Sunday, March 15, 2026
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क्या अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में आएगा नया मोड़?

आने वाले समय में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में नया मोड़ आ सकता है! अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप पर हुए जानलेवा हमले के बाद चुनाव के इतने करीब डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार और राष्ट्रपति जो बाइडेन रेस से पीछे हट गए। ट्रंप और बाइडेन के बीच प्रेसिडेंशियल डिबेट के बाद से ही कई अटकलों ने जोर पकड़ा था। हमले के बाद ट्रंप की बढ़ी रेटिंग्स ने इस बात का अहसास दिलवा ही दिया था। अपनी दावेदारी वापस लेने के बाद बाइडेन ने हैरिस का नाम भी आगे कर दिया, हालांकि हैरिस के लिए राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी इतनी आसान भी नहीं, इसमें कई तरह के टेक्निकल पेच हैं। बाइडेन का विकल्प कौन होगा ? इस पर औपचारिक मुहर अगस्त मध्य में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेशनल कन्वेंशन लगेगी, जब पार्टी डेलीगेट्स उम्मीदवार के औपचारिक तौर पर वोट करेंगे, बाइडेन की घोषणा के बाद जिस तरह के रिएक्शन पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के चेयरपर्सन जेमी हैरीसन की ओर से सामने आए, उससे ये साफ है कि कमला हैरिस के पास भले ही राष्ट्रपति बाइडेन का समर्थन हो, लेकिन फिलहाल पार्टी के बड़े नेता मोटे तौर पर इस तरह के समर्थन के कम से कम संकेत तो देना नहीं चाहते। डेमोक्रेटिक पार्टी की रूल बुक कहती है कि डेलिगेट उन लोगों के सेंटिमेंट को सामने रखना चाहेंगे, जिन्होंने उन्हें चुना है। बता दें कि बाइडेन के पास ज्यादातर प्राइमरी डेलीगेट्स का समर्थन हासिल है।

हालांकि तकनीकी तौर डेलीगेट्सअपना उम्मीदवार चुनने के लिए आजाद हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि अभी भी टेक्निकली डेमोक्रेटिक पार्टी से उम्मीदवार बाइडेन ही हैं। बाइडेन को पहले उम्मीदवारी से औपचारिक तौर पर मुक्त होना है, उसके बाद ही दूसरे उम्मीदवारों पर बात हो सकती है। दरअसल 1967 से पहले ये होता था कि जो पार्टी के शीर्ष नेताओं का प्रभाव बहुत ज्यादा होता था, लेकिन अब रूल बुक में बहुत सारी चीजें लिखित हैं,जिन्हें दिशानिर्देशों की तरह लिया जा है। अभी भी चार हजार प्राइमरी से जो ड्मोक्रेट चुन के आते हैं, वोट करते हैं कि कौन अध्यक्ष चुना जाएगा, ऐसे में वो विकल्प अभी खुला हुआ है और ये साफ है कि औपचारिक तौर पर बतौर उम्मीदवार रिलीज होने पर डेलीगेट्स अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं कि वो कमला हैरिस को चुनें, या फिर किसी और उम्मीदवार को।

अगर बाइडेन की पार्टी के किसी नेता को लगता है कि वो कमला हैरिस से बेहतर साबित हो सकते हैं, और हैरिस ट्रंप के खिलाफ दूसरे संभावित उम्मीदवारों के मुकाबले में कमजोर हो सकती हैं तो ऐसे में उन्हें 600 डेलिगेट्स के सिग्नेचर हासिल करने होंगे। इसके बाद वो बतौर उम्मीदवार नामित हो जाएंगे, जिसके बाद उनका मुकाबला कमला हैरिस से करना होगा। यानी किसी भी उम्मीदवार को डेमोक्रेटिक पार्टी के करीब 3900 प्राइमरी डेलीगेट्स के बहुमत को अपने पक्ष में लेना होगा। ऐसे में अगर कई डेलीगेट्स को नामांकन मिलता है, और किसी को बहुमत नहीं मिलता है, तो ऐसे में ‘ब्रोकर्ड कन्वेंशन’ आयोजित होगा। जिसमें डेलीगेट्स कई राउडंस में वोट कर सकते हैं जिससे कि एक उम्मीदवार चुना जा जा सके।

ध्यान देने वाली बात ये भी है कि मध्यस्थता वाला यानि ब्रोकर्ड कन्वेंशन पिछली बार 1952 में हुआ था जब इलिनियोस के गवर्नर एडेल स्टीवनसन ने बार बार ये कहा था कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं, लेकिन कन्वेंशन में एक जोरदार भाषण दिया। पहले राउंड में किसी एक विजेता के सामने ना आने पर इसके बाद डी आइजनहावर ने ना सिर्फ नामांकन हासिल किया था बल्कि स्टीवनसन को हरा भी दिया था। एक ऐसे विकल्प की संभावना सामने जताई जा रही है कि प्री कन्वेंशन वर्चुअल वोट भी हो सकता है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास कैंपेनिंग के लिए वक्त कम ही बचा है।

31 मई को दाखिल हुए कागजों के मुताबिक बाइडेन हैरिस कैंपेन से अब तक पार्टी के पास 91 मिलियन डॉलर इकट्ठा हो चुके हैं। जानकार कहते हैं कि क्योंकि डोनर्स ने ये धन तकनीकी तौर पर बाइडेन और हैरिस के साझा कैंपेन के लिए दिया था, ऐसे में बाइडेन के उम्मीदवारी वापस लेने के बाद मसला इस फंड को डोनर्स को वापस करने को लेकर भी है। अब जबकि चुनाव में 100 से कुछ ज्यादा दिन ही बचे हैं,ऐसे में अगर कोई और हैरिस की जगह बतौर उम्मीदवार होता है तो उस पर जीरो बैलेंस के साथ कैंपने का खतरा भी मंडरा रहा है। यही वजह है कि हैरिस ने अभी से अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर डोनर्स से फंड देने की मुहिम शुरू कर दी है। हालांकि हैरिस की उम्मीदवारी के पक्ष में ये बात है कि क्योंकि फंड का अकाउंट वहां के चुनाव आयोग में राष्ट्पति बाइडेन के साथ साथ साथ हैरिस के नाम पर भी है, ऐसे में अगर कोई दूसरा उम्मीदवार आता है तो उसे फंड रेजिंग शुरुआत से करनी होगी।

संविधान हत्या दिवस पर क्या बोले संजय रावत?

