Wednesday, March 18, 2026
Home Blog Page 535

एक देश और एक चुनाव के लिए सरकार ने क्या बनाया है प्लान?

आज हम आपको बताएंगे कि एक देश और एक चुनाव के लिए सरकार ने प्लान क्या बनाया है! केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर रामनाथ कोविंद पैनल की सिफारिशों को मंजूरी दे दी। इसका मकसद लोकसभा के साथ सभी राज्यों के विधानसभा और स्थानीय निकायों का चुनाव कराना है। लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है। इसे लागू करने के लिए सरकार को एक नहीं, बल्कि दो-दो संविधान संशोधन विधेयकों को पास कराना होगा जिसके तहत संविधान में कई बदलाव करने पड़ेंगे। खैर, कोविंद कमिटी की रिपोर्ट को कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब आगे क्या? ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लागू करने के लिए सरकार का आखिर प्लान क्या है? कैसे लागू होगा? आइए एक-एक बात समझते हैं। कोविंद पैनल की सिफारिशों को आगे बढ़ाने के लिए एक क्रियान्वयन समूह का गठन किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को कैबिनेट मीटिंग के बाद बताया कि यह समूह रिपोर्ट में दी गई सिफारिशों को लागू करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साथ चुनाव दो चरणों में लागू किए जाएंगे: पहला लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए और दूसरा आम चुनावों के 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकाय चुनावों के लिए।

सबसे पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे। इसके बाद दूसरे चरण में पंचायतों और नगर पालिकाओं के स्थानीय निकाय चुनाव आम चुनाव के 100 दिनों के भीतर कराए जाएंगे। सभी चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची होगी। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) राज्य चुनाव अधिकारियों की सलाह से मतदाता पहचान पत्र तैयार करेगा। केंद्र पूरे देश में इस बारे में विस्तृत चर्चा शुरू करेगा। पैनल की सिफारिशों को लागू करने के लिए एक क्रियान्वयन समूह का गठन किया जाएगा। वैष्णव ने कहा कि बड़ी संख्या में पार्टियों ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का समर्थन किया है और केंद्र अगले कुछ महीनों में इस पर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि कोविंद पैनल की सिफारिशों पर पूरे भारत में तमाम मंचों पर चर्चा की जाएगी।

कोविंद पैनल के मुताबिक जब संसद का सत्र होगा, तो इस कदम को अधिसूचित करने के लिए एक तारीख तय की जानी चाहिए। ⁠उस नियत तिथि के बाद होने वाले राज्य चुनावों से बनने वाली सभी विधानसभाएं केवल 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक की अवधि के लिए ही होंगी। इसका मतलब है कि बदलाव के लिए लोकसभा चुनाव के बाद एक तारीख तय की जाएगी। उस तारीख के बाद जिन राज्यों में चुनाव होंगे, उनका कार्यकाल आम चुनावों के साथ तालमेल बिठाने के लिए कम कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि 2024 और 2028 के बीच बनने वाली राज्य सरकारों का कार्यकाल 2029 के लोकसभा चुनावों तक ही होगा। उसके बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अपने आप एक साथ होंगे।

⁠मिसाल के तौर पर, एक राज्य जहां 2025 में चुनाव होना है, उसके पास चार साल के कार्यकाल वाली सरकार होगी जबकि 2027 में चुनाव कराने वाले राज्य में 2029 तक केवल दो साल के लिए सरकार होगी। जैसे बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं तो ‘ONOE’ लागू करने के लिए उसकी विधानसभा का कार्यकाल 2029 तक रहेगा यानी सिर्फ 4 साल का। इसी तरह 2027 में यूपी विधानसभा के चुनाव होने हैं तो उसके बाद बनने वाली सरकार सिर्फ 2 साल रहेगी। ऐसे ही अन्य राज्यों के मामले में भी होगा। फिर 2029 में लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्यों के विधानसभा का चुनाव भी मुमकिन हो सकेगा।

इस तरह बनी नई सरकार का कार्यकाल भी लोकसभा के पिछले पूर्ण कार्यकाल की शेष अवधि के लिए ही होगा और इस अवधि की समाप्ति सदन के विघटन के रूप में काम करेगी। इसे अभी जो उपचुनाव की प्रक्रिया होती है, उससे और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। किसी लोकसभा, विधानसभा या राज्यसभा की सीट के रिक्त हो जाने की स्थिति में उपचुनाव कराए जाते हैं। लेकिन उपचुनाव में जीतकर आए जनप्रतिनिधि का कार्यकाल लोकसभा या विधानसभा के बाकी बचे कार्यकाल जितना ही होता है। राज्यसभा की स्थिति में भी 6 साल का कार्यकाल पूरा होने में जितना समय बचा होता है, उतने समय के लिए ही उपचुनाव से जीते सांसद का कार्यकाल रहता है। बिल्कुल इसी तरह त्रिशंकु संसद या त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में चुनाव तो होंगे लेकिन जो सरकार बनेगी वह अगले आम चुनाव तक ही रहेगी। यानी अगर 2 साल बाद ही मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए तो अगली सरकार का अधिकतम कार्यकाल सिर्फ 3 साल होगा, न कि 5 साल।

दो संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के बाद, संसद अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन प्रक्रियाओं का पालन करेगी। चूंकि केवल संसद को ही लोकसभा और विधानसभा से संबंधित चुनाव कानूनों को बनाने का अधिकार है, इसलिए पहले संशोधन विधेयक को राज्यों से समर्थन की जरूरत नहीं होगी। लेकिन, स्थानीय निकायों में चुनाव से जुड़े मामले राज्य के अधीन हैं और इसके लिए दूसरे संशोधन विधेयक को देश के कम से कम आधे राज्यों द्वारा अनुमोदित किया जाना जरूरी होगा।

दूसरे संविधान संशोधन विधेयक को राज्यों से मंजूरी के बाद, और दोनों सदनों में निर्धारित बहुमत से पारित होने के बाद, विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के लिए जाएंगे। एक बार जब वह विधेयकों पर हस्ताक्षर कर देती हैं, तो वे कानून बन जाएंगे। इसके बाद, कार्यान्वयन समूह इन अधिनियमों के प्रावधानों के आधार पर इन बदलावों को अंजाम देगा। एकल मतदाता सूची और मतदाता पहचान पत्र के संबंध में प्रस्तावित कुछ बदलावों के लिए कम से कम आधे राज्यों से मंजूरी की जरूरत होगी। संविधान के अनुच्छेद 325 में एक नया उप-खंड सुझाएगा कि एक निर्वाचन क्षेत्र में सभी मतदान के लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहिए।

