अशोक गहलोत अर्जुन सिंह की तरह रुख बदलने के प्रयासों में लगे हुए है! इतिहास अक्सर अपने आप को दोहराता है। सियासत में इतिहास का असर सबसे ज्यादा होता है और इतिहास दोहराने की घटनाएं भी सियासत में ही सबसे ज्यादा होती हैं। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के मामले में तो कम से कम यह सौ फीसदी सच है। करीब 33 साल पहले कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री ने आलाकमान के निर्देश की अनदेखी कर अपनी पसंद के उम्मीदवार की ताजपोशी कराई थी। अब यही काम राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कर रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान गहलोत को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सचिन पायलट को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। दूसरी ओर, गहलोत इस बात पर अड़े हैं कि वे अध्यक्ष के साथ सीएम भी बने रहें। यदि सीएम पद छोड़ना ही पड़े तो उनकी पसंद के उम्मीदवार को नया मुख्यमंत्री बनाया जाए।

पिछले चार दिनों से राजस्थान में जारी सियासी खींचतान की तस्वीरें काफी हद तक 1989 में मध्य प्रदेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रम से मिलती-जुलती हैं। उस समय भी कांग्रेस आलाकमान ने अपनी पसंद के व्यक्ति को सीएम बनाने के लिए दिल्ली से ऑब्जर्वर भेजे थे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समर्थक विधायक इसके खिलाफ गोलबंद हो गए। उन्होंने आलाकमान का निर्देश मानने से इनकार कर दिया और हालत यह हो गई कि पार्टी में टूट का खतरा पैदा हो गया। अंततः आलाकमान को एक कंप्रोमाइज कैंडिडेट को सीएम बनाने के लिए हामी भरनी पड़ी थी।मध्य प्रदेश की सियासत में यह घटना जनवरी, 1989 में हुई थी। चुरहट लॉटरी कांड में नाम आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ा। उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष थे। वे अपनी कैबिनेट में रेल मंत्री माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। दूसरी ओर, अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। उन्होंने आलाकमान पर दबाव बनाना शुरू किया। राजीव ने दिल्ली से गुलाम नबी आजाद को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जिससे सिंधिया को विधायक दल का नया नेता चुनने की प्रक्रिया पूरी हो सके, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

अर्जुन सिंह के समर्थन में करीब 70 विधायक हरबंश सिंह के बंगले पर जमा हो गए। वे इस बात पर अड़ गए कि या तो अर्जुन सिंह ही सीएम रहें या फिर उनके पसंद के उम्मीदवार को इस पद पर बिठाया जाए। उधर, कांग्रेस आलाकमान विधायकों के इस रवैये से नाराज हो गया। राजीव गांधी ने उस समय केंद्रीय गृह मंत्री रहे बूटा सिंह और माखनलाल फोतेदार को दोबारा भोपाल भेजा। राजीव को उम्मीद थी कि वे दोनों अर्जुन सिंह को मना लेंगे।

मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद में माधवराव सिंधिया दिल्ली से भोपाल पहुंच गए। उनके लिए चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था कांग्रेस की ओर से ही की गई थी। मुख्यमंत्री आवास में देर रात तक विधायक दल की बैठक चलती रही। उधर, सिंधिया अपनी समर्थक मंत्री विमला वर्मा के बंगले पर बैठे् इंतजार करते रहे। यह तय माना जा रहा था कि सिंधिया ही अगले सीएम बनेंगे और इसकी केवल औपचारिक घोषणा ही बाकी है। देर रात विधायक दल की बैठक खत्म होने के बाद मामला पूरी तरह पलट गया।

अर्जुन सिंह और उनके समर्थक किसी हाल में सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजी नहीं हुए। उन्होंने पार्टी आलाकमान की भी एक नहीं सुनी। बूटा सिंह और फोतेदार की कोशिशें कामयाब नहीं हो सकीं। अंततः कांग्रेस नेतृत्व को ही झुकना पड़ा। एक कंप्रोमाइज कैंडिडेट के रूप में मोतीलाल वोरा को विधायक दल का नेता चुना गया और वे मुख्यमंत्री बन गए।

इस वाकये के बाद राजीव गांधी और अर्जुन सिंह के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उन्होंने अर्जुन सिंह को करीब एक साल तक कोई पद नहीं दिया। दिसंबर, 1989 में अर्जुन सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया, लेकिन कुछ महीने बाद ही उनके धुर विरोधी श्यामाचरण शुक्ल की राजीव ने कांग्रेस में वापसी कराई। वोरा के हटने के बाद शुक्ल नए मुख्यमंत्री बने और अर्जुन सिंह फिर कभी एमपी की राजनीति में वापसी नहीं कर सके।राजस्थान में अशोक गहलोत के समर्थक भी वही कर रहे हैं जो 1989 में अर्जुन सिंह ने किया था। गहलोत के समर्थक विधायकों ने अपने इस्तीफे तक विधानसभा अध्यक्ष को भेज दिए। पार्टी नेतृत्व की ओर से भेजे गए पर्यवेक्षकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। अब देखना यह है कि अर्जुन सिंह की तरह गहलोत भी आलाकमान को झुकने के लिए मजबूर कर पाते हैं या नहीं। यह देखना भी रोचक होगा कि माधवराव सिंधिया की तरह सचिन पायलट भी कहीं सीएम की कुर्सी से दूर तो नहीं रह जाएंगे।