Thursday, March 19, 2026
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क्या नसरुल्लाह की मौत तीसरे विश्व युद्ध की घंटी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नसरुल्लाह की मौत तीसरे विश्व युद्ध की घंटी है या नहीं! इजरायल के लेबनान में भीषण हवाई हमले में हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की हत्या ने क्षेत्र में तनाव को काफी बढ़ा दिया है। हमले के बाद इजरायल और लेबनानी गुट हिजबुल्लाह के बीच पूर्ण युद्ध का अंदेशा बढ़ गया है। इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष छिड़ा तो ईरान और अमेरिका भी इससे बाहर नहीं रहेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि अब चीजें किस तरफ जाएंगी। खासतौर से हिजबुल्लाह, ईरान और इजरायल का अगला कदम क्या होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान हिजबुल्लाह ने उठाया है। ऐसे में सवाल है कि एक के बाद एक झटके झेल रहा ये गुट अब क्या करेगा। हिजबुल्लाह के ज्यादातर कमांडरों की हत्या कर दी गई है और उसके कम्युनिकेशन सिस्टम पेजर और वॉकी-टॉकी को भी तहस-नहस कर दिया गया है। ऐसे में हिजबुल्लाह के सामने फिर से उठ खड़े होने और इजरायल को जवाब देने की चुनौती है।

अमेरिका स्थित मध्य पूर्व सुरक्षा विश्लेषक मोहम्मद अल-बाशा का मानना है कि हसन नसरल्लाह की मौत हिजबुल्लाह के लिए बड़ा नुकसान है। इससे ये गुट अस्थिरता का शिकार होगा और इसकी राजनीतिक और सैन्य रणनीतियों में भी बदलाव आएगा। हालांकि ये ऐसी उम्मीद करना गलत है कि ये कि गुट अचानक से अपनी हार मान लेगा। एक्सपर्ट का मानना है कि हिजबुल्लाह लड़ाई जारी रखेगा ना कि इजराइल की शर्तों पर किसी समझौता को मान लेगा। हिजबुल्लाह के पास हजारों लड़ाके हैं और हथियारों का बड़ा जखीरा है। उसके पास ऐसी मिसाइल और रॉकेट हैं, जो इजरायल के तेल अवीव और दूसरे शहरों तक पहुंच सकते हैं। हिजबुल्लाह दबाव बढ़ने पर इनका इस्तेमाल कर सकता है।

हसन नसरल्ला की हत्या ईरान के लिए उतना ही बड़ा झटका है, जितना हिजबुल्लाह के लिए है। ईरान ने इस हत्या पर कड़ी प्रतिक्रिया भी दी है। इससे पहले जुलाई में तेहरान में हमास नेता इस्माइल हानिया की हत्या भी ईरान के लिए शर्म की वजह बनी थी। ईरान पर इजरायल के बढ़ते हमले ईरान सरकार को प्रतिक्रिया के लिए मजबूर कर सकते हैं।ईरान के पास पश्चिम एशिया में कई गुट हैं। इनमें हिजबुल्लाह के अलावा यमन में हूती हैं। सीरिया और इराक में भी ईरान के पास मिलिशिया हैं। ईरान इन समूहों से अपने क्षेत्रों में इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर अपने हमले तेज करने के लिए कह सकता है। हालांकि ऐसा होने पर इजरायल के साथ खुद तो भी एक पूर्ण युद्ध में पा सकता है।

अमेरिका के खास सहयोगी इजरायल पर खासतौर से सभी की निगाह है क्योंकि उसने लेबनान में हमला कर अपनी आक्रामकता जाहिर कर दी है। इजरायल का रुख दिखाता है कि उसका फिलहाल युद्धविराम का कोई इरादा नहीं है। इजरायली सेना को लगता है कि हिजबुल्लाह बैकफुट पर है, इसलिए वह उस पर आक्रमण को जारी रखना चाहेगा।

इजरायल पर इसलिए भी नजर रहेगी कि वह हवाई हमले की करता है या जमीन पर भी सेना लेबनान में भेजेगा। इजरायली सेना लेबनान में जमीनी अभियान का ऐलान कर सकती है। आईडीएफ के लिए लेबनान में एंट्री मुश्किल नहीं होगी लेकिन उसे अभियान पूरा करने में गाजा की तरह महीनों या वर्ष भी लग सकते हैं। इससे इजरायल की चुनौती बढ़गी। बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि खुमैनी के आने के बाद भी इज़रायल ने 1980 से 1988 तक ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान को काफी मदद दी थी। हुआ यह था कि 22 सितंबर 1980 को सद्दाम हुसैन की सेना ने अचानक ईरान पर हमला कर दिया था। युद्ध के दौरान ईरान को सैन्य साजोसामान मुहैया कराने वालों में सबसे आगे इजरायल ही था।

इज़राइल ने ईरान के युद्ध को प्रत्यक्ष समर्थन दिया था। उस वक्त इजरायल ने ऑपरेशन बेबीलोन के तहत इराक के ओसिरक परमाणु रिएक्टर पर बमबारी करके उसे नष्ट कर दिया। परमाणु रिएक्टर को इराक के परमाणु हथियार कार्यक्रम का एक हिस्सा माना जाता था। उस वक्त इराक पर तानाशाह सद्दाम हुसैन का राज था। 1982 की बात है, जब इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण कर फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को बाहर कर दिया था। दक्षिण लेबनान में सुरक्षा क्षेत्र के आगामी निर्माण से लेबनान में इजरायली सहयोगियों और नागरिक इजरायली आबादी को अस्थायी रूप से लाभ हुआ। नतीजा यह हुआ कि दक्षिण लेबनान के भीतर फिलीस्तीनी के बजाय घरेलू लेबनानी प्रतिरोध आंदोलन का उदय हुआ, जहां हिजबुल्लाह मजबूती के साथ उठ खड़ा हुआ।

आखिर इसराइल और ईरान कैसे बन गए कट्टर दुश्मन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इसराइल और ईरान जैसे दो दोस्त देश कट्टर दुश्मन कैसे बन गए!ईरान ने आखिरकार इजरायल पर मिसाइलों से हमला बोल दिया। उसने दावा किया है कि इन हमलों में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के हेडक्वॉर्टर्स तबाह हो गया। ईरान ने यह भी कहा है कि उसने इस्माइल हानिया और हिजबुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह की मौत का बदला ले लिया है। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि ईरान ने ये हमले करके बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। नेतन्याहू का इस मामले में अमेरिका भी साथ दे रहा है। इजरायल-ईरान के बीच दुश्मनी आज चरम पर पहुंच चुकी है, मगर कभी दोनों दोस्त हुआ करते थे। जानते हैं कि दोनों की दोस्ती और दुश्मनी की पूरी कहानी। ईरान की दुश्मनी की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वह यह मानने लगा है कि इजरायल के वजूद में रहने का हक नहीं है। ईरान इजरायल को छोटा शैतान तो अमेरिका को बड़ा शैतान मानता है। मध्य-पूर्व में ईरान चाहता है कि अमेरिका और इजरायल इस क्षेत्र से गायब हो जाएं।

इजरायल यह मानता है कि हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों को पैसे देता है और ईरान के सुप्रीम कमांडर अयातुल्लाह खामनेई यहूदी विरोधी संगठनों को इजरायल के खिलाफ भड़काते हैं। इन दोनों की दुश्मनी में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। ईरान ने इजरायल के खिलाफ एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस तैयार किया है। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले तक इजरायल के साथ उसके संबंध काफी दोस्ताना थे। इस्लामी क्रांति से पहले तक ईरान में पहलवी राजवंश का शासन था। उस वक्त ईरान मध्य-पूर्व में अमेरिका के बड़े सहयोगियों में से एक हुआ करता था। 1948 में जब इजरायल बना तो उस वक्त तुर्की के बाद ईरान ही इजरायल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम देश था।

