Friday, March 13, 2026
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आखिर क्या है पीएम मोदी का नया एजेंडा?

आज हम आपको पीएम मोदी का नया एजेंडा बताने जा रहे हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार शपथ लेने के बाद भारत सरकार का कामकाज संभाल लिया है। पीएम मोदी के साथ 71 मंत्रियों ने भी शपथ ली है। आज मंत्रियों को मंत्रालय भी बांट दिए गए हैं। इस बार पीएम मोदी की मंत्रिपरिषद् में एनडीए के घटक दलों का खास तवज्जो दी गई है। दरअसल लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को वोट शेयर और सीटों का बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन बीजेपी अपने एनडीए के घटक दलों के सहयोग से सरकार बना पाई है। बीजेपी नीत एनडीए गठबंधन के खाते में 292 सीटें आई हैं। बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हालांकि, 2019 के मुकाबले 63 सीटें कम है। बीजेपी इस लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई के लिए ऐक्शन मोड में हैं। पीएम मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही सरकारी कामकाज शुरू कर दिया है। आइए जानते हैं मोदी सरकार 3.0 के 100 दिनों के एजेंडे के तहत किस सेक्टर पर सरकार का खास फोकस रहेगा।पीएम मोदी ने आज अपने तीसरे कार्यकाल की पहली फाइल पर हस्ताक्षर करते हुए किसानों को सौगात दी। उन्होंने पहला आधिकारिक कार्य ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ की 17वीं किस्त जारी की। इससे 9.3 करोड़ किसानों को लाभ होगा और करीब 20,000 करोड़ रुपए बांटे जाएंगे। पीएम मोदी के इस फैसले पर केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, अमित शाह, नितिन गडकरी समेत कई मंत्रियों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘किसान कल्याण के प्रति हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता जगजाहिर है। तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने सबसे पहला निर्णय ही किसानों के हित में किया है।

आज प्रधानमंत्री मोदी ने ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ की 17वीं किस्त जारी कर दी, जिसके कारण देश के किसानों के बैंक खातों में 20,000 करोड़ की धनराशि सीधे पहुंच गई। मैं इस किसान हितैषी निर्णय के लिए नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देता हूं।’ दरअसल बीजेपी के खिलाफ किसानों की नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं है। किसानों का गुस्सा ही है जिसके कारण बीजेपी का ग्रामीण वोट बैंक शेयर इस बार काफी घटा है। इस बार मोदी सरकार कृषि क्षेत्र में अच्छे और बड़े फैसले लेकर किसानों को खुश करने की कोशिश करेगी। वहीं सरकारी नौकरियों में भर्ती बढ़ाकर युवाओं को भी अपनी ओर खींचने का प्रयास कर सकती है।

मोदी कैबिनेट 3.0 की पहली बैठक में बड़ा फैसला लिया गया है। इस फैसले के तहत 3 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के अंदर सहायता दी जाएगी। 2015-16 में मोदी सरकार की तरफ से घरों के निर्माण के लिए पात्र ग्रामीण और शहरी परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत की गई थी। अभी तक 10 वर्षों में आवास योजनाओं के तहत पात्र गरीब परिवारों के लिए कुल 4.21 करोड़ घर बनाए गए हैं। पीएमएवाई के तहत निर्मित सभी घरों को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की अन्य योजनाओं के साथ ही अन्य बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, एलपीजी कनेक्शन, बिजली कनेक्शन, जल के लिए नल कनेक्शन आदि प्रदान की जाती है। ऐसे में मोदी 3.0 कैबिनेट की बैठक में लोगों की आवास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 3 करोड़ अतिरिक्त ग्रामीण और शहरी परिवारों को घर बनाने के लिए सहायता प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। इन घरों का निर्माण शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में किया जाएगा। नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार पीएम पद की शपथ ली है और ये उनके मोदी 3.0 कैबिनेट की पहली बैठक थी, जिसमें यह बड़ा फैसला लिया गया है।

भारत की अर्थव्यवस्था ने तो अपनी तरक्की तो तेज की है, लेकिन इससे देश में बेरोजगारी पर बहुत लगाम लगती नजर नहीं आ रही है। इस समस्या को कम करने के लिए सरकार को अलग-अलग मोर्चों पर एकसाथ काम करना होगा। आने वाले 100 दिनों के अंदर सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा। जैसे टैक्स रिफॉर्म्स करने होंगे, ताकि प्राइवेट सेक्टर को मदद मिले, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देना होगा, साथ ही कौशल विकास, बेहतर शैक्षणिक सुधार जैसे काम करने होंगे, PM-VIKAS को तेजी से लागू करना होगा, जिनसे बेहतर कौशल के साथ-साथ नौकरियों की संख्या भी बढ़ेगी। इस बीच सरकार के सामने राज्यों के साथ परामर्श कर लेबर कोड को लागू करने का भी सवाल है। ज्यादातर राज्य वेज कोड को लागू करने के लिए नियम बना चुके हैं।

क्या गृहमंत्री अमित शाह के लिए भी बढ़ सकती है चुनौती?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गृहमंत्री अमित शाह के लिए भी चुनौती बढ़ सकती है या नहीं! एनडीए सरकार में एक बार फिर से केंद्रीय गृह मंत्रालय की कमान अमित शाह को मिली है। उनके कमान संभालते ही अब सबसे पहली चुनौती जम्मू-कश्मीर की सामने खड़ी है। जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार 30 सितंबर तक विधानसभा चुनाव कराने हैं। इसके लिए चुनाव आयाेग तैयारी भी कर रहा है। लेकिन जिस तरह से पिछले कुछ समय से और अब रविवार को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों की शपथ ग्रहण समारोह में जम्मू के रियासी में आतंकवादियों ने तीर्थयात्रियों से भरी बस पर ओपन फायरिंग की। इसे देखते हुए 370 हटने के बाद सूबे में पहली बार हो रहे विधानसभा चुनावों को शांतिपूर्ण तरीके से कराना बड़ी चुनौती होगी। जम्मू-कश्मीर में मंत्रालय को दो फ्रंट पर काम करना होगा। पिछली सरकार में भी गृह मंत्री रहे अमित शाह ने कहा भी था कि 1643 किलोमीटर दूरी में फैली पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर कंटीले तार लगाए जाएंगे। यहां का फ्री मूवमेंट खत्म किया जाएगा। अभी यहां कुछ किलोमीटर हिस्से में ही बाढ़ लगाने का काम पूरा किया जा सकता है।सबसे पहले तो सूबे में विधानसभा चुनाव कराना बड़ी चुनौती होगी। जिसे किसी भी सूरत में आतंकी ग्रुप शांतिपूर्ण तरीके से होने में बाधा बन सकते हैं। जैसा की पिछले कुछ समय से देखने में आ रहा है कि जब भी सरकार की तरफ से जम्मू-कश्मीर में शांति की बात की जाती है। उसके कुछ ही दिनों बाद घाटी में कोई ना कोई आतंकी घटना को अंजाम दे दिया जाता है। जिसे देखते हुए लग रहा है कि पाकिस्तान के समर्थन में यहां आतंकी घटनाओं को जो अंजाम दिया जा रहा है। उसका पूरी तरह से खात्मा करना सरकार के लिए बड़ा काम होगा।

