Saturday, March 14, 2026
Home Blog Page 602

जब संविधान में शपथ को लेकर बनाए गए नियम?

संविधान में भी शपथ को लेकर कई नियम बनाए गए है! पहले संशोधन के फलस्वरूप एक बहुत महत्वपूर्ण संविधानिक प्रश्न उठता है और वह यह है कि क्या मंत्रियों को सदस्यों की हैसियत से नहीं बल्कि मंत्रियों की हैसियत से, एच्चे हृदय से काम करना चाहिये या नहीं। सभा कृपा करके यह देखें कि घोषणाओं के आठ प्रपत्र हैं। संघ के मंत्रियों के सम्बन्ध में दो पत्र हैं। प्रपत्र 1 और प्रपत्र 21 पहली शपथ पद- शपथ है और दूसरी शपथ गोपनीयता शपथ है। इसके अतिरिक्त राज्यों के मंत्रियों के सम्बन्ध में भी दो प्रपत्र हैं, अर्थात् प्रपत्र 5 और प्रपत्र 6, जिनमें से एक पद शपथ के सम्बन्ध में और दूसरा गोपनीयता – शपथ के सम्बन्ध में है। इन सभी दशाओं में मंत्रियों को अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिये “सत्यनिष्ठा” से शपथ लेनी है अथवा प्रतिज्ञान करना है और यह आवश्यक नहीं है कि वह यह बच्चे हृदय से कर। यह विचार किया जा सकता है कि “सच्चे हृदय से” शब्दों को निकाल देने से वर्तमान प्रथा में कोई अन्तर नहीं आयेगा। माननीय सदस्यों से मेरा अनुरोध है कि संसद के सदस्यों तथा न्यायाधीशों के लिये जो शपथों के प्रपत्र रखे गये हैं। उन पर विचार किया जाये। संसद के सदस्यों को जो घोषणा करनी होगी वह प्रपत्र 3 में दी गई है। यह शपथ इसी प्रकार की है। मैं जानना चाहता हूं कि क्या “सच्चे हृदय से काम करना” शब्दावली स्वतन्त्र भारत के किसी मंत्री के सम्बन्ध में प्रयोग में नहीं आ सकती? मैं जानता हूं कि मंत्रियों को राजनयिक होना चाहिए, चतुर होना चाहिए, किन्तु यह नहीं जानता था कि चूंकि उन्हें राजनयिक होना चाहिए इसलिए उन्हें सच्चे हृदय से काम करने की आवश्यकता नहीं।उन्हें “सत्यनिष्ठा से तथा सच्चे हृदय से ” घोषणा करनी है। न्यायाधीशों ने जो प्रतिज्ञान करना है वह प्रपत्र 4 उल्लिखित है। उन्होंने भी यह घोषणा करनी कि वे अपने कर्तव्य का पालन “सत्यनिष्ठा तथा सच्चे हृदय से” करेंगे। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को प्रपत्र 8 के अधीन यह घोषणा करनी है कि वे अपने कर्तव्यों का पालन “सत्यनिष्ठा और सच्चे हृदय से करेंगे।

शब्दावलियों को बहुत समझ बुझ कर चुना गया है। एक शब्दावली संसद के सदस्यों तथा राज्यों के विधान मंडलों के सदस्यों और संघ न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के सदस्यों के लिए है, जिन्हें अपने कर्तव्यों का पालन “सत्यनिष्ठा और सच्चे हृदय” से करना है किन्तु संघ के तथा राज्य के मंत्रियों पर यह शब्दावली लागू नहीं होती। मैं यह जानना चाहता हूं कि मंत्रियों के सम्बन्ध ये शब्द जान बूझ कर नहीं रहने दिए गए हैं अथवा अनजाने। संसद के तथा राज्यों के विधान मंडलों के सदस्यों और न्यायाधीशों के सम्बन्ध में जिस सावधानी से “सच्चे हृदय से” शब्दों को रखा गया है उससे ज्ञात होता है कि अन्य स्थलों से ये शब्द जान बूझकर निकाल दिए गए हैं। मैं इस सभा के सदस्यों से जानना चाहता हूं कि क्या उनका विचार यह है कि जब तक वे विधान मंडल के सदस्य बने रहेंगे तब तक वे अपने कर्तव्यों का पालन सत्यनिष्ठा से तथा “सच्चे सदस्य से” करेंगे किन्तु जैसे ही वे मंत्रिमंडल की गद्दियों पर आरूढ़ होंगे, उनको “सच्चे हृदय से काम करने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी। क्या विचार यही है?

यदि बात यही है तो यह आधुनिक विचार-धारा के अनुरूप ही है। वास्तव में मंत्रियों को सच्चे हृदय से काम करने की आवश्यकता है। उन्हें तो कपटी होने की आवश्यकता है। मैं कह सकता हूं कि कुछ व्यक्तियों का कपट भी सद्गुण समझा जाता है। राधा ने श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहा था: “निपट कपट तुम श्याम।” श्याम तुम कपटी हो। यह प्रेम की पराकाष्ठा है। क्या हम भी अपने मंत्रियों को ‘निपट कपट तुम श्याम’ कह कर संबोधित करेंगे और यह कहेंगे आप हमारे प्रभु हैं किन्तु निपट कपटी हैं?” यह शपथ इसी प्रकार की है। मैं जानना चाहता हूं कि क्या “सच्चे हृदय से काम करना” शब्दावली स्वतन्त्र भारत के किसी मंत्री के सम्बन्ध में प्रयोग में नहीं आ सकती? मैं जानता हूं कि मंत्रियों को राजनयिक होना चाहिए, चतुर होना चाहिए, बता दे कि  प. बंगाल से मुस्लिम सदस्य नजीरुद्दीन अहमद ने प्रस्ताव रखा कि शपथ में ‘सत्यनिष्ठा से शपथ’ के साथ-साथ ‘सच्चे हृदय से शपथ’ लिए जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सदस्य शपथ लेते हुए यह कहें कि सत्यनिष्ठा और सच्चे हृदय से शपथ लेता/लेती हूं। उन्होंने अपना विचार रखते हुए कहा, ‘अध्यक्ष महोदय, मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करता हूं कि, “संशोधनों पर संशोधनों की सूची 1 पांचवा सप्ताह के संशोधन संख्या 56 के सम्बन्ध में, तृतीय अनुसूची में घोषणाओं के प्रपत्र 1 में,सत्य निष्ठा से’ शब्दों के पश्चात् और सच्चे हृदय से शब्द रखे जाएं। किन्तु यह नहीं जानता था कि चूंकि उन्हें राजनयिक होना चाहिए इसलिए उन्हें सच्चे हृदय से काम करने की आवश्यकता नहीं।

