Home Blog Page 616

आखिर ईरान को क्यों तबाह करना चाहते हैं इजरायल के प्रधानमंत्री?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इजरायल के प्रधानमंत्री ईरान को तबाह क्यों करना चाहते हैं! मार्च, 2015 की बात है, जब अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में 1993 में ओस्लो शांति समझौते के खिलाफ एक आलोचनात्मक लेख छपा, जिसमें कहा गया था कि नेतन्याहू ने फिलिस्तीनियों के साथ शांति को लेकर पूर्व पीएम यित्जाक रॉबिन की तुलना नेविल चेंबरलेन से की थी। लेख में ईरान के साथ परमाणु समझौते को बेकरार नेतन्याहू के बारे में कहा गया था कि वह खुद को दुनिया बचाने वाले नायक के रूप में देखते हैं। दरअसल, नेतन्याहू आतंकी समूहों जैसे हिजबुल्लाह और हमास के साथ-साथ ईरान के हमले होने पर अकसर ये धमकी देते नजर आते हैं कि वह किसी भी कीमत पर अपने दुश्मनों से बदला लेकर रहेंगे। उनके मंत्री दिग्गज भारतीय हीरो रहे राजकुमार का वो मशहूर डायलॉग मारते नजर आते हैं कि हम मारेंगे…मगर जगह और समय हम तय करेंगे। ऐसी बयानबाजियां कुछ समय के लिए भले ही इजरायलियों को अच्छी लगें, मगर हकीकत में उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता है। इजरायली ऐसी राजनीतिक बयानबाजियों को ज्यादा तवज्जो देते नजर नहीं आते हैं। यही वजह है कि बीते साल 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमले के बाद से ही इजरायली कई बार नेतन्याहू के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। इजरायली अखबार हारेत्ज के एक इजरायली स्तंभकार और ‘माई प्रॉमिस्ड लैंड: द ट्राइंफ एंड ट्रेजेडी ऑफ इजराइल (2013) के लेखक अरी शावित के अनुसार, नेतन्याहू तीन दशकों से खुद को ब्रिटेन के महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री रह चुके विंस्टन चर्चिल के रूप में मानते हैं। उन्होंने खुद को पश्चिम के उद्धारकर्ता की शानदार भूमिका में ढाल लिया है। यह ठीक वैसे ही जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान चर्चिल यह मानते थे कि दुनिया पर राज करना उनके देश का जन्मसिद्ध अधिकार है और दुनिया के उनकी बात मानेगी। उनका कहना है कि यह एक तरह का चर्चिल कॉम्प्लेक्स है, जिसमें नेतन्याहू हकीकत से परे खुद को हीरो के रूप में देखते हैं।

नेतन्याहू कई इंटरव्यू में यह कह चुके हैं कि ईरान 21वीं सदी का नाजी जर्मनी है, वहीं इजरायल 21वीं सदी का ग्रेट ब्रिटेन है। और वह खुद चर्चिल हैं। इस वक्त भी नेतन्याहू चर्चिल के चाहने वाले की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उनका मानना है कि इजरायल उनके वैश्विक कद के हिसाब से काफी छोटा देश है। नेतन्याहू खुद की तुलना अक्सर चर्चिल के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति रहे फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट से भी करते रहे हैं, जो अमेरिका के महानतम राष्ट्रपतियों में से एक माने जाते हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध 1940-1945 के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे चर्चिल को भारतीयों की नेतृत्व क्षमता पर कभी भरोसा नहीं होता था। इसलिए वो कहा करते थे कि अगर भारत का नेतृत्व भारतीयों को सौंप दिया जाएगा तो इंडियन कभी इस देश को नहीं चला पाएंगे। उनकी नीतियों की वजह से बंगाल में उस वक्त इतना भीषण अकाल पड़ा कि 30 लाख लोग मारे गए थे। चर्चिल को भी यह मुगालता रहता था कि वह दुनिया को बचा रहे हैं। इसके बावजूद जब विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज पूरी दुनिया में अस्त हो गया।

नेतन्याहू अक्सर तब घिर जाते हैं, जब इजरायल फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास के खिलाफ गाजा पट्टी में लड़ाई करता है। इसके लिए इजरायल को कई बार गहन अंतरराष्ट्रीय जांच का सामना भी करना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और सहायता समूहों ने भी कई बार गाजा पट्टी में बड़ी संख्या में मारे गए नागरिकों को लेकर इजरायली सरकार की आलोचना की है।

नेतन्याहू पर कई बार ये भी आरोप लगे हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में निर्दोष इजरायली नागरिक मारे गए। बीते कुछ महीने पहले ही बंधक संकट में भी नेतन्याहू के कमजोर नेतृत्व को लेकर सवाल उठे थे। यह आरोप लगता है कि इजरायल नागरिक हताहतों की संख्या को कम करने में विफल रहा है। वहीं, नेतन्याहू अक्सर ये तर् देते दिखते हैं कि इजरायल डिफेंस फोर्सेज ने 2003 के इराक युद्ध के दौरान इराकी शहर फालुजा में अमेरिकी सेना की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया था।

नेतन्याहू डेमोक्रेटिक राजनेताओं और उदार बुद्धिजीवियों का तिरस्कार करते हैं, जिन्हें वह कमजोर लोगों के रूप में देखते हैं। इस जटिलता के कारण उन्हें नागरिक नेता नहीं माना जाता है। ज्यादातर लोग ये मानते हैं कि नेतन्याहू को सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन से कोई सरोकार नहीं है। उनके राष्ट्र की कहानी 21वीं सदी में पश्चिम की परस्पर विरोधी संस्कृतियों के बीच एक शक्तिशाली संघर्ष की कहानी है।

74 वर्षीय प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस वक्त भी लेबनान में इजरायली सेना भेजी है, मगर यह अब तक जितनी भी बार इजरायली सेना लेबनान में घुसी, उसे आखिर में बिना कुछ हासिल किए लौटना ही पड़ा है। नेतन्याहू के सबसे कट्टर आलोचकों में से एक पूर्व राजनयिक एलोन पिंकस ने इजरायली अखबार हारेत्ज में लिखा, वह विंस्टन चर्चिल नहीं हैं, जिनसे वह अपनी तुलना करते हैं। त्रासदी और संकट के पलों के दौरान कोई भी उनकी ओर नहीं देखता है।

 

क्या चुनावों के बाद आएगी जीतने वाली पार्टी के लिए चुनौतियां?