क्या पेजर बम जैसे आधुनिक हथियारों से बचना संभव हो पाएगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पेजर बम जैसे आधुनिक हथियारों से भविष्य में बचना संभव हो पाएगा या नहीं! लेबनान में हिजबुल्लाह के सदस्य मंगलवार तब चौंक गए जब उनके पेजर में विस्फोट हो गया। किसी की जेब में तो किसी के हाथ में ही पेजर विस्फोट हो गया। इस पेजर ब्लास्ट में 11 लोग मारे गए और हजारों घायल हैं। हिजबुल्लाह ने इसके पीछे इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है। बताया जा रहा है कि ये पेजर मूल रूप से हिजबुल्लाह के कम्युनिकेशन के लिए थे,लेकिन इजरायली एजेंसी ने इनको विस्फोटक में बदल दिया। हिजबुल्लाह के एक अधिकारी ने बताया कि इस घटना के पीछे इजराइल का हाथ है। हिजबुल्लाह के सदस्यों के पास जो नए पेजर थे, उनमें लिथियम बैटरी थी जो फट गई। लिथियम बैटरी जब अधिक गर्म होती है तो धुआं छोड़ती है, पिघलती है और यहां तक कि उसमें आग भी लग जाती है। हिजबुल्लाह के सदस्य पेजर का इस्तेमाल खास नजर से बचने के लिए कर रहे थे। भारत में 90 के दशक में पेजर का इस्तेमाल होता था लेकिन कुछ ही साल बाद यह पूरी तरह चलन से बाहर हो गया। अब सवाल यह भी है कि क्या ऐसे हमलों से बचा जा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इन पेजर को इस साल अप्रैल-मई के महीने में ताइवान से लेबनान भेजा गया था। ऐसे में इस बात की पूरी गुंजाइश है कि इसकी तैयारी कई महीने पहले ही कर ली गई थी। जिन पेजर में विस्फोट हुआ उनमें 3 ग्राम के करीब विस्फोटक लगा हुआ था। इसे पेजर में लगी बैटरी के बगल में विस्फोटक लगाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक दोपहर के वक्त इन पेजर्स पर एक संदेश आया और इस मैसेज ने पेजर में लगे विस्फोटक को एक्टिवेट कर दिया।

हिजबुल्लाह के सदस्यों को आपसी बातचीत के लिए मोबाइल फोन की जगह पेजर का इस्तेमाल करने को कहा गया था। मोबाइल से दूर रहने को कहा गया था और यह आशंका जाहिर की गई थी कि ऐसा करते हैं तो इजरायल उन्हें आसानी से निशाना बना सकता है। पेजर छोटा कम्युनिकेशन डिवाइस होता है जिनका इस्तेमाल मोबाइल फोन के आने से पहले एक दूसरे को मैसेज भेजने के लिए किया जाता था। आसान शब्दों में इसे समझें तो एसएमएस भेजने का एक उपकरण। पेजर पर कोई मैसेज आता है तो लाइट ब्लिंक होती है जिसके बाद यूजर को नए मैसेज के बारे में पता चलता है।

पेजर के अंदर एक छोटा विस्फोटक लगाकर दूर से ही एक्टिवेट किया गया। यह एक्टिवेशन किसी रेडियो सिग्नल के जरिए भी किया जा सकता है। एक बार जब विस्फोटक को एक्टिवेट किया जाता है तो यह एक शक्तिशाली विस्फोट पैदा करता है जो पेजर और आसपास की चीजों को नष्ट कर देता है। पेजर बम के इस्तेमाल के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहले इसका इस्तेमाल टारगेट किलिंग के लिए किया जा सकता है। यह एक बेहद खतरनाक तरीका है क्योंकि जिसे टारगेट किया गया उसे पता भी नहीं चल पाता कि उसे मारा कैसे गया। दूसरे, इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर विध्वंस के लिए भी किया जा सकता है। कई पेजर बमों को एक साथ रखकर किसी बिल्डिंग को भी उड़ाया जा सकता है।

पेजर विस्फोट या इस प्रकार के ब्लासट से जुड़े कई खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि इसका पता लगाना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि यह एक छोटे से डिवाइस के अंदर छिपा होता है, इसलिए इसे पहचान पाना लगभग नामुमकिन है। दूसरा खतरा यह है कि इसे अनजाने में एक्टिवेट किया जा सकता है। अगर किसी को यह पता न चले कि पेजर में विस्फोटक लगा है, तो वह इसे अनजाने में एक्टिवेट कर सकता है, जिससे एक विस्फोट हो सकता है। मेटल डिटेक्टर में आसानी से पकड़ में नहीं आता। लेबनान में इन हमलों की खबरों के बाद इस तरह के हमलों की आशंका बढ़ गई है।

बता दे कि लेबनान में हुए हमलों का आरोप इजरायल पर है। ये अटैक उस ओर इशारा करते हैं कि एआई के दौर में यह और कितना खतरनाक हो सकता है। ऐसे अटैक हो सकते हैं जिनकी कल्पना भी जल्द नहीं की जा सकती। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को छूने से भी इस वक्त लेबनान में लोग डर रहे हैं।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दखल हर फील्ड में बढ़ता जा रहा है। जरूरी नहीं कि किसी देश पर हमला करने के लिए मिसाइल या तोप का इस्तेमाल हो। मानव इतिहास में युद्ध का एक अंधकारमय अध्याय रहा है। सदियों से मनुष्य ने अधिक शक्तिशाली हथियार बनाने में अपना समय लगाया है। तलवार और धनुष से लेकर तोप और मिसाइल तक, युद्ध के तरीके लगातार विकसित होते रहे हैं। लेकिन अब, एक नई तकनीक ने युद्ध के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है वह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मशीनों को इंसानों की तरह सोचने और सीखने की क्षमता प्रदान करती है। AI का उपयोग अब युद्ध में कई तरह से किया जा रहा है, जैसे कि ड्रोन, साइबर युद्ध, लॉजिस्टिक्स और युद्ध सिमुलेशन। ये हथियार बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपने टारगेट को पहचान उन पर हमला कर सकते हैं। AI से लैस ड्रोन अब युद्ध के मैदान में निगरानी, हमला और तलाशी जैसे कई काम कर सकते हैं। AI युद्ध के कुछ फायदे भी हैं और कुछ नुकसान भी। AI से लैस हथियार अधिक सटीक माने जा रहे हैं। आम नागरिकों के हताहत होने की संभावना कम होती है। AI से लैस सिस्टम बहुत तेजी से फैसले ले सकते हैं। लेकिन, इनके गलत हाथों में जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। AI युद्ध के नैतिक पहलुओं के बारे में कई सवाल उठते हैं, जैसे कि एक मशीन को किसी इंसान को मारने का फैसला लेने देना कितना उचित है।

AI युद्ध के भविष्य को पूरी तरह से बदल सकता है। AI से लैस रोबोट और ड्रोन युद्ध के मैदान में आम हो सकते हैं। साइबर युद्ध एक प्रमुख युद्ध का मैदान बन सकता है। AI युद्ध को अधिक मुश्किल और अप्रत्याशित बना सकता है। एआई से युद्ध के तरीके भी बदले हैं। एआई से संचालित ड्रोन और रोबोट अब आम होते जा रहे हैं। एआई डेटा का विश्लेषण करके दुश्मन की गतिविधियों का पूर्वानुमान लगा सकता है और रणनीति बनाने में मदद कर सकता है। साइबर हमले अब युद्ध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं और एआई का उपयोग इन हमलों का पता लगाने और उनसे बचाव के लिए किया जा रहा है।

आखिर लेबनान में कैसे हुआ पेजर अटैक?

