Tuesday, March 17, 2026
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विधानसभा चुनाव से पहले यूनिफाइड पेंशन स्कीम पर दाव खेलना कितना सही?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विधानसभा चुनाव से पहले यूनिफाइड पेंशन स्कीम पर दाव खेलना कितना सही है और कितना नहीं! लोकसभा चुनाव 2024 में 400 पार का सपना देखने वाली बीजेपी महज 240 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। बीजेपी को एनडीए के घटक दलों के सहयोग से केंद्र में सरकार बनानी पड़ी। लोकसभा चुनाव में भारी सीटों को नुकसान होते ही बीजेपी विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गई। लेकिन बीजेपी आगामी चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर काफी ऐक्टिव है, इस बार बीजेपी कोई मौका नहीं गंवाना चाहती। शायद यही वजह है मोदी सरकार ने चुनावों से ठीक पहले सरकारी कर्मचारियों को पेंशन का तोहफा दे दिया है।केंद्र सरकार ने कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना को यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) नाम दिया गया है। इस फैसले से सरकारी कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद सैलरी का 50% पेंशन के तौर पर मिलेगा। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने यह कदम एनपीएस को लेकर सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी को देखते हुए उठाया है। वहीं, सरकार का कहना है कि UPS, NPS का बेहतर वर्जन है।

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि यूनिफाइड पेंशन स्कीम सरकारी कर्मचारियों को राहत देने वाली है, यह स्कीम सरकारी कर्मचारियों की लंबे समय से चली आ रही पेंशन की मांग को ध्यान में रखकर लाई गई है। दरअसल इस साल हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में नई पेशन योजना को मंजूरी देकर बीजेपी ने सरकारी कर्मचारियों के वोट को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है। आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा चुनाव में सरकारी कर्मचारियों के पेंशन को लेकर गुस्से और विरोध के चलते बीजेपी को भारी मतों का नुकसान हुआ था। इस साल जिन राज्यों में चुनाव है। उन राज्यों में बीजेपी को मिले पोस्टल बैलेट (डाक मतपत्र) की संख्या 2019 के मुकाबले 2024 के लोकसभा चुनाव में कम हुई है। पोस्टल बैलेट की सुविधा वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग व्यक्तियों के अलावा आवश्यक सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों को दी जाती है, इसमें रक्षा बलों के कर्मी भी शामिल हैं।

हरियाणा में कांग्रेस को इस बार पोस्टल बैलेट में BJP से ज्यादा वोट मिले हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने BJP से 5 सीटें छीन लीं। इसके साथ ही पोस्टल बैलट में भी कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ा है। 2019 में BJP ने हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटें जीती थीं। उस समय पोस्टल बैलेट में BJP को 74% वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 16% वोट मिले थे। 2024 के चुनाव में BJP को 44.26% और कांग्रेस को 48.49% पोस्टल वोट मिले। 2019 में हरियाणा में कुल 53,689 पोस्टल बैलट पड़े थे। 2024 में यह संख्या घटकर 51,237 रह गई। हरियाणा में विधानसभा चुनाव 1 अक्टूबर को होने हैं।

जम्मू और कश्मीर में 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 2024 में बीजेपी को पोस्टल बैलेट में बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा है। 2019 में बीजेपी को 69% पोस्टल बैलेट मिले थे, जबकि कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन को सिर्फ 16% वोट मिले थे। 2024 में हुए चुनाव में पोस्टल बैलेट के आंकड़े बदल गए। इस बार कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन को 38.64% वोट मिले, जबकि बीजेपी को 33.26% वोट मिले। जम्मू और कश्मीर में 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को तीन चरणों में वोटिंग होनी है। 2019 में कुल 53,737 पोस्टल बैलेट डाले गए थे। 2019 में बीजेपी ने जम्मू की दोनों लोकसभा सीटें और लद्दाख की सीट जीती थी, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कश्मीर की तीनों सीटें जीती थीं। इस साल जम्मू और कश्मीर (बिना लद्दाख के) में कुल 42,867 पोस्टल बैलेट डाले गए। 2024 के चुनाव में बीजेपी ने जम्मू की अपनी दोनों लोकसभा सीटें बरकरार रखीं, जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस को दो सीटों से संतोष करना पड़ा। कश्मीर की तीसरी सीट एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती।

महाराष्ट्र में पोस्टल बैलेट के आंकड़े बता रहे हैं कि राजनीतिक समीकरण कैसे बदल रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना को पोस्टल बैलेट में बड़ी जीत मिली थी। लेकिन 2024 में महाविकास अघाड़ी आगे निकल गई। इसका मतलब साफ है, 2024 के चुनाव में मुकाबला कड़ा होने वाला है। 2019 में बीजेपी और शिवसेना को कुल 2.15 लाख पोस्टल वोटों में से 54.8% वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस और NCP को सिर्फ 30.15% वोट ही मिल पाए थे। लेकिन 2024 में तस्वीर बदल गई। इस बार महाविकास अघाड़ी ने पोस्टल बैलेट में 43.72% वोट हासिल किए, जबकि बीजेपी और उसके सहयोगियों को 39% वोट ही मिले। इस बदलाव के पीछे कई कारण हो सकते हैं। 2019 के बाद से महाराष्ट्र की राजनीति में काफी उथल-पुथल हुई है। शिवसेना में टूट हो गई और NCP भी दो गुटों में बंट गई। इन बदलावों का असर पोस्टल बैलेट के नतीजों पर साफ दिखाई दे रहा है।

झारखंड और हरियाणा में 2019 के लोकसभा चुनाव में पोस्टल बैलेट के नतीजे अलग-अलग रहे। झारखंड में बीजेपी गठबंधन को ज्यादा वोट मिले, जबकि हरियाणा में कांग्रेस गठबंधन आगे रहा। झारखंड में 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी और AJSU को कुल 38,553 पोस्टल बैलेट में से 57% वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस, JMM, RJD और CPI(ML) गठबंधन को 32.49% वोट मिले थे। इस चुनाव में NDA ने झारखंड की 14 में से 12 लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि विपक्ष को 2 सीटों पर जीत मिली थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा में पोस्टल बैलेट के नतीजे अलग थे। हरियाणा में डाले गए कुल 1.69 लाख पोस्टल बैलेट में से कांग्रेस गठबंधन को 47% वोट मिले, जबकि बीजेपी गठबंधन को 42% वोट मिले। दोनों राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

क्या बीजेपी के लिए कड़क रुख रखेगी विपक्ष?