हरियाणा में चुनावों को जीतने के बाद जीतने वाली पार्टी के सामने कई चुनौतियां आने वाली है! चुनाव प्रचार शबाब पर हो और पार्टियों में सीएम पद के लिए एक से ज्यादा दावेदार हों। ये बात तो सामान्य है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के भीतर एक से ज्यादा नेता सार्वजनिक तौर पर सीएम पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक रहे हों और आलाकमान चुपचाप न सिर्फ इसे देख रहा हो बल्कि बढ़ावा दे रहा हो तो ये बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। हरियाणा में ठीक ऐसा ही हो रहा। दोनों ही प्रमुख पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस में ऐसा ही हो रहा। दोनों दलों में कई नेता खुलकर सीएम पद के लिए अपनी दावेदारी जता रहे और आलाकमान इसलिए चुप है कि उसे ऐसे बयानों या दावों से चुनाव में फायदे की उम्मीद है। लेकिन चुनावी फायदे के लिए चुप्पी की ये रणनीति चुनाव बाद दोनों ही पार्टियों के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। चुनाव बीजेपी जीते या कांग्रेस, चुनाव बाद मुख्यमंत्री चुनना आसान नहीं रहने वाला। अक्सर चुनाव के दौरान पार्टियां मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की सार्वजनिक बयानबाजियों पर लगाम लगाई रहती हैं। उन्हें गुटबाजी का डर सताए रहता है। लेकिन पार्टी खुद की ऐसी बयानबाजियों को हवा दे और अगर हवा न भी दे तो चुप्पी साधे रखे तो ये चौंकाता है। हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस दोनों में ही ऐसा ही हुआ। कांग्रेस को उम्मीद है कि हरियाणा की सत्ता से उसका वनवास इस बार 10 साल बाद शायद खत्म हो जाए। लेकिन पार्टी में मुख्यमंत्री पद के लिए कई दावेदार हैं। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा तो हैं ही, सिरसा से सांसद कुमारी सैलजा भी हैं। गांधी परिवार के बहुत खास माने जाने वाले रणदीप सुरजेवाला भी हैं। दिलचस्प बात ये है कि सैलजा और सुरजेवाला दोनों में से कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहा। सिर्फ भूपेंद्र सिंह हुड्डा ही असेंबली इलेक्शन लड़ रहे हैं।

चुनाव के दौरान हुड्डा, सैलजा या सुरजेवाला की सीएम पद पर दावेदारी को लेकर सार्वजनिक बयानबाजियों पर कांग्रेस की चुप्पी के पीछे रणनीति है। उसे इन बयानों से चुनावी फायदे की उम्मीद है। सैलजा हरियाणा में कांग्रेस की दलित चेहरा हैं। वह भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कट्टर प्रतिद्वंद्वी मानी जाती हैं। सिरसा से सांसद सैलजा ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को खुलकर जताया है। बताया जाता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की 75 से 80 प्रतिशत सीटों पर उन्हें टिकट मिला है, जिन्हें हुड्डा कैंप चाहता था। इस वजह से चुनाव के दौरान सैलजा की नाराजगी की खबरें भी उड़ीं लेकिन उन्होंने अफवाह बताकर खारिज किया।

राज्यसभा सांसद रणदीप सुरजेवाला की नजर भी सीएम की कुर्सी पर है। सैलजा अगर दलित चेहरा हैं तो सुरजेवाला का कैथल और उसके आस-पास के इलाकों में अच्छा-खासा असर माना जाता है। दोनों की सीएम पद के लिए दावेदारी पर कांग्रेस इसलिए चुप है कि उसे उम्मीद है कि इससे दोनों ही नेताओं के समर्थक कार्यकर्ताओं में जोश रहेगा और उस उत्साह का फायदा पार्टी को चुनाव में मिलेगा।

यही कहानी बीजेपी में भी है। पार्टी पहले ही मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अगुआई में चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है लेकिन केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और अनिल विज खुलकर मुख्यमंत्री पर की अपनी इच्छा का इजहार कर रहे हैं। बीजेपी आलाकमान इस पर चुप है क्योंकि उसे लगता है कि दोनों नेताओं की सीएम पद को लेकर दावेदारी ठोकने से उनके समर्थकों का उत्साह बढ़ेगा और चुनाव में पार्टी को इसका लाभ मिलेगा। राव इंद्रजीत सिंह अहीर हैं और विज पंजाबी। ये दोनों ही जातियां कम से कम 20 विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करने की क्षमता रखती हैं। इन दोनों नेताओं के जरिए बीजेपी इन दोनों जातियों को साधने की फिराक में है।

राव इंद्रजीत सिंह का अहिरवाल इलाके में अच्छा-खासा प्रभाव है। दूसरी तरफ अनिल विज राज्य में बीजेपी के सबसे पुराने चेहरे हैं। वह 2014 में भी खुद को सीएम पद के दावेदार के तौर पर पेश कर रहे थे लेकिन बीजेपी आलाकमान ने मनोहर लाल खट्टर को चुना। खट्टर पहला कार्यकाल तो पूरा कर लिए लेकिन दूसरा नहीं। उन्हें बीजेपी ने बीच में ही हटा दिया। पार्टी ने उनके ही खासमखास नायब सिंह सैनी को हरियाणा का सीएम बनाया और अनिल विज की राज्य कैबिनेट से भी छुट्टी हो गई। उसके बाद कुछ दिनों तक विज नाराज भी थे। अब वह खुद को सीएम पद के दावेदार के तौर पर पेश कर रहे हैं।

हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान तकरीबन खत्म हो चुका है। गुरुवार चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। 5 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे और नतीजे 8 अक्टूबर को आएंगे। जीत चाहे कांग्रेस की हो या बीजेपी की, उनकी असली चुनौती तो जीत के बाद शुरू होगी।

 

आखिर कौन हो सकता है हरियाणा का सरताज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर हरियाणा का सरताज आने वाले समय में कौन होगा! हरियाणा एक ऐसा राज्य है जो विरोधाभासों और पहेलियों से भरा हुआ है। एक ऐसा राज्य जहां कई ग्रामीण महिलाएं अभी भी घूंघट में रहती हैं तो वहीं मुक्केबाजी, कुश्ती और निशानेबाजी में भारत की बेहतरीन महिला खिलाड़ियों का घर भी है। प्रगतिशील सुधारवादी आंदोलनों के इतिहास वाला यह क्षेत्र वह स्थान भी है जहां जाति समाज और राजनीति में गहराई से समाई हुई है। यह शहीद सैनिकों की भूमि होने के साथ-साथ एक ऐसा स्थान भी है जहां अक्सर पैरोल पर छूटने वाले एक धर्मगुरु की चर्चा होती है। चुनाव वाले इस दिलचस्प राज्य की यात्रा (जिसने कभी आया राम गया राम जैसे सदाबहार मुहावरे को जन्म दिया था) ने कुछ ऐसे विषयों को सामने लाया जो तय करेंगे कि हरियाणा में अगली सरकार किस राजनीतिक गठबंधन की बनेगी। राज्य में शनिवार यानि कल वोटिंग है।

राज्य की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा। जाट पिछले 10 वर्षों से हरियाणा में शासन कर रही बीजेपी सरकार के खिलाफ सबसे मुखर सामाजिक समूह हैं। कांग्रेस जाट वोटों के लिए हुड्डा, पूर्व सीएम भूपेंद्र और बेटे दीपेंद्र पर निर्भर है। यह जोड़ी पार्टी के प्रचार का चेहरा रहा। कांग्रेस ने भाजपा से कहीं ज्यादा जाट उम्मीदवार उतारे हैं।दुष्यंत चौटाला की जेजेपी ने लगभग 15% वोट हासिल किए और 10 सीटें हासिल कीं। लेकिन कुल मिलाकर, नतीजों के बाद जेजेपी ने बीजेपी से हाथ मिलाकर इसकी विश्वसनीयता छीन ली। इस बार जेजेपी का वोट शेयर और सीटें तेजी से कम हो सकती हैं। कई जाटों ने कहा कि वे इस चुनाव में सबसे आगे चल रही कांग्रेस को वोट देंगे। 2019 के राज्य चुनावों में बीजेपी ने मुस्लिम बहुल नूंह को छोड़कर अपेक्षाकृत शहरी सीटों और दक्षिणी हरियाणा में बेहतर प्रदर्शन किया। महेंद्रगढ़, रेवाड़ी और गुड़गांव जिलों के कुछ हिस्सों में संख्यात्मक रूप से मजबूत यादवों सहित कई ओबीसी, एक ऐसे राज्य में बीजेपी को वोट देने की संभावना रखते हैं, जहां राजनीति को आम तौर पर जाटों और गैर-जाटों के बीच देखा जाता है।

