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आखिर क्या है भारत का सबसे बड़ा हथियार एक्वा बम?

आज हम आपको भारत के सबसे बड़े हथियार एक्वा बम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! बता दे कि बम और गोलाबारी से कोई भी सेना किसी जमीन को इतनी तबाह नहीं कर सकती जितनी पाकिस्तान के खेतों ओर लोगों को हरा-भरा रखने वाले पानी के सोर्स को भारत स्थायी रूप से बंद करके तबाह कर सकता है। अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख रहे डेविड लिलिएनथल ने यह बात 60 के दशक में कही थी। इसके कुछ समय बाद ही भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तानाशाह फील्ड मार्शल जनरल अयूब खान कराची में 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल समझौते की खातिर एक मेज पर आए थे। माना जाता है कि भारत ने आजादी के वक्त से 13 साल तक पाकिस्तान के साथ कुछ न कुछ विवाद में उलझा रहा था। तब नेहरू ने पानी देने के बदले स्थायी शांति की वकालत की थी। मगर, उनकी यह सोच बाद के बरसों में कितनी बड़ी भूल साबित हुई। कई विशेषज्ञों ने इसे एकतरफा समझौता करने की नेहरू की चूक करार दिया था। हाल ही में भारत ने एक बार फिर इस समझौते की समीक्षा किए जाने की मांग पाकिस्तान से की है। जानते हैं सिंधु जल संधि विवाद की जड़ें कहां हैं और क्या वाकई में नेहरू ने कोई गलती की थी। क्या है इसके पीछे की कहानी, जानते हैं।

चाइनाज वॉर क्लाउड्स’ किताब के लेखक और डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी के अनुसार, यह संधि एक तरह से भारत के लिए ‘एक्वा बम’ है जो वास्तव में पाकिस्तान के खिलाफ भारत का सबसे शक्तिशाली हथियार है। भारत सिंधु बेसिन में बहने वाली सात नदियों के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। मगर, भारत ने बस एक बार इस ताकत को आजमाया था, जिससे पाकिस्तान घुटनों के बल आ गया था। हालांकि, वो कदम बेहद मामूली था। अमेरिका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के ऐरॉन वुल्फ और जोशुआ न्यूटन अपनी एक केस स्टडी में बताते हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल बंटवारे का विवाद 1947 में बंटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था। उस वक्त पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच यह झगड़ा काफी चल रहा था।

1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियर मिले और उन्होंने पाकिस्तान की तरफ जाने वाली दो प्रमुख नहरों पर एक ‘स्टैंडस्टिल समझौते’ पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार पाकिस्तान को लगातार पानी मिलता रहा। ये समझौता 31 मार्च 1948 तक ही लागू हो पाया। 1 अप्रैल को इस समझौते के खात्मे के साथ भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ जमीन सूखने लगी। भारतीय पंजाब में इंजीनियरों ने फिरोजपुर हेडवर्क्स से देपालपुर नहर और लाहौर तक पानी की आपूर्ति बंद कर दी। मंडी जलविद्युत योजना से बिजली की आपूर्ति भी काट दी गई। पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर में पानी बांटा जाने लगा।

दक्षिण एशियाई यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. देवनाथ पाठक के अनुसार, उस वक्त भारत के इस कदम के पीछे कई कारण बताए गए, जिसमें एक यह था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था। हालांकि बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राजी हो गया। 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर टेनेसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलिएनथल भारत आए। वो पाकिस्तान भी गए। जब लौटकर वह अमेरिका पहुंचे तो उन्होंने सिंधु नदी के बंटवारे पर एक लेख लिखा।

डेविड का वो लेख उनके दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा, जो उस वक्त विश्व बैंक के तत्कालीन प्रमुख थे। ब्लैक ने तब सिंधु जल बंटवारे के लिए भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से संपर्क किया। इसी के बाद से दोनों देशों के बीच में इसे लेकर कई दौर की बातचीत शुरू हो गई। आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए। संधि पर नेहरू और अयूब खान ने दस्तखत किए। 1960 में दोनों देशों के बीच हुए सिंधु जल समझौते में छह नदियों ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी के वितरण और इस्तेमाल करने के अधिकार शामिल हैं। इस संधि के तहत ‘तीन पूर्वी नदियों’ ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है। वहीं तीन ‘पश्चिमी नदियां’ सिंधु, चिनाब और झेलम का पानी का मालिकाना हक पाकिस्तान को दे दिया गया। हालांकि, भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी का भी इस्तेमाल अपने घरेलू कामों, सिंचाई और पनबिजली के लिए कर सकता है। संधि पर अमल के लिए सिंधु आयोग बना, जिसमें दोनों देशों के कमिश्नर हैं। वे हर साल मिलते हैं और विवाद निपटाते हैं।

पाकिस्तान के लेखक मोइन अंसारी की किताब ‘इंडियाज एक्वा बम’ के अनुसार, 90 प्रतिशत सिंचित भूमि होने के बाद भी पाकिस्तान को महज 80 प्रतिशत पानी ही क्यों दिया गया। यह बड़ा नुकसान है। वहीं, इस मसले पर ब्रिटेन और अमेरिका ने पाकिस्तान का मूक समर्थन किया था। दरअसल, पाकिस्तान को ब्रिटेन और अमेरिका ने रूस के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में तैयार किया था। ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिससे वे इसे विफल होने देते। वहीं पानी पर वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेलानी ने एक बार लिखा था, भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर रहा है। अंततराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

सिंधु नदी का इलाका करीब 11.2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। ये इलाका पाकिस्तान 47 प्रतिशत, भारत 39 प्रतिशत, चीन 8 प्रतिशत और अफगानिस्तान 6 प्रतिशत में है। एक आंकड़े के मुताबिक करीब 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास के इलाकों में रहते हैं। ऐसे में यह पानी इन देशों के लिए बेहद अहम है।

 

क्या जानवर की काटने के बाद लगवाना चाहिए रेबीज का टीका?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जानवर की काटने के बाद रेबीज का टीका लगवाना चाहिए या नहीं! इंसान का सबसे पहला कोई वफादार पालतू पशु साथी रहा है तो वो है कुत्ता। ऐतिहासिक साक्ष्य तो यही कहते हैं, जब 30 हजार साल से ज्यादा वक्त से कुत्ते हम इंसानों के साथ रह रहे हैं। यह 10 हजार साल पहले घोड़े को पालतू बनाए जाने से भी ज्यादा पुराना है। भारत के पौराणिक कथाओं में तो महाभारत काल में कुत्ता ही पांडव युधिष्ठिर के साथ सशरीर स्वर्ग जा पाया था। बाकी पांडवों को रास्ते में ही मरना पड़ा था। अब यही कुत्ता हम इंसानों को काट रहा है। यह इतना काट रहा है कि पूरी दुनिया में हर साल कुत्तों के काटने के 10 करोड़ मामले सामने आ रहे हैं। अकेले अमेरिका में कुत्तों के काटने के करीब 1 करोड़ केस सामने आते हैं। भारत में भी करीब 28 लाख ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। ये हालात दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। एक उद्योगपति को भी कुत्ते के काटने से जान गंवानी पड़ी है। आइए-समझते हैं कि कुत्तों के काटने के मामले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? कितना घातक है कुत्तों का काटना? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एसोएिशन फॉर द प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ रेबीज इन इंडिया (APCRI) के आंकड़ों के अनुसार, भारत कुत्तों के काटने से होने वाली मौतों के मामले में रेबीज कैपिटल है। कुत्तों के काटने से होने वाली पूरी दुनिया में होने वाली मौतों का 36 फीसदी मौत भारत में ही हो जाती हैं।