क्या ईश्वर के नाम पर शपथ लेना सही है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ईश्वर के नाम पर शपथ लेना सही है या नहीं! सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं’ से पहले ‘ईश्वर की शपथ लेता हूं’ आना चाहिए। यानी विकल्पों में ‘सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान’ के ऊपर ‘ईश्वर की शपथ लेता हूं’ को प्राथमिकता दिया जाना चाहिए। तभी पूर्वी पंजाब के प्रतिनिधि सरदार भूपेंद्र सिंह मान ने ईश्वर के नाम पर शपथ लेने का विकल्प दिए जाने पर आपत्ति प्रकट की। उन्होंने अपनी सोच के पक्ष में लंबा तर्क दिया। उन्होंने कहा- श्रीमान मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करता हूं कि, ‘संशोधनों पर संशोधनों की सूची (1) पांचवा सप्ताह के संशोधन संख्या 56 से 63 तक में, तृतीय अनुसूची में शपथ अथवा प्रतिज्ञान के प्रपत्र में से प्रस्तावित शब्दों में से, ईश्वर की शपथ लेता हूं, शब्द निकाल दिए जाएं। इस संशोधन को उपस्थित करने में मेरा उद्देश्य यह है कि शपथ लेने में ईश्वर का नाम नहीं लिया जाना चाहिए। सभा के समक्ष ईश्वर का नाम हटा देने का प्रस्ताव रखकर मैं ईश्वरत्व का विरोध नहीं कर रहा हूं। धार्मिक तथा नैतिक दृष्टि से तथा संविधान के महत्व को दृष्टि में रखकर भी मैं शपथ से ईश्वर का नाम हटा देने के लिये सभा से अनुरोध कर रहा हूं।

जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो हम प्रायः यह शपथ लेते थे “ईश्वर की शपथ, यह सच है”, “ईश्वर की शपथ, मैं यह करूंगा”, “ईश्वर की शपथ, मैं यह नहीं करूंगा”, “ईश्वर की शपथ, यह गलत है” इत्यादि, और हमारे अध्यापक तथा बड़े बूढ़े हमसे हमेशा कहते थे कि शपथ लेने की आदत अच्छी आदत नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता कि उस समय जो आदतें बुरी आदतें समझी जाती थीं वे अब हमारे बड़े होने पर अच्छी आदतें कैसे समझी जाने लगी हैं। अन्य प्रकार की शपथ लेना अच्छा नहीं है। यदि किसी व्यक्ति से उसके घोषणा करने अथवा सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करने पर भी ईश्वर की शपथ लेने को कहा जाए तो वह कहेगा “मैं सच कहूंगा। आपको मेरा विश्वास करना चाहिये। इसकी आवश्यकता नहीं कि मैं ईश्वर की शपथ लूं।” मेरे विचार से किसी व्यक्ति से ईश्वर की शपथ लेने को कहना उसका अपमान करना है । श्रीमान, मेरा यह भी विचार है कि शपथ में ईश्वर का नाम लेकर ईश्वर का निरादर करना है। इसके अतिरिक्त मैं यह कह सकता हूं कि किसी व्यक्ति से ईश्वर की शपथ लेने को कहना उसका अविश्वास करना है।

श्री कामत के संशोधन के अधीन संविधान के खण्डों में कुछ स्थलों पर हम ईश्वर का नाम रख चुके हैं। हम शपथ के लिये भी ईश्वर के नाम को रख रहे हैं। कल आप उसके नाम को प्रस्तावना में भी स्थान देने जा रहे हैं। मुझे सन्देह है कि ईश्वर उसे पसंद करेगा या नहीं। आपके लिये यह उत्कृष्ट संविधान हो सकता है किन्तु सम्भव है कि ईश्वर इसे पसंद न करे। सम्भव है वह इस संविधान में अपना नाम रखवाना ही न चाहे। सम्भव है कि वह साम्यवादी ईश्वर हो अथवा प्रबल समाजवादी प्रवृत्ति का हो। मैं सदस्यों से तथा डॉ. अम्बेडकर से कहता हूं कि यदि बिना उसकी इच्छा जाने हुए आप उसका नाम रख देते हैं और कल वह यह विचार करता है कि वह इस संविधान से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेगा तो इस संविधान का क्या होगा? मैं यह प्रार्थना करता हूं कि उसके नाम का संविधान में विभिन्न प्रकार से उल्लेख करने तथा उसका संविधान से नाता जोड़ने के पूर्व आप यह जान लें कि उसकी क्या इच्छा है।

वहीं, प. बंगाल से मुस्लिम सदस्य नजीरुद्दीन अहमद ने प्रस्ताव रखा कि शपथ में ‘सत्यनिष्ठा से शपथ’ के साथ-साथ ‘सच्चे हृदय से शपथ’ लिए जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सदस्य शपथ लेते हुए यह कहें कि सत्यनिष्ठा और सच्चे हृदय से शपथ लेता/लेती हूं। उन्होंने अपना विचार रखते हुए कहा, ‘अध्यक्ष महोदय, मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करता हूं कि, “संशोधनों पर संशोधनों की सूची 1 पांचवा सप्ताह के संशोधन संख्या 56 के सम्बन्ध में, तृतीय अनुसूची में घोषणाओं के प्रपत्र 1 में,सत्य निष्ठा से’ शब्दों के पश्चात् और सच्चे हृदय से शब्द रखे जाएं।” उन्होंने इस विचार के पीछे लंबा तर्क दिया। उन्होंने कहा- मेरे पहले संशोधन के फलस्वरूप एक बहुत महत्वपूर्ण संविधानिक प्रश्न उठता है और वह यह है कि क्या मंत्रियों को सदस्यों की हैसियत से नहीं बल्कि मंत्रियों की हैसियत से, एच्चे हृदय से काम करना चाहिये या नहीं। सभा कृपा करके यह देखें कि घोषणाओं के आठ प्रपत्र हैं। संघ के मंत्रियों के सम्बन्ध में दो पत्र हैं। प्रपत्र 1 और प्रपत्र 21 पहली शपथ पद- शपथ है और दूसरी शपथ गोपनीयता शपथ है। इसके अतिरिक्त राज्यों के मंत्रियों के सम्बन्ध में भी दो प्रपत्र हैं, अर्थात् प्रपत्र 5 और प्रपत्र 6, जिनमें से एक पद शपथ के सम्बन्ध में और दूसरा गोपनीयता – शपथ के सम्बन्ध में है। इन सभी दशाओं में मंत्रियों को अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिये “सत्यनिष्ठा” से शपथ लेनी है अथवा प्रतिज्ञान करना है और यह आवश्यक नहीं है कि वह यह बच्चे हृदय से कर।

आखिर शपथ के शब्दों पर क्यों हुई बहस ?

हाल ही में संसद में शपथ के शब्दों पर खूब बहस देखी गई! जो लोकसभा की सदस्य निर्वाचित हुआ/हुई हूं, ईश्वर की शपथ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान लेता/लेती हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा/रखूंगी। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा/रखूंगी। तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला/वाली हूं, उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूंगा/करूंगी।” संसद में एक-एक कर सभी सांसद यह शपथ ले रहे हैं। 18वीं लोकसभा की पहली बैठक में शपथ के इन शब्दों से सदन गूंज रहा है। कुछ सांसद संविधान और अपने पद की मर्यादा के प्रति ईश्वर की शपथ ले रहे हैं तो कुछ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान ले रहे हैं। कभी सोचा कि आखिर शपथ के लिए ये दो विकल्प ही क्यों होते हैं? कोई धार्मिक ग्रंथ, ईश्वर के नाम, संविधान या किसी और के नाम से शपथ क्यों नहीं लेता? इसके पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। आप जानते हैं कि संविधान के निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने, 18 दिन का वक्त लगा। संविधान सभा ने इन कुल 114 दिनों में एक-एक विषय पर गंभीर और विस्तृत चर्चा की। जब बात सांसदों के शपथ की आई तब इस बात पर खूब चर्चा हुई कि इसका प्रारूप क्या हो। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सांसदों के शपथ का एक प्रारूप तैयार किया। संविधान का जो प्रारूप तैयार किया गया था, उसमें शपथ का विषय तीसरी अनुसूची में रखा गया। इस पर 26 अगस्त और 16 अक्टूबर, 1949 को संविधान सभा में चर्चा हुई। इसमें केंद्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, संसद सदस्य, राज्य विधानमंडल के सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर आसीन व्यक्तियों द्वारा लिए जाने वाले प्रतिज्ञान और शपथ शामिल हैं।

