, ओड़िशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से होकर गुजरेगी।रोज लगभग 70-80 किमी की दूरी बस से पूरी की जाएगी। 8-10 किमी. पैदल यात्रा होगी। यात्रा के जरिए 110 जिले, लगभग 100 लोकसभा सीटें और 337 विधानसभा सीटें कवर होंगी।

कांग्रेस नेता रमेश ने ऐलान किया कि 2024 आम चुनाव के मद्देनजर यात्रा का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से होकर गुजरेगा। उनका कहना था कि राहुल गांधी की अगुआई में यात्रा उत्तर प्रदेश में 11 दिनों में 1074 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। यह प्रदेश में 20 जिलों से होकर गुजरेगी। राज्य में जनाधार बुरी तरह से खो चुकी कांग्रेस एक बार फिर देश के सबसे बड़े सूबे में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल, ओड़िशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से होकर गुजरेगी। 20 मार्च को यात्रा मुंबई में संपन्न होगी।

66 दिनों की यात्रा शुरुआत मणिपुर के इंफाल से होगी। मणिपुर के चार जिलों में कुल 107 किलोमीटर का सफर एक दिन में तय होगा। इसके बाद नगालैंड में एंट्री होगी। दो दिनों में पांच जिलों से होकर 257 किलोमीटर की दूरी तय होगी। असम में आठ दिनों में 17 जिलों में 833 किलोमीटर का सफर, अरुणाचल में एक दिन में एक जिले में की दूरी, मेघालय में एक दिन में एक जिले और 5 किमी की यात्रा, वेस्ट बंगाल में पांच दिनों में सात जिलों में 530 किमी का सफर, बिहार में चार दिन में सात जिलों से गुजरते हुए 425 किमी की दूरी तय होगी। कांग्रेस की यात्रा झारखंड में 8 दिनों में 13 जिलों से होते हुए 804 किमी का सफर, ओडिशा में चार दिनों में चार जिलों में 341 किमी की दूरी, छत्तीसगढ़ में यात्रा पांच दिनों में सात जिलों के जरिए 536 किमी की दूरी, बता दे कि लेकिन सुरक्षा संबंधी मुद्दों के सुनिश्चित होने के बाद ही पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश के नाम का ऐलान करने का फैसला किया। 6,713 किलोमीटर से अधिक की यह यात्रा बसों के जरिए और पैदल तय की जाएगी। यात्रा में राहुल गांधी रोजाना कम-से-कम दो सभाएं करेंगे। रोज लगभग 70-80 किमी की दूरी बस से पूरी की जाएगी। 8-10 किमी. पैदल यात्रा होगी। यात्रा के जरिए 110 जिले, लगभग 100 लोकसभा सीटें और 337 विधानसभा सीटें कवर होंगी। मध्य प्रदेश में पांच दिनों में नौ जिलों से होकर 698 किमी की दूरी, राजस्थान में एक दिन में दो जिलों से होकर 128 किमी का सफर, गुजरात में पांच दिनों में सात जिलों से गुजरते हुए 445 किमी की दूरी और महाराष्ट्र में पांच दिनों में छह जिलों से होते हुए 480 किमी की दूरी तय करेगी।

क्या हेमंत सोरेन और केजरीवाल जाएंगे जेल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल जाएंगे या नहीं! जैसे-जैसे आम चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, सियासी फिजा में राजनीतिक जंग भी तेजी पकड़ रही है। नए साल के पहले हफ्ते में ही देश के दो राज्यों के सीएम पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को केंद्रीय एजेंसी ईडी समन पर समन भेज रही है। ईडी ने केजरीवाल को दिल्ली में शराब नीति घोटाले मामले में समन भेजा है। वहीं सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में ईडी सात बार समन भेज चुकी है। दोनों सीएम अभी तक केंद्रीय एजेंसी के सामने पेश नहीं हुए हैं। दोनों ही दल आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार उन्हें गिरफ्तार करने की साजिश कर रही है। चूंकि मौसम चुनावों का है तो सभी दल एक-दूसरे पर हमला बोल रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां ईडी के समन में सियासी नफा-नुकसान ढूंढ रही हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ ही आम आदमी पार्टी का गठन करने वाले केजरीवाल अपने राजनीतिक जीवन के एक मुश्किल संकट से गुजर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी बीजेपी दिल्ली के सीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। ईडी ने केजरीवाल को अपने पास पेश होने के लिए तीन बार समन भेज चुकी है। आप और केजरीवाल इसे केंद्र सरकार की साजिश बता रही है। आप ने कहा कि केजरीवाल को चुनाव प्रचार से रोकने के लिए साजिश रची जा रही है। उधर, बीजेपी केजरीवाल पर भ्रष्टाचार को लेकर हमला बोल रही है। दिल्ली शराब घोटाला मामले में ही राज्य के पूर्व डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया और पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह इस वक्त जेल में हैं। अब आप को ये डर है कि ईडी केजरीवाल को भी गिरफ्तार कर सकती है। केजरीवाल की पार्टी कह रही है कि सीएम ईडी की जांच में सहयोग को तैयार हैं लेकिन उनको भेजा गया समन पूरी तरह गैरकानूनी है।

आप के लिए अभी दोहरी मुसीबत आ गई है। पार्टी को दो बड़े नेता जेल में हैं और सीएम केजरीवाल को भी ईडी का समन आ चुका है। कुछ महीने बाद ही लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। पार्टी दिल्ली और पंजाब में चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई है। अगर इस केजरीवाल की गिरफ्तारी हो जाती है तो पार्टी के लिए बड़ा झटका होगा। केजरीवाल पार्टी के स्टार प्रचारक हैं। अगर ईडी उन्हें गिरफ्तार करती है तो पार्टी के चुनावी भविष्य पर असर पड़ना तय है। हालांकि, अभीतक केजरीवाल ईडी के सामने पूछताछ के लिए पहुंचे ही नहीं है। बीजेपी तो आरोप लगा रही है कि केजरीवाल थर-थर कांप रहे हैं। लेकिन AAP भी राजनीतिक दांव-पेच में जुटी हुई है। फिलहाल केजरीवाल ईडी के समन से बच रहे हैं। पार्टी की कोशिश है कि इस मामले को जितना देर तक खींचा जा सकता है खींचा जाए। केजरीवाल आरोप लगाते रहे हैं कि बीजेपी 2024 के चुनाव से पहले विपक्षी आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। पार्टी अब ईडी के समन का जवाब कानून के मुताबिक देने की बात कह रही है।

सियासी विशेषज्ञ बता रहे हैं कि जिस तरह से बीजेपी अब केजरीवाल को कट्टर बेईमान बता रही है इसका असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। क्योंकि केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ ही चुनकर आए थे। राजधानी में लोकसभा की 7 सीटें हैं। अभी सभी सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं। केजरीवाल को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरकर बीजेपी आप पर मानसिक बढ़त बनाना चाह रही है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन के साथ आप का दिल्ली में सीट शेयरिंग अभी फिक्स नहीं हो पाया है। ऐसे में आप के लिए एकबार फिर दिल्ली में पेच फंस सकता है। पार्टी का लोकसभा में अभी कोई सांसद नहीं है। पार्टी पूरी कोशिश में है कि उसका लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन अच्छा हो ताकि रिजल्ट के बाद पार्टी मोलभाव करने में आगे रहे।

