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क्या भारत न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए सजा साबित होगी या दवा?

विश्लेषकों की माने तो भारत न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए सजा और दवा दोनों ही साबित हो सकती है! हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस की दमदार वापसी की उम्मीदें हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में शिकस्त के साथ ही धराशायी हो चुकी हैं। इस तरह 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी की राह अब अनिश्चित दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं, कांग्रेस हालिया हार से नवगठित I.N.D.I.A. गठबंधन की भी मुश्किल बढ़ रही है क्योंकि इस गठबंधन का भविष्य भी कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। अगर कांग्रेस उन 200 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर बीजेपी से हारती रहती है जहां दोनों पार्टियों का सीधा मुकाबला है, तो क्षेत्रीय पार्टियों का अच्छा प्रदर्शन भी गठबंधन को जीत दिलाने के लिए काफी नहीं होगा। आखिर कांग्रेस को हो क्या गया है? वह वापसी क्यों नहीं कर पा रही है, या कम से कम अपनी छाप क्यों नहीं छोड़ पा रही है? कई लोग इसके लिए गांधी परिवार के नेतृत्व और उनकी घटती चुनावी जीत को जिम्मेदार मानते हैं। वो कहते हैं कि ‘नए भारत’ में मोदी फैक्टर काफी मजबूत है, जबकि कांग्रेस के पास कोई नया नैरेटिव नहीं है। गांधी परिवार का नेतृत्व विरासत पर आधारित है, जहां सारे अधिकार होते हैं लेकिन हार या गलत फैसलों की कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती। पार्टी हारती है, उसे नुकसान होता है, लेकिन गांधी परिवार इससे अछूता रहता है। कांग्रेस के लिए इस राजनीतिक निराशा के दौर के बीच, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक और यात्रा पर निकलने का फैसला किया है। राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा को उम्मीद थी कि राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की जीत होगी और उसका पूरा श्रेय उनकी भारत जोड़ो यात्रा और जातिगत गणना-ओबीसी कार्ड को जाएगा। लेकिन ऐसा हो न सका। ये देखना बाकी है कि ये नया ‘पूरब-पश्चिम’ बस यात्रा-2 पार्टी को कहां तक ले जा पाएगी।

चुनाव प्रचार समिति सीडब्ल्यूसी की 21 दिसंबर की बैठक में कुछ सदस्यों ने राहुल को आगाह किया था कि लोकसभा चुनाव बेहद नजदीक हैं और ऐसे में एक और यात्रा फायदेमंद नहीं होगी। साथ ही, राम मंदिर उद्घाटन के लिए बीजेपी के कार्यक्रम से ये टकरा सकती है और इसमें पहले जैसा नयापन भी नहीं होगा। लेकिन पार्टी ने इन चेतावनियों को दरकिनार कर दिया है। एक तरफ राहुल दूसरी यात्रा की तैयारी कर रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रियंका वाड्रा भी अपना दायरा बढ़ा रही हैं। भले ही उनके नेतृत्व में यूपी कांग्रेस लगभग खत्म हो गई, लेकिन उन्हें ‘बिना विभाग के एआईसीसी महासचिव’ का पद इनाम के तौर पर मिल गया। यानी कहीं भी दखल देने का लाइसेंस और वो भी बिना किसी जवाबदही के। अगर राहुल का पीएम बनने का दावा इस पर आधारित है कि उनके पिता, उनकी दादी और उनके परनाना भी प्रधानमंत्री थे तो प्रियंका वाड्रा के पक्ष में तो एक और योग्यता है यानी चौथा कारण। उनके फैन अब ये दावा कर सकते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री भी प्रधानमंत्री बनने से पहले ‘बिना विभाग के मंत्री’ थे।

परिवार के फलने-फूलने में एक चालाकी से चलने वाला ‘टू हैंड्स क्लैप’ सिस्टम मदद करता है यानी ‘आप मेरी पीठ खुजाओ, मैं आपकी पीठ खुजाऊं।’ CWC से लेकर AICC सचिवालय और प्रदेश कांग्रेस समितियों (CPC) तक तकरीबन सभी पदाधिकारी ‘मनोनीत’ होते हैं, जिन्हें चुने हुए सदस्यों के उलट जब चाहे हटाया जा सकता है। सोनिया-राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद भी अपना स्थान सुरक्षित कर लिया। रायपुर अधिवेशन में “पूर्व कांग्रेस अध्यक्षों और पूर्व प्रधानमंत्रियों को CWC में स्थायी सदस्यता” दे दी गई। गांधी परिवार और नियुक्त पदाधिकारी आपसी वफादारी के नाम पर साथ चलते हैं, जबकि कांग्रेस डूबती जा रही है। मनोनीत पदाधिकारी ये राग गाते रहते हैं कि सिर्फ गांधी परिवार ही पार्टी को एकजुट रख सकती है। पार्टियां भविष्य की राजनीति पर काम करके जीतती हैं, अतीत के किस्सों पर नहीं या युवाओं को विरासत में मिले विशेषाधिकारों का दिखावा करके नहीं। और गांधी-वाड्रा परिवार इस मामले में कई क्षेत्रीय पार्टियों की ही तरह हैं, जहां उनकी तरह ही परिवार केंद्रीय भूमिका में है।

राहुल गांधी पार्टी के मनोनीत पदाधिकारियों पर भले ही दबदबा रखते हों, लेकिन ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने साफ संकेत दिया कि वह उनके पीएम प्रत्याशी के संभावितों की लिस्ट में भी नहीं हैं। उन्होंने दलित समुदाय से खरगे को पीएम उम्मीदवार के रूप में पेश करके ये बात तेज कर दी। यह देखना बाकी है कि सीटों के बंटवारे में ‘इंडिया’ ब्लॉक की बात चलेगी या कोई पार्टी गठबंधन साथ छोड़ देगी।

कांग्रेस की उम्मीद तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल पर टिकी है, लेकिन दूसरी तरफ राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में उसकी पकड़ कमज़ोर हुई है। हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों में इस हार से अन्य राज्यों में सीट शेयरिंग को लेकर उसकी मोल-तोल की क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित होगी। जैसे बिहार में उसे जेडीयू, महाराष्ट्र में एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना, यूपी में समाजवादी पार्टी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, झारखंड में जेएमएम, पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ सीटों के तालमेल में कांग्रेस की मोलभाव की क्षमता कम हुई है। इसका मतलब है कि एक तरफ तो सीधे मुकाबले वाले राज्यों में कांग्रेस को बीजेपी के तूफान से खुद निपटना होगा और दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों से मुकाबले वाले राज्यों में ये दुआ करनी होगी कि उसके सहयोगी दल बीजेपी पर भारी पड़ें।

इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं को लगता है कि चुनाव को “मोदी बनाम कौन” और धार्मिक मुद्दों से हटाकर रोजमर्रा की समस्याओं पर लाना सबसे अच्छा तरीका है। लेकिन ज़्यादातर पार्टियां एक ही राज्य में मजबूत हैं, वो पूरे देश में कांग्रेस की मदद नहीं कर सकतीं और बीजेपी के सीधे मुकाबले में उसका साथ नहीं दे सकतीं। पिछले चुनावों ने ये भी दिखाया कि ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ की होड़ भी बीजेपी के धार को कुंद नहीं कर सकतीं।

इंडिया ब्लॉक के नेताओं को मोदी के दो दांव – ‘वंशवादी राजनीति’ और ‘भ्रष्टाचार’ के जवाब देने में भी मुश्किल हो रही है। जब एक मंच पर ज़्यादातर नेता अपने परिवार के साथ नज़र आते हैं, तो ब्लॉक ‘कंगारू की कतार’ जैसा लगता है और जब उनमें से कई ज़मानत पर रिहा हैं या भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का सामना कर रहे हैं, तो इससे उनकी छवि को धक्का लगता है। अभी तक ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास कोई ऐसा सकारात्मक और विश्वसनीय नैरेटिव नहीं है जो उन मतदाताओं को लुभा सके जिन्हें फ्लोटिंग माना जाता है। यानी ऐसे वोटर जो चुनाव आने तक तय नहीं कर पाते कि उन्हें किसे वोट देना चाहिए। राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, इसलिए कांग्रेस और ‘इंडिया’ ब्लॉक मोदी सरकार के कामकाज के कमजोर पहलुओं को उठा रहे हैं, इस उम्मीद में कि मतदाता बदलाव चाहते हैं। वो इतिहास का हवाला दे रहे हैं कि नेहरू के अलावा किसी केंद्र सरकार को लगातार तीन चुनाव जीत नहीं मिली। इंडिया ब्लॉक तो चमत्कार के लिए प्राथर्ना कर रहा है।

क्या लोकसभा चुनाव में राम मंदिर रामबाण साबित होगा?