इस अनुसूची पर संविधान सभा में कई सदस्यों ने अपने-अपने तर्क रखे, खासकर शपथ और प्रतिज्ञान में ईश्वर के नाम का आह्वान करने के मामले पर। डॉ. आंबेडकर ने एक संशोधन पेश किया, जिसमें लोगों को ‘ईश्वर’ के नाम पर शपथ लेने का विकल्प दिया गया। पंजाब के सिख सदस्य सरदार भूपेन्द्र सिंह मान ने इस कदम का नैतिक और धार्मिक आधार पर विरोध किया। आश्चर्य की बात यह है कि सदस्य ने इस बात पर जोर दिया कि चूंकि ईश्वर विधानसभा के सदस्य नहीं हैं और न ही उनकी सहमति ली गई है, इसलिए ‘ईश्वर’ शब्द को शपथ में शामिल नहीं किया जा सकता।

एक अन्य सदस्य ने कहा कि इन पदों पर आसीन लोग धर्मनिरपेक्ष कार्य करेंगे, उनसे शपथ लेते समय ईश्वर का नाम लेने के लिए कहना कोई मतलब नहीं रखता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राजनीति में व्यक्ति को अधार्मिक कार्य करने पड़ते हैं, इसलिए ‘ईश्वर’ को इसमें शामिल करना अनुचित है। सभा के कुछ सदस्य इस बात पर भी अड़े थे कि शपथ ग्रहण से पहले शपथ ग्रहण होना चाहिए, जिसमें ‘ईश्वर’ का जिक्र न हो। उनका मानना था कि ‘ईश्वर’ शब्द को बाद में रखने का मतलब है कि इसका महत्व कम हो गया है। एक सदस्य ने इस बदलाव के पक्ष में जोरदार तर्क दिया। उनका कहना था कि भारतीय जनता की पसंद के अनुसार बनाए गए संविधान में शपथ की शुरुआत ‘ईश्वर’ के नाम पर शपथ लेने से होनी चाहिए। इस बदलाव को सुनिश्चित करने वाले संशोधन को अंततः संविधान सभा ने स्वीकार कर लिया। सभा से संशोधित तीसरी अनुसूची को 26 अगस्त, 1949 को संविधान में अपना लिया गया। 16 अक्टूबर, 1949 को अनुसूची पर फिर चर्चा की गई, लेकिन कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया गया।

आइए जानते हैं कि 26 अगस्त, 1949 को शपथ के शब्दों पर किन सदस्यों ने क्या-क्या कहा। यहां हम कुछ प्रमुख सदस्यों के तर्कों को ही रख रहे हैं जिन्हें पढ़कर आप गदगद हो जाएंगे। इस विषय पर बहस की शुरुआत डॉ. आंबेडकर की तरफ से संशोधन पेश किए जाने पर हुई। डॉ. आंबेडकर ने कहा- माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः श्रीमान मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करता हूं कि ” तृतीय अनुसूची में घोषणाओं के प्रपत्र 1 में’ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं अथवा शपथ लेता हूं ‘ शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाए :- सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं, ईश्वर की शपथ लेता हूं श्रीमान, मैं यह प्रस्ताव भी उपस्थित करता हूं कि “तृतीय अनुसूची में घोषणाओं के प्रपत्र 2 में सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं अथवा शपथ लेता हूं शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाए :- ‘Solemnly affirm’ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं, ईश्वर की शपथ लेता हूं!

पाकिस्तान में पुलिस ने मां-बेटी को सीमेंट के कमरे से बचाया.

0

मां और किशोर बेटी को घर में बंद कर दिया गया और रिश्तेदारों ने बाहर ईंट की दीवार बना दी। उनका ‘अपराध’ – वे संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर अपने रिश्तेदारों की मांग के आगे नहीं झुके. उस घटना में दोनों की जान भी जा सकती थी. लेकिन पड़ोसियों और पुलिस की पहल से दीवार तोड़कर दोनों को मुक्त कराया गया.

जगह है पाकिस्तान. हालाँकि, ‘दंड’ का प्रकार भारतीय सम्राट अकबर के एक कुख्यात कृत्य से मेल खाता है। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें भी अपनी दरबारी नर्तकी अनारकली से प्यार हो गया था और उन्होंने उसे ‘जीवित कब्र’ दे दी थी। अकबर ने अनारकली के बेटे सेलिम के साथ रोमांस को रोकने के लिए अनारकली के घर के बाहर एक दीवार बनवाई। कहा जाता है कि अनारकली की वहीं मौत हो गई. हालाँकि, पाकिस्तानी महिला और उसकी बेटी जीवित रहने में सफल रहीं।

महिला पाकिस्तान के सिंध प्रांत के शहर लतीफाबाद की रहने वाली है। उसने पुलिस को बताया कि उसने उन्हें पकड़ लिया था और उन्हें मारने की कोशिश की थी. नाम है सुहैल. मकान के कामों को लेकर वह काफी समय से महिला और उसकी बेटी को प्रताड़ित कर रहा था। महिला ने शिकायत की कि घटना वाले दिन उन्हें जबरदस्ती कमरे में ले जाकर बंद कर दिया गया. उससे पहले ही मकान का बैनामा ले लिया गया। उनके लिए घटना की जानकारी किसी को देना संभव नहीं था, जब तक कि पड़ोसियों ने खुद इस मामले पर ध्यान नहीं दिया।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फारूक लिंजर ने कहा कि स्थानीय निवासियों से सूचना मिलने के बाद वे मौके पर पहुंचे और महिला और उसकी बेटी को बचाया। साथ ही उन्होंने कहा कि घटना का मुख्य आरोपी महिला का बेटा वासुर और उसका बेटा है. पुलिस इन दोनों की तलाश कर रही है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सरकार ने संसद में बिना किसी चर्चा के नई आतंकवाद विरोधी नीति की घोषणा कर दी. विपक्ष का आरोप है कि खैबर-पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में सेना का दमन करने के मकसद से यह रणनीति अपनाई गई.