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को भी ईडी अबतक 7 बार समन भेज चुकी है। सातवें समन भेजते हुए ईडी ने उन्हें हरहाल में पेश होने को कहा है। अभीतक ईडी के समन से बचते फिर रहे जेएमएम नेता इसबार घिर गए हैं। कयास हैं कि सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी का डर है और इसी कारण वह अपनी जगह पत्नी कल्पना सोरेन को सीएम बनाने का दांव खेल सकते हैं। बीजेपी नेता भी राज्य में ऐसा दावा कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि सोरेन ने पत्नी को सीएम बनाने के लिए दांव चल भी दिया है। राज्य के गांडेय विधानसभा क्षेत्र से पार्टी के विधायक सरफराज अहमद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ये सीट जेएमएम के लिए काफी मुफीद मानी जाती है। अगर मनी लॉन्ड्रिंग केस में हेमंत की गिरफ्तारी होती है तो वह अपनी पत्नी के लिए सीएम पद की फील्डिंग पूरी तरह से कर चुके हैं।

झारखंड में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं जबकि लोकसभा चुनाव तो बस मुहाने पर खड़ा है। राज्य में लोकसभा की 14 सीटें हैं। बीजेपी हेमंत पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रही है। दूसरी तरफ बीजेपी ने राज्य का अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को बनाकर आदिवासी दांव भी चल दिया है। यानी अगर हेमंत की गिरफ्तारी हुई तो भगवा दल उन्हें भ्रष्टाचारी बताते हुए जमकर निशाना साधेंगे। दूसरी तरफ अगर कल्पना को सीएम का पद मिलता है तो पार्टी हेमंत पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाएगी। यानी लोकसभा चुनाव से पहले झारखंड के सीएम बुरी तरह फंस चुके हैं।

पीएम मोदी ने पिछले साल अगस्त में एक बड़ा बयान देते हुए कहा था कि 2014 के पहले भ्रष्टाचार और घोटाले का युग था। पीएम मोदी लगातार विपक्ष खासकर कांग्रेस पर इसे लेकर निशाना साधते रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा था कि वह न तो खाएंगे न और खाने देंगे। उनके इस बयान का चुनाव में बड़ा असर दिखा था। ऐसे में अगर देश को दो बड़े सीएम भ्रष्टाचार के आरोप में घिरते हैं तो आम चुनाव से पहले बीजेपी के पास एक ऐसा ब्रह्मास्त्र होगा जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं होगी। इसी महीने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का भी बीजेपी भरपूर फायदा उठाने के संकेत दे चुकी है। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी एक मजबूत इरादे के साथ उतरेगी। वहीं, विपक्ष अपने बिखरे घर को सुधारने की ही कोशिश में जुटी हुई है।

जानिए पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं! दिल्ली में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में जब उन्हें कारसेवकों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की सलाह दी गई तो उन्होंने बेहिचक यही बात कही। 30 अक्टूबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने आयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। अगले वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम को मुख्यमंत्री की कुर्सी खोनी पड़ी और पहली बार बीजेपी को प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला। भाजपा ने इस पद के लिए कल्याण सिंह को चुना तो वो सीधे अयोध्या गए, राम लला का दर्शन करने। वहां उन्होंने अपना प्रण दुहराया- राम लला आपका मंदिर बनकर रहेगा, चाहे कुछ भी हो। कल्याण ने अपना संकल्प पूरा किया, भले ही उन्हें एक वर्ष में ही अपनी सरकार की आहुति देनी पड़ी। 5 जनवरी, 1932 को अलीगढ़ जिला स्थित अतरौली गांव में जन्मे कल्याण सिंह ने दुनियादारी की समझ होते ही राष्ट्रवाद का रास्ता चुन लिया। वो अपने स्कूली दिनों में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस से जुड़ गए। देश के लिए कुछ कर गुजरने की लालसा ने उनमें अथक परिश्रमी और अटल संकल्प का व्यक्तित्व गढ़ दिया। कल्याण वाचाल थे तो समाज और सियासत में उनकी पूछ होने लगी। कद बढ़ा तो पद भी बढ़ा। 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंच गए और 10 साल बाद 1977 में पहली बार प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। 1980 के दशक शुरुआती दशक में जब विश्व हिंदू परिषद वीएचपी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का आंदोलन चलाया तो कल्याण सिंह इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। वो हिंदुत्व का प्रमुख चेहरा बन गए, खासकर उत्तर प्रदेश में।

कल्याण जब 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब तक भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा संपन्न हो चुकी थी। रथयात्रा को बिहार में रोककर आडवाणी को नजरबंद कर लेने के बावजूद राम मंदिर आंदोलन अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ता रहा और 30 अक्टूबर, 1990 का वो दिन आया जब अयोध्या में कार सेवकों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। तब से मुलायम सिंह यादव की छवि मुल्ला मुलायम की बनने लगी। संभवतः मुलायम के कार सेवकों के प्रति इसी कठोर रवैये ने कल्याण सिंह को भी एक रास्ता सुझाया- किसी भी हद तक जाने का। उन्हें लगा कि अगर मंदिर बनने से रोकने वाले कुछ भी कर सकते हैं तो मंदिर बनाने की राह में आने वाली किसी बाधा की परवाह भला वो क्यों करें।

कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा। लेकिन राम मंदिर निर्माण का निश्चय पक्का था, इसलिए सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के आसपास 2.27 एकड़ जमीन खरीद ली और पास में ही राम चबूतरा बनवा दिया। सरकार का मकसद साफ था- तीर्थस्थल में पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करना। विश्व हिंदू परिषद भी लोगों को समझा-बुझाकर तीर्थस्थल के आसपास के इलाके की जमीनें खरीदने लगी। कल्याण सरकार ने भी जो जमीनें खरीदीं, वो विश्व हिंदू परिषद के ट्रस्ट को सौंपती गई। उसने राम कथा पार्क के लिए आसपास की 42.09 एकड़ जमीन विहिप ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दी।