राम मंदिर लोकसभा चुनाव में रामबाण साबित हो सकता है! अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। मकर संक्रांति के दिन से ही राम की नगरी में रामोत्सव शुरू हो जाएगा। इस दौरान विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होंगे। 22 तारीख को प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में दर्शन का दौर शुरू होगा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस पूरे कार्यक्रम को यूपी की अर्थव्यवस्था में बड़े बूस्ट के एक बेहतरीन मौके की तरह देख रही है। ग्लोबल ब्रांडिंग के लक्ष्य के साथ अयोध्या का पूरा कायाकल्प किया जा रहा है। यही नहीं अयोध्या के विकास का असर आसपास के जिलों तक देखा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ इस मौके को भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 में राम लहर पैदा करने की कोशिश में है। पहले बात करते हैं भारतीय जनता पार्टी की। भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर को लेकर डिटेल प्लान तैयार कर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार पीएम नरेंद्र मोदी के प्राण प्रतिष्ठा कराने के अगले ही दिन यानी 23 जनवरी से अयोध्या में भाजपा का 5 हजार भक्तों को रोजाना दर्शन कराने का प्लान है। इस दौरान पार्टी की तरफ से भक्तों का ढोल नगाड़ों से स्वागत किया जाएगा। यही नहीं देश भर में राम मंदिर आंदोलन की याद दिलाने के लिए भाजपा कार्यकर्ता इसके इतिहास के संदर्भ में बुकलेट भी बांटेंगे। इस बुकलेट में राम मंदिर आंदेालन के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के नेताओं की प्रमुख भूमिका का जिक्र होगा। यही नहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल आदि विपक्षी दलों द्वारा रोड़े अटकाने की बातों का भी जिक्र होगा।

देश भर में पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद अक्षत वितरण कार्यक्रम चला रहा है। संघ और विहिप कई कार्यक्रम भी चला रहे हैं। इन सभी में भाजपा कार्यकर्ता भी जुटेंगे। पूरी कोशिश है कि देश भर में पब्लिक कनेक्ट और मजबूती से स्थापित हो जाए। हर बूथ से कम से कम एक व्यक्ति/परिवार को राम मंदिर में रामलला के दर्शन कराए जाने की योजना है। इसमें सबसे ज्यादा जोर दक्षिण के राज्यों पर है। पार्टी की रणनीति का आयाम इतना बड़ा है कि कोशिश है कि लोकसभा चुनाव से पहले कम से कम 5 हजार लोग रोजाना दर्शन करें और ताकि वह लौटकर अपने क्षेत्र में पार्टी का प्रचार करें। यूपी ही नहीं उत्तर भारत के अन्य राज्यों से भी सीधे बस सेवा देने की योजना है। इसमें वहां की भाजपा सरकारों से भी सहयोग लिया जाएगा। यही नहीं रेलवे ने जो स्पेशल ट्रेनें चलाने का ऐलान किया है, उसका भी ज्यादा से ज्यादा लाभ भाजपा उठाएगी। जिस तरह रैलियों को लेकर रणनीति बनती है, ठीक वैसे ही इसकी भी प्लानिंग है। जो कार्यकर्ता लोगों को राम मंदिर यात्रा के लिए लेकर आएगा, वही उनके लौटने तक उनकी पूरी सहूलियत का ख्याल रखेगा। इसमें पार्टी के अन्य कार्यकर्ता उसका सहयोग करेंगे।

वहीं दूसरी तरफ योगी सरकार राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को ऐतिहासिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। दरअसल सरकार इसे उत्तर प्रदेश की ग्लोबल ब्रांडिंग के मौके के तौर पर देख रही है। यहां वर्ल्ड क्लास एयरपोर्ट शुरू हो गया है, अयोध्या में तमाम कंपनियों के होटल खोलने की तैयारी है। यही नहीं अयोध्या का विस्तार कर एक अलग प्लांड शहर बसाया जा रहा है। यही नहीं राम मंदिर समारोह के दौरान विशिष्ट अतिथियों को यूपी की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना से गिफ्ट दिया जाएगा। कोशिश है कि यूपी के हर जिले के अलग उत्पादों को ग्लोबल ब्रांडिंग मिले। वैसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूपी के इन प्रोडक्ट को कई अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अतिथियों को भेंट कर चुके हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ खुद आयोजन की पूरी व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं।सीएम योगी का कहना है कि पूरी दुनिया अयोध्या की ओर उत्सुकता से देख रही है। हर कोई अयोध्या आना चाहता है। पूरा देश राममय है। यह उत्तर प्रदेश की ग्लोबल ब्रांडिंग का सुअवसर भी है। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में आने वाले अतिथियों तथा उसके बाद पर्यटकों/श्रद्धालुओं के आगमन को सुखद, संतोषप्रद अनुभव के लिए राज्य सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। जनसहयोग से अयोध्या नगरी सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता का मानक होगी। यह श्रीराममंदिर ‘राष्ट्रमन्दिर’ के रूप में भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक एकता का प्रतीक होगा।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि 22 जनवरी के बाद अयोध्या में दुनिया भर से रामभक्तों का आगमन होगा। उनकी सुविधा के लिए पूरे नगर में विभिन्न भाषाओं में साइनेज लगाए जाएं। संविधान की 08वीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं और संयुक्त राष्ट्र की 09 भाषाओं में साईनेज हों। प्रयागराज-अयोध्या,गोरखपुर- अयोध्या, लखनऊ-अयोध्या, वाराणसी-अयोध्या मार्ग पर स्मार्ट साइनेज लगाये जाएं। विभिन्न भाषाओं में सूचना प्रसारित हो। इन मार्गों पर अतिक्रमण कतई न हो। स्वच्छता हो। रेहड़ी-पटरी व्यवसायी न हो। क्रेन, एम्बुलेंस की उपलब्धता हो। इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा संबंधित जनपदों को निर्देशित किया जाए।

जनवरी में जहां एक तरफ भव्य श्रीराम मंदिर का उद्घाटन होगा। वहीं दूसरी तरफ कई विकास कार्य भी पूरे हो जाएंगे। इलमें 394 करोड़ से 4 लेन अयोध्या-अकबरपुर बसखारी मार्ग, एनएच 27 से रामपथ तक रेलवे समपार, पंचकोसी परिक्रमा मार्ग पर बड़ी बुआ रेलवे क्रॉसिंग पर ओवर ब्रिज, दर्शन नगर के पास रेलवे ओवर ब्रिज, अमानीगंज में मल्टी लेवल पार्किंग, कलेक्ट्रेट के पास स्मार्ट वाहन पार्किंग, पंचकोसी और चौदहकोसी मार्ग पर इंटरप्रिटेशन वॉल का निर्माण, परिक्रमा मार्ग पर 25 से ज्यादा पयर्टन स्थलों और कुंडों का विकास, डेकोरेटिव पोल और हेरिटेज लाइटों की स्थापना का कार्य, कौशल्या सदन का निर्माण, मुक्ति वैकुंठ धाम के विकास का कार्य पूरा हो जाएगा। फरवरी में अयोध्या के 7 वार्डों में 24 घंटे जलापूर्ति, सूर्यकुंड के पास आरओबी, मार्च में अयोध्या अकबरपुर मार्ग पर फतेहगंज आरओबी, अयोध्या बिल्हौरघाट 4 लेन सड़क, गुप्तार घाट का सौंदर्यीकरण, नया घाट से लक्ष्मण घाट तक पर्यटन सुविधाओं का विकास, अयोध्या सोलर सिटी का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। अप्रैल में अवध बस स्टैंड के पास आश्रय गृह का निर्माण, नाका बाइपास के पास कल्याण भवन का निर्माण, चार ऐतिहासिक प्रवेश द्वारों का निर्माण पूरा कर लिया जाएगा।

क्या दक्षिण में अपनी पैठ बढ़ा सकेंगे पीएम मोदी?

