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क्या ब्रिक्स देश मिलकर करेंगे डॉलर का खात्मा?

आने वाले समय में ब्रिक्स देश डॉलर का खात्मा कर सकते हैं! हाल ही में रूस के कजान में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस संगठन के देशों को अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार पर जोर दिया है। माना जा रहा है कि यह इशारा ब्रिक्स की अपनी करेंसी कायम करने की है। दरअसल, पूरी दुनिया के कारोबार पर इस वक्त अमेरिकी डॉलर का दबदबा है। इससे पहले 2023 में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि ब्रिक्स राष्ट्र अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में संभावित स्वर्ण समर्थित मुद्रा बनाने पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। हालांकि, यह अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी, लेकिन ब्रिक्स मुद्रा की संभावना और निवेशकों के लिए इसके संभावित प्रभावों को देखने के लिए यह अच्छा वक्त माना जा रहा है। आइए-समझते हैं कि ब्रिक्स देश कैसे डॉलर के दबदबे को खत्म कर सकते हैं और ब्रिक्स की मुद्रा का वजन कितना होगा। अभी दुनिया में अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व है, जो सभी मुद्रा व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है। 2023 से पहले तक करीब 100 फीसदी पेट्रोलियम का कारोबार अमेरिकी डॉलर में किया जाता था। हालांकि, 2023 में यह तस्वीर थोड़ी बदल गई। तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा यानी 20 फीसदी गैर अमेरिकी मुद्राओं से किया गया था। यही बात अब अमेरिका को सता रही है। माना जा रहा है कि मौलिक रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से बने ब्रिक्स देश नई करेंसी की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे अमेरिका चिंता में हैं, क्योंकि इससे उसका वर्चस्व टूट सकता है।

ब्रिक्स की अपनी करेंसी की बात तब उठी है, जब चीन और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए हैं। ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि ब्रिक्स देशों को एक नई आरक्षित मुद्रा स्थापित करनी चाहिए। इससे अमेरिकी डॉलर पर काफी असर पड़ सकता है। उसकी मांग में गिरावट आएगी। इसी को डी-डॉलराइजेशन कहा जाता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में जंग समेत हाल की वैश्विक वित्तीय चुनौतियों और आक्रामक अमेरिकी विदेश नीतियों ने ब्रिक्स देशों को संभावना तलाशने के लिए प्रेरित किया है। वे अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता को कम करते हुए अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करना चाहते हैं। ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी? इकसी अभी तक लॉन्च की कोई निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इन देशों ने इस संभावना पर विस्तार से चर्चा की है। 2022 में 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी पुतिन ने नई वैश्विक आरक्षित मुद्रा की वकालत की थी। अप्रैल, 2023 में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डिसिल्वा ने ब्रिक्स मुद्रा का समर्थन किया। दक्षिण अफ्रीका के ब्रिक्स राजदूत अनिल सूकलाल ने कहा है कि लगभग 40 देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की इच्छा जताई है। पुतिन ने खुद भी इस बार कहा है कि 30 देश इसके लिए तैयार हैं। व्यक्त की है। 2023 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में छह देशों को ब्रिक्स सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। अर्जेंटीना, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। जनवरी 2024 में अर्जेंटीना को छोड़कर सभी आधिकारिक तौर पर गठबंधन में शामिल हो गए।

नई मुद्रा से ब्रिक्स देशों को कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें अधिक कुशल सीमा पार लेनदेन और वित्तीय समावेशन में बढ़ोतरी शामिल है। ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी, डिजिटल करेंसी और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स का लाभ उठाकर ब्रिक्स मुद्रा वैश्विक वित्तीय प्रणाली में क्रांति ला सकती है। निर्बाध सीमा पार भुगतान के लिए यह ब्रिक्स देशों और उससे परे व्यापार और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा दे सकता है। दशकों से अमेरिकी डॉलर ने दुनिया की अग्रणी आरक्षित मुद्रा के रूप में राज किया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अनुसार, 1999 से 2019 के बीच अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 96 प्रतिशत, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 74 प्रतिशत और बाकी दुनिया में 79 प्रतिशत डॉलर का उपयोग किया गया था। अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, अमेरिकी डॉलर का उपयोग लगभग 88 प्रतिशत मुद्रा विनिमय में किया जाता है और केंद्रीय बैंकों के रखे गए सभी विदेशी मुद्रा भंडार का 59 प्रतिशत उपयोग डॉलर में किया जाता है।

कुछ वित्तीय विश्लेषक इस बात के प्रमाण के रूप में 1999 में यूरो के निर्माण की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिक्स मुद्रा संभव हो सकती है। हालांकि, इसके लिए वर्षों की तैयारी, एक नए केंद्रीय बैंक की स्थापना और 5 देशों के बीच अपनी संप्रभु मुद्राओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक समझौते की जरूरत होगी। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए संभवतः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समर्थन की भी जरूरत होगी। 2024 की दूसरी तिमाही तक मूल ब्रिक्स देशों और मिस्र (केंद्रीय बैंक स्वर्ण भंडार वाले पांच नए अतिरिक्त देशों में से एकमात्र देश) की संयुक्त केंद्रीय बैंक सोने की हिस्सेदारी दुनिया के केंद्रीय बैंकों में रखे गए सभी सोने का 20 प्रतिशत से अधिक थी। सेंट्रल बैंक गोल्ड होल्डिंग्स के मामले में रूस, भारत और चीन शीर्ष 10 में हैं।

रूस के पास 2,335.85 मीट्रिक टन (एमटी) सोना है, जो इसे केंद्रीय बैंक के सोने के भंडार के मामले में पांचवां सबसे बड़ा बनाता है। चीन 2,264.32 मीट्रिक टन सोने के साथ छठे स्थान पर है और भारत 840.76 मीट्रिक टन के साथ आठवें स्थान पर है। ब्राजील और दक्षिण अफ़्रीका के केंद्रीय बैंक में सोने की हिस्सेदारी बहुत कम है, जो क्रमशः 129.65 मीट्रिक टन और 125.44 मीट्रिक टन है। नए ब्रिक्स सदस्य मिस्र की सोने की हिस्सेदारी भी उतनी ही कम, 126.57 मीट्रिक टन है।

 

क्या ब्रिक्स देशों में शामिल होना चाहते हैं पाकिस्तान और तुर्की?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान और तुर्की ब्रिक्स देशों में शामिल होना चाहते हैं या नहीं! करीब 2500 साल पहले एक सिल्क रोड की शुरुआत हुई, जो भूमध्य सागर से लेकर पूर्वी एशिया को जोड़ता था। इस दौरान ज्यादातर व्यापारी मुस्लिम थे और पूर्व की ओर चले गए। ये व्यापारी अपने साथ कारोबारी वस्तुएं तो लेकर आए ही, अपने साथ अपनी संस्कृति और मान्यताएं भी पूर्वी एशिया में ले गए। माना जाता है कि इस्लाम उन कई धर्मों में से एक था जो 7वीं से 10वीं शताब्दी के दौरान युद्ध, व्यापार और राजनयिक आदान-प्रदान के माध्यम से धीरे-धीरे सिल्क रोड के आसपास के देशों में फैलना शुरू हुआ।

चीन में भी इस्लाम का आगमन तब हुआ, जब तांग और सोंग राजवंशों का शासन था। इस्लाम पहली बार चीन में 616-18 ईसवी में साद इब्न अबी वक्कास, वहाब इब्न अबू कबचा और कई दूसरे मुस्लिम यात्रियों के जरिए पहुंचा। कई विवरणों में जिक्र है कि वहाब अबू कबचा 629 ईसवी में समुद्र के रास्ते कैंटन पहुंचे। अब चीन में मुस्लिमों की इतनी आबादी है कि वह इन्हें अपने लिए खतरा मानता है। कहा जा रहा है कि इसी वजह से चीन ने ब्रिक्स देशों में शामिल होने की तुर्की इच्छा पर पानी फेर दिया। इसे समझते हैं। चीन में करीब 2.5 करोड़ मुसलमान हैं, जो कुल जनसंख्या का 2 प्रतिशत से भी कम हैं। इनमें हुई मुस्लिम सबसे अधिक संख्या में हैं। मुसलमानों की सबसे बड़ी संख्या उत्तर-पश्चिमी चीन के शिंझियांग स्वायत्त क्षेत्र में रहती है। इनमें बड़ी आबादी उइघुर मुस्लिमों की है। निंग्जिया, गांसु और किंघई के क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी है, मगर कम संख्या में है। चीन के 55 आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक लोगों में से 10 समूह मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम हैं। कम्युनिस्ट देश होने के नाते चीन में सार्वजनिक जगहों, ऑफिस वगैरह पर नमाज पढ़ने की आबादी है। उइघुर मुस्लिमों के खिलाफ जमकर सख्ती की जाती है।