6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में कारसेवकों का जनसमुद्र उमड़ा तो आडवाणी समेत बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं ने उन्हें संभालने की भरपूर कोशिशें कीं। लेकिन रामभक्तों पर एक मानो एक जुनून सवार था- अत्याचार और अन्याय की सदियों पहले पड़ी नींव के प्रतीक रूप में बाबरी मस्जिद का सफाया। एक-एक कर कारसेवक बाबरी मस्जिद की गुंबदों पर चढ़ने लगे और कुछ देर में ही गुंबद टूटकर गिरने लगे। दो साल पहले उत्तर प्रदेश की जिस पुलिस ने अयोध्या की भूमि कारसेवकों के खून से रंग दी थी, वो बाबरी विध्वंस को चुपचाप देख रही थी। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक बाबरी की सुरक्षा में असफल रहने की नैतिक जिम्मेदारी लेने में देर नहीं की। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें 24 घंटे के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस समय पद खोने का कोई पछतावा है तो कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मुख्यमंत्री का पद भगवान राम के सामने कुछ भी नहीं है। वर्षों बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने ही राम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया तो कल्याण सिंह ने लखनऊ में अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसमें उन्होंने कहा, ‘6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी थी, मैंने अयोध्या में हुई अराजकता की पूरी जिम्मेदारी ली थी। मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर और उसी दिन राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उसकी कीमत चुकाई थी। मेरा विश्वास है कि 2022-23 तक अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनकर तैयार होगा, जिसके दर्शन देश-विदेश से लोग करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हर किसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और उसे स्वीकार कर लिया है, जो न्यायपूर्ण, वैध और सर्व-समावेशी है। इसने 500 साल पुराने विवाद को समाप्त कर दिया है।’

क्या पीएम मोदी का हर कार्य राजनीति से जुड़ा हुआ होता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी का हर कार्य राजनीति से जुड़ा हुआ होता है या नहीं! उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक अलग ही माहौल है। प्रभु रामलला के उनके भव्य मंदिर में विराजमान किए जाने की तैयारियां चल रही हैं। इसी अयोध्या में एक परिवार इस समय खासा खुश है। वह है मीरा मांझी का परिवार। 30 दिसंबर को अचानक प्रधानमंत्री उनके घर पहुंच गए। घर में बनी चाय का स्वाद लिया। उस दौरान पीएम मोदी ने कहा था, आपलोग मीठी चाय पीते हैं। मैं चायवाला हूं, मुझे चाय पीते ही उसके स्वाद का अंदाजा हो जाता है। अब उनका संदेश आया है। एक पत्र, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके घर पहुंचने के अनुभवों को साझा किया। नए साल की बधाई भेजी और साथ में कुछ गिफ्ट भी। प्रधानमंत्री का संदेश और उपहार पाकर परिवार की खुशियां कई गुना बढ़ी हुई हैं। अब हर तरफ मीरा मांझी की चर्चा है। इन चर्चाओं के बीच निषादराज की चर्चा शुरू हो गई है। भगवान राम के परममित्र रहे निषादराज लंका दमन के बाद सिंहासन संभालने के क्रम में आयोजन का साक्षी बने थे। निषादराज अयोध्या भगवान राम के निमंत्रण पर पधारे थे। भगवान राम ने मित्र का दर्जा दिया। अब प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में करीब 550 सालों के बाद विराजमान होने वाले हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री ने मीरा मांझी को इस आयोजन का निमंत्रण स्वयं देकर त्रेता युग की परंपरा को बरकरार रखने का संदेश दिया। वहीं, इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या के निषाद परिवार को नए साल की शुभकामनाएं और गिफ्ट भेजकर एक अलग राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। दरअसल, यूपी की राजनीति में ओबीसी वोट बैंक बड़ी भूमिका में है। निषाद जातियों का प्रदेश में एक बड़ा वोट बैंक है, जो जीत- हार में बड़ी भूमिका निभाता रहा है। भगवान राम के परम मित्र निषादराज के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ग को साधने की कोशिश की है। 30 दिसंबर को अयोध्या पहुंचे प्रधानमंत्री अचानक अपने दौरे में बदलाव कर मीरा मांझी के घर पहुंच गए। मीरा मांझी उज्ज्वला गैस कनेक्शन योजना की एक 10 करोड़वीं लाभुक हैं। प्रधानमंत्री ने इस दौरे के जरिए एक तीर से कई शिकार किए।

निषाद जातियों के बीच छोटे- छोटे दलों का प्रभाव है। यूपी में निषाद पार्टी इस वोट बैंक पर अपना दावा करती दिखती है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद इस वर्ग पर अपना दावा करते हैं। वहीं, बिहार में वीआईपी पार्टी अध्यक्ष मुकेश साहनी का अपना दावा है। निषाद पार्टी अभी एनडीए के साथ है। डॉ. संजय निषाद यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार का हिस्सा हैं। वहीं, बिहार की वीआईपी पार्टी कभी एनडीए तो कभी विपक्षी गठबंधन के पाले में जाती रही है। पीएम नरेंद्र मोदी के मीरा मांझी के घर पर जाने को लेकर निषाद वर्ग में एक अलग ही माहौल बना है। सवाल यह किया जाने लगा है कि आखिर किसी सामान्य निषाद परिवार में अब से पहले कोई प्रधानमंत्री आया है? इन सवालों को भाजपा की तरफ से भी उठाया जा रहा है। पूर्वांचल से उत्तरी बिहार के अधिकांश इलाकों में निषाद जाति वर्ग के वोटरों के बीच इस संदेश को काफी तेजी से फैलाया जा रहा है। इसका असर भी उसी तेजी से देखने को मिल रहा है।

पीएम ने उज्ज्वला योजना को लेकर सरकार की ओर से चलाए गए अभियान को एक तरीके से सफल करार दिया। अपने सरकार की उपलब्धियां बता दी। दूसरी तरफ मीरा मांझी के जरिए उन्होंने निषाद कम्युनिटी को सीधे- सीधे टारगेट किया। असर उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक पड़ना तय माना जा रहा है। यूपी की 18 फीसदी आबादी निषाद समुदाय से जुड़ी हुई है। वहीं, बिहार में इस वर्ग की जनसंख्या करीब 14 फीसदी है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में इस वर्ग ने पीएम नरेंद्र मोदी को अपना समर्थन दिया है।

बिहार में भाजपा की निषाद पॉलिटिक्स अलग है। पार्टी ने पहले कैप्टन जयप्रकाश नारायण निषाद को अपने साथ जोड़ा। अब उनके बेटे अजय निषाद भाजपा से सांसद हैं। वे बिहार की मुजफ्फरपुर सीट से पिछले दो लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर चुके हैं। इससे पहले कैप्टन निषाद 2009 में जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर जीते थे। इस प्रकार निषाद पॉलिटिक्स को साधने की कोशिश में जुटे मुकेश साहनी को अजय निषाद के जरिए भाजपा किनारे लगाती दिख रही है। दरअसल, बिहार में निषाद वर्ग का वोट बैंक करीब 8 फीसदी है। वहीं, प्रदेश में निषाद समाज की 21 उपजातियां हैं। इनके वोट बैंक भी करीब 5 से 6 फीसदी हैं। इस प्रकार प्रदेश के करीब 14 फीसदी वोट बैंक तक पीएम नरेंद्र मोदी के अवध में लिए गए एक्शन का प्रभाव पहुंचा है।