पीएम मोदी अब धीरे-धीरे दक्षिण में अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं! लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने लिए ‘अबकी बार 400 पार’ का लक्ष्य दिया है। कार्यकर्ताओं को 50+% का महत्वाकांक्षी टारगेट दिया गया है। लेकिन क्या ये इतना आसान है? खासकर तब जब तमाम राज्यों में बीजेपी की सीटें पहले ही अपने चरम पर हैं यानी अब सीटें बढ़ने से रहीं, हां घट जरूर सकती हैं। ऐसे में बीजेपी लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में हैटट्रिक का लक्ष्य कैसे पूरा करेगी? बीजेपी को बखूबी पता है कि लक्ष्य आसान नहीं लेकिन मोदी की अगुआई में पार्टी धीरे-धीरे दक्षिण में भी अपनी पैठ बढ़ा रही है। काशी-तमिल संगमम से लेकर त्रिशूर में महिला संगमम तक, नरेंद्र मोदी चुपके-चुपके दक्षिण में बीजेपी की पैठ बढ़ा रहे हैं। तमिलनाडु दौरे के अगले दिन बुधवार को पीएम मोदी केरल में ‘2 लाख महिलाओं’ की रैली के जरिए दक्षिण भारत में बीजेपी के लोकसभा अभियान का शंखनाद कर चुके हैं। केरल के त्रिशूर में ‘नारी शक्ति मोदीकोप्पम महिला संगमम’ के जरिए बीजेपी शक्तिप्रदर्शन कर रही है। पार्टी का दावा है कि ये कार्यक्रम अभूतपूर्व है क्योंकि दक्षिण भारत में किसी भी पार्टी के कार्यक्रम में महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी नहीं हुई है। ये कार्यक्रम ऐतिहासिक महिला आरक्षण कानून को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने पर केरल की महिलाओं की तरफ से पीएम मोदी को धन्यवाद देने के लिए है। बिना किसी शोरशराबे के बीजेपी चुपचाप दक्षिण में अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस के हाथों कर्नाटक हारने के बाद अभी दक्षिण के किसी राज्य में उसकी सरकार नहीं है। लेकिन पार्टी लगातार वहां अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। 119 सीटों वाली तेलंगाना विधानसभा चुनाव में पार्टी ने न सिर्फ 8 सीटों पर जीत दर्ज की बल्कि अपना वोटशेयर भी दोगुना किया। 2018 में सूबे में पार्टी को 6.2 प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार बढ़कर 14 प्रतिशत के करीब रहा। इतना ही नहीं, कामरेड्डी सीप पर तो बीजेपी के के. वेंकट रमन रेड्डी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष रेवंत रेड्डी दोनों को शिकस्त दी। हालांकि, दोनों नेता अपनी-अपनी दूसरी सीट से जीतने में सफल रहे और कांग्रेस के रेवंत रेड्डी तो मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। पार्टी का ये प्रदर्शन बताता है कि तेलंगाना में उसका प्रदर्शन कोई तुक्का नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी ने पिछले कई सालों की कोशिशों से धीरे-धीरे एक नया वोट बैंक तैयार करने में सफलता हासिल की है। ये नया वोट बैंक है आधी आबादी यानी महिलाओं का। ऐतिहासिक महिला आरक्षण बिल को संसद से पास कराना उसी दिशा में एक अहम कदम है। एक ही बार में तीन बार तलाक बोलकर महिला से रिश्ता खत्म करने की बुराई तलाक-ए-बिद्दत को बैन करने से मुस्लिम महिलाओं को फायदा पहुंचा है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और राज्यों की कई बीजेपी सरकारें महिलाओं को सीधा फायदा पहुंचाने वाली कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। केंद्र सरकार की बात करें तो उसकी बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना, जनधन अकाउंट, मिशन पोषण, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन, मैटरनिटी लीव को 12 की जगह 26 हफ्ते करना, मातृवंदन योजना के तहत बच्चे के जन्म पर मां को 5000 रुपये जैसी तमाम योजनाएं महिलाओं पर ही केंद्रित हैं। आर्मी में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने जैसे कदम से समान अवसर और समानता का अधिकार देने की कोशिश की। उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन का लाभ मिला है। अभी अयोध्या में पीएम मोदी ने उज्ज्वला योजना की 10 करोड़वीं लाभार्थी से मुलाकात की थी। इसके अलावा जनधन योजना के तहत 27 करोड़ महिलाओं का बैंक में खाता खुला है। बैंक से बिना गारंटी के कर्ज वाली मुद्रा लोन योजना के लाभार्थियों में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। स्टैंड अप इंडिया स्कीम के लाभार्थियों में भी आधे से ज्यादा महिलाएं हैं। चुनावों में बीजेपी को मोदी सरकार की इन स्कीम का लाभ मिलता रहा है।

2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तब देश में कुल 91 करोड़ वोटर थे जिनमें से 44 करोड़ महिलाएं थीं। बीते कई बार से चुनाव में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। 2019 में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में कुल रजिस्टर्ड महिला वोटरों में से 67.18 फीसदी ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया जबकि पुरुषों के मामले में ये आंकड़ा 67.02 प्रतिशत था। तमिलनाडु, केरल, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा जैसे 12 राज्य ऐसे थे जहां महिलाओं का वोटर टर्नआउट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा था। इन राज्यों में लोकसभा की करीब 200 सीटें हैं। तमिलनाडु और केरल को छोड़कर बीजेपी ने 2019 में इन सभी राज्यों में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि देश में महिलाओं की पसंदीदा पार्टी बीजेपी है। 2019 में देशभर में बीजेपी को औसतन 36 प्रतिशत महिलाओं का वोट मिला। कांग्रेस को 20 प्रतिशत और बाकी 44 प्रतिशत वोट टीएमसी, बीजेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को मिले थे।

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस बुरी तरह मुंह की खाई लेकिन तेलंगाना वह केसीआर की बादशाहत को खत्म करने में कामयाब रही। हालांकि, अजेंडा के तहत कुछ तत्वों ने पिछले महीने आए चुनाव नतीजों के आधार पर भारत को ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ में बांटने की खूब कोशिश की। ऐसे तत्वों में I.N.D.I.A. गठबंधन की प्रमुख साझेदार डीएमके और कांग्रेस के कुछ स्वघोषित हमदर्द शामिल थे। लेकिन मोदी ने काशी-तमिल संगमम के जरिए उत्तर-दक्षिण बंटवारे की इस गंदी राजनीति की काट भी निकाल रखी है। पीएम मोदी ने 17 दिसंबर को दूसरे काशी तमिल संगमम केटीएस के दूसरे संस्करण का उद्घाटन किया जो 30 दिसंबर तक चला। पीएम ने केटीएस के जरिए रामेश्वरम और काशी के प्राचीन और सांस्कृतिक संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश की है। इस कार्यक्रम को भले ही मोदी राजनीतिक नहीं मानते, लेकिन इस कल्चरल एक्सचेंज प्रोग्राम के जरिए बीजेपी को तमिलनाडु में जमीन तलाशने और उसे मजबूत करने में मदद मिलेगी।

आखिर हिट एंड रन पर क्यों हो रहा है हंगामा?

