Saturday, March 14, 2026
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क्या अब हो चुका है नए युग का आगाज?

वर्तमान में तीन नए कानून से नए युग का आगाज हो चुका है! देश में आज आधी रात से ब्रिटिश हुकूमत के तीन आपराधिक कानूनों का अंत हो गया। भारतीय संसद द्वारा बनाये गये नये कानून के साथ एक जुलाई का अरुणोदय, भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक नये युग का आगाज है। आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए एक ऐतिहासिक कदम के रूप में तीन नये कानून भारतीय न्याय संहिता बीएनएस, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बीएनएसएस और भारतीय साक्ष्य अधिनियम बीएसए एक जुलाई से लागू होंगे। ये कानून क्रमशः औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता आईपीसी, दंड प्रक्रिया संहिता सीआरपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लिया। नये आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद एफआईआर से लेकर अदालत के निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन की गई है और भारत अपनी आपराधिक न्याय प्रणाली में आधुनिक तकनीक का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। यह कानून तारीख-दर-तारीख के चलन की समाप्ति सुनिश्चित करेंगे और देश में एक ऐसी न्यायिक प्रणाली स्थापित होगी, जिसके जरिये तीन वर्षों के भीतर न्याय मिलना सुनिश्चित हो सकेगा।

भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक सुलभ, जवाबदेह, भरोसेमंद और न्याय प्रेरित बनाने का प्रयास है। 600 से अधिक संशोधनों और कुछ जोड़ने एवं हटाने के साथ आपराधिक कानूनों को पारदर्शी, आधुनिक और तकनीकी तौर पर कुशल ढांचे में ढाला गया है, ताकि वे भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था को कमजोर करनेवाली मौजूदा चुनौतियों से निपटने में सक्षम हों। तीनों नये आपराधिक कानून को वर्ष 2023 में संसद के शीतकालीन सत्र में पारित किया गया था। नये कानूनों के लागू होने के बाद पुलिस, जांच और न्यायिक व्यवस्था का चेहरा बदल जायेगा। कई तरह के मामलों में इन कानूनों का व्यापक असर पड़ेगा।

नये कानूनों में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों की जांच को प्राथमिकता दी गयी है। सूचना दर्ज होने के दो महीने के भीतर जांच पूरी होगी। अब इलेक्ट्रॉनिक रूप से समन की तामील की जा सकेगी। इससे कानूनी प्रक्रियाओं में तेजी आयेगी। कागजी कार्रवाई कम होगी और सभी संबंधित पक्षों के बीच समुचित संवाद सुनिश्चित होगा। नये कानूनों में जांच, ट्रायल और अदालती कार्यवाहियों में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। नये कानूनों में पेश किये गये कुछ ठोस संशोधन केवल आरोपियों को दंडित करने के बजाय पीड़ित को न्याय देने को प्राथमिकता देकर हमारी सामूहिक चेतना को पुन: व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं।

पीड़ित, गवाह और बड़े पैमाने पर जनता के अधिकारों और भलाई की रक्षा के लिए कुछ खास चीजें जोड़ी गयी हैं और संशोधन किये गये हैं। इन तीनों कानूनों में जीरो एफआईआर, ऑनलाइन शिकायत एवं इलेक्ट्रानिक माध्यम से समन और सभी जघन्य अपराधों में घटना स्थल की अनिवार्य वीडियोग्राफी का प्रावधान शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति थाने जाये बिना घटना की ऑनलाइन शिकायत कर सकेगा। पीड़ित क्षेत्राधिकार की चिंता किये बिना देश के किसी भी थाने में एफआईआर दर्ज करा सकता है। सबूत एकत्र करने के दौरान घटना स्थल की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी करायी जायेगी, ताकि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न की जा सके। पीड़ित और आरोपी दोनों को ही एफआईआर की कॉपी, पुलिस रिपोर्ट, चार्जशीट, बयान, स्वीकारोक्ति समेत मामले से जुड़े अन्य कागजात 14 दिन के भीतर हासिल करने के हकदार होंगे।

मामले को बेवजह लंबा नहीं खींचा जा सके, इसकी भी व्यवस्था की गयी है। कोई भी अदालत मामले को अधिकतम दो सुनवाई तक ही टाल सकती है। गवाहों की सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम किया गया है। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को अनिवार्य रूप से गवाह सुरक्षा योजना लागू करनी होगी। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिए बीएनएस में नया अध्याय जोड़ा गया है।

कई धाराएं और प्रावधान बदल गये हैं। आईपीसी में 511 धाराएं थीं, अब 356 बची हैं। 175 धाराएं बदल गयी हैं। आठ नयी जोड़ी गयीं, 22 धाराएं खत्म हो गयी हैं। इसी तरह सीआरपीसी में 533 धाराएं बची हैं। 160 धाराएं बदली गयी हैं, नौ नयी जुड़ी हैं, नौ खत्म हुई हैं। पूछताछ से ट्रायल तक सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से करने का प्रावधान हो गया है, जो पहले नहीं था। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ट्रायल कोर्ट को हर फैसला अधिकतम तीन साल में देना होगा। भारतीय न्याय संहिता में 20 नये अपराध जोड़े गये हैं। ऑर्गेनाइज्ड क्राइम, हिट एंड रन, मॉब लिंचिंग पर सजा का प्रावधान। डॉक्यूमेंट में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं। आईपीसी में मौजूद 19 प्रावधानों को हटा दिया गया है। 33 अपराधों में कारावास की सजा बढ़ा दी गयी है। 83 अपराधों में जुर्माने की सजा बढ़ा दी गयी है। छह अपराधों में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान किया गया है।

भारतीय न्याय संहिता 163 साल पुरानी आईपीसी की जगह ली है, जिससे दंड कानून में महत्वपूर्ण बदलाव आयेंगे। सजा के रूप में सामुदायिक सेवा एक उल्लेखनीय परिचय है। यौन अपराधों के लिए कड़े कदम उठाये गये हैं। कानून में उन लोगों के लिए दस साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है जो शादी का वादा करके धोखे से यौन संबंध बनाते हैं। संगठित अपराध में अपहरण, डकैती, वाहन चोरी, जबरन वसूली, भूमि हड़पना, अनुबंध हत्या, आर्थिक अपराध, साइबर अपराध और मानव, ड्रग्स, हथियार या अवैध सामान या सेवाओं की तस्करी शामिल है। वेश्यावृत्ति या फिरौती के लिए मानव तस्करी, संगठित अपराध के रूप में परिभाषित करते हुए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भौतिक लाभ के लिए हिंसा, धमकी, डराने-धमकाने, जबरदस्ती या अन्य गैरकानूनी तरीकों से अंजाम दिये गये अपराधों के लिए कड़ी सजा दी जायेगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाले कृत्यों के लिए नये कानून ने आतंकवादी कृत्य को ऐसी किसी भी गतिविधि के रूप में परिभाषित किया है, जो लोगों में आतंक फैलाने के इरादे से भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता या आर्थिक सुरक्षा को खतरा पहुंचाती है। पांच या उससे अधिक व्यक्तियों का समूह मिलकर नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य समान आधार पर हत्या करता है, तो ऐसे समूह के प्रत्येक सदस्य को मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा दी जायेगी और जुर्माना भी देना होगा।

तीन नए कानून के तहत कहां हुई एफआईआर दर्ज?