आज हम आपको बताएंगे कि लेबनान में पेजर अटैक आखिर कैसे हुआ लेबनान में हिज्बुल्लाह के सदस्यों के पेजर में हुए विस्फोट हुआ। लेबनान के पेजर विस्फोटों का भारत में जन्मे नॉर्वेजियन नागरिक से कनेक्शन सामने आया है। केरल के वायनाड के इस शख्स ने नॉर्वे जाने से पहले थोड़े समय के लिए धर्मगुरु बनने की ट्रेनिंग ली थी, अब उनका नाम लेबनान में हुए पेजर विस्फोटों में सामने आया है। यह विस्फोट हिज़्बुल्लाह लड़ाकों को निशाना बनाकर किए गए थे जिसमें 12 लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। वायनाड के 37 साल के रिंसन जोस अब नॉर्वे का नागरिक है। रिंसन पर सोफिया, बुल्गारिया स्थित नॉर्टा ग्लोबल लिमिटेड कंपनी का मालिक होने का आरोप है। अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां इस कंपनी की जांच कर रही हैं क्योंकि ऐसी खबरें हैं कि इसने सैकड़ों पेजर बेचे हैं। केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और केरल पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने शुक्रवार को वायनाड के मानंतवाड़ी के पास रिंसन के पैतृक गांव ओंडायांगडी से उसके बारे में जानकारी जुटाई। वायनाड के जिला पुलिस प्रमुख तापोश बसुमाथरी ने कहा कि पुलिस ने रिंसन के ठिकानों की जांच की है। उन्होंने बताया कि अब मीडिया में पहचान और परिवार की जानकारी आने के बाद पुलिस ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं।

परिवार के सूत्रों ने बताया कि रिंसन के पिता मोथेदाथ जोस और माता का नाम ग्रेसी है। वो पहले दर्जी का काम करते थे। लेकिन बाद में अपने जुड़वां भाई के साथ वो विदेश चले गए। उसका भाई अब यूके में काम करता है। उसकी बहन आयरलैंड में नर्स है। वह अपनी पत्नी के साथ नॉर्वे में रहता है और आखिरी बार नवंबर 2023 में घर आया था और जनवरी 2024 में वापस चला गया था। रिंसन के चाचा थानकाचन ने टीओआई को बताया, ‘रिंसन ने आखिरी बार तीन दिन पहले अपने परिवार से बात की थी। उसके बाद से वे उससे फोन पर संपर्क नहीं कर पाए हैं। हमने शुक्रवार को रिंसन की पत्नी को भी फोन करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। उसके बारे में मीडिया में आ रही खबरें हैरान करने वाली हैं, शायद उसे किसी ने इस मामले में फंसाया होगा।’

हंगेरियन मीडिया ने बताया कि नॉर्टा ग्लोबल ने पेजरों की बिक्री में मदद की थी। फर्म की वेबसाइट, जिसमें इसे कंसल्टिंग, टेक्नोलॉजी और पेमेंट इंटीग्रेशन, रिक्रूटमेंट और आउटसोर्सिंग पर मजबूत फोकस वाली एक एडवांस टेक्नोलॉजी कंपनी बताया जाता था, अब इसे हटा दिया गया है। हालांकि, बुल्गारिया की स्टेट एजेंसी फॉर नेशनल सिक्योरिटी ने कहा कि नॉर्टा ग्लोबल और उसके मालिक ने माल की बिक्री या खरीद से जुड़े किसी भी लेनदेन को अंजाम नहीं दिया है। जो कि टेरर फंडिंग के कानूनों में आता है। रॉयटर्स ने गुरुवार को बताया था कि नॉर्टा का बल्गेरियाई हेडक्वार्टर सोफिया के पास एक अपार्टमेंट बिल्डिंग में रजिस्टर था, जो लगभग 200 अन्य कंपनियों का भी घर था, लेकिन वहां नॉर्टा का कोई नामोनिशान नहीं था। रॉयटर्स ने कहा कि रिंसन ने फोन पर संपर्क करने पर पेजर पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और बल्गेरियाई व्यवसाय के बारे में पूछे जाने पर फोन काट दिया।

रिंसन के लिंक्डइन पेज के अनुसार, वह लगभग पांच साल से नॉर्वे में ओस्लो स्थित डीएन मीडिया समूह में काम कर रहे हैं और कई ब्रांडों/प्रकाशनों में डिजिटलीकरण, स्वचालन और विकास का नेतृत्व करने में शामिल थे। 2016 वो नॉर्टा कंपनी चला रहे हैं। रिंसन ने 2012 से 2015 तक ओस्लो मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की थी। प्रोफ़ाइल में यह भी दावा किया गया है कि वह सितंबर 2012 से एक वर्ष के लिए नॉर्वे के अंतर्राष्ट्रीय छात्र संघ के महासचिव थे।

ओंडायांगडी इलाके के निवासियों ने कहा कि वे रिंसन को एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में जानते थे, जबकि उसके हैरान परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्हें यकीन है कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया होगा। रिंसन के चाचा थानकाचन ने कहा कि रिंसन ने ओंडायांगडी स्कूल में पढ़ाई की, फिर एक साल के लिए एक मदरसा गया और बाद में वायनाड और बेंगलुरु में अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने बेंगलुरु के एक कॉल सेंटर में काम किया था और आगे की पढ़ाई के लिए नॉर्वे जाने से पहले 2010 में पांडिचेरी से एमबीए हासिल किया था। उन्होंने कहा कि उन्हें रिंसन के वहां एक कंपनी के मालिक होने के बारे में पता नहीं था। वह एक कंपनी में कर्मचारी था… परिवार इतना संपन्न नहीं है। अभी भी उसके माता-पिता घर पर ही सिलाई का काम करते हैं।

क्रिकेटरों के बाद मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन, अभ्यास से लेकर पेशे तक, कई पहल संगठन हैं

0

एमसीए ने यह सुनिश्चित करने के लिए पहल की है कि संगठन के साथ पंजीकृत सभी उम्र के क्रिकेटरों को अभ्यास और यात्रा में किसी भी समस्या का सामना न करना पड़े। साथ ही शैक्षणिक योग्यता के अनुसार नौकरी की व्यवस्था भी की जायेगी. मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (एमसीए) ने क्रिकेटरों के साथ खड़े होने की पहल की। एमसीए क्रिकेटरों के लिए ‘करियर फेयर’ और ‘इक्विपमेंट फेयर’ का आयोजन करने जा रहा है। यह निर्णय संगठन की शीर्ष परिषद की बैठक में लिया गया. जूनियर क्रिकेटरों के लिए भी विशेष पहल की गई है.

कई क्रिकेटर खेल के साथ-साथ पढ़ाई को भी महत्व देते हैं। शैक्षिक योग्यता के बावजूद उचित नौकरी नहीं मिल रही है। खेलों को महत्व देते हुए कई बार नौकरी की परीक्षा की तैयारी ठीक से नहीं हो पाती या अवसर चूक जाते हैं। एमसीए अधिकारियों ने उन क्रिकेटरों के साथ खड़े होने का फैसला किया है। विभिन्न भर्ती एजेंसियों को आमंत्रित किया जाएगा। संगठनों के प्रतिनिधि क्रिकेटरों में से अपनी आवश्यकता के अनुसार स्टाफ का चयन कर सकते हैं। क्रिकेटरों को उनकी शैक्षणिक योग्यता के मुताबिक काम करने का मौका मिलेगा.

“उपकरण मेला” का आयोजन किया जायेगा। एमसीए अधिकारी खेल उपकरण निर्माताओं को भी आमंत्रित करना चाहते हैं। क्रिकेटरों को कंपनियों से सीधे जरूरी उपकरण खरीदने का मौका मिलेगा. इससे क्रिकेटरों को काफी कम खर्च आएगा। क्रिकेटर उपकरण उसी कीमत पर खरीद सकते हैं जिस कीमत पर कंपनियां उन्हें बेचती हैं।

एमसीए के अध्यक्ष अजिंक्य नाइक ने अखिल भारतीय अंग्रेजी प्रेस को बताया, “एमसीए एक करियर मेला आयोजित करने जा रहा है। विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के प्रमुख आएंगे। हमारे संगठन में पंजीकृत क्रिकेटर उनसे सीधे बात कर सकते हैं। योग्यता और पसंद के अनुसार काम कर सकते हैं। पूर्व क्रिकेटरों को भी हिस्सा लेने का मौका मिलेगा. हम क्रिकेटरों को क्रिकेट के बाहर करियर बनाने में मदद करना चाहते हैं। इसके अलावा, हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि क्रिकेटरों को सही कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाले खेल उपकरण मिले।” लोकल ट्रेन से अभ्यास के लिए मुंबई आने वाले क्रिकेटरों को प्रथम श्रेणी पास प्रदान किया जाएगा। क्रिकेट सीजन के बाद कैंप में बुलाए जाने वालों को विशेष भत्ता मिलेगा। इसके अलावा टाइम्स शील्ड और एमसीए कॉरपोरेट ट्रॉफी में भाग लेने वाली सभी टीमों को मैच के दिन का जरूरी खर्च भी संस्था की ओर से दिया जाएगा।