आज हम आपको बताएंगे की हिट एंड रन पर हंगामा क्यों हो रहा है! हिट-एंड-रन मामलों के लिए भारतीय न्याय संहिता में नए प्रावधानों के खिलाफ ट्रक ऑपरेटरों की हड़ताल ने पूरे देश की रफ्तार रोक दी। खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति से लेकर परिवहन सेवाएं ठप्‍प हो गईं। हालात बिगड़ते देख सरकार ने भी ‘पैनिक’ बटन दबाने में देर नहीं लगाई। मंगलवार को देर शाम उसने वाहन चालकों के साथ सुलह का रास्‍ता निकाल लिया। सरकार के साथ यूनियनों ने भी ड्राइवरों को काम पर वापस लौटने की अपील की। ये ड्राइवर बीएनएस में हिट-एंड-रन मामलों को लेकर किए गए कड़े प्रावधानों से नाराज थे। ऐसे मामलों में 10 साल की सजा और सात लाख रुपये के जुर्माने के प्रावधान ने उनका पारा चढ़ा दिया था। सरकार ने साफ कर दिया कि नए कानून और प्रावधान लागू नहीं हुए हैं। इस पर कोई भी फैसला ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के साथ बातचीत के बाद लिया जाएगा। नए प्रावधानों के खिलाफ ड्राइवरों का विरोध सिक्‍के का एक पहलू है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी है। उसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाली मौतों का बढ़ता ग्राफ बेहद डराने वाला है। इनमें हिट-एंड-रन मामलों की भी हिस्‍सेदारी है। आइए, यहां आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं कि क्‍यों हमें सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े प्रावधानों की जरूरत है? इस बारे में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़े होश उड़ाने वाले हैं। इनसे पता चलता है कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं और इनमें होने वाली मौतों में हिट-एंड-रन मामलों की हिस्सेदारी 14.6 फीसदी और 18.1 फीसदी थी। 2021 में यह संख्या 16.8 फीसदी और 11.8 फीसदी थी।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं या इनमें होने वाली मौतों का कोई एक बड़ा कारण नहीं है। इसमें कई कारण शामिल हैं। जैसे आमने-सामने की टक्कर। पीछे या बगल से चोट। एक्‍सीडेंट और इनमें होने वाली मौतों में इनकी लगभग बराबर की हिस्सेदारी है। सटीक तौर पर कहें तो 2022 में नौ प्रकार की सड़क दुर्घटनाओं और इनसे जुड़ी मौतों के आंकड़ों में हिट-एंड-रन का हिस्सा पांचवें और दूसरे स्थान पर था। सरकार के आंकड़े कहते हैं कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 72 फीसदी और इन सड़क दुर्घटनाओं में हुईं मौतों में 71 फीसदी ओवर स्‍पीडिंग के कारण हुईं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि नेशनल हाईवे पर सामान्य सड़कों की तुलना में दुर्घटना का ज्‍यादा खतरा होता है। जहां 2022 में कुल सड़क लंबाई में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों की हिस्सेदारी सिर्फ 4.9 फीसदी थी। वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में कुल मौतों का 60.5 फीसदी इन सड़कों पर हुईं।

जिन वाहनों ने सड़क दुर्घटनाएं कीं और जो वाहन इसका शिकार हुए उसका भी डेटा है। आंकड़ों से पता चलता है कि क्राइम और विक्टिम वीकल दोनों के मामले में दोपहिया वाहन सबसे आगे रहे। टू-वीलर की आपस में टक्‍कर का आंकड़ा सबसे अधिक है। जहां तक ट्रकों और लॉरियों का सवाल है, तो वे क्राइम वीकल ग्रुप जिन वाहनों से एक्‍सीडेंट हुआ में दूसरे नंबर पर रहे। उनके सबसे बड़े शिकार दोपहिया वाहन थे।

अगर मुकदमा पूरा हुआ हो तो नहीं। अन्य दुर्घटनाओं की तुलना में हिट-एंड-रन मामलों में सजा का आंकड़ा बेहतर है। उदाहरण के लिए जिन हिट-एंड-रन मामलों की सुनवाई 2022 में पूरी हुई, उनमें सजा की दर 47.9 फीसदी थी। अन्य दुर्घटनाओं के लिए यह दर महज 21.8 फीसदी थी। यहां तक कि हत्या और गैर इरादतन हत्या में भी सजा की दर कम थी। यह 43.8 फीसदी और 38.7 फीसदी थी। हालांकि, यह और बात है कि अन्य अपराधों की तरह हिट-एंड-रन के 90 फीसदी से अधिक मामले एक साल अदालतों में लंबित रहते हैं। यह ट्रेंड 2022 से पहले के वर्षों में भी यही था।

यहां जिन अन्‍य तीन अपराधों का जिक्र किया गया है, उनमें पुलिस को हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने में ज्‍यादा समय लगता है। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से केवल 66.4 फीसदी में आरोप पत्र दायर हुए। वहीं, हत्या के 81.5%, गैर इरादतन हत्या के 84% और 79.6% अन्य दुर्घटनाओं के मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए। हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल नहीं होने का एक बड़ा कारण है। वह यह है कि पुलिस को सच जानने के बावजूद भी सबूत नहीं मिलते हैं। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से 28% में अपर्याप्त सबूत या कोई सुराग नहीं होना रहा। हत्या के 11%, गैर इरादतन हत्या के 9% और अन्य दुर्घटनाओं के 11% मामले में ऐसा देखा गया। इससे पता चलता है कि हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की दर के कम होने के पीछे अपराधी को न ढूंढ पाना एक कारण हो सकता है। शायद भारतीय दंड संहिता आईपीसी की जगह लेने वाले भारतीय न्‍याय संहिता बीएनएस में इस बात का भी ध्‍यान रखा गया था।

क्या बीजेपी की वजह से ही आप आए हैं राम मंदिर में रामलला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी की वजह से ही रामलला राम मंदिर में पधार पाए हैं! हम गोली नहीं चलाएंगे, दिल्ली में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में जब उन्हें कारसेवकों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की सलाह दी गई तो उन्होंने बेहिचक यही बात कही। 30 अक्टूबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने आयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। अगले वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम को मुख्यमंत्री की कुर्सी खोनी पड़ी और पहली बार बीजेपी को प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला। भाजपा ने इस पद के लिए कल्याण सिंह को चुना तो वो सीधे अयोध्या गए, राम लला का दर्शन करने। वहां उन्होंने अपना प्रण दुहराया- राम लला आपका मंदिर बनकर रहेगा, चाहे कुछ भी हो। कल्याण ने अपना संकल्प पूरा किया, भले ही उन्हें एक वर्ष में ही अपनी सरकार की आहुति देनी पड़ी। आज ‘राम मंदिर आंदोलन के स्तंभ’ की विशेष श्रृंखला में बात इन्हीं कल्याण सिंह की। 5 जनवरी, 1932 को अलीगढ़ जिला स्थित अतरौली गांव में जन्मे कल्याण सिंह ने दुनियादारी की समझ होते ही राष्ट्रवाद का रास्ता चुन लिया। वो अपने स्कूली दिनों में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस से जुड़ गए। देश के लिए कुछ कर गुजरने की लालसा ने उनमें अथक परिश्रमी और अटल संकल्प का व्यक्तित्व गढ़ दिया। कल्याण वाचाल थे तो समाज और सियासत में उनकी पूछ होने लगी। कद बढ़ा तो पद भी बढ़ा। 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा

पहुंच गए और 10 साल बाद 1977 में पहली बार प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। 1980 के दशक शुरुआती दशक में जब विश्व हिंदू परिषद वीएचपी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का आंदोलन चलाया तो कल्याण सिंह इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। वो हिंदुत्व का प्रमुख चेहरा बन गए, खासकर उत्तर प्रदेश में।