आज हम आपको बताएंगे की तीन नए कानून के तहत एफआईआर दर्ज कहां-कहां हुई है! 30 जून खत्म होते ही देशभर में 1 जुलाई 2024 से तीनों नए कानून लागू हो गए। इसके तहत देश में पहली एफआईआर ग्वालियर में दर्ज की गई। जहां 1.80 लाख रुपये की कीमत की बाइक चोरी के मामले में मुकदमा दर्ज किया गया। अब से जो भी अपराध होगा। वह नए कानून के तहत ही दर्ज किया जाएगा। जबकि 1 जुलाई से पहले हुआ क्राइम पुराने कानून के हिसाब से ही दर्ज किया जाएगा। भले ही उस मामले में एफआईआर 1 जुलाई को या इसके बाद दर्ज की जाए। नए क्रिमिनल सिस्टम के तहत 15 अगस्त तक तमाम केंद्र शासित प्रदेशों में काम होने लगेगा। अन्य राज्यों में भी तकनीकी स्तर पर कार्य तेजी से हो रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि नए कानूनों के तहत देश में पहली एफआईआर दिल्ली में नहीं बल्कि ग्वालियर में बाइक चोरी की दर्ज की गई है। दिल्ली में वेंडर के खिलाफ जो मामला दर्ज हुआ था। वह पुराने प्रावधान के तहत हुआ था। जिसे पुलिस ने रिव्यू के प्रावधान का उपयोग कर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि देश के आजाद होने के 77 साल बाद आज भारत की न्याय प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी हो गई है। इसके बड़े फायदे होंगे। अंग्रेजों उन्होंने 1 जुलाई से लागू हुए तीनों नए कानूनों को दंड की जगह न्याय देने वाला बताया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने से पहले इसके हर पहलू पर चार सालों तक विस्तार से अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा की गई। आजादी के बाद से अब तक किसी भी कानून पर इतनी लंबी चर्चा पहले कभी नहीं हुई। नए कानूनों में पहली प्राथमिकता महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को दी गई है।ने जो कानून बनाए थे।

इसमें एक नया अध्याय जोड़कर इसे और अधिक संवेदनशील बनाया गया है। यह तीनों नए कानून सबसे आधुनिक न्याय प्रणाली का सृजन करेंगे। इन कानूनों में आधुनिक से आधुनिक तकनीक को ना केवल अपनाया गया है। बल्कि ऐसा प्रावधान किया गया है कि अगले 50 सालों में भी आने वाली तकनीक भी इसमें समाहित हो सकें।

गृह मंत्री ने कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं को देखते हुए तीनों कानून देश की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाओं में उपलब्ध होंगे और केस भी उन्हीं भाषाओं में चलेंगे। इसमें केवल हिंदी या इंग्लिश भाषा नहीं रखी गई है। नए कानूनों में आज के समय के हिसाब से धाराएं जोड़ी गई हैं। जिनसे लोगों को परेशानी थी। उन धाराओं को हटा दिया गया है। नए कानूनों में दंड की जगह न्याय को प्राथमिकता मिलेगी। देरी की जगह स्पीडी ट्रायल और जस्टिस मिलेगा।नए कानूनों में सभी प्रक्रियाओं के पूरा होने की टाइम लिमिट भी तय की गई है। इसके पूरी तरह लागू होने के बाद तारीख-पे-तारीख से निजात मिलेगी। किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज होने से सुप्रीम कोर्ट तक तीन साल में न्याय मिल सकेगा। नए कानूनों में अंग्रेजों के राजद्रोह कानून को जड़ से समाप्त कर दिया गया है। कुछ लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं कि नए कानूनों में रिमांड का समय बढ़ा दिया गया है। यह सच नहीं है। नए कानूनों के तहत भी रिमांड का समय पहले की तरह ही 15 दिन का है। उन्होंने कहा कि इन कानूनों में 60 दिनों के अंदर कुल 15 दिनों की रिमांड का प्रावधान किया गया है। 15 दिन की रिमांड की लिमिट को नहीं बढ़ाया गया है। इस बारे में भ्रांति फैलाई जा रही है।

नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फोरेंसिक जांच अनिवार्य की गई है। इससे न्याय जल्दी मिलेगा और सजा मिलने की दर को भी 90 फीसदी तक ले जाने में मदद मिलेगी। नए कानूनों पर करीब 22.5 लाख पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग के लिए 12 हजार मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा चुके हैं। कई इंस्टीट्यूशंस को इसके लिए अधिकृत किया गया है और 23 हजार से अधिक मास्टर ट्रेनर्स को भी ट्रेंड किया जा चुका है। पहले कानूनों में केवल पुलिस के अधिकारों की रक्षा की गई थी लेकिन नए कानूनों में अब पीड़ितों और शिकायतकर्ता के अधिकारों की भी रखा करने का प्रावधान रखा गया है। उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग के अपराध के लिए पहले के कानून में कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन इन कानूनों में पहली बार मॉब लिंचिंग को परिभाषित किया गया। उन्होंने कहा कि देशभर के 99.9 फीसदी पुलिस थाने कंप्यूटराइज हो चुके हैं। ई-रिकॉर्ड जनरेट करने की प्रक्रिया भी 2019 से शुरू कर दी गई थी। जीरो एफआईआर, ई-एफआईआर और चार्जशीट सभी डिजिटल होंगे।

नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फोरेंसिक जांच अनिवार्य होगी। ज्यूडिशयरी में भी 21 हजार सबोर्डिनेट ज्यूडिशयरी की ट्रेनिंग हो चुकी है, 20 हजार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को ट्रेंड किया गया है। इन कानूनों पर लोकसभा में 9 घंटे 29 मिनट चर्चा हुई। जिसमें 34 सदस्यों ने हिस्सा लिया। जबकि राज्यसभा में 6 घंटे 17 मिनट चर्चा हुई और 40 सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि एक ऐसा झूठ फैलाया जा रहा है कि संसद सदस्यों को बाहर निकालने के बाद यह कानून पारित किए गए। जबकि यह गलत है।

1 जुलाई से पहले जो भी क्राइम हुआ है। वह पुराने कानून के तहत ही दर्ज होगा, भले ही वह मुकदमा 30 जून के बाद दर्ज हो। 1 जुलाई से इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS), कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और इंडियन एविडेंस एक्ट (IEA) की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू हो गए हैं। सीआरपीसी में 484 धाराओं की जगह बीएनएसएस में 531, आईपीसी में 511 धारा की जगह बीएनएस में 357 और आईईए में 167 धाराओं की जगह बीएसए में 170 धाराएं हैं।

तीन नए कानून से आखिर क्या-क्या बदला ?

आज हम आपको बताएंगे की तीन नए कानून से आखिर क्या-क्या बदला है! देश भर में 1 जुलाई से तीनों नए कानून लागू हो गए। नए क्रिमिनल सिस्टम के तहत 15 अगस्त तक तमाम केंद्र शासित प्रदेशों में काम होने लगेगा। बाकी राज्यों में भी तकनीकी स्तर पर काम तेजी से हो रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि देश के आजाद होने के 77 साल बाद भारत की न्याय प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी हो गई है। उन्होंने तीनों नए कानूनों को दंड की जगह न्याय देने वाला बताया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने से पहले इसके हर पहलू पर चार साल तक विस्तार से अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा की गई। आजादी के बाद से अब तक किसी भी कानून पर इतनी लंबी चर्चा पहले कभी नहीं हुई। नए कानूनों में पहली प्राथमिकता महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को दी गई है।न्यायपालिका में भी 21 हजार सब-ऑर्डिनेट न्यायपालिका की ट्रेनिंग हो चुकी है। 20 हजार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को ट्रेंड किया गया है। इन कानूनों पर लोकसभा में 9 घंटे 29 मिनट चर्चा हुई। जिसमें 34 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इन कानूनों में ऐसा प्रावधान किया गया है कि अगले 50 साल में भी आने वाली तकनीक भी इसमें समाहित हो सकें। गृह मंत्री ने कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं को देखते हुए तीनों कानून देश की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाओं में उपलब्ध होंगे। केस भी उन्हीं भाषाओं में चलेंगे। इसमें केवल हिंदी या अंग्रेजी भाषा नहीं रखी गई है। नए कानूनों में आज के समय के हिसाब से धाराएं जोड़ी गई हैं। नए कानूनों में अंग्रेजों के राजद्रोह कानून को जड़ से समाप्त कर दिया गया है। कुछ लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं कि नए कानूनों में रिमांड का समय बढ़ा दिया गया है। यह सच नहीं है। नए कानूनों के तहत भी रिमांड का समय पहले की तरह ही 15 दिन का है।

नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फरेंसिक जांच अनिवार्य की गई है। नए कानूनों पर करीब 22.5 लाख पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग के लिए 12 हजार मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा चुके हैं। कई इंस्टिट्यूशंस को इसके लिए अधिकृत किया गया है। 23 हजार से अधिक मास्टर ट्रेनर्स को भी ट्रेंड किया जा चुका है। पहले कानूनों में केवल पुलिस के अधिकारों की रक्षा की गई थी, लेकिन नए कानूनों में अब पीड़ितों और शिकायतकर्ता के अधिकारों की भी रखा करने का प्रावधान रखा गया है।

उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग के अपराध के लिए पहले के कानून में कोई प्रावधान नहीं था। अब इन कानूनों में पहली बार मॉब लिंचिंग को परिभाषित किया गया। उन्होंने कहा कि देशभर के 99.9 फीसदी पुलिस थाने कंप्यूटराइज हो चुके हैं। ई-रिकॉर्ड जनरेट करने की प्रक्रिया भी 2019 से शुरू कर दी गई थी। जीरो एफआईआर, ई-एफआईआर और चार्जशीट सभी डिजिटल होंगे। नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फरेंसिक जांच अनिवार्य होगी। न्यायपालिका में भी 21 हजार सब-ऑर्डिनेट न्यायपालिका की ट्रेनिंग हो चुकी है। 20 हजार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को ट्रेंड किया गया है। इन कानूनों पर लोकसभा में 9 घंटे 29 मिनट चर्चा हुई। जिसमें 34 सदस्यों ने हिस्सा लिया।

राज्यसभा में 6 घंटे 17 मिनट चर्चा हुई और 40 सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि एक ऐसा झूठ फैलाया जा रहा है कि संसद सदस्यों को बाहर निकालने के बाद यह कानून पारित किए गए। यह गलत है। उन्होंने बताया कि 2020 में सभी सांसदों, मुख्यमंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को पत्र लिखकर उनसे सुझाव मांगे गए। गृह सचिव ने देश के सभी आईपीएस और जिला अधिकारियों से इस संबंध में सुझाव मांगे।गृह मंत्री ने कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं को देखते हुए तीनों कानून देश की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाओं में उपलब्ध होंगे। केस भी उन्हीं भाषाओं में चलेंगे। इसमें केवल हिंदी या अंग्रेजी भाषा नहीं रखी गई है। नए कानूनों में आज के समय के हिसाब से धाराएं जोड़ी गई हैं। नए कानूनों में अंग्रेजों के राजद्रोह कानून को जड़ से समाप्त कर दिया गया है। शाह ने बताया कि उन्होंने खुद 158 बार इन कानूनों की समीक्षा बैठक की। इसके बाद गृह मंत्रालय की समिति के पास इन्हें भेजा गया। फिर ढाई से तीन महीने तक इन पर गहन चर्चा के बाद कुछ राजनीतिक सुझावों को छोड़ते हुए 93 बदलावों के साथ इन बिलों को फिर से कैबिनेट ने पारित किया।

आखिर क्या कुछ खास हो रहा है वर्तमान में संसद में?

आज हम आपको बताएंगे कि वर्तमान में संसद में क्या कुछ खास हो रहा है! राज्यसभा में स्पीकर जगदीप धनखड़ और नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बीच जुबानी जंग छिड़ गई। दरअसल राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा चल रही थी, तभी खरगे सदन के वेल में चले गए। इसे लेकर स्पीकर धनखड़ ने खरगे पर काफी नाराजगी जताई। धनखड़ ने कहा कि खरगे ने ऐसा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया। वहीं खरगे ने इसे गलत बताया और कहा कि इसमें गलती राज्यसभा अध्यक्ष की थी।जानकारी के अनुसार, राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कहा कि उनके लिए यह काफी दुखदायी क्षण है कि सदन में विपक्ष के नेता वेल में आ जा रहे हैं। यही नहीं, उनके साथ सीनियर नेता मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी भी वेल में आ रहे हैं। धनखड़े ने कहा, ‘मेरे लिए ये ज्यादा पीड़ादायक है कि खरगे बाहर जाकर झूठ बोल रहे थे। वो बाहर जाकर मिसरिपोर्ट कर रहे थे। मैं सख्त शब्द यूज नहीं कर रहे हैं। वो अब इनकार कर रहे हैं।’

धनखड़ ने कहा, ‘ANI के ट्विटर पर जो उनका बयान है वो खुद में कंट्राडिक्ट कर रहे हैं। एक वक्त कहते हैं कि वो वेल में नहीं गए एक समय वो कह रहे हैं हम वेल में गए। इस संस्थान को नुकसान पहुंचाया जाता है। लोकतंत्र के मंदिर में ऐसा हो रहा है। ये वो कर रहे हैं जिनके पास इसकी रक्षा की जिम्मेदारी है। ये ज्यादा पीड़ादायक है। मैं इसपर सतर्क हूं और मेरा कार्यालय इस पर ऐक्शन लेगा।’वहीं मल्लिकार्जुन खरगे ने धनखड़े पर सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘राज्य सभा के सभापति जी से मैं ये कहूंगा कि विपक्ष के प्रति उनका आज का सौतेला व्यवहार “भारतीय संसद के इतिहास में दागी हो गया है”! खरगे ने एक्स पर कहा, ‘सभापति जी केवल सत्ता पक्ष की ओर देख रहे थे। मैंने उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए 10 मिनट तक हाथ उठाया, खड़ा हुआ, संसदीय गरिमा और नियमों का पालन किया, फ़िर भी उन्होंने सदन में विपक्ष के नेता की ओर नहीं देखा। जब नेता विपक्ष नियमानुसार उनका ध्यान आकर्षित करता है, तो उन्हें उसकी ओर देखना चाहिए, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने मुझे अपमानित करने के लिए जानबूझकर मुझे नजरअंदाज कर दिया, मुझे या तो अंदर जाना होगा या बहुत जोर से चिल्लाना होगा। इसलिए मैं निश्चित रूप से कहूंगा कि यह सभापति साहब की गलती है।’

उन्होंने कहा, ‘7 वर्षों में 70 पेपर लीक हुए हैं, करोड़ों युवाओं से मोदी सरकार ने विश्वासघात किया है। हम NEET घोटाले पर 267 के नियम के तहत सदन में चर्चा कर के, इससे पीड़ित लाखों युवाओं की आवाज़ उठाना चाहते थे। इसलिए लोगों की समस्या पर ध्यान आकर्षित करने के लिए, हमने एक विशेष चर्चा के लिए कहा। हम किसी को परेशान नहीं करना चाहते थे। हम केवल छात्रों के मुद्दों को उठाना चाहते थे। लेकिन उन्होंने इसका मौका नहीं दिया, इस पर ध्यान ही नहीं दिया।’ यही नहीं राज्यसभा में नीट पर चर्चा को लेकर विरोध के दौरान कांग्रेस की राज्यसभा सांसद फुलो देवी नेतम की तबीयत बिगड़ गई। सदन में विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच महिला सांसद को अचानक चक्कर आ गया और वह नीचे गिर गईं। इसके बाद कांग्रेस सांसद को जल्दी से एंबुलेंस से राम मनोहर लोहिया अस्पताल में एडमिट कराया गया। फूलो देवी नेतम छत्तीसगढ़ से कांग्रेस की राज्यसभा सांसद हैं। कांग्रेस सांसद ने दोपहर में एकक ट्वीट कर नीट पर विपक्ष की आवाज दबाने को लेकर ट्वीट भी किया था। उन्होंने ट्वीट में लिखा था कि जहां एक ओर नरेंद्र मोदी NEET पर कुछ नहीं बोल रहे, उस वक्त विपक्ष के नेता राहुल गांधी जी युवाओं की आवाज़ सदन में उठा रहे है। लेकिन… ऐसे गंभीर मुद्दे पर माइक बंद करने जैसी ओछी हरकत करके युवाओं की आवाज को दबाने की साजिश की जा रही है।