आने वाले समय में विपक्ष अब हमेशा के लिए बीजेपी के लिए कड़क रुख अपनाएगी! आम चुनाव के नतीजों के बाद देश की राजनीति तेजी से बदली है। अनुमानों के इतर लोकसभा चुनाव में BJP लगातार तीसरी बार अकेले दम बहुमत पाने के लक्ष्य से दूर रही और एक बार फिर सही अर्थों में गठबंधन की सरकार का दौर शुरू हुआ। तब से केंद्र सरकार के भीतर एक के बाद कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए, जिससे गठबंधन सरकार की मजबूरी की बात सामने आई। उदाहरण के लिए, लैटरल एंट्री पर यूटर्न को ले लीजिए, या फिर वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में भेजे जाने की बात या पेंशन का मामला। इसी तरह से बजट में बिहार और आंध्र प्रदेश का खास ख्याल रखा गया। इन सब घटनाओं पर विपक्ष का यही कहना था कि यह BJP को बहुमत से कम, 240 लोकसभा सीटें मिलने का असर है। वहीं, BJP इसे रणनीति और सबको साथ लेकर चलने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति बता रही है। जानकारों के अनुसार, गठबंधन सरकार की स्वाभाविक मजबूरी होती है, लेकिन अभी तुरंत किसी राय को अंतिम मान लेना जल्दबाजी है।आम चुनाव परिणाम से उत्साहित विपक्ष, केंद्र सरकार और BJP पर दबाव बनाने का एक भी मौका नहीं छोड़ना चाहता। संसद से लेकर इसके बाहर तक, कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों में नई ऊर्जा दिखी। NEET का मुद्दा हो या जाति जनगणना, विपक्ष कहीं न कहीं सरकार पर दबाव बनाने में सफल रहा। इसमें बहुत हद तक उसे परोक्ष रूप से BJP के सहयोगी दलों का भी साथ मिल गया। मसलन वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को JPC में भेजने की मांग NDA के घटक दल TDP ने की। इसी तरह से, लैटरल एंट्री को लेकर विरोध के सुर नीतीश कुमार की पार्टी JDU और चिराग पासवान की ओर से उठे।

विपक्ष से जुड़े एक नेता का कहना है कि पिछले कुछ बरसों में पहली बार BJP दबाव में दिख रही है। ऐसे में अगर अब उन्होंने दबाव कम किया तो BJP फिर वापसी कर सकती है। जाहिर है, विपक्ष हमलावर बना रहेगा। हालांकि उसे पता है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार और BJP काउंटर अटैक करेगी। ऐसे में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव बेहद अहम हो जाते हैं। विपक्ष जानता है कि अगर इन राज्यों में परिणाम उसके पक्ष में आए तो BJP पर दबाव बनाना और आसान हो जाएगा। लेकिन, अगर BJP का प्रदर्शन बेहतर रहा, तो फिर विपक्ष के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल भरी हो जाएगी। यही वजह है कि विपक्ष इन चुनावों पर बहुत ध्यान दे रहा है।

BJP को विपक्ष कोई मौका नहीं देना चाहता। यही कारण है कि कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने बताया कि कांग्रेस इन चुनावी राज्यों में सहयोगी दलों से समझौता करने के लिए अपने हितों को दरकिनार करने को भी तैयार है। जम्मू-कश्मीर में पार्टी ने यही किया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुकाबले पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसी तरह से लोकसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस गठबंधन सहयोगियों के साथ सीट शेयरिंग में लचीला रुख दिखा रही है। इन मामलों पर जब पार्टी के भीतर से सवाल उठे, तो शीर्ष नेतृत्व ने यही तर्क दिया कि इन राज्यों में अगर विपक्ष को जीत मिलती है तो आने वाले समय में कांग्रेस को भी बहुत फायदा होगा और BJP का तेजी से पतन होगा।

BJP इस सियासी चर्चा को अधिक तूल नहीं देना चाहती। पार्टी का दावा है कि किसी मुद्दे पर न तो मोदी सरकार का स्टैंड बदला है और न ही काम करने के तरीके में बदलाव आया है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, पहले भी मोदी सरकार सहमति जुटाने की कोशिश करती थी। वे मिसाल देते हैं कि किस तरह किसान बिल को पूर्ण बहुमत की सरकार में वापस लिया गया और CAA पर भी सहमति बनाने की कोशिश हुई, जबकि BJP अकेले दम 300 सीटों के पार थी। जब भी जरूरत हुई, सरकार ने तमाम पक्षों को सुनकर हमेशा बदलाव का रुख दिखाया। BJP नेता 2015 में जमीन अधिग्रहण बिल को वापस लेने और GST में कई संशोधन करने जैसे फैसले भी दिखाते हैं।

BJP इस तर्क को भी खारिज करती रही है कि वह सहयोगियों के दबाव में है। पार्टी नेता पहले की मिसाल देते हैं, जब सहयोगियों की बातों को सरकार में तवज्जो दी गई। लेकिन, इन तर्कों और दावों के बीच आम धारणा यह जरूर बनी है कि 4 जून को आए चुनाव परिणाम का असर केंद्र सरकार पर दिखा है और कहीं न कहीं उसका इकबाल कमजोर हुआ है। यह धारणा आगे जाकर और मजबूत होगी या कमजोर, इसका फैसला बहुत कुछ विधानसभा चुनाव के परिणाम करेंगे। तब तक यह सियासी बहस जारी रहेगी और सरकार के हर फैसले को उसी चश्मे से देखा जाएगा।

लेटरल एंट्री को लेकर कांग्रेस के लिए क्या बोली बीजेपी?

हाल ही में बीजेपी ने लेटरल एंट्री को लेकर कांग्रेस के लिए एक बयान दे दिया है! केंद्र सरकार के सचिवों के विभिन्न पदों पर लेटरल एंट्री से भर्ती पर फिलहाल रोक लग गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को निर्देश दिया गया है कि वो 17 अगस्त, 2024 को जारी विज्ञापन वापस ले ले। करीब 40 से 45 पदों पर लेटर एंट्री से भर्ती के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से आवेदन मंगाए गए थे। कांग्रेस पार्टी ने इसमें आरक्षण की प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने का मुद्दा उठाया। बाद में केंद्र सरकार में शामिल एनडीए के सहयोगी दलों जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) ने भी बिना आरक्षण के लेटरल एंट्री पर आपत्ति जताई। हालांकि एक और बड़े सहयोगी टीडीपी ने सरकार का समर्थन किया था, लेकिन मोदी सरकार ने विवाद से बचना ही भला समझा। प्रधानमंत्री ने खुद मामले में दखल दी और उनके निर्देश पर कार्मिक विभाग के मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी को चिट्ठी लिखकर विज्ञापन रद्द करने को कहा। अब इस कांग्रेस पार्टी अपनी पीठ थपथपा रही है। वहीं, बीजेपी पलटवार में कांग्रेस सरकारों के दौरान हुई भर्तियों में मची अंधेरगर्दी की याद दिला रही है।लेटरल एंट्री से भर्तियों वाला विज्ञापन वापस लेने की खबर आते ही कांग्रेस पार्टी ने ट्वीट कर अपनी वाहवाही लूटी। पार्टी ने अपने एक्स हैंडल से पोस्ट में कहा कि एक बार फिर मोदी सरकार को संविधान के आगे झुकना पड़ा है। वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर चोट है।’ पार्टी का एक पोस्ट कहता है, ‘चंद कॉर्पोरेट्स के प्रतिनिधि सरकारी पदों पर बैठकर क्या कारनामे करेंगे, सेबी इसका उदाहरण है।आरक्षण विरोधी इस फैसले का कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे नेता विपक्ष राहुल गांधी और INDIA गठबंधन ने खुलकर विरोध किया। इसकी वजह से मोदी सरकार को ये फैसला वापस लेना पड़ा है।’