यूपी में निषाद जाति 17 ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है। कभी इस वर्ग को साधने के लिए समाजवादी पार्टी की मुलायम सिंह यादव सरकार ने एससी का दर्जा देने का प्रस्ताव तैयार किया। हालांकि, वोट बैंक की राजनीति में यह प्रस्ताव कानूनी पचड़े में फंस गया। कोर्ट की इस पर रोक लग गई। 2011 की जनगणना को आधार बनाकर देखा जाए तो यूपी में निषाद समाज का वोट बैंक करीब 18 फीसदी है। यूपी की 165 विधानसभा सीटों पर इनकी बहुलता है। इनका वोट बैंक 90 हजार से एक लाख के करीब है। अन्य जिलों में भी इनकी आबादी 25 से 30 हजार के करीब है। मतलब, यह वर्ग जीत- हार का अंतर पैदा करने वाला है।

गोरखपुर, जौनपुर, भदोही, वाराणसी से लेकर पूरे पूर्वांचल में इस वर्ग का वोट बैंक प्रभावी माना जाता है। नौका चालक और मछली पकड़ने का काम करने वाले इस वर्ग के बीच पीएम मोदी का पहुंचना एक बड़ी राजनीतिक घटना के रूप में देखा जा रहा है। पीएम मोदी के इस कदम से क्षेत्रीय छत्रपों की राजनीति भी प्रभावित होनी तय मानी जा रही है। पीएम मोदी ने इसके बाद जनसभा में भी उज्ज्वला योजना की चर्चा की। पीएम ने कहा कि वर्ष 1947 में देश की आजादी के बाद से 2014 तक देश में केवल 14 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए। पिछले साढ़े नौ सालों में 18 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए हैं। इसमें से 10 करोड़ कनेक्शन तो उज्ज्वला योजना के हैं। साथ ही, उन्होंने एक सामान्य लाभुक के मुंह से आवास योजना में भ्रष्टाचार जैसी शिकायतों पर बात की। पूछा, कितने पैसे आए। मीरा ने कहा- तीन किश्तों में ढाई लाख रुपये आए। इस पर पीएम ने पूछा- किसी ने कुछ मांगा तो नहीं? किसी को कुछ देना तो नहीं पड़ा? मीरा ने कहा- पूरे पैसे एकाउंट में आए। किसी को खिलाना नहीं पड़ा।

भाजपा का विरोध करने के लिए बनी I.N.D.I.A. हो या अन्य विपक्षी दल, पीएम नरेंद्र मोदी के एक्शन का असर उन पर पड़ना तय है। पीएम मोदी ने एक सामान्य निषाद परिवार और मुहल्ले में पहुंचकर एक अलग माहौल पैदा किया। इस पर बहस शुरू हुई। इसका सीधा राजनीतिक लाभ उन्हें मिलना तय है। यूपी की राजनीति में अखिलेश यादव और मायावती निषाद वर्ग को साधकर अपनी तरफ लाने का प्रयास करती रही है। हालांकि, अब पीएम नरेंद्र मोदी ने मीरा मांझी के घर पहुंचकर संदेश दिया है कि इस वर्ग का असली मित्र भाजपा ही है। वहीं, जमीन पर सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के दिल्ली से दावे की हकीकत अयोध्या से दिखाकर पीएम मोदी ने विरोध करने वाले दलों को भी जमीन पर उतरने का संदेश दिया है।

देशभर में एक साल में कितने होते हैं हिट एंड रन के मामले?

आज हम आपको वह आंकड़े दिखाएंगे जिनमे हिट एंड रन के मामले देश भर में एक साल में गिने गए हैं! भारतीय न्याय संहिता बीएनएस में सड़क दुर्घटनाओं के लिए सजा के प्रावधान के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों में रोष है। देशभर के ट्रक ड्राइवर बीएनएस की धारा 104 को वापस लेने की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए थे। उनकी चिंता यह है कि सड़क हादसे के लिए 10 साल जेल की सजा का प्रावधान बहुत कठोर है जो ड्राइवरों की जिंदगी और उनका परिवार तबाह कर देगा। हालांकि, सच्चाई कुछ और है। नया कानून कहता है कि अगर कोई ड्राइवर किसी को ठोकर मारकर भाग जाता है और वह घटना की रिपोर्टिंग नहीं करता है तब उसे 10 साल की सजा हो सकती है। अगर वह पुलिस को घटना की जानकारी खुद दे दे तो उसे 5 साल तक की सजा ही हो सकती है जिसका प्रावधान मौजूदा कानून में भी है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर अगर नए कानून के प्रावधान को परखें तो क्या आप कहेंगे कि यह गलत है? आइए, आपको इस सवाल का जवाब ढूंढने में थोड़ी और मदद करते हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में दिल्ली में सड़क हादसों से जितनी मौतें हुईं, उनमें 47% यानी करीब आधे मामलों में पता ही नहीं चल पाया है कि आखिर टक्कर किसने मारी? इसे ही हिट एंड रन केस कहते हैं- मारो और निकल लो। सोचिए, अगर ड्राइवर की जिंदगी और उसका परिवार है तो क्या हादसे में जान गंवाने वालों की जिंदगी और परिवार का कोई महत्व नहीं? कानून सिर्फ यही कहता है कि अगर हादसा हो गया है तो इसकी जानकारी पुलिस को दें ताकि पीड़ित को जान बचाने की कोशिश की जा सके। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से सड़क हादसों में मौतों की संख्या बहुत हद तक नीचे आ सकती है। तब कई जिंदगियां बच सकती हैं, कई परिवार एक झटके के बाद दोबारा उबर सकता है।

आइए सड़क हादसों में मौतों पर थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 2002 में राजधानी दिल्ली में लगभग सड़क हादसों में होने वाली आधी मौतों की वजह ऐसे वाहन होते हैं जिनका कभी पता ही नहीं चल पाता है। पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में दिल्ली में सड़क हादसों में हुई मौतों में से 47% अज्ञात वाहनों के कारण हुई थी। वहीं, कार या टैक्सी से 14% जबकि भारी वाहनों से हादसों में 12% मौतें हुई हैं। अज्ञात वाहनों ने उस साल 668 लोगों की जान ली और लगभग 1,104 को घायल कर दिया। 2023 के आंकड़े अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन माना जाता है कि वे लगभग समान स्तर पर हैं।

अब जरा पूरे देश का हाल देख लें। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में सभी सड़क हादसों में टक्कर मारकर भागने के मामले करीब 15% थे। यानी हर 100 दुर्घटनाओं में से 15 में टक्कर मारने वाले वाहन का पता ही नहीं चला। हिट एंड रन केस में मौतों की बात करें तो यह आंकड़ा 18% है। आइए कुछ ऐसे सवालों के जवाब भी जान लें जो आपके मन में भी उठ सकते हैं। नहीं, भारत में सड़क हादसों के कई कारण होते हैं.। सामने से टक्कर, पीछे से टक्कर, साइड से टक्कर, ओवरस्पीडिंग, नशे में गाड़ी चलाना- ये सब भी बड़े कारण हैं। टक्कर मारकर भागना सड़क हादसों का पांचवां सबसे बड़ा कारण है और मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा डर ट्रक-लॉरी से लगाता है। हकीकत भी यही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन शामिल होते हैं। सबसे ज्यादा टक्कर दोपहिया वाहनों में ही होती है। ट्रक-लॉरी के ज्यादातर शिकार दोपहिया वाहन ही होते हैं।