इससे पहले सुबह कांग्रेस सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा में नीट व एनटीए मुद्दे पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया था। कांग्रेस की रंजीत रंजन और सैयद नासिर हुसैन समेत विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने नियम 267 के अंतर्गत राज्यसभा में चर्चा कराए जाने की मांग की थी। हुसैन ने अपने नोटिस में कहा कि सदन में आज के लिए सूचीबद्ध सभी कामकाज को स्थगित कर, नीट-यूजी और यूजीसी-नेट सहित विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होने और एनटीए की ‘नाकामी’ पर चर्चा कराई जाए। विपक्षी सांसद चाहते हैं कि नियम 267 के अंतर्गत सदन के अन्य कार्यों को स्थगित कर इन मुद्दों पर चर्चा कराई जाए। ऐसा नहीं होने पर विपक्षी सदस्य अपना विरोध जता रहे थे।

धराशाही हुए एयरपोर्ट के बारे में क्या बोला विपक्ष ?

हाल ही में विपक्ष ने धराशाही हुए एयरपोर्ट के बारे में बयान दे दिया है! दिल्ली में मॉनसून की पहली बारिश राजधानी के लोगों के लिए आफत बन गई है। पहली ही बारिश की वजह से जहां कई जगहों पर जलभराव हुआ तो वहीं दिल्ली के टर्मिनल-1 पर बड़ा हादसा हो गया। जिसमें एक शख्स की मौत भी हो गई और कई लोग घायल हो गए। टर्मिनल-1 पर छज्जा गिरने पर कांग्रेस ने पीएम मोदी पर निशाना साधा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दावा किया कि एयरपोर्ट के छत का जो हिस्सा गिरा है उसका उद्घाटन पीएम मोदी ने 10 मार्च को किया था। हालांकि केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने मल्लिकार्जुन खरगे के इस दावे को खारिज कर दिया। केंद्रीय मंत्री ने हादसे वाली जगह का दौरा करने के बाद कहा कि एयरपोर्ट के छत का जो हिस्सा गिरा है वो 2009 में बने छत का हिस्सा है। इसका उद्घाटन पीएम मोदी ने नहीं किया था। मंत्री ने आगे कहा कि हम इस घटना को गंभीरता से ले रहे हैं। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन की गई इमारत दूसरी तरफ है और यहां जो इमारत गिरी है वह एक पुरानी इमारत है और 2009 में इसका उद्घाटन किया गया था। जीएमआर ने इस काम का ठेका निजी ठेकेदारों को दिया था। इस तरह से पूरे दिन एयरपोर्ट की छत गिरने पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सोशल मीडिया वॉर चलती रही। आइए आपको दिखाते हैं कि किसने क्या आरोप- प्रत्यारोप लगाए हैं।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दिल्ली एयरपोर्ट पर हुए हादसे पर सवाल उठाते हुए कहा कि मार्च में प्रधानमंत्री जी ने दिल्ली एयरपोर्ट टर्मिनल-1 का उद्घाटन किया था आज उसकी छत ढह गई जिसमें एक कैब ड्राइवर की दुखद मृत्यु हो गई। तीन महीने पहले प्रधानमंत्री जी ने जिस जबलपुर एयरपोर्ट का उद्घाटन किया था उसकी भी छत ढह गई। अयोध्या में निर्माण कार्यों के खस्ताहाल पर पूरा देश दुखी है। यह भाजपा का चंदा लो और धंधा दो का भ्रष्टाचारी मॉडल है जिससे अब पर्दा उठ चुका है। सवाल यह है कि प्रधान उद्घाटन मंत्री जी क्या इन घटिया निर्माण कार्यों और इस भ्रष्टाचारी मॉडल की जिम्मेदारी लेंगे?

इतना ही नहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा-भ्रष्टाचार और आपराधिक लापरवाही मोदी सरकार के पिछले 10 वर्षों में ताश के पत्तों की तरह ढहने वाले घटिया बुनियादी ढांचे के लिए जिम्मेदार हैं। दिल्ली एयरपोर्ट (T1) की छत का गिरना, जबलपुर एयरपोर्ट की छत का गिरना, अयोध्या की नई सड़कों की खस्ता हालत, राम मंदिर में रिसाव, मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक रोड में दरारें, 2023 और 2024 में बिहार में 13 नए पुल गिरना, प्रगति मैदान सुरंग का जलमग्न होना, गुजरात में मोरबी पुल का ढहना त्रासदी कुछ ऐसे स्पष्ट उदाहरण हैं जो मोदी जी और भाजपा के विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा बनाने के बड़े दावों की पोल खोलते हैं। 10 मार्च को जब मोदी जी ने दिल्ली एयरपोर्ट T1 का उद्घाटन किया, तो उन्होंने खुद को दूसरी मिट्टी का इंसान कहा। इसके बाद पार्टी के अध्यक्ष ने पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते लिखा कि दिल्ली एयरपोर्ट त्रासदी के पीड़ितों के प्रति हमारी हार्दिक संवेदना। उन्होंने एक भ्रष्ट, अयोग्य और स्वार्थी सरकार का खामियाजा भुगता है।

वहीं कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए एक्स पर लिखा कि दिल्ली एयरपोर्ट टर्मिनल-1, जिसका उद्घाटन मार्च में प्रधानमंत्री ने किया था, आज इसकी छत गिर गई, जिसमें एक कैब ड्राइवर की दुखद मौत हो गई। जबलपुर एयरपोर्ट की छत, जिसका उद्घाटन तीन महीने पहले प्रधानमंत्री ने किया था वो भी गिर गई। अयोध्या में निर्माण कार्य की खराब स्थिति से पूरा देश दुखी है। उन्होंने पीएम से जिम्मेदारी लेने के लिए भी सवाल किया और कहा कि यह भाजपा का दान लो और व्यापार दो का भ्रष्ट मॉडल है, जो अब उजागर हो गया है। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री इन घटिया निर्माण कार्यों और इस भ्रष्ट मॉडल की जिम्मेदारी लेंगे?

कांग्रेस के कई नेताओ के ट्वीट पर बीजेपी नेताओं ने भी जमकर पलटवार किया। भाजपा नेता अमित मालवीय ने कांग्रेस की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए दावा किया कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान जिसने भी सबसे बड़ी रिश्वत भेजी, उसे ठेके दे दिए गए। टी1 का जो हिस्सा ढह गया, उसे 2009 में खोला गया था जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सत्ता में थी। उन दिनों गुणवत्ता जांच की कोई अवधारणा नहीं थी और जिसने भी सत्तारूढ़ कांग्रेस को सबसे बड़ी रिश्वत भेजी, उसे ठेके दे दिए गए। उन्होंने आगे लिखा कि सोनिया गांधी, जो उस समय सुपर पीएम थीं, को जवाब देना चाहिए।

दिल्ली एयरपोर्ट पर शुक्रवार सुबह हादसे में मारे गए व्यक्ति के परिजनों को 20 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया गया है। साथ ही दिल्ली एयरपोर्ट ने कहा है कि सभी घायलों को तीन-तीन लाख रुपए का मुआवजा दिया जायगा। भारी बारिश के बाद शुक्रवार को एयरपोर्ट के टर्मिनल वन पर छत गिरने से हुए हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई और आठ लोग घायल हो गए। दिल्ली एयरपोर्ट ने एक्स पर कहा है कि टर्मिनल वन की सभी फ्लाइट रात 11 बजे तक टर्मिनल दो और तीन से जाएंगी और लैंड करेगी।

क्या देश के 80 फ़ीसदी अस्पतालों में नहीं है सुविधाएं?