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संवाददाताओं ने जब बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी से लेटरल एंट्री पर राहुल गांधी के बयानों पर सवाल पूछा तो उन्होंने जोरदार पलटवार किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा कैबिनेट सचिव 1987 बैच के हैं जब केंद्र में राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की सरकार थी। क्या राहुल गांधी बताएंगे कि राजीव गांधी ने कितनों का आरक्षण दिया? त्रिवेदी ने कहा कि राहुल गांधी और उनके खानदान की आरक्षण और एससी-एसीट और ओबीसी को लेकर जो खानदानी विरासत है वो किसी से छिपी हुई नहीं है और उनकी अज्ञानता भी किसी से छिपी नहीं है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी यूपीएससी चेयरमैन प्रीति सूदन को लिखी चिट्ठी में कांग्रेस सरकारों में हुई लेटरल एंट्री का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक तो लेटरल एंट्री को मंजूरी वर्ष 2005 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने दी थी जिसके अध्यक्ष कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली थे। दूसरी तरफ लेटरल एंट्री के नाम पर कांग्रेस सरकारों ने भाई-भतीजावाद का ऐसा खेल खेल कि सामाजिक न्याय और आरक्षण के पूरी अवधारणा को गहरा चोट पहुंचा। केंद्रीय मंत्री ने नाम लिए बिना कहा कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान सोनिया गांधी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन किया गया जिसका मकसद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सुपरसीड करना था। वहीं, आधार कार्ड वाली संस्था यूएडीएआई हो या कई मंत्रालय, कांग्रेस की सरकारों में लेटरल एंट्री के जरिए भर्तियों में खूब धांधली हुई।

राहुल के अन्य बयानों को कांग्रेस पार्टी ने एक्स हैंडल पर पोस्ट किया है। इसमें कहा गया है, ‘नरेंद्र मोदी संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) की जगह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जरिए लोकसेवकों की भर्ती कर संविधान पर हमला कर रहे हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती का खुलेआम एससी, एसी और ओबीसी वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है।’

पार्टी ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बयानों को कोट किया है। इसमें कहा गया है, ‘टॉप ब्यूरोक्रेसी समेत देश के सभी शीर्ष पदों पर वंचितों का प्रतिनिधित्व नहीं है। उसे सुधारने के बजाय लेटर एंट्री द्वारा उन्हें शीर्ष पदों से दूर किया जा रहा है। यह यूपीएससी की तैयारी कर रहे प्रतिभाशाली युवाओं के हक पर डाका और वंचितों के आरक्षण समेत सामाजिक न्याय की परिकल्पना पर चोट है।’ पार्टी का एक पोस्ट कहता है, ‘चंद कॉर्पोरेट्स के प्रतिनिधि सरकारी पदों पर बैठकर क्या कारनामे करेंगे, सेबी इसका उदाहरण है। प्रशासनिक ढांचे और सामाजिक न्याय को चोट पहुंचाने वाले लेटरल एंट्री जैसे देश विरोधी कदम का INDIA विपक्षी गठबंधन मजबूती से विरोध करेगा।’

महात्मा गांधी के ऐसे आंदोलन जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगा दिया!

आज हम आपको महात्मा गांधी के ऐसे आंदोलन के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगा दिया है! राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने पूरे देश में अलग छाप छोड़ दी, जो शुरुआत से ही अग्रणी रहे, जिनके आंदोलन ने देश में एक नई ऊर्जा दी और अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया… आज हम आपको गांधी जी के कुछ ऐसे ही आंदोलन के बारे में जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दें कि इस स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी को 77 साल पूरे हो गए हैं। बता दें कि गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत की। मुंबई में हुई रैली में गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर जमकर कहर ढाया। गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। देश की आजादी में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना योगदान दिया है। तिलक से नेहरू तक, लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक, सभी ने आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी के आंदलनों को कौन भूल सकता है।

गांधी आंदोलनों को आज भी याद किया जाता है। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं। हम आपको गांधी के कुछ आंदोलनों के बारे में बताएंगे जिन्होंने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। सबसे पहला चंपारण सत्याग्रह… यह सत्याग्रह भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन था जो बिहार के चंपारण जिले से महात्मा गांधी की अगुवाई में 1917 को शुरू हुआ था। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने लोगों में जन्मे विरोध को सत्याग्रह के माध्यम से लागू करने का पहला प्रयास किया जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आम जनता के अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था।

इसके बाद शुरू हुआ असहयोग आंदोलन…बता दे कि अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला हत्याकांड के बाद देश में गुस्सा था। अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। अंग्रोजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ स्वराज की मांग उठनी शुरू हुई। एक अगस्त, 1920 को महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की घोषणा की गई। छात्रों ने स्कूल-कॉलेज जाना बंद कर दिया। मजदूर हड़ताल पर चले गए। अदालतों में वकील आना बंद हो गए। शहरों से लेकर गांव देहात में आंदोलन का असर दिखाई देने लगा।  अब बात नमक सत्याग्रह की… जानकारी के लिए बता दे कि असहयोग आंदोलन के करीब आठ साल बाद महात्मा गांधी ने एक और आंदोलन किया। इस आंदोलन से अंग्रेज सरकार हिल गई। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक 24 दिन का पैदल मार्च निकाला। इस मार्च को दांडी मार्च, नमक सत्याग्रह और दांडी सत्याग्रह के रूप में इतिहास में जगह मिली। इसके बाद शुरू हुआ हरिजन आंदोलन, जिसे छुआछूत विरोधी आंदोलन भी कहा जाता है…

बता दें कि महात्मा गांधी जी ने 8 मई 1933 से छुआछूत विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी। इस दौरान महात्मा गांधी ने आत्म-शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास किया। इस उपवास के साथ एक साल लंबे अभियान की शुरुआत हुई। उपवास के दौरान गांधी जी ने कहा था- या तो छुआछूत को जड़ से समाप्त करो या मुझे अपने बीच से हटा दो। इससे पहले 1932 में गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की थी। दलित समुदाय के लिए हरिजन नाम भी महात्मा गांधी ने दिया था। गांधी जी ने ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्र का भी प्रकाशन किया था। अब अंत में बात भारत छोड़ो आंदोलन की… बता दें कि 9 अगस्त, 1942 को गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत की। मुंबई में हुई रैली में गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर जमकर कहर ढाया। गांधी समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए।

इस आंदोलन ने दूसरे विश्व युद्ध में उलझी ब्रिटिश सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी। अंग्रेजों को आंदोलन खत्म करने में एक साल से ज्यादा का समय लग गया।  यह भारत की आजादी में सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन था। इसलिए बता दे कि देश की आजादी में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना योगदान दिया है। तिलक से नेहरू तक, लक्ष्मी बाई से भगत सिंह तक, सभी ने आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी के आंदलनों को कौन भूल सकता है। तो यह थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कुछ ऐसे आंदोलन, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया!

