Sunday, March 15, 2026
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क्या जम्मू से हिंदुओं को भागना चाहता है पाकिस्तान?

पाकिस्तान अब जम्मू से भी हिंदुओं को भागना चाहता है! जम्मू-कश्मीर में डोडा जिले में घात लगाकर किए गए आतंकी हमले में सेना के कैप्टन समेत 4 जवान शहीद हो गए। एक पुलिसकर्मी की भी मौत हुई है। सेना, राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस का इस इलाके में सर्च ऑपरेशन चल रहा था, जब ये हमला हुआ। आतंकी घने जंगल होने की वजह से बच निकले। हालांकि, सेना का तलाशी अभियान जारी है। 2022 और 2023 में जम्मू क्षेत्र में 3-3 आतंकी हमले हुए थे, जो इस साल अभी तक ऐसे 6 हमले किए जा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों के पीछे क्या वजह है? आखिर कश्मीर घाटी छोड़कर अब जम्मू को निशाना क्यों बना रहे हैं आतंकी? क्या ये पाकिस्तान और चीन की साजिश है? इन सभी सवालों के जवाब डिफेंस एनालिस्ट से जानेंगे। डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, इस साल के शुरुआत से दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियां बढ़ गई हैं। इसी साल से अब तक जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियां बढ़ गई हैं। इन दोनों बातों में एक सीधा कनेक्शन है। चीन और पाकिस्तान जान-बूझकर इन इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं। दरअसल, आगामी युद्ध के लिए यह पृष्ठभूमि बनाई जा रही है, ताकि दोनों देश ये अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ये बता सकें कि ये इलाके बेहद अशांति और अस्थिरता थी, इसलिए ये हमले करने पड़े।

लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि हांगकांग से प्रकाशित होने वाले चीन के सरकारी अखबार विएन वीपो के अनुसार, अगले 11 सालों में यानी 2035 तक तीन युद्ध होने हैं। इनमें पहली जंग 2027 में ताइवान के साथ होनी है, जब चीन उस पर हमला करेगा। दूसरा हमला 2029 में दक्षिण चीन सागर में स्थित स्पार्टली आईलैंड पर होगा, जो वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया से घिरा हुआ है। यह द्वीप रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। इसके अलावा, एक हमला चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत पर 2035 में करेंगे। ये टू फ्रंट वॉर होनी है, जिसके तहत चीन अरुणाचल प्रदेश सीमा पर जंग छेड़ेगा और पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में लड़ाई लड़ेगा। पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के घाटी के बजाय जम्मू में लगातार किए जा रहे हमलों के पीछे एक वजह चीन का आर्थिक गलियारा जो पीओजेके से गुजर रहा है। चीन के 65 बिलियन अमेरिकी डॉलर सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) प्रोजेक्ट के लिए निवेश हो चुके हैं। चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी योजना है, जिसकी शुरुआत 2013 में की गई थी। भारत इस प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है, क्योंकि पीओजेके भारत का अभिन्न हिस्सा है।

डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में आतंकी जान-बूझकर हिंदू बहुल जम्मू के इलाकों को निशाना बना रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू की कुल आबादी करीब 15 लाख है और इसमें से 84 फीसदी हिंदू और 7 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान अब कश्मीर की तरह जम्मू से भी हिंदुओं को भगाने की साजिश कर रहा हो। 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में महज 2700 से 3400 कश्मीरी पंडित ही रह गए हैं। जबकि 1981 की जनगणना के अनुसार, इस क्षेत्र में करीब 1.25 लाख हिंदू थे। इसमें ज्यादातर पंडित थे। 90 के दशक में आतंकवाद की शुरुआत के बाद से कश्मीरी पंडितों को साजिशन वहां से जान बचाकर भागना पड़ा।

जम्मू से पुंछ-राजौरी तक सीमावर्ती इलाका है और आगे अखनूर तक इंटरनेशनल बॉर्डर है। एलओसी में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब इंटरनेशनल बॉर्डर का भी सहारा लेकर आतंकी जम्मू क्षेत्र में बढ़ते जा रहे हैं। जम्मू का बड़ा इलाका भी इंटरनेशनल बॉर्डर के पास है। ऐसे में यहां से घुसपैठ भी आसान है। डोडा में तो इतने ज्यादा घने जंगल हैं कि उसका फायदा आतंकी उठा रहे हैं। इस इलाके में पहाड़ और घने जंगल बहुत हैं। इसके अलावा, सड़क संपर्क भी ज्यादा अच्छा नहीं है। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी और पुख्ता तैनाती हुई है। यह भी एक वजह है कि आतंकियों का नया टार्गेट अब जम्मू बन चुका है।

डिफेंस एक्सपर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव में भी जम्मू-कश्मीर के लोगों ने बढ़-चढ़कर वोटिंग की, जिससे आतंकी बौखलाए हुए हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आकाओं को भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से घबराहट होने लगती है। वो चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव जैसी कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया या विकास का कोई काम कामयाब न हो। वो हर हाल में कश्मीर में अशांति बनाए रखना चाहते हैं, ताकि उनके नापाक मंसूबे पूरे हो सकें। इस तरह के हमले कर आतंकी संगठन लोगों को डराने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।

पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई लद्दाख में भारत-चीन सीमा और कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती को कम करना चाहते हैं। ऐसे में जम्मू के इलाकों में लगातार हमले की साजिश की जा रही है, ताकि बाकी जगहों से भारतीय सेना को तैनाती घटानी पड़े। डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, डोडा हमले की जिम्‍मेदारी भी ‘कश्‍मीर टाइगर’ नामक आतंकी संगठन ने ली है। यह ग्रुप भी लश्कर और जैश से जुड़ा है, जो राजौरी, पुंछ, कठुआ और डोडा के अलग-अलग क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियां चला रहा है। जम्‍मू में काफी भीड़-भाड़ रहती है, ऐसे में आतंकियों की पहचान करने में मुश्किल आती है।

आतंकवादियों से ज्यादा शहीद क्यों हो रहे हैं हमारे सैनिक?