हाल ही में संजय रावत ने संविधान हत्या दिवस पर अपना बयान दिया है! केंद्र सरकार ने 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। 1975 में कांग्रेस पार्टी के लगाए गए इस आपातकाल का बचाव शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने किया है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधा और कहा कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी ऐसी ही स्थिति में प्रधानमंत्री होते, तो वह भी भारत में इमरजेंसी लगाते। उन्होंने कहा कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। संजय राउत ने कहा कि आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। भारत सरकार ने शुक्रवार को घोषणा की कि 25 जून को 1975 में इंदिरा गांधी सरकार घोषित आपातकाल की याद में हर साल संविधान हत्या दिवस के रूप में याद किया जाएगा। उनके पास काम नहीं है इसलिए वे देश के लोगों को भटका रहे हैं। उनका दिमाग ठिकाने नहीं है।’ पीएम मोदी को निशाने पर लेते हुए संजय राउत ने कहा, ‘अगर हम आपातकाल की बात करें तो पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार का हर दिन संविधान की हत्या के लिए चिह्नित किया जाएगा।’संजय राउत ने कहा, ‘उनके पास (बीजेपी) कोई काम नहीं बचा है।’

संजय राउत ने कहा, ’50 साल हो गए हैं और लोग आपातकाल को भूल चुके हैं। इस देश में आपातकाल क्यों लगाया गया था? कुछ लोग देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। रामलीला मैदान से खुला ऐलान किया गया, हमारे जवानों और सेना को कहा गया कि सरकार के आदेश का पालन न करें। तो ऐसी स्थिति में अगर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होते तो वे भी आपातकाल लगा देते।’

उद्धव ठाकरे की शिवसेना नेता ने कहा, ‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था, कुछ लोग देश में बम बना रहे थे और जगह-जगह बम फोड़ रहे थे। मैं आपको बताना चाहता हूं कि अमित शाह को आपातकाल के बारे में कुछ नहीं पता है। नकली शिवसेना (शिंदे) के साथ बाला साहब ठाकरे की तारीफ करने वालों ने आपातकाल का समर्थन किया है। बाला साहब ठाकरे ने उस समय आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। आरएसएस ने भी इसका समर्थन किया था।’

संजय राउत ने कहा, ‘शिवसेना नेता बाला साहब ठाकरे ने 1975 में आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी का खुलकर समर्थन किया था। मुंबई में उनका स्वागत किया गया था। उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया क्योंकि उन्हें लगा कि देश में अराजकता को नियंत्रित करने की जरूरत है। इसमें क्या गलत था?…बीजेपी के 10 साल के शासन में जो हुआ उसे याद रखा जाएगा। वे संविधान के रक्षक भी नहीं हैं।’राउत ने आगे कहा,’यह सब होने के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई। अटल बिहारी वाजपेई पीएम बने, उन्हें नहीं लगा कि संविधान की हत्या हुई है। लेकिन वे (बीजेपी) कौन हैं? उनके पास काम नहीं है इसलिए वे देश के लोगों को भटका रहे हैं। उनका दिमाग ठिकाने नहीं है।’ पीएम मोदी को निशाने पर लेते हुए संजय राउत ने कहा, ‘अगर हम आपातकाल की बात करें तो पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार का हर दिन संविधान की हत्या के लिए चिह्नित किया जाएगा।’

इससे पहले 26 जून को लोकसभा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगाए गए आपातकाल की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। अध्यक्ष ओम बिरला ने इस कृत्य की निंदा करते हुए प्रस्ताव पढ़ा और कहा कि 25 जून 1975 को भारत के इतिहास में हमेशा एक काले अध्याय के रूप में जाना जाएगा। बता दें कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। संजय राउत ने कहा कि आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। भारत सरकार ने शुक्रवार को घोषणा की कि 25 जून को 1975 में इंदिरा गांधी सरकार घोषित आपातकाल की याद में हर साल संविधान हत्या दिवस के रूप में याद किया जाएगा।उद्धव ठाकरे की शिवसेना नेता ने कहा, ‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था, कुछ लोग देश में बम बना रहे थे और जगह-जगह बम फोड़ रहे थे। मैं आपको बताना चाहता हूं कि अमित शाह को आपातकाल के बारे में कुछ नहीं पता है। 1975 में लगाए गए आपातकाल के 50 साल पूरे होने के अवसर पर, बिरला ने उन सभी लोगों की ताकत और दृढ़ संकल्प की प्रशंसा की, जिन्होंने आपातकाल का कड़ा विरोध किया, लड़ाई लड़ी और भारत के लोकतंत्र की रक्षा की।

क्या अब आपातकाल को पाठ्यक्रम में किया जाएगा शामिल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब आपातकाल को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा या नहीं! राज्यसभा में सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक सदस्य ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की बहाली के लिए हुए प्रयासों की तुलना स्वतंत्रता संग्राम में हुए संघर्ष से करते हुए इस कालखंड के इतिहास को स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की मांग उठाई। उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए भाजपा के नरेश बंसल ने कहा कि आपातकाल को अगर सही तरीके से पाठ्य पुस्तकों में स्थान दिया जाए तो देश में लोकतांत्रिक शक्तियों का विकास होगा और प्रजातंत्र की जड़ें भी मजबूत होंगी। आपातकाल को भारत के लोकतंत्र का ‘काला अध्याय’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि इसे कभी बुलाया नहीं जा सकता क्योंकि उस समय के ‘रक्षक ही भक्षक’ बन गए थे। उन्होंने कहा कि देश में 1975 में आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और इस दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।बंसल ने कहा कि सभी छात्रों के लिए पाठ्य पुस्तकों में एक पाठ होना चाहिए कि आपातकाल क्या था, इसे कैसे और क्यों लगाया गया। छात्रों को आपातकाल के बारे में जानना चाहिए। उन बलिदानियों के संघर्ष को वर्तमान और भावी पीढ़ी जान सके, इसलिए आपातकाल की संपूर्ण कथा बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि आपातकाल को अगर सही तरीके से पाठ्य पुस्तकों में स्थान दिया जाए तो लोकतांत्रिक शक्तियों का विकास होगा और प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत होंगी।

बंसल ने कहा कि भावी पीढ़ी को इस ‘काले अध्याय’ से परिचित कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम की तरह लोकतंत्र बहाली के संघर्ष के इतिहास को भी स्कूल एवं कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आपातकाल लगाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के संविधान का गला घोंट दिया था और देश के लोकतंत्र पर कलंक लगाया था। आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता का हनन, सहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कुचला गया था। इसके साथ ही हजारों लोगों को बिना कारण के जेलों में ठूंस दिया गया। देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए अनेक लोगों ने बलिदान दिया।उन्होंने कहा कि आपातकाल का वह समय लोकतांत्रिक सेनानियों के लिए एक दुस्वप्न है जिसे याद कर आज भी उनकी आंखें नम हो जाती है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा विपक्ष के ज्यादातर नेता भी आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों के शिकार हुए थे। ज्ञातव्य है कि देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया था। यह 21 मार्च 1977 यानी 21 महीने तक लागू रहा। हाल ही में केंद्र सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है। यही नहीं राज्यसभा सदस्य बंसल ने कहा कि वर्ष 1975 में देश पर थोपा गया आपातकाल लोकतंत्र के माथे पर काला दाग है। 21 माह तक चले आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रता का हनन, असहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का हनन हुआ था। हजारों लोग बिना कारण जेलों में ठूंस दिए गए। तब लोकतंत्र बचाने को हजारों लोग बलिदान हुए।उन्होंने कहा कि केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के साथ जब जो विश्वासघात किया, उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल-कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