इसके अलावा शांति की राह देख रहे मणिपुर में फिर से कानून-व्यवस्था कायम करना बड़ा काम होगा। यहां मेतई और कुकी समुदाय के बीच चल रही समस्या को खत्म करते हुए मणिपुर को फिर से मुख्य धारा में लाना बड़ा चैलेंज होगा। हालांकि, इसके लिए लगातार काम किया जा रहा है। लेकिन बीच-बीच में जिस तरह से यहां घटनाएं सामने आ रही हैं। उसे देखते हुए मणिपुर में शांति बहाल करने का काम आसान नहीं होगा। इसके लिए राज्य सरकार के साथ काम करते हुए गृह मंत्रालय को बड़ा काम करना होगा। जिससे की यहां फिर से लोग डर और भयमुक्त अपना जीवन यापन कर सके। मोदी सरकार-2 में जिस तरह से देश को नक्सली मुक्त करने के दावे किए गए थे। उन दावों को अमल में लाना होगा। खासतौर से छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित इलाकों को फिर से समाज की मुख्य धारा में लाने का काम करना होगा। जिससे की यह इलाके नक्सली मुक्त हो सकें। हालांकि, इसके लिए पिछली सरकार ने भी लगातार काम किया और कई मामलों में बड़ी संख्या में नक्सली मारे गए। लेकिन अभी भी बीच-बीच में जिस तरह से यहां नक्सली घटनाएं सामने आती हैं। उनसे पूरी तरह से पार पाना होगा।

इसी तरह से भारत-म्यांमार बॉर्डर को पूरी तरह से अभेद्य बनाने के लिए यहां फेंसिंग करने का काम पूरा करना होगा। पिछली सरकार में भी गृह मंत्री रहे अमित शाह ने कहा भी था कि 1643 किलोमीटर दूरी में फैली पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर कंटीले तार लगाए जाएंगे। यहां का फ्री मूवमेंट खत्म किया जाएगा। अभी यहां कुछ किलोमीटर हिस्से में ही बाढ़ लगाने का काम पूरा किया जा सकता है। बता दें कि 370 हटने के बाद सूबे में पहली बार हो रहे विधानसभा चुनावों को शांतिपूर्ण तरीके से कराना बड़ी चुनौती होगी। जम्मू-कश्मीर में मंत्रालय को दो फ्रंट पर काम करना होगा। सबसे पहले तो सूबे में विधानसभा चुनाव कराना बड़ी चुनौती होगी। जिसे किसी भी सूरत में आतंकी ग्रुप शांतिपूर्ण तरीके से होने में बाधा बन सकते हैं। जैसा की पिछले कुछ समय से देखने में आ रहा है कि जब भी सरकार की तरफ से जम्मू-कश्मीर में शांति की बात की जाती है। इस पूरी सीमा को फेंसिंग से सुरक्षित किया जाएगा। जबकि 1 जुलाई से देशभर में लागू होने वाले तीनों नए आपराधिक कानूनों को भी लागू कराना अहम होगा। ताकि कहीं कोई दिक्कत पेश ना आए। पैरा मिलिट्री फोर्स में जरूरत के मुताबिक बढ़ोतरी और पुलिस रिफार्म का काम भी करना होगा। इसके अलावा अन्य कई मुद्दों पर भी काम करना होगा।

क्या भारतीय डिप्लोमेसी से निपट पाएंगे विदेश मंत्री?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारतीय डिप्लोमेसी से विदेश मंत्री निपट पाएंगे या नहीं! मोदी 2.0 में भारत की विदेश नीति में कई आयाम अलग दिखे। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान यूक्रेन युद्ध के बीच बंटी दुनिया में पश्चिमी और रूसी ब्लॉक दोनों को एक मंच पर ले आने में कामयाबी से लेकर खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज की तरह दिखाने की कवायद। हालांकि इस दौरान कनाडा की ओर से लगे आरोप और धार्मिक आजादी के मामले पर अमेरिका की टिप्पणियां चुनौती बनकर भारतीय डिप्लोमेसी की राह को चुनौती पूर्ण बनाती। ऐसे में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और क्षेत्रीय संघर्षों की मौजूदगी ने भारत की चुनौतियों को और बढ़ाया ही है। ORF के फेलो कबीर तनीजा कुछ ऐसा ही मानते हैं, वो कहते हैं कि ‘जयशंकर की प्राथमिकताएं उन मुद्दों को लेकर वहां से शुरू होती हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले अधूरी छोड़ी थी। रोज बदलती दुनिया कि जटिलताएं कम नहीं हो रही है,बल्कि बढ़ ही रही हैं। यूक्रेन, गाज़ा में हो रहे संघर्षों का स्वरूप बदला नहीं है। ऐसे में जैसा कि बीते सालों से वो करते आ रहे हैं, उसी के तह वो भारत की प्राथमिकताओं की ही सुरक्षा करने का काम करने की कोशिश करेंगे, उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में ये होगा कि जिओ पॉलिटिकल घटनाओं का बुरा प्रभाव इकोनमी पर ना पड़े।’ ऐसे में माना जा रहा है कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि फॉरेन पॉलिसी के मूल ढांचे में चाहे बदलाव ना दिखे, लेकिन डिप्लोमेसी में कुछ स्थूल बदलाव दिख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जेएनयू में पढ़ाने वाले अमिताभ सिंह कहते हैं कि ‘इजरायल हमास संघर्ष के मद्देनज़र पिछले साल 7 अक्टूबर के हमले के बाद भारत का रुख आतंकवाद को लेकर एक मजबूत संदेश लिए हुआ था, उसमें कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही दुनिया भर में संघर्षों को लेकर जिस तरह राइटविंग सरकारें रुख रखती हैं, उसे रखना अब भारत के लिए मुश्किल होगा, हालांकि मिडिल ईस्ट के मुद्दे पर वो पिछली सरकार में देखने को मिला था। इसके साथ ही विदेशी मंचों में मोदीमय माहौल में कमी आने की संभावना है, जो कि पिछली साफ बार साफ तौर से दिखाई पड़ी थी।’

जानकार मानते हैं कि पड़ोसी देशों को लेकर चीन की आक्रामकता एक चुनौती बनी रहेगी। इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता कि पिछले साल से लगातार भारत नेबरहुड फर्स्ट की पॉलिसी पर लौटता आ रहा है, जिसमें नेपाल और श्रीलंका समेत दूसरे देशों को आर्थिक मदद और दूसरी कोशिशों के जरिए संबंध और बेहतर किए जाने की कवायद की जा रही है। लेकिन मालदीव समेत कई पड़ोसी देशों की नीति चीन के प्रभाव में हैं । ऐसे में शपथ ग्रहण में मुइज्जू का शामिल होना सकारात्मक संकेत तो है, लेकिन अपनी मूल नीति चीन परस्ती से वो पीछे हटेगा ऐसा लगता नहीं। वहीं श्रीलंका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं तो ऐसे में रानिल विक्रमासिंघे शायद जियो पॉलिटिकल समीकरणों के लिहाज से समर्थन तलाश रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके पड़ोसियों की विदेश नीति को लेकर भारत को लगातार काम करना होगा।