वर्तमान में हमारे सैनिक बहुत ही ज्यादा संख्या में शहीद होते जा रहे हैं! जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी घटनाओं में इजाफा हुआ है। सोमवार को डोडा में आतंकियों के साथ हुए मुठभेड़ में एक मेजर समेत 4 सैन्यकर्मियों की मौत हुई। उससे एक हफ्ते पहले कठुआ में सेना के 2 ट्रकों पर आतंकी हमले में 5 जवानों ने बलिदान दिया। इस साल अबतक जम्मू क्षेत्र में आतंकी हमले में 11 सैन्यकर्मी सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं। इसमें इंडियन एयर फोर्स का भी एक जवान शामिल है। दूसरी तरफ, इस साल जम्मू रिजन में अबतक सिर्फ 5 आतंकी ही मारे गए हैं। यानी इस साल अबतक जम्मू क्षेत्र में जितने आतंकी मारे गए हैं, उससे करीब दोगुने सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है। जम्मू क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में 2021 के बाद तेजी आई है। तब से लेकर अबतक 34 सैनिक सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं जबकि इसी अवधि में 40 आतंकी मारे गए हैं। जम्मू में आखिर क्यों बढ़ी हैं आतंकी घटनाएं? आइए समझते हैं। अगस्त 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म किए जाने और सूबे के 2 केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजन के बाद घाटी में तो आमतौर पर शांति है, लेकिन जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। खासकर, 2021 के बाद पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। सुरक्षा बलों के साथ-साथ सिविलियंस पर आतंकी हमले बढ़े हैं।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के उदय और उसके चरम पर पहुंचने के बाद 2003 आते-आते पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाके में आतंकवाद नियंत्रित हो चुका था। यह बात पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने भी इस साल जनवरी में कही थी। उन्होंने कहा कि इलाके में 2017-18 तक शांति रही। उसके बाद घाटी तो लगभग शांत है लेकिन जम्मू क्षेत्र अशांत है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अब जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद को नए सिरे से खड़ा करने में जुटी हुई है। इसकी एक वजह ये है कि एलओसी पर आतंकी घुसपैठ के मुकाबले इंटरनैशनल बॉर्डर से घुसपैठ आसान है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से छद्म तंजीमों के नाम पर लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन नए सिरे से सिर उठा रहे हैं। इस नापाक गठजोड़ का सिर नहीं कुचला गया तो आने वाले वक्त में जम्मू की शांति को गंभीर खतरा हो सकता है।

जम्मू क्षेत्र में 2022 और 2023 में सुरक्षा बलों पर 3-3 आतंकी हमले हुए थे। लेकिन इस साल भी ही सुरक्षा बलों पर 6 आतंकी हमले हो चुके हैं। 2022 में आतंकी हमलों में 6 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। 2023 में ये आंकड़ा 21 था और इस साल अबतक 11 सैनिक सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं।

जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों में इजाफे की एक वजह 2021 के बाद वहां सैन्य तैनाती में कमी भी है। 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच खूनी झड़प के बाद से ही लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर तनाव है। उसके बाद से ही वहां दोनों ओर से भारी सैन्य तैनाती की गई है। उसका असर जम्मू क्षेत्र में सैन्य तैनाती पर भी पड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में जम्मू क्षेत्र से करीब 4000 से 5000 सैनिकों को मूव किया गया था। आने वाले दिनों में जम्मू रिजन में सैन्य तैनाती बढ़ाई जा सकती है।

रिपोर्ट में राज्य पुलिस के सूत्रों के हिसाब से बताया है कि जम्मू में सुरक्षा बलों पर बढ़ते आतंकी हमलों के पीछे आतंक के आकाओं की सोची-समझी रणनीति है। रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा गया है, ‘2019 में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के बाद घाटी तो तकरीबन शांत है लेकिन तभी 2020 में गलवान (पूर्वी लद्दाख) में झड़प हो गई। उसके बाद से ही जम्मू क्षेत्र में आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं। इस तरह सेना के लिए एक तरह से तीन मोर्चे खुल गए हैं।’

जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों में बढ़ोतरी की एक वजह लोकल और ग्राउंड लेवल इंटेलिजेंस में कमी को भी माना जा सकता है। हालांकि, आतंकियों ने अब लोकल स्तर पर लॉजिस्टिक सपोर्ट नहीं ले रहे हैं और छिपने के लिए गुफाओं और जंगलों का इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि किसी स्लीपर सेल के यहां पनाह ले रहे हैं। 2021 के बाद पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। सुरक्षा बलों के साथ-साथ सिविलियंस पर आतंकी हमले बढ़े हैं।द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन आतंकी हमलों का नेतृत्व पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड सैनिकों की तरफ से किया जा रहा है।

जम्मू कश्मीर में क्यों मारे नहीं जा रहे आतंकवादी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवादी क्यों नहीं मारे जा रहे! करीब 20 सालों तक शांत रहे जम्मू में आखिर ऐसा क्या हो गया कि करीब तीन साल से वहां आतंकी कई वारदातों को अंजाम दे चुके हैं? घात लगाकर सिक्योरिटी फोर्स को ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं। सुरक्षा बलों के गहन अभियानों के बावजूद आतंकी अपने मंसूबों में सफल हो जा रहे हैं। जुलाई का महीना अभी पूरा गुजरा भी नहीं है कि भारतीय सेना के नौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। ढाई महीने में सुरक्षा बलों के कुल 13 सैनिकों की शहादत हुई है जबकि आतंकी सिर्फ तीन मारे गए हैं। आतंकी कम्युनिकेशन के लिए हाईलेवल इनक्रिप्टेड सेट, अल्ट्रा सेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह रेडियो कम्युनिकेशन सेट चीन मेड है और पाकिस्तान की सेना भी इसका इस्तेमाल करती है। मेजर जनरल यश मोर (रिटायर्ड) कहते हैं कि पहले हम आतंकवादियों की कम्युनिकेशन पकड़ लेते थे और इससे उनके मंसूबों का पता चल जाता था, लेकिन पिछले 1-2 साल में आतंकियों के पास अल्ट्रा सेट हैं जो पकड़ में नहीं आते इसलिए हमारी सिक्यॉरिटी फोर्स उन्हें पकड़ नहीं पा रही है। मेजर जनरल मोर के मुताबिक यह एक बड़ी वजह है जिससे आतंकी अपने मंसूबों में सफल हो पा रहे हैं क्योंकि उनकी भनक नहीं लग पा रही है।

मेजर जनरल मोर कहते हैं कि जिस तरह से आतंकी हमला कर रहे हैं उससे साफ है कि वे काफी ट्रेंड हैं। वे उन जगहों पर अटैक कर रहे हैं जहां सिक्यॉरिटी फोर्स हमले की सबसे कम आशंका मान रही है और वे सरप्राइज दे रहे हैं। साथ ही झूठी जानकारी या दूसरे तरीकों से ट्रैप कर रहे हैं और फिर घात लगाकर हमला कर रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (रिटायर्ड) ने डोडा, पुंछ, रजौरी इलाके की टेरेन बताते हुए कहा कि वहां विजिबिलिटी काफी कम होती है और अगर ऊंचाई से कोई घात लगाकर हमला करे तो वह उसके पक्ष में होता है। यहां आतंकी अपने टाइम पर पूरी रेकी कर हमला कर रहे हैं। इसलिए हर वक्त सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ये इलाके कई सालों तक शांत रहे लेकिन आतंकी अब इन्हें चुन रहे हैं तो सिक्यॉरिटी फोर्स को एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) का पूरा पालन करना होगा। शांत माने जा रहे इलाके में भी रिस्क नहीं लिया जा सकता और हर वक्त अलर्ट रहना होगा।