आलोचना झेल रही पाकिस्तानी सरकार ने मंगलवार को कहा कि उनकी देश के किसी भी हिस्से में कोई बड़ा सैन्य अभियान शुरू करने की कोई योजना नहीं है. संयोग से, पिछले शनिवार को पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शरीफ की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय सर्वोच्च योजना’ पर शीर्ष समिति की बैठक में नई आतंकवाद विरोधी योजना को मंजूरी दी गई थी। सोमवार को पाक रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ‘ऑपरेशन आजम-ए-इस्तेकाम’ नाम से आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन की घोषणा की। पाकिस्तानी सेना ने करीब एक दशक पहले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के लड़ाकों के खिलाफ ‘ऑपरेशन राह-ए-निजात’ चलाया था। डेढ़ साल पहले. सेना-टीटीपी झड़प के कारण पाक-अफगानिस्तान सीमा पर कई लोग विस्थापित हुए। माना जा रहा है कि इस बार भी ऐसा खतरा है. पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सहित विपक्ष का एक वर्ग पहले ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज)-पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी गठबंधन सरकार के कदम पर सवाल उठा चुका है। जमीयत उलेमा इस्लाम-फज़ल और अवामी नेशनल पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने भी शरीफ सरकार के नए आतंकवाद विरोधी अभियान का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे सिलसिलेवार हमलों को लेकर खुद रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने चिंता जताई! सोमवार को पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान एक राज्य के रूप में उन लोगों की रक्षा करने में विफल रहा है जिन्हें धार्मिक कारणों से सताया जा रहा है। इस देश में कोई भी धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है।”

हाल के वर्षों में पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध में हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों पर लगातार हमले हुए हैं। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमलों के अलावा, कई धार्मिक अल्पसंख्यक मारे गए। मृतकों में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ नेशनल काउंसिल के सदस्य सुरेन सिंह जैसे जाने-माने चेहरे भी शामिल हैं। कई मामलों में इस्लाम के अपमान की अफवाहें फैलाकर धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है।

पाकिस्तान की संसद ने सोमवार को धार्मिक निंदा के आरोप में अल्पसंख्यकों के नरसंहार की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सरकार ने कहा है कि भविष्य में ऐसी घटना होने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी. रक्षा मंत्री आसिफ ने आरोप लगाया, ”न केवल गैर-मुस्लिमों पर, बल्कि मुसलमानों के छोटे समूहों पर भी हमले किए जा रहे हैं।” माना जा रहा है कि उनका इशारा शिया और अहमदिया समुदायों पर हमलों की हालिया घटनाओं की ओर था।

1563 उम्मीदवारों के लिए आयोजित नीट-यूजी पुनः परीक्षा के परिणाम घोषित.

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी एनटीए ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा नेट के 1563 छात्रों को अतिरिक्त अंक रद्द होने के बाद दोबारा परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी है। उस परीक्षा के नतीजे प्रकाशित हो चुके हैं. एनटीए ने शुक्रवार को उन अभ्यर्थियों के नतीजे जारी किए। यदि आप उनकी वेबसाइट पर जाते हैं, तो आप परिणाम देख सकते हैं। फाइनल आंसर शीट (अंसार की) रविवार को ही जारी की गई थी.

NEET-UG परीक्षा का रिजल्ट 4 मई को जारी किया गया था. इसी दिन लोकसभा चुनाव नतीजे भी घोषित हुए. लेकिन विवाद की शुरुआत नीट रिजल्ट से हुई. इसमें देखा जा सकता है कि 67 लोग एक साथ फर्स्ट बने. 720 में से 720 अंक मिले। यानी वे एक भी निशान नहीं काट सके. जो नेट के इतिहास में दुर्लभ है. इससे पहले अधिकतम चार लोगों को सबसे ज्यादा अंक पाने वाले पहले व्यक्ति के रूप में देखा जाता था। इतना ही नहीं नेट के रिजल्ट ने और भी कई विवाद खड़े कर दिए हैं. यह देखा जा सकता है कि पूर्ण अंक प्राप्त करने वाले पहले 67 छात्रों में से कई ने एक विशेष परीक्षा केंद्र से परीक्षा दी थी। सवाल उठता है, लेकिन क्या परीक्षा से पहले प्रश्न लीक हो गया था? कुछ को पहले ही प्रश्न मिल गया है? देखने में आया कि कई लोगों को कुछ ऐसे अंक मिल गये, जो सामान्य तौर पर मिलना संभव नहीं है. इस सवाल के जवाब में एनटीए ने कहा कि कुछ अभ्यर्थियों को परीक्षा केंद्र में कम समय होने के कारण अतिरिक्त अंक दिए गए. बाद में जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में उठा तो केंद्र सरकार ने वहां बताया कि अतिरिक्त अंक रद्द कर दिए जाएंगे. इससे 1563 लोगों की संख्या कम हो जायेगी. वे चाहें तो दोबारा परीक्षा दे सकते हैं। हालाँकि, दूसरी बार परीक्षा देना वैकल्पिक है।

यह देखा जा सकता है कि नियत दिन पर 813 लोग दूसरी बार परीक्षा में बैठे। जो कुल अभ्यर्थियों के आधे से थोड़ा अधिक है. यानी कई छात्र मौका मिलने पर भी परीक्षा में नहीं बैठे. जिन छह शहरों में उम्मीदवारों ने यह अतिरिक्त अंक हासिल किया, वहां परीक्षा का दूसरा दौर भी आयोजित किया गया। लेकिन इस बार परीक्षा केंद्र बदल दिया गया. उस परीक्षा के नतीजे रविवार को जारी किये गये.

NEET प्रश्न लीक विवाद के बीच, केंद्र सरकार ने NTA द्वारा आयोजित कई परीक्षाओं को स्थगित कर दिया। विभिन्न विषयों के लिए शोध प्रवेश नेट को भी परीक्षा के एक दिन बाद रद्द घोषित कर दिया गया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने माना कि एनटीए प्रक्रिया में गड़बड़ियां हैं. उन्होंने यह भी बताया कि नेट का प्रश्न डार्क वेब पर लीक हो गया है। एनटीए को निखारने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। विभिन्न राज्यों में नेट और नेट प्रश्न लीक से संबंधित संदिग्ध गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। कथित तौर पर, पैसे के बदले परीक्षा से एक दिन पहले प्रश्न बेचे गए थे। कई छात्रों ने इसे खरीदा है. छात्रों और अभिभावकों के एक वर्ग ने नेट रद्द करने की मांग भी उठाई. हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट NET को रद्द करने से सहमत नहीं था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. हालाँकि, कोर्ट अभी काउंसलिंग प्रक्रिया पर रोक लगाने से हिचक रहा है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजस्थान के कोटा में हुई आत्महत्या की घटनाओं का इस बार के नीट रिजल्ट से कोई संबंध नहीं है.

प्रश्नोत्तरी सहित कई शिकायतें मिली हैं। सुप्रीम कोर्ट में सात मामले दायर किए गए हैं. उन सभी मामलों की सुनवाई शुक्रवार को कोर्ट में हुई. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की सेवानिवृत्त पीठ की सुनवाई में अनियमितता का आरोप लगाते हुए सीबीआई जांच का अनुरोध दायर किया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जांच का आदेश देने से पहले सभी पक्षों से जवाब मांग रहा है.

शुक्रवार की सुनवाई में याचिकाकर्ता ने कोटा में हुई आत्महत्या की घटना का जिक्र किया. इस संबंध में जस्टिस विक्रम नाथ की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा, ”इस मामले में बेवजह भावुक होकर सवाल पूछना ठीक नहीं है.” नीट रिजल्ट का कोटा में आत्महत्या की घटना से कोई लेना-देना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच याचिका पर जारी किया नोटिस. पीठ ने कहा, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) को अगले दो सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा गया है। इसके अलावा कोर्ट ने याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया. उन्हें जवाब देने के लिए 8 जुलाई तक का समय दिया गया है. इसी दिन इस मामले की अगली सुनवाई है.

ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट एनआईटी में एक साथ 67 अभ्यर्थियों के पहली रैंक हासिल करने पर देशभर में विवाद खड़ा हो गया। बाद में पता चला कि प्रश्न पत्र और कुछ परीक्षा केंद्रों में समय की दिक्कत के कारण 1563 अभ्यर्थियों को अतिरिक्त अंक दिए गए। लेकिन जब रैंकिंग को लेकर विवाद सामने आया तो विभिन्न हलकों ने इस अतिरिक्त संख्या के औचित्य पर सवाल उठाते हुए विरोध जताया. विपक्षी राजनीतिक दल केंद्र के खिलाफ चले गए।

मानहानि मामले में मेधा पाटकर को पांच महीने की जेल?

0

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को बदनाम करने के आरोप में पांच महीने की जेल! दिल्ली कोर्ट ने सजा सुनाते हुए कोर्ट का आदेश सुनते हुए मेधा पाटकर ने कहा, ”सच्चाई कभी हार नहीं सकती. हमने कभी किसी को बदनाम करने की कोशिश नहीं की. हमने बस अपना काम किया।” दिल्ली की एक अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को मानहानि मामले में पांच महीने जेल की सजा सुनाई है. मेधा के खिलाफ मानहानि का मामला दिल्ली के मौजूदा उपराज्यपाल विनयकुमार सक्सेना ने दायर किया था। सोमवार को दिल्ली मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने कहा कि मेधा की उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें एक या दो साल जेल जैसी कोई कठोर सजा देने का आदेश नहीं दिया जा रहा है. हालाँकि, अदालत ने कहा कि योग्यता के झूठे दावे के कारण सक्सेना का सामाजिक सम्मान खो गया है। इस कारण मेधा को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया है.

मेधा गुजरात में नर्मदा बचाओ आंदोलन के चेहरों में से एक के रूप में रातों-रात सुर्खियों में आ गईं। 2000 में, सक्सेना ‘नेशनल काउंसिल ऑफ सिविल लिबर्टीज’ नामक संगठन के अध्यक्ष थे। इस संगठन ने शुरू से ही नर्मदा बचाओ आंदोलन का विरोध किया। सक्सेना के संगठन ने एक विज्ञापन जारी कर नर्मदा नदी पर बांध बनाने के खिलाफ बुद्धिजीवियों के आंदोलन का विरोध किया था. मेधा ने जवाब में एक प्रेस बयान जारी किया.

उस बयान में मेधा ने दावा किया था कि सक्सेना हवाला के जरिए विदेश में मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल था. मेधा ने दिल्ली के मौजूदा उपराज्यपाल को गुजरात सरकार का ‘एजेंट’ भी कहा. लेकिन योग्यता के दावे से “परेशान” सक्सेना ने 2001 में अहमदाबाद की एक अदालत में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया। 2003 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया था. अदालत ने सोमवार को मेधा के खिलाफ अपने आदेश में कहा, “यह स्पष्ट है कि प्रेस बयान मानहानि के इरादे से प्रकाशित किया गया था।” लेकिन मेधा को शायद अभी जेल नहीं जाना पड़ेगा. क्योंकि जज ने सोमवार को कहा, इस सजा को अगले महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है. कोर्ट का आदेश सुनकर मेधा ने कहा, ”सच्चाई कभी हार नहीं सकती. हमने कभी किसी को बदनाम करने की कोशिश नहीं की. हमने बस अपना काम किया. हम अदालत के आदेश का विरोध करेंगे।” कई लोगों को लगता है कि मेधा इसके बाद हाई कोर्ट जा सकती हैं.

तीस्ता नदी को बचाने के लिए जलपाईगुड़ी में नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिला परिषद सभागार में ‘विपन्ना तीस्ता’ (तीस्ता बचाओ) पर चर्चा हुई. पूर्व केंद्रीय मंत्री पवनकुमार बंसल, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, ‘तीस्ता के प्रभावित नागरिक’ के महासचिव ग्यात्स लेप्चा, नदी बचाओ आंदोलन के तापस दास, पूर्व विधायक देबप्रसाद रॉय और अन्य उपस्थित थे।

मेधा ने अपने भाषण में व्यापक पर्यावरण, नदी और आजीविका को बचाने के मद्देनजर तीस्ता नदी को बचाने के लिए एक जन आंदोलन का आह्वान किया। ग्याट्स ने तीस्ता पर एक के बाद एक बांध और जलविद्युत परियोजनाओं के परिणामस्वरूप सिक्किम में ग्रामीण समाज और आम लोगों की वर्तमान स्थिति का वर्णन किया है। बंसल की बातचीत से भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे और समग्र जल राजनीति का मुद्दा सामने आता है। आरंभ में प्रोफेसर रूपक पाल ने सम्मेलन का उद्देश्य बताया. गंगा कटाव पर एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई. आयोजकों की ओर से अमर्त्य रॉय ने कहा, ”तीस्ता के आसपास सम्मेलन आयोजित करने का एकमात्र उद्देश्य इस नदी को बचाना है. फिर हम जीवित रहेंगे. फिलहाल हमारा लक्ष्य तीस्ता के मुद्दों को दिल्ली और कोलकाता के कार्यालयों तक पहुंचाना है कन्वेंशन द्वारा उठाई गई मांगों को बताना और इस लक्ष्य तक जनमत को आकार देना।”

चर्चा तीस्ता के आसपास बांधों के निर्माण, ग़ज़लदोबर तीस्ता परियोजना और इसके परिणामस्वरूप मैदानी इलाकों में जल संकट के बारे में हुई। एक ओर, सिक्किम बांध बनाकर और अन्यत्र जलविद्युत बेचकर अपने पर्यावरण को संरक्षित कर रहा है, दूसरी ओर, ग़ज़लडोबा बैराज नदी के सामान्य प्रवाह को प्रभावित कर रहा है।

साहित्यकार देबेश रॉय ने अपने उपन्यास ‘तिस्ता पारेर व्रक्तांता’ में जीवंत तीस्ता के लंबे रास्ते में बढ़ती नागरिकता की एक अनूठी कहानी लिखी है। लेकिन दिन-ब-दिन पतन के पंजे उस तीस्ता पर भी आ गए हैं। यह नदी उत्तरी बंगाल और बांग्लादेश की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। तीस्ता को उसका गौरव लौटाने के लिए जलपाईगुड़ी से नागरिक आंदोलन शुरू हुआ।

असम बाढ़ से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के 61 वन शिविर प्रभावित.