चीन को लेकर डिप्लोमेसी एक ऐसी धुरी है, जिसके इर्द गिर्द विदेश नीति के कई आयाम गढ़े जाते हैं। जहां एक ओर रूस के साथ संबंधों को और गहरा कर चीन और रूस के बीच की नजदीकी की काट तलाशनी होगी, वहीं चुनौती चीन के साथ संतुलन बनाने की भी है। बता दें कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि फॉरेन पॉलिसी के मूल ढांचे में चाहे बदलाव ना दिखे, लेकिन डिप्लोमेसी में कुछ स्थूल बदलाव दिख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जेएनयू में पढ़ाने वाले अमिताभ सिंह कहते हैं कि ‘इजरायल हमास संघर्ष के मद्देनज़र पिछले साल 7 अक्टूबर के हमले के बाद भारत का रुख आतंकवाद को लेकर एक मजबूत संदेश लिए हुआ था, उसमें कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है। अमेरिका और भारत के रिश्तों की नजदीकी को लेकर चीन की असुरक्षा को और मजबूत करना होगा। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों पर भारतीय रणनीतिकार लगातार नजर रखना चाहेंगे, क्योंकि वहां कौन सत्ता में आएगा, इससे तय होगा कि दोनों देशों के बीच संबंधों की नजदीकी रेखा क्या होगी ?

आखिर अपने ही क्षेत्र में कैसे हारी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी अपने ही क्षेत्र में कैसे हारी! 2024 का आम चुनाव चौंकाने वाला रहा। नरेंद्र मोदी की अगुआई में NDA लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में जरूर सफल रहा, लेकिन इस चुनाव ने कई मिथ तोड़ने के साथ कुछ रिवर्स ट्रेंड भी दिखाए। सबसे अहम ट्रेंड था ऑल्टरनेटिव मीडिया और सोशल मीडिया पर विपक्षी स्पेस का मजबूत होकर उभरना। समानांतर नैरेटिव में विपक्ष इस बार बीस पड़ा। दिलचस्प बात है कि 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में BJP के उभरने के पीछे जो प्लेटफॉर्म सबसे सशक्त मीडियम रहा, 2024 में वहीं से उनके लिए सबसे ज्यादा प्रतिरोध उभरा। चुनाव में विपक्ष पूरी तरह सोशल मीडिया पर निर्भर रहा। खासकर I.N.D.I.A. के घटक दलों ने अपनी बात पहुंचाने, लोगों से जुड़ने के लिए इस मीडियम का इस्तेमाल किया। कांग्रेस ने खासतौर पर सार्वजनिक मंचों से मुख्यधारा की मीडिया के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर की। राहुल गांधी ने एक भी इंटरव्यू नहीं दिया। विपक्ष और उनके समर्थकों ने पूरी ताकत सोशल मीडिया पर लगाई, खासकर यूट्यूब पर। इसमें social media influencers का भी साथ मिला। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी का BJP के खिलाफ बनाया गया विडियो पूरे देश में वायरल हुआ, करोड़ों व्यू मिले। विपक्ष ने भी इस विडियो का इस्तेमाल किया। ऐसे विडियो से इस बात को और बल मिला कि BJP 400 सीटें जीतने के बाद संविधान बदल सकती है।

आंकड़े भी बताते हैं कि पिछले एक साल के दौरान सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर विपक्ष लगातार मजबूत हुआ। हालांकि चुनाव से ठीक पहले BJP और खुद नरेंद्र मोदी को इसका एहसास हो गया था। इलेक्शन के पहले मोदी ने social media influencers से मुलाकात भी की थी। लेकिन, विपक्ष ने शुरू में ही जो बढ़त बना ली थी, उसे उसका फायदा मिला। संविधान बदलने का मुद्दा हो, युवाओं को रोजगार का मसला या कोई और बात, विपक्ष ने सोशल मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। वोटिंग पैटर्न पर आए ट्रेंड जाहिर करते हैं कि चुनाव पर सोशल मीडिया का कितना बड़ा असर पड़ा। 18 से 30 साल के युवाओं ने 2014 और 2019 की तुलना में इस बार विपक्ष को अधिक वोट दिया। यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर राहुल गांधी के विडियो 300% अधिक देखे गए। कांग्रेस का घोषणापत्र एक करोड़ बार डाउनलोड हुआ। यूट्यूब पर BJP के खिलाफ कंटेंट की व्यूअरशिप अधिक रही।

ऑल्टरनेटिव मीडिया और सोशल मीडिया ने मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में ठीक वैसी ही भूमिका निभाई, जैसा कि UPA-2 के दौर में हुआ था। दरअसल, इसकी शुरुआत किसान आंदोलन के समय ही हो गई थी। तब किसानों ने सोशल मीडिया का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया और पूरे साल आंदोलन चला। आखिरकार किसान अपनी मांग मनवाने में सफल रहे। हालांकि इस बार जब विपक्ष सोशल मीडिया पर अपनी पहुंच बढ़ा रहा था, तब BJP ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वह जमीन पर अधिक ताकतवर हो चुकी है। लेकिन, उसका आकलन कहीं न कहीं गलत साबित हुआ, खासकर पहली बार वोट डालने वालों के बारे में। ऐसे मतदाताओं के बीच पिछले कुछ बरसों में ब्रैंड राहुल भी मजबूत हुआ है।

10 साल पहले, 2014 में लोगों ने पहली बार ऐसा चुनाव देखा था जिसका एक रणक्षेत्र सोशल मीडिया भी बना। नरेंद्र मोदी वहां सुपरस्टार बनकर सामने आए। पूरे चुनाव के दौरान सोशल मीडिया ने न सिर्फ खबरें ब्रेक कीं, बल्कि ओपिनियन मेकिंग में भी दखल दिया। तब लोकसभा की 163 सीटें शहरी या विकसित होते क्षेत्रों में आती थीं। जानकारों के अनुसार, इन जगहों पर सोशल मीडिया ने चुनाव प्रचार और लोगों के मत को प्रभावित करने में प्रभावी भूमिका निभाई। 2014 में सीमित इंटरनेट विस्तार के बावजूद सोशल मीडिया ने चुनाव पर गहरा असर डाला था। तब विपक्ष इस प्लैटफॉर्म से पूरी तरह अनजान-सा दिखा। लेकिन, तब जो सबक मिला तो उसने धीरे-धीरे यहां भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी।

एक दशक पहले सोशल मीडिया ने पहली बार भारत में कैंपेन और नैरेटिव को आगे ले जाने के सशक्त हथियार के रूप में उपयोग होने की संभावना की पुष्टि की थी। इससे पहले अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन हो या दिल्ली गैंग रेप के बाद शुरू हुआ आंदोलन, इनकी रूपरेखा सोशल मीडिया पर रची गई। नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने तभी इसमें छिपी संभावना को तलाशा था और एक मजबूत टीम बनाकर यहां कैंपेन शुरू कर दिया था। इस प्लैटफॉर्म पर मोदी देश ही नहीं दुनिया के लोकप्रिय नेता बनकर उभरे। आज भी वह सोशल मीडिया पर सबसे मजबूत हैं। लेकिन, कहीं न कहीं विपक्ष और Social Media Influencers के सामूहिक हमले का काउंटर सत्ता पक्ष नहीं कर सका। जिस मैदान पर BJP और नरेंद्र मोदी अजेय रहते थे, इस चुनाव में उसी मैदान पर वे पूरी तरह बैकफुट पर दिखे।