रणजी ट्रॉफी नॉकआउट में पहुंचने के लिए मुंबई के खिलाफ जीत बेहद जरूरी थी। मैच घरेलू मैदान पर होने के कारण बंगाल को अतिरिक्त फायदा हुआ। अजिंक्य रहाणे जैसा बल्लेबाज नहीं होने से काम थोड़ा आसान हो गया। लेकिन इस अहम मुकाबले में बंगाल की बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग इतनी शांत रही कि मुंबई ने आसानी से मैच जीत लिया. आपको बोनस अंक भी मिल सकते हैं.

मुंबई ने पहली पारी में 412 रन बनाए. बंगाल के गेंदबाजों को लाइन, लेंथ से दिक्कत थी. मनोज तिवारी का प्लान दूसरे दिन की सुबह मुंबई को जल्दी आउट करने का था. लेकिन बंगाल के सूरज सिंधु जयसवाल के अलावा कोई भी गेंदबाज विकेट लेता नजर नहीं आया. ईशान पोडेलेरा ने ऑफ स्टंप के बाहर गेंद डाली. मुंबई के ग्यारहवें नंबर पर उतरे रॉयस्टन डायस ने विकेट छोड़ने के बावजूद रन बनाए। यह गेंदबाज 46 रन बनाकर नाबाद है. बंगाल बल्लेबाजी करने में विफल रहा. अनुष्टुप मजूमदार 108 रन बनाकर नाबाद रहे। बाकी खिलाड़ियों में कप्तान मनोज ने 36 रन बनाए। बाकी कोई भी बल्लेबाज 20 रन का आंकड़ा पार नहीं कर सका. बल्लेबाजों की विफलता के कारण बंगाल की पारी 199 रन पर समाप्त हुई। दूसरे दिन का खेल वहीं ख़त्म हो गया. तीसरी सुबह मुंबई ने बंगाल को फॉलो किया। दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने उतरे बंगाल के बल्लेबाज भी अपनी गलतियों को सुधारते नजर नहीं आए. सौरव पाल (25) और श्रेयांश घोष (5) ने मुंबई के फील्डरों को कैचिंग प्रैक्टिस कराई. सुदीप घरामी ने 20 रन बनाए. बंगाल की पारी संभालने की उम्मीद मनोज और अनुष्टुप थे। लेकिन उनके लिए हर पारी में रन बनाना मुश्किल होता है. अनुष्टुप 14 रन बनाकर बोल्ड हो गए. लंच ब्रेक तक बंगाल ने 4 विकेट खोकर 74 रन बनाए। वे अभी भी 139 रन से पीछे हैं. बंगाल को पारी में हार का डर है.

बंगाल बल्लेबाजी करने में विफल रहा. अनुष्टुप मजूमदार 108 रन बनाकर नाबाद रहे। बाकी खिलाड़ियों में कप्तान मनोज ने 36 रन बनाए। बाकी कोई भी बल्लेबाज 20 रन का आंकड़ा पार नहीं कर सका. बल्लेबाजों की विफलता के कारण बंगाल की पारी 199 रन पर समाप्त हुई। दूसरे दिन का खेल वहीं ख़त्म हो गया. तीसरी सुबह मुंबई ने बंगाल को फॉलो किया।

इजरायली हमले में लेबनान में मृतकों की संख्या 500 पहुंची, हिजबुल्लाह ने भी 200 रॉकेट से जवाब दिया.

0

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि महिलाओं और बच्चों सहित 492 लोगों की मौत हो गई है। घायलों की संख्या 1,645 है. हिजबुल्लाह ने दावा किया कि हमला उत्तरी इज़राइल को निशाना बनाकर किया गया था। इजरायली हमलों में लेबनान में एक दिन में सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। उस देश की मीडिया के अनुसार, सोमवार के हमले में लगभग 500 लोग मारे गए। हालांकि, लेबनान का हिजबुल्लाह ग्रुप भी जवाबी हमला कर रहा है. उन्होंने दावा किया कि इजरायली सैन्य ठिकानों पर 200 रॉकेट दागे गए. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इस हमले में कोई हताहत हुआ या नहीं. इस संबंध में इजराइल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि महिलाओं और बच्चों सहित 492 लोगों की मौत हो गई है। घायलों की संख्या 1,645 है. हिजबुल्लाह ने दावा किया कि हमला उत्तरी इज़राइल को निशाना बनाकर किया गया था। ये हमले हाइफ़ा, अफुला और नाज़रेथ जैसी जगहों पर पूरी रात किए गए। हालाँकि, इज़राइल का जवाबी दावा यह है कि हिजबुल्लाह द्वारा दागे गए अधिकांश रॉकेटों ने आकाश में उनके ‘आयरन डोम’ को नष्ट कर दिया है।

हालांकि, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने चेतावनी दी है कि अगर हिजबुल्लाह ने हमले बंद नहीं किए तो आने वाले दिनों में उन पर और ताकत से हमला किया जाएगा. इजरायली सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हरजी हलेवी ने कहा कि लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ लड़ाई में अगले कदम की तैयारी की जा रही है। लेकिन उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगला कदम और भी भयावह होने वाला है.

सोमवार को इजराइली सेना ने लेबनान की राजधानी बेरूत के निवासियों को जल्द से जल्द शहर छोड़कर कहीं और शरण लेने की चेतावनी दी. इतना ही नहीं, उन्हें हिजबुल्लाह से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. यह संदेश मिलने के बाद बेरूत के निवासी अन्यत्र भागने लगे। यह चेतावनी देने के बाद इजराइल ने एक के बाद एक बमबारी शुरू कर दी.

इजराइल पिछले 11 महीने से हिजबुल्लाह से लड़ रहा है. उस देश पर फ़िलिस्तीनी उग्रवादी समूह हमास ने हमला किया था। हिजबुल्लाह ने भी उनका समर्थन किया. तभी से विवाद शुरू हो गया. इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है. लेबनान और इज़राइल पिछले कुछ महीनों से संघर्ष के दौरान एक-दूसरे को लगातार चेतावनी दे रहे हैं। हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि जिस तरह से इजराइल उन पर हमला कर रहा है, उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा. इजराइल का दावा है कि वह हिजबुल्लाह को खत्म कर देगा. इजराइल ने रविवार सुबह से लेबनान पर हमले तेज कर दिए हैं. देश के दक्षिणी हिस्से में एक के बाद एक हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले किए जा रहे हैं. मिसाइल हमले भी तेज़ कर दिए गए हैं. इजराइल का दावा है कि हिजबुल्लाह के 290 ठिकानों को नष्ट कर दिया गया है. हालाँकि इज़रायली के दावे को हिज़्बुल्लाह के प्रतिदावे ने खारिज कर दिया, लेकिन इज़रायली सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया और उन्हें नष्ट कर दिया गया।