अगर मामला अदालत तक पहुंचे तो मिलती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिट एंड रन केस में जो ट्रायल पूरा हो जाते हैं, उनमें करीब 47.9% में सजा होती है। ये दर दूसरी दुर्घटनाओं से काफी ज्यादा है। हत्या और गैर-इरादतन हत्या जैसे गंभीर मामलों में सजा की दर क्रमशः 44% और 39% ही है। हालांकि ये भी जानना जरूरी है कि हिट एंड रन के 90% से ज्यादा केस सालभर तक कोर्ट में ही पेंडिंग रह जाते हैं। यही स्थिति दूसरे गंभीर अपराधों की भी है।

इसका मतलब ये हुआ कि टक्कर मारकर भागने वाले को पकड़ पाना, सबूत जुटाना और चार्जशीट बनाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही एक बड़ा कारण है जिसके चलते सरकार ने नया कानून बनाने का फैसला किया है। पुलिस का कहना है कि नंबर प्लेट खराब या धुंधला हो तो वाहन का पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है। ऊपर से प्रत्यक्षदर्शी भी पुलिस को जानकारी देने से हिचकते हैं। वैसे भी, हिट एंड रन के ज्यादातर मामले रात में होते हैं जब प्रत्यक्षदर्शी कम ही होते हैं। सड़कों पर सीसीटीवी कैमरों की कमी से जांच और भी मुश्किल हो जाती है। भारतीय दंड संहिता आईपीसी की जगह ले रही भारतीय न्याय संहिता बीएनएस में हादसे के बाद भाग खड़े होने वाले ड्राइवरों को 10 साल तक की जेल और 7 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। हालांकि, दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन के अध्यक्ष डॉ. रोहित बाजलुजा का मानना है कि इस कानून को पूरी तरह लागू करना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि ‘बिना उचित तैयारी और साधनों के कानून बनाना खतरनाक है। यह किसी को हथियार देकर उसे अपनी मर्जी से इस्तेमाल करने की इजाजत देने जैसा है।’ वे आगे कहते हैं, ‘दिल्ली में ही लगभग 80 हजार पुलिसकर्मी हैं, जिनमें से 5,000 ट्रैफिक पुलिस में हैं। अब इतने कम पुलिसकर्मियों से इतने सारे वाहनों और इतने बड़े क्षेत्र पर निगरानी रखना और सभी कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई करना लगभग असंभव है।’

जानिए मृत पति के बच्चे पर किसका होता है हक?

आज हम आपको बताएंगे कि मृत पति के बच्चों पर किसका हक होता है और कानून क्या कहता है! ऑस्ट्रेलिया में एक 62 साल की महिला ने अपने मृत पति के वीर्य के खातिर न सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि जीत भी गई। महिला के पति की 17 दिसंबर को अचानक मौत हो गई थी। इसके बाद महिला ने अस्पताल से अपने पति के वीर्य को सुरक्षित रखने की गुजारिश की ताकि वह उसके जरिए सरोगेसी का सहारा लेकर मां बन सके। अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए। वक्त कम था। अगर देरी होती तो उसके मृत पति के शरीर से वीर्य निकालना मुमकिन नहीं होता। लिहाजा महिला वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। वह अदालत को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रही कि वह और उसके पति बड़ी शिद्दत से बच्चा पैदा करने के बारे में सोच रहे थे। खैर, महिला पति के वीर्य पर हक तो हासिल कर लिया है लेकिन अभी वह उसके जरिए मां नहीं बन सकती क्योंकि उसे अब इसके लिए कोर्ट से अलग से इजाजत लेने की जरूरत होगी। वैसे मृत शख्स के वीर्य पर हक की लड़ाई कई बार अदालतों में पहुंची हैं। भारत में भी कई बार ऐसा हो चुका है। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया वाले हालिया मामले पर नजर डालते हैं। 62 वर्ष की महिला के पति की मौत हो गई। उसने अस्पताल से अपने पति के वीर्य को सुरक्षित रखने की गुहार लगाई। अस्पताल ने हाथ खड़े किए तो सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वहां महिला जज को ये भरोसा दिलाने में कामयाब हो गई कि वह और उसके पति बच्चा पैदा करना चाहते थे। 2019 में उनके 31 साल के बेटे की एक कार हादसे में मौत हो गई थी। 2017 में उनकी 29 साल की बेटी भी मछली पकड़ने के दौरान हुए हादसे में डूबकर मर गई थी। इन दुखद घटनाओं के बाद कपल इस पर गंभीरता से विचार करने लगा कि क्या इस उम्र में उन्हें बच्चा हो सकता है? क्या 61 साल के पति के वीर्य का इस्तेमाल करके सरोगेसी के जरिए वह फिर से माता-पिता बन सकते हैं? इस बीच पति की अचानक मौत हो गई। महिला ने तब अस्पताल से गुजारिश की कि वह उनके पति के वीर्य को निकालकर स्टोर करे ताकि वह बाद में मां बन सके। अस्पताल ने साफ कह दिया कि वह ऐसा नहीं कर सकता। इसके बाद महिला अर्जेंट ऑर्डर के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची। 21 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला के मृति पति के वीर्य को कलेक्ट किया जाए और उसे सुरक्षित रखा जाए।

असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नॉलजी रेग्युलेशन ऐक्ट, 2021 यानी एआरटी एक्ट में वीर्य या एग को सुरक्षित करने की उम्र सीमा तय है। कानून के मुताबिक, पुरुष के लिए ये उम्र सीमा 55 वर्ष और महिला के लिए 50 वर्ष तय की गई है। इस कानून में 6 चैप्टर हैं और कुल 46 पैराग्राफ है। इस कानून के जरिए एआरटी क्लीनिक और एआरटी बैंकों के कामकाज को रेग्युलेट किया गया है। वैसे इस कानून में अविवाहित व्यक्तियों के वीर्य को स्टोर करने को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं। इस कानून के मुताबिक एआरटी बैंकों को किसी मृत व्यक्ति के वीर्य/अंडे को फ्रीज करने के लिए संबंधित पक्षों की लिखित में सहमति जरूरी है। लेकिन कानून में इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है कि अविवाहित व्यक्ति की मौत के बाद उसके वीर्य पर किसका अधिकार होगा।

2019 में महाराष्ट्र में एक फैमिली कोर्ट ने दिलचस्प फैसला दिया। नांदेड़ कोर्ट में महिला ने आईवीएफ के जरिए बच्चा पैदा करने के लिए पति के वीर्य की मांग की जबकि दोनों के बीच तलाक के लिए पहले से कानूनी लड़ाई चल रही थी। महिला का एक 7 साल का बेटा पहले से था और उसकी कस्टडी भी उसी के पास थी। उसके पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी और महिला ने उसके खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा रखा था। कानूनी लड़ाई के बीच महिला ने अलग रह रहे पति के वीर्य को हासिल करने के लिए एक और कानूनी लड़ाई शुरू कर दी। महिला ने दलील दी कि भविष्य में उसके बेटे को भाई या बहन के साथ की जरूरत पड़ सकती है लिहाजा वह वीर्य सुरक्षित कराना चाहती है क्योंकि वह दूसरी शादी भी नहीं करना चाहती। फैमिली कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया।