भारत में 2021 से कुत्ते काटने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बीते तीन साल में यह करीब तीन गुना बढ़ चुका है। 2022 से 2023 के बीच कुत्ते के काटने के केस 21.8 लाख से बढ़कर 27.5 लाख हो चुके हैं। 2018 में कुत्तों ने सबसे ज्यादा 75 लाख लोगों को काटा था। वहीं, अमेरिका में हर साल करीब 45 लाख लोगों को कुत्ते काट लेते हैं। बीते साल वाघ बकरी के मालिक पराग देसाई की कुत्ते के काटने से मौत हो गई थी। बताया जा रहा था कि सुबह-सुबह वो मॉर्निंग वॉक पर निकले थे, जब कुछ अवारा कुत्तों ने उन पर हमला कर दिया। हमले के बाद उनका अस्पताल में इलाज चल रहा था, मगर उन्हें बचाया नहीं जा सका। उस वक्त कई रिपोर्ट्स में यह कहा गया कि पराग देसाई को कुत्ते के काटने के बाद ब्रेन हेमरेज हो गया, जिससे मस्तिष्क में ब्लीडिंग हो गई। PubMed की एक रिपोर्ट बताती है कि कुत्ता काटने के बाद अगर रेबीज वायरस फैल जाता है तो ये ब्रेन डैमेज का कारण बन सकता है।

यूरोप में एक देश है चेकोस्लोवाकिया, जिसे अब चेक रिपब्लिक कहते हैं। यहां के प्रेडमोस्टी साइट पर मुंह में हड्डी लिए एक कुत्ता दफन है। माना जाता है कि यह कुत्ता 32 हजार साल पुराना है। वहीं, जर्मनी में ओबेर कैसेल में एक महिला और पुरुष के बीच में कुत्ते का दफनाया गया है। रेडियो कार्बन डेटिंग में इस कुत्ते को 14,300 साला पुराना माना गया है। 6 हजार साल पहले मिस्र की अनुबिस सभ्यता, मध्य अमेरिका की माया सभ्यता और यूनान की सरबेरस सभ्यता में इंसान के साथ कुत्तों के रहने के साक्ष्य मिले हैं। चेक गणराज्य में कुत्ते के इंसान के साथ दफनाए जाने के साक्ष्य भी मिल चुके हैं।

रेबीज का इतिहास कम से कम 4,000 साल पुराना है, जब यह हकीकत लोगों को पता चली कि कुत्ते के काटने से मौत हो सकती है। प्राचीन इराक में तो कुत्तों के काटने पर जुर्माना भरने तक के नियम बनाए गए थे। मौजूदा वक्त में 99 फीसदी रेबीज के मामले अफ्रीका और एशिया में हैं। यह लैटिन अमेरिकी देशों से गायब ही हो चुके हैं, जहां साल भर में करीब 20 ही रेबीज के मामले सामने आते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार, कुत्ते सबसे ज्यादा बच्चों को काटते हैं, जो उनके लिए आसान शिकार हैं। अमेरिका में करीब 50 फीसदी बच्चों को कुत्ते कभी न कभी जरूर काट लेते हैं। 12 साल की उम्र तक के बच्चे इसके ज्यादा शिकार होते हैं। वहीं, दूसरे नंबर पर बुजुर्गों को कुत्ते काट खाते हैं। ऐसे में बच्चों या बुजुर्गों को कुत्तों से बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि इन दोनों ही उम्र वालों में इम्यून सिस्टम युवाओं जितना ताकतवर नहीं होता है।

नेशनल रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम गाइडलाइंस के अनुसार कुत्ते का काटना 100 फीसदी घातक है। अगर पीड़‍ित को सही समय पर ट्रीटमेंट नहीं मिलता है तो उसकी मौत होनी तय है। ऐसी लापरवाही कतई न करें। कुत्ते के काटने पर खून संक्रमित हो जाता है और खून जहरीला होने लगता है। बहुत से लोग इस जहर को कम करने के लिए घाव पर नमक, हल्‍दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, नींबू, खड़‍िया या मिट्टी लगाने लगते हैं। कुछ लोग पीपल के पत्ते भी घाव पर लगाते हैं। मगर, ऐसी कोई भी चीज मरीज की जान नहीं बचा सकती है। साथ ही झाड़-फूंक भी काम नहीं आती है। इस तरह की किसी भी सलाह को बिल्‍कुल न मानें और हर हाल में रेबीज का टीका समय से लगवाएं।

 

क्या भारत ने ढूंढ लिया है अंधेपन का इलाज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत ने अंधेपन का इलाज ढूंढ लिया है या नहीं! ट्रैकोमा, भारत में इसका नाम सुनते ही कई लोग दहशत के साए में जीने लगते थे। कारण है कि यह एक संक्रामिक बीमारी जिसका अगर तय समय पर उपचार न किया जाए तो यह अंधा भी कर सकती है। कहते हैं न कि बुरे वक्त की एक अच्छी बात यह होती है कि वह भी गुजर जाता है। देश में ट्रैकोमा बीमारी भी किसी बुरे वक्त की तरह चली गई। अंधेपन का कारण बनने वाली इस बीमारी से देश ने 7 साल पहले जंग जीत ली थी, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO को इसे कबूल करने में 7 साल लग गए। इसके साथ, भारत चीन, नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार सहित 19 अन्य देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने इस बीमारी को समाप्त कर दिया है। बीमारी उन्मूलन का अर्थ किसी विशिष्ट क्षेत्र या देश में किसी बीमारी को फैलने से रोकना है, लेकिन विश्व स्तर पर नहीं। बीमारी को भगाने के बाद, होने वाले किसी भी मामले को उस क्षेत्र या जनसंख्या के बाहर से आया हुआ माना जाता है। यह उन्मूलन के समान नहीं है, जो एक बीमारी को दुनिया भर में समाप्त करने को संदर्भित करता है। हां कुछ प्रयोगशालाओं में कुछ शीशियों को छोड़कर।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एक बीमारी को तब समाप्त किया जाता है जब यह किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रहती है। किसी बीमारी को समाप्त करने के लिए प्रमाणित होने के लिए, देशों को WHO के निर्धारित मापनीय लक्ष्यों को पूरा करना होगा। लक्ष्यों को पूरा करने के बाद, देशों को उन्मूलन बनाए रखने या आगे संक्रमण को बाधित करने के लिए कार्रवाई जारी रखनी चाहिए क्योंकि एक खत्म हो चुकी बीमारी हमेशा वापस आ सकती है।ट्रैकोमा के समाप्ति की WHO की परिभाषा को पूरा करने के लिए, ट्रैकोमा ट्रिचियासिस की घटना को देखना होगा। यह एक स्थिति है जो पलकों को रगड़ने के कारण होती है, जिससे निशान बन जाता है। यह 15 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों में 0.2% से कम होना चाहिए। इसके अलावा, 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ट्रैकोमेटस सूजन की घटना 5% से कम होनी चाहिए।

ट्रैकोमा क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस बैक्टीरिया के कारण होता है। यह संक्रामक है और संक्रमित लोगों के आंखों, पलकों और नाक या गले के स्राव के संपर्क में आने से फैलता है। इसे संक्रमित वस्तुओं जैसे रूमाल को संभालकर भी पास किया जा सकता है। भीड़भाड़ वाली परिस्थितियों में रहने वाले लोग जिनके पानी की पर्याप्त पहुंच के कारण गंदे चेहरे और हाथ हो जाते हैं, उन्हें इस बीमारी से ज्यादा खतरा है।

जहां यह सक्रिय है, वहां बच्चों के संक्रिमत होने का खतरा ज्यादा होता है। महिलाएं भी संवेदनशील होती हैं, क्योंकि उनके पास चाइल्डकेयर की मुख्य जिम्मेदारी होती है। लक्षणों में आंखों और पलकों में हल्की खुजली और जलन, सूजन पलकें और आंखों से मवाद निकलना, आंखों में दर्द आदि शामिल हैं। बार-बार संक्रमण से नेत्रश्लेष्मला की सूजन और निशान हो सकता है, जिससे पलकें अंदर की ओर मुड़ जाती हैं और पलकें आंख के गोले के खिलाफ रगड़ती हैं। इससे कॉर्निया अंधा हो सकता है, जिससे अंधापन हो सकता है।