इजरायल के फाउंडर और उसकी पहली सरकार के प्रमुख डेविड बेन गुरियन ने अपने अरब पड़ोसियों को साधने के लिए ईरान से दोस्ती कर ली थी, ताकि नए यहूदी देश को लेकर कोई कुछ बोल न सके। मगर, 1979 में कट्टर अयातुल्लाह खुमैनी की क्रांति ने शाह को उखाड़ फेंका और एक इस्लामी गणतंत्र लागू किया। खुमैनी ने खुद को ईरान का रक्षक करार दिया था। उन्होंने ईरान में अमेरिका और इजरायल के प्रति नफरत के बीज बोए, जिसका चरम रूप आज देखने को मिल रहा है। अयातुल्लाह की सरकार ने इजरायल के साथ संबंध तोड़ लिए। उसने उसके नागरिकों के पासपोर्ट की वैधता को मान्यता देना बंद कर दिया और तेहरान में इजरायली दूतावास को ज़ब्त कर फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (PLO) को सौंप दिया। उस समय अलग फिलिस्तीन के लिए इजरायल के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व PLO कर रहा था। वजह यह थी कि अयातुल्लाह की सरकार के कई कमांडरों ने PLO के साथ लेबनान में लड़ाई लड़ी थी।

इजरायल और ईरान के बीच यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि खुमैनी के आने के बाद भी इज़रायल ने 1980 से 1988 तक ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान को काफी मदद दी थी। हुआ यह था कि 22 सितंबर 1980 को सद्दाम हुसैन की सेना ने अचानक ईरान पर हमला कर दिया था। युद्ध के दौरान ईरान को सैन्य साजोसामान मुहैया कराने वालों में सबसे आगे इजरायल ही था। इज़राइल ने ईरान के युद्ध को प्रत्यक्ष समर्थन दिया था। उस वक्त इजरायल ने ऑपरेशन बेबीलोन के तहत इराक के ओसिरक परमाणु रिएक्टर पर बमबारी करके उसे नष्ट कर दिया। परमाणु रिएक्टर को इराक के परमाणु हथियार कार्यक्रम का एक हिस्सा माना जाता था। उस वक्त इराक पर तानाशाह सद्दाम हुसैन का राज था।

1982 की बात है, जब इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण कर फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को बाहर कर दिया था। दक्षिण लेबनान में सुरक्षा क्षेत्र के आगामी निर्माण से लेबनान में इजरायली सहयोगियों और नागरिक इजरायली आबादी को अस्थायी रूप से लाभ हुआ। नतीजा यह हुआ कि दक्षिण लेबनान के भीतर फिलीस्तीनी के बजाय घरेलू लेबनानी प्रतिरोध आंदोलन का उदय हुआ, जहां हिजबुल्लाह मजबूती के साथ उठ खड़ा हुआ। दोनों देशों में संबंध तब और बिगड़ गए जब ये खुलासा हुआ कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने का काम शुरू कर चुका है। इजरायल किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहता है कि मध्य पूर्व में किसी देश के पास परमाणु हथियार हो। तब से दोनों देशों के रिश्तों में और खटास आती गई, जो अब कट्टर दुश्मनी में बदल गई।

इजरायल और ईरान के बीच की लड़ाई को ‘शैडो वॉर’ कहा जाता है, क्योंकि दोनों ही देश हमलों को सीधे तौर पर स्वीकार नहीं करते हैं। कभी ईरान से जुड़े इस्लामिक जिहादी समूह ने अर्जेंटीना में इजरायली दूतावास उड़ा दिया था। उसके कुछ समय पहले ही हिज़बुल्लाह नेता अब्बास अल मुसावी की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए मोसाद पर आरोप लगे थे। हाल ही में ईरान समर्थक हमास लीडर इस्माइल हानिया की तेहरान में हत्या और हिजबुल्लाह के चीफ कमांडर नसरल्लाह की हत्या के पीछे भी इजरायल को ही जिम्मेदार माना जाता है।

कैंप डेविड समझौता 17 सितंबर, 1978 में इजरायल और मिस्र के बीच हुआ था, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने मध्यस्थता की थी। कैंप डेविड समझौते पर मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने दस्तखत किए थे। इस समझौते से दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हुई थी। इन्हीं समझौतों की वजह से सादात और बेगिन को संयुक्त रूप से 1978 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। हालांकि, इजरायल और ईरान के बीच अभी ऐसा समझौता संभव होना मुश्किल लगता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच के मुद्दे जटिल हैं और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विश्व समुदाय में चिंता है।

 

क्या अपने अतीत को दोहरा रहा है इजराइल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसराइल अब अपने अतीत को दोहरा रहा है या नहीं! इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यह ऐलान किया कि लेबनान में आतंकी गुट हिजबुल्लाह के लीडर हसन नसरल्लाह की हत्या आने वाले वर्षों के लिए क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदलने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा। इजरायल ने लेबनान में ईरान समर्थित आतंकवादी समूह पर एक के बाद एक कई बड़े हमले किए। पहले पेजर और वॉकी टॉकी विस्फोट, फिर दक्षिणी बेरूत पर एक बड़ा हवाई हमला किया, जिसमें वरिष्ठ कमांडर इब्राहिम अकील मारा गया। इसके तीन दिन बाद ही एक जबरदस्त बमबारी में हिजबुल्लाह का चीफ हसन नसरल्लाह भी मारा गया। इन हमलों में कई इमारतें जमींदोज हो गईं और हिजबुल्लाह की तकरीबन पूरी लीडरशिप खत्म हो गई। इजरायल भले ही इसे अपनी जीत मान रहा हो या इसके पीछे उसका 3H प्लान हो, मगर यह उस पर भारी भी पड़ सकता है। इजरायल को यह नहीं भूलना चाहिए कि कभी उसके इसी तरह के कदमों की वजह से ही हिजबुल्लाह का जन्म हुआ था। जून 1982 की बात है, जब फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन यानी PLO को कुचलने के मकसद से इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण किया। तब इजरायल ने यह सोचा था कि वह लेबनान में ईसाई वर्चस्व वाली एक ऐसी सरकार बनवाएगा, जो उसके समर्थन में होगी। इसके अलावा, वहां से सीरियाई फोर्सेज को बाहर भी निकाला जा सकेगा। इन तीनों ही मकसद में इजरायल नाकाम रहा था।

लेबनान में फिलिस्तीनी हथियार बंद समूहों को अमेरिकी मध्यस्थता वाले समझौते के तहत देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। उस वक्त PLO को ट्यूनीशिया, यमन और अन्य जगहों पर निर्वासन में भेज दिया था। हालांकि, पांच साल बाद ही पहला फिलिस्तीनी इंतिफादा या विद्रोह गाजा में भड़क गया और पश्चिमी तट तक फैल गया। आज फिलिस्तीनी अपने मकसद के लिए अडिग हैं। वो इजरायली कब्जे को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। नीचे दिए ग्राफिक से समझते हैं कि इजरायल के हालिया हमलों के बाद अब उसकी लीडरशिप में कौन बचा है। 1982 के लेबनान युद्ध को लेबनान पर दूसरा इजरायली आक्रमण भी कहा जाता है। यह 6 जून, 1982 को उस वक्त शुरू हुआ, जब इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर आक्रमण किया। आक्रमण दक्षिणी लेबनान में एक्टिव फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) और इजरायली सेना के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई, जिसमें सीमा के दोनों ओर नागरिक मारे गए थे। इजरायली सैन्य अभियान का कोड नाम ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली था।

अबू निदाल जैसे आतंकी सगंठन (फतह) के आतंकियों ने ब्रिटेन में इजरायल के राजदूत श्लोमो अर्गोव की हत्या का प्रयास किया था, जिसके बाद तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने पीएलओ को दोषी ठहराया। उन्होंने लेबनान में इजरायली आक्रमण के पीछे यही वजह बताई। इजरायल की सरकार ने जब पीएलओ को निकाल बाहर किया तो उसने राष्ट्रपति बशीर गेमायेल के नेतृत्व में एक इजरायल समर्थक ईसाई सरकार बनवाई। इजरायल सरकार ने एक संधि पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद जताई थी, जो इजरायल को ’40 साल की शांति’ देगी। मगर, इसी बीच सितंबर, 1982 में गेमेल की हत्या हो गई और शांति संधि की बात धरी की धरी रह गई।

इस युद्ध की वजह से बड़ी संख्या में इजरायली जनता मारी गई। इजरायली जनता का मोहभंग हो गया दिया। इजरायली डिफेंस फोर्सेज ने 29 सितंबर, 1982 को लेबनान में अपना अभियान समाप्त कर दिया। फरवरी से अप्रैल 1985 तक इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान सुरक्षा क्षेत्र में कब्जा कर रखा था, जिससे ईरान समर्थित लड़ाका समूह हिजबुल्लाह का जन्म हुआ। इसने 2000 में लेबनान से आईडीएफ की अंतिम वापसी तक इजरायली कब्जे के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।