वर्तमान में देश के 80 फ़ीसदी अस्पतालों में सुविधाएं ही नहीं है! भारत में सरकारी अस्पतालों की हालत बहुत खराब है। एक रिपोर्ट में पता चला है कि 80% सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। सरकार ने खुद यह रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स और जरूरी उपकरणों की भारी कमी है। यह रिपोर्ट ‘नेशनल हेल्थ मिशन’ के तहत आने वाले सरकारी अस्पतालों की हालत बताती है। NHM सरकार की एक अहम योजना है जिसके तहत देश भर के जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और आयुष्मान आरोग्य सेंटर्स आते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि NHM के तहत आने वाले 2 लाख से ज्यादा अस्पतालों में से केवल 40,451 ने ही अपनी जानकारी सरकार को दी है। सरकार ने अस्पतालों से जानकारी इकट्ठा करने के लिए ‘इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड’ (IPHS) नाम का एक डिजिटल टूल बनाया था। इस टूल के जरिए पता चला कि जानकारी देने वाले 40,451 अस्पतालों में से केवल 8,089 अस्पताल ही IPHS के मानकों पर खरे उतरे। यानी, इन अस्पतालों में ही मरीजों के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं, डॉक्टर, नर्स और उपकरण मौजूद हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिर का मूल्यांकन अब वर्चुअली किया जाएगा। NHM के तहत सबसे ज्यादा आयुष्मान आरोग्य मंदिर आते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, 42% अस्पतालों ने IPHS के मानकों पर 50% से भी कम अंक हासिल किए। बाकी के 15,172 अस्पतालों को 50 से 80% के बीच अंक मिले। सरकार ने यह सारी जानकारी IPHS के डैशबोर्ड पर सार्वजनिक कर दी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह रिपोर्ट इसलिए तैयार की गई है ताकि यह पता चल सके कि अस्पतालों में क्या कमियां हैं। उन्होंने बताया, ‘हमारा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सभी सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं, उपकरण और डॉक्टर मौजूद हों ताकि मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके।’ केंद्र का लक्ष्य है कि नई सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर 70,000 सरकारी अस्पतालों को IPHS के मानकों के अनुसार बनाया जाए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘हम राज्यों को अस्पतालों में सुधार के लिए पूरी मदद दे रहे हैं। हमारा मकसद सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता में सुधार लाना है।’

अधिकारी ने बताया कि सरकार की ओर से अस्पतालों का औचक निरीक्षण भी किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित हो सके कि अस्पताल जो सरकार जानकारी दे रहे वो सही हैं या नहीं। IPHS के अलावा, ‘नेशनल क्वालिटी अश्योरेंस स्टैंडर्ड’ (NQAS) भी है जो अस्पतालों का मूल्यांकन करता है। NQAS अस्पतालों में दवाइयों की उपलब्धता, कचरा प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण और मरीजों के अधिकारों जैसे मानकों पर गौर करता है।

अधिकारी ने बताया कि जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का NQAS मूल्यांकन पहले की तरह ही किया जाएगा। लेकिन, आयुष्मान आरोग्य मंदिर का मूल्यांकन अब वर्चुअली किया जाएगा। NHM के तहत सबसे ज्यादा आयुष्मान आरोग्य मंदिर आते हैं। बता दें कि वाटर कूलर और ओआरएस काउंटर पर नहीं मिला गिलास

सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान को अस्पताल के निरीक्षण में मरीजों के लिए बनाए गए ओआरएस काउंटर और वाटरकूलर पर पानी पीने के लिए गिलास नहीं मिला। इस पर उन्होंने वहां गिलास रखने के निर्देश दिए। इसके अलावा महिला अस्पताल में सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान को महिला शौचालय की स्थिति ठीक नहीं मिली। इस पर उन्होंने सीएमएस को शौचालय जल्द ठीक कराने के निर्देश दिए ।NHM के तहत आने वाले अस्पतालों का 60 फीसदी खर्च केंद्र सरकार उठाती है जबकि बाकी 40% खर्च राज्य सरकारें उठाती हैं।सांसद ने शुक्रवार को जिला अस्पताल के निरीक्षण के दौरान अपना ब्लड प्रेशर चैक कराया। उनका ब्लड प्रेशर 140 होने के कारण बढ़ा हुआ था। उनको ध्यान रखने की सलाह दी गई। सांसद ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को अस्पताल में जांच कराने के लिए आने वाले मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।अस्पताल ही IPHS के मानकों पर खरे उतरे। यानी, इन अस्पतालों में ही मरीजों के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाएं, डॉक्टर, नर्स और उपकरण मौजूद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 42% अस्पतालों ने IPHS के मानकों पर 50% से भी कम अंक हासिल किए। बाकी के 15,172 अस्पतालों को 50 से 80% के बीच अंक मिले। सरकार ने यह सारी जानकारी IPHS के डैशबोर्ड पर सार्वजनिक कर दी है।सीएमएस को चौधरी चरण सिंह तस्वीर लगवाने के लिए कहासांसद डॉ. राजकुमार सांगवान ने सीएमएस को उनके कक्ष में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की तस्वीर नहीं मिली। इस पर उन्होंने कक्ष में तस्वीर लगवाने के लिए कहा।

आखिर कौन है लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी जो होंगे नए आर्मी चीफ?

आज हम आपको लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी के बारे में बताने जा रहे हैं जो अगले आर्मी के होंगे!रविवार दोपहर बाद इंडियन आर्मी को नया चीफ मिल जाएगा। मौजूदा वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी नए आर्मी चीफ का पद संभालेंगे। वे ऐसे वक्त में आर्मी चीफ का पद संभाल रहे हैं जब लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर चीन से निपटने से लेकर जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से निपटने की चुनौतियां बढ़ी हैं। सेना के मॉर्डनाइजेशन के साथ ही अग्निवीर के तौर पर एक बड़े मसले का हल निकालना भी बाकी है। 2022 में सेना में भर्ती की प्रक्रिया बदली और अग्निपथ स्कीम के तहत अग्निवीरों की भर्ती हो रही है। अभी तक के प्रावधान के हिसाब से चार साल पूरा होने से पहले 25 पर्सेंट अग्निवीरों को परमानेंट होने का विकल्प दिया जाएगा, उस वक्त तक जनरल द्विवेदी ही आर्मी चीफ रहेंगे। अग्निपथ में बदलाव को लेकर आर्मी के भीतर स्टडी तो चल ही रही है लेकिन इसके साथ ही यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। खासकर इस बार केंद्र सरकार का जो स्वरूप है और विपक्ष के नंबर हैं उससे यह मसला गरम है और आगे इसके और गरमाने के आसार है। ऐसे में सेना की जरूरतों और मनोबल का ध्यान रखते हुए आर्मी चीफ के तौर पर जनरल द्विवेदी को मजबूत स्टैंड लेना होगा।