आखिर जेडीयू सरकार के प्रवक्ता एनडीए से क्यों चल रहे हैं विपरीत?

वर्तमान में जेडीयू के कई प्रवक्ता एनडीए से विपरीत चल रहे हैं! बिहार में इन दिनों राजनीति उथल-पुथल तेज है। जनता दल (यूनाइटेड) के महासचिव केसी त्यागी ने रविवार को पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने पिछले साल ही इस्तीफा दे दिया था, लेकिन पार्टी ने उन्हें पद पर बने रहने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि इस साल फिर से मुझे प्रवक्ता नियुक्त किया गया। यह एक कठिन काम है। मैं हर दिन सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक उपलब्ध रहता हूं। अब युवा पीढ़ी को कार्यभार संभालने का समय आ गया है। सूत्रों का कहना है कि त्यागी का इस्तीफा ऐसे वक्त आया है जब उन्होंने हाल ही में बीजेपी के कुछ वैचारिक मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया था। सूत्रों ने कहा कि कुछ संवेदनशील मुद्दों पर इन बयानों ने एनडीए के भीतर पार्टी को मुश्किल स्थिति में डाल दिया। जेडीयू के एक सीनियर नेता ने बताया कि वह पार्टी के एक बहुत सम्मानित नेता हैं, लेकिन उन्होंने मुद्दों पर पार्टी लाइन के बारे में आलाकमान से पूछे बिना बयान देना शुरू कर दिया था। लेटरल एंट्री और यूसीसी जैसे बहुत ही संवेदनशील मुद्दे हैं। पार्टी नेतृत्व के विचारों को जाने बिना दिए गए कड़े बयान गठबंधन में परेशानी खड़ी कर सकते हैं।

इसके अलावा त्यागी ने हाल ही में इजराइल-हमास युद्ध पर विपक्षी नेताओं के साथ एक संयुक्त बयान जारी किया था। उन्होंने कहा कि विदेश नीति के मुद्दों पर, सहयोगी दलों के रूप में सरकार के साथ चलना एक नियम है। ये राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले हैं और केंद्र सरकार बहुत सारे कारकों पर विचार करने के बाद एक रुख अपनाती है। यह हमारी चिंता का विषय बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लेकिन आप इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष पर विपक्षी नेताओं के साथ भोजन का आयोजन कर रहे हैं। वह भी ठीक है, जब तक यह व्यक्तिगत हैसियत से किया जाता है। लेकिन आप विपक्ष के साथ संयुक्त बयान जारी कर रहे हैं। बैठक के बाद इजराइल को हथियारों की बिक्री रोकने के लिए भारत से आग्रह करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया गया। इस पर त्यागी, अली और कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसदों और नेताओं ने हस्ताक्षर किए।

हालांकि पार्टी पदाधिकारी ने कहा कि बीजेपी की ओर से कोई दबाव नहीं था और यह फैसला नीतीश कुमार ने खुद लिया है। केवल 10 दिन पहले, जब लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने लेटरल एंट्री के माध्यम से शीर्ष सरकारी पदों पर नियुक्तियों के लिए आवेदन मांगने वाले एक यूपीएससी विज्ञापन के बारे में अपने संदेह व्यक्त किए थी उन्होंने कहा थी कि उनकी पार्टी इस कदम के बिल्कुल समर्थन में नहीं थी। वहीं त्यागी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि सरकार ने विपक्ष के हाथों में हथियार दे दिया है और इस कदम से राहुल गांधी वंचित वर्गों के चैंपियन बन जाएंगे।

जबकि त्यागी ने मामले में पार्टी की स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा जेडीयू खुद को जातिगत जनगणना और दलितों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के पैरोकार के रूप में देखती है। उनके शब्दों को एक सहयोगी के लिए थोड़ा कठोर माना गया। सरकार को विज्ञापन वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसे त्यागी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सामाजिक न्याय की राजनीति की जीत बताया।

बयान ऐसे समय में आए हैं जब जदयू खुद को उस सरकार में बीजेपी के एक प्रमुख सहयोगी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले बिहार के लिए अधिकतम केंद्रीय लाभ हासिल करने के लिए पार्टी एक विश्वसनीय गठबंधन सहयोगी बनने की कोशिश कर रही है। इससे पहले यूसीसी जैसे मुद्दों पर, त्यागी ने अन्य सहयोगियों की तुलना में जदयू के अधिक स्पष्ट रुख को व्यक्त किया है। 15 अगस्त को जब प्रधानमंत्री ने एक बार फिर यूसीसी का मुद्दा उठाया, तो त्यागी ने कहा कि पार्टी यूसीसी का समर्थन करती है लेकिन व्यापक परामर्श चाहती है। उन्होंने कहा कि यह 2017 में कानून आयोग को लिखे अपने पत्र में खुद नीतीश कुमार द्वारा स्पष्ट किया गया रुख था। दूसरी ओर एलजेपी ने कहा कि वह सरकार द्वारा यूसीसी का मसौदा तैयार करने के बाद ही कोई टिप्पणी करेगी।

लोकसभा चुनाव नतीजों के तुरंत बाद, जब एनडीए सहयोगियों के बीच बातचीत चल रही थी, त्यागी ने बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग और अग्निपथ योजना की समस्याओं पर जदयू का पक्ष रखा। त्यागी ने कहा कि योजना को लेकर मतदाताओं में आक्रोश है। हमारी पार्टी चाहती है कि इसकी खामियों को दूर करने के लिए सरकार में इस पर गहनता से चर्चा हो। हालांकि एनडीए को हमारा समर्थन बिना शर्त है, लेकिन हमारा मानना है कि बिहार को विशेष दर्जा मिलना चाहिए। राज्य के विभाजन के बाद, जिस कठिनाई और बेरोजगारी की समस्या का सामना करना पड़ा है, उसे केवल राज्य को विशेष दर्जा देकर ही दूर किया जा सकता है।