माना जाता है कि 1982 के इजरायली आक्रमण का सबसे अहम नतीजा यह हुआ कि हिजबुल्लाह के रूप में ऐसा नासूर पैदा हुआ, जिसने इजरायल के खिलाफ लगातार गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। इसने इजरायल को दक्षिण लेबनान से एकतरफा हटने के लिए मजबूर कर दिया। ऐसा पहली बार था जब जब किसी अरब सैन्य बलों ने इजरायल को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। अरब की धरती से ईरान की मदद से यह नया समूह उन फिलिस्तीनी उग्रवादियों से ज्यादा अधिक घातक और प्रभावी साबित हुआ। 2005 तक इस लड़ाई में ईरान ने हिजबुल्लाह की जमकर मदद की।

नसरल्लाह की मौत ईरान के लिए भी बड़ा झटका है। उसने अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई को इजरायली हमले के डर से कहीं छिपा दिया है। जुलाई में तेहरान के एक गेस्ट हाउस में हमास के राजनीतिक नेता इस्माइल हनिया की अपमानजनक हत्या का बदला भी अभी तक ईरान नहीं ले पाया है। अब नसरल्लाह की हत्या के बाद ईरान अब नई रणनीति पर विचार कर रहा होगा।ईरान के पास मध्य पूर्व में उसके मित्र देशों के भारी हथियारों से लैस लड़ाकों का एक पूरा संगठन है, जिसे कथित तौर पर ‘प्रतिरोध की धुरी’ (एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस) कहा जाता है। हिजबुल्लाह के अलावा यमन में हूती और सीरिया और इराक में भी कई शिया संगठन हैं, जिन्हें ईरान इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर हमले करने के लिए कह सकता है। हालांकि, वह इसके लिए सौ बार सोचेगा, क्योंकि इसकी प्रतिक्रिया बेहद जबरदस्त होगी।

17 सितंबर, 1978 को कैंप डेविड समझौते पर मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने दस्तखत किए थे। मैरीलैंड के कैंप डेविड में 12 दिनों की सीक्रेट बातचीत के बाद इन दो समझौतों पर अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मौजूदगी में व्हाइट हाउस में हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों से मिस्र और इजरायल के बीच 1979 की मिस्र-इजरायल शांति संधि की राह खुली। इन्हीं समझौतों की वजह से सादात और बेगिन को संयुक्त रूप से 1978 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। हालांकि, अमेरिका के हालिया रुख से अभी समझौते की गुंजाइश नहीं दिखती है।

 

क्या बिना चीफ के आगे बढ़ पाएगा ईरान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिना चीफ के ईरान आगे बढ़ पाएगा या नहीं! हिजबुल्लाह चीफ नसरल्लाह पर हमला एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, जो पश्चिम एशिया में सैन्य और राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह से बदल सकता है। नसरल्लाह पर हुए हमले में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड का एक वरिष्ठ सदस्य भी मारा गया। हमास के इस्माइल हनियेह के हत्या की तरह, इजरायल को इस बार जो इनपुट मिले उसमें ईरानी जासूस की भी भूमिका है। यह ध्यान देने योग्य बात है। यह न केवल हिजबुल्लाह के भविष्य के लिए बल्कि सभी क्षेत्रीय भू-राजनीतिक संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। सबसे पहले नेतन्याहू अमेरिकी चुनावों के लिए सभी बटन दबा रहे हैं, जिसका अर्थ है ट्रम्प के अभियान के लिए समर्थन और कमला हैरिस के संभावित चुनाव से पहले जो शुरू किया था उसे खत्म करना। नेतन्याहू ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों के खिलाफ अपनी लड़ाई तेज कर दी है। यह रणनीति उनके अपने राजनीतिक भविष्य को मजबूत करने और इजरायल की सुरक्षा को बढ़ाने दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

पश्चिमी दुनिया, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन, नेतन्याहू की सरकार को हर तरह का राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना जारी रखे हुए हैं। यह नेतन्याहू को और प्रोत्साहित करता है और उसे एक आक्रामक नीति अपनाने के लिए प्रेरित करता है। नतीजतन, नेतन्याहू हमास और हिजबुल्लाह के बिना एक दुनिया बनाने की अपनी योजना में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जो उन्हें और इजरायल दोनों को राजनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से संतुष्ट करेगा। नसरल्लाह के नेतृत्व में, हिजबुल्लाह न केवल लेबनान में बल्कि पूरे क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति था। नसरल्लाह के नहीं रहने से निस्संदेह संगठन के रणनीति और उसके कैसे आगे बढ़ाया जाएगा इस पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। हमारे पास इस बारे में कोई ठोस डेटा नहीं है कि हिजबुल्लाह का नया शासन ढांचा कैसा होगा। पुनर्गठन की प्रक्रिया में कितना समय लगेगा। इस बीच, ईरान और दूसरे बलों से कैसे तालमेल बैठेगा।

इसमें समय लगेगा। क्या नसरल्लाह के करिश्माई नेतृत्व में हिजबुल्लाह ने जो वर्तमान शक्ति हासिल की है क्या दोबारा हो पाएगा। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या ईरान के साथ संबंधों को उसी तरह बनाए रखा जाएगा। हिजबुल्लाह की पहचान नसरल्लाह से काफी हद तक जुड़ी हुई थी। दोबारा वैसा हो इसकी संभावना कम है। बदली परिस्थिति में हिजबुल्लाह के भविष्य को और ईरान के प्रभाव दोनों को लेकर सवाल है। लेबनान, सीरिया और इराक में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए ईरान को हिजबुल्लाह जैसे मजबूत सहयोगी की जरूरत है। यदि ईरान हिजबुल्लाह को वह समर्थन प्रदान करने में विफल रहता है जिसकी उसे अपेक्षा है या यदि नया हिजबुल्लाह नेतृत्व ईरान के साथ अपने संबंधों को लेकर वैसे आगे नहीं बढ़ता तो इसका न केवल क्षेत्र में हिजबुल्लाह की स्थिति पर बल्कि ईरान पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ईरान अब नेतन्याहू और इजरायल के लिए मेन टारगेट है। खासकर तेहरान में हनियेह की हत्या के बाद, इजरायल को जवाब देने की ईरान की क्षमता सवालों के घेरे में है। इजरायल के प्रति नए ईरानी नेतृत्व की नीति की अस्पष्टता अभी भी हमें यह अनुमान लगाने से रोकती है कि नसरल्लाह की मौत के बाद ईरान क्या कर सकता है। क्या ईरान हूतियों के माध्यम से इस क्षेत्र में अपना प्रभाव डालता रहेगा। क्या यह दिखाने के लिए कि वह एक क्षेत्रीय शक्ति है, तेल व्यापार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर देगा। क्या ईरान यह दावा करते हुए कि उसे खतरा महसूस हो रहा है, अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम में तेजी लाएगा।

यदि ईरान हिजबुल्लाह को वह समर्थन प्रदान करने में विफल रहता है जिसकी उसे अपेक्षा है, तो क्या नसरल्लाह के बाद नया हिजबुल्लाह चीफ खुद को ईरान से दूर कर पाएगा। क्या हिजबुल्लाह लेबनान में ईरानी मदद के बिना टिक सकता है। इसका लेबनान में खाड़ी देशों की राजनीतिक शक्ति पर क्या असर पड़ेगा। ईरान चाहे जो भी नीति अपनाए, सीरिया और इराक दोनों में उसके प्रभाव पर सवाल उठेंगे। नसरल्लाह के नहीं रहने से निस्संदेह संगठन के रणनीति और उसके कैसे आगे बढ़ाया जाएगा इस पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। हमारे पास इस बारे में कोई ठोस डेटा नहीं है कि हिजबुल्लाह का नया शासन ढांचा कैसा होगा।इस लिहाज से ईरान को बिना देर किए कोई कदम उठाने की जरूरत है। इस कदम में देरी का मतलब होगा कि ईरान की असली ताकत पर सवाल उठाया जाएगा।

 