चीन के शिंजियांग प्रांत में करीब 1.2 करोड़ उइघुर मुसलमान रहते हैं। ये अपनी भाषा बोलते हैं, जो तुर्की से मिलती-जुलती है। ये खुद को सांस्कृतिक और जातीय रूप से मध्य एशियाई देशों के करीब मानते हैं। उइघुर शिंजियांग की आबादी के आधे से भी कम हैं। हाल के दशकों में बहुसंख्यक जातीय समूह हान लोगों का शिनजियांग में बड़े पैमाने पर पलायन देखा गया है, जो कथित तौर पर वहां की अल्पसंख्यक आबादी को कमजोर करने के लिए किया गया था। चीन पर मुस्लिम धार्मिक हस्तियों को निशाना बनाने , क्षेत्र में धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने तथा मस्जिदों और कब्रों को नष्ट करने का भी आरोप लगाया गया है।

दरअसल, इस बहस की शुरुआत तब हुई, जब जर्मन प्रकाशक बिल्ज ने यह खबर चला दी थी कि तुर्की को ब्रिक्स में शामिल होने से भारत ने रोक दिया। हकीकत यह है कि तुर्की नाटो का सदस्य है और उसने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया है। चीन पाकिस्तान को भी शामिल करना चाहता है। पाकिस्तान और चीन में सैन्य सहयोग के साथ रणनीतिक साझेदारी भी है। इसके बावजूद पाकिस्तान भयानक आर्थिक संकट से जूझ रहा है। हाल ही में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन भाषण में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सभी फैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए और ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों का सम्मान होना चाहिए। इस टिप्पणी को पाकिस्तान को ब्रिक्स की सदस्यता नहीं मिलने से जोड़कर देखा गया। यह खबर आई कि रूस और चीन के चाहने के बावजूद भारत ने पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल होने से रोक दिया। हालांकि, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने कहा कि पाकिस्तान को ब्रिक्स में पार्टनर देश का भी दर्जा नहीं मिला। पाकिस्तान होमवर्क ठीक से नहीं किया।

तुर्की को रोकने में भारत के अलावा चीन का भी नाम लिया जा रहा है। रूस के एक विश्लेषक करीम हास ने कहा कि चीन को उइघुर मुसलमानों पर तुर्की के रुख को लेकर नाराजगी है। तुर्की अक्सर उइघुर मुस्लिमों के खिलाफ अत्याचार को लेकर चीन की आलोचना करता रहता है, जिस पर चीन ऐतराज जताता रहा है। कहा जाता है कि पाकिस्तान के कश्मीर राग को लेकर तुर्की उसका साथ देता रहा है, जिस वजह से भारत को भी तुर्की के ब्रिक्स में आने पर ऐतराज है।

तुर्की को ब्रिक्स की सदस्यता नहीं मिलने के पीछे 5 अहम वजह हैं। पहला यह है कि तुर्की एक तो नाटो का सदस्य देश है। दूसरा यह कि तुर्की को लेकर अभी सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं है। तीसरा ब्रिक्स अभी चार नए सदस्यों- ईरान, यूएई, इथियोपिया और मिस्र को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इन्हें इसी साल ब्रिक्स की पूर्णकालिक सदस्यता मिली थी। चौथी वजह यह है कि चीन उइघुर मुसलमानों पर तुर्की की निंदा से परेशान रहता है। वहीं, पांचवीं वजह यह है कि चीन तुर्की की अर्थव्यवस्था को लेकर भी अपना अलग नजरिया रखता है। चीन को लगता है कि तुर्की ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक के लिए बोझ साबित होगा।

तुर्की जी-7 और यूरोपीय यूनियन के साथ रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में शामिल है। ऐसे में तुर्की का पंगा रूस के साथ बढ़ चुका है। उसका रूस के साथ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ नहीं रहा है। 2022 में तुर्की और रूस का द्विपक्षीय व्यापार 68.70 अरब डॉलर था जो 2023 में घटकर 55.4 अरब डॉलर रह गया। तुर्की ने अमेरिकी सैन्य तकनीक रूस को निर्यात करने पर रोक लगा दी है। सबसे बड़ी बात कि तुर्की यूक्रेन को सैन्य हथियार दे रहा है, जो व्लादिमीर पुतिन को कतई अच्छा नहीं लग रहा।

तुर्की यूरोपीय यूनियन में शामिल होना चाहता था लेकिन उसे जगह नहीं मिली। माना जाता है कि मुस्लिम बहुल देश होने के कारण तुर्की को ईयू में जगह नहीं मिली। ऐसे में तुर्की अपनी पहचान को लेकर जूझता रहा है। तुर्की के एक तरफ यूरोप है और दूसरी तरफ एशिया। तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोगन भी यह इच्छा जता चुके हैं, जब उन्होंने कहा कि तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने की चाहत को पश्चिम से मुंह मोड़ने के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

 

क्या अमेरिका, चीन और जापान बन चुके हैं दुनिया के सबसे बड़े सट्टेबाज?

वर्तमान में अमेरिका, चीन और जापान दुनिया के सबसे बड़े सट्टेबाज बन चुके हैं! दुनिया भर में हर पांच में से एक इंसान ने अपने जीवन में कभी न कभी जुआ जरूर खेला है। रोमांच, संपर्क और पैसे बनाने की भावना ने लोगों में जुए की लत लगाई है। अमेरिका, चीन और जापान जैसे कई देश ऐसे हैं, जहां जुआ ऑनलाइन या ऑफलाइन रूपों में खेला जाता है। इसके अलावा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन समेत दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहां जुआ खेला जाता है। भारत में भी दिवाली के मौके पर जुआ खेला जाता है। इसके अलावा, हमारे देश में पाबंदी के बाद भी जुआ खेलने की इंडस्ट्री काफी बढ़ चुकी है। जानते हैं जुए का खेल और दुनिया में उसका कितना होता है कारोबार। अमेरिका, चीन और जापान सबसे बड़े जुआरियों में से हैं, जो हर साल कुल जुए में अरबों डॉलर का सकल घाटा उठाते हैं। अमेरिका में 1,000 से अधिक एक्टिव कैसीनो हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा जुआरी है, जो सालाना 116.9 बिलियन डॉलर का सकल घाटा उठाता है। एक सर्वे में अमेरिकियों में से 62% ने कहा कि उन्होंने 2023 के दौरान जुआ खेला था। देश के कुछ सबसे आम जुए के रूपों में लॉटरी, रैफल्स, कैसिनो , स्लॉट मशीन, बिंगो और खेल सट्टेबाजी शामिल हैं। 2018 के बाद से सट्टेबाजी जैसा जुआ देश में काफी बढ़ गया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के एक संघीय कानून को पलट दिया। इसने अधिकांश राज्यों में खेल सट्टेबाजी को प्रतिबंधित कर दिया था।

एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में 2024 में 1.6 अरब लोगों ने किसी न किसी रूप में जुआ जरूर खेला। हर साल 4.2 अरब लोगों ने जुआ खेला है। 2024 में दुनिया की आबादी 800 करोड़ के पार हो चुकी है। अमेरिका में तकरीबन आधी आबादी किसी न किसी रूप में जुआ जरूर खेलती है। वहां का लास वेगास कैसिनो के मामले में दुनिया में बेहद पॉपुलर है। भारत में जुआ खेलने की इंडस्ट्री 5 लाख करोड़ की हो चुकी है। यहां पर 1.2 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में जुआ खेल रहे है। यह हाल तब है, जब भारत में जुआ खेलना गैरकानूनी है। जुए की ग्लोबल इंडस्ट्री 45 लाख करोड़ रुपए की हो चुकी है। यह इंडस्ट्री 2028 तक 62 लाख करोड़ रुपए की हो जाएगी।

चीन में जुआ खेलना गैरकानूनी है , लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह देश दुनिया में जुए से होने वाले सकल घाटे में दूसरे स्थान पर है, जो सालाना 62.4 बिलियन डॉलर है। चीन आम तौर पर जुए की अनुमति नहीं देता है। मगर, चीन के प्रांतों में लॉटरी की अनुमति है, जिन्हें वेलफेयर लॉटरी और स्पोर्ट्स लॉटरी के रूप में जाना जाता है। यहां अवैध जुआ भी आम है, जिसमें गुप्त कैसिनो, अनौपचारिक लॉटरी और महजोंग जैसे सट्टेबाजी कार्ड गेम शामिल हैं। चीन के एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र मकाऊ में जुआ कानूनी है, जहां 2023 में सकल गेमिंग राजस्व 22.3 बिलियन डॉलर है।