काफी मतदाताओं ने कहा कि मनोहर लाल खट्टर के कार्यकाल के दौरान ‘खर्ची-पर्ची’ में गिरावट आई। लेकिन खट्टर का चेहरा पोस्टरों से गायब रहा। सैनी ओबीसी हैं। भाजपा को उम्मीद है कि देर से हुआ बदलाव पार्टी के पीछे ओबीसी समूह के तहत विभिन्न जातियों को एकजुट करेगा। लेकिन भाजपा के प्रति उत्साह की कमी साफ दिखाई दे रही है। 2019 के हरियाणा चुनाव में अभय चौटाला की इनेलो ने करीब 2.5% वोट हासिल किए और 1 सीट जीती। इस बार इनेलो अपने वोट शेयर में सुधार करेगी और अपनी सीटें बढ़ाएगी। हरियाणा के एकमात्र मुस्लिम बहुल जिले नूंह में मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और इनेलो के बीच है। छतों पर उनके झंडे लहरा रहे हैं। नूंह शहर और आस-पास के इलाकों में एक भी भाजपा का झंडा नहीं दिखा। उम्रदराज मुसलमानों से बात करने पर पता चला कि अभय के पिता, हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला को अभी भी स्वीकृति प्राप्त है और उनकी पार्टी को कुछ हद तक समर्थन प्राप्त है।

इनेलो ने बसपा के साथ गठबंधन किया है जिससे पार्टी को कुछ दलित वोट हासिल करने में मदद मिलेगी। क्या बसपा को भी इस व्यवस्था से फायदा होगा, इसकी गारंटी नहीं है। 2019 में बसपा को 4% वोट मिले थे। हरियाणा में अनुसूचित जातियां लगभग 20% हैं। 2019 में, दुष्यंत चौटाला की जेजेपी ने लगभग 15% वोट हासिल किए और 10 सीटें हासिल कीं। लेकिन कुल मिलाकर, नतीजों के बाद जेजेपी ने बीजेपी से हाथ मिलाकर इसकी विश्वसनीयता छीन ली। इस बार जेजेपी का वोट शेयर और सीटें तेजी से कम हो सकती हैं।

आप के वोट शेयर में बढ़ोतरी होने की संभावना है, हालांकि सीटों पर कुछ भी भविष्यवाणी करना मुश्किल है। जाट वोटों का विभाजन कांग्रेस के खिलाफ जा सकता है। अगर किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तो सीटों के साथ छोटी पार्टियां किंगमेकर बन जाएंगी।बता दें कि जहां अक्सर पैरोल पर छूटने वाले एक धर्मगुरु की चर्चा होती है। चुनाव वाले इस दिलचस्प राज्य की यात्रा जिसने कभी आया राम गया राम जैसे सदाबहार मुहावरे को जन्म दिया था ने कुछ ऐसे विषयों को सामने लाया जो तय करेंगे कि हरियाणा में अगली सरकार किस राजनीतिक गठबंधन की बनेगी। राज्य में शनिवार यानि कल वोटिंग है। क्योंकि हथीन विधानसभा सीट पर एक चाय बेचने वाले ने कहा, ‘नेता किसी का नहीं होता’।

 

क्या पूर्व सांसद अशोक तंवर के जरिए दलितों को साथ पा सकीं कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस पूर्व सांसद अशोक तंवर के जरिए दलितों को साथ पाएगी या नहीं! पूर्व सांसद अशोक तंवर शुक्रवार को कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल हो गए। तंवर ने हरियाणा के दलित एवं अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाताओं से आह्वान किया कि वे कांग्रेस को बड़ा जनादेश दें ताकि यह प्रदेश नंबर एक बन सके। तंवर बृहस्पतिवार को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ हरियाणा के महेंद्रगढ़ में चुनावी मंच पर नजर आए थे। इससे कुछ घंटे पहले ही उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार के लिए प्रचार किया था। हरियाणा में 5 अक्टूबर को वोटिंग होगी। ऐसे में यह सवाल है कि आखिर कांग्रेस को अशोक तंवर की ऐन मौके पर वापसी से कितना फायदा मिलेगा। पार्टी के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने कांग्रेस मुख्यालय में तंवर का स्वागत किया और उन्हें संविधान की एक प्रति भी सौंपी। बाद में तंवर ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा भी मौजूद थे। खरगे ने मुलाकात की तस्वीर साझा करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”हरियाणा में हम 36 बिरादरी के साथ हैं। हमारे संकल्प सबके लिए है। दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक व गरीबों की आवाज़ हम सदैव उठाते रहेंगे। आज कांग्रेस में वापसी करने वाले पूर्व सांसद अशोक तंवर और हमारे सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा से मुलाकात की।’

दीपेंद्र हुड्डा ने तंवर को हरियाणा के वंचित, बहुजन और सर्वसमाज की मजबूत आवाज करार दिया। उन्होंने कहा, ”सिरसा से 15वी लोकसभा में मेरे साथी रहे, हरियाणा के ग़रीब-किसान-वंचित-बहुजन व सर्वसमाज की मज़बूत आवाज़ भाई अशोक तंवर जी का कांग्रेस पार्टी में शामिल होने पर स्वागत हैं। पार्टी में उनके शामिल होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष खरगे जी से अशोक भाई के संग औपचारिक मुलाक़ात कर आशीर्वाद लिया।’ कांग्रेस मुख्यालय में माकन ने तंवर का पार्टी में औपचारिक रूप से स्वागत करते हुए कहा, ”हम सभी ने संविधान की रक्षा करने का प्रण लिया है। हम देश के संविधान और बाबासाहेब आंबेडकर के सिद्धांतों की रक्षा के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। हमें आशा है कि अशोक तंवर जी के आने से इन प्रयासों को और बल मिलेगा।’ तंवर ने कहा, ”मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से हुई। कुछ समय के लिए मैं भाजपा में शामिल हो गया था, लेकिन वहां देश के संविधान और बाबासाहेब के प्रति कोई आस्था नहीं है।”

उन्होंने कहा कि भाजपा लोगों को बांटने का काम करती है, लेकिन राहुल गांधी जी ने यात्रा निकालकर लोगों को एक करने का काम किया है। पूर्व सांसद ने कहा, ‘आज मैं फिर देश जोड़ने और संविधान बचाने की लड़ाई में राहुल गांधी जी के साथ खड़ा हूं। तंवर ने कहा कि मैं हरियाणा के दलितों, वंचितों और पिछड़ों से अनुरोध करता हूं कि हरियाणा को फिर नंबर एक बनाने के लिए यहां कांग्रेस की सरकार बनाएं। मेरा आग्रह है कि लोग कांग्रेस को बड़ा जनादेश दें जिसका संदेश पूरे देश में जाए।”

एक सवाल के जवाब में तंवर ने कहा कि सिरसा लोकसभा में उनकी नहीं, बल्कि भाजपा और उसकी नीतियों की हार हुई है। हरियाणा में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से दो दिन पहले बृहस्पतिवार को भाजपा को झटका देते हुए अशोक तंवर बृहस्पतिवार को महेंद्रगढ़ जिले में राहुल गांधी की रैली में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस में वापसी से कुछ घंटे पहले सिरसा के पूर्व सांसद तंवर ने सफीदों विधानसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार के लिए प्रचार किया था और मतदाताओं से भाजपा को तीसरी बार सत्ता में वापस लाने का आह्वान किया था।

तंवर पांच साल पहले हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ मतभेदों के चलते कांग्रेस से अलग हो गए थे। वह अप्रैल 2022 में आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हुए थे। आप में शामिल होने से पहले वह कुछ समय के लिए तृणमूल कांग्रेस में भी रहे थे। पार्टी के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने कांग्रेस मुख्यालय में तंवर का स्वागत किया और उन्हें संविधान की एक प्रति भी सौंपी। बाद में तंवर ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की।भाजपा में शामिल होने के बाद तंवर ने मई में सिरसा लोकसभा सीट से कांग्रेस नेता कुमारी सैलजा के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे। भाजपा ने सिरसा से निवर्तमान सांसद सुनीता दुग्गल का टिकट काटकर तंवर को मुकाबले में उतारा था।

 

जब सुषमा स्वराज गई थी पाकिस्तान, क्या था वह कार्यक्रम?