क्या इसराइल और ईरान के युद्ध से उत्पन्न हो सकता है खतरा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसराइल और ईरान के युद्ध से खतरा उत्पन्न हो सकता है या नहीं! ईरान ने इजरायल पर लगभग 200 मिसाइलें दागीं, जिनमें से ज्यादातर को इजरायल ने मार गिराया। इस हमले में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। ईरान का कहना है कि यह हमला हिज्बुल्ला प्रमुख हसन नसरल्लाह, IRGC कमांडर अब्बास निलफोरूशान और हमास प्रमुख इस्माइल हनियेह की हत्या का बदला लेने के लिए किया गया है। इजरायल ने भी इस हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही है। यह टकराव सालों से चला आ रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे पूरी तरह जंग में बदलने से रोकने की कोशिश कर रहा है। ईरान आधिकारिक तौर पर इजरायल के अस्तित्व को मानने से इनकार करता है। इजरायल विरोधी सशस्त्र ग्रुप्स का समर्थन करता है। इजरायल के प्रधान मंत्री नेतन्याहू हमेशा से ईरान को फिलिस्तीनी मुद्दे से ज्यादा बड़ा खतरा मानते रहे हैं। उन्होंने हाल ही तक इसे दरकिनार करने की कोशिश की थी। नेतन्याहू ने ईरान के साथ पश्चिमी देशों के समझौते को कमजोर करने के लिए सक्रिय रूप से काम किया। अब यह संघर्ष इतना बढ़ गया है कि कोई भी इस बात पर विचार नहीं कर रहा है कि क्या ईरान और इजरायल सुलह के लिए कोई रास्ता निकाल सकते हैं।

अपनी बयानबाजी के बावजूद, ऐसा नहीं लगता कि ईरान वास्तव में सोचता है कि वह इजरायल के साथ युद्ध जीत सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान शांति पसंद करता है। लेकिन तेल अवीव के साथ टकराव का तेहरान का पसंदीदा तरीका लॉन्ग टर्म और अप्रत्यक्ष लड़ाई है। यह समझ में आता है क्योंकि ईरान कहीं न कहीं सैन्य स्थिति में इजरायल से कमजोर है। खासकर जब अमेरिका को इस समीकरण में शामिल किया जाए। इसके अलावा, इजरायल से अलग, ईरान के पास ऐसा कोई देश नहीं है जो उसे सुरक्षा की गारंटी दे सके। ईरान और इजरायल के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे टकराव में अप्रत्यक्ष और अपरंपरागत तरीकों का इस्तेमाल करना पसंद करता है। हिज्बुल्लाह, हमास और हौथिस जैसे गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के साथ अपने गठबंधन के नेटवर्क पर बहुत अधिक निर्भर करता है। इजरायल का प्रतिरोध करना, ईरान के लिए प्रतिरोधक का काम करना और अपनी घरेलू राजनीतिक भूमिकाएं निभाना अहम है।

हालांकि, ये भूमिकाएं कभी-कभी टकरा जाती हैं, जैसा कि हम अब हिज्बुल्लाह के साथ देख रहे हैं। 7 अक्टूबर के बाद, हिज्बुल्लाह ने हमास के साथ एकजुटता में इजरायल पर गोलीबारी करके अपनी प्रतिरोधक भूमिका पर जोर दिया। वह फैसला अब उल्टा पड़ सकता है, क्योंकि इजरायल की प्रतिक्रिया ने हिज्बुल्लाह को नुकसान पहुंचाया है और ईरान के प्रतिरोध को कमजोर किया है। ईरान ने अप्रैल में भी इजरायल पर मिसाइलों से हमला किया था। यह हमला सीरिया में IRGC अधिकारियों की हत्या के जवाब में किया गया था। अगर इसका उद्देश्य ईरान के प्रतिरोध को बहाल करना था, तो यह काम नहीं आया। इजरायल हत्याओं के अभियान के साथ आगे बढ़ा। ईरान ने उस समय कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की और कहा कि उसका मानना है नेतन्याहू तेहरान को एक ऐसे युद्ध में फंसाने की कोशिश कर रहे थे जो वह नहीं चाहता था।

हालांकि, जैसे ही इजरायल नसरल्लाह की हत्या में सफल हुआ और उसने लेबनान पर जमीनी अटैक शुरू कर दिया। ईरान के अंदर इस बात पर बहस तेज हो गई कि क्या उसके संयम को कमजोरी माना जा रहा। अमेरिका के मिले-जुले मैसेज, जिसने पिछले हफ्ते युद्धविराम का आह्वान किया था, लेकिन फिर नसरल्लाह की हत्या की प्रशंसा की गई। इसका मतलब तेहरान में कम से कम कुछ लोग सोच रहे कि वाशिंगटन ने उन्हें जानबूझकर गुमराह किया, युद्धविराम की बात कही, जबकि तेल अवीव को हमले की तैयारी में मदद की।

अगर ईरान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो प्रतिरोध की धुरी बहुत ही एकतरफा सौदेबाजी की तरह दिखेगी। ईरान को हमेशा उम्मीद थी कि इजरायल के किसी भी हमले की स्थिति में हिज्बुल्ला उसका बचाव करेगा। लेकिन ऐसा लग रहा कि वह बस किनारे पर ही खड़ा है, जबकि हमास और हिज्बुल्ला नेता मारे गए। हालांकि, सबसे बढ़कर ईरान को सीधे इजरायली हमले का डर है। चारों ओर युद्ध की बयानबाजी के साथ, ईरान ने गणना की होगी कि इजरायली हमला तब भी हो सकता है, चाहे वह कार्रवाई करे या चुपचाप रहे। ऐसा इसलिए वह दिखाना चाहता था कि वह कम से कम इजरायल को नुकसान पहुंचा सकता है, भले ही वह निर्णायक रूप से युद्ध न जीत सके।

इजरायल अब यह प्लान कर रहा कि कैसे जवाब दिया जाए। इसने इस क्षेत्र में ईरान समर्थित सशस्त्र ग्रुप्स के खिलाफ अपना हवाई अभियान जारी रखा है। इस बात की प्रबल संभावना है कि वह ईरान के अंदर रणनीतिक स्थलों, जैसे परमाणु सुविधाओं और सैन्य स्थलों पर हमला करेगा। हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं कि क्या इजरायल हवाई हमलों के जरिए ईरान की परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। अगर ईरान ने तय कर लिया कि मौजूदा घमासान केवल परमाणु हथियारों से ही सुलझ सकता है तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसके दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को लेकर भी निहितार्थ हो सकते हैं। खासकर अगर ईरान और पाकिस्तान के बीच फिर से तनाव पैदा होता है। ईरान ने इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया था। इन हालात में अमेरिका और यूरोप को पश्चिम एशिया में संघर्षों से बाहर निकलने का अधिक टिकाऊ रास्ता खोजने के लिए गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ काम करना चाहिए।

 

क्या अमेरिका की अनसुनी कर रहा है इजराइल?

वर्तमान में इजरायल अमेरिका की अनसुनी करता हुआ नजर आ रहा है! इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से पूरी दुनिया में चिंता का माहौल है। इस तनाव का असर तेल और खाद की कीमतों से लेकर, समुद्री व्यापार और अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव तक पर पड़ सकता है। यह तनाव अचानक नहीं बढ़ा, पिछले साल 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद से ही बढ़ रहा है। इस हमले के बाद से ही इजरायल, गाजा में हवाई और जमीनी कार्रवाई कर रहा है। इस संघर्ष की शुरुआत पिछले साल 7 अक्टूबर को हमास के हमले से हुई थी। इस कार्रवाई में अब तक 40,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 20 लाख लोग बेघर हो गए हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि अब गाजा के लोगों को खाने-पीने की चीजों की कमी का सामना करना पड़ रहा है और यहां की स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमरा गई हैं। अमेरिका, मिस्र और कतर जैसे देशों ने युद्धविराम के लिए बहुत कोशिश की है, लेकिन अभी तक कोई खास नतीजा नहीं निकला है। इसकी एक वजह यह भी है कि इजरायल हमास को पूरी तरह से खत्म करना चाहता है, जबकि हमास ‘स्थायी’ युद्धविराम की मांग पर अड़ा हुआ है।

पिछले साल 7 अक्टूबर से ही 100 से ज्यादा इजरायली नागरिक हमास के कब्जे में हैं और यह साफ नहीं है कि उनमें से कितने लोग अभी भी जीवित हैं। दुनिया भर के कई देशों में इजरायल के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है और उसकी कार्रवाइयों की आलोचना हो रही है। हाल ही में इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को देश में आने से रोक दिया। हालांकि कई यूरोपीय देशों, खासकर अमेरिका में इजरायल को समर्थन मिल रहा है लेकिन अमेरिका में रहने वाले अरब और मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेता इसका विरोध कर रहे हैं।