जापान में जुआ वैसे तो जुआ अपराध है। मगर यह एशिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर जुआ खेलने में आगे है। यहां जुए में 24.1 बिलियन डॉलर का घाटा हुआ है। चीन की तरह जापानी राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारें कभी-कभी सरकारी आय बढ़ाने और नागरिकों को मनोरंजन प्रदान करने के लिए लॉटरी कार्यक्रम आयोजित करती हैं। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक दौड़ पर भी दांव लगा सकते हैं, जिसमें घुड़दौड़, पावरबोट रेसिंग, साइकिल रेसिंग और डामर स्पीडवे मोटरसाइकिल रेसिंग शामिल हैं।

फ्रांस में जुआ से होने वाला कुल सकल घाटा 10.4 बिलियन डॉलर है। फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज पास्कल ने 17वीं शताब्दी में रूलेट व्हील का आविष्कार किया था, जबकि 1870 में शुरू हुई पूल बेटिंग बेहद पॉपुलर है। फ्रांस में लगभग आधी आबादी हर साल जुआ खेलती है। 2010 में फ्रांस द्वारा ऑनलाइन जुए को वैध बनाने के बाद से जुए में भी बढ़ोतरी हुई है। चैंटिली जैसे हाई प्रोफाइल घुड़दौड़ में सट्टेबाजी आम है। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अनिल सिंह श्रीनेत बताते हैं कि भारत में जुआ और सट़टेबाजी के संबंध में कानून है। सार्वजनिक जुआ अधिनियम 1867, के तहत भारत में जुआ और सट़टेबाजी पर पाबंदी है। संविधान में गैंबलिंग को स्टेट लिस्ट में रखा गया है, यानी कोई भी स्टेट इसके लिए अपना कानून बना सकता है। यह प्रावधान है कि राज्य चाहें तो यह कानून मानें या फिर इसमें संशोधन करके अपने यहां इसे लीगलाइज कर सकते हैं। इसी के तहत गोवा, दमन और सिक्किम ने अपने यहां जुआ और सट़टेबाजी को लीगलाइज कर रखा है।

अगर कोई घर में जुआ चलाता है तो उसके लिए 200 रुपए जुर्माना या तीन महीने की सजा और अगर कोई जुआघर में खेलने जाता है तो उस पर 100 रुपए फाइन या एक महीने की कैद हो सकती है। वहीं, लॉटरी अधिनियम, 1998 के तहत कई स्टेट ने लॉटरी पर बैन लगाया है या उसे जारी रखा है।

ब्रिटेन की एक स्टडी के अनुसार, जुआ खेलने वाली 32 फीसदी महिलाओं में ज्यादातर की उम्र 35 से 54 साल के बीच की है। उम्रदराज और युवा महिलाएं भी जुआ खेल रही हैं, मगर उनकी जुआ खेलने की दर थोड़ी कम है। स्मार्टफोन्स और टैबलेट्स ने महिलाओं की ऑनलाइन गैंबलिंग में दिलचस्पी बढ़ा दी है। उन्हें किसी कैसिनो जाने की जरूरत नहीं है। ऑप्टीमूव डॉटकॉम पर 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में ऑनलाइन गैंबलिंग के दौरान पुरुष औसतन 4800 रुपए की बाजी लगाते हैं तो वहीं महिलाएं औसतन 3500 रुपए का दांव लगा रही हैं।

 

आखिर वर्तमान में वैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग क्यों उठ रही है?

वर्तमान में वैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग उठती जा रही है! देश में जब भी चुनाव होते हैं तो ईवीएम को लेकर विपक्ष की तरफ से सवाल उठाए जाते हैं। लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक ईवीएम से छेड़छाड़ से लेकर खराबी की शिकायत अक्सर सामने आती है। चुनाव आयोग जहां विपक्ष के आरोपों को आधारहीन बताता है, वहीं केंद्र सरकार के मंत्री इसे विपक्ष की हार के बाद झुंझलाहट बताते हैं। इसके बावजूद कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने बुधवार को एक बार फिर सुझाव दिया कि भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) को चुनाव कराने के लिए मतपत्रों की ओर लौटने पर विचार करना चाहिए। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने उन्होंने लोकतंत्र की सुरक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। तिवारी ने कहा कि पूरी दुनिया में, बिना किसी अपवाद के, यहां तक कि उन देशों में भी जहां ईवीएम का आविष्कार या भारत से पहले इस्तेमाल किया गया था, हर कोई वापस मतपत्रों की ओर लौट गया है क्योंकि लोकतंत्र इतना कीमती है कि इसे तकनीक पर नहीं छोड़ा जा सकता।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को बहुत गंभीरता से न केवल विचार करना चाहिए बल्कि इस देश को वापस मतपत्रों की ओर ले जाने की पहल करनी चाहिए। लोकतंत्र इतना कीमती है कि इसे तकनीक पर नहीं छोड़ा जा सकता। कांग्रेस नेता का यह बयान चुनाव आयोग की तरफ से हाल ही में हरियाणा चुनाव में अनियमितताओं के कांग्रेस के आरोपों को खारिज करने के बाद आया है। चुनाव आयोग ने कहा था कि ये आरोप “निराधार, गलत और तथ्यों से रहित हैं। मंगलवार को कांग्रेस को लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने उनसे चुनाव के बाद निराधार दावे करने से बचने का आग्रह किया। साथ ही पार्टी पर बिना सबूत के ‘सामान्य’ संदेह पैदा करने का आरोप लगाया। चुनाव आयोग ने चेतावनी दी कि इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना आरोपों से सार्वजनिक अशांति और अराजकता हो सकती है। खासकर मतदान और मतगणना के दिनों जैसे संवेदनशील समय के दौरान।

तिवारी ने ईवीएम की बैटरी लाइफ पर भी सवाल उठाए और संदेह जताया। उन्होंने कहा कि यह विज्ञान के किसी भी नियम को पूरी तरह से खारिज करता है कि एक मशीन, एक ईवीएम, पूरे दिन सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक या सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक इस्तेमाल की जा सकती है और मशीन के बंद होने के बाद 99% बैटरी लाइफ होती है। इसे एक स्ट्रांग रूम में स्टोर किया जाता है और फिर कुछ दिनों बाद बाहर लाया जाता है और वोटों की गिनती की जाती है।

इस मुद्दे पर बीजेपी नेता तरुण चुघ ने कांग्रेस पार्टी की आलोचना की। उन्होंने कांग्रेस को ‘डूबता जहाज’ कहा। चुनावी हार के बाद ईवीएम की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने के लिए इसे दोषी ठहराया। चुघ ने ने कहा कि कांग्रेस एक डूबता जहाज है जो विचारहीन और नीतिहीन है… वे (चुनाव में) अपनी हार के लिए ईवीएम को दोषी ठहराते हैं। कांग्रेस पार्टी, जब भी चुनाव जीतती है, चाहे वह उस समय कर्नाटक या तेलंगाना में हो, ईवीएम और चुनाव आयोग को ठीक मानती है… इतने सारे चुनाव हारने के बावजूद उनका अहंकार ऊंचा है। बता दें कि कांग्रेस ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली हार का ठीकरा कुछ अलग तरह से फोड़ा। पार्टी ने इस बार बड़ी अलबेली वजह बताकर ईवीएम में हेरफेर का आरोप मढ़ा। कांग्रेस ने कहा कि कई मतगणना केंद्रों पर ईवीएम की बैटरी बाकियों के मुकाबले ज्यादा चार्ज थी। पार्टी ने दावा किया जहां ईवीएम की बैटरी ज्यादा चार्ज थी, वहां उसे हार मिली है। पार्टी ने इसकी आधिकारिक शिकायत चुनाव आयोग से की थी जिसका जवाब आयोग ने मंगलवार को दिया।

चुनाव आयोग ने कांग्रेस के रवैये पर आपत्ति जाहिर की और उसे सावधान भी किया। आयोग ने 26 विधानसभा क्षेत्रों के रिटर्निंग ऑफिसर्स की री-वेरिफिकेशन रिपोर्ट का हवाला दिया। आयोग ने कहा कि पूरी जांच के बाद पाया गया कि चुनावी प्रक्रिया का हर चरण सही था और कांग्रेस उम्मीदवारों या एजेंटों की देखरेख में किया गया था। यह जानकारी 1,600 पेज की रिपोर्ट में है।चुनाव आयोग ने कहा है कि कांग्रेस की ओर से आयोग में कोई औपचारिक पत्र प्राप्त होने से पहले ही इस तरह के ‘आधारहीन’ आरोपों को अक्सर जोर-शोर से प्रचारित किया जाता है और ऐसा अक्सर मतदान या मतगणना के दिन के आसपास होता है। आयोग ने आगे कहा है कि कांग्रेस जैसे ऐतिहासिक प्रतिष्ठा वाले एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का यह रवैया खासा निराशाजनक है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने जानबूझकर यह प्रवृत्ति ही पाल ली है कि सबूत हों या नहीं, बस चुनावी नतीजों की विश्वसनीयता पर संदेह के बादल पैदा कर दो।

चुनाव आयोग के कांग्रेस के रवैये पर उठाए गए सवाल वाकई गंभीर हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग की विश्वनीयता को कठघरे में खड़ा करने के हर संभव प्रयास करती है। ऐसा करने में वह चालाकी भी बरतती है और जीत के बाद भी कहती है कि ईवीएम पर सवाल तो बना हुआ है। सवाल है कि क्या चुनाव आयोग की निष्पक्षता तभी साबित होगी जब हर चुनाव में कांग्रेस की जीत और उसके विरोधियों की हार होती रहे? कांग्रेस कहती है कि वह लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन लोकतंत्र को खतरा है तो किससे? जो अपनी जीत और विरोधियों की हार हमेशा के लिए दीवार पर लिख देना चाहती है, क्या वो लोकतंत्र की रक्षक हो सकती है?