मोतियाबिंद न तो संक्रामक रोग है और न ही बैक्टीरिया, वायरस, कवक या परजीवी के कारण होता है। लेकिन ट्रैकोमा दुनिया में अंधेपन का प्रमुख संक्रामक कारण है, और यह दुनिया के सबसे गरीब हिस्सों में अधिकतर होता है। इसका इलाज न होने और बार-बार संक्रमण से दृष्टि दोष और अंधापन हो सकता है। भारत ने 1976 में नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस (NPCB) को एक केंद्र-प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में लॉन्च किया था। यह ऐसा करने वाला पहला देश था। 1959-1963 के आंकड़ों से पता चला कि छह मौजूदा राज्यों में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा का प्रसार 50% से अधिक था: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी, उत्तराखंड और गुजरात।

राष्ट्रीय ट्रैकोमा नियंत्रण कार्यक्रम 1963 में शुरू किया गया था और बाद में इसे एनपीसीबी में शामिल किया गया था। भारत में अंधेपन पर WHO के 1986-89 के सर्वेक्षण से पता चला कि इन राज्यों में ट्रैकोमा का प्रसार 10% से कम था। 2006 में उन्हीं छह राज्यों में किए गए त्वरित आकलनों से पता चला कि 10% से कम बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा था, जबकि इस बीमारी से पीड़ित वयस्कों का अनुपात 0.03% से 0.5% के बीच था। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया कि ट्रैकोमा एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई थी, भले ही सभी छह में मामले पाए गए थे, जो मुख्य रूप से कुछ जिलों – बीकानेर (राजस्थान) और पौड़ी (उत्तराखंड) में केंद्रित थे। 2010 में कार निकोबार द्वीप पर किए गए एक ट्रैकोमा त्वरित आकलन से पता चला कि 51% बच्चों में सक्रिय ट्रैकोमा था, जिसका समाधान अगले तीन वर्षों में एज़िथ्रोमाइसिन के बड़े पैमाने पर प्रशासन द्वारा किया गया। इससे प्रसार घटकर 6.8% हो गया। WHO के अनुसार, 2005 में भारत में अंधेपन के सभी मामलों में से 4% के लिए ट्रैकोमा जिम्मेदार था। 2018 तक, प्रसार घटकर 0.008% हो गया था।

राष्ट्रीय ट्रैकोमेटस ट्रिचियासिस (TT) सर्वेक्षण भी 2021-24 के दौरान अंधता और दृष्टि दोष के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत 200 स्थानिक जिलों में किया गया था, जो एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में ट्रैकोमा को समाप्त करने के लिए भारत को प्रमाणित करने के लिए WHO के आदेश के हिस्से के रूप में किया गया था। अपने देश कार्यालय द्वारा जांच के बाद, WHO ने अंततः घोषणा की कि भारत ने एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में ट्रैकोमा को समाप्त कर दिया है। इसने कहा कि देश ने WHO के दिशानिर्देशों के आधार पर एक पोस्ट-वैलिडेशन निगरानी योजना भी विकसित की है, जो निरंतर उन्मूलन प्रयासों के लिए है।

 

दक्षिण चीन सागर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या कहा?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण चीन सागर के लिए एक बड़ा बयान दे दिया है! एक ऐसा इलाका जहां विस्तारवादी चीन अपनी धौंस दिखाता रहता है। खुराफात करता रहता है। दादागीरी करता है। आस-पास के देशों को जब-तब तंग करता रहता है। जहां उसने बना रखें हैं कृत्रिम द्वीप। कम से कम तीन द्वीपों का सैन्यीकरण कर चुका है। मिलिट्री बेस बना रखा है। उस साउथ चाइना सी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का नाम लिए बिना बड़ी नसीहत दी है। दो दिन के भीतर दूसरी बार नसीहत। नसीहत ये कि दक्षिण चीन सागर की स्थिरता समूचे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की शांति के लिए अहम है, लिहाजा विवादों का निपटारा अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों, कानूनों के हिसाब से हो। एक दिन पहले गुरुवार को जब भारत और ASEAN ने चीन को साउथ चाइना सी में खुराफातों से बाज आने का संदेश दिया तो वह तिलमिला उठा। क्षेत्रीय मामलों में बाहरी ताकतों के दखल की कोशिश बताने लगा। इस बीच पीएम मोदी ने दूसरी बार उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। अब तो उसका और ज्यादा तिलमिलाना और फड़फड़ाना तय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को 19वें ईस्ट एशिया समिट में अपने संबोधन में पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए दक्षिण चीन सागर की स्थिरता के महत्व पर जोर दिया। पीएम मोदी ने कहा, ‘एक स्वतंत्र, खुला, समावेशी, समृद्ध और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक पूरे क्षेत्र की शांति और प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण चीन सागर की शांति, सुरक्षा और स्थिरता पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के हित में है।’

पीएम मोदी ने ASEAN देशों में एकता की वकालत करते हुए कहा कि भारत की ‘इंडो-पैसिफिक महासागर पहल’ और ‘इंडो-पैसिफिक पर आसियान आउटलुक’ के बीच गहरी समानताएं हैं। इससे पहले, गुरुवार को भारत और ASEAN की तरफ से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि दक्षिण चीन सागर में जो भी विवाद हैं, उनका अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसा से समाधान होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करने की नसीहत के बाद चीन तिलमिला गया। गुरुवार को ही चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने आरोप लगाया कि ‘बाहरी ताकतें’ ‘क्षेत्रीय मामलों’ में दखल दे रही है। ASEAN समिट के दौरान ही फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने भी चीन तो लताड़ लगा दी। उन्होंने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि साउथ चाइना सी में मोटे तौर पर हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं जिसकी वजह चीन की हकते हैं।

पीएम मोदी ने शुक्रवार को म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि उसे अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत एक पड़ोसी देश के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाता रहेगा। म्यांमार को अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में इजरायल-ईरान तनाव का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बहुचर्चित बयान को फिर दोहराया कि यह युद्ध का युग नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यह युद्ध का युग नहीं है। समस्याओं का समाधान युद्ध के मैदान से नहीं निकल सकता।’

पीएम मोदी ने संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करने की भारत की प्रतिबद्धता पर जोर दिया, साथ ही बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता देते हुए एक मानवीय दृष्टिकोण का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘विश्वबंधु की जिम्मेदारी निभाते हुए भारत इस दिशा में हर संभव योगदान देता रहेगा।’ पीएम मोदी ने आतंकवाद को वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बताते हुए इस बारे में भी बात की। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान करते हुए कहा, ‘मानवता में विश्वास करने वाली ताकतों को मिलकर काम करना होगा।’ उन्होंने सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए साइबर, समुद्री और अंतरिक्ष क्षेत्रों में सहयोग मजबूत करने की जरूरत पर भी बल दिया।

वियनतियाने में शिखर सम्मेलन के मौके पर, पीएम मोदी ने अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से मुलाकात की और तूफान मिल्टन के कारण अमेरिका में कम से कम 14 लोगों की मौत पर दुख जाहिर किया। पीएम मोदी दो दिवसीय लाओस यात्रा पर हैं, जहां उन्होंने 21वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया। उनकी यह यात्रा भारत की ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के एक दशक को चिह्नित करती है। वियनतियाने पहुंचने पर, उनका औपचारिक स्वागत किया गया और लाओस के गृह मंत्री, विलायवोंग बुद्धाखाम सहित वरिष्ठ मंत्रियों ने उनका स्वागत किया। पीएम मोदी ने भारतीय समुदाय के लोगों से भी बातचीत की और शिक्षा और खेल मंत्री और वियनतियाने के मेयर सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने उनका स्वागत किया।

उन्होंने लुआंग प्रबांग के रॉयल थिएटर द्वारा लाओ रामायन, फालक फलम के एक प्रदर्शन में भाग लिया, और एक्स पर कार्यक्रम की तस्वीरें साझा करते हुए, भारत और लाओस के बीच सांस्कृतिक संबंधों की तारीफ की। भारत और लाओस के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, जो बौद्ध धर्म और रामायण की उनकी साझी विरासत में परिलक्षित होते हैं। दोनों देशों ने 1956 में द्विपक्षीय संबंध स्थापित किए और उनके संबंध मैत्रीपूर्ण बने हुए हैं।

 

आखिर हिंद महासागर के लिए क्या है प्रधानमंत्री मोदी का नया प्लान?