किसी मृत व्यक्ति के वीर्य पर उसकी विधवा का ही अधिकार हो सकता है, इसकी भारत ही नहीं, दुनियाभर की अदालतें मान्यता देती हैं। भारत में भी इस तरह के मामले अदालतों में पहुंच चुके हैं। 2021 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक मृत व्यक्ति के वीर्य पर उसके पिता की दावेदारी को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मृतक के अलावा सिर्प उसकी पत्नी के पास ही सुरक्षित रखे गए वीर्य को हासिल करने का अधिकार है। दरअसल, शख्स शादीशुदा था और थैलेसीमिया का मरीज था। उसने भविष्य में उपयोग के लिए अपने शुक्राणुओं को दिल्ली के एक अस्पताल में सुरक्षित रखवा दिया था। बाद में उस शख्स की मौत हो गई। उसके बाद उसके पिता ने दिल्ली के अस्पताल से संपर्क किया कि उन्हें उसके मृत बेटे के स्पर्म को दिया जाए। अस्पताल ने बताया कि इसके लिए मृतक की पत्नी की अनुमति जरूरी है। इसके बाद पिता ने बेटे के वीर्य पर हक हासिल करने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कलकत्ता हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि शख्स की मौत के बाद उसके वीर्य पर सिर्फ और सिर्फ उसकी पत्नी का अधिकार है।

दिल्ली हाई कोर्ट के सामने ये सवाल आया था कि अगर किसी अविवाहित शख्स की मौत हो जाती है और उसने अपने वीर्य के सैंपल को संरक्षित करा रखा हो तो उस पर आखिर किसका हक होगा। इस मामले में दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नॉलजी रेग्युलेशन ऐक्ट में इसे लेकर कोई व्यवस्था नहीं है कि किसी मृत व्यक्ति के सीमेन सैंपल पर उसके माता-पिता या उसके कानूनी उत्तराधिकारी का हक होगा या नहीं।

भारत में किसी मृत व्यक्ति के वीर्य से उसकी पत्नी के मां बनने का पहला मामला 2009 में सामने आया था। कपल कृत्रिम गर्भाधान की कोशिश में था और इसके लिए वीर्य को संरक्षित कराया था। दुर्भाग्य से 2006 में पति की मौत हो गई। पति की मौत के 2 साल बाद पत्नी को इस बात की जानकारी हुई कि उसके पति के वीर्य का सैंपल तो अस्पताल में सुरक्षित है। उसके बाद वह अस्पताल से संपर्क की और 2009 में अपने मृत पति के स्टोर किए गए वीर्य की मदद से प्रेग्नेंट हुई और अस्पताल में बेटे को जन्म दिया।

क्या शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से है दिक्कत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शंकराचार्य को मोदी के राम मूर्ति छूने से दिक्कत है या नहीं! पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उन्होंने इसे लेकर कहा है कि वह अयोध्या नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान है। उन्होंने कहा कि वहां पीएम नरेंद्र मोदी मूर्ति का लोकार्पण करेंगे और उसे स्पर्श करेंगे। क्या मैं वहां ताली बजा-बजाकर जय-जय करूंगा? शंकराचार्य के इस बयान के बाद से कंट्रोवर्सी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के मूर्ति को स्पर्श करने को शंकराचार्य द्वारा रेखांकित करने पर पुराने विवाद की यादें भी ताजा हो गई हैं। साथ ही सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसे समय में जब नरेंद्र मोदी को सनातन धर्म के प्रतीकों के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है तब स्वामी निश्चलानंद उनसे नाराज क्यों हैं? और ऐसे बागी बयान क्यों दे रहे हैं? गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती उर्फ नीलाम्बर का जन्म बिहार में हुआ था। 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में लगभग 31 साल की आयु में स्वामी करपात्री महाराज के सान्निध्य में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इसके बाद से वह नीलाम्बर से स्वामी निश्चलानंद हो गए थे। पुरी के 144वें शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी मानकर 9 फरवरी 1992 को पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर आसीन किया था।

राम मंदिर आंदोलन के बहाने धर्म और राजनीति के आपस में घुल-मिल जाने के दौर में तमाम संत खुलकर अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने लगे हैं। अयोध्या के तमाम मठों के महंत और शंकराचार्य भी राजनैतिक पार्टियों के समर्थन में यदा-कदा नजर आते हैं। ऐसे माहौल में भी पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद इस बात पर भरोसा करते हैं कि शंकराचार्य का पद किसी पार्टी को समर्थन देने वाला नहीं बल्कि शासकों पर शासन करने वाला पद है। उनकी वेबसाइट पर यह वाक्य प्रमुखता से दर्ज भी है। ऐसे में उनकी इस सैद्धांतिकी में पीएम मोदी से उनका विरोध काफी हद तक समझा भी जा सकता है। निश्चलानंद स्वामी राजनीति में संतों का इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति से भी नाराज दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने इसे लेकर एक बयान दिया था कि सियासी पार्टियां पहले संतों को अपना स्टार प्रचारक बनाती हैं और बाद में उन्हें मौनी बाबा बना देती हैं। उन्होंने श्री-श्री रविशंकर और योग गुरु बाबा रामदेव का उदाहरण भी दिया। उन्होंने किसी पार्टी का नाम लिए बिना कहा था कि पहले राजनैतिक दल ने दोनों का भरपूर इस्तेमाल किया। शासन सत्ता पाते ही उन्हें मौनी बाबा बना दिया गया।

स्वामी निश्चलादनंद की भाजपा से नाराजगी क्या है, इसका जवाब साफतौर पर नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अपने बयानों में जब-तब उन्होंने भाजपा नेताओं और संघ प्रमुख को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की इसलिए निंदा की थी कि वह भाजपा के प्रचारक बन गए हैं। इसके अलावा हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था पर बयान देने वाले मोहन भागवत के लिए कहा था कि उनके पास ज्ञान की कमी है। इतना ही नहीं, हिंदू मंदिरों में सरकार के हस्तक्षेप से भी निश्चलानंद को दिक्कत है। अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि मंदिरों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और ट्रस्ट को सक्षम बनकर मंदिरों में बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए। मंदिरों के लगातार हो रहे ‘कॉरिडोरीकरण’ का भी निश्चलानंद ने अक्सर विरोध किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वामी निश्चलानंद कभी प्रशंसा करते हैं तो कभी उनसे नाराज भी रहते हैं। उनके बयानों से लगता है कि राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज्यादा उपस्थिति भी उनकी आपत्ति का कारण है। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान उन्होंने इसे लेकर बड़ा बयान दिया था। निश्चलानंद ने सवालिया लहजे में कहा था कि राम जन्मभूमि को लेकर मोदी की क्या भूमिका रही थी? राम मंदिर निर्माण को लेकर क्या उनका एक भी भाषण सुनने को मिलेगा।