आपातकाल को भारत के लोकतंत्र का काला अध्याय करार देते हुए उन्होंने कहा कि इसे कभी बुलाया नहीं जा सकता क्योंकि उस समय के रक्षक ही भक्षक बन गए थे. उन्होंने ये भी कहा कि देश में 1975 में आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और इस दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए. भावी पीढ़ी को इस काले अध्याय से परिचित कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम की तरह लोकतंत्र बहाली के संघर्ष के इतिहास को भी स्कूल एवं कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.उन्होंने कहा कि आपातकाल लगाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के संविधान का गला घोंट दिया था और देश के लोकतंत्र पर कलंक लगाया था. आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता का हनन, सहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कुचला गया था. इसके साथ ही हजारों लोगों को बिना कारण के जेलों में ठूंस दिया गया. देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए अनेक लोगों ने बलिदान दिया.

बजट सत्र से पहले संसद में क्या हुआ था?

आज हम आपको बताएंगे कि बजट सत्र से पहले संसद में क्या-क्या हुआ था! संसद के आगामी बजट सत्र की तैयारियों के लिए सरकार ने रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाई। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठक आयोजित की। इसमें सत्र के दौरान उठाए जाने वाले मुद्दों पर चर्चा की गई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया कि बैठक के दौरान जेडी(यू) नेताओं ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, जबकि वाईएसआरसीपी ने आंध्र प्रदेश के लिए भी यही मांग की। गौरतलब है कि टीडीपी नेता इस मुद्दे पर चुप रहे। जयराम रमेश ने ट्वीट किया, कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आज हुई सर्वदलीय बैठक में जेडी(यू) नेता ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे बाधित किया गया था, राजनाथ सिंह जी ने आज अपील की है कि यह संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। बता दें कि सरकार छह विधेयक पेश कर सकती है। इसमें 90 साल पुराने विमान अधिनियम को बदलने का प्रस्ताव भी शामिल है। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए बजट के लिए संसद की मंजूरी भी मांगेगी, जो वर्तमान में संघीय शासन के अधीन है। उन्होंने कहा कि जब पीएम बोल रहे हों, तो सदन और देश को इसे सुनना चाहिए।वाईएसआरसीपी नेता ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। हैरानी की बात है कि टीडीपी नेता इस मामले पर चुप रहे।

रमेश के अनुसार, सर्वदलीय बैठक में 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के गठन तथा उन पर समुचित ध्यान दिए जाने के लिए सर्वसम्मति से समर्थन किया गया।हाल ही में लोकसभा में उपनेता नियुक्त किए गए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी, ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के बारे में चिंता जताई। उन्होंने डिप्टी स्पीकर के पद की मांग दोहराई। समाजवादी पार्टी के सांसद राम गोपाल यादव ने उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के दौरान खाद्य पदार्थों की दुकानों पर नाम-प्लेट लगाने के उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया निर्देश पर प्रकाश डाला।

 संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने चर्चा को बेहद रचनात्मक बताया। उन्होंने भाग लेने वाले सभी दलों के फ्लोर नेताओं का आभार व्यक्त किया। किरेन रिजिजू ने कहा कि हमारी चर्चा बहुत उपयोगी रही। मैं सभी दलों के फ्लोर नेताओं को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने अच्छे सुझाव दिए हैं। बैठक में भाजपा सहित 44 दलों ने हिस्सा लिया। हमने सभी फ्लोर नेताओं से सुझाव लिए हैं। संसद को सुचारू रूप से चलाना, सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपील की कि हम लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब कोई सदस्य संसद में बोलता है, तो हमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और न ही बीच में बोलना चाहिए। विशेष सत्र में, जब पीएम मोदी राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर भाषण दे रहे थे, तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे बाधित किया गया था, राजनाथ सिंह जी ने आज अपील की है कि यह संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि जब पीएम बोल रहे हों, तो सदन और देश को इसे सुनना चाहिए।

संसद का बजट सत्र सोमवार, 22 जुलाई से शुरू होने वाला है। इसमें 12 अगस्त तक 19 बैठकें होंगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंगलवार को केंद्रीय बजट पेश करेंगी, जबकि सोमवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाएगा। बता दें कि जयराम रमेश ने ट्वीट किया, कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आज हुई सर्वदलीय बैठक में जेडीयू नेता ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। वाईएसआरसीपी नेता ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। हैरानी की बात है कि टीडीपी नेता इस मामले पर चुप रहे। यही नहीं सर्वदलीय बैठक में 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के गठन तथा उन पर समुचित ध्यान दिए जाने के लिए सर्वसम्मति से समर्थन किया गया।

हाल ही में लोकसभा में उपनेता नियुक्त किए गए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी, ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के बारे में चिंता जताई। इस दौरान सरकार छह विधेयक पेश कर सकती है। इसमें 90 साल पुराने विमान अधिनियम को बदलने का प्रस्ताव भी शामिल है। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए बजट के लिए संसद की मंजूरी भी मांगेगी, जो वर्तमान में संघीय शासन के अधीन है।

क्या नेपाल के नए प्रधानमंत्री के कारण भारत की बढ़ेगी टेंशन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नेपाल के नए प्रधानमंत्री के कारण भारत की टेंशन बढ़ेगी या नहीं! नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ शुक्रवार को संसद में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाए। पिछले सप्ताह उनकी सरकार से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। इस घटनाक्रम के बाद पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में नयी सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया है। देश की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 69 वर्षीय प्रचंड को 63 वोट मिले, जबकि विश्वासमत प्रस्ताव के विरोध में 194 वोट पड़े। विश्वासमत हासिल करने के लिए कम से कम 138 वोट की जरूरत थी। प्रतिनिधि सभा के 258 सदस्यों ने मतदान में भाग लिया, जबकि एक सदस्य अनुपस्थित रहा। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओइस्ट सेंटर (सीपीएन-एमसी) के अध्यक्ष प्रचंड 25 दिसंबर, 2022 को पद संभालने के बाद चार बार विश्वासमत हासिल करने में सफल रहे, लेकिन इस बार उन्हें असफलता मिली। प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष देव राज घिमिरे ने प्रचंड के विश्वासमत प्रस्ताव को संविधान के अनुच्छेद 100 खंड 2 के अनुसार मतदान के लिए रखा। मतदान पूरा होने के बाद उन्होंने घोषणा की कि प्रधानमंत्री प्रचंड विश्वासमत हासिल करने में असफल रहे।