आतंकी जिस तरह वारदात कर भागने में सफल हो रहे हैं, उससे ह्यूमन इंटेलिजेंस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विदेशी आतंकी इलाके में हैं और वारदात कर रहे हैं लेकिन उनकी जानकारी क्यों नहीं मिल पा रही है? लेफ्टिनेंट जनरल कुलकर्णी कहते हैं कि मैंने खुद डोडा एरिया में कमांड किया है। किसी भी ऑपरेशन के लिए लोकल सोर्स बेहद अहम होते हैं। लोकल ही हमारे आंख-कान होते हैं। वे बताते हैं कि कहीं कोई संदिग्ध व्यक्ति दिख रहा है या कोई संदिग्ध हरकत दिख रही है। यह जानकारी भी लोकल से ही मिलती रहती थी कि बाहर से कब कहां कोई आया है। वह कहते हैं कि ह्यूमन इंटेलिजेंस पर ध्यान देने की जरूरत है। मेजर जनरल मोर भी सवाल उठाते हैं कि हम्यूमन इंटेलिजेंस बेस कैसे खत्म हो गया जबकि इतने सद्भावना के कार्यक्रम चलते हैं। वह कहते हैं कि ह्यूमन इंटेलिजेंस के लिए लगातार प्रयास करना होता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस से समन्वय से क्यों जानकारी नहीं मिल पा रही है।चार साल पहले जब चीन के साथ तनाव शुरू हुआ तो इस इलाके से सैनिकों को वहां भेजा गया। भारतीय सेना की आरआर फोर्स- रोमियो, डेल्टा, यूनिफॉर्म फोर्स के पास यहां अलग-अलग इलाके का जिम्मा था। लेकिन करीब चार साल पहले जब ईस्टर्न लद्दाख में चीन के साथ एलएसी पर तनाव बढ़ा और स्थिति हिंसक झड़प तक पहुंच गई तब यहां से यूनिफॉर्म फोर्स को हटाकर एलएसी पर भेज दिया गया। यहां से तीन ब्रिगेड जितने सैनिकों को कम किया गया। उनकी संख्या कम होने की वजह से बाकी फोर्स के पास उन इलाकों का जिम्मा भी आ गया जहां यूनिफॉर्म फोर्स तैनात थी। जानकारों के मुताबिक इसका फायदा भी आतंकियों ने उठाया और खुद को फिर से खड़ा करने के लिए काम किया।

पिछले कुछ समय में भारतीय सेना ने इन इलाकों में गैप भरने के लिए ज्यादा सैनिकों की तैनाती की है लेकिन सूत्रों के मुताबिक अब भी वह पुराने नंबर को मैच नहीं करते, यानी उतनी फोर्स नहीं है जितनी चार साल पहले थी। मेजर जनरल यश मोर (रिटायर्ड) कहते हैं कि जो आरआर फॉर्मेशन को चीन फ्रंट पर भेजा गया था उसे वापस लाया जाना चाहिए। लेफ्टिनेंट जनरल कुलकर्णी (रिटायर्ड) कहते हैं कि फौज ने 22-23 साल पहले वह इलाका आंतकियों से मुक्त कर सिविल एडमिनिस्ट्रेशन को दे दिया तो उनकी जिम्मेदारी बनती थी कि वे उस इलाके को शांत रखें, इंटेलिजेंस इक्ट्ठा करें और आतंकियों को फिर पनपने ना दें। वह कहते हैं कि फौज थ्रेट परसेप्शन के हिसाब से तैनाती करती है और रीडिप्लॉयमेंट करती है। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी को बढ़ा रहा है और इंटरनल सिक्योरिटी उनका काम है, फौज का काम एक्सटर्नल सिक्योरिटी है।

बेटी को दूसरी शादी के लिए उकसाने वाले मां-बाप से क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बेटी को दूसरी शादी से के लिए उकसाने वाले मां-बाप को खरी -कोटी सुनाई है! एक महिला ने पहली शादी के वैध रहते हुए दूसरी शादी कर ली। उसके माता-पिता ने भी उसका साथ दिया। दूसरी शादी से महिला को एक बच्चा भी हुआ लेकिन दूसरा पति अपनी पत्नी की पहली शादी से अनजान था। जब राज खुला तो उसने पत्नी के साथ-साथ उसके माता-पिता के खिलाफ भी केस दर्ज कराया। माता-पिता पर आरोप लगा अपनी बेटी को पहली शादी के प्रभावी रहते हुए दूसरी शादी करने के लिए उकसाने का। इस मामले में माता-पिता अदालत से दोषी भी करार दिए गए लेकिन सजा मामूली मिली। उन्हें सजा सुनाए जाने वाले दिन अदालत की कार्यवाही पूरी होने तक के लिए कैद की सजा सुनाई थी। शख्स ने सजा को मामूली बताते हुए इसे चुनौती दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने सजा को अपराध की गंभीरता के हिसाब से कम बताते हुए पत्नी के माता-पिता को 6 महीने कैद की सजा सुनाई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ये फैसला सुनाया। महिला के माता-पिता ने पहली शादी के रहते हुए अपनी बेटी की दूसरी शादी कराने में मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा सुनाई जानी चाहिए। इससे पहले निचली अदालत ने महिला के माता-पिता को सिर्फ कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद की सजा सुनाई थी। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने अपराध की प्रकृति और जिस तरह से इसे अंजाम दिया गया, उसे ध्यान में रखते हुए पत्नी के माता-पिता की सजा बढ़ाकर 6 महीने की कर दी।

जस्टिस सीटी रविकुमार के लिखे फैसले में कहा गया, ‘एक बार जब यह पाया जाता है कि आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध एक गंभीर अपराध है, तो इस मामले में मौजूद परिस्थितियां हमें यह मानने के लिए मजबूर करती हैं कि ‘कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद’ उचित सजा नहीं है। यह सजा देने में आनुपातिकता के नियम के अनुरूप नहीं है।’

इस मामले में महिला ने पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी रचाई थी। दूसरी शादी से एक बच्चे का जन्म भी हुआ था। दूसरे पति से पहली शादी के बारे में छिपाया गया था। महिला के माता-पिता पर अपनी बेटी की पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी कराने में मदद करने का आरोप था। महिला ने आईपीसी की धारा 494 के तहत दो विवाह करने का गुनाह किया और उसके माता-पिता ने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया। निचली अदालत ने पत्नी को दो विवाह करने और उसके माता-पिता को अपनी बेटी को ऐसा करने के लिए उकसाने का दोषी ठहराया था। शिकायतकर्ता-दूसरे पति ने माता-पिता को सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी।

महिला के माता-पिता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध के लिए कोई न्यूनतम सजा तय नहीं है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक राज्य बनाम कृष्णा उर्फ राजू, (1987) 1 SCC 538 के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि न्यूनतम सजा निर्धारित न होने का मतलब यह नहीं है कि अदालतें अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखे बिना मामूली सजा सुना दें।

कृष्णा उर्फ राजू मामले में अदालत ने सजा को बहुत ही कम या ‘मामूली’ बताते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में अत्यधिक सहानुभूति आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कम करेगी। इस तरह अदालत ने कहा कि भले ही सजा देना न्यायिक विवेक के दायरे में आता है, लेकिन सजा अपराध की प्रकृति के अनुपात में होनी चाहिए। अपराध की जैसी गंभीरता, उसी के हिसाब से सजा।