एक समय ऐसा था जब सुषमा स्वराज पाकिस्तान गई थी आज हम आपको उस कार्यक्रम के बारे में बताने वाले हैं! भारत ने शुक्रवार को घोषणा की कि विदेश मंत्री एस जयशंकर अक्टूबर के मध्य में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की यात्रा करेंगे। यह घोषणा विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने की। पाकिस्तान इस बार एससीओ बैठक की मेजबानी कर रहा है। इससे पहले पाकिस्तान का दौरा करने वाली पिछली भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज थीं। वह दिसंबर 2015 में अफगानिस्तान पर एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद गई थीं। साल 2015 में सुषमा स्वराज ने वार्षिक हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में हिस्सा लिया था। यह सम्मेलन 7-8 दिसंबर को पाकिस्तान में हुआ था। उस समय वहां 14 देशों के प्रतिनिधियों मौजूद थे। सुषमा की यह यात्रा भारत और पाकिस्तान के बीच बैंकॉक में शांति वार्ता के कुछ दिनों बाद हुई थी। इससे पहले भारत ने कश्मीर को लेकर महीनों तक तनाव के बाद उन्होंने अगस्त में एक उच्च स्तरीय बैठक रद्द कर दी थी। हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में एशियाई और अन्य देश अफगानिस्तान और उसके पड़ोसियों के भविष्य पर चर्चा करने के लिए एकजुट होते हैं। उस समय अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग को तालिबान और क्षेत्र में अन्य आतंकवादियों से बढ़ते खतरे का मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिखर सम्मेलन में अपने संबोधन में सुषमा स्वराज ने कहा था कि अब समय आ गया है कि हम एक-दूसरे के साथ व्यापार करने तथा क्षेत्रीय व्यापार और सहयोग को मजबूत करने के लिए परिपक्वता और आत्मविश्वास का प्रदर्शन करें। उन्होंने कहा था कि भारत अपने सहयोग को उस गति से आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, जिस पर पाकिस्तान को सहजता हो। लेकिन आज हमें अच्छे पड़ोसी की सर्वोत्तम परंपराओं के अनुरूप कम से कम अफगानिस्तान की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए।

तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अफगानिस्तान पर ‘हार्ट ऑफ एशिया’ क्षेत्रीय सम्मेलन के अवसर पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की थी। स्वराज ने नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से भी बातचीत की थी। सुषमा की उस यात्रा के दौरान सुषमा के साथ विदेश सचिव एस जयशंकर भी उनके साथ थे। हालांकि, नवाज शरीफ के साथ मीटिंग में भारत का झंडा नहीं होने को लेकर विवाद भी हुआ था।

सुषमा स्वराज की पाकिस्तान यात्रा से पहले बैंकॉक में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों अजित डोभाल और नसी जंजुआ की मीटिंग हुई थी। दोनों की बीच यह बैठक करीब चार घंटे तक चली थी। खास बात है कि उस मीटिंग में मौजूदा विदेश मंत्री और तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर मौजूद थे। बैठक में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर और कई प्रमुख द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की थी। इसके साथ ही ‘रचनात्मक संबंधों’ को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की गई थी।

बता दे कि भारत और पाकिस्तान के बीच काफी लंबे समय से रिश्ते खत्म हैं और तनातनी का सिलसिला जारी है। इस बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर पाकिस्तान जाएंगे। यहां वह SCO (शंघाई सहयोग संगठन) की बैठक में शामिल होंगे। 15-16 अक्टूबर को इस्लामाबाद में बैठक होगी। 2014 के बाद यह पहली बार होगा जब कोई भारतीय मंत्री पाकिस्तान जाएगा। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर 9 साल बाद पाकिस्तान जाएंगे। SCO के काउंसिल ऑफ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट (CHG) की बैठक में जयशंकर हिस्सा लेंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने यह जानकारी दी। पाकिस्तान ने 29 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बैठक का न्योता दिया था। पाकिस्तान के विदेश विभाग की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच ने कहा था, ‘बैठक में भाग लेने के लिए सभी सदस्य देशों के प्रमुखों को निमंत्रण भेजा गया है।’

इससे पहले जयशंकर ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की संभावनाओं को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था, ‘पाकिस्तान से बातचीत करने का दौर अब खत्म हो चुका है। भारत अपने सहयोग को उस गति से आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, जिस पर पाकिस्तान को सहजता हो। लेकिन आज हमें अच्छे पड़ोसी की सर्वोत्तम परंपराओं के अनुरूप कम से कम अफगानिस्तान की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए।हर चीज का समय होता है, हर काम कभी ना कभी अपने अंजाम तक पहुंचता है।’ जयशंकर ने आगे कहा था, ‘जहां तक जम्मू-कश्मीर का सवाल है तो अब वहां आर्टिकल 370 खत्म हो गई है। यानी मुद्दा ही खत्म हो चुका है। अब हमें पाकिस्तान के साथ किसी रिश्ते पर क्यों विचार करना चाहिए।’

 

‘हैट्रिक’ रोनाल्डो अपने बेटे के साथ! अल नासिर के नए कोच ने जीत के साथ शुरुआत की

0

रोनाल्डो के पास दुनिया भर के पांच शहरों में लक्जरी होटल हैं। उनमें से, अदाला ने मैड्रिड में होटल को महत्व देने का फैसला किया। वह सर्वोत्तम पेशेवरों को आकर्षित करना चाहता है। 27 लाख मासिक वेतन. साल में 50 दिन की छुट्टी. और भी आकर्षक लाभ हैं. क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने मैड्रिड में होटल स्टाफ को इस तरह का लाभ देने का फैसला किया है। 39 वर्षीय पुर्तगाली फुटबॉलर इस समय व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

सीआर सेवन के पास पांच लक्जरी होटल हैं। रोनाल्डो का अपने गृहनगर लिस्बन, न्यूयॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक होटल है। फंचल, पुर्तगाल और मराकेश, मोरक्को में भी होटल हैं। रियल मैड्रिड के लिए अपने लंबे खेल करियर के कारण यह स्पेनिश शहर रोनाल्डो के पसंदीदा में से एक है। उनका वहां एक होटल भी है. रोनाल्डो ने एक समूह के साथ संयुक्त रूप से होटल व्यवसाय में निवेश किया है। हालाँकि, उन्होंने लिस्बन और मैड्रिड के होटलों के बारे में मुख्य निर्णय स्वयं लिए।