अध्यक्ष घिमिरे अब राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को सूचित करेंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 76 खंड 2 के अनुसार दो या दो से अधिक राजनीतिक दलों को नयी सरकार के लिए दावा पेश करने के लिए आमंत्रित करेंगे। इससे नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के लिए नयी गठबंधन सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल ने सदन में सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के साथ सत्ता-साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पिछले सप्ताह प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

नेपाली कांग्रेस के पास प्रतिनिधि सभा में 89 सीट हैं, जबकि सीपीएन-यूएमएल के पास 78 सीट हैं। इस तरह दोनों की संयुक्त संख्या 167 है, जो निचले सदन में बहुमत के लिए आवश्यक 138 से कहीं अधिक है। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा पहले ही अगले प्रधानमंत्री के रूप में ओली का समर्थन कर चुके हैं। देउबा और ओली ने प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार को अपदस्थ करने और नयी गठबंधन सरकार बनाने के लिए सोमवार को सात सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

समझौते के अनुसार, ओली और देउबा प्रतिनिधि सभा की शेष अवधि के दौरान बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद साझा करेंगे। पहले चरण में ओली डेढ़ साल के लिए प्रधानमंत्री बनेंगे और उसके बाद बाकी अवधि के लिए देउबा प्रधानमंत्री रहेंगे। प्रचंड की पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में 32 सीट हैं। वह सीपीएन-यूएमएल के समर्थन से 25 दिसंबर 2022 को तीसरी बार प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए थे। प्रचंड को नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 खंड 2 के अनुसार प्रधानमंत्री चुना गया था, जिसमें दो या दो से अधिक दलों के समर्थन से प्रधानमंत्री चुनने का प्रावधान है। बता दें कि ओली के पिछले कार्यकाल में भारत-नेपाल सीमा विवाद चरम पर था। उनकी सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा प्रकाशित किया था, जिसमें भारत के कालापानी, लिंपियाधुरा, लिपुलेख जैसे कई इलाकों को नेपाल का हिस्‍सा बताया गया था। ओली ने कई सार्वजनिक भाषणों में भारत से जमीन का वह हिस्सा वापस लेने का दंभ भी भरा था। उन्होंने यहां तक कहा था कि नेपान उन हिस्सों को वापस लेने में सक्षम है। तब भारत ने नेपाल के इस नक्शे पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। शुक्रवार दोपहर प्रतिनिधि सभा का सत्र शुरू होते ही प्रचंड ने साझा सिद्धांतों के बजाय ‘‘डर के चलते’’ गठबंधन बनाने को लेकर नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल की तीखी आलोचना की तथा उन पर देश को पीछे की ओर धकेलने का आरोप लगाया।

यही नहीं ओली ने अपने गठबंधन सहयोगी नेपाली कांग्रेस के साथ नयी गठबंधन सरकार में शामिल किए जाने वाले मंत्रियों की सूची तैयार करने को लेकर शनिवार को विचार विमर्श किया। नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के करीबी सूत्रों ने बताया, ‘‘राष्ट्रपति सोमवार सुबह नए प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों को शपथ दिला सकते हैं। ओली के एक करीबी सूत्र ने बताया कि कुल 21 मंत्रालयों में से नेपाली कांग्रेस को नौ मंत्रालय और सीपीएन-यूएमएल को आठ मंत्रालय मिलेंगे, साथ ही प्रधानमंत्री का पद भी मिलेगा। सूत्र ने बताया, ‘‘गृह, विदेश, वित्त और ऊर्जा जैसे प्रमुख पदों को एनसी और यूएमएल के बीच बांटा जाएगा। नेपाली कांग्रेस को गृह मंत्रालय मिलने की संभावना है, जबकि वित्त मंत्रालय यूएमएल को मिलेगा।’

क्या नेपाल के साथ भड़केगा सीमा विवाद?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब नेपाल के साथ सीमा विवाद भड़क सकता है या नहीं! नेपाल में सीपीएन-यूएमएल पार्टी के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली को नयी गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने के लिए रविवार को तीसरी बार देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। ये वही ओली हैं, जिनके कार्यकाल में भारत-नेपाल सीमा विवाद गहरा गया था। ओली ने पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की जगह ली है, जो शुक्रवार को प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत हार गए थे। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के अनुसार नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने ओली को नेपाल-यूनीफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन-यूएमएल) और नेपाली कांग्रेस गठबंधन सरकार का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया। ओली नई मंत्रिपरिषद के साथ सोमवार को शपथ लेंगे। शुक्रवार देर रात ओली ने नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया और प्रतिनिधि सभा के 165 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र सौंपा, जिसपर उनकी पार्टी से 77 तथा नेपाली कांग्रेस से 88 सदस्यों के दस्तखत थे। ओली ने इससे पहले 11 अक्टूबर 2015 से तीन अगस्त 2016 तक और फिर पांच फरवरी 2018 से 13 जुलाई 2021 तक नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था।

ओली के पिछले कार्यकाल में भारत-नेपाल सीमा विवाद चरम पर था। उनकी सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा प्रकाशित किया था, जिसमें भारत के कालापानी, लिंपियाधुरा, लिपुलेख जैसे कई इलाकों को नेपाल का हिस्‍सा बताया गया था। ओली ने कई सार्वजनिक भाषणों में भारत से जमीन का वह हिस्सा वापस लेने का दंभ भी भरा था। उन्होंने यहां तक कहा था कि नेपान उन हिस्सों को वापस लेने में सक्षम है। तब भारत ने नेपाल के इस नक्शे पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि उनकी सरकार गिर जाने के बाद मानचित्र विवाद ठंडे बस्ते में चला गया था। ऐसे में ओली के एक बार फिर नेपाल का प्रधानमंत्री बनने से भारत के साथ सीमा विवाद भड़कने के आसार हैं।

ओली ने अपने गठबंधन सहयोगी नेपाली कांग्रेस के साथ नयी गठबंधन सरकार में शामिल किए जाने वाले मंत्रियों की सूची तैयार करने को लेकर शनिवार को विचार विमर्श किया। नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के करीबी सूत्रों ने बताया, ‘‘राष्ट्रपति सोमवार सुबह नए प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों को शपथ दिला सकते हैं। शपथ ग्रहण समारोह शुरू होने से पहले सोमवार को एक छोटे मंत्रिमंडल की घोषणा होने की संभावना है।’’