इजरायल और लेबनान की सीमा पर भी तनाव बढ़ गया है। पिछले एक साल से हिजबुल्लाह की ओर से लगातार हो रहे हमलों के जवाब में इजरायल ने हवाई हमले तेज कर दिए हैं और जमीनी कार्रवाई भी शुरू कर दी है। इन हमलों से उत्तरी इजरायल में रहने वाले 70,000 लोग बेघर हो गए हैं। इस कार्रवाई में हिजबुल्लाह नेता नसरल्लाह और उसके कई बड़े सैन्य कमांडर मारे गए हैं। 2006 में भी इजरायल ने ऐसी ही एक मुहिम चलाई थी, लेकिन तब वह हिजबुल्लाह नेतृत्व को नुकसान नहीं पहुंचा पाया था।

हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई के दौरान इजरायल ने सीरिया के रास्ते ईरान से होने वाली सप्लाई को भी निशाना बनाया। इसके अलावा इजरायल ने सीरिया और लेबनान में ईरानी अधिकारियों को भी निशाना बनाया जो हिजबुल्लाह को मदद पहुंचा रहे थे। ईरान में बहुत से लोगों का मानना है कि जुलाई में तेहरान में हमास नेता इस्माइल हानिया की हत्या उनकी संप्रभुता का उल्लंघन है। 1 अक्टूबर को, ईरान ने 180 बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया, जो पहले के हमलों से कहीं ज्यादा बड़ा था। इनमें से कई मिसाइलें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में कामयाब रहीं।

इजरायल का मानना है कि अपने पड़ोसियों को काबू में रखने के लिए ताकत दिखाना ही एकमात्र उपाय है, इसलिए माना जा रहा है कि इस बार वह ईरान को जवाब जरूर देगा। अमेरिका समेत इजरायल के सभी सहयोगी चाहते हैं कि यह संघर्ष जल्द से जल्द खत्म हो। अमेरिका का ध्यान इस समय रूस-यूक्रेन युद्ध पर है। अमेरिका अब तक यूक्रेन को लगभग 100 अरब डॉलर की सहायता दे चुका है। राष्ट्रपति बाइडेन ने 2020 के अपने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान विदेशों में अमेरिकी सेना की सक्रियता को कम करने की बात कही थी। अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी को इसी रणनीति के तहत देखा गया था। हालांकि, अमेरिका में इजरायल को पूरा समर्थन देने की अपील करने वालों की भी कमी नहीं है।

कई लोगों का कहना है कि नेतन्याहू अमेरिका की युद्धविराम की सिफारिशों को इसलिए नजरअंदाज कर पा रहे हैं क्योंकि वह अमेरिकी राष्ट्रपति की राजनीतिक मजबूरियों को अच्छी तरह से समझते हैं। रूस और चीन जैसे अमेरिकी प्रतिद्वंद्वी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। 2006 में भी इजरायल ने ऐसी ही एक मुहिम चलाई थी, लेकिन तब वह हिजबुल्लाह नेतृत्व को नुकसान नहीं पहुंचा पाया था।वहीं भारत खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भी चिंतित होगा। अगर अमेरिका ईरान पर और प्रतिबंध लगाता है तो भारत के लिए कई तरह की नीतिगत चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं।

 

समझ नहीं आ रहा कि पूजा में अपने बालों को कैसे बांधें? बालों के प्रकार के अनुसार चुनें

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जो लोग बालों को बांधने का जोखिम नहीं उठाना चाहते, उन्हें बाल खुले रखना ज्यादा आरामदायक लगता है। लेकिन बालों को हर वक्त और हर जगह खुला रखना संभव नहीं है। तभी ख्याल आने लगता है कि बालों को बांधना कैसे अच्छा रहेगा। सजने-संवरने का मतलब है मेकअप के साथ हजारों प्रयोग। चेहरे की बनावट, त्वचा का प्रकार, आंखों का आकार, होंठ सब कुछ देखा-सुना जाता है, उसके बाद ही मेकअप करने बैठती हूं। लेकिन कोई भी अपने बालों की ज्यादा परवाह नहीं करता। या तो खुले बाल, या बैंग्स, या पोनीटेल। एक बड़े फूल की माला या हेयर बैंड के साथ। क्या आपने कभी सोचा है कि क्या यह चेहरे पर फिट बैठता है? जो लोग बालों को बांधने का जोखिम नहीं उठाना चाहते, उन्हें बाल खुले रखना ज्यादा आरामदायक लगता है। लेकिन बालों को हर वक्त और हर जगह खुला रखना संभव नहीं है। तभी ख्याल आने लगता है कि बालों को बांधना कैसे अच्छा रहेगा। अपने बालों के प्रकार के अनुसार अपने बालों को स्टाइल करने का तरीका जानें।

बालों को कैसे बांधें?

सिर्फ बालों की लंबाई ही नहीं, बल्कि बालों की मोटाई का भी ध्यान रखना चाहिए। माथे की संरचना पर भी ध्यान देना जरूरी है। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही हेयरस्टाइल चुनें।

1) यदि बाल लंबे या मध्यम और घने हैं, तो उन्हें बांधने का प्रयास करें। स्लीक पोनीटेल, साइड बन, विभिन्न चोटियाँ अच्छी लगेंगी। आप अपने बालों को खुला रखकर भी बैकब्रश कर सकती हैं।

2) अगर आपके बाल छोटे और घने हैं तो आप वॉटरफॉल ब्रैड, समुराई बन या हाफ पोनीटेल बना सकती हैं। किसी भी हेयर एक्सेसरीज़ का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है।

3) अगर बाल छोटे हैं और घनत्व कम है तो पफ्ड फ्रेंच बन, साइड ट्विस्ट के साथ अच्छा लगेगा। आप अलग-अलग तरह की हेयर एक्सेसरीज का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। यह पतले बालों को काफी हद तक छिपा सकता है।

4) अगर बालों की लंबाई लंबी है, लेकिन पतले हो गए हैं तो आप बालों को खुला रख सकती हैं। ऐसे बालों पर फिशटेल अच्छी लगेगी। पतले बालों पर जूड़ा या पोनीटेल बनाने से बचना चाहिए।

5) कई लोगों को घुंघराले बालों की समस्या होती है। बहुत जल्दी खुरदुरा और उलझ जाता है। ऐसे में अलग-अलग तरह के बन्स देखना अच्छा लगता है। लेकिन आप चाहें तो फ्रेंच ब्रेड या समुराई ब्रेड भी ट्राई कर सकते हैं. बुरा मत मानना.

6) अगर जल्दी हो तो सिंथी के दोनों तरफ के बालों को बांटकर वापस बांध लें। बाकी बालों को खुला छोड़ दें। यह हेयरस्टाइल हर तरह के कपड़ों के साथ अच्छा लगेगा।

आप कितने दिन की पूजा में शैंपू जरूर करेंगी? और अगर आप ज्यादा शैंपू का इस्तेमाल करते हैं तो बाल रूखे हो जाते हैं। अगर आप पूजा के सितारों जैसे मुलायम और चिकने बाल चाहती हैं तो सिर्फ शैम्पू से काम नहीं चलेगा। रूखे बालों को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए अपने दैनिक शैम्पू में कुछ सामग्री मिलाएं।

शैम्पू में क्या मिलाने से बढ़ जाएगी बालों की चमक?

1)नारियल का दूध

नारियल के दूध में विटामिन सी, विटामिन बी और विटामिन ई आदि मौजूद होते हैं। कई विटामिनों के अलावा, इसमें सेलेनियम, सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे कई खनिज शामिल हैं। ये तत्व बालों और बालों की जड़ों को बनाए रखने और बालों के विकास को बढ़ावा देने में मदद करते हैं। नारियल के दूध को शैम्पू में मिलाकर बालों में लगाने से बाल लंबे और स्वस्थ होंगे।

2) गुलाब जल

शैंपू में एक कप गुलाब जल मिलाएं। इससे तालू की खुश्की दूर हो जाएगी। अगर तालु पर खुजली या डैंड्रफ की समस्या है तो उससे भी छुटकारा मिल जाएगा. बाल जिला वापस आ जायेगा.