 

क्या भारत को भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ आगे बढ़ना चाहिए?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत को भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ आगे बढ़ना चाहिए या नहीं! किसी भी देश की तरक्की सिर्फ उसके संसाधनों पर नहीं, बल्कि उसके द्वारा अपनाए गए संस्थानों पर निर्भर करती है। उनका मानना है कि जो देश सुरक्षित संपत्ति अधिकार, समानता और अवसर प्रदान करते हैं, और मजबूत सरकारी संस्थान बनाते हैं, वे ही सफलता की सीढ़ी चढ़ पाते हैं। वे कहते हैं, “सफल राष्ट्र ऐसे संस्थान स्थापित करते हैं जो वंचितों का समर्थन करते हैं, कम शक्तिशाली लोगों की सुरक्षा करते हैं और बड़े निगमों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करते हैं।” प्रोफेसर मोकीर से सहमत हूं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अधिकार पर सवाल उठाना और जोखिम उठाना जरूरी है। हालांकि, वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि इस विद्रोह को मजबूत राज्य संस्थानों के साथ संतुलित करने की जरूरत है जो कानूनों का पालन सुनिश्चित करते हैं और भविष्यवाणी की जा सकने वाली व्यवस्था बनाते हैं। आर्थिक समृद्धि के लिए राज्य शक्ति और सामाजिक नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। तकनीक में बदलाव हमेशा से इतिहास का अहम हिस्सा रहे हैं, चाहे वह खेती की शुरुआत हो या औद्योगिक क्रांति। हर बार, समाज को नई तकनीकों के इस्तेमाल के तरीके पर फैसला लेना पड़ा है और इन फैसलों ने उनके भविष्य को आकार दिया है। तकनीकी परिवर्तन, जैसे कृषि में बदलाव या औद्योगिक क्रांति, हमेशा महत्वपूर्ण मोड़ रहे हैं जिनके लिए अनुकूलन और चुनाव की जरूरत होती है। इन बदलावों के दौरान, समाज महत्वपूर्ण चुनाव करते हैं कि नई तकनीकों का उपयोग कैसे किया जाए, और ये चुनाव उनके भविष्य के प्रक्षेपवक्र को आकार देते हैं। शक्तिशाली तकनीकी कंपनियों को विनियमित करने और डेटा और एआई प्रौद्योगिकियों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने में सक्षम मजबूत वैश्विक संस्थानों के निर्माण के लिए मजबूत लोकतंत्र आवश्यक हैं।आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के दौर में हैं और यह हमें एक और मौका देता है, लेकिन इसके साथ ही इसके संभावित खतरों पर भी विचार करना होगा।

मानव नवाचार, रचनात्मकता और राज्य क्षमता महत्वपूर्ण बनी हुई है। 21वीं सदी में जरूरी विशिष्ट कौशल विकसित हो रहे हैं। जेनरेटिव एआई के कुछ कार्यों को स्वचालित करने की संभावना है, जिससे सूचना बोर्ड, पुनर्प्राप्ति और कुछ प्रकार के शारीरिक श्रम से संबंधित कौशल का मूल्य कम हो जाएगा। हालांकि, मानव रचनात्मकता और लचीलापन केंद्रीय रहेगा। यूएस-चीन प्रतिद्वंद्विता एआई के वैश्विक परिदृश्य को आकार दे रही है, लेकिन अन्य देशों को इसे एक निश्चित गति के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। भारत, तुर्की, इंडोनेशिया, मैक्सिको और ब्राजील जैसे देशों को एआई के विकास और शासन को प्रभावित करने के लिए वैश्विक मामलों में सहयोग करना चाहिए और एक सामूहिक आवाज बनानी चाहिए।

एआई में यूएस-चीन को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी अलग आर्थिक और भू-राजनीतिक योजना विकसित करने की जरूरत है। इस योजना को एआई परिदृश्य में भारत के आला और प्रतिस्पर्धी लाभ की पहचान करनी चाहिए, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह वैश्विक रुझानों के साथ बहकर निष्क्रिय खिलाड़ी न बन जाए। भारत को सिलिकॉन वैली की तरह तकनीक विकसित करने और बनाने पर ध्यान केंद्रित करके मुख्य रूप से प्रतिभा राष्ट्र से तकनीकी राष्ट्र में परिवर्तित होना चाहिए। इस बदलाव के लिए रिसर्च और विकास में निवेश, नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना और अत्याधुनिक एआई तकनीकों पर काम करने वाले स्टार्टअप का समर्थन करना होगा।

लोकतंत्र दुनिया भर में चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसमें ध्रुवीकरण, विश्वास में गिरावट और सामान्य उद्देश्य की कमी शामिल है। इन मुद्दों को संबोधित करना सर्वोपरि है। शक्तिशाली तकनीकी कंपनियों को विनियमित करने और डेटा और एआई प्रौद्योगिकियों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने में सक्षम मजबूत वैश्विक संस्थानों के निर्माण के लिए मजबूत लोकतंत्र आवश्यक हैं।

मनुष्यों को मशीनों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उनके पूरक कौशल विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। इसके लिए यह समझना आवश्यक है कि प्रौद्योगिकी का भविष्य पूर्वनिर्धारित नहीं है और सक्रिय रूप से इसके विकास को आकार देना है। हमें AI के लिए मानव-समर्थक दिशा की वकालत करनी चाहिए, अत्यधिक स्वचालन और कुछ लोगों के हाथों में सूचना नियंत्रण की एकाग्रता के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में शामिल होना, नागरिक समाज संगठनों का समर्थन करना और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करना एक ऐसे भविष्य को आकार देने के लिए महत्वपूर्ण है जहां AI मानवता को लाभ पहुंचाए।

 

क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे महापुरुष आज की जरूरत बन चुके हैं?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे महापुरुष आज की जरूरत बन चुके हैं या नहीं! वल्लभभाई पटेल के जीवन, उनकी ओर से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और आधुनिक भारत के निर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डालता है। पटेल को ‘भारत के लौह पुरुष’ के रूप में जाना जाता है। पटेल ने भारत के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 500 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वल्लभभाई झावेरभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नडियाद गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। कठोर परिश्रम, अनुशासन और आत्मनिर्भरता जैसे गुण, जो बाद में उनके नेतृत्व और सेवा के दृष्टिकोण को परिभाषित करते थे, उनके बचपन से ही दिखाई देने लगे थे। वल्लभभाई अपने पिता झावेरभाई पटेल से ही प्रेरित होकर देशभक्ति के जज्बे से लबालब हो गए। उनके पिता झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में सेवा की थी। इन शुरुआती अनुभवों ने न्याय, सम्मान और लचीलापन के प्रति एक मजबूत प्रतिबद्धता को बढ़ावा दिया।