ओली के एक करीबी सूत्र ने बताया कि कुल 21 मंत्रालयों में से नेपाली कांग्रेस को नौ मंत्रालय और सीपीएन-यूएमएल को आठ मंत्रालय मिलेंगे, साथ ही प्रधानमंत्री का पद भी मिलेगा। सूत्र ने बताया, ‘‘गृह, विदेश, वित्त और ऊर्जा जैसे प्रमुख पदों को एनसी और यूएमएल के बीच बांटा जाएगा। नेपाली कांग्रेस को गृह मंत्रालय मिलने की संभावना है, जबकि वित्त मंत्रालय यूएमएल को मिलेगा।’’ इससे पहले, शनिवार को सीपीएन-यूएमएल ने भविष्य की रणनीति पर चर्चा करने और नए मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले मंत्रियों के नामों को अंतिम रूप देने के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक की।नेपाल में जनमत से उसे राहत मिल सकती है, जो अब चीन के बहुत करीबी आने की लंबे समय तक कीमत, कर्ज के जाल में फंसने के जोखिम और भारत की तुलना में चीनी क्षमताओं के मामले में सीमाओं के बारे में बहुत सतर्क है। 1950 की संधि और सीमा मुद्दे जैसे पारंपरिक अड़चनों को सहयोग की भावी दिशाओं को प्रभावित करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, पार्टी के वरिष्ठ नेता और स्थायी समिति के सदस्य राजन भट्टराई के अनुसार, शुरुआत में एक छोटा मंत्रिमंडल होगा, जिसका बाद में विस्तार किया जाएगा।

सीमा के दोनों ओर पिरामिड के निचले हिस्से में रहने वाले लोगों के लिए एक परिवर्तनकारी भविष्य को प्राप्त करने के लिए एक एक्सपर्ट ग्रुप क्यों नहीं बनाया जा सकता? रोटी-बेटी, भोजन और विवाह बंधन के पुराने नारे के बजाय इस समय के उत्साहवर्धक विषय के रूप में ‘सर्वांगीण विकास में तेजी’ आज के परिवर्तित नेपाल में गूंज सकती है। माओवादियों के मुख्यधारा में आने के बाद से वामपंथी अधिकांश सरकारों में सत्ता में रहे हैं, क्योंकि यह जाति, लिंग या संस्कृति के आधार पर पारंपरिक असमानताओं को कम करने की संभावनाएँ प्रदान करता है। भले ही इसका प्रदर्शन अब तक निराशाजनक रहा हो। अस्थिरता के बावजूद द्विपक्षीय सहयोग में सर्वसम्मति आधारित निरंतरता सुनिश्चित करने का यही एकमात्र तरीका है।भारत के लिए नेपाल के वामपंथियों के साथ गहन रूप से जुड़ना भी महत्वपूर्ण है, भले ही पारंपरिक मित्रों के साथ मजबूत संबंध बने रहें।

 

क्या नेपाल के लिए भारत को जरूरत है एक नई रणनीति की?

नेपाल के लिए भारत को एक नई रणनीति की जरूरत है! काठमांडू में एक और राजनीतिक नाटक सामने आया है। नेपाल का संवैधानिक राजतंत्र से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में परिवर्तन अंतहीन और अराजक लग रहा है। यह सरकार के लगातार बदलावों, गठबंधन सहयोगियों के अवसरवादी बदलाव, अत्यधिक राजनीतिकरण वाली संस्थाओं, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अक्सर रेड लाइन को पार करने, खासकर चीन के मामले में, की विशेषता रही है। मौजूदा प्रकरण में, प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की तरफ से शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस से अलग होने के बाद पूर्व कम्युनिस्ट सहयोगी के पी शर्मा ओली के साथ एक नया गठबंधन बनाने के कुछ ही दिनों के भीतर, एक बार फिर गठबंधन सहयोगियों और दुश्मनों के बीच पाला बदलने की घटना हुई। ओली (अब नेपाल के नए प्रधानमंत्री) और देउबा ने 2027 में होने वाले अगले चुनावों तक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक नई घूर्णी व्यवस्था के तहत प्रधान मंत्री पद को साझा करने पर एक ‘समझ’ बनाई है। ये सैद्धांतिक रूप से संभव है क्योंकि दोनों के पास दो सबसे बड़ी पार्टियों के रूप में 278 संसदीय सीटों में से 167 सीटें हैं।

प्रचंड की माओवादी सेंटर (एमसी) सिर्फ 32 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर थी। हालांकि वे अपनी टैक्टिकल राजनीतिक कलाबाजी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार वे काफी पीछे रह गए। हालांकि, विश्वास मत से एक दिन पहले, उनके कमजोर मंत्रिमंडल ने चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत एक रेलवे परियोजना को मंजूरी दे दी। ओली के साथ उनके गठबंधन के कुछ दिनों के दौरान, उनकी वामपंथी-प्रभुत्व वाली सरकार ने 100 रुपये के नोटों पर एक नक्शा छापने का आश्चर्यजनक निर्णय भी लिया। इस नक्शे में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा के भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था!

भारत को उम्मीद है कि नेपाली कांग्रेस के नए गठबंधन के प्रमुख सदस्य होने के कारण इस तरह के दुस्साहस को कम किया जाएगा। इस उम्मीद को अन्य संकेतों से बल मिलता है। उदाहरण के लिए, ओली के प्रमुख सलाहकार राजन भट्टाराई का सार्वजनिक बयान कि ओली नेपाल के विकास के लिए भारत के साथ अच्छे संबंधों को आवश्यक मानते हैं और मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। देउबा की पत्नी आरजू राणा को विदेश मंत्री के रूप में नियुक्त किया जाना। उनका प्रारंभिक बयान कि भारत के साथ सीमा विवादों को तथ्यों और साक्ष्यों के माध्यम से हल किया जाना चाहिए, अनावश्यक संघर्षों से बचना चाहिए।

जबकि ओली को अक्सर भारत विरोधी के रूप में चित्रित किया जाता है, अतीत में, वे विपरीत कारणों से नेपाल में आंतरिक रूप से आलोचना के घेरे में आ चुके हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का संदेह, जो जाहिर तौर पर अधिकांश राजनीतिक नेताओं और उनके प्रति वफादार वरिष्ठ नौकरशाहों से जुड़ा हुआ है, लंबे समय तक छाया बना रहा है। इसके अलावा, ओली 72 साल के हैं, देउबा 78 और प्रचंड 69 साल के हैं। बेचैन युवा राजनेता प्रतीक्षा कर रहे हैं। इन्होंने 10 साल के दर्दनाक माओवादी विद्रोह का खामियाजा भुगता है, या तो अपराधी के रूप में या क्रूरता के शिकार के रूप में। राजनीतिक मंथन निकट भविष्य में जारी रहने की संभावना है। इसकी पुरानी राजनीतिक अस्थिरता पहले से ही विदेशी और घरेलू दोनों तरह के निवेश के लिए एक गंभीर अवरोधक है। ऐसे समय में जब बीमार अर्थव्यवस्था को इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

