Friday, July 19, 2024
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आखिर डीलक्स ट्रेन ने कैसे की अपनी शुरुआती यात्रा?

आज हम आपको बताएंगे कि डीलक्स ट्रेन ने अपनी शुरुआती यात्रा कैसे की! अंग्रेजो ने भारत में तब डीलक्स या लग्जरी ट्रेन चलाई थी, जबकि इसका नाम भी भारतीयों ने नहीं सुना था। देश की पहली deluxe ट्रेन बॉम्बे से पुणे के बीच चली थी, आज से 94 साल पहले। जी हां, देश की पहली डीलक्स और सुपरफास्ट ट्रेन डेक्कन क्वीन एक्सपेस मराठी में दख्खन ची रानी थी। 1930 में जब यह ट्रेन चली थी, तब यह कई मायनों में अनूठी थी। ब्रिटिश इंडिया में बॉम्बे प्रेसिडेंसी के तहत इसे अमीर यात्रियों के लिए लिए चलाया गया था। यह देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन का ताज इसी के सर पर है। साथ ही यह भारत की पहली ऐसी ट्रेन है जो लंबी दूरी तक इलेक्ट्रिक इंजन से चली थी। यह भारत की पहली ऐसी ट्रेन थी, फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे को भी 1 जनवरी 1949 को समाप्त कर दिया गया था, और सेकेंड क्लास के डिब्बे को ही फर्स्ट क्लास के रूप में दुबारा डिजाइन किया गया था, जो जून 1955 तक जारी रहा। उसी समय पहली बार इस ट्रेन में थर्ड क्लास भी शुरू किया गया था।जिसमें महिला डिब्बा लगाया था। साथ ही पहली ऐसी ट्रेन थी, जिसमें डाइनिंग कार लगाया गया था। मतलब कि इसमें चलता-फिरता रेस्टोरेंट है।

एक जून 1930 को जब इस ट्रेन की पहली यात्रा शुरू हुई थी, तब इसें सात डिब्बे हुआ करते थे। उस समय पश्चिमी भारत में Great Indian Peninsula Railway या जीआईपी रेलवे नामक कंपनी रेल सेवा चलाती थी। उसने इसकी यात्रा कल्याण रेलवे स्टेशन से शुरू कराई थी। इस समय इसकी यात्रा छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से पुणे जंक्शन के बीच होती है।

हम कहें कि इस ट्रेन का संबंध घुड़दौड़ से है तो आप नहीं मानेंगे। लेकिन सच्चाई यही है। इस ट्रेन में शुरुआती यात्री पुणे के रेस कोर्स में हॉर्स रेसिंग में हिस्सा लेने वाले या हॉर्स रेसिंग पर पैसा लगाने वाले अमीर-उमरा होते थे। उन्हीं के लिए अंग्रेजों ने भारत की पहली लग्जरी या डीलक्स ट्रेन शुरू की थी। इस ट्रेन का रइस की अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि महज सात डिब्बों की ट्रेन में दो डिब्बे तो गार्ड वाले ही निकल गए। बचे पांच डिब्बे। इनमें भी एक डिब्बा रेस्टोरेंट कार था। ताकि अमीरों की आरामतलबी में खलल नहीं पड़े। इस ट्रेन का नाम पुणे के नाम पर रखा गया था। पुणे को “दक्खन की रानी” के रूप में भी जाना जाता है। शुरुआत में जो ट्रेन को सात डिब्बों के दो रैक के अंडरफ्रेम इंग्लैंड से मंगाए गए थे। उनके ऊपर रेलवे के ही मुंबई स्थित माटुंगा वर्कशॉप में कोच बनाए गए। शुरुआती रैक का एक डिब्बा सिल्वर कलर से रंगा गया था और उस पर स्कारलेट मोल्डिंग था। अन्य डिब्बों का रंग रॉयल ब्ल्यू और उस पर गोल्डन कलर का लाइन था।

जब डेक्कन क्वीन चली थी तब रेलवे में चार क्लास होते थे। लेकिन इस ट्रेन में केवल दो क्लास, फर्स्ट और सेकेंड क्लास के डिब्बे लगाए गए थे। फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे को भी 1 जनवरी 1949 को समाप्त कर दिया गया था, और सेकेंड क्लास के डिब्बे को ही फर्स्ट क्लास के रूप में दुबारा डिजाइन किया गया था, जो जून 1955 तक जारी रहा। उसी समय पहली बार इस ट्रेन में थर्ड क्लास भी शुरू किया गया था।जीआईपी रेलवे नामक कंपनी रेल सेवा चलाती थी। उसने इसकी यात्रा कल्याण रेलवे स्टेशन से शुरू कराई थी। इस समय इसकी यात्रा छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से पुणे जंक्शन के बीच होती है।

अब डेक्कन क्वीन जर्मन डिब्बों यानी एलएचबी कोच के साथ दौड़ती है। इन आधुनिक डिब्बों को उत्कृष्ट प्रोजेक्ट के रूप में डेवलप किया गया है। इस रैक ब्रेल साइनेज, बायो टॉयलेट्स और डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड भी लगाया है जो पहले नहीं था। इस बोर्ड के लगने से यात्रियों को ट्रेन और आने वाले स्टेशनों की जानकारी आसानी से मिलती है। बता दें कि बॉम्बे प्रेसिडेंसी के तहत इसे अमीर यात्रियों के लिए लिए चलाया गया था। यह देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन का ताज इसी के सर पर है। साथ ही यह भारत की पहली ऐसी ट्रेन है जो लंबी दूरी तक इलेक्ट्रिक इंजन से चली थी। यह भारत की पहली ऐसी ट्रेन थी, जिसमें महिला डिब्बा लगाया था। साथ ही पहली ऐसी ट्रेन थी, जिसमें डाइनिंग कार लगाया गया था। मतलब कि इसमें चलता-फिरता रेस्टोरेंट है। अब इस ट्रेन में 15 डिब्बे हैं। इनमें से एक डाइनिंग कार भी शामिल है। डाइनिंग कार आईएसओ सर्टिफाइड है।

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