3) चीनी

प्रदूषण, पसीने और तेल व गंदगी जमा होने के कारण बाल बहुत जल्दी चिपचिपे हो जाते हैं। इसलिए अपने बालों को नियमित रूप से साफ़ करना ज़रूरी है। इसके लिए हफ्ते में कम से कम 2-3 बार शैंपू करना जरूरी है। और अब से स्वस्थ बाल पाने के लिए इस शैम्पू में चीनी मिलाएं। यदि आप शैम्पू में 1 चम्मच चीनी मिलाते हैं, तो आपके बालों की प्राकृतिक चमक वापस आ जाएगी। डैंड्रफ की समस्या को कम करने के लिए आप इस ट्रिक का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

4) बेकिंग सोडा

क्या आप जिस शैम्पू का उपयोग करते हैं वह पैराबेन और सल्फेट मुक्त है? इस प्रकार के शैम्पू में ज्यादा झाग नहीं बनता है। हालाँकि, यदि आप अतिरिक्त झाग चाहते हैं, तो शैम्पू में थोड़ा बेकिंग सोडा मिला लें। झाग बनेगा, बाल साफ़ होंगे.

5) आवश्यक तेल

अगर आपके घर में टी ट्री, लैवेंडर, रोज़मेरी या पेपरमिंट एसेंशियल ऑयल है, तो इसे शैम्पू में मिलाएं। डैंड्रफ की समस्या कम हो जाएगी.

दौड़ने के दौरान पैरों के दर्द को दूर करते हैं खास जूते! समस्या विशेष जूते की नहीं है?

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व्यायाम जूते आसानी से फटते या खराब नहीं होते क्योंकि उन्हें बहुत अधिक नहीं पहना जाता है। इसलिए हर साल नए जूते खरीदना कई लोगों के मन में नहीं होता होगा। हालाँकि, ‘रनिंग शू’ का भी एक विशिष्ट शब्द है। दौड़ने जाते समय पैरों में साधारण चप्पल या जूते नहीं पहनने चाहिए। यह प्रतिकूल हो सकता है. उस डर से उसने ‘रनिंग शूज़’ की एक जोड़ी खरीदी। उन जूतों के साथ चलना या दौड़ना वास्तव में आरामदायक लगता है। प्रशिक्षकों का कहना है कि शरीर का संतुलन बनाए रखने और चोट से बचाने में दौड़ने वाले जूतों की विशेष भूमिका होती है। हालाँकि, ऐसे जूते पहनने से कई बार पैरों में दर्द हो सकता है।

व्यायाम जूते आसानी से फटते या खराब नहीं होते क्योंकि उन्हें बहुत अधिक नहीं पहना जाता है। इसलिए हर साल नए जूते खरीदना कई लोगों के मन में नहीं होता होगा। हालाँकि, ‘रनिंग शू’ का भी एक विशिष्ट शब्द है। अगर नियमित रूप से इस्तेमाल किया जाए तो ये जूते एक साल तक पहने जा सकते हैं। उससे ज्यादा नहीं. पैरों के तलवों पर कई ऐसे निशान होते हैं जो बताते हैं कि जूते की मियाद खत्म होने वाली है। पता लगाएं कि वे क्या हैं. 1) जोड़ों का दर्द:

दौड़ने के दौरान पैर या मांसपेशियों की चोट से बचने के लिए डॉक्टर विशेष जूते पहनने की सलाह देते हैं। लेकिन अगर ऐसे जूते पहनने के बाद भी टखने में दर्द हो तो मान लेना चाहिए कि जूते की गुणवत्ता खराब हो गई है। पैरों को अलग से सहारा देने के लिए ‘कुशन’ होता है। जूते घिसते-घिसते घिस जाते हैं। वहां से भी ऐसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं.

2) पैरों में छाले:

नए जूते पहनने के बाद पैरों में छाले पड़ जाते हैं। लेकिन अगर पुराने ‘रनिंग शूज’ पहनने के बाद भी आपके पैरों में दिक्कत होती है तो आपको समझ जाना चाहिए कि अब जूते बदलने का समय आ गया है। चलते या दौड़ते समय जूते की अंदरूनी परत और त्वचा की पतली परत बार-बार रगड़ने से कट सकती है या छाले पड़ सकते हैं।

3) जूते के तलवों का ख़राब होना:

यहां तक ​​कि अगर जूते का सोल घिस जाए तो भी अक्सर पैरों में दर्द होता है। ऐसे जूते पहनकर चलने या दौड़ने से पैर में चोट लगने का खतरा बढ़ जाता है। पैरों को नुकसान से बचाने के लिए नए जूते खरीदना बेहतर है।

खाना-पीना काम नहीं कर रहा था. इसलिए उन्होंने जिम ज्वाइन कर लिया. लेकिन दो दिन की एक्सरसाइज के बाद जीभ बाहर आ गई. उस पर सारा दर्द! वह सोच भी नहीं सकते थे कि चर्बी कम करते-करते वह पूरी तरह से बिस्तर पर पड़ जाएंगे। बिस्तर से उठना-बैठना तो दूर की बात है। वहीं ट्रेनर का कहना है कि ऐसा दर्द बिल्कुल सामान्य है. व्यायाम करने से शरीर की सभी मांसपेशियों पर तनाव पड़ता है। इसलिए आपको दर्द होने पर भी लगातार तीन दिन जिम करना होगा। आप दर्द के कारण जिम नहीं छोड़ सकते। इसलिए जिम जाने से पहले आप बिस्तर से उठकर कुछ आसनों का अभ्यास कर सकते हैं।

1) मलासन:

सबसे पहले जमीन पर बैठ जाएं. इसके बाद दोनों पैरों को दोनों तरफ फैलाकर सीधे बैठ जाएं। दोनों पैरों को जितना हो सके पास-पास रखें। हाथों को नमस्कार की मुद्रा में एक साथ रखें। 3-4 मिनट तक इस आसन में रहने के बाद धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं।

2) विलय:

सबसे पहले दोनों पैरों और हाथों को जमीन पर रखकर कैट पोज़ करें। इसके बाद पीठ को फुलाकर और सिर को नीचे करके एक बार सांस भरें और फिर पेट को अंदर करके सांस छोड़ें। इस आसन का अभ्यास कम से कम 5 मिनट तक 5 बार करें।

3)बालासन:

अपने घुटनों को मोड़ें और अपनी एड़ियों पर बैठें। इस बार शरीर को झुकायें। शरीर को इस तरह मोड़ें कि छाती जांघों को छुए। अपने सिर को गद्दे पर रखें और अपनी बाहों को आगे की ओर फैलाएं। यह आसन तंत्रिका तंत्र के लिए बहुत फायदेमंद है। इसके साथ ही यह गर्दन और पीठ के दर्द को भी कम करने में मदद नहीं करता है।

रोज सुबह उठकर आधे पानी में डूबे शरीर को खींचकर जिम ले जाएं। झिमुनी को राहत देने, शरीर और दिमाग को उत्तेजित करने के लिए वहां हर समय तेज लय के विभिन्न गाने बजाए जाते हैं। हालाँकि, कुछ लोगों के लिए इस थकान से उबरना काफी मुश्किल हो जाता है। ऐसी शारीरिक स्थिति में अगर आप वजन उठाना चाहते हैं या प्लैंक करना चाहते हैं तो 10 सेकंड से ज्यादा रुकना संभव नहीं है। जब पूरे शरीर का भार हाथों और पैरों पर पड़ता है तो पूरा शरीर कांपने लगता है। बहुत से लोग सोचते हैं कि झटके अपर्याप्त नींद या अत्यधिक परिश्रम के कारण होते हैं। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि ऐसी समस्याएं थकान या नींद की कमी के कारण हो सकती हैं। इसके अलावा तीन अन्य बातों पर भी नजर रखना जरूरी है.

1) क्या आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं?