आज हम आपको हिंद महासागर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा बनाया गया नया प्लान बताने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाओस की यात्रा पर हैं, जहां उन्होंने पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन(EAS) को संबोधित करते हुए हिंद प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर में शांति और स्थिरता पर बात की। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच से हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और शांति पर काफी जोर दिया। इससे पहले 4 नवंबर, 2019 की बात है, जब इसी अंतरराष्ट्रीय मंच से पीएम मोदी ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभर रहे मतभेदों पर बात की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन एक मुक्त, खुला, समावेशी, पारदर्शी, नियम आधारित, शांतिपूर्ण, समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने का तार्किक मंच है, जहां संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता और समुद्री कानूनों के पालन पर जोर दिया जाता है। उस वक्त पीएम ने’इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव (IPOI)’ का प्रस्ताव दिया था, जिससे हिंद-प्रशांत समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित, भयमुक्त और स्थिर बनाया जा सके और इसके लिए इच्छुक राष्ट्रों के बीच सहयोगी ढांचा बनाया जा सके। जानते हैं मोदी के उसी भयमुक्त समुद्री क्षेत्र के विजन के बारे में, यह इतना जरूरी क्यों है। यह भी जानेंगे कि आखिर ये मंच किस तरह का है। 4 नवंबर, 2019 को भारत ने पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में अपने प्रस्ताव में समुद्री सहयोग और सहभागिता के 7 मूल पहलुओं की पहचान की थी, जो रणनीतिक रूप से मोदी के 7 तीर भी हैं। ये हैं-समुद्री सुरक्षा, समुद् इकोसिस्टम, समुद्री रिसोर्स, क्षमता निर्माण और संसाधनों का बंटवारा, आपदा जोखिम में कमी और मेनेजमेंट, विज्ञान, प्रौद्योगिकी सहयोग और कारोबारी कनेक्टिविटी व समुद्री परिवहन। पीएम मोदी के यही सूत्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को दबदबे को कम कर सकते हैं।

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का गठन 2005 में किया गया था। यह हिंद प्रशांत क्षेत्र में प्रमुख राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियों पर रणनीतिक बातचीत और सहयोग के लिए 18 देशों का एक मंच है। इस मंच का विचार सबसे पहले 1991 में तत्कालीन मलेशियाई प्रधानमंत्री महाथिर बिन मुहम्मद ने दिया था। उन्होंने उस वक्त पूर्वी एशिया समूह बनाने की बात की थी। पहला पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन 14 दिसंबर, 2005 को कुआलालंपुर, मलेशिया में आयोजित किया गया था।

भारत पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के संस्थापक सदस्यों में शामिल है। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन (ASEAN) के 10 सदस्य देश शामिल हैं-ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के साथ ही 8 सदस्य देश ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, भारत, न्यूज़ीलैंड, कोरिया गणराज्य, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका है। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के सदस्य विश्व की लगभग 54% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनकी 58% भागीदारी है। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन एक आसियान केंद्रित मंच है। इसकी अध्यक्षता केवल एक आसियान सदस्य द्वारा की जा सकती है।

भारतीय वैश्विक परिषद में रिसर्चर रहे डॉ. टेम्जेनमरेन एओ के एक लेख ‘हिंद-प्रशांत और भू-राजनीतिक क्षेत्र में पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की भूमिका’ में कहा गया है कि 2021 में EAS सदस्यों ने दुनिया की करीब 54% आबादी का प्रतिनिधित्व किया। इसके सदस्य देशों ने अनुमानित रूप से 57.2 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का कारोबार किया, जो वैश्विक जीडीपी का 59.5% है। यह मज़बूत और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाला क्षेत्र है। इसे अमेरिका और यूरोप के बाद विश्व अर्थव्यवस्था का तीसरा ध्रुव माना जाता है। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में 4 प्रमुख आर्थिक भागीदार देश जापान, चीन, भारत और कोरिया 12 उच्च रैंकिंग वाली वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। EAS देशों के बीच वित्तीय और मौद्रिक सहयोग इतना ज्यादा है कि उनका संयुक्त विदेशी मुद्रा भंडार 3 ट्रिलियन डॉलर के पार जा चुका है।EAS का मकसद समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ समंदर में मुक्त कारोबारी क्षेत्र विकसित करना भी है। यही वजह है कि पीएम मोदी समंदर को भयमुक्त बनाना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि समुद्री सुरक्षा होने से हिंद-प्रशांत देशों के बीच समुद्री कारोबार ज्यादा बढ़ेगा। दरअसल, इस इलाके में क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सैन्य बजट में बढ़ोतरी शांति, सुरक्षा और समृद्धि के व्यापक मकसद को कमजोर करता है।

दक्षिण चीन सागर में चीन की दबंगई और उसके बढ़ते निवेश की प्रकृति ने आसियन देशों में भारत को एक ऐसी संभावित शक्ति के रूप में देखने के लिये प्रेरित किया है जो चीन को संतुलित कर सकता है। भारत समुद्री क्षेत्र में बड़ा पॉवर बन सकता है। भारत की शक्ति सेवा क्षेत्र और सूचना-प्रौद्योगिकी में है, वहीं जापान के पास एक मजबूत पूंजी आधार भी है।

 

क्या भारत के लिए जरूरी हो चुका है फोर्टिफाइड चावल?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या वर्तमान में भारत के लिए फोर्टिफाइड चावल जरूरी हो गया है या नहीं ! करीब 134 साल पहले चावल को ताकत बनाने की पहली कोशिश हुई थी। 1890 में एक डच डॉक्टर आइजकमैन ने देखा कि मुर्गियों को पॉलिश किए हुए चावल खिलाने से उनमें बेरी-बेरी यानी बेहद कमजोरी के लक्षण दिखाई देने लगे। इसके बाद उन्होंने चावलों में थायमिन मिलाना शुरू किया, जिसे विटामिन बी-1 कहा जाता है। जब इसे मुर्गियों को खिलाया गया तो वह पहले की तरह लड़खड़ाने के बजाय तेजी से चलने-फिरने लगीं। यहीं से राइस फोर्टिफिकेशन की शुरुआत हुई। हाल ही में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत दिसंबर 2028 तक फोर्टिफाइड चावल बांटे जाने की योजना को मंजूरी दी गई। क्या हैं फोर्टिफाइड राइस, इसके बारे में जानते हैं। फोर्टिफाइड चावल साधारण चावलों से ही बनता है। इसके पोषक तत्व कृत्रिम तरीके से बढ़ाए जाते हैं। इन चावलों में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी-1 और बी-12 जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों को मिलाया जाता है। दरअसल, फोर्टिफिकेशन कुपोषण की समस्या से निपटने की दिशा में बड़ा कदम माना जाता है। यानी एक तरह से यह कहा जा सकता है कि चावल की किलेबंदी की जाती है, जो शरीर को ताकत देते हैं। मेटाबॉलिज्म रेट बढ़ जाता है और चुस्ती-फुर्ती बढ़ जाती है।