0

असम में बाढ़ से 44 की मौत, काजीरंगा नेशनल पार्क में घुसा पानी, मदद का आश्वासन प्रधानमंत्री के असम वन विभाग ने सोमवार को कहा कि काजीरंगा नेशनल पार्क के 233 वन शिविरों में से 62 अब पानी में डूबे हुए हैं. बाढ़ के कारण वन्यजीवों के मरने का डर है. असम भारी बारिश से प्रभावित. पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य के बड़े इलाके बाढ़ की चपेट में हैं. 44 लोगों की मौत हो चुकी है. ढाई लाख से ज्यादा लोग प्रभावित. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा को फोन किया और हर संभव मदद का आश्वासन दिया।

हिमंत ने सोमवार को एक्स हैंडल पर मोदी के फोन के बारे में लिखा, ‘माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कुछ देर पहले असम में बाढ़ की स्थिति के बारे में जानकारी लेने के लिए मुझे फोन किया था. मैंने उन्हें बताया कि असम और अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में भारी बारिश ने बाढ़ की दूसरी लहर पैदा कर दी है। मैंने उन्हें ऊपरी असम के जिलों में राज्य सरकार द्वारा उठाए गए राहत और बचाव उपायों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने मुझे इस संकट में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया है।” असम सरकार के सूत्रों ने कहा, लगातार बारिश के कारण ब्रह्मपुत्र, बुरीदिहिंग, सुबनसिरी, धनसीडी, जिया भराली, पुथिमारी, बेकी, गुरुंग, संकोश सहित विभिन्न नदियां खतरे के स्तर पर पहुंच गई हैं। ब्रह्मपुत्र में बाढ़ के कारण काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का बड़ा हिस्सा पहले ही पानी में डूब चुका है। गैंडा, जंगली भैंसा, हिरण समेत विभिन्न जंगली जानवरों की मौत का खतरा बढ़ रहा है। असम वन विभाग ने सोमवार को कहा कि काजीरंगा में 233 वन शिविरों में से 62 अब पानी में डूबे हुए हैं। लगभग हर साल, जब काजीरंगा के निचले इलाकों में बाढ़ आती है, तो वन्यजीव राष्ट्रीय राजमार्ग 715 को पार करके कार्बी आंगलोंग पहाड़ियों में शरण लेते हैं। उस समय तेज रफ्तार गाड़ियों की चपेट में आने से कई लोगों की मौत हो गई थी. ऐसे में असम वन विभाग उस राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात नियंत्रण पर ध्यान दे रहा है.

रेमल बारिश के बाद असम में बाढ़. स्थिति और खराब हो गई. बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है. शनिवार को राज्य में तीन और लोगों की मौत हो गई. असम सरकार के बाढ़ बुलेटिन में इसकी जानकारी दी गई है.

असम में बाढ़ से गांव के गांव बह गए हैं. राज्य और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल बचाव अभियान चला रहे हैं। शनिवार को इंसानों के अलावा 89 जानवरों को भी बचाया गया. हालांकि, असम की तीन महत्वपूर्ण नदियों का पानी अभी भी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है. जब तक वहां पानी नहीं घटेगा, बाढ़ की स्थिति में सुधार होने की संभावना नहीं है.

शुक्रवार तक बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या 350,000 थी. शनिवार को यह छह लाख का आंकड़ा पार कर गया। नागांव जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है. वहां अकेले बाढ़ प्रभावित लोगों की संख्या ढाई लाख से ज्यादा है. असम आपदा प्रतिक्रिया बल के आंकड़े कहते हैं कि राज्य के कम से कम 10 जिले अभी भी बाढ़ से प्रभावित हैं। बराक असम की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। नदी पिछले गुरुवार से ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. इसके अलावा, ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी कोपिली, बराक की सहायक नदी कोशियारा का पानी भी खतरे के स्तर से ऊपर है। सड़कें, पुल और घर बह गए. बीघे के बाद अब बीघे की खेती की जमीन भी बाढ़ से प्रभावित हो रही है.

असम में शनिवार को बाढ़ के कारण मरने वाले तीन नए लोग कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिलों के निवासी थे। आपदा प्रतिक्रिया बल के सदस्य स्थिति से निपटने के लिए दिन-रात बचाव कार्य कर रहे हैं। कई जगहों से संपर्क टूट गया है. ट्रेनों की आवाजाही पर भी असर पड़ा है.

असम पुलिस और जिला प्रशासन ने बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं और कई प्रतिबंध लगाए हैं। रात में स्थानीय लोगों की आवाजाही पर भी प्रतिबंध जारी किया गया है। राजधानी गुवाहाटी के बड़े इलाके अभी भी पानी में डूबे हुए हैं।

रेमल के प्रभाव से असम में पिछले मंगलवार से बारिश शुरू हो गई. राज्य के विभिन्न हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश हो रही है. इसीलिए बाढ़ की स्थिति निर्मित होती है. पूर्वोत्तर भारत में मॉनसून पहले ही प्रवेश कर चुका है.

झारखंड के लातेहार में चार माओवादी गिरफ्तार.

0

झारखंड के पालमुर जंगल में पुलिस ने चार हथियारबंद माओवादियों को पकड़ा है, सूत्रों से मिली जानकारी के बाद ऑपरेशन बरवाडी के एसडीपीओ वेंकटेश प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ”दो देशी पिस्तौल, आठ कारतूस, एक मोबाइल फोन और तीन मोटरसाइकिल बरामद की गई हैं.” गिरफ्तार कर लिया गया.” पलामू राष्ट्रीय झारखंड पुलिस ने उद्यान लागोआ इलाके के पास सड़क पर ‘नाकाबंदी अभियान’ चलाकर चार माओवादियों को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने कहा कि गिरफ्तार किए गए लोग झारखंड जनमुक्ति परिषद (जेजेएमपी) के सदस्य थे, जो प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) से अलग हुआ एक समूह है।

यह ऑपरेशन सोमवार को राजधानी रांची से 160 किलोमीटर दूर लातेहार जिले के बरवाडी उपमंडल में हुआ. बरवाडी के एसडीपीओ (डिविजनल पुलिस ऑफिसर) वेंकटेश प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “गिरफ्तार किए गए लोगों के पास से दो देशी पिस्तौल, आठ कारतूस, एक मोबाइल फोन और तीन मोटरसाइकिल जब्त किए गए हैं।” एक पुलिस सूत्र ने बताया कि सड़क पर छापेमारी कर एक मोटरसाइकिल पर सवार चार माओवादियों को गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तार लोगों की पहचान बिटन लोहरा, लक्ष्मण लोहरा, गुड्डु उर्फ ​​मच्छिन्द्र लोहरा और वीरेंद्र सिंह के रूप में हुई है. पुलिस ने यह भी बताया कि लातेहार जिले में इनके खिलाफ रंगदारी की कई शिकायतें हैं. एक पुलिस सूत्र ने बताया कि सड़क पर छापेमारी कर एक मोटरसाइकिल पर सवार चार माओवादियों को गिरफ्तार किया गया.

झारखंड में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में चार नक्सली ढेर, हथियार और गोला-बारूद बरामद सिंहभूम जिले के पुलिस अधीक्षक आशुतोष शेखर ने बताया कि गोपनीय सूत्रों से सूचना मिलने के बाद सोमवार सुबह जंगल इलाके में तलाशी अभियान शुरू किया गया था. उस सर्च ऑपरेशन के दौरान हुई मुठभेड़ में अब तक चार नक्सली मारे जा चुके हैं. झारखंड में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प से खून-खराबा हुआ. पुलिस ने कहा कि सोमवार सुबह पश्चिम सिंहभूम जिले में दो पक्षों के बीच गोलीबारी में चार माओवादी मारे गए।

सिंहभूम जिले के पुलिस अधीक्षक आशुतोष शेखर ने बताया कि गुप्त सूत्रों से सूचना मिलने के बाद सोमवार सुबह वन क्षेत्र में तलाशी अभियान शुरू किया गया. तभी माओवादियों ने सुरक्षा बलों पर फायरिंग कर दी. सुरक्षा बलों ने भी जवाबी कार्रवाई की. मुठभेड़ में अब तक चार नक्सली मारे गये हैं. लेकिन सर्च ऑपरेशन जारी है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक मारे गए माओवादियों के पास से हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया है.