पटेल ने शुरुआत में स्थानीय स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की और बाद में इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई की। भारत लौटने पर उन्होंने अहमदाबाद में एक सफल वकील के रूप में खुद को स्थापित किया। कानूनी क्षेत्र में उनके अनुभव ने बहस, बातचीत और भाषण कला में उनके कौशल को तेज किया, जिससे उन्हें आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए तैयार किया गया। हालांकि, यह 1918 के खेड़ा सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के साथ उनकी बातचीत थी जिसने एक सफल वकील से एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी में उनके परिवर्तन को गति दी। गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों और भारत की स्वतंत्रता के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता ने पटेल को बहुत प्रभावित किया, जिससे उन्हें पूरे दिल से संघर्ष में शामिल होने की प्रेरणा मिली।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में वल्लभभाई पटेल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी, और वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद नेताओं में से एक के रूप में उभरे। एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी यात्रा को 1918 के खेड़ा सत्याग्रह के साथ गति मिली, जहां उन्होंने महात्मा गांधी के साथ एक सफल विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। बाढ़ और अकाल से प्रभावित खेड़ा क्षेत्र को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी ब्रिटिश अधिकारियों ने भू-राजस्व संग्रह को माफ करने से इनकार कर दिया। पटेल के मार्गदर्शन में खेड़ा के किसानों ने असहयोग और अवज्ञा का एक अभियान चलाया, जिसके कारण अंततः करों को निलंबित कर दिया गया, जिससे एकता और अहिंसा की शक्ति का पता चला।

इसके बाद, पटेल 1928 के बारदोली सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बारदोली में किसानों पर अत्यधिक भूमि कर का बोझ था जिसे वे खराब फसल के कारण वहन नहीं कर सकते थे। पटेल के दृढ़ नेतृत्व में, किसानों ने एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया, करों का भुगतान करने से इनकार कर दिया और ब्रिटिश वस्तुओं और सेवाओं का सामूहिक बहिष्कार किया। आंदोलन की सफलता ने पटेल को ‘सरदार’ (नेता) की उपाधि दिलाई, जो लोगों के उनके मार्गदर्शन और साहस के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

उनकी भूमिका ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को परिभाषित करने वाले प्रमुख आंदोलनों तक विस्तार किया, जिसमें 1930 में नमक मार्च और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शामिल थे। अन्य नेताओं के साथ, पटेल के प्रयासों ने स्वतंत्रता आंदोलन के जनाधार को मजबूत किया, और उन्होंने जमीनी स्तर पर समर्थन जुटाने, अनुशासन बनाए रखने और आम नागरिकों में उद्देश्य की भावना पैदा करने में खुद को कुशल साबित किया। उनकी मजबूत संगठनात्मक क्षमताओं और कार्य के प्रति समर्पण ने उन्हें कांग्रेस के भीतर एक अनिवार्य व्यक्ति और महात्मा गांधी के एक विश्वसनीय सहयोगी बना दिया।

सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने दृढ़ संकल्प, अडिग इच्छाशक्ति और नेतृत्व के प्रति सैद्धांतिक दृष्टिकोण के कारण ‘भारत के लौह पुरुष’ की उपाधि अर्जित की। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में, पटेल ने स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता के बाद के शासन दोनों की चुनौतीपूर्ण मांगों को पूरा करने के लिए आवश्यक शक्ति और लचीलापन का उदाहरण दिया। नेतृत्व के प्रति उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक था फिर भी समझौता न करने वाला था; उन्होंने व्यक्तिगत या राजनीतिक हितों से ऊपर राष्ट्र के कल्याण को रखा, कठिन निर्णय लिए जिनके लिए सहानुभूति और सिद्धांतों के सख्त पालन के संतुलन की आवश्यकता थी।

पटेल की एक परिभाषित विशेषता अधिकार के साथ सहानुभूति को संयोजित करने की उनकी क्षमता थी। वह ग्रामीण आबादी के संघर्षों की अपनी गहरी समझ के लिए जाने जाते थे और आम लोगों को सशक्त बनाने के लिए लगातार काम करते थे। बारडोली सत्याग्रह जैसी घटनाओं के दौरान उनके नेतृत्व ने न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और वंचितों की ओर से दमनकारी ताकतों के खिलाफ खड़े होने की उनकी इच्छा को रेखांकित किया। हालांकि, पटेल ने अनुशासन और व्यवस्था की भावना को भी बरकरार रखा, इस बात पर जोर देते हुए कि ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के कारण भारत को आंतरिक कलह या अव्यवस्था से ग्रस्त होने के बजाय एक स्थिर और समृद्ध भारत बनना चाहिए।

भारत के पहले गृह मंत्री और रियासत मंत्री के रूप में, पटेल ने रणनीतिक दूरदर्शिता, अनुनय और, जब आवश्यक हो, दृढ़ता के संयोजन के साथ इस स्मारकीय कार्य का रुख किया। उन्होंने इन राज्यों के शासकों को भारत में शामिल होने के लिए मनाने के लिए एक वरिष्ठ भारतीय सिविल सेवक, वी.पी. मेनन के साथ मिलकर काम किया। पटेल और मेनन ने रियासतों के शासकों की देशभक्ति, आर्थिक हितों और सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए उनसे एक एकीकृत भारत के लाभों को देखने का आग्रह किया। उनका राजनयिक दृष्टिकोण काफी हद तक सफल रहा, क्योंकि उन्होंने संघर्ष का सहारा लिए बिना अधिकांश शासकों का सहयोग प्राप्त कर लिया।

पटेल के आदर्श आज भी प्रासंगिक हैं। तीव्र वैश्वीकरण और बदलती राजनीतिक गतिशीलता के युग में, पटेल के राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सिद्धांत हमें सामूहिक पहचान और लचीलापन के महत्व की याद दिलाते हैं। एक विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था, ग्रामीण समुदायों के सशक्तिकरण और कुशल शासन के बारे में उनका दृष्टिकोण आधुनिक नीतिगत चर्चाओं में गूंजता रहता है। इसके अलावा, वैचारिक मतभेदों को दूर करने और सहयोगात्मक नेतृत्व पर जोर देने की उनकी क्षमता, इस बात पर जोर देते हुए कि राष्ट्रीय कल्याण के प्रति एक साझा प्रतिबद्धता व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेदों को पार कर सकती है, एक मूल्यवान सबक प्रदान करती है।

पटेल को समर्पित और गुजरात में लंबी खड़ी, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, एक ऐसे व्यक्ति के लिए एक उपयुक्त श्रद्धांजलि है, जिसने अपने देश के लिए शक्ति, एकता और वफादारी का प्रतीक था। जैसे-जैसे भारत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक – नई चुनौतियों से जूझ रहा है, पटेल की विरासत एक मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में कार्य करती है, जो हमें याद दिलाती है कि सच्ची ताकत एकता, अखंडता और लोगों के कल्याण के लिए अथक प्रतिबद्धता में निहित है। आज, जब हम उनकी स्मृति का सम्मान करते हैं, तो हमें इस बात पर चिंतन करने के लिए कहा जाता है कि उनके आदर्श भारत को अधिक समावेशी, समृद्ध और लचीला राष्ट्र बनने की दिशा में कैसे मार्गदर्शन कर सकते हैं।

 

यदि आपके पास व्यक्तिगत रूप से इसका परीक्षण करने का अवसर नहीं है, तो ऑनलाइन सामान खरीदने से पहले आपको क्या देखना चाहिए?

क्रीम से लेकर लिपस्टिक, फाउंडेशन तक सब कुछ ऑनलाइन खरीदें? खरीदने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? मोबाइल फोन की एक क्लिक पर अब घरेलू और विदेशी ब्रांडों के सौंदर्य प्रसाधन घर बैठे उपलब्ध हैं। इसके फायदे बहुत हैं. पसंदीदा चीजें ऑर्डर करके घर पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं। यदि आपको यह पसंद नहीं है तो आप इसे वापस कर सकते हैं।

हालाँकि, ऑनलाइन सौंदर्य प्रसाधन खरीदते समय कुछ समस्याएँ बनी रहती हैं। उदाहरण के लिए, मान लें कि आप लिपस्टिक ऑनलाइन खरीदते हैं। मोबाइल स्क्रीन पर जो रंग उसने देखा वह होठों पर लगाते ही काफी बदल गया। एक बार खोलने के बाद कॉस्मेटिक वापस नहीं किया जा सकता। फाउंडेशन के मामले में भी, जब आप स्टोर पर जाते हैं, तो आपको अपने हाथ या गाल पर शेड देखने का अवसर मिलता है। परिणामस्वरूप, यह समझा जा सकता है कि यह त्वचा से मेल खाता है या नहीं। लेकिन, ऑनलाइन में वह अवसर नहीं है। इसके अलावा, किसी नए ब्रांड के सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करने से पहले कैसे समझें कि वह अच्छा है या बुरा?

क्या कह रहे हैं यूजर्स?

सौंदर्य प्रसाधनों का कोई भी नया ब्रांड खरीदने से पहले समीक्षाएँ अवश्य पढ़ें। देखें कि ग्राहक इसके बारे में क्या कह रहे हैं, इसके इस्तेमाल के बाद वांछित परिणाम मिल रहे हैं या नहीं। एक नहीं बल्कि कई ‘रिव्यू’ देखने के बाद ही सामान खरीदें।

कौन ज्यादा बिकता है?