भारत में चावल फोर्टिफिकेशन को एक महत्वपूर्ण फैसला माना जाता है क्योंकि सरकार अभी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के तहत कई योजनाओं के जरिए 300 लाख टन से अधिक चावल बांटती है। केंद्र ने 2022 में 328 लाख टन से अधिक चावल अलग-अलग स्कीम के तहत बांटे हैं, जिनमें मिडडे मील स्कीम, एकीकृत बाल विकास सेवाओं और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शामिल हैं। आज भारत दुनिया का लगभग 20% चावल पैदा करता है। इसके अलावा, हमारे देश में चावल की खपत भी सबसे ज्यादा है। हमारे देश में सबसे ज्यादा चावल ही खाया जाता है। चावल की प्रति व्यक्ति खपत हर महीने तकरीबन 7 किलो अनुमानित है। ऐसे में चावल के फोर्टिफिकेशन से आम लोगों को जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं।

भारत में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण का स्तर बहुत ज्यादा है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार, देश में हर दूसरी महिला एनीमिया से पीड़ित है और हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। चावल एशिया और अफ्रीका में मुख्य खाया जाने वाला खाना है। आयरन की कमी से दुनिया में दो अरब से ज्यादा लोग जूझ रहे हैं। इससे एनीमिया, कमजोरी, थकान, चक्कर आना, सुस्ती और मातृ मृत्यु दर का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए कई देशों ने चावल को आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B-12 जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध करने की स्ट्रैटेजी अपनाई।

दरअसल, चावल की मिलिंग और पॉलिशिंग के दौरान विटामिन बी, ई समेत मैग्नीशियम, पोटैशियम और मैंगनीज सहित कुछ पोषक तत्त्व कम हो जाते हैं। यानी ब्राउन राइस सफेद या पॉलिश किए हुए चावल बन जाते हैं। दरअसल, हमें अधिकांश आयरन मीट से मिलता है, जिसका 50% शरीर सोख लेता है। सब्जियों से आयरन की सीमित तौर पर पूर्ति होती है और महज 3% ही शरीर सोख पाता है। यही कारण है कि आयरन की कमी भारत में बड़ी समस्या है। चावल को ताकतवर बनाने के प्रॉसेस में चावल में महत्वपूर्ण विटामिन और खनिजों को शामिल किया जाता है, जिससे इसकी पोषक वैल्यू बढ़ जाती है। फोर्टिफिकेशन प्रॉसेस में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के तय मानकों को मुताबिक, चावल में विटामिन ए, विटामिन बी-12, विटामिन बी-1, आयरन, जिंक और फोलिक एसिड जैसे जरूरी तत्व शामिल किए जाते हैं।

गर्भवती महिलाओं में फोलिक एसिड की कमी से गर्भ में पल रहे बच्चे में स्पाइना बिफिडा यानी न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट हो जाता है। इस विकार में रीढ़ प्रभावित हो जाती है। जिससे पैदा होने के बाद चलने-फिरने में समस्या या विकलांगता की समस्या हो जाती है।

पंजाब और हरियाणा में हर 1000 में 4.7 से 9 बच्चों में यह समस्या पाई जाती है। इसके अलावा, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के कुछ भागों में न्यूरल ट्यूब दोष के सबसे ज्यादा मामले पाए गए हैं। विकसित देशों में यह 1 प्रति 1000 से भी कम है।

फोर्टिफाइड चावलों को मिलों में बनाया जाता है। इस दौरान इनमें सूक्ष्म पोषक तत्वों, विटामिन और खनिजों की मात्रा को कृत्रिम तरीके से बढ़ाया जाता है। इसके लिए कोटिंग, डस्टिंग और एक्सट्रूजन जैसी तकनीक का इस्तेमाल होता है। पहले सूखे चावल को पीसकर आटा बनाया जाता है। फिर उसमें सूक्ष्म पोषक तत्व मिलाए जाते हैं। पानी के साथ इन्हें अच्छे से मिक्स किया जाता है। फिर मशीनों की मदद से सुखाकर इस मिश्रण को चावल का आकार दिया जाता है, जिसे फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) कहा जाता है। तैयार होने के बाद इन्हें आम चावलों में मिला दिया जाता है। FSSAI के नियम के अनुसार, इसे 1:100 के अनुपात में मिलाया जाता है। यानी हर 1 किलो चावल में 10 ग्राम फोर्टिफाइड राइस मिलाया जाता है।

 

क्या महाराष्ट्र और झारखंड में अपनी जगह बन पाएगी कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस महाराष्ट्र और झारखंड में अपनी जगह बन पाएगी या नहीं! कछुए ने खरगोश को हरा दिया। यह कहानी तो बचपन में ही बता दी जाती है। लेकिन इस पाठ के सबक हममें से कितने को याद रहते हैं? यूं कहें कि जिंदगी की पटरी पर आगे बढ़ते हुए हममें से कितने लोग कुछए और खरगोश की रेस वाली यह कहानी को याद रखते हैं? इन सवालों के जवाब जो भी हों, लेकिन इतना तो तय है कि हरियाणा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने तो इस कहानी के सबक का जरा भी ध्यान नहीं रखा। फिर 8 अक्टूबर के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी को बताया कि सबक भूलने का नतीजा क्या होता है। हरियाणा में कांग्रेस पार्टी ने रेस वाले खरगोस की भूमिका निभाई। ‘जीत ही रहे हैं’ के भाव से ओत-प्रोत कांग्रेस पार्टी के नेता सुस्त पड़ गए और हार के डर से बीजेपी ने चुस्ती दिखाई और जमीन पर काम किया। बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने हजारों बैठकें कीं। इधर, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से नियुक्त प्रदेश प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान और विप्लब देव के दिशा-निर्देश में नेताओं-कार्यकर्ताओं ने जी-जान लगा दिया।

उधर, कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंख मूंदकर भरोसा किया और सारे अंडे उनकी ही टोकरी में रख दिए। पार्टी ने प्रदेश की एक अन्य दिग्गज नेता कुमारी शैलजा को भाव नहीं दिया। वहीं टिकट वितरण में भी बहुत हद तक भाई-भतीजावाद हावी रहा। ये सब ‘खरगोशी प्रवृत्ति’ के कारण ही हुआ। उधर, कछुआ (बीजेपी) धीरे-धीरे ही सही, लेकिन कदम-दर-कदम बढ़ता गया। काम के दौरान नींद आना आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन उतना ही स्वभाविक है रुला देने वाला परिणाम आना। हरियाणा के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस की चीख निकाल दी, इसमें कोई संदेह नहीं। तो क्या अब वह सतर्क हो जाएगी? होना तो यही चाहिए। महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव सामने हैं। कांग्रेस को अपनी गलती सुधारकर हिसाब चुकता करने का मौका जल्द ही मिल गया है। लेकिन क्या हारती हुई बाजी को जीत में बदलने वाली बीजेपी इन चुनावों में कांग्रेस वाली गलती करेगी? क्या बीजेपी पर जीत का नशा छा जाएगा और वह महाराष्ट्र-झारखंड में हरियाणा के कांग्रेस जैसी गलती करेगी?

संभव है कि बीजेपी ऐसा कुछ नहीं करे, लेकिन एक बात तो सही है कि महाराष्ट्र और झारखंड में उसे हरियाणा वाली बढ़त तो नहीं मिल पाएगी। क्यों? क्योंकि हरियाणा में जीत ने बीजेपी की चुपचाप चली गई चालों को उजागर कर दिया। तब उसकी रणनीति को कोई तवज्जो नहीं दी जा रही थी, इसलिए गुप्त ही रही। अब हरियाणा में बीजेपी की एक-एक चाल पर लंबी-चौड़ी चर्चा हो रही है।कांग्रेस के पास सीखने का आसान रास्ता है, साथ ही ‘खरगोशी प्रवृत्ति’ का खामियाजा उठाने का सबक भी। वह महाराष्ट्र-झारखंड के विधानसभा चुनावों में खरगोश की फुर्ती और कछुए की निरंतरता, दोनों गुणों को साधने की कोशिश करेगी ताकि दोनों प्रदेशों में जीत पक्की की जा सके। ऐसे में बीजेपी के पास क्या चारा रह जाएगा? क्या वह कोई नई चाल चलेगी? क्या उसकी नई रणनीति खरगोश और कछुए के संयुक्त गुणों से लबालब कांग्रेस को भी मात दे देगी?