दावे-प्रतिदावे के बीच दोनों पक्षों के बीच तनातनी तेज हो गई. हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि जिस तरह से इजराइल उन पर हमला कर रहा है, उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा. हिजबुल्लाह ने यह भी दावा किया कि वे इजरायली सेना के ठिकानों और हवाई अड्डों को निशाना बनाकर मिसाइल हमले भी कर रहे हैं। हालांकि, इजराइल ने चेतावनी दी है कि हिजबुल्लाह को जड़ से उखाड़ने के लिए यह अभियान जारी रहेगा।

दोनों पक्षों के बीच शनिवार से ही हमला जारी था. रविवार को हमला और तेज हो गया. इज़रायल का दावा है कि उनके हवाई हमलों में कई हिज़्बुल्लाह कमांडर मारे गए। लेबनानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बेरूत में इजरायली हवाई हमले में 37 लोग मारे गए। हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि जब तक इसराइल फ़िलिस्तीन पर हमला करना बंद नहीं करता, तब तक वे इसराइल पर हमला करते रहेंगे।

दोनों पक्षों के बीच नए सिरे से हुई झड़पों के कारण इज़राइल-लेबनान सीमा क्षेत्र के लगभग 10,000 निवासियों ने अपने घर छोड़ दिए हैं और कहीं और शरण मांगी है। इजरायली सेना के मुताबिक, गुरुवार दोपहर के बाद दक्षिणी लेबनान में कम से कम 100 रॉकेट लॉन्चरों पर युद्धक विमानों की मदद से हमला किया गया. इज़राइल का दावा है कि हिजबुल्लाह ने उन रॉकेट लॉन्चरों से उनके देश में कम से कम 1,000 मिसाइलें लॉन्च करने की योजना बनाई थी।

अरबों रुपये का नुकसान, डूब रहे थे सलमान! सलमान को डूबने से किसने बचाया?

0

उस वक्त एक के बाद एक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो रही थीं. भाईजान डूबने से कैसे बचे, इसकी बी-टाउन में खूब चर्चा हो रही है। आज वह बॉलीवुड के चचेरे भाई हैं। जब उनकी फिल्म दिवाली या ईद पर रिलीज होती है तो फैंस सिनेमाघरों को कंसार-घंटियों से भर देते हैं। फैंस पूरे साल उन्हें बड़े पर्दे पर देखने का इंतजार करते हैं। लेकिन एक समय सलमान खान का करियर डूब रहा था. एक के बाद एक फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो रही थी. उस वक्त आई बाढ़ से भाईजान कैसे बचे, इसकी भी बी-टाउन में खूब चर्चा होती है।

यह अवधि 2004 से 2006 के बीच की है. इस दौरान ‘गारब: प्राइड एंड ऑनर’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘फिर मिलेंगे’, ‘दिल ने जिसे अपना कान्हा’, ‘लकी: टाइम फॉर लव’ रिलीज हुईं। सलमान की ये फिल्में उस वक्त बॉक्स ऑफिस पर बिल्कुल भी रिस्पॉन्स नहीं दे पाईं। करीना कपूर के साथ ‘कियू की’ और प्रियंका चोपड़ा के साथ ‘सलामे इश्क’ भी असफल रहीं। यह सलमान के करियर का सबसे कठिन दौर माना जाता है। लाखों रुपये का नुकसान हो रहा था. भाईजान टूट गये. इसके बाद उसके हाथ एक तस्वीर आती है, जो उसकी जिंदगी फिर से बदल देती है.

सलमान ने 2007 में फिल्म ‘पार्टनर’ में काम किया था। फिल्म में गोविंदा, लारा दत्त और कैटरीना कैफ भी थे। इस फिल्म में सलमान एक लव काउंसलर की भूमिका में नजर आये थे. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया. यहां तक ​​कि, इसे समीक्षकों द्वारा भी सराहा गया। ‘पार्टनर’ 28 करोड़ रुपए में बनी थी। लेकिन उस वक्त बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने 100.91 करोड़ रुपये का बिजनेस किया था. कहा जाता है कि इस फिल्म ने सलमान के करियर में संजीवनी की तरह काम किया था. सिर्फ तस्वीरें नहीं. फिल्म का गाना भी हिट रहा.

ऐश्वर्या राय बच्चन ने गुपचुप तरीके से की सलमान खान से शादी! एक समय इन दोनों सितारों का रिश्ता बॉलीवुड में चर्चा के केंद्र में था। 1999 में फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ की शूटिंग से सलमान और ऐश्वर्या का प्यार शुरू हुआ। इसके बाद ये खबर फैल गई कि इस स्टार जोड़ी ने गुपचुप तरीके से शादी कर ली है. यहां तक ​​कि ऐश्वर्या के धर्म परिवर्तन की भी चर्चा बी-टाउन में हुई थी.

लोनावला के आलीशान बंगले में हुई सलमान और ऐश्वर्या की शादी की धूम मची हुई है. करीबी परिवार और दोस्त मौजूद थे। लेकिन पूर्व ब्यूटी क्वीन के माता-पिता इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं थे. इसलिए वे इस शादी से नदारद रहे. शादी ख़त्म नहीं होती. खबर ये भी थी कि सलमान और ऐश्वर्या न्यूयॉर्क में हनीमून पर गए थे. लेकिन इन घटनाओं की सच्चाई कभी सामने नहीं आई। सलमान और ऐश्वर्या की शादी की खबरें अफवाह बनकर रह गई हैं।

एक इंटरव्यू में जब ऐश्वर्या से इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने दावा किया कि यह सब झूठ है। अगर वह शादी कर लेंगी तो पूरी इंडस्ट्री को पता चल जाएगा।’ एक्ट्रेस ने किया दावा. ऐश्वर्या ने कहा, ”अगर उन्होंने शादी कर ली तो क्या पूरी इंडस्ट्री को खबर नहीं होगी? हमारा उद्योग बहुत छोटा है. मैं उस तरह का इंसान नहीं हूं जो शादी जैसी बड़ी चीज से इनकार कर दूंगा। जब मेरी शादी हुई तो मैं गर्व से अपने दूल्हे का परिचय पूरी दुनिया को दूंगी। उसके बिना शादी करने का समय ही कहाँ है? ये अफवाहें वाकई हास्यास्पद हैं।”

ऐश्वर्या और सलमान ने 2002 में अपना रिश्ता खत्म कर लिया। लेकिन वह अलगाव भी खूब चर्चा में रहा. अलग होने के बाद दोनों ने एक-दूसरे से मिलना लगभग बंद कर दिया। इसके बाद ऐश्वर्या और सलमान ने फिर कभी साथ काम नहीं किया।

वह पूर्व मिस वर्ल्ड हैं। यह अपनी खूबसूरती के लिए पूरी दुनिया में प्रचलित है। लेकिन उस खूबसूरती को लेकर एक बार ऐश्वर्या राय बच्चन पर भद्दे कमेंट्स किए गए थे। एक पुराने इंटरव्यू में एक्ट्रेस ने इसका साफ जवाब दिया था.