अदालत ने कहा, ‘संक्षेप में, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सजा सुनाते समय अदालत को अपराध की प्रकृति, उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है जिनके तहत इसे अंजाम दिया गया था। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ये फैसला सुनाया। महिला के माता-पिता ने पहली शादी के रहते हुए अपनी बेटी की दूसरी शादी कराने में मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा सुनाई जानी चाहिए। इससे पहले निचली अदालत ने महिला के माता-पिता को सिर्फ कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद की सजा सुनाई थी। अपराधी द्वारा दिखाई गई सोच, उसके पिछले रिकॉर्ड आदि को ध्यान में रखना होता है। कोई असाधारण परिस्थितियां न होने पर सजा देते समय आनुपातिकता के नियम का पालन किया जाना चाहिए।’

आखिर एक ही सांप एक व्यक्ति को सात बार कैसे डस सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक ही सांप एक व्यक्ति को सात बार कैसे डस सकता है! उत्तर प्रदेश के सौरा गांव के 24 वर्षीय निवासी विकास द्विवेदी बार-बार सांप के काटने से जुड़ी एक हैरान करने वाली कहानी को लेकर चर्चा में हैं। विकास का दावा है कि उसे महज 40 दिनों में सात बार सांप काट है। विकास के अनुसार पहली बार सांप काटने के बाद उसके सपने में आया था। विकास के अनुसार सांप ने कहा था कि वह उसे 9 बार काटेगा। विकास का कहना है कि सांप ने सपने में कहा था कि 8 बार तो वह बच जाएगा लेकिन नौवीं बार काटने पर उसे कोई नहीं बचा पाएगा। सांप काटने की इस घटना को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। जिला प्रशासन की तरफ से इस मामले में कमेटी बनाकर मामले की रिपोर्ट मांगी गई है। इस खबर के बाद विकास के परिवार के साथ ही गांव में चिंता और डर का माहौल है। विकास का कहना है कि सांप ने हमेशा उसे सोते समय काटा है। अब तो उसके पूरी तरह से डर लगा रहा है कि सांप उसे नौंवी बार भी काट लेगा। हालांकि, यह अभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है कि एक ही सांप ने विकास को 7 बार काटा है। इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या एक ही सांप किसी शख्स को बार-बार काट सकता है। आखिर इस मामले में को लेकर एक्सपर्ट्स की क्या राय है। न्यूज 18 की रिपोर्ट में इन सांपों के व्यवहार और इलाज को लेकर एक्सपर्ट जोधपुर, राजस्थान के एक प्रसिद्ध सांप पकड़ने वाले तौहीद अहमद खान से बातचीत की।

तौहीद ने पहले तो इस घटना को लेकर हैरानी जताई। तौहीद का खुद भी कई बार सांपों के साथ वास्ता पड़ा है। तौहीद का कहना है कि सांप का जहर पीड़ितों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। उन्होंने आगे कहा कि सांप काटने पर सटीक एंटी-वेनम इलाज की आवश्यकता होती है जो विशिष्ट प्रकार के सांप के लिए अनुकूलित हो। उन्होंने बार-बार काटने के खतरे और उनके द्वारा होने वाले शारीरिक नुकसान को भी बताया।

आमतौर पर सांप विषैले और गैर विषैले दोनों होते हैं। विष एक जहरीला पदार्थ है जो सांप अपने शिकार को पकड़ने, खुद की रक्षा करने और भोजन को पचाने में मदद करने के लिए बनाता है। यदि कोई सांप विषैला है, तो वह अपने दांतों (नुकीले दाँतों) के माध्यम से जिस किसी को भी काटता है, उसमें विष डाल देता है। सां पों की कई प्रजातियाँ कुछ खास तरह के विष रखती हैं जो आपके शरीर को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। बता दें कि उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित सोरा गांव इस समय एक अजीबोगरीब घटना के चलते पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं इस जगह का कनेक्शन दौसा जिले के प्रसिद्ध आस्थाधाम मेहंदीपुर बालाजी से भी जुड़ गया है। दरअसल, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के मलवा थाना क्षेत्र के सोरा गांव निवासी 24 वर्षीय विकास द्विवेदी उर्फ बेटू पुत्र सुरेंद्र द्विवेदी को एक सांप अब तक 7 बार काट चुका है। वहीं सांप सपने में आकर पीड़ित को 9 बार काटने की चेतावनी दे चुका है। इस समस्या के समाधान के लिए कई जगह तांत्रिकों के चक्कर काटने के बाद अब पीड़ित विकास द्विवेदी अपनी परिवार और रिश्तेदारों के 11 सदस्यों के साथ दौसा जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ मेहंदीपुर बालाजी धाम में आया है। वहीं इस विकट परिस्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए बालाजी महाराज से प्रार्थना कर रहा है।

वहीं जब इस मामले की पड़ताल के लिए टीम पीड़ित विकास द्विवेदी से मिलने के लिए मेहंदीपुर बालाजी में स्थित एक विश्राम गृह में पहुंची। जहां विकास द्विवेदी अपने परिवार के साथ ठहरा हुआ है। विश्राम गृह में विकास द्विवेदी कुछ भी बताने की हालत में नहीं था। लेकिन उसके दोनों हाथों और पैरों पर सांप के काटने के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। ऐसे में काफी समझाने के बाद पीड़ित विकास कैमरे ने सामने बोलने को तैयार हुआ। पीड़ित विकास ने बताया कि चित्रकूट हनुमान जी के दर्शन कर 30 मई को गांव आया था। इस दौरान 2 जून की रात करीब 8 बजे टॉयलेट जाते समय सांप ने काट लिया। इसके बाद परिजन नजदीकी अस्पताल में ले गए। जहां इलाज के बाद ठीक हो गया। लेकिन उसके बाद 9 जून को सांप ने फिर से काट लिया। इस घटना के बाद परिवार के सदस्य भी भयभीत हो गए। लेकिन इस बार भी जान बच गई।

पीड़ित विकास द्विवेदी ने दावा किया है कि 16 जून शनिवार को सांप काटने से पहले सपने में आया। इस दौरान सांप ने उसे 9 बार काटने की चेतावनी दी थी। साथ ही सपने में कहा कि 8 बार तो जान बच जाएगी। लेकिन 9 वीं बार किसी भी हालत में जिंदा नहीं बचेगा, और इतना कहने के बाद तीसरी बार सांप ने काट लिया। इस घटना के बाद पीड़ित विकास ने सपने के बारे में अपने परिजनों को बताया। ऐसे में सांप के भय से भयभीत परिजनों ने विकास को 200 किलोमीटर दूर अपनी मौसी के यहां फतेहपुर में रहने के लिए भेज दिया। लेकिन जिद्दी सांप ने विकास का फतेहपुर में भी पीछा नहीं छोड़ा और 23 जून शनिवार की रात सोते समय चौथी बार काट लिया।

ऐसे में अब आखिरी उम्मीद लगाकर पीड़ित परिवार संकटमोचन के नाम से फेमस मेहंदीपुर बालाजी में आए है। यहां बालाजी महाराज के दरबार में पूरा परिवार इस अजीबोगरीब परेशानी से छुटकारा दिलाने के लिए बालाजी महाराज से प्रार्थना कर रहा है। पीड़ित के साथ आए रिश्तेदारों ने बताया कि पीड़ित परिवार की स्थिति बेहद तनावग्रस्त बनी हुई है। साथ ही आर्थिक स्थिति भी कमजोर है।

क्या पश्चिम बंगाल में हो रहा है सीबीआई पर विरोध?

वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सीबीआई पर विरोध किया जा रहा है! हाल ही में ममता बनर्जी सरकार पश्चिम बंगाल में सीबीआई जांच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी। 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार की अर्जी को सुनवाई के योग्य मानते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त को तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने कानूनी पहलू उठाया है जिस पर विचार किया जाना चाहिए। जब राज्य सरकार ने CBI जांच के लिए दी गई अपनी परमीशन को वापस ले लिया तो फिर एजेंसी वहां के मामलों में केस क्यों दर्ज कर रही है। दरअसल, ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 131 का हवाला देते हुए यह याचिका दाखिल की है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार की एक और याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संदेशखाली में महिलाओं के यौन शोषण-जमीन हथियाने और राशन घोटाले से जुड़े सभी मामलों में सीबीआई जांच का आदेश दिया था।  पश्चिम बंगाल और केंद्र के बीच यह विवाद संदेशखाली केस के बाद शुरू हुआ। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने इस साल 5 जनवरी को बंगाल के संदेशखाली में टीएमसी नेता शेख शाहजहां के घर छापा मारा था। इस दौरान अधिकारियों पर TMC समर्थकों ने जानलेवा हमला किया था। इसमें तीन अधिकारी घायल हो गए थे। बाद में सामने आया कि शाहजहां ने कई महिलाओं से यौन उत्पीड़न किया है। इस मामले में केंद्र सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। जब इस मामले में सीबीआई जांच को लेकर ममता सरकार ने मंजूरी नहीं दी तो सीबीआई ने हाईकोर्ट से इजाजत ले ली। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल को संदेशखाली केस CBI को सौंप दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने महिलाओं के यौन शोषण मामले में FIR दर्ज की। यहीं से केंद्र और राज्य के बीच यह विवाद बढ़ता चला गया।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1941 में भ्रष्टाचार और घूसखोरी की जांच के लिए स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट तैयार किया। युद्ध के बाद दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 के प्रावधानों के तहत इस एजेंसी का कामकाज शुरू हुआ। 1963 में गृह मंत्रालय ने इसका नाम स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट से बदलकर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) कर दिया। सीबीआई लोक सेवकों के भ्रष्टाचार, गंभीर आर्थिक अपराधों, धोखाधड़ी और सनसनीखेज अपराध से संबंधित क्राइम की जांच करती है। साथ ही सामाजिक अपराध विशेष रूप से आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी से संबंधित गंभीर अपराधों की जांच करना भी इसका मकसद था। 1987 इसका जांच करने का दायरा बढ़ाया गया। इसके बाद से ही यह एजेंसी हत्या, अपहरण, आतंकवाद के अलावा कई संगठित गंभीर अपराधों की जांच भी करने लगी। यह एजेंसी अपनी मर्जी से किसी मामले को संज्ञान में नहीं ले सकती। केंद्र सरकार की अनुमति के बाद ही कोई मामला जांच के लिए सीबीआई को दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत कहते हैं कि अगर किसी मामले की जांच सीबीआई कर रही है तो उसे राज्य सरकार की इजाजत लेनी अनिवार्य है। एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट भी यह बात साफ तौर कह चुका है कि बिना राज्य सरकार की अनुमति के सीबीआई वहां जांच नहीं कर सकती है। जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा था कि यह प्रावधान संविधान के मुताबिक है। वहीं, राष्ट्रीय जांच एजेंसी को आतंकवाद से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई के लिए राज्य सरकार की परमिशन की जरूरत नहीं होती।

दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 से सीबीआई एक स्वतंत्र निकाय है। यह कानून उस राज्य में किसी भी अपराध की सीबीआई जांच के लिए राज्य सरकार की सहमति प्राप्त करना अनिवार्य बनाता है। राज्य सरकार की सहमति या तो सामान्य या मामले के अनुसार विशिष्ट हो सकती है। राज्य अपने क्षेत्र में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की त्रुटिहीन सीबीआई जांच के लिए अपनी सामान्य सहमति दे सकता है। सामान्य सहमति के अभाव में सीबीआई को छोटी से छोटी कार्रवाई से पहले विशिष्ट सहमति मांगनी अनिवार्य है।

पिछले कुछ सालों में 8 राज्यों ने जांच के लिए अपनी सामान्य सहमति वापस ले ली है। नतीजतन एजेंसी को मामले में विशिष्ट अनुमति की जरूरत है। इन राज्यों में पश्चिम बंगाल, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान और मिजोरम शामिल हैं। मिजोरम 2015 में अपनी सामान्य सहमति वापस लेने वाला पहला राज्य था। नवंबर 2018 में, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम एन चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की सामान्य सहमति वापस ले ली। इस मामले के कुछ ही घंटों बाद सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने इसकी घोषणा की। बाद में आंध्र प्रदेश ने अपनी सहमति बहाल कर दी। जनवरी 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य की सहमति वापस ले ली। पंजाब ने अपनी सामान्य सहमति वापस नहीं ली, लेकिन उसने सीबीआई द्वारा जांच किए जा रहे महत्वपूर्ण मामलों के लिए केस-विशिष्ट सहमति वापस ले ली।

एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत के अनुसार, राजनीतिक भावना से प्रेरित विवादों के निपटारे के लिए अनुच्छेद 131 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के बीच विवाद के मामले पर सुनवाई करने हेतु असहमति जताई थी। अगर केंद्र या राज्य के विरुद्ध किसी नागरिक की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दायर की जाती है तो उसे अनुच्छेद 131 के तहत नहीं लिया जाएगा।

जब अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सीबीआई को गया नोटिस!