इसके बाद बाहरी खिलाड़ियों की तरफ से स्थिति का फायदा उठाने की वास्तविक संभावना है। प्रचंड और ओली दोनों ने हाल के वर्षों में कई बार भारत की तीव्र असुविधा के लिए चीन का इस्तेमाल किया है या खुद को चीन द्वारा इस्तेमाल किए जाने दिया है। चीन खुद दो मुख्य वामपंथी दलों को एक साथ आने के लिए आग्रह करने में बहुत खुले तौर पर और सक्रिय रहा है, लेकिन अगर यह सफल नहीं होता है, तो भी नेपाल को भारत विरोधी, पश्चिम विरोधी और नई अनिश्चित विश्व व्यवस्था में भरोसेमंद साथी के रूप में बदलने के अपने एकतरफा मिशन को जारी रखने से उसे कोई नहीं रोक सकता। चीन के स्पष्ट रणनीतिक इरादे को देखते हुए, भारत को वर्तमान सरकार के राजनीतिक स्वरूप से इतर एक नई और व्यापक जवाबी रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।

हालांकि, नेपाल में जनमत से उसे राहत मिल सकती है, जो अब चीन के बहुत करीबी आने की लंबे समय तक कीमत, कर्ज के जाल में फंसने के जोखिम और भारत की तुलना में चीनी क्षमताओं के मामले में सीमाओं के बारे में बहुत सतर्क है। 1950 की संधि और सीमा मुद्दे जैसे पारंपरिक अड़चनों को सहयोग की भावी दिशाओं को प्रभावित करने की आवश्यकता नहीं है। सीमा के दोनों ओर पिरामिड के निचले हिस्से में रहने वाले लोगों के लिए एक परिवर्तनकारी भविष्य को प्राप्त करने के लिए एक एक्सपर्ट ग्रुप क्यों नहीं बनाया जा सकता? रोटी-बेटी (भोजन और विवाह बंधन) के पुराने नारे के बजाय इस समय के उत्साहवर्धक विषय के रूप में ‘सर्वांगीण विकास में तेजी’ आज के परिवर्तित नेपाल में गूंज सकती है। भारत के लिए नेपाल के वामपंथियों के साथ गहन रूप से जुड़ना भी महत्वपूर्ण है, भले ही पारंपरिक मित्रों के साथ मजबूत संबंध बने रहें।

माओवादियों के मुख्यधारा में आने के बाद से वामपंथी अधिकांश सरकारों में सत्ता में रहे हैं, क्योंकि यह जाति, लिंग या संस्कृति के आधार पर पारंपरिक असमानताओं को कम करने की संभावनाएँ प्रदान करता है। भले ही इसका प्रदर्शन अब तक निराशाजनक रहा हो। अस्थिरता के बावजूद द्विपक्षीय सहयोग में सर्वसम्मति आधारित निरंतरता सुनिश्चित करने का यही एकमात्र तरीका है। वर्तमान अत्यधिक अस्थिर और अप्रत्याशित परिदृश्य में, एकमात्र मंत्र जो काम करने की संभावना है, वह है अतीत से सीखना ताकि टालने योग्य गलतफहमियां फिर से न हों। वर्तमान को यथासंभव सर्वोत्तम तरीके से प्रबंधित करें। संबंधों में स्थिर विकास पथ के लिए एक अंतर-दलीय सर्वसम्मति आधारित भविष्य को आकार देने का प्रयास करें।

क्या अग्नि वीर कर रहे हैं अन्य जॉब सर्च?

वर्तमान में अग्नि वीर अन्य जॉब सर्च कर रहे हैं! रक्षा मंत्रालय की अग्निपथ स्कीम को लेकर विपक्ष केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर है। इस बीच सेना के एक शीर्ष अधिकारी की तरफ से अग्निपथ स्कीम और अग्निवीर को लेकर कई बातें कही गई हैं। लेफ्टिनेंट जनरल चन्नीरा बंसी पोनप्पा का कहना है कि अग्निवीर के साथ सेना में किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता है। उन्होंने विपक्ष के इस आरोप का खंडन किया कि केंद्र ने सैनिकों की दो श्रेणियां बना दी हैं। लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि अग्निवीर समान ही वर्दी पहनते हैं और एक ही ड्यूटी निभाते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में उनकी स्थिति थोड़ी बेहतर है। अग्निपथ योजना की वर्तमान स्थिति और नियोजित अग्निवीरों की संख्या के बारे में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल पोनप्पा ने कहा कि जून 2022 से यह योजना शुरू की गई। इसके बाद हमारे पास पहला बैच था। इस बैच को दिसंबर 2022-जनवरी 2023 में भर्ती और एनरॉल किया गया। लगभग 1 लाख अग्निवीर सेना में एनरॉल्ड किए गए हैं। इसमें लगभग 200 महिलाएं भी शामिल हैं। लेफ्टिनेंट जनरल चन्नीरा बंसी पोनप्पा ने कहा कि इस वर्ष 2024-25 में लगभग 50,000 वेकेंसी जारी की गई हैं। भर्ती प्रक्रिया जारी है।

लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि लगभग 70,000 अग्निवीरों को पहले ही यूनिट में भेजा जा चुका है। लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि सभी अग्निवीर अपनी संबंधित बटालियनों में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे यह कहना होगा कि वे सभी ऐक्शन, ऑपरेशन और अन्य प्रोफेशनल ड्यूटी उसी प्रकार निभा रहे हैं, जैसे यूनिट में अन्य सिपाही या रंगरूट करते हैं। वे लोग अपनी यूनिट में पूरी तरह से घुलमिल गए हैं। अधिकारी ने कहा कि और हम देखते हैं कि कुछ क्षेत्रों में तो वे थोड़े बेहतर हैं। फिजिकल टेस्ट में लगभग 10% बेहतर हैं। और वे अपनी शिक्षा में लगभग 20% बेहतर हैं। संभवतः यह उनके केंद्रित दृष्टिकोण से संबंधित है।