बच्चे को जन्म देने के बाद ऐश्वर्या का वजन बढ़ गया। देखते ही देखते ट्रोलिंग शुरू हो गई. 2011 में आराध्या ऐश्वर्या की गोद में आ गईं। 2015 में एक इंटरव्यू में एक्ट्रेस ने ‘बॉडी शेमिंग’ के बारे में बात की थी. ऐश्वर्या ने कहा कि इस तरह के कटाक्षों का उन पर कोई असर नहीं हो रहा है. अभिनेत्री ने कहा, ”मैं परेशान नहीं हूं. जैसा कि आमतौर पर हकीकत में होता है, मैं अपनी बेटी के साथ समय बिता रही थी। लेकिन लोगों को नाटक पसंद है. सामान्य विषय शायद पसंद नहीं आया होगा।”

घर पर अचानक आ गया कोई मेहमान? अंडे से आप स्वादिष्ट स्नैक्स रेसिपी बना सकते हैं

पहले के दिनों में किसी भी त्योहार पर कालापता खाने की प्रथा थी, चाहे वह पूजाबाड़ी हो या शादी समारोह। पूजा कार्य में केले के पत्तों का उपयोग भी बहुत पुराना है। लेकिन न केवल इस राज्य में, दक्षिणी लोग भी विभिन्न त्योहारों के दौरान कालापता पर भोजन परोसते हैं। यह प्रथा पर्यावरण के अनुकूल भी है। कोलकाता के पीज़ होटल में कालापाटा पर खाना परोसने का रिवाज हमेशा से रहा है। हाल ही में विभिन्न बंगाली रेस्तरां भी कालापाता में भोजन परोस रहे हैं। क्या केले के पत्तों पर खाना सिर्फ इसलिए परोसा जाता है क्योंकि यह अच्छा लगता है? या इसका स्वास्थ्य से कोई लेना-देना है?

1) रीति-रिवाजों, परंपराओं और पर्यावरण की रक्षा के अलावा केला खाने से कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं। अगर कांच, स्टील या प्लास्टिक की प्लेटों को ठीक से साफ न किया जाए तो बैक्टीरिया या वायरस खाने में फैल सकते हैं। लेकिन यदि आप केले के पत्तों पर खेलते हैं तो यह संभावना कम है। इसके अलावा, केले के पत्तों के रोगाणुरोधी गुण भोजन में मौजूद किसी भी हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने में भी मदद करते हैं।

2) इसके अलावा केले के पत्तों में विटामिन ए, विटामिन सी और एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं। गर्म भोजन को पत्तों पर रखने से भोजन की पौष्टिकता खराब नहीं होती, बल्कि उसका स्वाद बढ़ जाता है।

1) रीति-रिवाजों, परंपराओं और पर्यावरण की रक्षा के अलावा केला खाने से कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं। अगर कांच, स्टील या प्लास्टिक की प्लेटों को ठीक से साफ न किया जाए तो बैक्टीरिया या वायरस खाने में फैल सकते हैं। लेकिन यदि आप केले के पत्तों पर खेलते हैं तो यह संभावना कम है। इसके अलावा, केले के पत्तों के रोगाणुरोधी गुण भोजन में मौजूद किसी भी हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने में भी मदद करते हैं।

2) इसके अलावा केले के पत्तों में विटामिन ए, विटामिन सी और एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं। गर्म भोजन को पत्तों पर रखने से भोजन की पौष्टिकता खराब नहीं होती, बल्कि उसका स्वाद बढ़ जाता है।

3) कई लोग सोचते हैं कि जब गर्म खाना केले के पत्तों के संपर्क में आता है तो उसका स्वाद और गंध बदल जाता है। साधारण भोजन भी अमृत तुल्य हो जाता है। इसके अलावा केले के पत्ते खाने से पाचन क्रिया भी बेहतर होती है। केले के पत्तों में मौजूद पॉलीफेनोल्स शरीर में पाचन एंजाइमों के स्राव को बढ़ाते हैं।

4) प्लास्टिक या थर्मोकपल प्लेटें पर्यावरण के लिए कचरे के अलावा कुछ नहीं हैं। जब ऐसा कचरा मिट्टी या पानी में मिल जाता है तो यह पर्यावरण और पशु जीवन के लिए भी अच्छा नहीं है। उस दृष्टि से केले के पत्तों का उपयोग करना सुरक्षित है।

5) जब गर्म भोजन को थर्मोकपल या प्लास्टिक प्लेट पर रखा जाता है तो रासायनिक प्रतिक्रिया होना असामान्य बात नहीं है। लेकिन केले के पत्ते में गर्म खाना ज्यादा देर तक पड़ा रहने पर भी ऐसा कोई डर नहीं रहता.

चॉप्स, कटलेट, पकौड़े, कबिराजी – ये सभी स्वादिष्ट व्यंजन मानसून की शाम को मन को रोमांचित कर देते हैं। बहुत से लोग इसे अपने पसंदीदा स्टोर से कार्यालय में वापस लाते हैं। दोबारा ऑर्डर करने पर कुछ ही मिनटों में खाना आ गया. लेकिन जब अचानक मेहमान आ जाए तो परेशानी में पड़ना पड़ता है। कई लोगों को मेहमानों को रेस्टोरेंट का खाना परोसना पसंद नहीं आता. ऐसे में आप घर पर ही फटाफट कुछ बना सकते हैं. यह तब भी काम करेगा जब फ्रिज में मछली या मांस न हो। आप अंडे से एग फिंगर्स बना सकते हैं.

सामग्री:

5 अंडे

आधा कप कटा हुआ प्याज

1 कप बिस्किट पाउडर: 1 कप

2 चम्मच काली मिर्च पाउडर

2 बड़े चम्मच आटा

2 बड़े चम्मच कॉर्नफ्लोर

1 चम्मच चिली फ्लेक्स

नमक स्वाद अनुसार

सफेद तेल की मात्रा

तरीका:

सबसे पहले एक बाउल में अंडे फोड़ लें और उन्हें कटे हुए प्याज, नमक और काली मिर्च पाउडर के साथ अच्छी तरह फेंट लें। – इसके बाद एक गोल टिफिन पैन को तेल से ग्रीस कर लें और उसमें अंडे का यह मिश्रण डालें. – अब पैन में पानी भरकर उसमें डिब्बा रख दें और इसे ढककर धीमी आंच पर रखें. 25 मिनिट बाद गैस बंद कर दीजिये. जब यह ठंडा हो जाए तो डिब्बे का ढक्कन खोलकर चेक करें कि यह जम गया है या नहीं. यदि जम जाए तो लम्बाई में काट लें। इस बार दूसरे बाउल में बिस्किट पाउडर, नमक, काली मिर्च मिला लें. दूसरे कटोरे में दो अंडे फेंटें। इस बार उंगलियों को पहले अंडे के मिश्रण में डुबोएं और फिर ब्रेडक्रंब में फ्राई करें. कसुंदी और सलाद के साथ परोसने पर इसका स्वाद बहुत अच्छा लगेगा.

कब और कितना दूध देगा फायदा? वयस्कों और बच्चों की तुलना करें

सुबह जल्दी उठने से शरीर ही नहीं मन भी अच्छा रहता है। और इसका क्या फायदा है? दिनभर काम करने के बाद रात को दिमाग मोबाइल स्क्रीन पर चला जाता है। सोशल मीडिया, वेब सीरीज, नेटदुनिया का आकर्षण भी कुछ कम नहीं है। और जैसे ही मन उसमें डूबता है, नींद सुबह हो जाती है।

कई लोगों के लिए सुबह उठना मुश्किल हो जाता है। लेकिन, सुबह उठने के फायदे भी कम नहीं हैं!

मनोचिकित्सक शर्मिला सरकार कहती हैं, ”हमारे शरीर की अपनी घड़ी होती है। जो अंधकार और प्रकाश के साथ सामंजस्य रखता है। अगर उस घड़ी के साथ सामंजस्य की कमी हो तो शरीर खराब हो सकता है या शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।”

डॉक्टर के मुताबिक, सूर्यास्त के बाद जैसे-जैसे अंधेरा गहराता जाता है, शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है। यह हार्मोन नींद लाने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए अगर कोई रात को मोबाइल, लैपटॉप लेकर बैठा है तो उसे जल्दी नींद नहीं आएगी। डिवाइस स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन के रिलीज को प्रभावित करती है। मैं सोना नहीं चाहता.