महाराष्ट्र में 288 और झारखंड में 81 विधानसभा सीटें हैं। ये कुल मिलाकर हरियाणा और झारखंड की 90+90 कुल 180 सीटों से बहुत ज्यादा (288+81 = 369) हैं। कांग्रेस के पास अकेले महाराष्ट्र में ही बीजेपी से बदला लेने का मौका है। हरियाणा में कांग्रेस ने किसी से गठबंधन नहीं किया, लेकिन महाराष्ट्र में उसका शरद पवार के गुट वाली एनसीपी और उद्धव गुट की शिवसेना के साथ गठबंधन है। वहीं, झारखंड में भी वह जेएमएम और आरजेडी के साथ गठबंधन में ही चुनाव मैदान में उतरेगी।महाराष्ट्र में बीजेपी गठबंधन की सरकार है जबकि झारखंड में कांग्रेस गठबंधन की। बीजेपी चाहेगी के कम-से-कम यही स्थिति चुनाव परिणाम आने के बाद भी बनी रहे। वैसे झारखंड की सत्ता में वापसी के लिए भी उसने पूरा दम-खम लगाया है। कांग्रेस भी ऐसा ही सपना अपने लिए देख रही होगी। बता दें कि कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंख मूंदकर भरोसा किया और सारे अंडे उनकी ही टोकरी में रख दिए। पार्टी ने प्रदेश की एक अन्य दिग्गज नेता कुमारी शैलजा को भाव नहीं दिया। देखना होगा कि दोनों पार्टियां चुनावों में जो सपने दिखाएगी, जनता उनमें से किस पर ज्यादा यकीन करती है।

 

भारतीय विदेश मंत्री के पाकिस्तान दौरे में क्या होने वाला है खास?

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री पाकिस्तान दौरे पर जा चुके हैं, तो आज हम आपको यह बताएंगे कि उनके दौरे में क्या खास होने वाला है! पाकिस्तान से संबंधों में तनाव के बीच भारत की तरफ से बड़ा फैसला लिया गया है। पाकिस्तान की मेजबानी में आयोजित हो हो रहे शंघाई शिखर संगठन की बैठक में भारत हिस्सा लेगा। पाकिस्तान अक्टूबर के मध्य में एससीओ के शासनाध्यक्षों की परिषद (सीएचजी) की बैठक की मेजबानी करेगा। खास बात है कि भारत की तरफ से इस मीटिंग में विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। पाकिस्तान की तरफ से इस सम्मेलन के लिए पीएम मोदी को न्योता दिया गया था। ऐसे में भारत ने एस जयशंकर को पाकिस्तान भेजने को लेकर काफी अहम फैसला किया है। जयशंकर को पीएम मोदी का ‘चाणक्य’ माना जाता है। अगस्त में, पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एससीओ के शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया था। जयशंकर की पाकिस्तान यात्रा महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे नई दिल्ली की ओर से एक बड़े फैसले के रूप में देखा जा रहा है। वरिष्ठ मंत्री को भेजने के फैसले को एससीओ के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब पीएम मोदी ने जयशंकर को अहम मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी दी है। जयशंकर पहले भी कई अहम मौके पर पीएम मोदी के भरोसे पर खरे उतरे हैं। अमेरिका से लेकर रूस तक, चीन से लेकर यूरोपीय देशों तक जयशंकर कूटनीतिक के मोर्चे पर भारत के पक्ष को दमदार तरीके से रखते हैं। जयशंकर ने कई बार ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर पश्चिमी देशों को दोहरे रवैये की पोल खोली है। जयशंकर कूटनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। ऐसे में जब पाकिस्तान में जब वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे तो भारत अपना पक्ष इस बहुराष्ट्रीय मंच पर साफतौर पर रख पाएगा।

पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में फरवरी 2019 में भारत के युद्धक विमानों द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर बमबारी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध गंभीर तनाव में आ गए थे। पाकिस्तान की तरफ से लगातार सीमापार से आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। इतना ही नहीं पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र जैसे ग्लोबल मंच पर कश्मीर को लेकर बेसुरा राग अलापता रहता है। इसको लेकर भारत ने कई बार दुनिया के सामने पड़ोसी मुल्क की पोल भी खोली है। भारत ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म किया तो इस पर पड़ोसी मुल्क ने ऐतराज जताया था। अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंधों को सीमित कर दिया था।

बता दे कि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल से बातचीत में पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने कहा कि भारत ने किसी नौकरशाह को ना भेजकर जयशंकर को भेजने का फैसला करके स्मार्ट पहल की है। भारत के साथ हमारा द्विपक्षीय संबंध सामान्य स्तर पर नहीं है। वो भी ऐसे वक्त में जब दोनों देशों में एक दूसरे के यहां उच्चायुक्त भी नहीं हैं। ये बहुत अजीब स्थिति है। इससे पहले एक न्यूज चैनल में उन्होंने जयशंकर का स्वागत खुले दिल से किए जाने की बात कही थी। माना जा रहा है कि इस दौरे से भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुधार की शुरुआत हो सकती है। SCO की इस बार की सालाना बैठक पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 15 और 16 अक्टूबर को है। इसका सदस्य होने के नाते भारत के प्रतिनिधिमंडल की अगुआई विदेश मंत्री एस जयशंकर कर रहे हैं। इस दौरे से भारत-पाकिस्तान में संबंध सुधरने की उम्मीद न के बराबर है, मगर पाकिस्तान और सोशल मीडिया पर इसकी खासी चर्चा है। दोनों देशों के संबंध अरसे से बेपटरी हैं।

जयशंकर ने अपने पाकिस्तान दौरे को लेकर पहले ही कहा था कि यह दौरा एक क्षेत्रीय समिट के लिए है। मैं भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर चर्चा करने नहीं जा रहा हूं। मैं एससीओ के एक अच्छे सदस्य के तौर पर जा रहा हूं। जयशंकर की यह साफगोई कूटनीतिक जगत में हर किसी को रास आती है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने भी जयंशकर के दौरे को लेकर कहा कि अभी भारत से द्विपक्षीय बातचीत को लेकर कोई योजना नहीं है।

पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे अजय बिसारिया ने हॉगकांग से निकलने वाले सरकारी अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा है कि जयशंकर का पाकिस्तान जाना दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने का अहम मौक़ा है। भारत ने एक मंत्री को भेजने का फैसला कर यह मैसेज दिया है कि वह अपने पड़ोसी से संबंधों में स्थिरता चाहता है। दोनों देश संबंधों की शुरुआत अपने-अपने उच्चायुक्त भेजकर कर सकते हैं।

जयशंकर ने इससे पहले 28 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की 79वीं बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान अपने कर्मों का फल भुगत रहा है और पाकिस्तान की जीडीपी सिर्फ कट्टरता में ही काम आती है। उन्होंने कहा-आतंक के हर रूप का विरोध होना चाहिए। हमारा पड़ोसी देश आतंकवाद के लिए जाना जाता है लेकिन वह कभी भी कामयाब नहीं होगा।