हाल ही में अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सीबीआई को नोटिस पहुंच गया है! सीएम अरविंद केजरीवाल न तो घोषित अपराधी हैं और न ही आतंकवादी’, दिल्ली के मुख्यमंत्री की जमानत याचिका पर उनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने हाईकोर्ट में ये टिप्पणी की। अरविंद केजरीवाल की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कथित शराब नीति घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में हाईकोर्ट का रुख किया है। इस याचिका पर जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने सीबीआई से जवाब मांगा। जिसमें 17 जुलाई को अगली सुनवाई होगी। उस दिन केजरीवाल की अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका भी सुनवाई के लिए लगी है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में न्यायिक हिरासत में हैं।जस्टिस कृष्णा ने हाल ही में सीबीआई की गिरफ्तारी और तीन दिन की पुलिस हिरासत को चुनौती देने वाली केजरीवाल की याचिका पर नोटिस जारी किया। मामले की सुनवाई 17 जून को तय की गई है। केजरीवाल ने मामले में जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाए बिना सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी, विक्रम चौधरी और एन हरिहरन केजरीवाल की ओर से पेश हुए। एडवोकेट डीपी सिंह ने सीबीआई का प्रतिनिधित्व किया। सुनवाई के दौरान सिंघवी ने दलील देते हुए कहा कि केजरीवाल न तो घोषित अपराधी हैं और न ही आतंकवादी हैं।

डीपी सिंह ने अदालत को बताया कि जमानत याचिका और केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका में उठाए गए आधार एकसमान हैं और मुख्यमंत्री के पास जमानत के लिए पहले ट्रायल कोर्ट जाने का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। केजरीवाल ने मामले में जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाए बिना सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ईडी ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था।सिंघवी ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां ट्रिपल टेस्ट का दूर-दूर तक आरोप है और केजरीवाल न तो घोषित अपराधी हैं और न ही आतंकवादी हैं। विक्रम चौधरी ने दलील दी कि चूंकि निचली अदालत ने केजरीवाल को रिमांड पर भेजते हुए पाया था कि सीआरपीसी की धारा 41ए का उल्लंघन नहीं किया गया है, इसलिए सेशन कोर्ट का दरवाजा खटखटाना व्यर्थ होगा। वेकेशन जज अमिताभ रावत ने मुख्यमंत्री को 26 जून को तीन दिनों के लिए सीबीआई की हिरासत में भेज दिया था, यह देखते हुए कि इस स्टेज पर गिरफ्तारी को अवैध नहीं कहा जा सकता है।

हालांकि, जज ने कहा था कि गिरफ्तारी गैरकानूनी नहीं है, लेकिन सीबीआई को अति उत्साही नहीं होना चाहिए। बाद में, 29 जून को वेकेशन जज सुनैना शर्मा ने केजरीवाल को न्यायिक हिरासत में भेज दिया क्योंकि सीबीआई ने इस स्टेज पर उनकी आगे की रिमांड नहीं मांगी थी। जस्टिस कृष्णा ने हाल ही में सीबीआई की गिरफ्तारी और तीन दिन की पुलिस हिरासत को चुनौती देने वाली केजरीवाल की याचिका पर नोटिस जारी किया। मामले की सुनवाई 17 जून को तय की गई है।

जांच एजेंसी ने तिहाड़ जेल में मुख्यमंत्री से पूछताछ की, जहां वह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच की जा रही मनी लॉन्ड्रिंग मामले के संबंध में न्यायिक हिरासत में बंद हैं। केजरीवाल का बयान दर्ज किया गया। यह दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा पीएमएलए मामले में मुख्यमंत्री को दी गई जमानत पर रोक लगाने के कुछ घंटों बाद हुआ था। कोर्ट की इजाजत के बाद 26 जून को सीबीआई ने केजरीवाल से कोर्ट में पूछताछ की और फिर उन्हें इस मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया। बता दें कि अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका भी सुनवाई के लिए लगी है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में न्यायिक हिरासत में हैं। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी, विक्रम चौधरी और एन हरिहरन केजरीवाल की ओर से पेश हुए। एडवोकेट डीपी सिंह ने सीबीआई का प्रतिनिधित्व किया। सुनवाई के दौरान सिंघवी ने दलील देते हुए कहा कि केजरीवाल न तो घोषित अपराधी हैं और न ही आतंकवादी हैं।केजरीवाल ने मामले में जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाए बिना सीधे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था। मई में उन्हें आम चुनाव के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने 1 जून तक अंतरिम जमानत दी थी। उन्होंने 2 जून को सरेंडर किया था।

बेरोजगारी के मुद्दे पर बीजेपी को क्या बोली कांग्रेस?

हाल ही में कांग्रेस ने बेरोजगारी के मुद्दे पर बीजेपी को आड़े हाथ ले लिया है! कांग्रेस ने रविवार को आरोप लगाया कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने तुगलकी नोटबंदी, जल्दबाजी में लागू जीएसटी लागू कर भारत में बेरोजगारी के संकट को बढ़ा दिया है। कांग्रेस ने यह भी कहा कि सरकार ने चीन से बढ़ते आयात के कारण रोजगार बढ़ाने वाले वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) को भी बर्बाद कर दिया है। कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने एक बयान में वैश्विक बैंक सिटीग्रुप की एक नयी रिपोर्ट का हवाला दिया। रमेश ने कहा कि कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जो हाल के चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस की कही गई बातों की पुष्टि करते हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस बेरोजगारी संकट पर लगातार चिंता जताती रही है। तुगलकी नोटबंदी, जल्दबाजी में लागू जीएसटी ( और चीन से बढ़ते आयात के कारण रोजगार सृजन करने वाले MSME के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से यह संकट और बढ़ गया है।रमेश ने कहा कि सिटीग्रुप की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार की कई अतिप्रचारित योजनाओं ने जमीनी स्तर पर कोई लाभ नहीं दिया है और इनमें सुधार के लिए सुझाव दिए गए हैं।’ उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नॉन बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री ने केवल बड़े कारोबारी समूहों को लाभ पहुंचाने वाली आर्थिक नीतियां बनाकर बेरोजगारी दर को 45 वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। इसमें ग्रेजुएशन कर चुके युवाओं के बीच बेरोजगारी दर 42 प्रतिशत है।

रमेश ने रिपोर्ट के मुख्य अंश साझा किए जिसमें कहा गया है कि भारत को अपने युवाओं को रोजगार देने के लिए अगले 10 वर्षों तक प्रति वर्ष 1.2 करोड़ नौकरियां सृजित करनी चाहिए। रमेश ने कहा कि यहां तक कि सात प्रतिशत जीडीपी वृद्धि भी हमारे युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं करेगी। ‘नॉन बायोलॉजिकल’ प्रधानमंत्री की सरकार में देश ने औसतन केवल 5.8 प्रतिशत जीडीपी दर हासिल की है। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में मोदी सरकार का पूरी तरह विफल होना बेरोजगारी संकट का मूल कारण है। मुद्रा और स्वनिधि जैसे जुमले छोटे व्यवसायों को कर्ज देने में पूरी तरह विफल रहे हैं। इनमें बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में 10 लाख रिक्त पद हैं जो न केवल हमारे शिक्षित युवाओं के साथ भद्दा मजाक है बल्कि सरकार के कामकाज में भी बाधा है।’ कांग्रेस नेता ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत की केवल 21 प्रतिशत श्रम शक्ति के पास नियमित वेतन वाली नौकरी है जो कि कोविड के पहले के समय से 24 प्रतिशत कम है। रमेश ने दावा किया, ‘कोविड के बाद की रिकवरी में एकमात्र लाभार्थी अरबपति वर्ग रहा है। इस बीच वेतनभोगी मध्यम वर्ग के लिए रास्ते बंद हो रहे हैं।’