लेकिन सुबह की रोशनी और हवा, प्रकृति की निकटता। क्या यह दिन के अन्य समय में फिट बैठता है? कुछ लाभ वास्तव में भोर के बिना उपलब्ध नहीं होते।

1. सुबह की रोशनी और हवा

सुबह की रोशनी और हवा अच्छी लगती है। इस समय हल्की धूप और ठंडी हवा बहुत आरामदायक होती है। जो दिन के अन्य समय में आसानी से उपलब्ध नहीं होता है। विटामिन डी संश्लेषण के लिए सूर्य का प्रकाश भी महत्वपूर्ण है।

2. प्रकृति

प्रकृति से निकटता मन पर प्रभाव डालती है। शर्मिला कहती हैं, ”ठंडी हवा में चलना अच्छा लगता है. आप काफी देर तक पैदल भी चल सकते हैं. लेकिन जब धूप तेज होती है तो चलना मुश्किल हो जाता है।

3. लोगों से निकटता

जिस तरह सुबह का खुला स्वभाव मानस को प्रभावित करता है, उसी तरह सुबह की सैर भी कई लोगों से मिलती है। दोस्ताना बातचीत से दिन की अच्छी शुरुआत हो सकती है।

4. प्राणायाम

सुबह उठकर शारीरिक व्यायाम और प्राणायाम करने से न सिर्फ शरीर बल्कि मन भी नियंत्रण में रहता है। प्राणायाम के अलावा योगाभ्यास से भी रोग नियंत्रित होते हैं। योग प्रशिक्षक इस समय को व्यायाम के लिए आदर्श मानते हैं।

5. नाश्ता

कई लोगों के पास नाश्ता करने का समय नहीं होता क्योंकि वे देर से उठते हैं। लेकिन नाश्ता करना ज़रूरी है. अगर आप सुबह उठते हैं तो खाना खिलाने में कोई रुकावट नहीं आती है.

पोषण विशेषज्ञ दूध को संतुलित खाद्य पदार्थों की सूची में रखते हैं। नवजात शिशुओं से लेकर बुजुर्गों तक, दूध सभी के लिए फायदेमंद है। जब तक आपको दूध से एलर्जी या दूध पीने के बाद सीने में जलन न हो। इस संबंध में पोषण विशेषज्ञ शंपा चक्रवर्ती ने कहा, ‘यह जानना जरूरी है कि आप कब और कितना दूध का सेवन कर रहे हैं। कई लोग सुबह दूध का सेवन करते हैं तो उसके बाद गले-सीने में जलन होने लगती है। जो लोग सीने में जलन से पीड़ित हैं, उनके लिए सुबह दूध न पीना ही बेहतर है। बल्कि रात को खाएं. ऐसे में ठंडा दूध पीना ज्यादा फायदेमंद रहेगा।” उनके अनुसार, बच्चों के लिए दोबारा दूध पीने का आदर्श समय सुबह का होता है। हालाँकि, रात को सोने से पहले दूध पीने से शरीर को अधिक कैल्शियम अवशोषित करने में मदद मिलती है क्योंकि अनिद्रा की समस्या दूर हो जाती है।

कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन, पोटैशियम, विटामिन डी से भरपूर दूध शरीर को तभी फायदा पहुंचाएगा जब इसका सेवन सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का ऐसा दावा है। इस मुद्दे पर वैज्ञानिक पत्रिका ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है। वैज्ञानिक वाल्टर विलेट के अनुसार यदि कोई वयस्क पुरुष या महिला प्रतिदिन एक माप दूध का सेवन करें तो उनके शरीर में पोषक तत्वों की कमी नहीं होगी और विभिन्न शारीरिक समस्याएं दूर रहेंगी। भारत जैसे देश में एक वयस्क महिला एक दिन में 2-3 कप दूध का सेवन कर सकती है, लेकिन उससे ज्यादा नहीं। वहीं एक आदमी 3-4 कप दूध पी सकता है. लेकिन अगर डेयरी उत्पाद, जैसे पनीर, छोले का भी सेवन किया जाए तो दिन में 2 कप से ज्यादा दूध का सेवन नहीं किया जा सकता है।

यह माप बच्चों के लिए अलग है. 12 से 24 महीने का बच्चा दिन में 2-3 कप दूध पी सकता है। 2 से 5 साल के बच्चे को एक दिन में दो से ढाई कप से ज्यादा दूध नहीं पीना चाहिए। 5 से 8 साल की उम्र के बच्चे भी दिन में ढाई कप दूध का सेवन कर सकते हैं। 9 साल से अधिक उम्र के बच्चे दिन में तीन कप तक दूध पी सकते हैं। गाय के दूध से एलर्जी होने पर पौधे के दूध का सेवन किया जा सकता है। यह दूध विभिन्न प्रकार के मेवे, जई, नारियल और सोयाबीन से प्राप्त किया जाता है। बादाम का दूध, नारियल का दूध, जई का दूध और सोया दूध सबसे प्रसिद्ध हैं। इस दूध को पशु दूध के विकल्प के रूप में चुना जा सकता है। लेकिन बच्चों को दूध देने से पहले यह जांच लें कि वे दूध पचा पा रहे हैं या नहीं। अगर दूध से जी मिचलाना या सीने में जलन हो तो दूध न पीना ही बेहतर है।

आखिर भारत क्यों आ रहे हैं मालदीव के राष्ट्रपति?

अब आने वाले समय में मालदीव के राष्ट्रपति भारत आने वाले हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या अब मालदीव के राष्ट्रपति का चीन से भरोसा उठ गया है और क्या वो अब भारत पर भरोसा करने लगे हैं? आज हम आपको इसी बारे में पूरी जानकारी देंगे!

आपको बता दें कि इस महीने मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत आ रहे हैं। इससे पहले भारत और मालदीव के बीच कुछ गलतफहमियां दूर हुई हैं। भारत ने मालदीव से अपने सैनिकों को वापस बुला लिया है। इससे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार आया है। भारत और मालदीव के रिश्ते पहले से बेहतर हुए हैं। भारत ने अपने सैन्य कर्मियों को वापस बुला लिया है। ये सैनिक भारत सरकार के राहत हेलीकॉप्टरों और विमानों का संचालन करते थे। इनकी जगह अब नागरिक कर्मचारी काम कर रहे हैं। इससे दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय दौरे फिर से शुरू हो गए हैं। मुइज्जू ने भारत से अपने सैनिकों को वापस बुलाने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि वह किसी भी देश को मालदीव की संप्रभुता में हस्तक्षेप करने या उसे कमजोर करने की अनुमति नहीं देंगे।

हालांकि, भारत और मालदीव के रिश्तों में आई नजदीकी चीन से दूरी बनाने की कीमत पर नहीं आई है। यह बात पिछले हफ्ते बीजिंग के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को बढ़ावा देने के लिए किए गए समझौते से साफ है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए बातचीत भी जारी है। श्रीलंका के दौरे पर, मालदीव के विदेश मंत्री मूसा जमीर ने भारत और चीन के साथ अपने देश के संबंधों के बारे में बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि मुइज्जू द्वारा भारतीय सैनिकों को वापस भेजने के प्रयासों के बाद भारत के साथ संबंधों में चुनौतियां आई थीं। एक मालदीवियन अखबार ने जमीर के हवाले से कहा, ‘हमारी सरकार की शुरुआत में, हमें (भारत के साथ) कुछ खट्टे-मीठे अनुभव हुए, आप जानते हैं।’ उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों की वापसी के बाद ये गलतफहमियां दूर हो गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन मुइज्जू के कार्यालय ने भारत यात्रा की घोषणा की, उसी दिन मालदीव के मीडिया ने यह भी बताया कि इस साल की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने वाले दो मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफा दे दिया है। जमीर ने कहा, ‘चीन और भारत दोनों के साथ हमारे अच्छे संबंध हैं और दोनों देश मालदीव का समर्थन करना जारी रखते हैं।’ उन्होंने ऐसे समय में दोनों देशों के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया, जब अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियां देश के आर्थिक हालातों के बारे में चेतावनी दे रही थीं।