जम्मू-कश्मीर में घाटी में दहशत फैलाने की आतंकवादियों की साजिश जारी है, लेकिन अब साथ ही कई सालों से शांत रहे जम्मू के इलाकों में भी आतंकी गतिविधि बढ़ी है। लगातार कई वारदातों को आतंकी अंजाम दे चुके हैं और सेना ने अपने कई सैनिकों को खोया है। यह सवाल उठ रहा है कि इंटेलिजेंस क्यों फेल हो रहा है और ह्यमून इंटेलिजेंस क्यों इतना कमजोर हुआ है कि आतंकियों के मंसूबों की वक्त रहते भनक तक नहीं मिल पा रही है। नए आर्मी चीफ के सामने इंटेलिजेंस को मजबूत कर यह भरोसा कायम करने की चुनौती होगी कि आतंकियों की साजिशों को पहले भांपकर उन्हें नाकाम करने की क्षमता सेना में है।

ईस्टर्न लद्दाख में एलएसी पर चार साल से गतिरोध जारी है। सैनिकों की वहां लगातार तैनाती है, जिससे LAC भी एक तरह से LOC बन गई है। सिर्फ ईस्टर्न लद्दाख में ही LAC पर नहीं बल्कि ईस्टर्न सेक्टर में भी LAC पर सैनिकों की तैनाती पहले के मुकाबले बढ़ी है। जम्मू- कश्मीर में आतंकी काबू से बाहर हो रहे हैं। मणिपुर में हालात खराब हैं। इन सब चुनौतियों के बीच सेना को सैनिकों की संख्या भी घटानी है। सरकार की तरफ से सैनिकों की संख्या कम करने का टारगेट है और चुनौतियों चारों तरफ हैं। नॉर्दन बॉर्डर तो प्राथमिकता रहेगी ही लेकिन वेस्टर्न फ्रंट पर भी ढिलाई नहीं बरती जा सकती है। ऐसे में मैनपावर मैनेजमेंट नए चीफ के सामने एक बड़ी चुनौती होगी कि कैसे सभी फ्रंट की जरूरतें पूरी की जाए।

सेना में अभी कुछ क्रिटिकल एम्युनिशन की कमी है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए कई सैन्य उपकरणों के इंपोर्ट पर बैन लगाया गया है और वे खरीद स्वदेशी कंपनियों से ही करनी हैं। ऐसे में सेना को वक्त पर सभी जरूरी उपकरण मिल सकें यह एक बड़ा टास्क है। क्योंकि कई बार डीआरडीओ की तरफ से सेना की जरूरत के हिसाब से प्रोडक्ट का प्रोटोटाइप तो तैयार हो जाता है लेकिन एक्चुअल फंक्शनल प्रोडक्ट मिलने में देरी होती रहती हैं। यह भी चुनौती होगी कि कैसे स्वदेशी इंडस्ट्री को सुविधा मुहैया कराएं कि वे सेना की जरूरत के हिसाब से और उनके मानकों पर फिट बैठने वाले प्रॉडक्ट तैयार करें। युद्ध के बदलते तरीके के साथ ही नए उपकरणों के साथ ही नई तरह की ट्रेनिंग बिना देरी किए देना भी एक चुनौती रहेगी। पाकिस्तान की बुरी आर्थिक स्थिति के बावजूद पाकिस्तान भी तेज रफ्तार से अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है।

चीन ने कुछ वक्त पहले ही अपनी स्ट्रैटजिक सपोर्ट फोर्स को रीस्ट्रक्चर किया है उसके तहत आने वाले तीन डिपार्मेंट साइबर, स्पेस और इंफो सपोर्ट फोर्स को सीधे सेंट्रल मिलिट्री कमिशन (सीएमसी) के तहत ले आए हैँ। जिससे उनकी बेहतर मॉनिटरिंग होगी और वह ज्यादा प्रभावशाली होंगे। इससे भारत के लिए थ्रेट परसेप्शन बढ़ेगा। भारतीय सेना में भी रीस्ट्रक्चरिंग की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि क्या बदलते थ्रेट परसेप्शन के हिसाब से सेना खुद को कितनी तेजी से तैयार कर रही है। नए थ्रेट के लिए नए उपकरण के साथ ही नई स्ट्रैटजी और नई तरह की ट्रेनिंग… इन सब में भारतीय सेना पीछे ना छूटे।

आखिर अन्य देशों से कैसे अलग है भारत ?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत अन्य देशों से अलग कैसे हैं! सरकार की आत्मनिर्भर नीति, कोरियाई चाइबोल के भारतीय वर्जन में विकसित हो रही है। जहां सरकार बड़े उद्योग समूहों को समर्थन और सब्सिडी देकर उन्हें विश्व स्तर का बनाना चाहती है। ऐसा ही पूर्वी एशिया के दूसरे देश भी करते हैं। क्या भारत पूर्वी एशिया का अनुसरण करेगा या फिर लैटिन अमेरिका की राह पर चलेगा, जिसने बड़े उद्योग बनाने के लिए ऊंचे टैरिफ, सीमित प्रतिस्पर्धा और सस्ता लोन दिया था। चाइबोल ने तो नेताओं को रिश्वत दी थी लेकिन लैटिन अमेरिका में भ्रष्टाचार कहीं ज्यादा था जिसने अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया। शुरुआती फायदों के बावजूद ये क्षेत्र मध्यम आय से ऊंची आय वाले देश नहीं बन पाए। अर्जेंटीना जो 19वीं सदी में सबसे अमीर देशों में से एक था, सात बार दिवालिया हुआ और पिछड़ गया। पूर्वी एशियाई देश हमेशा निर्यात पर ध्यान देते थे, इसलिए वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बने। इसके विपरीत लैटिन अमेरिकी देश आत्मनिर्भरता चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि प्रतिस्पर्धा की कमी ने उन्हें बर्बाद कर दिया। क्या भारत अपने चाइबोलाइजेशन के संस्करण में सफल होगा? या लैटिन अमेरिका के रास्ते पर जाएगा, जैसा रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्रियों को डर है।

पहली चिंता है अधूरा चाइबोलाइजेशन। कोरिया ने बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बाहर रखा। लेकिन आत्मनिर्भरता के लक्ष्य मिश्रित हैं। यह राष्ट्रीय चैंपियन चाहता है लेकिन बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी आकर्षित करना चाहता है। यह ऐप्पल को अरबों मूल्य के iPhone बनाने और निर्यात करने के लिए और माइक्रोन (लागत के 70% की सब्सिडी के साथ) को सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण के लिए आकर्षित करने में सफलता का दावा करता है। इसे विदेशियों को अनुचित तोहफा बताया गया है। इसके विपरीत, कोरिया ने उत्पादन में कभी भी विदेशी निवेश की अनुमति नहीं दी। सैमसंग और हुंडई ने पहले विदेशी तकनीक खरीदकर और बाद में R&D में बड़े पैमाने पर निवेश करके तरक्की की। भारत की आत्मनिर्भर नीति शुद्ध चाइबोलाइजेशन से बहुत दूर है। यह FDI को आकर्षित करने और भारत की बड़ी तीन कंपनियों – टाटा, अंबानी और अडानी – को दुनिया से मुकाबला करने के लिए राष्ट्रीय चैंपियन बनने का एक उलझा हुआ मिश्रण है।

आत्मनिर्भर में आयात को रोकने के लिए उच्च टैरिफ, उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) के माध्यम से सब्सिडी और राष्ट्रीय चैंपियन के पक्ष में नियम शामिल हैं। सरकार ने पतंग, मोमबत्ती, घड़ियां और वस्त्र जैसी वस्तुओं के छोटे उत्पादकों की रक्षा करते हुए कई कम तकनीक वाली वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। लेकिन यह अमेजन और वॉलमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी चाहता है। वहीं भारत की ई- कॉमर्स जैसे रिलायंस जैसी घरेलू कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए ई-कॉमर्स नियमों में बदलाव कर रहा है। इसलिए कोरिया के विपरीत भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियां और राष्ट्रीय चैंपियन दोनों चाहता है।