क्या गुजरात में होने वाली है असीमित बारिश?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आने वाले समय में गुजरात में असीमित बारिश होने वाली है या नहीं! गुजरात में भारी बारिश में कच्छ समेत करीब दर्जनभर जिलों में बाढ़ जैसी की स्थिति बन गई है। राज्य में पिछले 48 घंटों से हो रही मूसलाधार बारिश से बरसाती नदियां उफान हैं। इसके चलते कई जिलों के निचले इलाकों में पानी भर गया। मौसम विभाग ने आगे भी भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। 26 अगस्त को पूरे राज्य में रेड अलर्ट के बाद हाहाकार की स्थिति रही। इसके बाद राज्य सरकार ने 27 अगस्त को स्कूल बंद रखने का निर्णय लिया है। गुजरात में भारी बारिश से तीन लोगों की मौत भी हुई है, तो वहीं दूसरी तरफ मोरबी में ट्रैक्टर के बन जाने पर 11 लोगों को बचाने के बाद बाकी सात लोगों की खोजबीन अभी भी जारी है। राज्य सरकार ने आईएमडी द्वारा जारी रेड अलर्ट के मद्देनजर सभी कलेक्टर को अपने कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द करने को कहा गया है। राज्य सरकार ने बारिश से प्रभावित वर्षा जिलों में एनडीआरएफ की 13 व एसडीआरएफ की 22 टीमें तैनात की हैं। राज्य में अब तक 17,827 लोगों को स्थानांतरित व 1,653 लोगों को रेस्क्यू किया गया है। राज्य में हाल में सूरत, नवसारी, वलसाड, तापी, डांग व छोटा उदेपुर जिलों में कुल 523 सड़क मार्ग बंद कि गए हैं। मौसम विभाग ने गुजरात के 33 जिलों में 26 जिलों के लिए रेड अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार कच्छ, माेरबी, सुरेंद्रनगर, जामनगर, राजकोट, जूनागढ़, पोरबंदर, देवभूमि द्वारका, तापी, नवसारी, वलसाड और दाहोद के साथ पंचमहाल, अमरेली, गिर सोमनाथ, आणंद, खेडा, आणंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, डांग,महिसागर और छोटा उदेपुर और नर्मदा जिले रेड अलर्ट पर हैं। आईएमडी ने अहमदाबाद के लिए ऑरेंज और बनासकांठा, पाटण, महेसाणा, साबरकांठा, अरवल्ली, गांधीनगर जिलों के लिए येलाे अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने अनुामन में कहा है तटीय इलाकों के साथ अन्य जिलों में तेज हवा का भी अनुमान व्यक्त किया है। हवा की गति 40 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है।

26 अगस्त को रेड अलर्ट के बाद पूरे गुजरात में भारी बारिश हुई जिससे निचले इलाके जलमग्न हो गए। राज्य में तीन लोगों की मौत हो गई तथा सात अन्य लापता हो गए। सैकड़ों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने 29 अगस्त सुबह तक राज्य के कई जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश के साथ ही कुछ स्थानों पर अत्यधिक भारी बारिश की चेतावनी दी गई है जिसके बाद प्रशासन ने कमर कस ली है। साेमवार को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मौजूदा स्थिति की समीक्षा के लिए सभी प्रमुख शहरों के जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षकों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक ऑनलाइन बैठक की।

मोरबी जिले के हलवद तालुका में एक पुल से गुजरते समय एक ट्रॉली ट्रैक्टर के बह जाने से सात लोग लापता हो गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय एवं राज्य आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ और एसडीआरएफ) के लगभग 20 घंटे के तलाशी अभियान के बावजूद उनका पता नहीं चल सका।साबरकांठा जिले में कटवाड़ गांव के पास एक कार पानी के तेज बहाव में बह गई, जिसमें दो लोग सवार थे। स्थानीय लोगों की सूचना पर दमकल कर्मियों ने उन्हें बचा लिया। भारी बारिश से राज्य में कई राजमार्गों पर यातायात भी प्रभावित हुआ है।

अहमदाबाद, वडोदरा, आणंद, खेड़ा और पंचमहल जिलों में सोमवार को बहुत भारी बारिश हुई। जिससे निचले इलाकों और अंडरपास में जलभराव हो गया और कई लोग फंस गए। अहमदाबाद में भी कई अंडरपास में पानी भरने के बाद यातायात ठप होगा। वैष्णोदेवी सर्कल पर बने अंडरपास में भारी भरने क वीडियो भी वायरल हुआ है। राज्य राहत आयुक्त आलोक कुमार पांडे ने बताया अब तक बारिश के मौसम में कुल 99 लोगों की मौत हुई है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात में भारी बारिश के बाद गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल से बात की है। बता दें कि गुजरात में भारी बारिश हुई जिससे निचले इलाके जलमग्न हो गए। राज्य में तीन लोगों की मौत हो गई तथा सात अन्य लापता हो गए। सैकड़ों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इसकी जानकारी दी। पटेल ने एक्स पर लिखा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने आवश्यक सहायता का आश्वासन दिया है, जिसमें जरूरत पड़ने पर राज्य में राहत एवं बचाव तथा आपदा प्रबंधन के लिए केंद्रीय बलों से और मदद भेजना शामिल है।

बाढ़ग्रस्त और तबाही वाले क्षेत्र के लिए क्या बोले अमित शाह?

हाल ही में अमित शाह ने बाढ़ग्रस्त और तबाही वाले क्षेत्र के लिए एक बयान दे दिया है! केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों से बात की और दोनों राज्यों में बाढ़ की स्थिति का जायजा लिया। शाह ने दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बारिश तथा बाढ़ से निपटने के लिए केंद्र की तरफ से से हरसंभव मदद का आश्वासन दिया केंद्र सरकार के अधिकारी ने बताया कि गृह मंत्रालय बाढ़ प्रभावित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों के संपर्क में है। साथ ही राज्यों में नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय टीम तैनात की जाएंगी इस संबंध में गृह मंत्रालय ने गुजरात में बारिश और बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए अंतर-मंत्रालयी टीम गठित की। केंद्र सरकार ने गुजरात में बारिश और बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय दल आईएमसीटी का गठन किया है। यह दल राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान एनआईडीएम के कार्यकारी निदेशक के नेतृत्व में गुजरात के बाढ़ प्रभावित जिलों का दौरा करेगी। यही नहीं रेलवे अधिकारियों ने रविवार को बताया कि विजयवाड़ा-काजीपेट मार्ग पर लगभग 24 ट्रेनों को रोका गया है। ट्रैक पर काफी मात्रा में जलभराव हो गया है। वहीं, विजयवाड़ा मंडल में 30 ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। दक्षिण मध्य रेलवे ने कहा कि आंध्र प्रदेश में भारी बारिश के कारण एहतियात के तौर पर कई ट्रेनों को डायवर्ट और रद्द किया जा रहा है। इस साल आईएमसीटी ने असम, केरल, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे बाढ़ या लैंडस्लाइड प्रभावित राज्यों का दौरा किया। 25 से 30 अगस्त के बीच, राजस्थान और गुजरात के ऊपर बने गहरे दबाव के कारण गुजरात बारिश से बुरी तरह प्रभावित हुआ। गुजरात के अलावा, हिमाचल प्रदेश भी भारी बारिश, बादल फटने और भूस्खलन से प्रभावित हुआ है।

आंध्र प्रदेश की गृह मंत्री वंगलापुड़ी अनिता ने रविवार को बताया कि राज्य में पिछले दो दिनों में मूसलाधार बारिश के कारण पांच जिलों के 294 गांवों से 13,227 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के एक अधिकारी ने बताया कि उत्तरी आंध्र प्रदेश और दक्षिणी ओडिशा के तटों पर बना अवदाब रविवार तड़के उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़कर कलिंगपट्टनम के पास दक्षिणी राज्य के तट को पार कर गया। इसी के कारण राज्य में पिछले दो दिनों से भारी बारिश हो रही थी।

