Sunday, May 19, 2024
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महिलाओं के लिये Social Media बन गया है अपमान का घूंट, जानिए कैसे?

अक्सर हर बार सोशल मीडिया पर एक चीज समान्य तौर पर देखते होगें ,महिलाओं के खिलाफ ट्रोल लैंगिक भेद पर जाकर खत्म होता है . हाल फिलहाल में Sulli Deals और Bulli Bai App चर्चा में रहा .इसमें मुस्लिम महिलाओं के बिना सहमति के तस्वीरों का इस्तेमाल कर नीलामी की जाती थी ,बहरहाल हम समाज में है, उसी की प्रतिच्छवि सोशल मीडिया में दिख रही है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। उदाहरण के लिए, घर और घर से बाहर महिलाओं को जिस तरह लांछित होना पड़ता है, सोशल मीडिया में भी उन्हें ठीक वैसी ही उपेक्षा मिलती है। सोशल मीडिया में अधिकतर पुरुष अपनी नारी विद्वेषी भावना बेहिचक प्रकट करते हैं।यह हमारे समय की भीषण सच्चाई है 

Bangladeshi-Swedish writer, physician, feminist, secular humanist and activist. तस्लीमा नसरीन का कहना है”मैं अगर अपनी बात करूं, तो “सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक और ट्विटर पर मुझे अक्सर बेहद कुत्सित भाषा में निशाना बनाया जाता है. बीती सदी के आठवें-नौवें दशक में हाट-बाजार, उत्सव, मेले आदि में मेरे खिलाफ अभियान चलाया जाता था. तब मैं अपने आलोचकों की पहुंच में नहीं होती थी. इसलिए वे भीड़ में मेरे खिलाफ अभियान चलाते थे, ताकि समाज में मेरा बहिष्कार किया जा सके. लेकिन आज फेसबुक और ट्विटर पर मैं वैसे आलोचकों की पहुंच में हूं.इसलिए सोशल मीडिया में मुझे घेरना, मुझे गालियां देना मेरे आलोचकों के लिए बहुत आसान हो गया है. मैं उनसे मात्र एक क्लिक की दूरी पर हू .”

एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है की “महिलाओं के खिलाफ जिस तरह रोजमर्रा के जीवन में हिंसा और गाली-गलौज होती है, उसी तरह ऑनलाइन हिंसा भी होती है. नीति-निर्माताओं और सोशल मीडिया कंपनियों को इस समस्या को समझना चाहिए और ऐसे उपाय करने चाहिए, ताकि महिलाएं ऑनलाइन कम्युनिकेशन करते हुए खुद को सुरक्षित महसूस करें

पूरी दुनिया के साथ ही भारत भी इंटरनेट क्रांति के दौर में है. इस समय हर चौथा भारतीय सोशल मीडिया से जुड़ा है और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है. इनमें महिलाओं की खासी संख्या है. सोशल मीडिया अपने साथ ढेर सारी सुविधाएं और अच्छी चीजों के साथ कुछ बुराइयां भी लेकर आया है. ऑनलाइन हिंसा और एब्यूज उनमें से प्रमुख है.सर्वे बताते हैं कि ऑनलाइन हिंसा और एब्यूज की ज्यादातर शिकार महिलाएं हैं. मिसाल के तौर पर, गार्डियन अखबार ने विश्लेषण करके बताया कि ब्रिटेन में जिन 10 पत्रकारों को सबसे ज्यादा ऑनलाइन एब्यूज किया गया, उनमें से आठ महिलाएं और 2 अश्वेत पुरुष थे.

इनमें से भी कुछ खास महिलाओं को ज्यादा निशाने पर लिया जाता है. इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट का मानना है कि अगर कोई महिला अपने या समाज के मुद्दे पर लिखती-बोलती है या मुस्लिम या किसी वंचित समाज से या अगर कोई एलजीबीटी है, तो उसे इंटरनेट पर ज्यादा गाली-गलौज का सामना करना पड़ता है.साइबर बुलिंग कई तरीके से की जाती है. इसमें महिलाओं की तस्वीरों से छेड़छाड़, गाली-गलौज, धमकी, ब्लैकमेलिंग, फेक प्रोफाइल बनाकर अभद्र सामग्री डालने से लेकर, स्पाई कैम से उतारी गई तस्वीरों और वीडियो को वायरल करना तथा अश्लील मैसेज तक शामिल हैं.