क्या अब भारत की विदेश नीति में आएगा बदलाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब भारत की विदेश नीति में बदलाव आएगा या नहीं! विपक्ष जितनी भी खुशियां मना ले, लेकिन हकीकत यही है कि नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत ने उनकी ग्लोबल इमेज को और निखारा है। अब वह एक गठबंधन सरकार के नेता के रूप में अपनी बात रखेंगे, जिसमें कई राजनीतिक दल हैं। इससे भारत की भू-राजनीतिक स्थिति मजबूत ही होगी। इस आम चुनाव ने विपक्षी दलों को वापसी का मौका दिया, जिसे पश्चिम और पड़ोसी देशों में भारतीय लोकतंत्र की जीत के रूप में देखा जा रहा है। देश की लोकतांत्रिक साख एक महत्वपूर्ण कारण है कि मोदी सरकार पिछली सरकारों के गुटनिरपेक्ष दर्शन से व्यावहारिक multi-aligned policy में आसानी से बदलाव करने में सक्षम रही है।

देश की विदेश नीति में बड़े बदलाव की गुंजाइश नहीं दिखती। इसकी वजह है कि जो चार शख्सियतें इसे प्रभावित करती हैं, वे बदली नहीं हैं। वे लोग हैं – पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह। केवल एक अपवाद सुनने को मिला है NSA अजित डोभाल का। उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है और अब आगे जिम्मेदारी लेने के प्रति अनिच्छा जताई है।

विदेश नीति में कुछ सुधार हो सकते हैं। विश्व मंच पर मोदी की मौजूदगी के बावजूद उनकी सरकार को आम तौर पर हिंदू राइट विंग और बहुसंख्यकों की सरकार के तौर पर देखा जाता रहा है। पश्चिम का मीडिया इसी तरह से मोदी सरकार की व्याख्या करता है। इसकी वजह से खाड़ी देशों के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक करीबी के बाद भी समय-समय पर मुस्लिम वर्ल्ड के साथ भारत के रिश्ते पर असर पड़ा है। मसलन, साल 2022 में जब BJP की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा और पार्टी के दिल्ली मीडिया प्रमुख नवीन कुमार जिंदल ने पैगंबर मोहम्मद साहब को लेकर अपमानजनक बयान दिए तो इस्लामिक देशों के संगठन OIC ने आपत्ति जताई थी। BJP नेतृत्व को इस पर तुरंत एक्शन लेना पड़ा था। नूपुर को पार्टी ने निलंबित कर दिया, जबकि जिंदल को निकाल दिया गया। विदेश मंत्रालय ने OIC के बयान को बेबुनियाद और संकीर्ण मानसिकता का बताया था। लेकिन, इस प्रकरण ने कूटनीतिक बेचैनी पैदा कर दी थी।

हाल ही में मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान चला। इसकी वजह से कई दूसरी चीजों के साथ चीन की तरफ झुकाव रखने वाले मोहम्मद मुइज्जू को भी जीत मिल गई। नवंबर 2023 में वह मालदीव के राष्ट्रपति बन गए। रोचक बात यह है कि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में जो विदेशी मेहमान आए, उनमें मुइज्जू भी थे। इस साल की शुरुआत में बांग्लादेश में कुछ विपक्षी राजनीतिक धड़ों ने भी ‘इंडिया आउट’ अभियान चलाने का प्रयास किया। हालांकि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। मालदीव और बांग्लादेश, दोनों ही मुस्लिम बहुल देश हैं। उनके यहां एक तबका भारत में दक्षिणपंथी सरकार से चिंतित है।

मोदी सरकार में TDP और JDU जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं। ऐसे में इस सरकार की दक्षिणपंथी छवि को बदलना चाहिए। इन दलों को धर्मनिरपेक्ष और अल्पसंख्यक हितैषी माना जाता है। लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार के सीएम और JDU प्रमुख नीतीश कुमार ने मुस्लिम मतदाताओं से कहा था, ‘आपको सांप्रदायिक विवादों के बारे में पहले से पता होना चाहिए। कब्रिस्तान उपेक्षित रहे। मैंने फेंसिंग कराई। यह कभी मत भूलना।’ TDP ने साफ कर दिया है कि वह OBC सूची के तहत मुसलमानों को 4% आरक्षण देने की नीति जारी रखेगी। यह BJP के रुख के विपरीत है, जो मुसलमानों के लिए ‘हिंदू’ OBC कोटा के तहत आरक्षण खत्म करने के पक्ष में है। BJP नेताओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश के मुस्लिमों के खिलाफ बोलना मौजूदा राजनीतिक हालात में सही नहीं होगा।

मोदी सरकार ने पहले ही अपनी इमेज बदलनी शुरू कर दी है। 7 जून को पहली बार NDA के सदस्यों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ‘सर्व पंथ समभाव’ पर यकीन करती है। कूटनीतिक स्तर पर दोस्ताना और मिलनसार सरकार की छवि कई सारे दोस्त बनाने में मदद करेगी, खासतौर पर तेल उत्पादक अरब वर्ल्ड में। साथ ही, भारत के खिलाफ पाकिस्तान के लगातार चलने वाले अभियान को कमजोर करेगी। मोदी ने शपथ ग्रहण से पहले ही बदलाव के प्रयास को भांपना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते के साथ पहली बार मेसेज के जरिये बात की। लेकिन, उन्होंने लाई को कॉल नहीं किया। चीन ने पिछले महीने हुए चुनाव में लाई की जीत को मान्यता नहीं दी है। वह ताइवान पर हक जताता है। ऐसे में मोदी और लाई की बातचीत उसे भड़काने के लिए काफी थी। उसने भारत को ‘वन चाइना पॉलिसी’ की याद दिलाते हुए कहा कि वह ताइवान को अलग देश के रूप में मान्यता नहीं देता।

एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या नई सरकार BJP की इच्छा पर आगे बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाक अधिकृत कश्मीर के मुद्दे को फिर से उठाएगी। अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि PoK हमारा है और हम इसे वापस लेंगे। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इसके लिए उठाया जाने वाला कदम डिप्लोमैटिक होगा या फिर मिलिट्री एक्शन। नई NDA सरकार पुरानी BJP सरकार की तरह दिखेगी जिसमें सही चेक और बैलेंस होंगे। विश्व मंच पर भारत के लिए यह अच्छी खबर है।

आखिर आतंकवादियों ने शाम को ही क्यों किया बस पर हमला?