कल्याण जब 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब तक भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा संपन्न हो चुकी थी। रथयात्रा को बिहार में रोककर आडवाणी को नजरबंद कर लेने के बावजूद राम मंदिर आंदोलन अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ता रहा और 30 अक्टूबर, 1990 का वो दिन आया जब अयोध्या में कार सेवकों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। तब से मुलायम सिंह यादव की छवि मुल्ला मुलायम की बनने लगी। संभवतः मुलायम के कार सेवकों के प्रति इसी कठोर रवैये ने कल्याण सिंह को भी एक रास्ता सुझाया- किसी भी हद तक जाने का। उन्हें लगा कि अगर मंदिर बनने से रोकने वाले कुछ भी कर सकते हैं तो मंदिर बनाने की राह में आने वाली किसी बाधा की परवाह भला वो क्यों करें।

कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा। लेकिन राम मंदिर निर्माण का निश्चय पक्का था, इसलिए सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के आसपास 2.27 एकड़ जमीन खरीद ली और पास में ही राम चबूतरा बनवा दिया। सरकार का मकसद साफ था- तीर्थस्थल में पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करना। विश्व हिंदू परिषद भी लोगों को समझा-बुझाकर तीर्थस्थल के आसपास के इलाके की जमीनें खरीदने लगी। कल्याण सरकार ने भी जो जमीनें खरीदीं, वो विश्व हिंदू परिषद के ट्रस्ट को सौंपती गई। उसने राम कथा पार्क के लिए आसपास की 42.09 एकड़ जमीन विहिप ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दी।

6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में कारसेवकों का जनसमुद्र उमड़ा तो आडवाणी समेत बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं ने उन्हें संभालने की भरपूर कोशिशें कीं। लेकिन रामभक्तों पर एक मानो एक जुनून सवार था- अत्याचार और अन्याय की सदियों पहले पड़ी नींव के प्रतीक रूप में बाबरी मस्जिद का सफाया। एक-एक कर कारसेवक बाबरी मस्जिद की गुंबदों पर चढ़ने लगे और कुछ देर में ही गुंबद टूटकर गिरने लगे। दो साल पहले उत्तर प्रदेश की जिस पुलिस ने अयोध्या की भूमि कारसेवकों के खून से रंग दी थी, वो बाबरी विध्वंस को चुपचाप देख रही थी। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक बाबरी की सुरक्षा में असफल रहने की नैतिक जिम्मेदारी लेने में देर नहीं की। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें 24 घंटे के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस समय पद खोने का कोई पछतावा है तो कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मुख्यमंत्री का पद भगवान राम के सामने कुछ भी नहीं है। वर्षों बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने ही राम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया तो कल्याण सिंह ने लखनऊ में अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।

इसमें उन्होंने कहा, ‘6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी थी, मैंने अयोध्या में हुई अराजकता की पूरी जिम्मेदारी ली थी। मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर और उसी दिन राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उसकी कीमत चुकाई थी। मेरा विश्वास है कि 2022-23 तक अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनकर तैयार होगा, जिसके दर्शन देश-विदेश से लोग करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हर किसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और उसे स्वीकार कर लिया है, जो न्यायपूर्ण, वैध और सर्व-समावेशी है। इसने 500 साल पुराने विवाद को समाप्त कर दिया है।’

क्या उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के आएंगे स्वर्ण दिन?

अब उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के स्वर्ण दिन आ सकते हैं! उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक 2023-24 सत्र के लिए गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य घोषित नहीं किया है। इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किसानों के साथ ही चीनी मिल भी कीमत को लेकर चिंतित हैं। किसानों को उम्मीद है कि अप्रैल-मई में होने वाले चुनाव से पहले उन्हें गन्ने की कीमत को लेकर खुशखबरी मिल जाएगी। गन्ना उत्पादक किसानों से लेकर शुगर मिल तक क्या है हाल, हर पहलू समझते हैं। गन्ने की पेराई का सत्र अक्टूबर से शुरू हो जाता है। लेकिन अब जनवरी का महीना आ गया और किसानों को यह ही नहीं पता है कि उन्हें वर्तमान सत्र के लिए गन्ने की क्या कीमत मिल रही है? इस बार गन्नों में रोग लगने की वजह से पैदावार पर भी असर पड़ा है। किसान संगठन गन्ने की SAP को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। आखिरी बार 2021-22 में गन्ने की जनरल वेराइटी के लिए 340 रुपये प्रति क्विंटल और अर्ली वेराइटी के लिए 350 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया था। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है। यह पिछले सत्र में 121.35 लाख टन से 7.6 प्रतिशत तक कम है। हालांकि उत्तर प्रदेश में उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले बेहतर हुई है।2016-17 के सत्र में योगी सरकार के यूपी की सत्ता में आने के बाद से गन्ने की कीमत में प्रति क्विंटल के हिसाब से 35 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है। पहले के 305-315 से बढ़कर अब 340-350 रुपये प्रति क्विंटल कीमत हो गई है।

अगर सपा और बसपा शासनकाल की पिछली सरकारों पर नजर डालें तो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में गन्ने की कीमत में 65 रुपये प्रति क्विंटल 2011-12 में 240-250 से लेकर 2016-17 में 305-315 तक और मायावती के शासन में 125-130 रुपये प्रति क्विंटल 2006-07 में 125-130 से लेकर 2011-12 में 240-250 तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। यह दोनों सरकारें 5 साल के लिए थीं, जबकि योगी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार दूसरी बार सत्ता में आई है। सरदार वीएम सिंह का कहना है कि किसानों को आज की तारीख में गन्ने की कटाई के लिए प्रति कुंतल के हिसाब से 45-50 रुपए लेबर चार्ज देना पड़ रहा है, जबकि 2 साल पहले 30 से 35 तक का दाम था। इसके साथ ही खाद, बीज, कीटनाशक का दाम भी काफी बढ़ा है। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है।

हालांकि यह दिक्कत केवल किसानों की अकेले की ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के शुगर मिल भी गन्ने की SAP घोषित करने में हो रही देरी को लेकर चिंतित हैं। इसकी वजह यह है कि गाने से गुड़ और खंडसारी जैसे विकल्प तैयार करने वाले प्रति क्विंटल के हिसाब से 20 से 50 रुपये तक अधिक कीमत अदा कर रहे हैं। ऐसे व्यापारी अधिक दाम दे रहे हैं और तुरंत ही कैश में दे दे रहे हैं। वहीं सरकार हमारे इनपुट यानी गन्ना और आउटपुट यानी चीनी सभी का दाम मॉनिटर करती है। नैशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री लिमिटेड ने देश की शुगर आउटपुट 2023-24 में दिसंबर तक 112.10 लाख टन तक होने का अनुमान लगाया है। बता दें कि गन्ने की पेराई का सत्र अक्टूबर से शुरू हो जाता है। लेकिन अब जनवरी का महीना आ गया और किसानों को यह ही नहीं पता है कि उन्हें वर्तमान सत्र के लिए गन्ने की क्या कीमत मिल रही है? इस बार गन्नों में रोग लगने की वजह से पैदावार पर भी असर पड़ा है। किसान संगठन गन्ने की SAP को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। आखिरी बार 2021-22 में गन्ने की जनरल वेराइटी के लिए 340 रुपये प्रति क्विंटल और अर्ली वेराइटी के लिए 350 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया था।जबकि योगी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार दूसरी बार सत्ता में आई है।

सरदार वीएम सिंह का कहना है कि किसानों को आज की तारीख में गन्ने की कटाई के लिए प्रति कुंतल के हिसाब से 45-50 रुपए लेबर चार्ज देना पड़ रहा है, जबकि 2 साल पहले 30 से 35 तक का दाम था। इसके साथ ही खाद, बीज, कीटनाशक का दाम भी काफी बढ़ा है। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है। यह पिछले सत्र में 121.35 लाख टन से 7.6 प्रतिशत तक कम है। हालांकि उत्तर प्रदेश में उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले बेहतर हुई है।

क्या सर्दी के साथ-साथ दिल्ली की हवा में घुल रहा है प्रदूषण का जहर?