साइबर बुलिंग ऐसे तो पुरुषों के साथ भी हो सकती है, लेकिन महिलाओं के साथ यह अधिक होती है.विमेंस ऐड ने यूके में एक सर्वे किया जिसमें पाया कि 307 डोमेस्टिक वायलेंस सर्वाइवर्स में से 48% महिलाएं, रिलेशनशिप खत्‍म होने के बाद, उनके पूर्व पार्टनर द्वारा ऑनलाइन हैरास/एब्यूज की गईं. 38% को ऑनलाइन स्‍टॉक यानी पीछा किया गया. जबकि 45% मामलों में महिलाएं रिलेशनशिप में रहते हुए उनके पार्टनर्स द्वारा एब्यूज की गई. तीन-चौथाई महिलाओं ने माना कि पुलिस को नहीं पता कि इस तरह की समस्या से कैसे निपटा जाए. 12% महिलाओं ने पुलिस को रिपोर्ट किया, लेकिन उनकी कोई मदद नहीं हो सकी.एमनेस्टी इंटरनेशनल ने महिलाओं के ह्यूमन राइट्स पर खतरे को इन्वेस्टीगेट करने के लिए 18 से 55 साल की उम्र की 504 महिलाओं से ऑनलाइन पोल से साइबर एब्यूज के बारे में पूछा. सर्वे में पाया गया कि हर पांच में से एक महिला सोशल मीडिया पर एब्यूज से प्रभावित है. वहीं, 18-24 साल की उम्र की महिलाएं ज्यादा एब्यूज की शिकार हुईं.

इस उम्र के समूह में 37% महिलाओं ने कहा कि वो ऑनलाइन एब्यूज और हैरासमेंट का शिकार हुई हैं. इस सर्वे से भी इस बात की पुष्टि हुई कि साइबर एब्यूज करने वालों में परिचित लोगों की संख्या अच्छी-खासी (27%) है. तस्लीमा नसरीन आगे बताती है “बांग्लादेश से बाहर कर दिए जाने के बाद मैंने सोचा था कि अब मैं कट्टर पुरुषतंत्र का निशाना नहीं बनूंगी. पहले कोलकाता, फिर यूरोप में रहते हुए सचमुच मैं वैसे लोगों के निशाने से बाहर थी. लेकिन सोशल मीडिया पर आने के बाद मेरे आलोचकों की संख्या कई गुना ज्यादा हो गई है. पहले सिर्फ बांग्लादेश के कट्टर लोग ही मुझे निशाना बनाते थे. लेकिन फेसबुक और ट्विटर पर मेरा विरोध करने वाले सिर्फ बांग्लादेश के नहीं हैं, वे दूसरे देशों के भी हैं। वे अभद्र भाषा में मुझ पर हमले करते हैं, मुझे अश्लील इंगित करते हैं, वे मेरा बलात्कार करने की धमकी देते है .इस लिहाज से देखें, तो यह सिर्फ मेरी पीड़ा नहीं है, बल्कि पूरे नारी समाज की पीड़ा है. सोशल मीडिया पर महिलाओं को रोज ही कटु अनुभवों से गुजरना पड़ता है। कुछ इस पर अपनी प्रतिक्रिया, अपना क्षोभ जाहिर करती हैं, तो ज्यादातर महिलाएं चुप रह जाती है |

हम अपनी पुरुषवादी सोच को अब समाज के बीच से उठाकर सोशल मीडिया पर लगातार थोप रहे है . उसी की प्रतिच्छवि सोशल मीडिया में दिख रही है. इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं उदाहरण के लिए, घर और घर से बाहर महिलाओं को जिस तरह लांछित होना पड़ता है, सोशल मीडिया में भी उन्हें ठीक वैसी ही उपेक्षा मिलती है. सोशल मीडिया में अधिकतर पुरुष अपनी नारी विद्वेषी भावना बेहिचक प्रकट करते हैं.यह हमारे समय की भीषण सच्चाई है |

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