हाल ही में आतंकवादियों ने शाम को बस पर हमला कर दिया जो एक पैटर्न की ओर संकेत देता है! जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में एक बस पर हुए हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों को पकड़ने के लिए अभियान जारी है। ड्रोन, खोजी कुत्तों समेत निगरानी उपकरणों से लैस सुरक्षा बलों ने टीमें तैनात कर दी हैं। ये आतंकवादी लश्कर-ए-तैबा संगठन से जुड़े हो सकते हैं। हमले में पांच महिलाएं, तीन पुरुष और दो साल का एक बच्चा मारा गया है। हमले में बस ड्राइवर और कंडक्टर की भी मौत हो गई। बता दें कि पुंछ जिले के सुरनकोट इलाके में भारतीय वायुसेना के काफिले पर आतंकी हमला शाम के वक्त ही किया गया था। सूत्रों का कहना है कि असल में आतंकी जिस भी एरिया में हमला कर रहे हैं उनके पैटर्न को देखते हुए यह लग रहा है कि वह हमला करने से पहले वहां से भागने के सारे रास्ते तलाश लेते हैं। जांच के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) भी मौके पर पहुंची है। गृह मंत्रालय इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी निगाहें जमाए हुए है। शिव खोड़ी से कटरा जा रही यह बस 53 सीटर थी। इसमें 50 तीर्थयात्री सवार थे।

9 की मौत हो गई जबकि 41 घायल हैं। घायलों में ज्यादातर की हालत स्थिर बताई जा रही है। सूत्रों का कहना है कि आतंकियों ने बस के खाई में गिरने के बाद भी 15 से 20 मिनट तक फायरिंग की। इससे लगता है कि अगर बस खाई में ना गिरती तो आतंकियों का इरादा मास किलिंग यानी सभी यात्रियों की हत्या करने का था। आतंकियों ने नए पैटर्न के साथ यात्रियों की बस पर यह हमला किया। घायलों में 21 पुरुष और 20 महिलाएं हैं। रविवार शाम 6:10 पर बस पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले में स्थानीय राजबाग पौनी के रहने वाले बस ड्राइवर विजय कुमार और कटरा निवासी कंडक्टर अर्जुन की भी मौत हो गई। बस में सवार कुछ यात्रियों ने मीडिया को बताया कि जब बस ढलान पर थी तो एक आतंकी फौजी वर्दी में सड़क के बीचों-बीच बैठा था। बस की रफ्तार धीमी होते ही उसने फायरिंग शुरू कर दी। फिर और तरफ से भी बस पर फायरिंग होने लगी। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। ड्राइवर को भी गोली लगी और उनका बस से नियंत्रण खो गया। बस खाई में गिर गई। तब भी आतंकी बस पर गोलियां बरसाते रहे।

फरार आतंकियों की तलाश में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और सेना ने साथ मिलकर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। पहाड़ी इलाके में आतंकियों के छिपे होने की आशंका को देखते हुए ड्रोन की भी मदद ली जा रही है। मौके पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के DGP आर. आर. स्वैन और रियासी की SSP मोहिता शर्मा समेत अन्य तमाम अफसर पहुंचे। इस बीच घटनास्थल पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की एक टीम भी पहुंची। फरेंसिक टीम ने मौके से सैंपल इकट्ठा किए हैं।

जिस तरह से बस पर हमला किया गया उसे देखते हुए सुरक्षा एजेंसियां मान रही है कि आतंकियों की संख्या दो से तीन हो सकती है। हमले के तरीके को देखते यह भी लग रहा है कि यह एकदम ट्रेंड आतंकी थे। जैसा की पहले भी शक जताया गया था कि आतंकियों के भेष में पाकिस्तान आर्मी से रिटायर कुछ ‘जवानों’ को भी आतंकी गतिविधियों में शामिल किया जा रहा है। खासतौर से कहां फायरिंग करनी है ताकि एकदम सटीक गोलियां बरसाई जा सकें। इस हमले के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैबा और जैश-ए-मोहम्मद के इशारों पर काम करने वाला TRF यानी द रेजिस्टेंस फ्रंट के हाथ होने का शक है।

जम्मू-कश्मीर में हाल ही में हो रहे आतंकी हमलों में ज्यादातर अटैक शाम के वक्त किए जा रहे हैं।रविवार शाम 6:10 पर बस पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले में स्थानीय राजबाग पौनी के रहने वाले बस ड्राइवर विजय कुमार और कटरा निवासी कंडक्टर अर्जुन की भी मौत हो गई। बस में सवार कुछ यात्रियों ने मीडिया को बताया कि जब बस ढलान पर थी तो एक आतंकी फौजी वर्दी में सड़क के बीचों-बीच बैठा था। बस की रफ्तार धीमी होते ही उसने फायरिंग शुरू कर दी। 4 मई को भी पुंछ जिले के सुरनकोट इलाके में भारतीय वायुसेना के काफिले पर आतंकी हमला शाम के वक्त ही किया गया था। सूत्रों का कहना है कि असल में आतंकी जिस भी एरिया में हमला कर रहे हैं उनके पैटर्न को देखते हुए यह लग रहा है कि वह हमला करने से पहले वहां से भागने के सारे रास्ते तलाश लेते हैं।

क्या अब भारत को फिर से बचने के लिए तैयार है विदेश मंत्री एस जयशंकर?

विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत को फिर से बचने के लिए तैयार है! मोदी 2.0 में भारत की विदेश नीति में कई आयाम अलग दिखे। G 20 की अध्यक्षता के दौरान यूक्रेन युद्ध के बीच बंटी दुनिया में पश्चिमी और रूसी ब्लॉक दोनों को एक मंच पर ले आने में कामयाबी से लेकर खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज़ की तरह दिखाने की कवायद। हालांकि इस दौरान कनाडा की ओर से लगे आरोप और धार्मिक आजादी के मामले पर अमेरिका की टिप्पणियां चुनौती बनकर भारतीय डिप्लोमेसी की राह को चुनौती पूर्ण बनाती। ऐसे में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और क्षेत्रीय संघर्षों की मौजूदगी ने भारत की चुनौतियों को और बढ़ाया ही है।इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता कि पिछले साल से लगातार भारत नेबरहुड फर्स्ट की पॉलिसी पर लौटता आ रहा है, जिसमें नेपाल और श्रीलंका समेत दूसरे देशों को आर्थिक मदद और दूसरी कोशिशों के जरिए संबंध और बेहतर किए जाने की कवायद की जा रही है। लेकिन मालदीव समेत कई पड़ोसी देशों की नीति चीन के प्रभाव में हैं । ORF के फेलो कबीर तनीजा कुछ ऐसा ही मानते हैं, वो कहते हैं कि जयशंकर की प्राथमिकताएं उन मुद्दों को लेकर वहां से शुरू होती हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले अधूरी छोड़ी थी।

रोज बदलती दुनिया कि जटिलताएं कम नहीं हो रही है,बल्कि बढ़ ही रही हैं। यूक्रेन, गाज़ा में हो रहे संघर्षों का स्वरूप बदला नहीं है। ऐसे में जैसा कि बीते सालों से वो करते आ रहे हैं, उसी के तरह वो भारत की प्राथमिकताओं की ही सुरक्षा करने का काम करने की कोशिश करेंगे, उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में ये होगा कि जिओ पॉलिटिकल घटनाओं का बुरा प्रभाव इकोनमी पर ना पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे।

हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि फॉरेन पॉलिसी के मूल ढांचे में चाहे बदलाव ना दिखे, लेकिन डिप्लोमेसी में कुछ स्थूल बदलाव दिख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जेएनयू में पढ़ाने वाले अमिताभ सिंह कहते हैं कि ” इजरायल हमास संघर्ष के मद्देनज़र पिछले साल 7 अक्टूबर के हमले के बाद भारत का रुख आतंकवाद को लेकर एक मजबूत संदेश लिए हुआ था, उसमें कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है।