अयोध्या न जाने के लिए स्वामी निश्चलानंद ने जो कारण गिनाया है, उसमें उन्होंने कहा है, ‘मोदी लोकार्पण करें। मूर्ति को स्पर्श करेंगे, तो मैं वहां ताली बजाकर जय-जयकार करूंगा क्या?’ उनके इस बयान के तमाम मतलब भी निकाले जा रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से दिक्कत है। इस संदर्भ में एक पुराने विवाद की भी चर्चा चल पड़ी है। दरअसल, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश की इजाजत नहीं थी। साल 1958 में काफी लंबी लड़ाई के बाद दलितों को प्रवेश का मौका मिला। तब जैसे ही दलितों ने मंदिर में शिवलिंग को छुआ, तब करपात्री महाराज ने इसका विरोध किया था। उन्होंने विश्वनाथ मंदिर को अछूत घोषित कर दिया और काशी में ही गंगा के तट पर एक दूसरा काशी विश्वनाथ बनवा डाला था। इन्हीं करपात्री महाराज के सान्निध्य में निश्चलानंद ने भी संन्यास ग्रहण किया है। ऐसे में इस पुराने विवाद को नरेंद्र मोदी के रामलला की मूर्ति के स्पर्श करने को लेकर शंकराचार्य की जताई जा रही कथित आपत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

क्या यूपी में विपक्षी पार्टियां होगी एक?

अब यूपी में विपक्षी पार्टियां एक हो सकती है! पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा की बहुमत वाली जीत की यात्रा में उत्तर प्रदेश का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यहीं से चुनाव लड़ते हैं। इस कारण भी पूरे चुनाव में यूपी की चर्चा जोर-शोर से होती रहती है। चुनावी साल में यूपी के बारे में न केवल बात होगी बल्कि राम मंदिर के उद्घाटन के जरिए राष्ट्रीय चर्चा का रुख भी तय होगा। विपक्षी समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आरएलडी भाजपा के बढ़ते कदम को रोकने के लिए जाति और स्थानीय भावनाओं को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं बसपा जैसी अन्य पार्टियां, जिनके पास अच्छा वोट शेयर है, तटस्थ बनी हुई हैं। जहां तक बात छोटे दलों की है तो वो बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर आकर्षित हुए हैं। भाजपा ने 2014 में यूपी की 80 में से 71 सीटें 42% वोट शेयर के साथ जीती थीं। दो सीटें भाजपा की सहयोगी अपना दल ने जीती थीं। 2019 में बसपा, सपा और आरएलडी ने मिलकर भाजपा को टक्कर दी। फिर भी पार्टी ने 62 सीटें बड़े अंतर से जीत लीं और वोटों की हिस्सेदारी बढ़कर 50% हो गई। 2024 में भाजपा 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन करना चाहती है। राम मंदिर का उद्घाटन एक ऐसा तरूप का इक्का है जिसके दम पर भाजपा विपक्षियों को पूरी तरह चित करने की उम्मीद कर रही है। पार्टी ने जल्दी काम करना शुरू कर दिया है। भाजपा ने उन सीटों की पहचान की है जो उसने यूपी में कभी नहीं जीती थीं और जहां 2019 में हार मिली थी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, 2019 में जिन सीटों पर भाजपा को हार मिली थी, उन पर विशेष ध्यान देकर पार्टी ने राज्य में और 20 लाख मतदाता जोड़े हैं। पार्टी उन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले करने की योजना बना रही है जिन पर उसने 2019 में जीत नहीं दर्ज की थी। यह रणनीति हाल ही के विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी के लिए कारगर रही थी, इसलिए इसे आगामी लोकसभा में दोहराना चाहती है।

उत्तर प्रदेश की भाजपा इकाई के अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि हम चुनाव के कारण लोगों के पास जा रहे हैं। भाजपा का हर कार्यकर्ता सालभर लोगों के संपर्क में रहता है। हम हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहते हैं।’ चौधरी यूपी में चल रहे कई विकास कार्यों के बारे में भी बात करते हैं। वो कहते हैं, ‘पीएम मोदी के नेतृत्व में यूपी बदल गया है। इस कारण लोग मोदी और भाजपा पर भरोसा करते हैं।’ 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए थे। उसमें भाजपा की दोबारा जीत के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी एसबीएसपी जैसी छोटी पार्टियां भी भाजपा की ओर आकर्षित हुई हैं। पीएम नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रम पहले ही शुरू हो चुके हैं। 22 जनवरी को मोदी राम मंदिर का उद्घाटन करेंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे लोकसभा चुनाव तक मंदिर उद्घाटन का उत्साह बनाए रखें।

समाजवादी पार्टी सपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल आरएलडी सीट बंटवारे पर चर्चा में हैं। सभी ने 2022 का विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगे टिक नहीं पाए। उस चुनाव में सपा अपना वोट 10 से 32 प्रतिशत बढ़ाकर सबसे ज्यादा फायदे में रही। उसे 2012 में भी 32 प्रतिशत वोट नहीं मिले थे, जब उसने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इसी प्रदर्शन की बदौलत सपा और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक के अगुआ बने। 2024 के लोकसभा चुनाव दरअल 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों का प्रैक्टिस सेशन भी है। अखिलेश ने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। पार्टी प्रवक्ता और विश्लेषक सुधीर पंवार ने बताया कि सपा को अब पिछले एक साल में भाजपा और बसपा की तरह कैडर-आधारित पार्टी के रूप में संगठित किया गया है और यह अब एक औपचारिक संगठन है। इंडिया ब्लॉक में बसपा की अनुपस्थिति में अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ – पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक का नारा गढ़ा है और बसपा के मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक समानता, जातिगत जनगणना और बेरोजगारी पार्टी के अभियान का मुख्य हिस्सा हैं। पार्टी वर्तमान में उम्मीदवार चयन पर काम कर रही है। सर्वेक्षण चल रहे हैं और अखिलेश यादव व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। 2004 और 2009 के चुनावों में क्रमशः 35 और 23 लोकसभा सीटें जीतने के अपने सुनहरे दिनों के बाद सपा ने पिछले दो चुनावों में पांच-पांच सीटें ही जीती हैं। आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में हार के बाद पार्टी के पास लोकसभा में केवल तीन सांसद हैं।

अब तक एनडीए और इंडिया दोनों से दूरी बनाए रखने वाली बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने घटते वोट बैंक को रोकने की कठिन चुनौती का सामना करेगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी, लेकिन 2019 में सपा और आरएलडी के साथ गठबंधन में उसने 10 सीटें जीत ली थीं।