वर्तमान में दिल्ली की हवा में सर्दी के साथ-साथ प्रदूषण का जहर भी घुलता जा रहा है! दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने शहर के 24 प्रमुख इलाकों में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की एक सूची तैयार की है। विभाग ने दिल्ली के सभी कंटिनुअस एंबिएंट एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों पर प्रदूषण के स्रोतों की पहचान की है। इनमें खुले में बायोमास जलाना, नगरपालिका कचरे का फेंकना, गड्ढे वाली सड़कें, यातायात की भीड़ और निर्माण गतिविधि शामिल है। विभाग ने पहले 13 प्रदूषण हॉटस्पॉट की ऐसी ही सूची तैयार की थी। एक अधिकारी ने बुधवार को कहा, ‘हमने दिल्ली के पास प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों की पहचान की है। हमने उत्सर्जन एमिसन को कम करने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ सूची साझा की है,लिस्ट अलीपुर, आयानगर, बुराड़ी चौराहा, सीआरआरआई-मथुरा रोड, डॉ. करणी सिंह शूटिंग रेंज, दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, डीयू नॉर्थ कैंपस, इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान, आईटीओ, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, लोधी रोड, नजफगढ़, राष्ट्रीय स्टेडियम, नेहरू नगर, न्यू मोती बाग, नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी द्वारका, पटपड़गंज, पूसा नई दिल्ली, पूसा सेंट्रल, शादीपुर, सिरी फोर्ट, सोनिया विहार और श्री अरबिंदो मार्ग से संबंधित है, जैसा कि दिल्ली विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था। ‘

इन 24 स्थानों पर प्रदूषण के एक-दो नहीं बल्कि कुल 90 स्रोतों का पता लगा है। मसलन, आईटीओ में प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में भारी यातायात और चौराहे पर 150-180 सेकंड का लंबा वेटिंग पीरियड, क्रॉसिंग पर 120 मीटर तक भीड़ और लगभग 200 मीटर के हवाई दायरे में एक कंस्ट्रक्शन साइट का होना है।आयानगर में खुले कचरा फेंकना प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। सूची में कहा गया है कि आयानगर में मुख्य सड़क, चौधरी धर्मवीर नेताजी मार्ग और मेहरौली-गुड़गांव मार्ग के पास संडे मार्केट का कचरा सड़क पर फेंका गया था। आयानगर में प्रदूषण के अन्य कारक सड़क का धूल, गड्ढे, संडे मार्केट के वक्त बुरा रोड मैनेजमेंट और आयानगर के पास टी-पॉइंट पर यातायात की भीड़ हैं।

विज्ञान और पर्यावरण केंद्र की कार्यकारी निदेशक रिसर्च एंड एडवोकेसी अनुमिता रायचौधरी ने कहा, ‘पड़ोस और नगरपालिका वार्ड लेवल पर हाइपर लोकल एक्शन इलाके की हवा साफ रखने का एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रदूषण स्रोतों की स्थानीय सूची से साफ पता चल रहा है कि बिल्कुल केंद्रित कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, प्रदूषण पर पूरी तरह नियंत्रण के लिए सिटी लेवल का इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट भी जरूरी है।’ 2023 में दिल्ली ने 2022 में 98 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के मुकाबले 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर का औसत दैनिक पीएम2.5 कंसंट्रेशन दर्ज किया। 2023 में पीएम2.5 कंसंट्रेशन वार्षिक राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक NAAQS से 2.5 गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से 20 गुना अधिक थी। बता दें कि एक्सपर्ट के अनुसार, पिछले कुछ समय से दिल्ली समेत उत्तर भारत में कोहरे की स्थिति है। इसकी वजह से अधिकतम तापमान में कमी आई है। वहीं कोहरे की वजह से ही न्यूनतम तापमान सामान्य से उपर बने हुए हैं। आमतौर पर दस दिसंबर के बाद तापमान बढ़ना लगता है। स्काईमेट के महेश पलावत के अनुसार इस बार अभी तक दिल्ली में न्यूनतम तापमान 4.9 डिग्री से नीचे नहीं गया है। जिस दिन यह दर्ज हुआ था दिन का तापमान 24 डिग्री के आसपास था। इसकी वजह से ठंड का अहसास नहीं हुआ। अब अगले दो से तीन दिनों में कोहरा कम होगा। जिसकी वजह से धूप बढ़ेगी और दिन की ठिठुरन कम हो जाएगी। धूप अधिक समय तक बनी रहेगी। 6 व 7 जनवरी के आसपास पहाड़ों पर एक वेस्टर्न डिस्टरबेंस सक्रीय हो रहा है। इसकी वजह से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि में बारिश हो सकती है। इस दौरान यदि पहाड़ों पर अच्छी बर्फबारी हो जाती है तो दिल्ली में सर्दी थोड़ी बढ़ सकती है।

वहीं मौसम विभाग के अनुसार मंगलवार को राजधानी का अधिकतम तापमान 17.2 डिग्री रहा। यह सामान्य से दो डिग्री कम है। वहीं न्यूनतम तापमान 8.3 डिग्री रहा। यह सामान्य से एक डिग्री अधिक है। मौसम विभाग ने लोदी रोड में दिन के समय शीत लहर की घोषणा की। यहां अधिकतम तापमान 16.2 डिग्री रहा। यह सामान्य से पांच डिग्री कम रहा। बुधवार को आसमान साफ रहेगा। सुबह के समय हल्का कोहरा रह सकता है। अधिकतम तापमान 18 डिग्री और न्यूनतम तापमान 9 डिग्री रह सकता है।

पिछले कई दिनों से कोहरे की वजह से ट्रेनें ले हो रही हैं। मंगलवार को दिल्ली में 26 ट्रेनें देरी से पहुंची। इनमें राजधानी एक्सप्रेस से लेकर कई सुपर फास्ट ट्रेनें शामिल हैं। वहीं, रेलवे यातायात को बेहतर बनाने के मकसद से चल रहे कामों की मंगलवार को नॉर्दर्न रेलवे के महाप्रबंधक शोभन चौधुरी ने समीक्षा बैठक की। उन्होंने सभी मंडलों को निर्देश दिया कि सिग्नल सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएं। उन्होंने विभागाध्यक्षों से रेल कर्मचारियों को नियमित रूप से ट्रेनिंग देने को कहा, जिससे कि उन्हें जागरूक बनाए रखा जा सके और रेल प्रणाली में मानवीय गलतियों को कम किया जा सके। मंगलवार को लेट पहुंची 26 ट्रेनों में भुवनेश्वर राजधानी 5 घंटे लेट पहुंची। वहीं, चेन्नै-नई दिल्ली अपने निर्धारित समय से 5 घंटा लेट रही, अजमेर-कटरा एक्सप्रेस 6 घंटा लेट, भोपाल-निजामुद्दीन 4 घंटा 30 मिनट लेट रही। ये ट्रेनें औसतन डेढ़ से दो घंटे देरी से दिल्ली पहुंची हैं। यही नहीं, दिल्ली से खुलने वाली कई ट्रेनें देरी से चलीं। इनके डिपार्चर टाइम में बदलाव किया गया।