जमीर ने कहा कि मालदीव की आईएमएफ की मदद लेने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने अपने देश के सामने मौजूदा आर्थिक चुनौतियों को अस्थायी बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, ‘हमारे द्विपक्षीय साझेदार हैं जो हमारी आवश्यकताओं और हमारी स्थिति के प्रति बहुत संवेदनशील हैं। मुझे नहीं लगता कि यह ऐसा समय है, जहां हम अभी आईएमएफ के साथ जुड़ेंगे। हमारे सामने जो समस्या है वह बहुत अस्थायी है क्योंकि वर्तमान में हमारे भंडार में गिरावट आई है।’ यानी सीधी सी बात यह है कि मालदीव अब भारत के साथ भी रिश्ते अच्छा बनाना चाहता है! यही नहीं मालदीव के मीडिया आउटलेट अधाधू के साथ रविवार को एक विशेष साक्षात्कार में राष्ट्रपति मुइज्जू ने कहा कि लोगों ने उन्हें वोट दिया क्योंकि वे उनकी विदेश नीति में भरोसा करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि देश को शांति, विकास और सुरक्षा की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार की विदेश नीति सभी देशों के साथ मिलकर काम करने की है और यहां अस्थिरता के लिए कोई जगह नहीं है।

जब मुइज्जू से पूछा गया कि क्यों वे इंडिया आउट प्रस्ताव को निरस्त करेंगे, तो राष्ट्रपति ने सीधे तौर पर कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, ‘मैंने अभी अपनी नीति, मालदीव सरकार की नीति बताई है। मैंने नीति को स्पष्ट कर दिया है।’ इस बीच इंडिया आउट आंदोलन के नेताओं में से एक पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने घोषणा की है कि अभियान जारी रहेगा, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं है कि भारतीय सैन्यकर्मी पूरी तरह से मालदीव से चले गए हैं। यामीन ने कहा है कि भारतीय सैन्य उपस्थिति का मुद्दा हल नहीं हुआ है और वे इंडिया आउट अभियान जारी रखेंगे। उन्होंने सत्ता में आने के बाद इंडिया आउट प्रस्ताव रद्द नहीं करने के लिए मुइज्जू सरकार पर हमला भी बोला। मुइज्जू की विपक्षी एमडीपी के अध्यक्ष और पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने कहा कि इंडिया आउट अभियान लोगों को धोखा देने के लिए बनाया गया है। उन्होंने अभियान चलाने के लिए मुइज्जू सरकार से माफी की मांग की।

क्या जम्मू कश्मीर में 370 की हो सकती है वापसी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जम्मू कश्मीर में कभी 370 की वापसी हो सकती है या नहीं! 5 अगस्त 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रभाव को खत्म कर दिया था। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करते हुए इसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट दिया। राज्य को दो हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था और दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। केंद्र के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 23 अर्जियां दी गईं। सुनवाई के बाद 5 जजों की बेंच ने दिसंबर 2023 में सरकार के फैसले को बरकरार रखा और अपनी सुप्रीम मुहर लगा दी। इस फैसले के बाद ऐसा लगा कि शायद इस पर राजनीति बंद हो जाए लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस फैसले के बाद भी आवाज उठी और 370 हटने के बाद जब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव पहली बार होने जा रहे हैं तब इसकी गूंज और जोर से सुनाई पड़ रही है। एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इसकी कभी वापसी नहीं होगी तो वहीं अब जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम रहे उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इसे हम दोबारा लागू करेंगे। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि क्या ऐसा संभव है। उससे पहले यह जान लेते हैं कि किसने क्या कहा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी का संकल्प पत्र एक दिन पहले जारी किया और कहा कि अनुच्छेद 370 अब इतिहास बन गया है और केंद्र शासित प्रदेश में इसकी कभी वापसी नहीं होगी। केंद्रीय गृह मंत्री ने भाजपा का घोषणापत्र जारी करने से पहले अपने संबोधन में कहा कि मैं नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के एजेंडे को जानता हूं। मैं पूरे देश को यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि अनुच्छेद 370 अब इतिहास बन चुका है और इसकी कभी वापसी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 अब संविधान का हिस्सा नहीं है। इस अनुच्छेद ने युवाओं के हाथों में सिर्फ हथियार और पत्थर दिए हैं और उन्हें आतंकवाद की ओर धकेला है।

अमित शाह के इस बयान को चुनौती देते हुए जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम रहे उमर अब्दुल्ला ने कहा कि हम चुनाव जीते तो अनुच्छेद 370 को दोबारा लागू करेंगे। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इसके लिए वक्त लगेगा, लेकिन यह होकर रहेगा। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को फिर जम्मू-कश्मीर में लागू करेंगे। यह ऐसी चीज है जिसके लिए हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते, हम इसके लिए सरेंडर नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी माना कि इसे दोबारा लागू करना इतना आसान नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि आप इसे अगले 5 साल में लागू कर देंगे। यह सत्य है कि इसमें समय लगेगा।

चुनाव के बीच यह बड़ा सवाल है कि क्या ऐसा संभव है। जिस 370 को हटाने में वर्षों लग गए क्या उसे इतनी आसानी से वापस लाया जा सकता है। जानकार बताते हैं कि न यह तब आसान था और अब तो दोबारा लागू करना और भी मुश्किल है। संविधान की गहरी समझ रखने वाले जानकारों ने बताया कि इसे दोबारा लागू करना लगभग असंभव है। केंद्र की मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह ने इसके लिए अच्छा खासा होमवर्क किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 5 अगस्त 2019 को सीओ 272 जारी किया। राष्ट्रपति का यह वह आदेश था जिसके जरिए संविधान के अनुच्छेद 367 को संशोधित किया गया। इसमें कहा गया कि अनुच्छेद 370 (3) में उल्लेखित संविधान सभा की जगह इसे विधानसभा कहा जाएगा। इससे ही 370 हटाने का रास्ता साफ हुआ।

राष्ट्रपति के इस आदेश के कुछ ही समय बाद राज्य सभा में यह पास हुआ कि अनुच्छेद 370 नहीं रहेगा। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि विधानसभा की शक्ति राज्यपाल में समाहित थी और देश की संसद राज्यपाल की ओर से कानून बना सकती थी। राष्ट्रपति ने सीओ 273 जारी किया जिसके माध्यम से 370 पर अमल न करने की संसद की सिफारिश को लागू कर दिया गया। जिसके बाद 370 हट गया। अब चुनाव के बीच दावे किए जा रहे हैं कि इसे वापस लाएंगे। क्या कोई केंद्र की सरकार ऐसा करना चाहे तो यह उसके लिए इतना आसान होगा। केंद्र की किसी भी सरकार को अनुच्छेद 368 के रास्ते आगे बढ़ना काफी काफी मुश्किल होगा। युवाओं के हाथों में सिर्फ हथियार और पत्थर दिए हैं और उन्हें आतंकवाद की ओर धकेला है।क्योंकि इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत और 50 प्रतिशत विधानसभाओं की मंजूरी चाहिए जो वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मुश्किल लगता है।