सबसे अधिक बिकने वाले सौंदर्य प्रसाधनों में से आइटम चुनना बेहतर है। अगर कोई चीज अच्छी है तो वह ज्यादा बिकती है। वह आइटम ढूंढें जिसे आप ऑनलाइन स्टोर में खरीदना चाहते हैं। सबसे ज्यादा बिकने वाले आईलाइनर या काजल या लिपस्टिक खोजे जा सकते हैं। फिर देखें ग्राहक इसके बारे में क्या कह रहे हैं।

विशेषताएँ

कॉस्मेटिक खरीदने से पहले उसके फीचर्स जरूर पढ़ लें। काजल खरीदते समय यह देख लें कि वह कितना गहरा है, उठेगा या नहीं, थोड़ा बहेगा या नहीं।

त्वचा का प्रकार

कोई भी कॉस्मेटिक खरीदने से पहले यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि वह त्वचा के प्रकार के लिए है। फाउंडेशन रूखी त्वचा के लिए बनाया जाता है, तैलीय त्वचा के लिए नहीं, बिना समझे ख़रीदना पैसे की बर्बादी हो सकती है। साथ ही, फाउंडेशन खरीदने से पहले आपको अपनी त्वचा का रंग भी जानना होगा। फाउंडेशन के अलग-अलग शेड्स होते हैं। यदि आप अपनी त्वचा का रंग नहीं समझते हैं, तो इसे खरीदना मुश्किल हो सकता है।

कोई भी चीज़ तभी अच्छी लगती है जब वह प्राकृतिक हो। जब ‘नो मेकअप लुक’ और कम मेकअप का चलन है, तो आपको रंग-बिरंगे या कृत्रिम दिखने की क्या जरूरत है? भौंहों को मुलायम, घना और प्राकृतिक रूप से सुंदर दिखाने के भी तरीके हैं। रूप्टन कलाकारों ने दो आसान तरीके बताए। मराठी कहते हैं कि बहुत से लोग अपनी भौहों को घना दिखाने के लिए पाउडर का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इससे भौहें घनी की बजाय चपटी दिखती हैं।

रूप्टन कलाकार रिद्धिमा शर्मा कहती हैं, ”प्राकृतिक घनी भौहें अब चलन में हैं। हम कैसे दिखते हैं यह बहुत कुछ हमारी भौहों पर निर्भर करता है। इसलिए अगर आइब्रो नेचुरल दिखेंगी तो मेकअप भी अच्छा लगेगा।” लेकिन कई लोग सुबह होते ही सो जाते हैं। रात में जागना और दिन में सोना- यह आदत एक बार अनन्या पांडे ने साझा की थी। एक्ट्रेस ने कहा, ”मैं अच्छे से जानती हूं कि सुबह बिस्तर से उठने का दर्द कितना होता है!” लेकिन सुबह जल्दी उठकर आलस्य दूर करने और व्यायाम करने से क्या फायदा, चंकी-कन्या ने कहा। उन्होंने सुबह जल्दी उठने के टिप्स भी दिए।

अनन्या के मुताबिक, सुबह उठकर एक्सरसाइज करने के लिए न सिर्फ शारीरिक रूप से फिट रहना जरूरी है, बल्कि मानसिक रूप से भी तरोताजा रहना जरूरी है। सुबह जल्दी उठना, अगर यह लक्ष्य हो और चिंता कम हो तो सुबह जल्दी उठना संभव होगा। इसके लिए सबसे पहले मन को मजबूत करना होगा।

जल्दी उठने के लिए अनन्या ने क्या टिप्स दिए?

सोने से पहले ध्यान करें

रात को जल्दी सोना चाहिए. और अगर आप सोने से पहले कम से कम 15 मिनट तक ध्यान कर सकें तो शरीर और दिमाग तरोताजा रहेगा। चिंता और चिंता से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। दिन भर सोचते-सोचते और काम करते-करते शरीर के साथ-साथ दिमाग भी थक जाता है। इसलिए नींद आसानी से नहीं आती. उस समय बहुत से लोग टीवी देखने और मोबाइल फोन का उपयोग करने में समय बिताते हैं। नतीजा यह हुआ कि शरीर के बारह बज गए। इसलिए अगर आप नियमित रूप से ध्यान करेंगे तो आपका दिमाग तरोताजा रहेगा, सुबह उठने पर आपको थकान महसूस नहीं होगी।
हल्के व्यायाम से शुरुआत करें

अनन्या के मुताबिक, अगर आप सोचेंगे कि आपको सुबह वेट ट्रेनिंग या कार्डियो करना है तो आप आलस महसूस करेंगे। लेकिन अगर आप दिन की शुरुआत संगीत, नृत्य, साइकिलिंग, हल्के योग से करेंगे तो आलस्य नहीं आएगा। हो सके तो दोस्तों के साथ सुबह की सैर पर जाएं। सभी लोग एक साथ टहलें या जॉगिंग करें तो मन अच्छा रहेगा। व्यायाम करने के विचार से चिंता नहीं बढ़ेगी।

सुबह अपने फोन को न देखें

उठते ही फोन देखने की आदत को छोड़ना जरूरी है। पहले अपनी आँखें खोलो और इसके प्रति जागरूक हो जाओ। इसके बाद साफ हो जाएं और कुछ देर शारीरिक व्यायाम पर ध्यान दें। इसके बाद आप फोन देख सकते हैं. लेकिन अगर सोते समय फोन घनघनाने लगे तो तनाव बढ़ जाएगा। तब आप फिर व्यायाम नहीं करना चाहेंगे।

नए व्यायाम सीखें

अगर आप एक ही तरह की एक्सरसाइज करेंगे तो बोर हो जाएंगे। अगर आप सोचेंगे कि आप अगली सुबह जल्दी उठेंगे और कुछ नया सीखेंगे तो आप खुद ही उठ जायेंगे। कोई नया योग आसन या कोई नया डांस स्टेप सीखकर अभ्यास करें। आप दूसरों के साथ एक छोटी सी प्रतिस्पर्धा भी कर सकते हैं कि आप अगली सुबह कितनी दूर तक दौड़ सकते हैं। तब आपको आनंद के साथ-साथ शारीरिक व्यायाम भी मिलेगा।

अवामी लीग की सूची, चार महीनों में 370 कार्यकर्ता मारे जाने की खबर आया सामनेl

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जुलाई से अक्टूबर – इन चार महीनों में बांग्लादेश में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिले हैं। कोटा-सुधार आंदोलन की परिणति बड़े पैमाने पर तख्तापलट के रूप में हुई और शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया गया। पार्टी ने कहा कि जुलाई में कोटा-सुधार आंदोलन शुरू होने के बाद से चार महीनों में बांग्लादेश में कम से कम 370 अवामी लीग नेता और कार्यकर्ता मारे गए। वर्ष और अक्टूबर में समाप्त हुआ। शेख हसीना की पार्टी ने सोमवार को उनके नाम, हत्या की तारीख और हमले के स्थान की जानकारी के साथ एक सूची प्रकाशित की। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, वे यह सूची संयुक्त राष्ट्र की तथ्यान्वेषी टीम को सौंपेंगे। यदि यह सूची बहुत प्रारंभिक है. सरकार के असहयोग के कारण मारे गये सभी लोगों के बारे में जानकारी एकत्र करना संभव नहीं हो सका। बांग्लादेश की मीडिया पर बहुआयामी दबाव के कारण वे भी कई हत्याओं की ख़बरें या विवरण प्रकाशित नहीं कर सके. वह जानकारी एकत्र की जाएगी और बाद में इस सूची में जोड़ दी जाएगी।

जुलाई से अक्टूबर – इन चार महीनों में बांग्लादेश में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिले हैं। कोटा-सुधार आंदोलन की परिणति एक लोकप्रिय विद्रोह के रूप में हुई जिसने शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। प्रधानमंत्री हसीना ने देश छोड़कर दिल्ली में शरण ली। सरकार ने उन पर और उनकी सरकार पर नरसंहार का आरोप लगाते हुए प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए अंतर्राष्ट्रीय युद्ध अपराध न्यायाधिकरण में मामला दायर किया। साथ ही पूर्व सत्ताधारी दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी क्रूर अत्याचार किया गया है. अवामी लीग की शाखा छात्र लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. सार्वजनिक आक्रोश के बहाने अवामी नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। अवामी लीग ने आज ही के दिन यही सूचना प्रकाशित की थी. सूची से पता चलता है कि अगस्त में सबसे ज्यादा 317 लोग मारे गए. उसका
इससे पहले जुलाई में 22 अवामी कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी. सितंबर और अक्टूबर में क्रमशः 11 और 22 लोग मारे गए। पीड़ितों में से 228 को जलाकर मार दिया गया। 100 लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया. गोलीबारी में 23 लोग मारे गए. हालाँकि, अवामी नेतृत्व को लगता है कि इन हत्याओं के मामलों पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा क्योंकि मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पहले ही आंदोलनकारियों को आरोप से बचा लिया है।