इसके साथ ही दुनिया भर में संघर्षों को लेकर जिस तरह राइटविंग सरकारें रुख रखती हैं, उसे रखना अब भारत के लिए मुश्किल होगा, हालांकि मिडिल ईस्ट के मुद्दे पर वो पिछली सरकार में देखने को मिला था। इसके साथ ही विदेशी मंचों में मोदीमय माहौल में कमी आने की संभावना है, जो कि पिछली साफ बार साफ तौर से दिखाई पड़ी थी। ”

जानकार मानते हैं कि पड़ोसी देशों को लेकर चीन की आक्रामकता एक चुनौती बनी रहेगी। इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता कि पिछले साल से लगातार भारत नेबरहुड फर्स्ट की पॉलिसी पर लौटता आ रहा है, जिसमें नेपाल और श्रीलंका समेत दूसरे देशों को आर्थिक मदद और दूसरी कोशिशों के जरिए संबंध और बेहतर किए जाने की कवायद की जा रही है। लेकिन मालदीव समेत कई पड़ोसी देशों की नीति चीन के प्रभाव में हैं ।

ऐसे में शपथ ग्रहण में मुइज्जू का शामिल होना सकारात्मक संकेत तो है, लेकिन अपनी मूल नीति चीन परस्ती से वो पीछे हटेगा ऐसा लगता नहीं। वहीं श्रीलंका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं तो ऐसे में रानिल विक्रमासिंघे शायद जियो पॉलिटिकल समीकरणों के लिहाज से समर्थन तलाश रहे हैं। बता दें कि इस दौरान कनाडा की ओर से लगे आरोप और धार्मिक आजादी के मामले पर अमेरिका की टिप्पणियां चुनौती बनकर भारतीय डिप्लोमेसी की राह को चुनौती पूर्ण बनाती। ऐसे में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और क्षेत्रीय संघर्षों की मौजूदगी ने भारत की चुनौतियों को और बढ़ाया ही है।उसी के तरह वो भारत की प्राथमिकताओं की ही सुरक्षा करने का काम करने की कोशिश करेंगे, उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में ये होगा कि जिओ पॉलिटिकल घटनाओं का बुरा प्रभाव इकोनमी पर ना पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे। ORF के फेलो कबीर तनीजा कुछ ऐसा ही मानते हैं, वो कहते हैं कि जयशंकर की प्राथमिकताएं उन मुद्दों को लेकर वहां से शुरू होती हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले अधूरी छोड़ी थी। लेकिन बावजूद इसके पड़ोसियों की विदेश नीति को लेकर भारत को लगातार काम करना होगा।

क्या मालदीव के राष्ट्रपति खेल रहे हैं दोगला खेल?

वर्तमान में मालदीव के राष्ट्रपति दोगला खेल खेल रहे मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत में मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए आए और नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के साथ रिश्ते सुधरने की उम्मीद जता रहे थे। पीएम मोदी से भी उनकी बातचीत हुई और सोमवार केंद्रीय मंत्री एस जयशंकर ने मुइज्जू के साथ मीटिंग की। जब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत में थे और घनिष्ठ और ऐतिहासिक संबंधों को बढ़ाने की बात कर रहे थे उसी समय उनके देश में एक संसदीय समिति ने तीन समझौतों की समीक्षा की घोषणा कर दी।मोदी सरकार के नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के बीच रिश्ते सुधरने की उम्मीद है। एक ओर रिश्ते सुधरने की बात कही जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर मालदीव के सरकारी प्रसारक पब्लिक सर्विस मीडिया ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का लाइव प्रसारण आखिरी वक्त में रद्द कर दिया। इस समझौते पर मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और भारत समर्थक नेता इब्राहिम सोलिह ने भारत के साथ हस्ताक्षर किए थे। अब इस समीक्षा के पीछे यह कहा जा रहा है कि इनमें कथित तौर पर मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन किया गया था। इतना ही नहीं मोदी के शपथ ग्रहण का लाइव प्रसारण भी वहां रोक दिया गया। मालदीव की स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सांसद अहमद अजान ने कहा कि संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा सेवा समिति ने सोलिह के प्रशासन द्वारा मालदीव की संप्रभुता और स्वतंत्रता को कमजोर करने वाली कार्रवाइयों की जांच के लिए एक संसदीय जांच करने का फैसला किया है। अजान ने संसदीय जांच शुरू करने का प्रस्ताव रखा और आरोप लगाया कि पिछली सरकार के कार्यों ने देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता को प्रभावित किया है। मुइज्जू की सरकार ने पिछले साल घोषणा की थी कि वह मालदीव के जलक्षेत्र में संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए भारतीय नौसेना के साथ समझौते को रिन्यू नहीं करने जा रही है।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भले ही भारत में थे लेकिन मालदीव में वहां की सरकार की नफरत भारत के खिलाफ कम होती नहीं दिख रही है। मुइज्जू भारत मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए भारत आए थे। शपथ ग्रहण में आने से पहले मुइज्जू की ओर से कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होना उनके लिए सम्मान की बात होगी। मोदी सरकार के नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के बीच रिश्ते सुधरने की उम्मीद है। एक ओर रिश्ते सुधरने की बात कही जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर मालदीव के सरकारी प्रसारक पब्लिक सर्विस मीडिया ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का लाइव प्रसारण आखिरी वक्त में रद्द कर दिया।

पिछले साल 17 नवंबर को मालदीव का राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू की यह पहली भारत यात्रा थी। मुइज्जु का रुख चीन समर्थक है। उनके मालदीव के राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद से भारत और मालदीव के संबंधों में भारी तनाव पैदा हो गया था। उन्होंने शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद अपने देश से भारतीय सैन्यकर्मियों को वापस बुलाए जाने की मांग की थी। इस महीने की शुरुआत में भारतीय सैन्यकर्मियों की जगह आम नागरिकों को तैनात किया गया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और भारत समर्थक नेता इब्राहिम सोलिह ने भारत के साथ हस्ताक्षर किए थे।

अब इस समीक्षा के पीछे यह कहा जा रहा है कि इनमें कथित तौर पर मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन किया गया था। इतना ही नहीं मोदी के शपथ ग्रहण का लाइव प्रसारण भी वहां रोक दिया गया।मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भले ही भारत में थे लेकिन मालदीव में वहां की सरकार की नफरत भारत के खिलाफ कम होती नहीं दिख रही है। मुइज्जू भारत मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए भारत आए थे। शपथ ग्रहण में आने से पहले मुइज्जू की ओर से कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होना उनके लिए सम्मान की बात होगी।मुइज्जू की सरकार ने पिछले साल घोषणा की थी कि वह मालदीव के जलक्षेत्र में संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए भारतीय नौसेना के साथ समझौते को रिन्यू नहीं करने जा रही है।शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए मुइज्जू को दिया गया निमंत्रण और फिर दिल्ली आना भारत और मालदीव के बीच हाल के तनावपूर्ण संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन ऐसा लगता है कि तनावपूर्ण संबंध जल्द पूरी तरह ठीक नहीं होंगे।

देश का कारोबारी समुदाय मोदी सरकार का समर्थन क्यों कर रहा है? बीजेपी-राज उन्हें क्या उम्मीद दे रही है?