दूसरा डर यह है कि भारतीय व्यवसायी मुख्य रूप से भ्रष्ट सरकारों से एहसान खरीदने वाले अप्रतिस्पर्धी हथकंडे अपनाकर रह जाएंगे। कुछ भारतीय अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत बुनियादी ढांचे जैसे गैर-प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में अंबानी और अडानी जैसी कंपनियों के साथ, लैटिन अमेरिका के रास्ते पर जा रहा है। जिसमें अंबानी और अडानी जैसी कंपनियां बुनियादी ढांचे जैसे गैर-प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में पैसा कमा रही। लेकिन ये कोई सांठगांठ वाली उपलब्धि नहीं है। रिलायंस जियो ने भारत को दुनिया के सबसे सस्ते दूरसंचार नेटवर्क में से एक दिया है। अडानी ने मुंद्रा बंदरगाह से शुरुआत की। मुंबई और पास के कांडला जैसे प्रमुख बंदरगाहों से कार्गो को आकर्षित करने के लिए इसे प्रतिस्पर्धी होना पड़ा। आज, मुंद्रा भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है, जिसके साथ सबसे बड़ा विशेष आर्थिक क्षेत्र जुड़ा हुआ है।

एक दशक पहले, अडानी ने ऑस्ट्रेलिया में एक नई कारमाइकल कोयला खदान परियोजना में 16 बिलियन डॉलर निवेश का निर्णय लिया। कोई भी सांठगांठ वाला व्यक्ति किसी दूसरे देश में इतना बड़ा दांव नहीं लगाएगा। उन्हें पर्यावरणविदों और आदिवासी समूहों से वर्षों तक लड़ना पड़ा। इसके अलावा, प्रतिद्वंद्वी खनिकों ने कहा कि कारमाइकल को सफल होने के लिए कम से कम $110/टन के निर्यात मूल्य की आवश्यकता होगी, जो कि असंभव था क्योंकि दुनिया ने धीरे-धीरे कोयले का उपयोग करना बंद कर दिया था। अडानी ने आलोचकों से वर्षों तक लड़ाई लड़ी, आखिरकार सभी परमिट प्राप्त किए और उत्पादन शुरू किया। आज ऑस्ट्रेलियाई कोयले की कीमत $140/टन है, इसलिए अडानी ने सही अनुमान लगाया और उनके आलोचकों ने सही अनुमान नहीं लगाया।

टाटा एक स्थापित वैश्विक खिलाड़ी है। यह अब ब्रिटेन में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा नियोक्ता है, जो TCS, टाटा स्टील यूरोप (पूर्व में कोरस) और जगुआर लैंड रोवर चलाता है। आलोचकों का तीसरा डर यह है कि भारतीय कंपनियां R&D की कमी के कारण विफल हो जाएंगी। भारत सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.6% R&D पर खर्च करता है, जबकि चीन 2.4% और कोरिया 4.8% खर्च करता है। अधिकांश भारतीय R&D सरकार द्वारा किया जाता है, निगमों द्वारा नहीं। अगर भारत को चाइबोलाइज करना है तो इसमें आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए। हालांकि टॉप भारतीय कंपनियां ऐसा ही करने का लक्ष्य बना रही हैं। अंबानी और अडानी अक्षय ऊर्जा में बड़े पैमाने पर R&D की योजना बना रहे हैं। उनका लक्ष्य ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत $3/किग्रा से घटाकर $1/किग्रा करना है, जो अत्याधुनिक चीज़ है। जगुआर का R&D टाटा को ई-कारों में विश्व स्तरीय बनने में मदद करेगा। भारत के चौथे सबसे बड़े समूह बजाज ने अपने पुणे कारखाने के अधिकांश हिस्से को R&D केंद्र में बदल दिया है। सफलता किसी भी तरह से सुनिश्चित नहीं है। लेकिन भारत आगे बढ़ने के लिए अच्छी स्थिति में है। आइए आशावादी बनें।

क्या अब आईपीसी और सीआरपीसी का कोई भी वजूद नहीं रहा?

अब आईपीसी और सीआरपीसी का कोई भी वजूद नहीं रहा है! देश में आज आधी रात से ब्रिटिश हुकूमत के तीन आपराधिक कानूनों का अंत हो गया। भारतीय संसद द्वारा बनाये गये नये कानून के साथ एक जुलाई का अरुणोदय, भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक नये युग का आगाज है। आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए एक ऐतिहासिक कदम के रूप में तीन नये कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) एक जुलाई से लागू होंगे। ये कानून क्रमशः औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लिया। नये आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद एफआईआर से लेकर अदालत के निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन की गई है और भारत अपनी आपराधिक न्याय प्रणाली में आधुनिक तकनीक का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। यह कानून तारीख-दर-तारीख के चलन की समाप्ति सुनिश्चित करेंगे और देश में एक ऐसी न्यायिक प्रणाली स्थापित होगी, जिसके जरिये तीन वर्षों के भीतर न्याय मिलना सुनिश्चित हो सकेगा।

भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक सुलभ, जवाबदेह, भरोसेमंद और न्याय प्रेरित बनाने का प्रयास है। 600 से अधिक संशोधनों और कुछ जोड़ने एवं हटाने के साथ आपराधिक कानूनों को पारदर्शी, आधुनिक और तकनीकी तौर पर कुशल ढांचे में ढाला गया है, ताकि वे भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था को कमजोर करनेवाली मौजूदा चुनौतियों से निपटने में सक्षम हों। तीनों नये आपराधिक कानून को वर्ष 2023 में संसद के शीतकालीन सत्र में पारित किया गया था। नये कानूनों के लागू होने के बाद पुलिस, जांच और न्यायिक व्यवस्था का चेहरा बदल जायेगा। कई तरह के मामलों में इन कानूनों का व्यापक असर पड़ेगा। नये कानूनों में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों की जांच को प्राथमिकता दी गयी है। सूचना दर्ज होने के दो महीने के भीतर जांच पूरी होगी। अब इलेक्ट्रॉनिक रूप से समन की तामील की जा सकेगी। इससे कानूनी प्रक्रियाओं में तेजी आयेगी। कागजी कार्रवाई कम होगी और सभी संबंधित पक्षों के बीच समुचित संवाद सुनिश्चित होगा। नये कानूनों में जांच, ट्रायल और अदालती कार्यवाहियों में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। नये कानूनों में पेश किये गये कुछ ठोस संशोधन केवल आरोपियों को दंडित करने के बजाय पीड़ित को न्याय देने को प्राथमिकता देकर हमारी सामूहिक चेतना को पुन: व्यवस्थित करने का प्रयास करते हैं।

पीड़ित, गवाह और बड़े पैमाने पर जनता के अधिकारों और भलाई की रक्षा के लिए कुछ खास चीजें जोड़ी गयी हैं और संशोधन किये गये हैं। इन तीनों कानूनों में जीरो एफआईआर, ऑनलाइन शिकायत एवं इलेक्ट्रानिक माध्यम से समन और सभी जघन्य अपराधों में घटना स्थल की अनिवार्य वीडियोग्राफी का प्रावधान शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति थाने जाये बिना घटना की ऑनलाइन शिकायत कर सकेगा। पीड़ित क्षेत्राधिकार की चिंता किये बिना देश के किसी भी थाने में एफआईआर दर्ज करा सकता है। सबूत एकत्र करने के दौरान घटना स्थल की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी करायी जायेगी, ताकि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न की जा सके। पीड़ित और आरोपी दोनों को ही एफआईआर की कॉपी, पुलिस रिपोर्ट, चार्जशीट, बयान, स्वीकारोक्ति समेत मामले से जुड़े अन्य कागजात 14 दिन के भीतर हासिल करने के हकदार होंगे।