यूनुस सरकार ने पिछले कुछ दिनों में बांग्लादेश में 6 मेडिकल कॉलेजों और 14 सरकारी अस्पतालों के नाम बदल दिए हैं। अवामी लीग सरकार ने इन अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों का नाम शेख मुजीबुर रहमान, शेख हसीना या प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखा। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नोटिस में उन सभी नामों को बदल दिया गया है. हालाँकि, ताजुद्दीन अहमद और ज़ियाउर रहमान के नाम पर बने अस्पतालों के नाम अभी भी बरकरार हैं। अवामी नेतृत्व का आरोप है कि सरकार लिबरेशन वॉर और शेख मुजीब की यादों को भुलाने के लिए आजादी विरोधी लोगों के निर्देश पर ऐसा कर रही है. सरकार को इन मुद्दों पर सोशल मीडिया पर प्रतिकूल टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है. कई लोगों का कहना है कि देश में वस्तुओं की कीमत लोगों की पहुंच से बाहर है. कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है. एक-एक कर फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। विदेशी मुद्रा की कमी के कारण कोयले का आयात बंद होने से बिजली संयंत्र उछल रहे हैं। भारत की अडानी पावर ने ऐलान किया है कि अगर बकाया नहीं चुकाया गया तो वह 7 तारीख से बिजली बेचना बंद कर देगी. ऐसे में सरकार नाम बदलने जैसे सस्ते कार्यक्रम को प्राथमिकता दे रही है.

24 अक्टूबर को बागेरहाट के सिविल सर्जन जलालुद्दीन अहमद ने कैंसर जागरूकता शिविर में भाषण के अंत में मुक्ति युद्ध का नारा ‘जॉय बांग्ला’ बोला। बीएनपी के विरोध के बाद सरकार ने रविवार को नोटिस जारी कर वरिष्ठ डॉक्टर को ओएसडी से मुक्त कर दिया. सोमवार को यूनुस सरकार ने उन्हें नौकरी से मुक्त कर दिया.

बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिनों की सूची से आठ दिन पहले ही हटा दिए गए हैं। जिनमें से अधिकांश पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के परिवार के सदस्यों की याद में थे। इस बार मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश में 14 अस्पतालों के नाम बदल दिए. इस मामले में भी उनमें से एक के नाम के साथ हसीना के दिवंगत पिता मुजीबुर रहमान का नाम जुड़ा था. उनमें से एक के साथ हसीना का नाम जुड़ा था. बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से रविवार को एक अधिसूचना में 14 अस्पतालों के नाम बदलने की जानकारी दी गई।

राजधानी ढाका में शेख हसीना नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी नए मान्यता प्राप्त अस्पतालों की सूची में है। इसका नाम बदलकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी कर दिया गया है। हसीना का नाम तंगेल मेडिकल कॉलेज से भी जुड़ा था। उसमें से भी पूर्व प्रधानमंत्री का नाम हटाकर सिर्फ टैंगैल मेडिकल कॉलेज बनाया गया है. फरीदपुर स्थित बंगबंधु शेख मुजीब मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के नाम से भी बंगबंधु की स्मृति हटा दी गई है। नया नाम फरीदपुर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल है।

गोपालगंज में एक नेत्र अस्पताल है जिसका नाम हसीना की मां शेख फजीलातुन्नेस मुजीब के नाम पर रखा गया है। अंतरिम सरकार की ‘कोप’ भी वहीं गिरी है. नेत्र अस्पताल का नाम बदलकर गोपालगंज नेत्र अस्पताल एवं प्रशिक्षण संस्थान कर दिया गया है। हसीना के भाई शेख रसेल का राजधानी ढाका में अस्पताल था। शेख रसेल राष्ट्रीय गैस्ट्रोलिवर संस्थान और अस्पताल। इसका नाम बदलकर नेशनल गैस्ट्रोलिवर इंस्टीट्यूट कर दिया गया है।

डेब्यू के लिए लौटे शाहरुख! क्या पति का मन जानने के लिए ऐश्वर्या ने लिया ये फैसला?

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ऐश्वर्या के एक पुराने इंटरव्यू का वीडियो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. जिसे देखकर नेटिज़न्स ने अनुमान लगाया कि ऐश्वर्या को अपने पति और परिवार की देखभाल के लिए काम छोड़ना पड़ा। क्या अभिषेक बच्चन के लिए ऐश्वर्या राय बच्चन ने एक के बाद एक अपने करियर को छोड़ दिया? पिछले कुछ महीनों से उनके तलाक की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसी बीच ऐश्वर्या के एक पुराने इंटरव्यू का वीडियो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. जिसे देखकर नेटिज़न्स ने अनुमान लगाया कि ऐश्वर्या को अपने पति और परिवार की देखभाल के लिए काम छोड़ना पड़ा।

ऐश्वर्या को शाहरुख खान अभिनीत फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में एक भूमिका की पेशकश की गई थी। उस फिल्म में अभिषेक भी थे. लेकिन यह किरदार उनके खिलाफ नहीं था और ऐश्वर्या को यह किरदार ऑफर किया गया था। इसलिए ऐश्वर्या नहीं मानीं. एक इंटरव्यू में एक्ट्रेस ने कहा, ”मुझे फिल्म ऑफर की गई थी. वह बहुत ही मजेदार किरदार था. मैं जानता था कि यह एक अच्छा अनुभव होगा. लेकिन अभिषेक के विपरीत मेरा किरदार नहीं था। मामला अजीब है! सही? इसीलिए मैंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।” साक्षात्कारकर्ता के अनुसार, “इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐश्वर्या ने अभिषेक के लिए अपना करियर छोड़ दिया।” वहीं सुनने में आ रहा है कि ऐश्वर्या को हैप्पी न्यू ईयर में दीपिका पादुकोण वाला रोल ऑफर किया गया था। फिल्म में यह किरदार मुख्य हीरो यानी शाहरुख के अपोजिट था। सह-कलाकार अभिषेक थे। नेतागरिक का अनुमान है, ”असल में ऐश्वर्या अभिषेक के सामने शाहरुख की हीरोइन नहीं बनना चाहती थीं। हालांकि ‘धूम’ से डेब्यू करते हुए वह रितिक के अपोजिट थीं। लेकिन उस फिल्म में अभिषेक मुख्य हीरो थे. इसलिए अहं या अहं को ठेस पहुंचाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी।”

क्या रिश्ते की कमी के कारण वे अंततः तलाक की राह पर चल रहे हैं? अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी में अभिषेक और ऐश्वर्या एक साथ नहीं पहुंचे। यहीं से अटकलें तेज हो गईं. हालांकि, सुनने में यह भी आ रहा है कि अभिषेक और एक्ट्रेस निम्रत कौर की नजदीकियों ने उनकी शादी में दरार डाल दी है।

अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन तलाक की राह पर हैं। इन अटकलों के बीच सवाल उठा कि अभिषेक ने ऐश्वर्या के जन्मदिन पर क्या किया? 1 नवंबर को ऐश्वर्या 51 साल की हो गईं। तलाक की अफवाहों के बावजूद दोनों में से किसी ने अभी तक अपना मुंह नहीं खोला है. लेकिन ऐश्वर्या के जन्मदिन पर ये अटकलें साफ हो गईं। क्या अभिषेक ने तलाक की अटकलों पर लगाई मुहर?