इस बार रोनाल्डो ने मैड्रिड के होटल को खास तवज्जो देने का फैसला किया है. पुर्तगाल के कप्तान ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ पेशेवर होटल कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध हैं। मैड्रिड में उनके होटल में काम करने पर 25,000 यूरो (भारतीय कीमतों के हिसाब से 27 लाख रुपये से ज्यादा) मासिक वेतन मिलेगा। साल में 50 दिन तक की छुट्टी मिलेगी. कर्मचारियों के लिए उनके जन्मदिन पर अलग से बोनस की व्यवस्था होगी. होटल के बार और रेस्तरां में भोजन करने पर 25 प्रतिशत की छूट उपलब्ध है। रोनाल्डो का लक्ष्य मैड्रिड के ‘द पेस्टाना ग्रान विया’ होटल को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक बनाना है। होटल 2021 में बनाया गया था।

 

मोहन बागान सुपर जाइंट्स एएफसी चैंपियंस लीग 2 से बाहर हो गए हैं। वे ईरान में खेलने नहीं गये. इसीलिए उन्हें प्रतियोगिता से बाहर कर दिया गया है. क्रिस्टियानो रोनाल्डो की टीम अल नासिर को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

अल नासिर का 22 अक्टूबर को ईरानी क्लब एस्टेघलाल के खिलाफ एशियाई चैंपियंस लीग मैच है। रोनाल्डो को ईरान में खेलना है. लेकिन वे उस देश में जाकर खेलने के इच्छुक नहीं हैं। अगर अल नासिर नहीं खेलते हैं तो उन्हें मोहन बागान जैसी ही समस्या का सामना करना पड़ सकता है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अल नस्र मैच को दूसरे देश में स्थानांतरित करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। अल नासिर के एक अधिकारी ने कहा, “स्थिति पर नजर रखी जा रही है। मैच को तटस्थ स्थान पर आयोजित करने का प्रयास किया जा रहा है. हमने कोई औपचारिक आवेदन नहीं किया है।” एएफसी चैंपियंस लीग 2 प्रतियोगिता में मोहन बागान का मैच ट्रैक्टर एफसी के खिलाफ था। हरा-मैरून खेमा वह मैच खेलने नहीं गया. वे ईरान में नहीं खेलना चाहते थे. मोहन बागान ने वहां युद्ध की स्थिति के कारण नहीं खेलने का फैसला किया। लेकिन वे प्रतियोगिता से बाहर हो गये. अगर अल नासिर नहीं खेलेंगे तो क्या उन्हें मोहन बागान की तरह हटा दिया जाएगा? डर से इंकार नहीं किया जा सकता.

 

क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने गोल किया और जश्न ‘सिउउउ’ था। गोल करने के बाद उन्हें विपरीत दिशा में दौड़ते और मुड़ते और दोनों तरफ हाथ फैलाते देखा जा सकता था. लेकिन शुक्रवार को गोल के बाद नए अंदाज में जश्न मनाते देखा गया.

उसने गोल करके लड़के को तीन उंगलियाँ दिखाईं। यह त्यौहार क्यों?

अल नासिर के लिए रोनाल्डो ने गोल किया। उन्होंने सऊदी प्रो लीग में अल एत्तिफ़ाक के ख़िलाफ़ 33वें मिनट में पेनल्टी पर गोल किया। उस गोल के बाद पिता ने अपने बेटे रोनाल्डो जूनियर को तीन उंगलियां दिखाईं. रोनाल्डो जूनियर ने शुक्रवार को अल नासिर की युवा टीम के लिए दो गोल किए। बाबा ने अल नासिर के लिए गोल किया। रोनाल्डो के बेटे ने समझाना चाहा कि उन दोनों ने ‘हैट्रिक’ बनाई है।

अल नासिर ने 3-0 से जीत दर्ज की. रोनाल्डो के अलावा सलेम अल-नजदी और तालिस्का ने भी गोल किए। अल नासिर लीग में चौथे स्थान पर है। उन्हें चार मैचों में 8 अंक मिले. अल नासिर ने नए कोच स्टेफ़ानो पियोली के नेतृत्व में पहला मैच जीता। लीग लीडर अल इत्तिहाद ने तीन में से तीन मैच जीते हैं। अल नासिर नए कोच पियोली के प्रशिक्षण को अच्छे से पूरा करना चाहते हैं।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने गोल किया और जश्न ‘सिउउउ’ था। गोल करने के बाद उन्हें विपरीत दिशा में दौड़ते और मुड़ते और दोनों तरफ हाथ फैलाते देखा जा सकता था. लेकिन शुक्रवार को गोल के बाद नए अंदाज में जश्न मनाते देखा गया.

घर पर बाल दिखेंगे घने और चमकदार, आप इसे पूजा के दौरान ट्राई कर सकती हैं

0

टोटके बालों को झड़ने से रोकने के लिए कई लोग बाजार में मिलने वाले तरह-तरह के कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। बल्कि अगर आप घर पर ही इसकी देखभाल करेंगी तो आपके बाल बहुत जल्दी घने हो जाएंगे। बहुत ज़्यादा बाल झड़ रहे हैं? बढ़ रही है डैंड्रफ की समस्या या बालों के सिरे हो रहे हैं दोमुंहे? बालों की सभी समस्याओं के लिए घरेलू उपचार मौजूद हैं। बालों को झड़ने से रोकने के लिए कई लोग बाजार में मिलने वाले तरह-तरह के कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। बल्कि अगर आप घर पर ही इसकी देखभाल करेंगी तो आपके बाल बहुत जल्दी घने हो जाएंगे। जिला भी लौट आएगा।

शरीर में हार्मोन में अचानक बदलाव भी बालों के झड़ने का कारण बन सकता है। हार्मोनल परिवर्तन के कारण महिलाओं को प्रसव या रजोनिवृत्ति के बाद भी बाल झड़ने का अनुभव हो सकता है। क्योंकि आप हमेशा घरेलू ट्रिक्स पर भरोसा कर सकते हैं।

बालों को घना करने के लिए क्या करें?

1) अपने हाथ में थोड़ा सा नारियल का तेल लें और इसे जड़ से सिरे तक अच्छे से लगाएं। टिप की तरफ अधिक लगाएं. इस बार बालों को शॉवर कैप में लपेट लें और एक घंटे तक रखें। इसके बाद अतिरिक्त तेल को शैंपू से धो लें। बालों को सुखाने के लिए ड्रायर का प्रयोग न करें, हवा में सुखाएं।

2) प्याज के रस को नारियल के तेल में मिलाकर बालों पर अच्छे से लगाएं. इसे एक घंटे तक ऐसे ही रखें. फिर शैंपू कर लें. बाल घने और घने दिखेंगे.

3) अगर आप चावल धोने का पानी अपने बालों में लगाएंगे तो आपके बाल बहुत तेजी से बढ़ेंगे। चावल को धोकर उस पानी को बालों पर लगाएं और एक घंटे के लिए छोड़ दें और धो लें।

4) पका पपीता बालों के लिए बहुत अच्छा होता है। अगर पपीते के साथ बादाम का तेल और खट्टा दही मिलाया जाए तो बालों में नमी की मात्रा भी कई गुना बढ़ जाती है। पपीते को पीसकर उसमें खट्टा दही और मूंगफली का तेल मिला लें। इस मिश्रण को बालों पर अच्छे से लगाएं और शैंपू करने से एक घंटे पहले छोड़ दें। बाल बहुत तेजी से बढ़ेंगे. यह स्मूथ होगा.