मामले को बेवजह लंबा नहीं खींचा जा सके, इसकी भी व्यवस्था की गयी है। कोई भी अदालत मामले को अधिकतम दो सुनवाई तक ही टाल सकती है। गवाहों की सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम किया गया है। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को अनिवार्य रूप से गवाह सुरक्षा योजना लागू करनी होगी। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिए बीएनएस में नया अध्याय जोड़ा गया है। कई धाराएं और प्रावधान बदल गये हैं। आईपीसी में 511 धाराएं थीं, अब 356 बची हैं। 175 धाराएं बदल गयी हैं। आठ नयी जोड़ी गयीं, 22 धाराएं खत्म हो गयी हैं। इसी तरह सीआरपीसी में 533 धाराएं बची हैं। 160 धाराएं बदली गयी हैं, नौ नयी जुड़ी हैं, नौ खत्म हुई हैं। पूछताछ से ट्रायल तक सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से करने का प्रावधान हो गया है, जो पहले नहीं था। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ट्रायल कोर्ट को हर फैसला अधिकतम तीन साल में देना होगा। भारतीय न्याय संहिता में 20 नये अपराध जोड़े गये हैं। ऑर्गेनाइज्ड क्राइम, हिट एंड रन, मॉब लिंचिंग पर सजा का प्रावधान। डॉक्यूमेंट में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं। आईपीसी में मौजूद 19 प्रावधानों को हटा दिया गया है। 33 अपराधों में कारावास की सजा बढ़ा दी गयी है। 83 अपराधों में जुर्माने की सजा बढ़ा दी गयी है। छह अपराधों में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान किया गया है।

भारतीय न्याय संहिता 163 साल पुरानी आईपीसी की जगह ली है, जिससे दंड कानून में महत्वपूर्ण बदलाव आयेंगे। सजा के रूप में सामुदायिक सेवा एक उल्लेखनीय परिचय है। यौन अपराधों के लिए कड़े कदम उठाये गये हैं। कानून में उन लोगों के लिए दस साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है जो शादी का वादा करके धोखे से यौन संबंध बनाते हैं। संगठित अपराध में अपहरण, डकैती, वाहन चोरी, जबरन वसूली, भूमि हड़पना, अनुबंध हत्या, आर्थिक अपराध, साइबर अपराध और मानव, ड्रग्स, हथियार या अवैध सामान या सेवाओं की तस्करी शामिल है। वेश्यावृत्ति या फिरौती के लिए मानव तस्करी, संगठित अपराध के रूप में परिभाषित करते हुए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भौतिक लाभ के लिए हिंसा, धमकी, डराने-धमकाने, जबरदस्ती या अन्य गैरकानूनी तरीकों से अंजाम दिये गये अपराधों के लिए कड़ी सजा दी जायेगी।

क्या नए कानून में ऑनलाइन की जा सकेगी शिकायत?

अब से नए कानून में ऑनलाइन भी शिकायत की जा सकेगी! जीरो’ एफआईआर, पुलिस में ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराना, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन और सभी जघन्य अपराधों के अपराध दृश्यों की अनिवार्य वीडियोग्राफी तीन नए आपराधिक कानूनों की प्रमुख बातें हैं जो एक जुलाई से लागू होंगे। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 भारतीय नागरिकों को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इनका उद्देश्य सभी के लिए अधिक सुलभ, सहायक और प्रभावी न्याय प्रणाली सुनिश्चित करना है। पिछले साल पारित ये नए कानून ब्रिटिश काल के क्रमश: भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान लेंगे। नए कानूनों के तहत अब कोई भी व्यक्ति पुलिस थाने जाए बिना इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम से घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज करा सकता है। इससे मामला दर्ज कराना आसान और तेज हो जाएगा और पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा सकेगी। जीरो’ एफआईआर से अब कोई भी व्यक्ति किसी भी पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट (प्राथमिकी) दर्ज करा सकता है चाहे अपराध उस थाने के अधिकार क्षेत्र में न हुआ हो। इससे कानूनी कार्यवाही शुरू करने में होने वाली देरी खत्म होगी और अपराध की शिकायत तुरंत दर्ज की जा सकेगी। नए कानूनों के तहत पीड़ितों को प्राथमिकी की एक निशुल्क प्रति दी जाएगी जिससे कानूनी प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी।

नए कानून में जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि गिरफ्तारी की सूरत में व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को अपनी स्थिति के बारे में सूचित करने का अधिकार दिया गया है। इससे गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत सहयोग मिल सकेगा। इसके अलावा गिरफ्तारी विवरण पुलिस थानों और जिला मुख्यालयों में प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा जिससे कि गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार और मित्र महत्वपूर्ण सूचना आसानी से पा सकेंगे। मामले और जांच को मजबूत करने के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों का गंभीर अपराधों के लिए अपराध स्थल पर जाना और सबूत एकत्रित करना अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अलावा, अपराध स्थल से सबूत एकत्रित करने की प्रक्रिया की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी कराई जाएगी ताकि सबूतों में किसी प्रकार की छेड़छाड़ को रोका जा सके। सूत्रों ने बताया कि इस कदम से जांच की गुणवत्ता व विश्वसीयता बढ़ेगी।

नए कानूनों में महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों की जांच को प्राथमिकता दी गई है जिससे सूचना दर्ज किए जाने के दो महीने के भीतर जांच पूरी की जाएगी। नए कानूनों के तहत पीड़ितों को 90 दिन के भीतर अपने मामले की प्रगति पर नियमित रूप से जानकारी पाने का अधिकार होगा। नए कानूनों में महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराध के पीड़ितों को सभी अस्पतालों में निशुल्क प्राथमिक उपचार या चिकित्सीय उपचार मुहैया कराया जाएगा। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि पीड़ित को आवश्यक चिकित्सीय देखभाल तुरंत मिले। अब समन इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दिए जा सकते हैं जिससे कि कानूनी प्रक्रियाओं में तेजी आएगी, कागजी काम में कमी आएगी और सभी पक्षों के बीच प्रभावी संचार सुनिश्चित होगा। महिलाओं के खिलाफ कुछ अपराधों में पीड़ित के बयान दर्ज किए जाएंगे और जहां तक संभव होगा कोई महिला मैजिस्ट्रेट ही बयान दर्ज करेगी और उनकी अनुपस्थिति में कोई पुरुष मैजिस्ट्रेट किसी महिला की मौजूदगी में पीड़िता का बयान दर्ज करेगा।

अदालतें समय रहते न्याय देने के लिए मामले की सुनवाई में अनावश्यक विलंब से बचने के लिए अधिकतम दो बार मुकदमे की सुनवाई स्थगित कर सकती हैं। नए कानूनों में सभी राज्य सरकारों के लिए गवाह सुरक्षा योजना लागू करना अनिवार्य है ताकि गवाहों की सुरक्षा व सहयोग सुनिश्चित किया जाए और कानूनी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता व प्रभाव बढ़ाया जाए।

नए कानूनों में किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास और सामाजिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए छोटे-मोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा करने का प्रावधान है। सामुदायिक सेवा के तहत अपराधियों को समाज में सकारात्मक रूप से योगदान देने, अपनी गलतियों से सीख लेने और मजबूत सामुदायिक संबंध बनाने का मौका मिलेगा। नए कानूनों के तहत कुछ अपराधों के लिए लगाए जाने वाले जुर्माने को अपराध की गंभीरता से जोड़ा गया है। कानूनी प्रक्रियाओं को आसान बनाया गया है ताकि उन्हें समझना और उनका पालन करना आसान हो व निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित हो। संसद ने पिछले साल शीतकालीन सत्र में इन विधेयकों पर चर्चा की थी और इन्हें पारित किया था। लोकसभा के कुल 37 सदस्यों और राज्यसभा के 40 सदस्यों ने इस चर्चा में भाग लिया था।