क्या तमिलनाडु सहित दक्षिण को साध पाएंगे पीएम मोदी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी तमिलनाडु सहित दक्षिण को साध पाएंगे या नहीं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को तमिलनाडु में थे। इस साल लोकसभा चुनाव से पहले पीएम ने यहां कई परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया। कुछ नई परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इन परियोजनाओं की कुल लागत 20,140 करोड़ रुपये है। सीएम एमके स्‍टालिन के साथ मंच साझा करते हुए प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक प्रेरणा के लिए तमिलनाडु की सराहना की। डीएमडीके के संस्‍थापक और जाने-माने एक्‍टर विजयकांत को श्रद्धांजलि दी। पीएम ने उन्‍हें राष्‍ट्र हित के प्रति समर्पित रहने के साथ न केवल सिनेमा बल्कि राजनीति का भी ‘कप्तान’ बताया। एमके स्टालिन द्रविड़ मुनेत्र कषगम का नेतृत्व करते हैं। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A का वह प्रमुख चेहरा हैं। इस साल लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ बीजेपी से मुकाबला करने के लिए यह गठबंधन कमर कस रहा है। स्‍टालिन की मौजूदगी में विजयकांत पर राष्‍ट्रहित वाला बयान देकर पीएम ने दक्षिण की राजनीति को साधने की कोशिश की। दक्षिण भारत में बीजेपी अपनी उपस्थिति को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास करने में जुटी है। प्रधानमंत्री तमिलनाडु के दो दिवसीय दौरे पर हैं। आज उन्होंने लगभग 20,000 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। त्रिची हवाई अड्डे पर नए टर्मिनल को हरी झंडी दिखाई। इसके पहले वह तिरुचिरापल्ली के भारतीदासन विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। दोनों कार्यक्रमों में उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के साथ मंच साझा किया।

चेन्नई और दक्षिणी तमिलनाडु में हाल की भारी बारिश, बाढ़ और उसके परिणामस्वरूप हुए जानमाल के नुकसान की पृष्ठभूमि में मोदी के इस दौरे के काफी मायने हैं। उत्‍तर भारत में तो बीजेपी की पकड़ मजबूत है। लेकिन, दक्षिण में अभी वह उस स्‍थति में नहीं है। वह दक्ष‍िण में अपनी स्‍थ‍िति को मजबूत करना चाहती है। पीएम ने कहा कि केंद्र राज्‍य को हर संभव सहायता प्रदान कर रहा है। हालांकि, स्टालिन ने उनसे भारी बारिश-जलप्रलय को गंभीर प्राकृतिक आपदा घोषित करने और राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से राज्य को उचित धन जारी करने का आग्रह किया।

मोदी ने राज्य की राजधानी चेन्नई से करीब 300 किलोमीटर दूर मध्य तमिलनाडु के तिरुचिरापल्‍ली में 20 परियोजनाओं की आधारशिला रखी और उद्घाटन किया। उन्हें राष्ट्र को समर्पित किया। इससे पहले उन्होंने भारतीदासन विश्वविद्यालय के 38वें दीक्षांत समारोह में हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इन परियोजनाओं से तमिलनाडु की प्रगति मजबूत होगी। यात्रा सुगमता बढ़ेगी और रोजगार के हजारों अवसर पैदा होंगे। ये परियोजनाएं हवाई एवं बंदरगाहों, रेलवे, राजमार्ग, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, परमाणु ऊर्जा और उच्च शिक्षा से जुड़ी हैं। तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमारा प्रयास देश के विकास में तमिलनाडु से मिली सांस्कृतिक प्रेरणा का लगातार विस्तार करना है।’ दिल्ली में नए संसद भवन में ‘पवित्र सेंगोल’ स्थापित किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह तमिल संस्कृति की ओर से पूरे देश को दिए गए सुशासन के मॉडल से उपजी एक प्रेरणा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले 25 वर्ष के लिए ‘आजादी का अमृत काल’ भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों आयाम हैं। भारत को तमिलनाडु की जीवंत संस्कृति और विरासत पर गर्व है। अतीत में राज्य के सार्वजनिक कार्यक्रमों में ज्यादातर मौकों पर अंग्रेजी में बोलने वाले मोदी ने मंगलवार को हिंदी में भी बात की।

पीएम ने तमिलनाडु के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन को भी याद किया। उनका हाल ही में निधन हो गया। मोदी ने कहा कि उन्होंने देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भारत भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व निवेश कर रहा है और यह एक नई आशा के रूप में उभर रही शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।उन्होंने कहा कि तमिलनाडु ‘मेक इन इंडिया’ के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण ब्रांड एंबेसडर बन रहा है। प्रधानमंत्री ने केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को दोहराया जहां राज्य का विकास राष्ट्र के विकास में परिलक्षित होता है। उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में 40 से अधिक केंद्रीय मंत्रियों ने 400 से अधिक बार तमिलनाडु का दौरा किया। वह बोले, ‘भारत तमिलनाडु की प्रगति के साथ प्रगति करेगा।’ उन्होंने कहा कि भारत और सभ्यता हमेशा ज्ञान के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे हैं। नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में तो लोग जानते ही हैं, कांचीपुरम के विश्वविद्यालय और मदुरै शिक्षा के केंद्र के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

नई रेल परियोजनाओं के बारे में मोदी ने कहा कि इनसे उद्योग और बिजली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही नई सड़क परियोजनाएं श्रीरंगम, चिदंबरम, रामेश्वरम और वेल्लोर जैसे आस्था और पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्रों को जोड़ेंगी। जिन परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया, उनमें तिरुचिरापल्ली-मनमदुरई-विरुधुनगर रेलवे लाइन का विद्युतीकरण शामिल है।

पीएम ने कहा कि 2014 से पहले के दशक में राज्यों को 30 लाख करोड़ रुपये दिए गए थे, जबकि पिछले 10 वर्ष में राज्यों को 120 लाख करोड़ रुपये दिए गए। तमिलनाडु को भी 2014 से पहले के 10 वर्षों की तुलना में इस अवधि में 2.5 गुना अधिक धन मिला है। राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के लिए राज्य में तीन गुना से अधिक और रेलवे क्षेत्र में 2.5 गुना अधिक धन खर्च किया गया।

क्या अब लागू होगा हिट एंड रन का नया कानून?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब हिट एंड रन का नया कानून लागू होगा या नहीं! हिट-एंड-रन’ को लेकर नए कानून के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल खत्म होने का रास्‍ता साफ है। केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने मंगलवार को ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक के बाद उन्होंने कहा कि नया कानून अभी लागू नहीं हुआ है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 106/2 को लागू करने से पहले ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के लोगों से बात की जाएगी। उसके बाद ही फैसला लिया जाएगा। सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर सभी वाहन चालकों से अपने-अपने काम पर लौटने की अपील की है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस ने भी सभी ड्राइवरों से हड़ताल खत्‍म करने का आह्वान किया है। ‘हिट-एंड-रन’ मामलों के लिए नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता बीएनएस के तहत जेल और जुर्माने के कड़े प्रावधान के खिलाफ ट्रक, बस और टैंकर ऑपरेटरों ने सोमवार को तीन दिवसीय हड़ताल शुरू की थी। हड़ताल के मंगलवार को दूसरे दिन में प्रवेश करने के बीच उत्तर और पश्चिम भारत के करीब दो हजार पेट्रोल पंपों में ईंधन का भंडार खत्म हो गया। बीएनएस ने औपनिवेशिक युग की भारतीय दंड संहिता की जगह ली है। इसमें प्रावधान है कि लापरवाही से गाड़ी चलाकर गंभीर सड़क दुर्घटना का कारण बनने वाले और पुलिस या प्रशासन के किसी भी अधिकारी को सूचित किए बिना भागने वाले ड्राइवरों को 10 साल तक की सजा या सात लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है।

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और कोर कमिटी के चेयरमैन बाल मलकीत सिंह ने गृह सचिव से मीटिंग के बाद प्रतिक्रिया दी। उन्‍होंने कहा, ‘ड्राइवर हमारे परिवार के सदस्य हैं। हमने 28 दिसंबर को ही प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर उन्हें ड्राइवरों की चिंता और भय से अवगत करा दिया था। साथ ही यह बता दिया था कि अगर यह कानून लागू होता है तो इससे क्या नुकसान हो सकता है। देश किस तरह प्रभावित होगा। हालांकि, सरकार ने समय पर संज्ञान नहीं लिया और जिस बात का डर था 1 तारीख से वही देखने को मिला। आज हमें 7 बजे गृह मंत्रालय में मीटिंग के लिए बुलाया गया था। गृह सचिव अजय भल्ला की अध्यक्षता में हमारी मीटिंग हुई, जिसमें सभी मुद्दों पर चर्चा हुई। हम आपको यह सूचित करते हैं कि धारा 106(20) के तहत 10 साल की सजा और जुर्माने का कानून अभी तक लागू नहीं हुआ है। हम आपको ड्राइवरों को पूरा आश्वासन दिलाते हैं कि ये कानून लागू नहीं होने देंगे। आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। हम बातचीत में विश्वास रखते हैं। डायलॉग के माध्यम से ही इसका हल निकला है।