तेलंगाना में हैदराबाद सहित राज्य के कई हिस्सों में भारी बारिश जारी है। राज्य में भारी बारिश के बाद कुछ जिलों में छोटी नदियां उफान पर हैं और बाढ़ के पानी के कारण गांवों का सड़क संपर्क बाधित हो गया। हैदराबाद में भी भारी बारिश हुई और रातभर बारिश जारी रहने के कारण राजधानी के कई हिस्सों में जलभराव हो गया। भारी बारिश और कई स्थानों पर पटरियों पर जलभराव के कारण कई ट्रेन या तो रद्द कर दी गई हैं या आंशिक रूप से रद्द कर दी गई हैं। वहीं, कुछ ट्रेन के मार्ग में भी परिवर्तन किया गया है। रेलवे अधिकारियों ने रविवार को बताया कि विजयवाड़ा-काजीपेट मार्ग पर लगभग 24 ट्रेनों को रोका गया है। ट्रैक पर काफी मात्रा में जलभराव हो गया है। वहीं, विजयवाड़ा मंडल में 30 ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। दक्षिण मध्य रेलवे ने कहा कि आंध्र प्रदेश में भारी बारिश के कारण एहतियात के तौर पर कई ट्रेनों को डायवर्ट और रद्द किया जा रहा है।

गुजरात में भारी बारिश के कारण बाढ़ की स्थिति ने जीवन को काफी प्रभावित कर दिया है, और केंद्र सरकार द्वारा आश्वासन मिलने से राहत कार्यों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान एनआईडीएम के कार्यकारी निदेशक के नेतृत्व में गुजरात के बाढ़ प्रभावित जिलों का दौरा करेगी। इस साल आईएमसीटी ने असम, केरल, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे बाढ़ या लैंडस्लाइड प्रभावित राज्यों का दौरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में बाढ़ के हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए पीड़ितों को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है। पीएम मोदी ने नागरिकों के जीवन और पशुधन की सुरक्षा पर मार्गदर्शन भी किया। बता दें कि उत्तरी आंध्र प्रदेश और दक्षिणी ओडिशा के तटों पर बना अवदाब रविवार तड़के उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़कर कलिंगपट्टनम के पास दक्षिणी राज्य के तट को पार कर गया। इसी के कारण राज्य में पिछले दो दिनों से भारी बारिश हो रही थी। साथ ही, गुजरात को केंद्र सरकार की ओर से सभी आवश्यक समर्थन और सहायता प्रदान करने का आश्वासन दिया गया।

ऑफिस जाने की जल्दी में खाने का नहीं मिलता मौका, 3 हेल्दी ड्रिंक्स बचाएंगी समय और सेहत दोनों

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ऑफिस जाते वक्त जल्दी में बिना खाए निकल जाना? अगर आप अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो ऑफिस निकलने से पहले ड्रिंक पर भरोसा कर सकते हैं। सुबह उठकर ऑफिस जाने की जल्दी में कई लोग ठीक से खाना नहीं खा पाते। कुछ तो कुछ दिनों तक बिना खाए भी रह जाते हैं। काम पर बैठे बिना उसे भूख लग जाती है। फिर हबीजाबी को जो कुछ भी उपलब्ध है उसी से अपना पेट भरना पड़ता है। लेकिन अगर यह दिन-ब-दिन चलता रहे तो शरीर अच्छा रहेगा?

पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि नाश्ता बहुत महत्वपूर्ण है। भोजन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन उचित मात्रा में होना चाहिए। लेकिन अगर आपके पास ऑफिस जाते समय बैठकर खाने का समय नहीं है, तो आप इसकी जगह हेल्दी सिरप और शेक का सेवन कर सकते हैं। पेट खाली नहीं रहेगा और आप 2 मिनट में खाकर बेहोश हो जाएंगे। साथ ही शरीर में कुछ पानी भी चला जाएगा.

केले में फाइबर, विटामिन सी और भरपूर मात्रा में पोटैशियम होता है। पोटेशियम रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है। फाइबर कब्ज की समस्या से राहत दिलाता है। नट बटर में स्वस्थ वसा होती है। चटनी में आसानी से पचने योग्य फाइबर होने से पाचन संबंधी समस्याएं भी नियंत्रण में रहती हैं। केला, दूध और बादाम बटर को एक साथ मिक्सर में डालकर 2 मिनट में शेक बनाया जा सकता है. और इसे 2 मिनट में खाया जा सकता है.

छाते में प्रोटीन होता है. इसमें नींबू का रस मिलाने पर विटामिन सी मिल जाता है। जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. चतुर शरबत हड्डियों को मजबूत बनाने में भी बहुत कारगर है। छाटू वजन घटाने में भी मददगार है. चुट्टू में फाइबर होने से पाचन संबंधी समस्याएं भी नियंत्रण में रहती हैं। ऑफिस जाने से पहले अगर आप एक गिलास चट्टू-नींबू का शरबत खाएंगे तो शरीर को प्रोटीन, फाइबर और विटामिन मिलेंगे. चटनी को पानी में पतला कर लें और उसमें साबुन के टुकड़े नमक के मिला लें। इसमें थोड़ा सा नींबू का रस मिलाने से स्वाद, गंध और पौष्टिकता बढ़ जाएगी। अगर आप अपना वजन कम करना चाहते हैं तो चीनी खाना बंद कर सकते हैं। अगर इससे जुड़ी कोई समस्या नहीं है तो आप इसमें थोड़ा सा गुड़ भी मिला सकते हैं.

स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। इसमें विभिन्न खनिज भी शामिल हैं। आप फल, प्रोटीन पाउडर और दूध से प्रोटीन शेक बना सकते हैं। ऑफिस जाने से पहले प्रोटीन शेक पीने से शरीर को प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स मिलेंगे। इसमें काफी मात्रा में कैलोरी होती है. परिणामस्वरूप, यह बिना कुछ बजाए कई घंटों तक चलेगा।

जब आप शाकाहारी, लेकिन प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों के बारे में सोचते हैं, तो सोयाबीन सबसे पहले दिमाग में आता है। सोयाबीन हर उम्र के लोगों के लिए समान रूप से फायदेमंद है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में हड्डियों का नुकसान विशेष रूप से आम है। सोयाबीन भी इस समस्या को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा सोयाबीन के और भी कई फायदे हैं। किन तीन कारणों से सप्ताह में कम से कम तीन दिन सोयाबीन खाना जरूरी है?