कांग्रेस नेता ने मोदी पर ग्रामीण भारतीयों को और गरीब बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी प्रति वर्ष 1-1.5 प्रतिशत से कम हो रही है। रमेश ने कहा कि सिटीग्रुप की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार की कई अतिप्रचारित योजनाओं ने जमीनी स्तर पर कोई लाभ नहीं दिया है और इनमें सुधार के लिए सुझाव दिए गए हैं।

रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि ‘स्किल इंडिया’ योजना पूरी तरह से विफल रही है। केवल 4.4 प्रतिशत युवाओं के पास ही किसी तरह का औपचारिक प्रशिक्षण है।कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने एक बयान में वैश्विक बैंक सिटीग्रुप की एक नयी रिपोर्ट का हवाला दिया। रमेश ने कहा कि कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जो हाल के चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस की कही गई बातों की पुष्टि करते हैं। रमेश ने कहा कि कौशल विकास के लिए एक नई पहल की सख्त जरूरत है।राहुल गांधी ने एक पोस्ट में कहा कि जिनके भरोसे करोड़ों जिंदगियां चलती हैं, उनकी अपनी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है। ‘यूरिनल’ जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित लोको पायलट के न काम के घंटों की कोई सीमा है और न ही उन्हें छुट्टी मिलती है। इस कारण वे शारीरिक और मानसिक रूप से टूट कर बीमार हो रहे हैं। कांग्रेस के न्याय पत्र में प्रशिक्षुता के अधिकार का जो वादा था वह वास्तव में समय की मांग है। उन्होंने कहा कि मुद्रा और स्वनिधि जैसे जुमले छोटे व्यवसायों को कर्ज देने में पूरी तरह विफल रहे हैं। इनमें बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है।

राहुल गांधी का लोको पायलट से मिलना विवाद क्यों बन गया?

आज हम आपको बताएंगे कि राहुल गांधी का लोको पायलट से मिलना विवाद क्यों बन गया है! राहुल गांधी शुक्रवार सुबह-सुबह यूपी के हाथरस पहुंचें। वहां सत्संग के दौरान मची भगदड़ में जान गंवाने वालों के परिजनों से मुलाकात कर उनका गम बांटा। रास्ते में अलीगढ़ के एक गांव में भी पीड़ित परिवारों से मिले। हाथरस से लौटकर दोपहर में वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए और वहां लोको पायलटों से मुलाकात की। लेकिन अब उनकी ये मुलाकात विवाद में पड़ गई है। उत्तर रेलवे का कहना है कि कांग्रेस नेता ने जिनसे मुलाकात की, वे उनकी क्रू लॉबी के नहीं थे, बल्कि ऐसा लगता है कि वे बाहरी थे। राहुल गांधी के साथ 7-8 कैमरामैन भी थे। बीजेपी ने भी इस मामले को लपकते हुए राहुल गांधी पर हमला बोला है। उसने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी ने जिन कथित लोको पायलटों से मुलाकात की, वे लोको पायलट नहीं थे बल्कि प्रफेशनल एक्टर थे, जिन्हें वे खुद ही लाए थे। हालांकि, इन आरोपों पर कांग्रेस या राहुल गांधी की तरफ से अभी कुछ नहीं कहा गया है। उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) दीपक कुमार ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि राहुल गांधी ने जिन क्रू मेंबर के साथ चर्चा की, वे उनकी लॉबी से नहीं थे, बल्कि बाहर के हो सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘आज दोपहर करीब 12:45 बजे राहुल गांधी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आए। उन्होंने हमारी क्रू लॉबी देखी। उनके साथ 7-8 कैमरामैन थे। उन्होंने हमारी क्रू लॉबी का दौरा किया और ये जाना कि हम अपनी क्रू लॉबी कैसे बुक करते हैं। क्रू लॉबी से बाहर आने के बाद उन्होंने कुछ लोगों से चर्चा की। वहां करीब 7-8 क्रू थे जो हमारी लॉबी से नहीं थे, लेकिन ऐसा लगता है कि वे बाहर से थे।’

उत्तर रेलवे की तरफ से राहुल गांधी से मुलाकात करने वाले कथित लोको पायलटों को बाहरी बताने के बाद बीजेपी हमलावर हो गई है। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने रेलवे अधिकारी के एएनआई को दिए बयान का वीडियो एक्स पर पोस्ट करते हुए कांग्रेस पर हमला किया है। उन्होंने पोस्ट किया, ‘अब उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी दीपक कुमार बताते हैं कि कैसे बालक बुद्धि राहुल गांधी ने कैमरामैन और एक निर्देशक की टीम के साथ गेट पर घुसकर उनकी बातचीत को शूट किया… लेकिन शूट में शामिल लोग उनकी लॉबी से नहीं थे! वे किराए के लोग थे। यू-ट्यूबर बनने की ऐसी बेताबी!’

इससे पहले, राहुल गांधी शुक्रवार दोपहर को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। कांग्रेस ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लोको पायलटों से मुलाकात की। ये लोको पायलट रेलवे की रीढ़ हैं, जिसे देश की जीवन रेखा कहा जाता है। उनके जीवन को सरल और सुरक्षित बनाना रेलवे सुरक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम होगा।’ राहुल गांधी की लोको-पायलटों के साथ बातचीत पश्चिम बंगाल में कंचनजंगा एक्सप्रेस ट्रेन दुर्घटना के कुछ सप्ताह बाद हुई है जिसमें कम से कम 10 लोगों की जान चली गई थी। बता दें कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रविवार को एक बार फिर लोको पायलट से जुड़े मुद्दों को उठाया। राहुल ने कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन उनके अधिकारों और कामकाजी परिस्थितियों में सुधार के लिए संसद में आवाज उठाएगा। राहुल गांधी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लोको पायलट के साथ अपनी हालिया बातचीत का एक वीडियो ‘एक्स’ पर पोस्ट किया है। कांग्रेस सांसद ने कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में लोको पायलट की जिंदगी की गाड़ी पूरी तरह से पटरी से उतर गई है।’ उन्होंने कहा कि लोको पायलट को गर्मी से खौलते केबिन में बैठ कर 16-16 घंटे काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

राहुल गांधी ने एक पोस्ट में कहा कि जिनके भरोसे करोड़ों जिंदगियां चलती हैं, उनकी अपनी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है। ‘यूरिनल’ जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित लोको पायलट के न काम के घंटों की कोई सीमा है और न ही उन्हें छुट्टी मिलती है। इस कारण वे शारीरिक और मानसिक रूप से टूट कर बीमार हो रहे हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि ऐसे हालात में लोको पायलट से ट्रेन चलवाना उनकी और यात्रियों की जान को जोखिम में डालना है। गांधी ने कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन लोको पायलट के अधिकारों और कामकाजी हालात को बेहतर किए जाने के लिए संसद में आवाज उठाएगा।