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में पूर्व अग्निवीरों की भर्ती का बड़ा कदम उठाया था। इसके तहत केंद्रीय बलों में पूर्व अग्निवीरों के पहले बैच के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण और उम्र में छूट के प्रावधान किए गए हैं। इतना ही नहीं, पूर्व अग्निवीरों को शारीरिक दक्षता परीक्षा से भी छूट मिलेगी। इससे पहले सरकार ने फैसला किया था कि अग्निवीर जीडी, अग्निवीर टेक, अग्निवीर ऑफिस असिस्टेंट/एसकेटी, अग्निवीर ट्रेड्समैन के जरिए युवा सेना में भर्ती के लिए आवेदन कर सकते हैं। अग्निवीर टेक में सांइस (पीसीएम) वाले युवाओं को मौका मिलेगा। वहीं, अग्निवीरों को भारतीय वायु सेना में भी अवसर मिल रहा है। अग्निवीर की इस भर्ती में केवल अविवाहित युवा ही आवेदन कर सकते हैं। बता दें कि हरियाणा सरकार ने घोषणा की है कि अग्निवीरों को कॉन्स्टेबल, माइनिंग गार्ड, फॉरेस्ट गार्ड, जेल वार्डन और एसपीओ के पदों पर भर्ती में 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। इसके अलावा अग्निवीरों को सरकारी नौकरियों में ग्रुप सी और ग्रुप डी के पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा में 3 साल की छूट दी जाएगी। अग्निवीरों को चार विभागों में 10 फीसदी आरक्षण देने तथा प्राथमिकता के आधार पर आर्म्स लाइसेंस जारी करने का ऐलान किया है। हरियाणा में कांग्रेस लगातार सत्ता में आने के बाद अग्निवीर योजना को समाप्त करने का ऐलान कर रही है।

चंडीगढ़ में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने यह ऐलान किया कि सेना से चार साल के बाद लौटने वाले अग्निवीरों को हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल, फॉरेस्ट और माइनिंग गार्ड, जेल वार्डन व एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) की भर्ती में दस प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। सीधी भर्ती में अग्निवीरों को यह सुविधा मिलेगी। सरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिए तय उम्र सीमा में भी अग्निवीरों को छूट मिलेगी। अग्निवीरों के पहले बैच को उम्र में पांच साल की छूट दी जाएगी। इसके बाद के बैच के लिए यह छूट तीन साल के लिए होगी। सरकार ने ग्रुप-सी और ग्रुप-डी यानी तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों में भी आरक्षण लागू करने का फैसला किया है।

सीएम ने कहा कि कांग्रेस केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना को लेकर दुष्प्रचार कर रही है। यह पीएम नरेंद्र मोदी की लोकहित की योजना है। इसके माध्यम से स्किल और एक्टिव युवा तैयार होंगे। 14 जून, 2022 को लागू की गई इस योजना के तहत भारतीय सेनाओं में चार सालों के लिए अग्निवीर भर्ती किए जा रहे हैं। चार वर्षों की सर्विस के बाद कुल अग्निवीरों में से 25 प्रतिशत स्थायी होंगे और बाकी रिटायर हो जाएंगे। इससे पहले केंद्र सरकार ने चार वर्षों के बाद रिटायर होने वाले अग्निवीरों को अर्धसैनिक बलों की भर्ती में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है। स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) की सीधी भर्ती में भी अग्निवीरों को 10 फीसदी का आरक्षण मिलेगा। एसपीओ के तहत सेना व अर्धसैनिक बलों के रिटायर्ड जवानों को नियुक्त किया जाता है।

क्या यूपी की तरह है उत्तराखंड में भी लगानी होगी नेम प्लेट?

अब यूपी की तरह उत्तराखंड में भी नेम प्लेट लगाई जा सकती है! यूपी की तर्ज पर अब उत्‍तराखंड सरकार ने फैसला लिया है कि हरिद्वार में कांवड़ यात्रा के दौरान दुकानों के आगे मालिक का नाम लिखना जरूरी होगा। हरिद्वार एसएसपी ने इस बात की पुष्टि की है। अब दुकान मालिक और स्‍टाफ का नाम लिखना जरूरी होगा। इसी आधार पर दुकानदारों का वेरिफिकेशन किया जाएगा। हरिद्वार में कांवड़ मेले को लेकर पुलिस मुस्तैद हो गई है। यही नहीं बिहार के संदर्भ में योगी आदित्यनाथ के इस फैसले के बाद आरजेडी की तरफ से हमला काफी तेज हो गया है। राज्य में अभी चार विधान सभा पर चुनाव होने हैं और यदि वर्ष 2025 के पहले चुनाव हुए तो एनडीए के कई मित्र दलों में परेशानी बढ़ जाएगी।उत्तर प्रदेश के बाद अब हरिद्वार में भी होटल और ढाबा संचालकों के साथ बोर्ड में नाम लिखने को लेकर सख्ती की जा रही है। हरिद्वार एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल ने होटल और ढाबों पर संचालकों/प्रोपराइटरों का नाम लिखना अनिवार्य कर दिया है।

संचालकों और प्रोपराइटरों का नाम अंकित न करने वालों पर पुलिस शिकंजा कस रही है। पुलिस इस मामले में चेकिंग अभियान भी चला रही है। सावन के कावड़ मेल की शुरुआत 22 जुलाई से होने जा रही है। जिसके लिए पुलिस पूरी तरह से सतर्क है। यात्रा और यात्रियों की सुरक्षा के इंतजाम को लेकर पुलिस मुस्तैदी से जुटी हुई है। वहीं होटल और ढाबा कारोबारियों के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। साथ ही इसका पालन न करने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। इसी सिलसिले में पुलिस ने होटल और ढाबों पर संचालकों व प्रोपराइटरों के नाम न लिखने वालों के चालान करना शुरू कर दिया है। पुलिस ने होटल और ढाबा संचालकों को साफ तौर पर हिदायत दी है कि साइन बोर्ड पर अपना नाम लिखें। रेट लिस्ट और सीसीटीवी कैमरा लगाने के भी निर्देश दिए गए हैं। निर्देशों का पालन न करने पर सख्त कार्रवाई अमल में लाने की चेतावनी भी पुलिस ने दी है। हालांकि इसके बावजूद हरिद्वार क्षेत्र में कई होटल संचालकों ने पुलिस के निर्देशों का पालन नहीं किया।

पुलिस ने होटल ढाबा संचालकों को यह भी निर्देश दिए हैं कि कावड़ मेले के दौरान होटल ढाबे में मांस, अंडा, लहसुन, प्याज का उपयोग नहीं किया जाएगा। मदिरा और मादक पदार्थों का सेवन भी नहीं करायेंगे। होटल और ढाबे में खाने की लिस्ट मुख्य स्थान पर चस्पा की जाएगी। भुगतान के लिए होटल ढाबे पर संचालक के नाम का क्यूआर कोड रखा जाएगा। वहीं कांवड़ मेला 2024 को सकुशल संपन्न करने के लिए सभी थाना प्रभारी ने अपने-अपने क्षेत्र में सीएलजी सदस्यों, ग्राम सुरक्षा समिति के सदस्य और ग्राम प्रधानों के साथ गोष्ठी भी की है। जिसमें इन सभी को कांवड़ मेला पर्व के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सहयोग करने की अपील की गई है।