इंग्लैंड विश्वविद्यालय के एक आंकड़े के अनुसार, रजोनिवृत्त महिलाओं में 6 महीने तक 30 ग्राम सोयाबीन के नियमित सेवन से ऑस्टियोपोरोसिस जैसी हड्डियों के नुकसान की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। सप्ताह में 3 दिन सोयाबीन खाने और नियमित सोया दूध खाने से हड्डियों के नुकसान को रोका जा सकता है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं की हड्डियों में कैल्शियम का स्तर कम हो सकता है। परिणामस्वरूप, हड्डियाँ नाजुक हो जाती हैं। सोया प्रोटीन में फाइटोएस्ट्रोजन नामक पदार्थ होता है, जो कैल्शियम के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है।

रक्त संचार में सहायक

सोयाबीन में आइसोफ्लेविन और लेसिथिन नामक दो एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं। ये कोलेस्ट्रॉल के स्तर को सामान्य रखने में मदद करते हैं। यह कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए बहुत हानिकारक होता है। यही कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का कारण बनता है। सोयाबीन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह यौगिक त्वचा और बालों को चमकदार बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा, चूंकि सोयाबीन में मौजूद लेसिथिन रक्त परिसंचरण को सामान्य रखता है, त्वचा कोशिकाएं मजबूत होती हैं और चमकदार दिखती हैं। इससे असमय बुढ़ापे से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा, सोयाबीन में मौजूद लेथिसिन वसा चयापचय की दर को बढ़ाने में मदद करता है। इससे वजन भी नियंत्रण में रहता है.

सोशल मीडिया की लत! आप कितना प्रभाव सोचते हैं? उपयोग में क्या बदलाव आ रहे हैं?

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सोशल मीडिया की अत्यधिक लत और लंबे समय तक समय बिताने की आदत न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है, बल्कि करीबी रिश्तों को भी नुकसान पहुंचाती है। क्या आप अक्सर सेल्फी लेते हैं? फेसबुक-ट्विटर पर शेयर की कई दिनों की यादें? लेकिन ऐसे लोग हमारे आसपास भी कम नहीं हैं. दिन भर सोशल मीडिया पेजों पर नजरें. फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप हर समय चैट करते हैं। सोशल मीडिया की अत्यधिक लत और लंबे समय तक समय बिताने की आदत न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है, बल्कि करीबी रिश्तों को भी नुकसान पहुंचाती है।

वॉट्सऐप ग्रुप में चैट करते या फेसबुक की न्यूज फीड चेक करते-करते कई लोगों को समझ ही नहीं आता कि सोने के लिए दिया गया समय कब खत्म हो गया। पर्याप्त नींद न लेने से शरीर के साथ-साथ दिमाग की भी थकान बढ़ जाती है। फिर छोटी-छोटी बातों को लेकर चिंता शुरू हो जाती है। मूड चिड़चिड़ा है. यह दूसरों के साथ प्रयोग में भी प्रकट होता है।

मनोवैज्ञानिक अनिंदिता मुखोपाध्याय के अनुसार, सोशल मीडिया की अत्यधिक लत दैनिक जीवन में पारिवारिक रिश्तों को प्रभावित कर रही है। तनाव पीड़ितों का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापित तनाव राहत उत्पादों का उपयोग कर रहा है, कुछ शराब या तंबाकू उत्पादों पर निर्भर हो रहे हैं। किसी आभासी मित्र की महँगी कार या सजे हुए घर की छवि ईर्ष्या और घबराहटपूर्ण तनाव उत्पन्न करती है। करीबी रिश्ते दूसरों की तुलना में दूर हो जाते हैं। अनिंदिता के मुताबिक, सोशल मीडिया एडिक्शन को ‘बिहेवियरल एडिक्शन’ कहा जाता है। देखा गया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते हैं, वे अपने आसपास के रिश्तों को महत्व नहीं देना चाहते। यह समस्या युवा पीढ़ी, खासकर किशोरावस्था में सबसे आम है। कई लोग कहते हैं कि उनके माता-पिता महंगी चीजें नहीं खरीदते, उन्हें अपने दोस्तों के माता-पिता की तरह विदेश यात्रा पर नहीं ले जाते। इस बात को लेकर माता-पिता से लगातार झगड़ा होता रहता है। फिर प्रेम या विवाह संबंध पर भी असर पड़ता है। दूसरों से बातचीत करने, तस्वीरें लाइक करने या सोशल मीडिया पर कमेंट करने को लेकर भी संदेह, नैतिक प्रदूषण, झगड़े बढ़ रहे हैं। ऐसा भी देखा गया है कि इस सोशल मीडिया की अत्यधिक लत भी कई रिश्ते टूटने की जड़ में है। इसलिए इस लत से बाहर निकलने के लिए आपको आभासी दुनिया को छोड़कर अपना ध्यान वास्तविकता की ओर लगाना होगा। घर के बड़ों को समय देकर, परिवार के साथ बातचीत करके, दोस्तों के साथ समय बिताकर, बच्चों को समय देकर इस लत से छुटकारा पाना संभव है।

सोशल मीडिया ने निस्संदेह हमारे संवाद और बातचीत करने के तरीके को बदल दिया है, लेकिन इसके साथ कई संभावित नकारात्मक प्रभाव भी जुड़े हैं। यहाँ कुछ सबसे ज़्यादा चर्चित मुद्दे दिए गए हैं:

1. **मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ**: सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग को चिंता, अवसाद और कम आत्मसम्मान से जोड़ा गया है। आदर्श छवियों और जीवन शैली के लगातार संपर्क में रहने से अपर्याप्तता और आत्म-संदेह की भावनाएँ पैदा हो सकती हैं।

2. **लत और समय की बर्बादी**: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को लत लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे कुछ उपयोगकर्ता ऑनलाइन बहुत ज़्यादा समय बिताते हैं। यह उत्पादकता और वास्तविक जीवन की बातचीत को कम कर सकता है।

3. **साइबरबुलिंग और उत्पीड़न**: सोशल मीडिया बदमाशी, उत्पीड़न और ट्रोलिंग का एक प्लेटफ़ॉर्म हो सकता है, जिसका व्यक्तियों, विशेष रूप से युवा लोगों पर गंभीर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकता है।

4. **गोपनीयता संबंधी चिंताएँ**: सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से गोपनीयता भंग हो सकती है। डेटा का दुरुपयोग या चोरी हो सकता है, और व्यक्तिगत विवरण अवांछित पक्षों के सामने आ सकते हैं।

5. **गलत सूचना का प्रसार**: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म गलत सूचना और प्रचार के प्रसार को बढ़ा सकते हैं, जो उपयोगकर्ताओं को गुमराह कर सकते हैं और गलत सूचना और भ्रम में योगदान दे सकते हैं।

6. **रिश्तों पर प्रभाव**: जबकि सोशल मीडिया कनेक्शन बनाए रखने में मदद कर सकता है, यह रिश्तों में गलतफहमी और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। दूसरों के जीवन का आदर्श चित्रण किसी के अपने रिश्तों में ईर्ष्या या असंतोष का कारण बन सकता है।

7. **ध्यान अवधि में कमी**: सोशल मीडिया की तेज़ गति, लगातार अपडेट होने वाली प्रकृति ध्यान अवधि को कम कर सकती है और कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई पैदा कर सकती है।