अगर कम पानी पीने से शरीर में पानी की कमी हो जाए तो ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। प्रशिक्षक व्यायाम के दौरान या बाद में बहुत अधिक पानी न पीने की सलाह देते हैं। हालाँकि, यदि आप पूरे दिन के दौरान इस समय को हटा दें, तो आप उतना पानी का सेवन कर सकते हैं जितना आपको करना चाहिए। अगर आप पानी की जगह इलेक्ट्रोलाइट्स पी सकते हैं तो यह अधिक फायदेमंद है।

2) अधिक कैफीन युक्त पेय पदार्थ पीना

सुबह जल्दी उठें और जिम जाएं। इसके बाद वह ऑफिस चला गया और घूमने लगा। इस कंपकंपी के अहसास से छुटकारा पाने के लिए आपको कॉफी कप को बार-बार पीना होगा। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि बहुत अधिक कैफीनयुक्त पेय पीने से शरीर में निर्जलीकरण हो सकता है। शरीर में पानी की कमी होने पर भी कंपकंपी हो सकती है।

3) अगर ब्लड शुगर लेवल कम हो जाए

नियमित रूप से रक्त शर्करा के स्तर की जांच किए बिना कम खाना। अत्यधिक व्यायाम करना। डॉक्टरों का कहना है कि अगर ब्लड शुगर लेवल अचानक गिर जाए तो इससे झटके आ सकते हैं।

कोई भी ब्रेकअप सुखद नहीं है! ‘लोग अकेले नहीं रह सकते’, तीसरी शादी पर शाकिब खान ने और क्या कहा?

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‘देश के संकट में स्वाभाविक है कि आम लोग विरोध और प्रदर्शन करेंगे’, शाकिब खान अपनी निजी जिंदगी से लेकर बांग्लादेश में हो रहे बदलावों के बारे में बात करते हैं. बांग्लादेश में वह बड़े पर्दे के ‘किंग’ हैं, दर्शक उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं। ‘तूफ़ान’ की रिलीज़ के बाद उस देश में पृष्ठभूमि बदल गई। 23 दिनों का जन आंदोलन, जिसके बाद एक नए बांग्लादेश का उदय हुआ। इतने बदले हालात के बाद कैसे हैं शाकिब खान? अभिनेता अपू-बुबली से लेकर तीसरी शादी की अफवाहों तक हर बात पर खुलकर बोलते हैं।

प्रश्न: बांग्लादेश की बदलती स्थिति में अब आप कैसे हैं?

शाकिब: मैं बिल्कुल ठीक हूं. मुझे कोई समस्या नहीं है. मैं एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति हूं. हमेशा देश और उसके लोगों के लिए.

सवाल: बांग्लादेश में शाकिब का दूसरा नाम ‘किंग खान’ है, भारत में शाहरुख खान को इसी नाम से बुलाया जाता है. क्या आप उनमें और अपने आप में कोई समानता पाते हैं?

शाकिब: शाहरुख खान एक अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार हैं। वह एशियाई महाद्वीप के सितारों के लिए प्रेरणा का दूसरा नाम हैं। मुझे लगता है कि वह न केवल भारत बल्कि पूरे महाद्वीप का गौरव हैं।’ उनसे तुलना का तो सवाल ही नहीं उठता, मैंने कभी इस बारे में सोचा भी नहीं. लेकिन लोग मुझे कुछ-कुछ उसकी तरह प्यार करते हैं; शायद यही समानता मिल जाये. यह एक अच्छी जगह है. प्रश्न: आपकी आने वाली फिल्म दराद में आपने हिंदी फिल्म की नायिका सोनल चौहान के साथ काम किया है। उनके साथ काम करते समय कोई भाषाई समस्या हुई?

शाकिब: बांग्ला-हिंदी में कई शब्द समान हैं। इसलिए आपसी समझ में कोई गति नहीं थी. इसके अलावा, आज की दुनिया में भाषा कोई बाधा नहीं है।

सवाल: एक हीरोइन के तौर पर आप सोनल को कितने अंक देंगे, आपको उसकी कौन सी खूबियां पसंद हैं?

शाकिब: सोनल बहुत सहयोगी रही हैं। खुद को तोड़कर नए तरीके से पेश करने की कोशिश की. शूटिंग के दौरान मैंने जो अटेंशन देखा, वह मुझे बहुत पसंद आया, काम करके बहुत खुशी हुई।’ मेरा मानना ​​है कि बांग्लादेश और भारत जहां भी फिल्म ‘दर्द’ दिखाई जाएगी, वहां दर्शकों को उनका काम पसंद आएगा.

प्रश्न: ‘तूफ़ान’ ने बांग्लादेश में लगभग एक रिकॉर्ड बना लिया है, लेकिन आपको क्यों लगता है कि यह कोलकाता में वह जादू नहीं कर सकी?

शाकिब: कोलकाता में व्यावसायिक फिल्म बाजार बहुत सुस्त है। जहाँ तक मैं देख सका, मैंने पूछा कि बड़े सितारे कितनी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोलकाता में मुख्यधारा का व्यावसायिक फिल्म बाजार कई वर्षों से अच्छा नहीं रहा है। ‘तूफान’ की सफलता सिर्फ बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया में सफल रही है। फिल्म की इस सफलता की शुरुआत पिछले साल ‘प्रियतमा’ के हाथ से हुई। ‘प्रियतमा’, ‘राजकुमार’, ‘तूफान’ जैसी सफल फिल्में – जो दुनिया के प्रमुख शहरों में रिलीज हुई हैं – सफल रही हैं। मैंने देखा है कि पूरी दुनिया में बांग्लादेशी फिल्म का बाजार तैयार हो गया है। स्टॉकहोम, डबलिन, पेरिस, मध्य पूर्व, उत्तरी अमेरिका के अलावा कई शहरों के सिनेमाघरों में बांग्लादेशी फिल्में हॉलीवुड फिल्मों के साथ रिलीज हो रही हैं। और सफल हो रहा हूँ. जो पहले अकल्पनीय था. लेकिन मैं ये सपना काफी समय से देख रहा था और अब ये सच हो गया है.

प्रश्न: बांग्लादेशी फिल्मों के गाने दोनों देशों के बीच एक आसान आवाजाही थे, उस समय ऐसा बदलाव आया था। फेसबुक पर भारत विरोधी टिप्पणियों के बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या इस तरह से फिल्म उद्योग में सुधार संभव है?

शाकिब: बांग्लादेश में हिल्सा मछली की अच्छी पैदावार हो रही है। हमारे क्रिकेटर खेलने जा रहे हैं, विभिन्न कूटनीतिक बातचीत भी चल रही है.’ पड़ोसी होने के नाते हमें एक-दूसरे के साथ सौहार्दपूर्ण रहना चाहिए।’ मैं इसे ऐसे ही देखता हूं। कुछ लोग इधर से कुछ कह रहे हैं, कुछ लोग उधर से बांग्लादेश के बारे में टिप्पणी कर रहे हैं! मानवीय भावना के स्थान पर मतभेद हो सकता है। और अगर कोई रिश्ता है तो टूट जाता है. कुछ दिनों के बाद यह फिर से ठीक हो गया। मैं इस बात को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नहीं हूं.’ यदि कोई समस्या है तो दोनों देशों के नीति निर्माता इसका समाधान निकालेंगे। मेरा मानना ​​है कि एशियाई होने के नाते हमें एकजुट होना चाहिए।

सवाल: इतने बड़े बदलाव का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, सिनेमाघरों में तोड़फोड़ हुई है, एक बड़े स्टार के तौर पर आप इस स्थिति को कैसे देखते हैं?

शाकिब: ऐसी घटना के बाद हालात सामान्य होने में समय लगता है. जब हमारे एक कलाकार की फिल्म पश्चिम बंगाल में रिलीज़ हुई, तो ओखानाका में इसे एक आंदोलन का सामना करना पड़ा। हर जगह कमोबेश बदलाव हो रहा है. यह स्वाभाविक है कि देश के संकट में सामान्य लोग विरोध-प्रदर्शन करेंगे।

आम लोग बहुत सी चीज़ें तोड़ देते हैं. वे फिर से बनाए गए हैं! जब कुछ नया आता है तो नई संभावनाएं बनती हैं। इसलिए सब कुछ फिर से ठीक होने के साथ, मुझे उम्मीद है कि हर कोई सामान्य स्थिति में वापस आ जाएगा और काम पर ध्यान केंद्रित करेगा। मुझे उम्मीद है कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री पहले से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ेगी।’

सवाल: आपकी निजी जिंदगी और वैसे भी शादी को लेकर काफी झगड़े हुए हैं, इससे शाकिब को कितना दुख होता है?