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के साथ बैठक के बाद केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने कहा कि सरकार और ट्रांसपोर्टर इस बात पर सहमत हुए हैं कि परिवहन कर्मचारी तुरंत अपना काम फिर से शुरू करेंगे। उन्‍होंने बताया, ‘हमने आज अखिल भारतीय परिवहन कांग्रेस के प्रतिनिधियों से चर्चा की। सरकार ये बताना चाहती है कि नए कानून और प्रावधान अभी लागू नहीं हुए हैं। हम ये भी कहना चाहते हैं कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(2) लागू करने से पहले अखिल भारतीय परिवहन कांग्रेस से विचार विमर्श करने के बाद ही निर्णय लिया जाएगा।’

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के प्रतिनिधियों की गृह मंत्रालय के अधिकारियों के साथ हुई सफल बैठक के बाद एक बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया कि सरकार ने बीएनएस की धारा 106/2 में सजा और जुर्माने के प्रावधान के बारे में ड्राइवरों की चिंता का संज्ञान लिया। इसे लेकर ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के प्रतिनिधियों के साथ विस्‍तृत चर्चा हुई। सरकार बताना चाहती है कि ये नए कानून और प्रावधान लागू नहीं हुए हैं। इन्‍हें लागू करने से पहले ऑल इंडिया मोटर ट्रासंपार्ट कांग्रेस के साथ बातचीत की जाएगी।

इसके पहले कांग्रेस ने ‘हिट-एंड-रन’ के मामलों में कड़ी सजा के प्रावधान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ट्रक चालकों का समर्थन किया। पार्टी ने कहा कि कानून का दुरुपयोग ‘वसूली तंत्र’ और ‘संगठित भ्रष्टाचार’ को बढ़ावा दे सकता है। कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर अवसंरचना क्षेत्र में निवेश को रोकते हुए ‘गरीब को दंडित’ करने का आरोप लगाया। वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने कहा कि जब 150 से ज्‍यादा सांसद निलंबित थे, तब संसद में मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़, चालकों के विरुद्ध एक ऐसा कानून बनाया, जिसके ‘परिणाम घातक’ हो सकते हैं।

क्या अब रुकेगी ड्राइवर की हड़ताल?

ड्राइवर की हड़ताल अब रुक सकती है! नए कानून में हिट ऐंड रन मामलों में कड़ी सजा के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल दूसरे दिन भी जारी रही। इस कारण से जम्मू-कश्मीर से महाराष्ट्र तक कई राज्यों में तेल, फल-सब्जी समेत जरूरी चीजों की सप्लाई पर असर पड़ा। एमपी और राजस्थान समेत 10 राज्यों से पेट्रोल पंप खाली होने की खबरें आईं। पेट्रोलियम उद्योग से जुड़े लोगों ने बताया कि उत्तर भारत में 2000 पेट्रोल पंप खाली हो गए हैं। डर के मारे जरूरी चीजें जमा करने का खतरा बढ़ गया है। इस बीच केंद्र सरकार ने हड़ताली समूहों से बातचीत शुरू की है। केंद्रीय गृह सचिव ने मंगलवार शाम हड़ताली समूहों से बात भी की। दिन में ट्रांसपोर्टरों की सबसे बड़ी यूनियन ‘ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस’ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हड़ताली ड्राइवरों के प्रति समर्थन जताया और सरकार से नया कानून वापस लेने की मांग की। कांग्रेस भी हड़तालियों के समर्थन में है। दिल्ली में भी अन्य दिनों की तुलना में पेट्रोल पंपों में ज्यादा भीड़ देखी गई। लेकिन चारों तेल में डिपो सप्लाई बेअसर रही। लेकिन 400 क्लस्टर बसें सड़कों पर नहीं उतरीं। वहीं, ISBT में भी यूपी और पंजाब की तरफ जाने वाली बसें कम रहीं। दूसरे राज्यों में विरोध प्रदर्शनों का असर सप्लाई पर एक-दो दिन में दिख सकता है। महाराष्ट्र के नासिक में ट्रक चालकों ने हड़ताल वापस ली है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हड़ताल तुरंत खत्म करवाएं। ड्राइवरों में डर, गुस्सा, चिंता है। अगर कोई रास्ता नहीं निकला, तो हालात गंभीर हो सकते हैं। एक ही हल है, सरकार नए कानून को वापस ले।

भारतीय न्याय संहिता-2023 के नए हिट ऐंड रन कानून का विरोध कर रहे ट्रक और बस ऑपरेटर्स मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि कुछ लोगों को गलतफहमी हो गई है। नए कानून में कहीं कोई कमी नहीं है। यह सभी के लिए अच्छा है। इसके तहत कोशिश की गई है कि हादसे के बाद सड़क पर तड़पते इंसान की जिंदगी बचाई जाए। कानून में जो भी बदलाव किए गए हैं वह सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशन के तहत किए गए हैं। हिट ऐंड रन के कई मामलों में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती बरतने की बात कही है।

गृह मंत्रालय ने कहा कि लापरवाही से गाड़ी चलाने पर हुई दुर्घटना के बाद अगर किसी ट्रक या दूसरे गाड़ी के ड्राइवर को लगता है कि उनके साथ मॉब लिंचिंग जैसा या फिर दूसरी किसी तरह की घटना हो सकती है तो वह मौके से जा सकते हैं। मगर, ऐसा न हो कि सड़क दुर्घटना के बारे में पुलिस या फिर मैजिस्ट्रेट को बताया ही न जाए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को ऐसे मामलों में कहा कि मौके के हालात अगर बेहद विपरीत हैं, तो आरोपी गाड़ी वाला मौके से कुछ दूर जाकर पुलिस या मैजिस्ट्रेट को सूचना दे सकता है। वह अगर थाने में जाने की स्थिति में नहीं है तो पुलिस कंट्रोल रूम में 108 पर फोन करके अपनी और अपनी गाड़ी के रजिस्ट्रेशन नंबर की पूरी पहचान बताते हुए यह कह सकता है कि उसे पुलिस जब भी जांच के लिए बुलाएगी वह उपलब्ध होगा। ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ हिट ऐंड रन की अधिकतम 10 साल की सजा वाली धारा में न बुक करके अधिकतम पांच साल तक की सजा वाले में बुक किया जाएगा।

हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि हिट एंड रन के तमाम मामलों में पहली कोशिश यही होनी चाहिए कि आरोपी गाड़ी लेकर न भागे। उसे पुलिस या मैजिस्ट्रेट को दे। इसके अलावा यह भी कोशिश करे कि घायल को किसी न किसी तरह से अस्पताल पहुंचाया जा सके।

हिट ऐंड रन में दो सब-सेक्शन 106 (1) और 106 (2) हैं। सब-सेक्शन 106 (1) कहता है कि अगर आरोपी घटना के तुरंत बाद किसी पुलिस अधिकारी या मैजिस्ट्रेट को लापरवाही से गाड़ी चलाने से हुई मौत की घटना की रिपोर्ट करता है तो उस पर सब-सेक्शन 106 2 के तहत नहीं बल्कि सब-सेक्शन 106 1 के तहत कार्रवाई की जाएगी। सब-सेक्शन 106 1 अधिकतम पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। यह जमानती भी है। एक्सिडेंट करके आरोपी भाग जाता है और पुलिस या मैजिस्ट्रेट किसी को तुरंत जानकारी नहीं देता है तो उसके खिलाफ धारा 106 (2) के तहत कार्रवाई की जाएगी। इसमें अधिकतम सजा 10 साल तक की है। यह गैर-जमानती है। दोनों मामलों में जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।