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के जंगल में गोलीबारी में प्रतिबंधित संगठन सीपीआईएमएल (माओवादी) के कम से कम आठ सदस्य मारे गए थे. सुरक्षा बल का एक जवान भी मारा गया. छत्तीसगढ़ पुलिस ने कहा कि नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों की सीमा से लगे पहाड़ी-जंगली इलाकों से नक्सली गुरिल्लाओं पीएलजीए की ‘मूवमेंट’ की जानकारी मिली थी. इसके बाद सर्च ऑपरेशन में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप (डीआरजी), छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स और सेंट्रल पैरामिलिट्री आईटीबीपी की संयुक्त फोर्स को बुलाया गया. इस ऑपरेशन में आठ नक्सली मारे गये. इससे पहले 5 जून को नारायणपुर में ही मुठभेड़ में छह नक्सली मारे गए थे.

मतदान से ठीक पहले माओवादी गुरिल्लाओं ने ओडिशा के नुआपारा पर हमला कर दिया. ओडिशा पुलिस के विशेष अभियान समूह (एसओजी) का एक जवान, विशेष रूप से प्रशिक्षित माओवादी विरोधी बल, सोमवार को कालाहांडी लोकसभा क्षेत्र के एक पहाड़ी, जंगली इलाके में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो गया। “गिरफ्तार किए गए लोगों के पास से दो देशी पिस्तौल, आठ कारतूस, एक मोबाइल फोन और तीन मोटरसाइकिल जब्त किए गए हैं।” एक पुलिस सूत्र ने बताया कि सड़क पर छापेमारी कर एक मोटरसाइकिल पर सवार चार माओवादियों को गिरफ्तार किया गया.

ओडिशा पुलिस के एडीजी देवदत्त सिंह ने कहा, ”सोमवार सुबह तड़के छत्तीसगढ़ सीमा के पास शिवनारायणपुर के पास सुनबेरा अभयारण्य में ओएसओजी और स्थानीय कोमना पुलिस स्टेशन के बीच गोलीबारी हुई. कुछ घंटों की लड़ाई में एसओजी का एक जवान घायल हो गया.” फिलहाल वह खतरे से बाहर हैं. कालाहांडी और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे आसपास के जिले लंबे समय से ‘माओवादी हॉटस्पॉट’ के रूप में जाने जाते हैं। पिछले डेढ़ दशक में सीपीआई (माओवादी) गुरिल्ला बल पीएलजीए की सुरक्षा बलों से कई बार झड़प हो चुकी है. मतदान के दिन पुलिस ने वहां अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराने के लिए पहले ही नक्सली हमले की आशंका की जानकारी दे दी थी. लेकिन वह भी अशांति से नहीं बच सका।

आखिर कब कब हुई है लोकसभा अध्यक्ष के लिए चुनाव की तैयारी?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा अध्यक्ष के लिए चुनाव की तैयारी कब-कब हुई है! 18वीं लोकसभा के लिए ज्यादातर सांसदों ने शपथ ले ली है। अब बुधवार को लोकसभा की औपचारिक कार्यवाही शुरू होगी। कल लोकसभा स्पीकर भी चुना जाएगा, ताकि सदन सुचारू रूप से चल सके। बीजेपी और एनडीए की ओर से इस बार भी ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। पिछली बार सर्वसम्मति से वो स्पीकर चुने गए थे। लेकिन इस बार इंडिया गठबंधन ने भी स्पीकर पद के लिए केरल की मावेलीकरा सीट से आठ बार सांसद रहे के. सुरेश को चुनाव मैदान में उतारा है। आमतौर पर लोकसभा स्पीकर को बिना चुनाव के लिए ही चुन लिया जाता है, लेकिन इस बार सरकार और विपक्ष में सहमति नहीं होने से स्पीकर का चुनाव होना तय है। स्पीकर पद के उम्मीदवार के. सुरेश भी केरल की मावेलीकारा से सांसद हैं। इसके अलावा ये भी इत्तेफाक है कि इस वक्त स्पीकर का चुनाव इसी मुद्दे को लेकर था कि क्या सरकार विपक्ष को उपाध्यक्ष पद देगी या नहीं। इसी मुद्दे को लेकर था कि क्या सरकार विपक्ष को उपाध्यक्ष पद देगी या नहीं। यानी 1952 में कांग्रेस ने विपक्ष को डिप्टी स्पीकर का पद नहीं दिया, और आज वही पार्टी लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार से उपाध्यक्ष पद मांग रही है।कांग्रेस ने विपक्ष को डिप्टी स्पीकर का पद नहीं दिया, और आज वही पार्टी लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार से उपाध्यक्ष पद मांग रही है।लेकिन ऐसा पहली बार नहीं होगा जब लोकसभा स्पीकर का चुनाव हो रहा है। पहले भी दो बार लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो चुका है।

1952 में देश के पहले आम चुनाव के बाद संसद में लोकसभा स्पीकर पर सहमति नहीं बन पाई और चुनाव हुआ। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के पूर्व सदस्य जी.वी. मावलंकर को अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव रखा। मालवीय का समर्थन तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री सत्य नारायण सिन्हा, दरभंगा मध्य सांसद एस.एन. दास और गुड़गांव सांसद पंडित ठाकुर दास भार्गव ने किया। लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापक और 16 अन्य विपक्षी सांसदों में से एक, कन्नूर के सांसद ए.के गोपालन ने शांताराम मोरे के पक्ष में प्रस्ताव रखा। मोरे भारतीय किसान और मजदूर पार्टी के संस्थापक थे। विपक्ष के सांसदों ने उनका समर्थन किया।

1952 में सदन में स्पीकर का चुनाव हुआ। मावलंकर को 394 वोटों के साथ स्पीकर के रूप में चुना गया, जबकि 55 सांसदों ने उनके नामांकन का विरोध किया। संयोग से इस बार भी विपक्ष के स्पीकर पद के उम्मीदवार के. सुरेश भी केरल की मावेलीकारा से सांसद हैं। इसके अलावा ये भी इत्तेफाक है कि इस वक्त स्पीकर का चुनाव इसी मुद्दे को लेकर था कि क्या सरकार विपक्ष को उपाध्यक्ष पद देगी या नहीं। यानी 1952 में कांग्रेस ने विपक्ष को डिप्टी स्पीकर का पद नहीं दिया, और आज वही पार्टी लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार से उपाध्यक्ष पद मांग रही है।