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भारतीय कारोबारी डर के मारे तो नहीं करते मोदी सरकार की आलोचना? भाजपा सरकार के पीछे व्यापारियों का समर्थन किस मानसिकता से आ रहा है? भारतीय व्यापार जगत इस समय संघर्ष की स्थिति में है। एक ओर, आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत की गूंज ने शेयर बाजार में सकारात्मक धारणा ला दी है। दूसरी ओर, कई व्यापारी दिल्ली में बीजेपी सरकार को लेकर आशंकित हैं. उद्योगपति राहुल बजाज (दिवंगत) ने चार साल पहले अमित शाह से कहा था कि उद्योगपति सरकार की आलोचना करने से डरते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ऐसी आलोचना बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक जगत में उनका कोई भी मित्र इस मामले को इतनी स्पष्टता से स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने मनमोहन सिंह युग की तुलना बीजेपी युग से की और कहा कि पहले सरकार की खुलकर आलोचना करना संभव था.

जवाब में, शाह ने बजाज से कहा कि उनकी सरकार को संसद में और संसद के बाहर किसी भी अन्य सरकार की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचना के कारण सरकार के निशाने पर आने का कोई अच्छा कारण नहीं है। शाह ने यह भी कहा कि सरकार का इरादा किसी को डराना नहीं है. लेकिन हकीकत में व्यापारियों-उद्योगपतियों में सरकार और उसकी ‘एजेंसियों’ को लेकर एक तरह की सतर्कता है. व्यावसायिक ‘लॉबी समूह’ या ‘प्रभावशाली समूह’ भी सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना न करने की सलाह देते हैं। लेकिन शेयर बाजार में विदेशी कंपनियों या घरेलू निवेशकों के उत्साह को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें से कोई भी उस अर्थ से डरता नहीं है, बल्कि वे काफी आशावादी हैं।

कारोबारी हलकों में लगातार यह चर्चा है कि नरेंद्र मोदी सरकार अगली गर्मियों में चुनाव में वापसी करेगी। लेकिन एकल वर्चस्व नहीं मिलेगा. परिणामस्वरूप, उन्हें सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की तलाश करनी होगी। वे पार्टनर उन पर कोई भी शर्त लगा सकते हैं। फिलहाल, ऐसी कहानियां प्रचलित हैं कि किस तरह सरकार के ‘पसंदीदा’ व्यवसायियों द्वारा विभिन्न कंपनियों पर नजर रखी जा रही है और उनके मालिकों को विभाग द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। अगर ऐसी कोई कंपनी शिकार बन जाती है और उसका विनिवेश हो जाता है, तो कर अराजकता की ज्यादा चर्चा नहीं होती है। कंपनियों को दिवालिया घोषित कर नीलाम किया जा रहा है और वे व्यापारी नीलामी में आखिरी बोली लगाने वाले हैं, जिन पर सरकार की नजर है।

इसके बाद भी व्यापारी मोदी सरकार को चुन रहे हैं. क्योंकि, इस सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो उनके बिजनेस के लिए मददगार हैं। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट कर के स्तर को कम करना, घरेलू उत्पादकों को विदेशी आयात द्वारा निगले जाने से बचाने के लिए टैरिफ और गैर-टैरिफ सुरक्षा प्रदान करना (याद रखें, अधिकांश भारतीय व्यवसायी, यहां तक ​​​​कि राहुल बजाज ने भी वैश्वीकरण के पक्ष में बात नहीं की है)। इसके अलावा, अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में भी सुधार किये गये हैं। निवेश के लिए सब्सिडी का प्रस्ताव है और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जाता है। और इसने भौतिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार के लिए अभूतपूर्व सरकारी निवेश को भी सक्षम बनाया है। तो आलोचना वास्तव में कहां है?
व्यापारियों का ध्यान इस बात पर है कि मोदी सरकार स्थिरता और निरंतरता का वादा कर रही है। कोई भी पिछली गठबंधन सरकार की दुर्गति को दोहराना नहीं चाहता (चुनाव के बाद गैर-भाजपा सरकार बनने की सबसे कम संभावना भी नहीं)। कोई भी नीति निर्माण को लेकर उस तरह का भ्रम नहीं चाहता जैसा मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी वर्षों में हुआ था। अगर बात ‘राजस्व आतंकवाद’ की हो रही है तो अगर यह सवाल उठे कि क्या मोदी काल में इसका स्तर कांग्रेस काल की तुलना में कम है, तो हमें अपना ध्यान दूसरे मुद्दे की ओर मोड़ना होगा. कांग्रेस द्वारा दिया जा रहा हालिया संदेश मुख्य रूप से लोक कल्याण उन्मुख और मुफ्त वस्तुओं के वादों से भरा है। इससे साफ पता चलता है कि ऐसे मामलों में सरकारी खजाना जिम्मेदारी नहीं उठाएगा। कांग्रेस ने अभी तक उस लिहाज से कोई व्यापारोन्मुखी संदेश नहीं दिया है.

यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें दूर की समानता मिलती है। जैसा कि आर्थिक इतिहासकार तीर्थंकर रॉय ने अपनी पुस्तक ए बिजनेस हिस्ट्री ऑफ इंडिया में दिखाया है, मुगल साम्राज्य के विस्तार ने वस्तुतः एक आर्थिक माहौल तैयार किया जिसमें व्यापारी (मुख्य रूप से पंजाबी क्षत्रिय और मारवाड़ी व्यापारी) पूर्वी भारत की ओर बढ़ने लगे। जब ‘पैक्स मुगलियाना’ (मुगल साम्राज्य का सीधा शासन) बंगाल तक फैल गया, तो उन्होंने अपने व्यवसायों को भी इस संघर्ष में फँसा दिया। तीर्थंकर बताते हैं कि जब मुगल साम्राज्य पतन के कगार पर था, उस उथल-पुथल के दौर में, व्यापारियों ने कम सामंती संघर्ष वाले स्थानों और अपेक्षाकृत राजनीतिक रूप से स्थिर क्षेत्रों को चुनना शुरू कर दिया। यही कारण है कि बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता जैसे ब्रिटिश शासित बंदरगाह शहर उन व्यापारियों का अड्डा बन गए। कम से कम उस समय के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी परिवार जगत सेठ का इतिहास तो इसकी पुष्टि करता है। 1857 के महान विद्रोह के दौरान भारतीय व्यापारियों ने अंग्रेजों का समर्थन किया। लेकिन जैसा कि तीर्थंकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समर्थक इतिहासकार क्रिस्टोफर बेली के विचारों का हवाला देते हैं, भारतीय पूंजी और ब्रिटिश शक्ति की परस्पर निर्भरता सुखद नहीं थी।

 

सवाल यह उठता है कि वेतन चोरी क्यों?

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एक नज़र डालने से पता चलता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में श्रम बल से अनुपस्थित महिलाओं की संख्या चिंताजनक रूप से बड़ी है। ‘कमाई’ शब्द एक दिशा सूचक यंत्र की तरह काम करता है जो यह समझ पैदा करता है कि कौन सा काम ‘काम’ है और कौन सा काम बिल्कुल भी ‘काम’ नहीं है। सवाल यह है कि काम का मतलब क्या है, कौन काम करता है या नहीं करता है और कौन कमाता है या नहीं कमाता है?