राहुल ने शुक्रवार को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लोको पायलटों से मुलाकात की थी, जिसके बाद उत्तर रेलवे (NR) के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि गांधी ने जिन लोको पायलट से मुलाकात की, वे नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन की ‘क्रू लॉबी’ (लोको पायलट के लिए निर्धारित स्थल) से नहीं थे। दिल्ली मंडल उत्तर रेलवे के अंतर्गत आता है। रायबरेली सांसद ने लोको पायलट से बात करके उनकी समस्याओं और चुनौतियों के बारे में जानकारी हासिल की थी। गांधी ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह संसद में उनके मुद्दे उठाएंगे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि गांधी ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर देशभर से आए करीब 50 लोको पायलट से मुलाकात की और उन्होंने उन्हें अपनी समस्याएं बताईं।

आखिर कंचनजंगा ट्रेन हादसा किसकी है गलती जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि कंचनजंगा ट्रेन हादसा किसकी गलती है! पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में 17 जून को कंचनजंगा एक्सप्रेस और मालगाड़ी की हुई टक्कर मामले में चीफ कमिश्नर रेलवे सेफ्टी (CCRS) जनक कुमार गर्ग की रिपोर्ट आ गई है। इसमें ट्रेन एक्सीडेंट कैटेगरी ‘एरर इन ट्रेन वर्किंग’ बताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें अकेले लोको पायलट, एएलपी या फिर गार्ड की गलती नहीं थी, बल्कि संयुक्त रूप से स्टेशन मैनेजर और ट्रेन संचालन से संबंधित कई अधिकारियों के स्तर पर ‘चूक’ हुई थी। जिस वजह से यह ट्रेन एक्सीडेंट हुआ और मालगाड़ी के पायलट और कंचनजंगा के गार्ड समेत हादसे में 10 लोगों की मौत हो गई थी। रिपोर्ट में रेलवे बोर्ड को भी सलाह दी गई है कि वह सुरक्षित ट्रेन चलाने के लिए कवच लगाने समेत ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम के लिए देशभर में एक यूनिफॉर्म सिस्टम तैयार करे। क्योंकि, कंचनजंगा एक्सप्रेस हादसे में जो गलतियां या चूक हुई। वह किसी एक के कारण नहीं बल्कि चीजों को अलग-अलग समझने की वजह से भी हुई। जैसे की कंचनजंगा और मालगाड़ी से पहले रंगापानी रेलवे स्टेशन से पांच और ट्रेन रवाना हुई थी। इन सभी को स्टेशन मास्टर ने T/A 912 अथॉरिटी जारी की थी। लेकिन यह सब ट्रेन अलग-अलग स्पीड से आगे पहुंची थी। इसमें 14 मिनट से लेकर 36 मिनट तक का ट्रेनों ने समय लिया। इन सात ट्रेनों में केवल कंचनजंगा एक्सप्रेस के पायलट ने नियमों का पालन किया और खराब सिग्नल होने के चलते उसने 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाई।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि अन्य ट्रेनों के एलपी ने नियमों का पालन नहीं किया। चूंकि T/A 912 अथॉरिटी पर कहीं पर भी ट्रेन लिमिट नहीं लिखी गई थी। इस वजह से सब ट्रेनों के पायलट ने ट्रेनों को अपने-अपने हिसाब से दौड़ाया। इसमें सबसे अधिक 78 किलोमीटर प्रति घंटा तक की स्पीड से कंचनजंगा को पीछे से टक्कर मारने वाली मालगाड़ी ने दिखाई।

स्पीडोमीटर डेटा से पता लगा है कि हादसे के दिन जब सुबह 8:45:43 बजे ट्रेन T/A 912 अथॉरिटी लेकर चली थी। तब इसकी स्पीड 15 किलोमीटर प्रति घंटा थी। लेकिन एलपी इसकी स्पीड बढ़ाता रहा और 4:04 मिनट बाद 8:50:02 मिनट पर मालगाड़ी की स्पीड 78 KMPH तक पहुंच गई थी। कंचनजंगा एक्सप्रेस आगे मोड़ पर खड़ी थी। फिर जैसे ही सुबह 8:50:03 बजे मालगाड़ी के एलपी ने आगे खड़ी कंचनजंगा को देखा। उसने तुरंत इमरजेंसी ब्रेक लगाए। 15 सेकंड में ट्रेन की स्पीड घटकर 40 KMPH तक ही आ पाई और 8:50:18 बजे मालगाड़ी ने कंचनजंगा एक्सप्रेस में पीछे से टक्कर मार दी। तीन सेकंड बाद ही उसकी स्पीड जीरो हो गई।

रिपोर्ट में बताया गया है कि T/A 912 अथॉरिटी सभी कायदे-कानून को बताते हुए जारी नहीं की गई थी। पायलट को कॉशन ऑर्डर जारी नहीं किया गया था। इमरजेंसी के दौरान वॉकी-टॉकी जैसे क्रिटिकल सेफ्टी इक्विपमेंट की कमी थी और स्टेशन मास्टर T/A 912 अथॉरिटी पर स्पीड लिमिट लिखने में फेल रहे।वैसे T/A 912 अथॉरिटी के लिए देशभर में एक ही तरह का नियम नहीं है। जिससे अलग-अलग ट्रेनों के पायलट ने इसे अपनी तरह से समझते हुए ट्रेन चलाईं। इसी तरह से अन्य कई स्तर पर कुछ ना कुछ चूक रही जो की इतनी बड़ी दुर्घटना का कारण बनी।

सीआरएस की इस प्राथमिक रिपोर्ट के एक्सपर्ट का कहना है कि यह तो साफ हुआ कि कम से कम अकेले लोको पायलट की गलती से यह दुर्घटना नहीं हुई थी। इसमें कई स्तर पर गलतियां और चूक हुईं। जो दुर्घटना का कारण बनी। अब रेलवे का कहना है कि वैसे तो इस दुर्घटना में ऑटोमेटिक सिग्नल सिस्टम के फेल होने पर बनाए गए नियमों का पालन नहीं किया गया। यह नियम देशभर में एक समान हैं। मालगाड़ी के लोको पायलट ने अथॉरिटी को ठीक ढंग से समझा नहीं। जबकि कंचनजंगा ट्रेन के पायलट ने नियमों के तहत ट्रेन चलाई और रेड सिग्नल पर रूका। इसमें 14 मिनट से लेकर 36 मिनट तक का ट्रेनों ने समय लिया। इन सात ट्रेनों में केवल कंचनजंगा एक्सप्रेस के पायलट ने नियमों का पालन किया और खराब सिग्नल होने के चलते उसने 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाई।लेकिन इसके बावजूद रेलवे ने बड़ा कदम उठाते हुए अथॉरिटी फार्म को बदल दिया है। जिससे की कोई भी पायलट इसे गलत ढंग से ना समझे। एलपी और एएलपी की और अधिक ट्रेनिंग कराई जाएगी। इसके अलावा जो भी अन्य जरूरी कदम हैं। वह सब उठाए जाएंगे।