दूसरी बार लोकसभा स्पीकर का चुनाव 1976 में हुआ। दरअसल 1975 में इमरजेंसी के ऐलान के बाद 5वीं लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया गया था। इसके बाद 1976 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कांग्रेस सांसद बी आर भगत को स्पीकर के रूप में चुनने का प्रस्ताव रखा। संसदीय कार्य मंत्री रघु रमैया द्वारा इसका समर्थन किया गया।बता दें कि लेकिन ऐसा पहली बार नहीं होगा जब लोकसभा स्पीकर का चुनाव हो रहा है। पहले भी दो बार लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो चुका है। 1952 में देश के पहले आम चुनाव के बाद संसद में लोकसभा स्पीकर पर सहमति नहीं बन पाई और चुनाव हुआ। आमतौर पर लोकसभा स्पीकर को बिना चुनाव के लिए ही चुन लिया जाता है, लेकिन इस बार सरकार और विपक्ष में सहमति नहीं होने से स्पीकर का चुनाव होना तय है। स्पीकर पद के उम्मीदवार के. सुरेश भी केरल की मावेलीकारा से सांसद हैं। इसके अलावा ये भी इत्तेफाक है कि इस वक्त स्पीकर का चुनाव इसी मुद्दे को लेकर था कि क्या सरकार विपक्ष को उपाध्यक्ष पद देगी या नहीं।पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के पूर्व सदस्य जी.वी. मावलंकर को अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव रखा। वहीं भावनगर के सांसद पी एम मेहता ने जगन्नाथ राव जोशी के नाम का प्रस्ताव रखा। जनसंघ के जोशी का समर्थन हाजीपुर के सांसद डी एन सिंह (कांग्रेस ओ) ने किया। भगत को बाद में स्पीकर चुन लिया गया। उनके पक्ष में 344 वोट आए और 58 वोट उनके खिलाफ गए।

आखिर किन सात सांसदों ने नहीं ली लोकसभा में शपथ ?

हाल ही में सात सांसदों ने लोकसभा में शपथ नहीं ली है! 18वीं लोकसभा के पहले सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को राहुल गांधी, अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी और संबित पात्रा समेत कई सासंदों ने संसद सदस्य के रूप में शपथ ली। लेकिन अभी भी सात ऐसे सांसद हैं, जिन्होंने शपथ नहीं ली है। प्रोटेम स्पीकर ने पंजाब से सांसद और खालिस्तानी समर्थक अमृतपाल का नाम लिया, लेकिन अमृतपाल की मौजूदगी नहीं थी। इसके अलावा सपा सांसद अफजाल अंसारी सदन में तो आए, लेकिन शपथ नहीं ले सके। आइए बताते हैं 18वीं लोकसभा में किस-किस सांसद ने शपथ नहीं ली है। मंगलवार को पंजाब के सांसदों के शपथ दिलाई जा रही थी। लोकसभा सेक्रेटरी जनरल ने डिब्रूगढ़ की जेल में बंद कथित खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह का नाम शपथ लेने के लिए पुकारा। इससे पहले अगर ये सांसद शपथ नहीं लेते हैं, तो ये सभी सांसद लोकसभा स्पीकर के लिए वोटिंग में शामिल नहीं हो पाएंगे।हालांकि खडूर साहिब सीट से निर्वाचित हुए सिंह सदन में उपस्थित नहीं थे। अमृतपाल सिंह को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है, हाल ही में उनके खिलाफ एनएसए की अवधि को एक साल के लिए बढ़ाने का फैसला किया गया था। इसी के चलते वो जेल से बाहर नहीं आ पाए। लेकिन लोकसभा में नियमों के तहत शपथ के लिए अमृतपाल सिंह का नाम भी लिया गया था।

समाजवादी पार्टी पार्टी के सांसद अफजाल अंसारी को भी लोकसभा में शपथ नहीं दिलाई गई। वो सदन में पहुंचे जरूर थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के चलते उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। अफजाल संसद पहुंचे और कुछ देर अखिलेश यादव के बगल में भी बैठे। दरअसल लोकसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें सदन की कारवाई में भी भाग लेने से रोका गया था। चूंकि शपथ ग्रहण भी लोकसभा की कार्यवाही का हिस्सा है, इसलिए अफजाल को शपथ नहीं दिलाई गई।

इस बार जम्मू-कश्मीर की बारामूला लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार इंजीनियर राशिद चुनाव जीता है। राशिद टेरर फंडिंग से जुड़े मामले में जेल में बंद है। राशिद ने शपथ ग्रहण के लिए अंतरिम जमानत मांगी थी। लेकिन फिलहाल राशिद को जमानत नहीं मिली है। हालांकि पटियाला हाउस कोर्ट एक जुलाई को मामले को सूचीबद्ध किया है। अब तक जिन सात सांसदों ने शपथ नहीं ली है, उसमें तीन टीएमसी के तीन, कांग्रेस के एक, समाजवादी पार्टी के एक और दो निर्दलीय सांसद हैं। कांग्रेस के शशि थरूर, टीमएसी के दीपक अधिकारी, शत्रुघ्न सिन्हा और हाजी नूरुल इस्लाम ने भी अभी तक शपथ नहीं ली है। वहीं निर्दलीय अमृतपाल सिंह और इंजीनियर राशिद भी शपथ नहीं ले पाए।

जिन सासंदों ने शपथ नहीं ली है, उन्हें न तो सदन में वोट देने की इजाजत होगी और न ही सांसद की कोई भी सुविधा मिलेगी। कल लोकसभा अध्यक्ष पद का चुनाव होना है। यही नहीं आपको बता दें कि नेता प्रतिपक्ष का कद कैबिनेट रैंक का होता है। नेता विपक्ष सीबीआई निदेशक सहित कई अहम पदों के लिए बनी सिलेक्ट कमिटी का मेंबर होता है। वहीं वह संसद की प्रतिष्ठित पीएसी लोकलेखा समिति का अध्यक्ष होता है। दरअसल, पीएम मोदी लोकसभा में नेता सदन हैं। कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी के नेता विपक्ष होने के बाद अगले पांच साल वह पीएम के सामने स्वाभाविक विकल्प के रूप में उभरेंगे। गौरतलब है कि 2014 और 2019 आम चुनाव में कांग्रेस को उतनी सीटें नहीं मिली थी, जिससे नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिल सके।पार्टी का मानना था कि अब वक्त आ गया है कि राहुल गांधी को आगे बढ़कर पार्टी को लीड करना चाहिए। जिस तरह से राहुल गांधी ने अपनी भारत छोड़ो यात्रा के दौरान पार्टी की अगुवाई की, पार्टी चाहती थी कि वैसा ही नेतृत्व लोकसभा में पार्टी का करें। पार्टी के भीतर नेता प्रतिपक्ष के लिए राहुल गांधी पहली पसंद के तौर पर उभरे थे, इसलिए कहा जा रहा था कि नेतृत्व की भूमिका में आने के लिए यह एक बेहतरीन मौका है। पार्टी का मानना था कि राहुल गांधी को अपने पिता वह पूर्व पीएम राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी की तरह नेता प्रतिपक्ष बनकर सदन में लोगों के मुद्दे उठाने चाहिए। लोकसभा की कुल सीट का कम से कम दस फीसदी सीट जीतना नेता विपक्ष का पद हासिल करने के लिए जरूरी होता है। इससे पहले अगर ये सांसद शपथ नहीं लेते हैं, तो ये सभी सांसद लोकसभा स्पीकर के लिए वोटिंग में शामिल नहीं हो पाएंगे।