शाकिब: दर्द हुआ. कोई भी ब्रेकअप सुखद नहीं होता. जितना हुआ, शायद उतना ही होना था। ‘जीवन एक यात्रा है’ इस सफर में कई लोगों से मुलाकात और परिचय होता है. मेरी जिंदगी में दो (अपू-बुबली) लोग गुजर चुके हैं, यह मैं पहले भी कह चुका हूं।’ उन्हें अतीत में ही रहने दो. मुझे इस सब पर कोई पछतावा नहीं है. जो हुआ वह शायद अच्छे के लिए हुआ हो. मेरे दो बच्चे हैं, माता-पिता, बहन और उसका परिवार, कुछ करीबी लोग, मेरा व्यवसाय और देश-विदेश में अरबों प्यारे लोग, जो मुझे बहुत प्यार देते हैं; मैं उन सभी के साथ बहुत अच्छा हूं.

सवाल: सुनने में आया है कि शाकिब खान दोबारा शादी करेंगे, बार-बार किसी दुल्हन या डॉक्टर से! क्या आप कभी दोबारा शादी करेंगे?

शाकिब: लोग अकेले नहीं रह सकते. परिवार और समाज के साथ रहता है. आइए देखें, एक निश्चित वर्ष के भीतर शादी करने की कोई जल्दी नहीं है। अगर ऐसा कुछ होता है तो यह परिवार में होगा और शादी तक पहुंच जाएगा। चूँकि मेरे माता-पिता बूढ़े हैं, वे मुझे एक परिवार के रूप में देखना चाहते हैं।

मंधाना, हरमनप्रीत के अर्धशतकों की मदद से भारत ने श्रीलंका को 82 रन से हराकर महिला विश्व कप जीता

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भारत ने पाकिस्तान के बाद श्रीलंका को हराया. हरमनप्रीत कौरेरा बुधवार को 82 रन की बड़ी जीत के साथ महिला टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में बनी हुई हैं. महिला टी20 वर्ल्ड कप में भारत बचा हुआ है. उन्होंने पाकिस्तान के बाद श्रीलंका को हराया. भारत बुधवार को 82 रनों की बड़ी जीत के साथ विश्व कप सेमीफाइनल में बना हुआ है। इस जीत में दो भारतीय सितारों हरमनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना ने बड़ी भूमिका निभाई. दोनों ने बल्ले से अर्धशतक बनाया.

वर्ल्ड कप में भारत की जो हालत है, उसे देखते हुए हर मैच जीतना होगा. सिर्फ जीतना नहीं, बल्कि बड़े अंतर से जीतना. मंधाना को ये बात पता थी. इसीलिए दुबई में हरमनप्रीत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया. मंधाना और शेफाली वर्मा ने अच्छी शुरुआत की. मंधाना को पहले दो मैचों में रन नहीं मिला. उन्होंने इस मैच में जवाब दिया. भारत के दोनों ओपनर तेजी से रन बना रहे थे. उन्होंने 12.4 ओवर में 98 रन जोड़े। मंधाना ने 37 गेंदों पर अर्धशतक लगाया. इसके बाद वह बाहर भाग गया.

अगली गेंद पर शेफाली 43 रन बनाकर आउट हो गईं. हरमनप्रीत ने लगातार दो विकेट गंवाने के बावजूद भारत की रन गति धीमी नहीं होने दी. इस मैच ने दिखाया कि क्यों उन्हें अभी भी इस प्रारूप में सबसे विनाशकारी बल्लेबाजों में से एक माना जाता है। कप्तान ने महज 27 गेंदों पर 52 रनों की पारी खेली. उन्होंने आठ चौके और एक छक्का लगाया. उनके बल्ले से भारत ने 20 ओवर में 3 विकेट खोकर 172 रन बनाए. जवाब में श्रीलंका ने शुरुआत से ही विकेट गंवाने शुरू कर दिए. रेणुका सिंह ठाकुर ने अपनी दूसरी ही गेंद पर विकेट ले लिया. वह शुरुआत है. श्रीलंका को कप्तान चमारी अटापट्टू पर भरोसा था. वह भी केवल 1 रन बनाकर श्रेयांका पाटिल की गेंद पर आउट हो गए। जो काम रेणुका और श्रेयंका ने नई गेंद से शुरू किया उसे अरुंधति रेड्डी और आशा शोभना ने पूरा किया. उनके सामने कोई भी श्रीलंकाई बल्लेबाज टिक नहीं सका.

अंत में श्रीलंका की टीम 19.5 ओवर में 90 रन पर ऑलआउट हो गई. भारत 82 रन से जीता. इस जीत के परिणामस्वरूप, भारत अंक तालिका में न्यूजीलैंड और पाकिस्तान को पछाड़ते हुए सीधे दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। हरमनप्रीता एक बार फिर सेमीफाइनल की दौड़ में शामिल हो गई हैं। सेमीफाइनल अभी काफी दूर है. महिला टी20 वर्ल्ड कप में रविवार को भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया. हालांकि इसका हरमनप्रीत कौर को कोई फायदा नहीं हुआ. क्योंकि, वे नेट रन रेट में ज्यादा सुधार नहीं कर पाए. उनका वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंचना मुश्किल है.

वर्ल्ड कप में अपने पहले मैच में भारत न्यूजीलैंड से 58 रनों के बड़े अंतर से हार गया था. दूसरे मैच में उसने पाकिस्तान को 6 विकेट से हराया। लेकिन 106 रनों का पीछा करते हुए भारत ने 18.5 ओवर खेले. परिणामस्वरूप उनका नेट रन रेट अभी भी बहुत कम है। प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें नॉकआउट के लिए जाएंगी। इसीलिए भारत पर दबाव ज़्यादा है.

भारत के ग्रुप में न्यूजीलैंड शीर्ष पर रहा. एक मैच खेलने पर उनके अंक 2 हैं। नेट रन रेट 2.900. ऑस्ट्रेलिया दूसरे नंबर पर है. उन्होंने एक मैच भी खेला और 2 अंक हासिल किए. नेट रन रेट 1.908। तीसरे नंबर पर पाकिस्तान है. दो मैच खेलने के बाद उनके अंक 2 हैं। नेट रन रेट 0.555। भारत चौथे नंबर पर है. उन्होंने दो मैच भी खेले और 2 अंक हासिल किए. हरमनप्रीत का नेट रन रेट -1.217 है. श्रीलंका ने दो मैच खेले और दोनों हारे। उनके अंक 0 हैं. नेट रन रेट -1.667.

ऐसे में भारत को सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए तीन नंबरों का मिलान करना होगा.

चित्र 1 – श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया को बचे हुए दो मैचों में हार का सामना करना पड़ेगा। तब भारत के अंक 6 हो जायेंगे. न्यूजीलैंड को भी बाकी तीन मैच जीतने होंगे. तो उनके अंक 8 हो जायेंगे. ऐसे में न्यूजीलैंड और भारत सेमीफाइनल में पहुंच जाएंगे.
नंबर 2 – अगर ऑस्ट्रेलिया अपने बचे हुए सभी मैच जीतता है तो उसके 8 अंक होंगे। उस स्थिति में वे भारत को भी खो देंगे। श्रीलंका को हराने पर भारत को 4 अंक मिलेंगे. ऐसे में भारत को उम्मीद करनी होगी कि श्रीलंका और पाकिस्तान न्यूजीलैंड को हरा दें. ऐसे में भारत और पाकिस्तान दोनों के 4 अंक होंगे. अगर नेट रन रेट अच्छा रहा तो भारत सेमीफाइनल में पहुंच जाएगा.

चित्र 3 – यदि भारत शेष दो मैचों में ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका को हरा देता है तो उसे 6 अंक मिलेंगे। अगर ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड और पाकिस्तान को दोबारा हरा देता है तो उसके भी 6 अंक हो जाएंगे. अगर न्यूजीलैंड पाकिस्तान और श्रीलंका को हरा देता है तो उसके भी 6 अंक हो जाएंगे. फिर इन तीन टीमों में से नेट रन रेट के आधार पर दो टीमें सेमीफाइनल में जाएंगी.

तीन में से दो मामलों में नेट रन रेट बड़ी भूमिका निभा सकता है. इसलिए भारत को न केवल जीतना होगा, बल्कि बड़े अंतर से जीतना होगा। हरमनप्रीत को पहले अपने बाकी दोनों मैच जीतने की कोशिश करनी होगी. तब स्थिति कुछ बेहतर होगी. ऐसे में भारत की अंतिम चार में जाने की संभावना बढ़ जाएगी.