Saturday, February 24, 2024
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क्या भारत में भी हो सकता है इजरायल जैसा हमला?

भारत में भी इजरायल जैसा हमला कभी भी हो सकता है! अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने और यूक्रेन युद्ध के बाद ऐसा लग रहा था कि देशों के बीच खींचतान का दौर वापस आ गया है और आतंकवाद का मुद्दा नजरों से कहीं ओझल हो गया है। हालांकि, हमास के विभत्स हमले ने सुरक्षा विश्लेषकों को याद दिलाया कि धोखेबाज सरकारों द्वारा समर्थित आतंकवादी समूहों की अंधेरी दुनिया मानव सभ्यता और उसके मूल्यों को चुनौती देती रहती हैं। पहले वास्तविक मकसद और विचारधारा की भूमिका आती है। चाहे वह कश्मीर और मुंबई में लश्कर-ए-तैयबा एलईटी के हमले हों या इजराइल में हमास के हमले, इनकी जड़ों में धार्मिक कट्टरपन है। मुस्लिम समुदाय के भीतर ही ऐसे चरमपंथी समूह शिया, सूफी और अहमदियों को निशाना बनाते हैं क्योंकि वे धर्म की उनकी चरमपंथी व्याख्या के अनुरूप जीवन नहीं जीते। 7 अक्टूबर के हमास के हमले का कारण नागरिक अधिकारों या दो देशों की आपसी लड़ाई नहीं था। इसके बजाय, इसका प्रेरणा विशुद्ध रूप से एक चरमपंथी धार्मिक विश्वास था कि यहूदियों को मार डाला जाना चाहिए और इजराइल को अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इजरायली नागरिकों की हत्या उनकी धार्मिक पहचान के कारण हुई थी। इसी तरह, कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया और कुछ अन्य को राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि पूरी तरह से जिहादी विचारधारा से निकलने वाले कारणों से अपनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

इस लिहाज से हमास और आईएसआईएस एक ही हैं। हमास मुस्लिम ब्रदरहुड की एक शाखा है जिसने कभी भी अपने इस्लामी चरित्र और एक शरिया शासित राज्य स्थापित करने के उद्देश्यों को नहीं छिपाया है। उनके लिए यहूदी राज्य के खिलाफ लड़ाई राजनीतिक नहीं बल्कि पूरी तरह से धार्मिक है। इसलिए, हमास और आईएसआईएस, अल-कायदा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, एलईटी और जैश-ए-मोहम्मद जेईएम जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय इस्लामी समूहों के बीच वैचारिक, रणनीतिक, संगठनात्मक और अन्य आपसी रिश्तों की जांच करने पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। मुझे कश्मीर में शोध करते हुए एलईटी और जेईएम के कई पूर्व आतंकवादियों का साक्षात्कार इंटरव्यू करने का मौका मिला। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस्लाम का पहला दुश्मन यहूदी राज्य है। जब मैंने इजरायल पर उनके विचारों के बारे में पूछा तो शिया मुसलमानों के भारी बहुमत ने ईरान की नीति का समर्थन किया।

दूसरे, सुरक्षा विश्लेषकों को आतंकवाद के पारिस्थितिकी तंत्र इकोसिस्टम को देखना चाहिए। इस इकोसिस्टम में आतंक के फाइनैंसर, कट्टरपंथी धार्मिक प्रचारक और प्रचार युद्ध के सैनिक प्रॉपगैंडा वॉर के सोल्जर्स शामिल हैं। इजराइल-हमास युद्ध में हमलावरों ने अपने अमानवीय हमलों को वैध ठहराने के कारण बताए तो उसकी प्रचार शाखा पूरी तरह से सक्रिय हो गई।

पूरे पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर फिलिस्तीन समर्थक विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें वामपंथी तत्वों ने इस्लामियों का खुलकर साथ दिया। ये प्रदर्शन पूरी तरह से एकतरफा थे, जिनमें किसी ने भी हमास की क्रूरता की निंदा नहीं की। ये प्रचार अभियान आतंकवादी समूहों द्वारा लोकतांत्रिक समाजों के खिलाफ छेड़े गए युद्ध का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। इस तथ्य में कोई विवाद नहीं है कि नागरिकों की मृत्यु हुई है, लेकिन प्रॉपगैंडा मशीनरी ने इजराइल द्वारा अस्पतालों पर बमबारी करने के फर्जी वीडियो प्रसारित किए हैं। वे समाज का ब्रेनवॉश करने के लिए झूठ और विकृतियों को फैलाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और कानून के शासन का लाभ उठाते हैं। मानवीय सहायता का उपयोग आतंकवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। यानी लोगों को कट्टरपंथी बनाना और हथियार बनाना, जैसा कि गाजा के मामले में हुआ था।

तीसरा, इजराइल को यह सोचने की जरूरत है कि हमास को गाजा से बाहर निकालने के बाद क्या होगा। यदि इजराइल बंधकों को वापस करने और हमास को गाजा से बाहर निकालने में जल्दी सफल होता है, तो भी यह समस्या समाप्त नहीं होगी- तुर्की, कतर, ईरान और मलेशिया जैसे देश हमास का समर्थन करते हैं। पिछले कुछ समय से चीन को भी उसका समर्थक माना जाता है। इसके नेताओं और कैडरों को उनके लाभार्थी देशों में सुरक्षित आश्रय मिल जाएगा। कुछ वर्षों के बाद वे इजराइल पर हमला करने के लिए वापस आएंगे क्योंकि उनका मकसद यहूदियों को अनंत काल तक मारना है।अंत में, भारत को हमास को आतंकवादी संगठन घोषित करना चाहिए, न केवल भारत-इजराइल मित्रता के कारण बल्कि महत्वपूर्ण सुरक्षा बाध्यताओं के कारण भी। जब हमास और तालिबान इस तरह की अल्पकालिक जीत हासिल करते हैं, तो यह भारत सहित सभी लोकतंत्रों में जिहादी समूहों को प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यह तथ्य कि हमास नेता खालिद मशाल ने केरल में कुछ मुस्लिम समूहों को संबोधित किया और उनके व्याख्यान को जिस तरह का उत्साही समर्थन मिला, उससे यह स्पष्ट होता है कि हमास और भारत केंद्रित जिहादी समूहों के बीच ऑपरेशनल लिंकेज मौजूद हैं।

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