पिछले साल अभिषेक ने अपनी पत्नी को खास तौर पर जन्मदिन की बधाई दी थी। उन्होंने ऐश्वर्या की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “हैप्पी बर्थडे”। उन्होंने जन्मदिन के संदेश के साथ एक लाल दिल वाला इमोजी भी भेजा। पिछले साल भी ऐश्वर्या के जन्मदिन पर अभिषेक उनके साथ नहीं थे। उस बार भी ऐश्वर्या ने अपनी बेटी आराध्या और मां बृंदा राय के साथ केक काटा था. हालांकि, पूर्व ब्यूटी क्वीन ने खुद केक नहीं खाया। क्योंकि, उसने कोरबा चौथ का व्रत किया था। लेकिन इस बार अभिषेक बिल्कुल चुप हैं. सोशल मीडिया पर भी उनकी पत्नी के जन्मदिन पर कोई बधाई देखने को नहीं मिली. इसे देखकर नेटीजन को लगता है कि ये स्टार कपल सच में तलाक की राह पर चलने वाला है. जानकारी तक तीसरे व्यक्ति की पहुंच। इसीलिए ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की शादी में दूरियां आ गई हैं। सुनने में तो ये भी आ रहा है कि ये स्टार कपल तलाक लेने की तैयारी में है. हालांकि, दोनों की ओर से कोई बयान नहीं आया है. फिल्म ‘दसवीं’ में एक्टिंग के दौरान से ही अभिषेक की निमरत कौर से नजदीकियां बढ़ीं। इसके बाद ऐश्वर्या से रिश्ते धीरे-धीरे खराब होने लगे। निमरत की वजह से अभिषेक-ऐश्वर्या तोड़ने जा रहे हैं शादी. अब पूरे सोशल मीडिया पर बच्चन परिवार को लेकर कानाफूसी हो रही है। निम्रत को लेकर तरह-तरह के मीम्स फैल गए हैं. उनकी तुलना लगातार ऐश्वर्या से की जा रही है. ये अटकलें करीब दो महीने से चल रही हैं. आखिरकार निम्रत ने इस विषय पर चुप्पी तोड़ी।

2022 में निमरत ने अभिषेक के साथ फिल्म ‘दसवीं’ में काम किया। उस वक्त अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी को 15 साल हो गए थे। ये सुनकर निमरत थोड़ी हैरान हो गईं. इंटरव्यू के होस्ट ने अभिषेक की 15 साल की खुशहाल शादी की भी तारीफ की. यह सुनकर निमरत हैरान रह गईं और बोलीं, ”15 साल!” अभिषेक ने टिप्पणी की, “हां, 15 लंबे साल। 2007 से 2022 तक।” निम्रत ने आश्चर्य से उत्तर दिया, “अद्भुत।” वह पुराना वीडियो अचानक से नेट पर फैलने लगा. आख़िरकार निम्रत ने अपना मुँह खोला. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ”मुझे जो पसंद आएगा लोग वही बात करेंगे. इन सब गॉसिप्स को रोकना मेरे लिए संभव नहीं है।’ इसलिए मैंने अपने काम पर ध्यान केंद्रित किया।”

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट में अनिश्चितता के कारण गौस्कर नहीं चाहते कि रोहित सीरीज के किसी भी मैच में कप्तानी करें

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रोहित शर्मा ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट को लेकर अनिश्चित हैं. गाओस्कर के मुताबिक, अगर रोहित पहले टेस्ट में नहीं खेलते हैं तो पूरी सीरीज में जसप्रीत बुमराह को भारत की कप्तानी करनी चाहिए. सुनील गाओस्कर न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 0-3 की हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. रोहित शर्मा ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट को लेकर अनिश्चित हैं. गाओस्कर के मुताबिक, अगर रोहित पहले टेस्ट में नहीं खेलते हैं तो पूरी सीरीज में जसप्रीत बुमराह को भारत की कप्तानी करनी चाहिए.

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत का पहला टेस्ट 22 नवंबर को है. हो सकता है कि रोहित वह मैच न खेलें. पता चला है कि उन्होंने निजी कारणों से उस टेस्ट से छुट्टी ले ली है. गाओस्कर ने कहा, ”कप्तान का पहला टेस्ट मैच काफी अहम होता है. चोटें अलग बात हैं. लेकिन अगर वह पहला टेस्ट नहीं खेलना चाहते हैं तो दबाव सहायक कप्तान पर है. मैं कहीं पढ़ रहा था कि रोहित शायद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले दो टेस्ट नहीं खेलेंगे। मुझे लगता है कि ऐसे में चयन समिति को पूरी सीरीज के लिए बुमराह को कप्तान बना देना चाहिए.’ साथ ही रोहित से कहा कि अगर वह सीरीज के बीच में टीम में शामिल होते हैं तो उन्हें सिर्फ खिलाड़ी बनकर रहना होगा. रोहित को पहले टेस्ट के लिए टीम के साथ रहना चाहिए।”

भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज का पहला मैच पर्थ में. रोहित 22 नवंबर से शुरू होने वाले टेस्ट में नहीं खेल पाएंगे. न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू मैदान पर 0-3 से मिली हार के बाद अब ऑस्ट्रेलिया दौरे का हर मैच भारत के लिए अहम है. क्योंकि रोहित के लिए टेस्ट वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने की लड़ाई मुश्किल हो गई है. रोहित से पूछा गया कि क्या वह ऑस्ट्रेलिया दौरे पर पहला टेस्ट खेलेंगे. उत्तर भारत के कप्तान ने कहा, ”मैं अभी भी निश्चित नहीं हूं कि मैं पर्थ टेस्ट में खेलूंगा या नहीं. चलो देखते हैं क्या होता हैं।” वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने के लिए भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट जीतने होंगे। गौस्कर ने कहा, ”मुझे नहीं लगता कि भारत ऐसा कर सकता है. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 4-0 से जीत संभव नहीं है. अगर वे इसे दिखा सकें तो मुझे बहुत खुशी होगी. लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. भारत 3-1 से जीत सकता है. लेकिन 4-0 कठिन है. लेकिन वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप को ध्यान में रखकर खेलना सही नहीं होगा. लक्ष्य ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जीतना होना चाहिए. चाहे वह 1-0, 2-0, 3-0, 3-1 या 2-1 से जीते। जीतना ज़रूरी है. अगर हम जीतते हैं तो भारतीय क्रिकेट प्रशंसक फिर से खुश होंगे।”

ऑस्ट्रेलिया-पाकिस्तान के बीच व्हाइट बॉल सीरीज सोमवार से शुरू हो गई। पहला वनडे मैच स्टीव स्मिथ ने खेला था. लेकिन उनकी नजर अब टेस्ट क्रिकेट पर है. यह कहना उचित है कि वह बॉर्डर-गाओस्कर ट्रॉफी खेलने के लिए तैयार नहीं है।

पाकिस्तान सीरीज के बीच स्मिथ के दिमाग में भारत. अगर स्मिथ टेस्ट में खेलने के लिए तैयार हैं, तो भी वह मैदान पर उतरते हैं। पहले वनडे मैच के बाद स्मिथ ने कहा, ”मैं पूरी तरह से तैयार हूं।” मैं कल टेस्ट मैच खेलने उतर सकता हूं. तैयारी अच्छी रही है. बल्लेबाजी में सहज महसूस होता है. आज की तरह उन्हें लगभग पारी की शुरुआत में ही बल्लेबाजी के लिए उतरना पड़ा. मैंने कुछ शॉट मारने की कोशिश की. पारी बड़ी नहीं कर सके. लेकिन खेलने में कोई दिक्कत नहीं हुई. ऐसा लगता है कि एक बड़ी दौड़ समय का इंतजार कर रही है।”

एक महीने से अधिक समय के बाद अंतरराष्ट्रीय खेल में वापसी करने वाले स्मिथ अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हैं। उन्होंने यह भी कहा, “मैंने पिछले सप्ताह बहुत अच्छा अभ्यास किया। ऐसा लगता है कि मैं अच्छी जगह पर हूं. टांगों का मूवमेंट बेहतर हो रहा है. क्रूज पर सब कुछ ठीक चल रहा है. बल्ले और गेंद के बीच अच्छा संबंध है. लेकिन 22 गज की दूरी पर कुछ और समय बिताना अच्छा होता।” स्मिथ ने पाकिस्तान के खिलाफ पहले वनडे में तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी की। तीसरे ओवर में उन्हें बल्लेबाजी के लिए उतरना पड़ा. स्मिथ ने इस दिन 46 गेंदों पर 44 रनों की पारी खेली. उनके बल्ले से 6 चौके निकले.

भारत 22 नवंबर से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज की शुरुआत करेगा. भारतीय टीम ने उससे काफी पहले ही क्रिकेटरों को उस देश में भेजना शुरू कर दिया था. अभिमन्यु ईश्वरन, प्रसिद्ध कृष्णा और नीतीश कुमार रेड्डी पहले से ही ऑस्ट्रेलिया में थे। इस बार लोकेश राहुल और ध्रुव जुरेल वहां जा रहे हैं. भारत को न्यूज़ीलैंड से झटका लगा. इसलिए वे ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोई जोखिम नहीं लेना चाहते.

राहुल और ज्यूरेल सीरीज शुरू होने से 17 दिन पहले ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं. इंडिया ‘ए’ वहां ऑस्ट्रेलिया ‘ए’ टीम के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेल रही है. अभिमन्यु, नितीश, प्रसिद्ध पहले टेस्ट में खेले थे. दूसरे टेस्ट में उनके साथ राहुल और ज्यूरेल टीम में होंगे. यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि क्रिकेटर सीरीज शुरू होने से पहले माहौल में ढल सकें.