हालांकि, अनुसूचित जाति के मतदाता बसपा का मुख्य आधार बने हुए हैं, लेकिन पार्टी के अंदर में ही एमबीसी जातियों के लिए ‘स्टेपनी वोट’ का तंज कसा जाता है। पार्टी के अधिकांश प्रमुख चेहरे, जो अपनी जाति, खासकर एमबीसी के बीच लोकप्रिय हैं, पहले ही बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो चुके हैं। बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दो प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रही है। बसपा के लिए यह स्वाभाविक है कि वह पहले अपने अनुसूचित जाति के वोटों को बरकरार रखे। दूसरा काम एमबीसी के बीच युवा चेहरों की तलाश करना है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में पार्टी के लिए दोनों काम कठिन हैं। मायावती का अकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुनने का फैसला स्पष्ट रूप से अनुसूचित जातियों के बीच युवा मतदाताओं को लुभाने का लक्ष्य साधने के लिए है। पार्टी अपने मूल अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने राजनीतिक विरोधियों से बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। राजभर, शाक्य, सैनी और निषाद जैसे एमबीसी मतदाताओं को एनडीए और इंडिया दोनों ही खेमे लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए कौन से हथियार है बीजेपी के पास?

आज हम आपको बीजेपी के उन हथियार के बारे में बताएंगे जो उसने कांग्रेस के लिए रख रखे हैं! कैसी भी प्रतिस्पर्धा हो, किसी भी प्रतियोगिता का हिस्सा आप बन रहे हैं तो जीत का फॉर्म्युला तो बनाना ही होगा। इस लिहाज से बीजेपी की छवि बेहद मजबूत दल की है। अब जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो देश की सत्ता में एक दशक से आसीन पार्टी ने चार समितियों का गठन कर दिया है। ये समितियां नेताओं को पार्टी से जोड़ने से लेकर चुनाव प्रबंधन तक का जिम्मा देखेंगी। सूत्रों के मुताबिक भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में इन चार कमिटियों को बनाने का फैसला लिया गया। सूत्रों ने बताया कि जॉइनिंग कमिटी, क्लस्टर कमिटी, कैंपेन कमिटी और न्यू वोटर्स कमिटी के नाम से समितियों का गठन किया गया है। इनमें जॉइनिंग कमिटी का दायित्व यह तय करना है कि किन नेताओं को भाजपा से जोड़ना है। यह कमिटी कई स्तर पर काम करेगी। मसलन, उन नेताओं की तलाश और उनसे संपर्क जिन्हें पार्टी से जोड़ा जाना चाहिए। फिर उन नेताओं की पड़ताल जिन्होंने बीजेपी से जुड़ने की इच्छा जताई है। जॉइनिंग कमिटी ही तय करेगी कि भाजपा से रूठकर दूसरी पार्टियों में चले गए किन-किन नेताओं को मनाकर वापस लाने के प्रयास किए जाएं। इसी समिति की जिम्मेदारी है कि वो पार्टी जॉइन करने के इच्छुक दूसरे दलों के नेताओं को विभिन्न पैमानों पर परखे और तय करे कि उन्हें बीजेपी में एंट्री दी जाए या नहीं। यह तय करने के लिए पार्टी नेता को उनकी छवि, जमीन पर पकड़, विचारधारा आदि की कसौटियों पर कसेगी।कमिटी देखेगी कि कौन-कौन पार्टी जॉइन करना चाहता है और उन्हें जॉइन करवा कर पार्टी को फायदा होगा भी या नहीं। साथ ही वे उनका बैकग्राउंड भी देखेंगे और जिस राज्य से हैं उस राज्य के पार्टी संगठन से भी बात करेंगे। वहीं, विभिन्न क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियों को भी पार्टी से जोड़कर उनका पॉलिटिकल डेब्यू कराने की जिम्मेदारी भी जॉइनिंग कमिटी के पास है।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, जॉइनिंग कमिटी में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, केंद्रीय मंत्री अश्वनी वैष्णव, केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडविया, असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा, महासचिव विनोद तावड़े, तरुण चुग और सुनील बंसल शामिल हैं। दरअसल, भाजपा अपने विरोधी दलों के नेताओं को तोड़ने की रणनीति पर भी काम कर रही है। पार्टी के इस मुहीम का मकसद कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में गए अपने नेताओं को वापस लाना भी है। कमिटी हर नेता से बात करेगी और उनकी असंतुष्टि का कारण पता करेगी। बातचीत के बाद अगर नेता की दलील में दम दिखा तो उन्हें संतुष्ट करने के लिए कदम उठाए जाएंगे और वापसी का रास्ता पुख्ता किया जाएगा। बीजेपी के एक नेता ने बताया कि देशभर में बहुत से लोग बीजेपी जॉइन करने को उत्सुक हैं। इसमें बड़ी संख्या में दूसरी पार्टी के नेता भी हैं। कमिटी देखेगी कि कौन-कौन पार्टी जॉइन करना चाहता है और उन्हें जॉइन करवा कर पार्टी को फायदा होगा भी या नहीं। साथ ही वे उनका बैकग्राउंड भी देखेंगे और जिस राज्य से हैं उस राज्य के पार्टी संगठन से भी बात करेंगे।

दूसरी क्लस्टर कमिटी है। यह समिति लोकसभा सीटों के जो अलग-अलग क्लस्टर बनाए गए हैं, उनके कॉर्डिनेशन का काम देखेगी और जिम्मेदारी तय करेगी। तीसरी कैंपेन कमिटी है। ये हर राज्य में किस तरह से चुनाव प्रचार की गतिविधि चलनी है और कहां-क्या जरूरत है, उस पर नजर रखेगी। चौथी न्यू वोटर्स कमिटी है जो नए मतदाताओं से संपर्क करेगी। लोकसभा चुनाव से पहले फर्स्ट टाइम वोटर्स को लुभाने के लिए बड़े स्तर पर कार्यक्रमों को अंजाम देने की योजना है। इसके अलावा, बीजेपी ने अपना वोटर बेस बढ़ाने के लिए GYAN रीब, युवा, अन्नदाता किसान, नारी फॉर्म्युला भी तैयार किया है।नेताओं की पड़ताल जिन्होंने बीजेपी से जुड़ने की इच्छा जताई है। जॉइनिंग कमिटी ही तय करेगी कि भाजपा से रूठकर दूसरी पार्टियों में चले गए किन-किन नेताओं को मनाकर वापस लाने के प्रयास किए जाएं। इसी समिति की जिम्मेदारी है कि वो पार्टी जॉइन करने के इच्छुक दूसरे दलों के नेताओं को विभिन्न पैमानों पर परखे और तय करे कि उन्हें बीजेपी में एंट्री दी जाए या नहीं। यह तय करने के लिए पार्टी नेता को उनकी छवि, जमीन पर पकड़, विचारधारा आदि की कसौटियों पर कसेगी। बीजेपी गरीबों, युवाओं, किसानों और महिलाओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत करने की फिराक में है। इन चार वर्गों में मतदाताओं का बड़ा हिस्सा आ जाता है।