8. **नींद में खलल**: सोशल मीडिया से जुड़े रहना, खासकर सोने से पहले, नींद के पैटर्न में बाधा डाल सकता है और अनिद्रा या खराब नींद की गुणवत्ता का कारण बन सकता है।

9. **इको चैंबर्स और ध्रुवीकरण**: सोशल मीडिया एल्गोरिदम अक्सर उपयोगकर्ताओं को ऐसी सामग्री दिखाते हैं जो उनकी मौजूदा मान्यताओं के साथ मेल खाती है, जिससे इको चैंबर्स बनते हैं और राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण में योगदान होता है।

10. **बॉडी इमेज इश्यूज**: सोशल मीडिया पर आदर्श और अक्सर अवास्तविक बॉडी स्टैंडर्ड्स के संपर्क में आने से शरीर से असंतुष्टि और अस्वस्थ व्यवहार हो सकता है, खासकर किशोरों और युवा वयस्कों में।

सोशल मीडिया के इस्तेमाल को वास्तविक जीवन की बातचीत और गतिविधियों के साथ संतुलित करने से इनमें से कुछ नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है।

25 लाख रुपये थी सिर की कीमत! छत्तीसगढ़ संघर्ष में माओवादी नेता मारा गया

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‘एनकाउंटर’ ऑपरेशन मंगलवार सुबह शुरू हुआ. इससे कोई माओवादी नहीं मरा. ये सभी पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के सदस्य हैं। मृतकों में छह महिलाएं हैं. छत्तीसगढ़ में मंगलवार को सुरक्षा गार्डों के साथ झड़प में नौ नक्सली मारे गए. वे जंगल में छुपे हुए थे. इस बार पुलिस सूत्रों के मुताबिक उनके एक सिर की कीमत 25 लाख टका थी!

मृत नेता का नाम माचरेला येसोबू है. 1988 से वह नक्सली आंदोलन से जुड़े थे. दंतेवाड़ा पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि उसके सिर की कीमत 25 लाख थी. माचरेला आंध्र प्रदेश के वारंगल के रहने वाले थे। टीम में उनका नाम ‘रानाडेर’ था।
पुलिस अधिकारी ने कहा, ”माचरेला दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सदस्य था. पुलिस उसके बारे में और जानकारी तलाश रही है।

इससे पहले गुप्त सूत्रों से छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की सीमा से लगे जंगलों में करीब 40 माओवादियों के छिपे होने की जानकारी मिली थी. इसके बाद उन्हें पकड़ने के लिए तलाशी शुरू हुई। मंगलवार सुबह करीब 10:30 बजे सुरक्षा गार्ड, सीआरपीएफ और बस्तर फाइटर्स की संयुक्त टीम ने ‘एनकाउंटर’ ऑपरेशन शुरू किया. दोनों पक्षों में गोलीबारी शुरू हो गयी. इस झड़प में नौ लोगों की मौत हो गई. मारे गए सभी लोग माओवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के सदस्य थे। उनके शव बरामद कर लिए गए हैं. मृतकों में छह महिलाएं हैं. उनके डेरे से काफी संख्या में आग्नेयास्त्र भी बरामद किये गये.
संयोग से, आंकड़े कहते हैं कि पिछले 10 वर्षों में माओवादियों द्वारा 6,617 सुरक्षाकर्मी और आम नागरिक मारे गए। लेकिन अब यह संख्या घटकर 70 प्रतिशत रह गई है। पिछले हफ्ते भी छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में माओवादियों के हमले में तीन ग्रामीणों की जान चली गई थी. पुलिस जासूस होने के संदेह में उनकी हत्या कर दी गई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने माओवादी गतिविधियों को दबाने के लिए पिछले महीने एक अंतरराज्यीय समन्वय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। शाह का दावा है कि दो साल से भी कम समय में देश से माओवादी गतिविधियां पूरी तरह खत्म हो जाएंगी. उन्होंने कहा, उनकी पहचान कर कड़ी सजा देने के अलावा आत्मसमर्पण नीति में भी बदलाव किये जायेंगे.

छत्तीसगढ़ के जंगल में सुरक्षा गार्डों से मुठभेड़, नौ नक्सली ढेर
पिछले 10 सालों में 6 हजार 617 सुरक्षाकर्मियों और आम नागरिकों को माओवादियों ने मार डाला. पिछले हफ्ते भी छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में माओवादियों के हमले में तीन ग्रामीणों की जान चली गई थी. पुलिस जासूस होने के संदेह में उनकी हत्या कर दी गई। छत्तीसगढ़ में सुरक्षा गार्डों के साथ झड़प में नौ माओवादी मारे गए. वे जंगल में छिप गये। घटना मंगलवार सुबह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुई.

पुलिस को पहले गुप्त सूत्रों से जानकारी मिली थी कि नक्सली दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की सीमा से लगे जंगलों में छिपे हुए हैं. इसके बाद उन्हें पकड़ने के लिए तलाशी शुरू हुई। मंगलवार सुबह करीब 10:30 बजे सुरक्षा गार्डों ने कार्रवाई शुरू की. दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई. मुठभेड़ में अंततः माओवादी हार गए। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, झड़प में कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई. मारे गए सभी लोग माओवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के सदस्य थे। उनके शव बरामद कर लिए गए हैं. उनके डेरे से काफी संख्या में आग्नेयास्त्र भी बरामद किये गये.

गोलीबारी के बाद भी सुरक्षा गार्ड सुरक्षित हैं। हालांकि, वे अभी भी यह पता लगाने के लिए सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं कि इलाके में और भी माओवादी छिपे हुए हैं या नहीं.

संयोग से, पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में माओवादियों के हमले में तीन ग्रामीणों की जान चली गई थी। पुलिस जासूस होने के संदेह में उनकी हत्या कर दी गई। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों में माओवादियों द्वारा 6,617 सुरक्षाकर्मी और नागरिक मारे गए। लेकिन अब यह संख्या घटकर 70 प्रतिशत रह गई है। माओवाद को कुचलने के उद्देश्य से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने एक अंतरराज्यीय समन्वय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी. शाह का दावा है कि दो साल से भी कम समय में देश से माओवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा. उन्होंने कहा, उनकी पहचान कर कड़ी सजा देने के अलावा आत्मसमर्पण नीति में भी बदलाव किये जायेंगे.

2026 तक देश से माओवादियों का सफाया हो जायेगा. ऐसी मांग केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की है. यह बात उन्होंने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही.

शनिवार को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने संवाददाताओं से कहा, ”मेरा मानना ​​है कि लड़ाई अपने अंतिम चरण में है. यह अंतिम आक्रमण का समय है. हम मार्च 2026 तक देश से माओवाद का खात्मा कर देंगे.”

शनिवार को अंतरराज्यीय समन्वय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री वहां के पुलिस प्रमुखों के साथ मौजूद थे. बैठक में पड़ोसी राज्यों के मुख्य सचिव समेत प्रशासनिक प्रमुख भी मौजूद थे. बैठक में मुख्य रूप से माओवादी बहुल इलाकों में केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाओं को लागू करने के पहलुओं पर चर्चा हुई.