5) बालों के स्वास्थ्य में मेथी की भूमिका के बारे में बहुत से लोग जानते हैं। बालों को दोमुंहे होने से बचाने और उन्हें स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने में मेथी भी बहुत उपयोगी है। कुछ मेथी दानों को मिक्सर में पीस लें. दो चम्मच मेथी पाउडर लें और इसे 2 चम्मच खट्टे दही के साथ मिलाएं। इस मिश्रण को बालों पर अच्छे से लगाएं। इसके बाद इसे आधे घंटे के लिए छोड़ दें और शैंपू कर लें। आप कितने दिन की पूजा में शैंपू जरूर करेंगी? और अगर आप ज्यादा शैंपू का इस्तेमाल करते हैं तो बाल रूखे हो जाते हैं। अगर आप पूजा के सितारों जैसे मुलायम और चिकने बाल चाहती हैं तो सिर्फ शैम्पू से काम नहीं चलेगा। रूखे बालों को मुलायम और प्रबंधनीय बनाने के लिए अपने दैनिक शैम्पू में कुछ सामग्री मिलाएं।

शैम्पू में क्या मिलाने से बढ़ जाएगी बालों की चमक?

1)नारियल का दूध

नारियल के दूध में विटामिन सी, विटामिन बी और विटामिन ई आदि मौजूद होते हैं। कई विटामिनों के अलावा, इसमें सेलेनियम, सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे कई खनिज शामिल हैं। ये तत्व बालों और बालों के रोम को बनाए रखने और बालों के विकास में मदद करते हैं। नारियल के दूध को शैम्पू में मिलाकर बालों में लगाने से बाल लंबे और स्वस्थ होंगे।

2) गुलाब जल

शैंपू में एक कप गुलाब जल मिलाएं। इससे तालू की खुश्की दूर हो जाएगी। अगर आपको तालु पर खुजली या डैंड्रफ की समस्या है तो इससे भी आपको छुटकारा मिल जाएगा। बाल जिला वापस आ जायेगा.

3) चीनी

प्रदूषण, पसीने और तेल व गंदगी जमा होने के कारण बाल बहुत जल्दी चिपचिपे हो जाते हैं। इसलिए अपने बालों को नियमित रूप से साफ़ करना ज़रूरी है। इसके लिए हफ्ते में कम से कम 2-3 बार शैंपू करना जरूरी है। और अब से स्वस्थ बाल पाने के लिए इस शैम्पू में चीनी मिलाएं। यदि आप शैम्पू में 1 चम्मच चीनी मिलाते हैं, तो आपके बालों की प्राकृतिक चमक वापस आ जाएगी। डैंड्रफ की समस्या को कम करने के लिए आप इस ट्रिक का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

4) बेकिंग सोडा

क्या आप जिस शैम्पू का उपयोग करते हैं वह पैराबेन और सल्फेट मुक्त है? इस प्रकार के शैम्पू में ज्यादा झाग नहीं बनता है। हालाँकि, यदि आप अतिरिक्त झाग चाहते हैं, तो शैम्पू में थोड़ा बेकिंग सोडा मिलाएं। झाग बनेगा, बाल साफ़ होंगे.

5) आवश्यक तेल

अगर आपके घर में टी ट्री, लैवेंडर, रोज़मेरी या पेपरमिंट एसेंशियल ऑयल है, तो इसे शैम्पू में मिलाएं। डैंड्रफ की समस्या कम हो जाएगी.

क्या नसरुल्लाह की मौत तीसरे विश्व युद्ध की घंटी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नसरुल्लाह की मौत तीसरे विश्व युद्ध की घंटी है या नहीं! इजरायल के लेबनान में भीषण हवाई हमले में हिजबुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की हत्या ने क्षेत्र में तनाव को काफी बढ़ा दिया है। हमले के बाद इजरायल और लेबनानी गुट हिजबुल्लाह के बीच पूर्ण युद्ध का अंदेशा बढ़ गया है। इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष छिड़ा तो ईरान और अमेरिका भी इससे बाहर नहीं रहेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि अब चीजें किस तरफ जाएंगी। खासतौर से हिजबुल्लाह, ईरान और इजरायल का अगला कदम क्या होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान हिजबुल्लाह ने उठाया है। ऐसे में सवाल है कि एक के बाद एक झटके झेल रहा ये गुट अब क्या करेगा। हिजबुल्लाह के ज्यादातर कमांडरों की हत्या कर दी गई है और उसके कम्युनिकेशन सिस्टम पेजर और वॉकी-टॉकी को भी तहस-नहस कर दिया गया है। ऐसे में हिजबुल्लाह के सामने फिर से उठ खड़े होने और इजरायल को जवाब देने की चुनौती है।

अमेरिका स्थित मध्य पूर्व सुरक्षा विश्लेषक मोहम्मद अल-बाशा का मानना है कि हसन नसरल्लाह की मौत हिजबुल्लाह के लिए बड़ा नुकसान है। इससे ये गुट अस्थिरता का शिकार होगा और इसकी राजनीतिक और सैन्य रणनीतियों में भी बदलाव आएगा। हालांकि ये ऐसी उम्मीद करना गलत है कि ये कि गुट अचानक से अपनी हार मान लेगा। एक्सपर्ट का मानना है कि हिजबुल्लाह लड़ाई जारी रखेगा ना कि इजराइल की शर्तों पर किसी समझौता को मान लेगा। हिजबुल्लाह के पास हजारों लड़ाके हैं और हथियारों का बड़ा जखीरा है। उसके पास ऐसी मिसाइल और रॉकेट हैं, जो इजरायल के तेल अवीव और दूसरे शहरों तक पहुंच सकते हैं। हिजबुल्लाह दबाव बढ़ने पर इनका इस्तेमाल कर सकता है।

हसन नसरल्ला की हत्या ईरान के लिए उतना ही बड़ा झटका है, जितना हिजबुल्लाह के लिए है। ईरान ने इस हत्या पर कड़ी प्रतिक्रिया भी दी है। इससे पहले जुलाई में तेहरान में हमास नेता इस्माइल हानिया की हत्या भी ईरान के लिए शर्म की वजह बनी थी। ईरान पर इजरायल के बढ़ते हमले ईरान सरकार को प्रतिक्रिया के लिए मजबूर कर सकते हैं।ईरान के पास पश्चिम एशिया में कई गुट हैं। इनमें हिजबुल्लाह के अलावा यमन में हूती हैं। सीरिया और इराक में भी ईरान के पास मिलिशिया हैं। ईरान इन समूहों से अपने क्षेत्रों में इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर अपने हमले तेज करने के लिए कह सकता है। हालांकि ऐसा होने पर इजरायल के साथ खुद तो भी एक पूर्ण युद्ध में पा सकता है।

अमेरिका के खास सहयोगी इजरायल पर खासतौर से सभी की निगाह है क्योंकि उसने लेबनान में हमला कर अपनी आक्रामकता जाहिर कर दी है। इजरायल का रुख दिखाता है कि उसका फिलहाल युद्धविराम का कोई इरादा नहीं है। इजरायली सेना को लगता है कि हिजबुल्लाह बैकफुट पर है, इसलिए वह उस पर आक्रमण को जारी रखना चाहेगा।