कांवड़ यात्रा 22 जुलाई से चल रही है। खबर है कि उत्‍तराखंड के रुड़की में भी हाइवे पर बने ढाबों का वेरिफिकेशन शुरू कर दिया गया है। यहां मौजूद दुकानदारों, ढाबेवालों और फलवालों से कहा गया है कि वे अपना नाम लिखें। रुड़की भी कांवड़ रूट पर आता है। यूपी में पहले मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामली के लिए ऐसे निर्देश दिए गए थे। शुक्रवार को योगी सरकार ने पूरे यूपी में कांवड़ पथ पर इसे लागू करने का आदेश जारी कर दिया। इसे ले कर विपक्षी दलों ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है। यही नहीं बिहार के संदर्भ में योगी आदित्यनाथ के इस फैसले के बाद आरजेडी की तरफ से हमला काफी तेज हो गया है। राज्य में अभी चार विधान सभा पर चुनाव होने हैं और यदि वर्ष 2025 के पहले चुनाव हुए तो एनडीए के कई मित्र दलों में परेशानी बढ़ जाएगी।  सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांवड़ ले जाने वाले श्रद्धालुओं की आस्‍था का सम्‍मान करते हुए यह कदम उठाया गया है। कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों को अपने मालिकों के नाम प्रदर्शित करने को कहा गया है, क्योंकि इससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने भी फैसले पर एक बार फिर से समीक्षा करने की मांग की है।सीएम योगी ने यह भी कहा है कि प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन वाले सामान बेचने वालों पर भी कार्रवाई की जाएगी।

क्या योगी के फैसले से दूसरे राज्य बिहार में चल रही है हलचल?

वर्तमान में सीएम योगी की फैसले से दूसरे राज्य बिहार में हलचल मच गई है! बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का वह वक्तव्य अतिश्योक्ति से भले भरपूर हो, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को लेकर बड़ी भविष्यवाणी करते कहा कि केंद्र सरकार 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। पर जिस तरह से भाजपा की नीतियों के विरुद्ध मित्र दल होते जा रहे हैं वैसे में वर्तमान सरकार पर कठिनाइयों का एक दौर शुरू तो हो ही गया है। विशेष राज्य का दर्जा, जातीय जनगणना, बढ़ा हुआ आरक्षण प्रतिशत को 9वीं अनुसूची में शामिल करने के पेंच तो पहले से थे अब सीएम योगी आदित्यनाथ का कांवड़ यात्रा के रास्ते पर दुकानदारों को अपना नाम और धर्म लिखने की अनिवार्यता ने एक नया बबाल उठा दिया है। इंडिया गठबंधन के मित्र दलों का तो विरोध सर चढ़कर बोल रहा है, पर मुश्किल यहां यह है कि एनडीए के मित्र दल भी उसी सुर में आवाज उठाने लगे हैं। लेकिन एनडीए में शामिल दलों के विरोध का मतलब विरोध के लिए विरोध करने से ज्यादा कुछ नहीं है। 22 जुलाई से कांवड़ यात्रा अपने इष्ट देव को जल अर्पित करने को लेकर शुरू होने वाली है। कांवड़ यात्रियों के लिए बड़ा कदम उठाते हुए सीएम आदित्यनाथ ने पूरे उत्तर प्रदेश में कांवड़ मार्गों पर खाने पीने की दुकानों पर ‘नेमप्लेट’ लगाने का आदेश दिया है। आदेश में साफ कहा गया है कि हर हाल में दुकानों पर संचालक मालिक का नाम लिखा होना चाहिए, इसके साथ ही उसे अपने धर्म के बारे में भी लिखना होगा। दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से ये फैसला कांवड़ यात्रियों की आस्था की शुचिता बनाए रखने के लिए लिया गया है। इसके साथ ही हलाल सर्टिफिकेशन वाले प्रोडक्ट बेचने वालों पर भी कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए हैं। हालांकि शुरुआत में ये फ़ैसला सिर्फ मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले तक सीमित था, लेकिन अब राज्य सरकार के आदेश पर पूरे राज्य में लागू कर दिया है।

बिहार के संदर्भ में योगी आदित्यनाथ के इस फैसले के बाद आरजेडी की तरफ से हमला काफी तेज हो गया है। राज्य में अभी चार विधान सभा पर चुनाव होने हैं और यदि वर्ष 2025 के पहले चुनाव हुए तो एनडीए के कई मित्र दलों में परेशानी बढ़ जाएगी। जनता दल यू (JDU) की राजनीति की तो धुरी ही थ्री सी यानी क्राइम, करप्शन एंड कम्युनलिज्म रहा है। लोजपा तो इस बात की वकालत करते रही है कि उप मुख्यमंत्री मुस्लिम से हो। हालांकि विधान सभा चुनाव में देरी हैं, मगर लोजपा और जदयू की तरफ से योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर उनकी टिप्पणी आ चुकी है।

जनता दल यू (जेडीयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने योगी सरकार के निर्देश को धार्मिक विभेद पैदा करने वाले बताते साफ कहा कि मुजफ्फरनगर पुलिस का वह आदेश वापस लिया जाना चाहिए। इसमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों को अपने मालिकों के नाम प्रदर्शित करने को कहा गया है, क्योंकि इससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने भी फैसले पर एक बार फिर से समीक्षा करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए, जिससे समाज में सांप्रदायिक विभाजन पैदा हो। एनडीए की केंद्र सरकार में शामिल केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी सीएम योगी आदित्यनाथ के फैसले पर सवाल उठाते कहा कि मेरी लड़ाई जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ है। इसलिए जहां कहीं भी जाति और धर्म के विभाजन की बात होगी। मैं उसका कभी भी समर्थन नहीं करूंगा।

योगी आदित्यनाथ सरकार के जिस निर्देश के विरुद्ध जेडीयू या लोजपा का बयान आया है। वह अपने अपने वोट बैंक की चिंता से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे भी जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी का विरोध अपने दल की नीतियों के समर्थन भर है।इसके साथ ही हलाल सर्टिफिकेशन वाले प्रोडक्ट बेचने वालों पर भी कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए हैं। हालांकि शुरुआत में ये फ़ैसला सिर्फ मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले तक सीमित था, लेकिन अब राज्य सरकार के आदेश पर पूरे राज्य में लागू कर दिया है। हां, नीतीश कुमार का कुछ बयान आता तो मामला ज्यादा पेंचीदा हो सकता था। अब रहा चिराग पासवान का विरोध तो वह भी विरोध के लिए विरोध है। एनडीए में बने रहने के लिए जितना संघर्ष चिराग ने किया वह इस छोटे से मसले पर सरकार गिराने की बात सोच नहीं सकते।