2017-18 से देश में ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण’ (पीएलएफएस) नामक एक सर्वेक्षण शुरू किया गया है, जिसमें ‘श्रम बल’ को संपूर्ण कार्यबल के रूप में परिभाषित किया गया है, यानी जो कार्यरत हैं (रोजगार), और जो कार्यरत नहीं हैं भले ही वे काम की तलाश में हों या काम करने के लिए तैयार हों (बेरोजगार)। इसके बाहर की आबादी श्रम से बाहर की शक्ति है – जो काम में संलग्न नहीं हैं, काम की तलाश में नहीं हैं, और काम के लिए तैयार नहीं हैं। सर्वेक्षण की परिभाषा में ‘कार्य’ का अर्थ ‘आर्थिक गतिविधि’ है।

श्रम बल में तीन प्रकार के श्रमिक होते हैं- 1) स्व-रोज़गार, 2) आकस्मिक श्रमिक, 3) नियमित वेतन या वेतनभोगी श्रमिक। ‘स्व-रोज़गार’ श्रेणी की दो उप-श्रेणियाँ हैं। स्व-स्वामित्व वाले वित्तीय उद्यमों में शामिल कर्मचारी, और पारिवारिक वित्तीय उद्यमों में गैर-कमाऊ सहायक। इस दूसरी उप-श्रेणी के कर्मचारी पारिवारिक वित्तीय उद्यमों के संबंध में पूर्ण या अंशकालिक काम करते हैं, लेकिन उन्हें उस काम के लिए वेतन या मजदूरी नहीं मिलती है। 2022-23 में, ‘श्रम बल’ में शामिल होने की दर 83.2% (पुरुष) और 39.8% (महिला) थी, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 87% (पुरुष) और 36.9% (महिला) थी। इस श्रम शक्ति में देश का औसत कार्यबल अनुपात 80.2% (पुरुष) और 38.5% (महिला) है, पश्चिम बंगाल में – 84.8% (पुरुष) और 36.1% (महिला) है।

एक नज़र डालने से पता चलता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में श्रम बल से अनुपस्थित महिलाओं की संख्या चिंताजनक रूप से बड़ी है। लेकिन जो महिलाएं कार्यबल में हैं, उनकी खतनी और खतनी की मजदूरी कैसी है, इसे देखकर एक आश्चर्यजनक वेतन-अंतर की कहानी सामने आती है। यह देखा जा सकता है कि कार्यबल में स्व-रोजगार की दूसरी उप-श्रेणी में, बड़ी संख्या में महिला श्रमिक आय या उत्पादन के लिए पारिवारिक उद्यमों में गैर-कमाई वाले सहायक कार्यों में लगी हुई हैं। 2017-18 में वे देश की कुल महिला कार्यबल का 31.7%, 2018-19 में 30.9%, 2019-20 में 35%, 2020-21 में 36.6%, 2021-22 में 36.7% और 2022 में 37.5% थीं -23. पश्चिम बंगाल के लिए: 2017-18 में 13.8%, 2018-19 में 15.6%, 2019-20 में 17.3%, 2020-21 में 18.1%, 2021-22 में 20.2% और 2022- 23 वर्षों में 23.3%। पिछले 6 वर्षों में, यह स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में महिलाएँ ‘बेरोजगार’ हैं, भले ही वे सीधे श्रमिक के रूप में देश के उत्पादन या वित्तीय गतिविधियों में शामिल हों। भले ही वे पारिवारिक उद्यमों में स्व-रोज़गार श्रमिक हैं, वे ‘मालिक’ नहीं हैं, क्योंकि उनके नाम पर स्वामित्व नहीं है, इन उद्यमों की आय बिल्कुल भी उनकी नहीं है, और चूंकि वे पारिवारिक उद्यमों से जुड़े श्रमिक हैं, वे ‘मजदूर’ नहीं हैं, इसलिए कोई मजदूरी या वेतन नहीं है। यदि कोई बाहरी श्रमिक उनका काम करता था, तो उस श्रमिक को मजदूरी देनी पड़ती थी।

सामान्य ज्ञान दो प्रश्न उठाता है। एक, यदि कोई आय नहीं है तो उन्हें ‘रोज़गार’ क्यों दिया जाता है? दो, यदि वे ‘रोज़गार’ हैं, तो कोई आय क्यों नहीं है? पहले प्रश्न का उत्तर खोजते समय देखने में आता है कि यदि इन बेरोजगार महिला श्रमिकों की गिनती की जाए तो बेरोजगारी दर काफी कम दिखाई देती है। दूसरा उत्तर लैंगिक राजनीति के साथ वर्ग शोषण के पारंपरिक संबंध में पाया जाना है।

गंजना को पहले ही शाप दिया जा चुका है। कुछ दिन पहले कामकाजी महिलाओं की आंखें तरेरती थीं, ‘घर से बाहर घूमती लड़कियां’! और आज पितृसत्तात्मक समाज के सामने उसके रोजगार का सवाल खड़ा हो गया है! महिलाओं को सीधे पैसा देने की योजना के बारे में समाज का एक वर्ग प्राप्तकर्ताओं पर जो विभिन्न लांछन लगाता है, उनमें से दो सबसे शक्तिशाली अपशब्द हैं ‘मुफ्त का पैसा’ और ‘भीख मांगना’। दिलचस्प बात यह है कि इस गरीब समाज ने घटिया खट्टन के बदले में घरेलू आय से संबंधित कार्यों में शामिल बड़ी संख्या में महिलाओं की ‘उचित मजदूरी’ से बचने में दशकों का समय बिताया है।

लेकिन जब बात इस पर आती है तो चर्चा खुली होनी चाहिए। बड़ी संख्या में महिला श्रमिक जिन्होंने अपनी श्रम शक्ति परिवार के कमाई वाले काम और उत्पादन कार्यों में खर्च की है, लेकिन बदले में उन्हें ‘शून्य’ वेतन मिला है, उन्हें अपना वेतन कब और क्या मिलेगा, इस बारे में स्पष्ट रूप से अपना मुंह खोलना चाहिए। और जो समाज दशकों से कल्याणकारी राज्य की जटिल अर्थव्यवस्था में ‘भीख’ किसे कहते हैं, लेकिन ‘बिना वेतन के कम वेतन’ का मतलब भी नहीं समझ पाता, उसे भी इस बार समझदारी दिखानी होगी. यह सुनिश्चित करने के लिए कि बड़ी संख्या में महिलाएं मजदूरी कमाने वाले कार्यबल से बाहर न रह जाएं।

श्रम बाजार में महिलाओं के लिए श्रम के अवसर, न्यूनतम आय की गारंटी, और सब्सिडी तक महिलाओं की सीधी पहुंच को अधिकार के रूप में कानूनी मान्यता देना आवश्यक है, ताकि इन भत्तों की निरंतरता किसी शासक की सनक और तिरस्कार पर निर्भर न हो, या इस बात पर विवाद न हो कि कहां पैसा कहाँ से आ रहा है। नहीं, आख़िरकार, कोई भी बजट के इन सभी हिस्सों की ज़िम्मेदारी प्राप्तकर्ता महिलाओं के कंधों पर नहीं डाल सकता है।