इजरायल पर इसलिए भी नजर रहेगी कि वह हवाई हमले की करता है या जमीन पर भी सेना लेबनान में भेजेगा। इजरायली सेना लेबनान में जमीनी अभियान का ऐलान कर सकती है। आईडीएफ के लिए लेबनान में एंट्री मुश्किल नहीं होगी लेकिन उसे अभियान पूरा करने में गाजा की तरह महीनों या वर्ष भी लग सकते हैं। इससे इजरायल की चुनौती बढ़गी। बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि खुमैनी के आने के बाद भी इज़रायल ने 1980 से 1988 तक ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान को काफी मदद दी थी। हुआ यह था कि 22 सितंबर 1980 को सद्दाम हुसैन की सेना ने अचानक ईरान पर हमला कर दिया था। युद्ध के दौरान ईरान को सैन्य साजोसामान मुहैया कराने वालों में सबसे आगे इजरायल ही था।

इज़राइल ने ईरान के युद्ध को प्रत्यक्ष समर्थन दिया था। उस वक्त इजरायल ने ऑपरेशन बेबीलोन के तहत इराक के ओसिरक परमाणु रिएक्टर पर बमबारी करके उसे नष्ट कर दिया। परमाणु रिएक्टर को इराक के परमाणु हथियार कार्यक्रम का एक हिस्सा माना जाता था। उस वक्त इराक पर तानाशाह सद्दाम हुसैन का राज था। 1982 की बात है, जब इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण कर फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को बाहर कर दिया था। दक्षिण लेबनान में सुरक्षा क्षेत्र के आगामी निर्माण से लेबनान में इजरायली सहयोगियों और नागरिक इजरायली आबादी को अस्थायी रूप से लाभ हुआ। नतीजा यह हुआ कि दक्षिण लेबनान के भीतर फिलीस्तीनी के बजाय घरेलू लेबनानी प्रतिरोध आंदोलन का उदय हुआ, जहां हिजबुल्लाह मजबूती के साथ उठ खड़ा हुआ।

आखिर इसराइल और ईरान कैसे बन गए कट्टर दुश्मन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इसराइल और ईरान जैसे दो दोस्त देश कट्टर दुश्मन कैसे बन गए!ईरान ने आखिरकार इजरायल पर मिसाइलों से हमला बोल दिया। उसने दावा किया है कि इन हमलों में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के हेडक्वॉर्टर्स तबाह हो गया। ईरान ने यह भी कहा है कि उसने इस्माइल हानिया और हिजबुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह की मौत का बदला ले लिया है। वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि ईरान ने ये हमले करके बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। नेतन्याहू का इस मामले में अमेरिका भी साथ दे रहा है। इजरायल-ईरान के बीच दुश्मनी आज चरम पर पहुंच चुकी है, मगर कभी दोनों दोस्त हुआ करते थे। जानते हैं कि दोनों की दोस्ती और दुश्मनी की पूरी कहानी। ईरान की दुश्मनी की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वह यह मानने लगा है कि इजरायल के वजूद में रहने का हक नहीं है। ईरान इजरायल को छोटा शैतान तो अमेरिका को बड़ा शैतान मानता है। मध्य-पूर्व में ईरान चाहता है कि अमेरिका और इजरायल इस क्षेत्र से गायब हो जाएं।

इजरायल यह मानता है कि हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों को पैसे देता है और ईरान के सुप्रीम कमांडर अयातुल्लाह खामनेई यहूदी विरोधी संगठनों को इजरायल के खिलाफ भड़काते हैं। इन दोनों की दुश्मनी में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। ईरान ने इजरायल के खिलाफ एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस तैयार किया है। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले तक इजरायल के साथ उसके संबंध काफी दोस्ताना थे। इस्लामी क्रांति से पहले तक ईरान में पहलवी राजवंश का शासन था। उस वक्त ईरान मध्य-पूर्व में अमेरिका के बड़े सहयोगियों में से एक हुआ करता था। 1948 में जब इजरायल बना तो उस वक्त तुर्की के बाद ईरान ही इजरायल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम देश था।

इजरायल के फाउंडर और उसकी पहली सरकार के प्रमुख डेविड बेन गुरियन ने अपने अरब पड़ोसियों को साधने के लिए ईरान से दोस्ती कर ली थी, ताकि नए यहूदी देश को लेकर कोई कुछ बोल न सके। मगर, 1979 में कट्टर अयातुल्लाह खुमैनी की क्रांति ने शाह को उखाड़ फेंका और एक इस्लामी गणतंत्र लागू किया। खुमैनी ने खुद को ईरान का रक्षक करार दिया था। उन्होंने ईरान में अमेरिका और इजरायल के प्रति नफरत के बीज बोए, जिसका चरम रूप आज देखने को मिल रहा है। अयातुल्लाह की सरकार ने इजरायल के साथ संबंध तोड़ लिए। उसने उसके नागरिकों के पासपोर्ट की वैधता को मान्यता देना बंद कर दिया और तेहरान में इजरायली दूतावास को ज़ब्त कर फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (PLO) को सौंप दिया। उस समय अलग फिलिस्तीन के लिए इजरायल के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व PLO कर रहा था। वजह यह थी कि अयातुल्लाह की सरकार के कई कमांडरों ने PLO के साथ लेबनान में लड़ाई लड़ी थी।

इजरायल और ईरान के बीच यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि खुमैनी के आने के बाद भी इज़रायल ने 1980 से 1988 तक ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान को काफी मदद दी थी। हुआ यह था कि 22 सितंबर 1980 को सद्दाम हुसैन की सेना ने अचानक ईरान पर हमला कर दिया था। युद्ध के दौरान ईरान को सैन्य साजोसामान मुहैया कराने वालों में सबसे आगे इजरायल ही था। इज़राइल ने ईरान के युद्ध को प्रत्यक्ष समर्थन दिया था। उस वक्त इजरायल ने ऑपरेशन बेबीलोन के तहत इराक के ओसिरक परमाणु रिएक्टर पर बमबारी करके उसे नष्ट कर दिया। परमाणु रिएक्टर को इराक के परमाणु हथियार कार्यक्रम का एक हिस्सा माना जाता था। उस वक्त इराक पर तानाशाह सद्दाम हुसैन का राज था।

1982 की बात है, जब इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण कर फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को बाहर कर दिया था। दक्षिण लेबनान में सुरक्षा क्षेत्र के आगामी निर्माण से लेबनान में इजरायली सहयोगियों और नागरिक इजरायली आबादी को अस्थायी रूप से लाभ हुआ। नतीजा यह हुआ कि दक्षिण लेबनान के भीतर फिलीस्तीनी के बजाय घरेलू लेबनानी प्रतिरोध आंदोलन का उदय हुआ, जहां हिजबुल्लाह मजबूती के साथ उठ खड़ा हुआ। दोनों देशों में संबंध तब और बिगड़ गए जब ये खुलासा हुआ कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने का काम शुरू कर चुका है। इजरायल किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहता है कि मध्य पूर्व में किसी देश के पास परमाणु हथियार हो। तब से दोनों देशों के रिश्तों में और खटास आती गई, जो अब कट्टर दुश्मनी में बदल गई।

इजरायल और ईरान के बीच की लड़ाई को ‘शैडो वॉर’ कहा जाता है, क्योंकि दोनों ही देश हमलों को सीधे तौर पर स्वीकार नहीं करते हैं। कभी ईरान से जुड़े इस्लामिक जिहादी समूह ने अर्जेंटीना में इजरायली दूतावास उड़ा दिया था। उसके कुछ समय पहले ही हिज़बुल्लाह नेता अब्बास अल मुसावी की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए मोसाद पर आरोप लगे थे। हाल ही में ईरान समर्थक हमास लीडर इस्माइल हानिया की तेहरान में हत्या और हिजबुल्लाह के चीफ कमांडर नसरल्लाह की हत्या के पीछे भी इजरायल को ही जिम्मेदार माना जाता है।