SCO में यूरेशिया के लगभग 80% क्षेत्र और इसके दायरे में दुनिया की 40% आबादी है। SCO के 9 सदस्य देश हैं- चीन, भारत, पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान, बेलारूस, ईरान और उज्बेकिस्तान। ईरान वर्ष 2023 में इसका सदस्य बना। अफगानिस्तान और मंगोलिया पर्यवेक्षक का दर्जा रखते हैं। संगठन के वर्तमान और आरंभिक संवाद भागीदारों में अजरबैजान, आर्मेनिया, मिस्र, कतर, तुर्किए, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका शामिल हैं। पूरी दुनिया की जीडीपी में एससीओ देशों की 20 फीसदी हिस्सेदारी है। दुनिया भर के तेल रिजर्व का 20 फीसदी हिस्सा इन्हीं देशों में है। एससीओ का कहना है कि इसका एक अहम मकसद ‘तीन बुराइयों’ यानी आतंकवाद, अलगाववाद और अतिवाद से लड़ना है। ब्रिटेन स्थित विदेश मामलों के थिंक टैंक चैथम हाउस के एनेट बोर के अनुसार, संगठन का जो मकसद है, उसे पूरा करने में चीन ही आड़े आ रहा है, क्योंकि उसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र शिनजियांग में अलगाववाद की आवाजें उठ रही हैं।

 

आखिर वर्ल्ड टेलीकम्युनिकेशन स्टैंडर्डाइजेशन असेंबली 2024 और इंडिया मोबाइल कांग्रेस में क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने वर्ल्ड टेलीकम्युनिकेशन स्टैंडर्डाइजेशन असेंबली 2024 और इंडिया मोबाइल कांग्रेस में एक बयान दिया है! उथल पुथल के इस वक्त में भारत दुनिया को कॉन्फ्लिक्ट से बाहर लाने और कनेक्ट करने की कोशिश कर रहा है। प्राचीन सिल्क रूट से लेकर मौजूदा के टेक्नोलॉजी रूट तक, भारत का मिशन दुनिया को कनेक्ट करने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने एशिया पैसिफिक में पहली बार हो रही वर्ल्ड टेलीकम्युनिकेशन स्टैंडर्डाइजेशन असेंबली 2024 को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। इसके साथ ही पीएम मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के आठवें एडिशन का भी आगाज़ किया। प्रधानमंत्री ने इस अंतर्राष्ट्रीय इवेंट के मंच से दोहराया कि डिजिटल टेक्नोलॉजी को लेकर एक ग्लोबल फ्रेमवर्क कायम किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ये विषय भारत की जी 20 अध्यक्षता के दौरान उठाया गया था। पीएम ने कहा कि ” अब वक्त आ गया है कि ग्लोबल संस्थाओं को ग्लोबल गवर्नेंस के महत्व को महसूस करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ग्लोबल लेवल पर टेक्नोलॉजी को लेकर एक फ्रेमवर्क की दिशा में काम वक्त की जरूरत है। उन्होंने एविएशन सेक्टर के फ्रेमवर्क की ही तर्ज पर एक सेफ डिजिटल इकोसिस्टम बनाए जाने वकालत की। पीएम ने कहा कि भारत का डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और नेशनल साइबर सेक्योरिटी स्ट्रेटेजी एक सेफ डिजिटल वातावरण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को ही दर्शाता है। पीएम ने WTSA से अपील की वो ऐसे मानक बनाएं जो भविष्य को देखते हुए सेफ और समावेशी हो, इसमें एथिकल एआई और डेटा प्राइवेसी स्टैंडर्ड भी शामिल होने चाहिए।

पीएम ने भारत की टेलीकॉम और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर यात्रा के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा कि जहां तक टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम की बात है, भारत आज की दुनिया में सबसे happening देशों की कैटेगरी में है। उन्होंने कहा कि भारत में 120 करोड़ मोबाइल फोन यूजर्स, 95 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं । इसके साथ ही पूरी दुनिया के 40 फीसदी वित्तीय लेन देन होता है। उन्होंने कहा कि भारत ने ये दिखा दिया है कि आखिरी व्यक्ति तक पब्लिक सेवाओं का लाभ पहुंचाने के लिए डिजिटल कनेक्टिविटी एक अहम हथियार की तरह साबित हो सकता है। पीएम ने कहा WTSA दुनिया कंसेसस यानि आम सहमति के जरिए एंपावर करती है तो इंडिया मोबाइल कांग्रेस दुनिया को कनेक्टिविटी के जरिए जोड़ती है ।

उन्होंने कहा संघर्षों से जूझ रही दुनिया को कनेक्टिविटी और कंसेंसस दोनों को की ही जरूरत है। इस दौरान पीएम ने जी 20 का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा ही वन अर्थ, वन फैमिली और वन फ्यूचर का संदेश दिया है। इसीलिए मौजूदा हालात में WTSA और IMC की साझेदारी एक बेहतरीन संदेश है जहां लोकल और ग्लोबल की कड़ियां आपस में जुड़ जाती हैं और इससे सिर्फ एक देश को नहीं बल्कि पूरी दुनिया को फायदा पहुंचता है। प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि भारत डीपीआई के क्षेत्र में अपने अनुभव दूसरे देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है।

भारत की मोबाइल यात्रा का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा कि 21वीं सदी का ये सफर दुनिया गौर से देख रही है। पहले टेलीकॉम दुनिया के लिए सिर्फ एक सुविधा के तौर पर देखा जाता था लेकिन टेलीकॉम महज कनेक्टिविटी का जरिया नहीं है। भारत में ये समानता और अवसर का माध्यम भी है। पीएम ने कहा कि टेलीकॉम बतौर मीडियम गांवों और शहरों के बीच के गैप को कम करने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि दस साल पहले जब उन्होंने डिजिटल इंडिया की संरचना सामने रखी थी, तब कहा था कि इसे लेकर एक संपूर्ण अप्रोच रखनी होगी। भारत के टेलीकॉम सेक्टर में बदलाव की बात करते हुए पीएम ने कहा कि भारत ने हजारों मोबाइल टावर बनाए हैं , जिनमें आदिवासी, पहाड़ी और बॉर्डर के इलाके भी शामिल हैं।

उन्होंने टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर का जिक्र करते हुए कहा कि रेलवे स्टेशन पर वाई फाई लगाया गया है तो अंडमान निकोबार जैसे इलाकों को अंडरसी केबल से जोड़ा गया है। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर के क्षेत्र में प्रगति पर लिखा कि महज 10 सालों में भारत ने धरती और चांद के बीच की दूरी का आठ गुना ज्यादा ऑप्टिकल फाइबर लगाया गया है। 5 जी को लेकर भारत की कनेक्टिविटी पर पीएम ने कहा कि दो साल पहले लांच गया फाइव जी अब हर जिले से कनेक्टेड है, जिसकी वजह से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 5 जी मार्केट बन गया और भारत अब तेजी से 6जी टेक्नोलॉजी की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।

टेलीकॉम के रिफॉर्म्स के बारे में बात करते हुए पीएम ने जोर देकर कहा कि प्रति जीबी इंटरनेट डेटा का खर्च भारत में 12 सेंट जितना है जबकि दूसरे कई देशों में एक जीबी डेटा 10 से 20 गुना ज्यादा महंगा है। ऐसे में एक औसतन भारत हर महीने में 30 जीबी डेटा का इस्तेमाल करता है। इस के अलावा पीएम मोदी ने डिजिटल टेक्नोलॉजी के लोकतांत्रिक करण का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने ऐसे डिजिटल प्लैटफॉर्म्स बनाए जिन्होंने कई लाख अवसरों का रास्ता खोला, इस दौरान उन्होंने जनधन और आधार का भी जिक्र किया। यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस के बारे में बात करते हुए पीएम ने कहा कि कई कंपनियों को कई अवसर दिए हैं । पीएम ने कहा कि कोविड के वक्त इन डिजिटल प्लैटफॉर्म ने गाइडलाइंस, वैक्सीनेशन और वैक्सीन सर्टिफिकेट में जिस तरह कम्युनिकेशन के जरिए मदद की, वो जगजाहिर है। पीएम ने इस दौरान WTSA में वीमेन नेटवर्क के महत्व पर बात करते हुए मोदी सरकार की वीमेन लेड डेवलपमेंट मुहिम के बारे में बात की .पीएम ने कहा कि भारत में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के जरिए महिलाओं को एंपावर किया गया है, उन्होंने इस दौरान नमो ड्रोण दीदी से लेकर बैंक सखी प्रोग्राम का भी जिक्र किया।

 

रुझान और एग्जिट पोल पर क्या बोले मुख्य चुनाव आयुक्त?

हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ने रुझान और एग्जिट पोल पर तीखी टिप्पणी व्यक्त की है! चुनावों में मतदान खत्म होने से लेकर वोटों की गिनती वाले दिन तक एग्जिट पोल आने, फाइनल रिजल्ट आने से पहले रूझानों और परिणामों के ट्रेंड बताए जाने को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। इस मामले में कड़ा ऐतराज जताते हुए उन्होंने कहा कि एग्जिट पोल्स से एक एक्सपेक्टेशन सेट करने से एक बहुत बड़ा डिस्टार्शन पैदा हो रहा है। मीडिया के लिए भी यह बड़ा आत्ममंथन का विषय है। जब काउंटिंग का समय शुरू होता है तो सुबह 8:05 और 8:10 बजे ही रिजल्ट आने शुरू हो जाते हैं, जस्ट नानसेंस। हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में ही नहीं बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा कि पिछले कुछ चुनावों से दो-तीन चीजें एक साथ हो रही हैं। अगर हम इस पूरे कैनवास को एक साथ देंखे तो यह समझना सभी के लिए बेहद जरूरी है। जिसमें पहले एग्जिट पोल आते हैं, जिसके बारे में कुछ पता नहीं कि उसका सैंपल साइज क्या था, उसका सर्वे कहां हुआ और उसका रिजल्ट कैसे आया। ऐसे में अगर कोई एग्जिट पोल नतीजों से मैच नहीं हुआ तो मेरी क्या जिम्मेदारी है? उसमें चिंतन करने की जरूरत है। इसे भी विभिन्न बॉडीज को देखने की जरूरत है। अब इसी से जुड़ा दूसरा विषय है जो बेहद अहम है। जिस दिन पोलिंग हुई उसके बाद शाम 6 बजे के बाद एग्जिट पोल दिखाने से एक एक्सपेक्टेशन बननी शुरू हुई।

सबको लगने लगा कि यह होने वाला है यानी यह जीतता दिखाई दे रहा है और यह हारता। जबकि इसका कोई साइंटिफिक आधार नहीं है। अब काउंटिंग के दिन का समय शुरू होता है। जिसमें सुबह 8:05 बजे और 8:10 बजे से ही रिजल्ट आने शुरू हो जाते हैं। आयोग ने इसे नॉनसेंस करार दिया। क्योंकि मतगणना के दिन पहले सुबह 8 बजे से 8:30 बजे तक बैलेट पेपर काउंट होते हैं इसके बाद 8:30 बजे से ईवीएम में पड़ी वोटों की गिनती होती है।

आयोग ने कहा कि अब आप बताइए कि मेरी पहली काउंटिग ही सुबह 8:30 बजे से शुरू होती है तो फिर रिजल्ट कैसे। इस बार हमारे पास प्रमाण है जिसमें कुछ जगह लीड वाले मामले सामने लाए गए कि फलां कैंडिडेट को इतने की लीड तो दूसरे को इतने की लीड। आयोग ने हैरानी जताते हुए कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि शुरूआत में लीड वाले यह ट्रेंड एग्जिट पोल को जस्टिफाई करने के लिए किए जाते हों। जिसमें कि हमने तो ऐसा ही कहा था ट्रेंड भी यही हो रहा है और जब वास्तव में रिजल्ट सामने आते हैं तो वह मिसमैच होने लगते हैं। आयोग ने इस मामले में गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह गंभीर विषय है। इस पर चिंतन जरूरी है।

हरियाणा चुनाव के नतीजे आने पर जिस तरह से ईवीएम और बैटरी को लेकर छेड़छाड़ और हैक करने की बात सामने आई। इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि इसमें कोई छेड़छाड़ संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी ने उनसे यह सवाल तक भी किया कि जब पेजर से उड़ा देते हैं तो फिर ईवीएम हैक क्यों नहीं हो सकती? जवाब में आयोग ने कहा कि पेजर कनेक्ट (किसी ना किसी सर्वर से) होता है, जबकि ईवीएम नहीं होती। उन्होंने कहा कि आयोग के पास ईवीएम को लेकर 20 शिकायतें आई हैं। वह सभी का जवाब देंगे। उन्होंने कहा कि इस बार बैटरी का मसला सामने आया, अगली बार क्या नया आएगा पता नहीं, लेकिन हमें लगता है कि आएगा जरूर। बता दें कि राजीव कुमार ने कहा, ‘एग्जिट पोल को हम गवर्न नहीं करते। लेकिन आत्मचिंतन की जरूरत है जरूर है कि सर्वे का सैंपल साइज क्या था, सर्वे कहां हुआ, उसका रिजल्ट कैसे आया, अगर रिजल्ट मैच नहीं किया तो मेरा कोई उत्तरदायित्व है या नहीं? ये सब देखने की जरूरत है। एनबीएस जैसी कुछ संस्थाएं हैं जो एग्जिट पोल्स को गवर्न करती हैं। मेरे हिसाब से अब वक्त आ गया है कि ये संस्थाएं आत्मचिंतन करें।’

मुख्य चुनाव आयुक्त ने संवाददाताओं से कहा कि जिस दिन पोलिंग खत्म हुई, उससे करीब-करीब तीसरे दिन मतगणना होती है। इधर, पोलिंग खत्म होने के दिन शाम छह बजे से बताया जाने लगता है कि ये होने वाला है। लोगों को भी लगता है कि यही होने वाला है। लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार सार्वजनिक नहीं है। जब काउंटिंग का समय शुरू होता है तब सुबह 8 बजके 5 मिनट या 10 मिनट से रिजल्ट आने शुरू हो जाते हैं। यह बिल्कुल फालतू है। उन्होंने बताया, ‘मेरी (चुनाव आयोग की) पहली काउंटिंग 8.30 बजे शुरू होती है। हमारे पास प्रमाण है कि 8.15 या 8.30 बजे से आने लगा कि इतने की लीड, इतने की लीड। ऐसा तो नहीं है कि एग्जिट पोल्स को सही साबित करने के लिए वो ट्रेंड्स आ गए? पहले राउंड की काउंटिंग में अगर 20 मिनट भी लगा तो 8.50 बजे से पहले तो कोई ट्रेंड आ ही नहीं सकता। चुनाव आयोग 9.30 बजे पहला ट्रेंड वेबसाइट पर डालता है। फिर हर दो-दो घंटे में ट्रेंड चरण दर चरण की मतगणना के परिणाम डाले जाते हैं।’

राजीव कुमार ने कहा, ‘मानते हैं कि संवाददाता वहां मौजूद होते हैं जो पहले बता देते हैं। रिजल्ट को स्क्रीन में दिखाना पड़ता है, एजेंट के साइन लेने पड़ते हैं, ऑब्जर्वर से जस्टिफाई करवाना पड़ता है। इस तरह चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आने में आधा घंटा लग सकता है। तो सवाल है कि 8.50 बजे से पहले पहला रुझान कैसे आ जाता है?’ उन्होंने कहा कि ये सब एग्जिट पोल्स से बनी उम्मीदों के कारण होता है। दबाव में फटाफट ट्रेंड्स दिखाए जाने लगते हैं, लेकिन असल परिणाम आने के बाद उम्मीदें टूटती हैं तो बखेड़ा खड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा, ‘उम्मीद और असलियत में अंतर और कुछ नहीं, सिर्फ फ्रस्ट्रेशन है।’ मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि ये एक ऐसा विषय है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इस मामले में चुनाव आयोग के हाथ बंधे हुए हैं, लेकिन उम्मीद है कि संबंधित संस्थाएं जरूर इस ओर ध्यान देंगी।