कैंप डेविड समझौता 17 सितंबर, 1978 में इजरायल और मिस्र के बीच हुआ था, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने मध्यस्थता की थी। कैंप डेविड समझौते पर मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने दस्तखत किए थे। इस समझौते से दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हुई थी। इन्हीं समझौतों की वजह से सादात और बेगिन को संयुक्त रूप से 1978 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। हालांकि, इजरायल और ईरान के बीच अभी ऐसा समझौता संभव होना मुश्किल लगता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच के मुद्दे जटिल हैं और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विश्व समुदाय में चिंता है।

 

क्या अपने अतीत को दोहरा रहा है इजराइल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसराइल अब अपने अतीत को दोहरा रहा है या नहीं! इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यह ऐलान किया कि लेबनान में आतंकी गुट हिजबुल्लाह के लीडर हसन नसरल्लाह की हत्या आने वाले वर्षों के लिए क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदलने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा। इजरायल ने लेबनान में ईरान समर्थित आतंकवादी समूह पर एक के बाद एक कई बड़े हमले किए। पहले पेजर और वॉकी टॉकी विस्फोट, फिर दक्षिणी बेरूत पर एक बड़ा हवाई हमला किया, जिसमें वरिष्ठ कमांडर इब्राहिम अकील मारा गया। इसके तीन दिन बाद ही एक जबरदस्त बमबारी में हिजबुल्लाह का चीफ हसन नसरल्लाह भी मारा गया। इन हमलों में कई इमारतें जमींदोज हो गईं और हिजबुल्लाह की तकरीबन पूरी लीडरशिप खत्म हो गई। इजरायल भले ही इसे अपनी जीत मान रहा हो या इसके पीछे उसका 3H प्लान हो, मगर यह उस पर भारी भी पड़ सकता है। इजरायल को यह नहीं भूलना चाहिए कि कभी उसके इसी तरह के कदमों की वजह से ही हिजबुल्लाह का जन्म हुआ था। जून 1982 की बात है, जब फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन यानी PLO को कुचलने के मकसद से इजरायल ने लेबनान पर आक्रमण किया। तब इजरायल ने यह सोचा था कि वह लेबनान में ईसाई वर्चस्व वाली एक ऐसी सरकार बनवाएगा, जो उसके समर्थन में होगी। इसके अलावा, वहां से सीरियाई फोर्सेज को बाहर भी निकाला जा सकेगा। इन तीनों ही मकसद में इजरायल नाकाम रहा था।

लेबनान में फिलिस्तीनी हथियार बंद समूहों को अमेरिकी मध्यस्थता वाले समझौते के तहत देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। उस वक्त PLO को ट्यूनीशिया, यमन और अन्य जगहों पर निर्वासन में भेज दिया था। हालांकि, पांच साल बाद ही पहला फिलिस्तीनी इंतिफादा या विद्रोह गाजा में भड़क गया और पश्चिमी तट तक फैल गया। आज फिलिस्तीनी अपने मकसद के लिए अडिग हैं। वो इजरायली कब्जे को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। नीचे दिए ग्राफिक से समझते हैं कि इजरायल के हालिया हमलों के बाद अब उसकी लीडरशिप में कौन बचा है। 1982 के लेबनान युद्ध को लेबनान पर दूसरा इजरायली आक्रमण भी कहा जाता है। यह 6 जून, 1982 को उस वक्त शुरू हुआ, जब इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर आक्रमण किया। आक्रमण दक्षिणी लेबनान में एक्टिव फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) और इजरायली सेना के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई, जिसमें सीमा के दोनों ओर नागरिक मारे गए थे। इजरायली सैन्य अभियान का कोड नाम ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली था।

अबू निदाल जैसे आतंकी सगंठन (फतह) के आतंकियों ने ब्रिटेन में इजरायल के राजदूत श्लोमो अर्गोव की हत्या का प्रयास किया था, जिसके बाद तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने पीएलओ को दोषी ठहराया। उन्होंने लेबनान में इजरायली आक्रमण के पीछे यही वजह बताई। इजरायल की सरकार ने जब पीएलओ को निकाल बाहर किया तो उसने राष्ट्रपति बशीर गेमायेल के नेतृत्व में एक इजरायल समर्थक ईसाई सरकार बनवाई। इजरायल सरकार ने एक संधि पर हस्ताक्षर करने की उम्मीद जताई थी, जो इजरायल को ’40 साल की शांति’ देगी। मगर, इसी बीच सितंबर, 1982 में गेमेल की हत्या हो गई और शांति संधि की बात धरी की धरी रह गई।

इस युद्ध की वजह से बड़ी संख्या में इजरायली जनता मारी गई। इजरायली जनता का मोहभंग हो गया दिया। इजरायली डिफेंस फोर्सेज ने 29 सितंबर, 1982 को लेबनान में अपना अभियान समाप्त कर दिया। फरवरी से अप्रैल 1985 तक इजरायली सेना ने दक्षिण लेबनान सुरक्षा क्षेत्र में कब्जा कर रखा था, जिससे ईरान समर्थित लड़ाका समूह हिजबुल्लाह का जन्म हुआ। इसने 2000 में लेबनान से आईडीएफ की अंतिम वापसी तक इजरायली कब्जे के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।

माना जाता है कि 1982 के इजरायली आक्रमण का सबसे अहम नतीजा यह हुआ कि हिजबुल्लाह के रूप में ऐसा नासूर पैदा हुआ, जिसने इजरायल के खिलाफ लगातार गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। इसने इजरायल को दक्षिण लेबनान से एकतरफा हटने के लिए मजबूर कर दिया। ऐसा पहली बार था जब जब किसी अरब सैन्य बलों ने इजरायल को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। अरब की धरती से ईरान की मदद से यह नया समूह उन फिलिस्तीनी उग्रवादियों से ज्यादा अधिक घातक और प्रभावी साबित हुआ। 2005 तक इस लड़ाई में ईरान ने हिजबुल्लाह की जमकर मदद की।

नसरल्लाह की मौत ईरान के लिए भी बड़ा झटका है। उसने अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई को इजरायली हमले के डर से कहीं छिपा दिया है। जुलाई में तेहरान के एक गेस्ट हाउस में हमास के राजनीतिक नेता इस्माइल हनिया की अपमानजनक हत्या का बदला भी अभी तक ईरान नहीं ले पाया है। अब नसरल्लाह की हत्या के बाद ईरान अब नई रणनीति पर विचार कर रहा होगा।ईरान के पास मध्य पूर्व में उसके मित्र देशों के भारी हथियारों से लैस लड़ाकों का एक पूरा संगठन है, जिसे कथित तौर पर ‘प्रतिरोध की धुरी’ (एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस) कहा जाता है। हिजबुल्लाह के अलावा यमन में हूती और सीरिया और इराक में भी कई शिया संगठन हैं, जिन्हें ईरान इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर हमले करने के लिए कह सकता है। हालांकि, वह इसके लिए सौ बार सोचेगा, क्योंकि इसकी प्रतिक्रिया बेहद जबरदस्त होगी।

17 सितंबर, 1978 को कैंप डेविड समझौते पर मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने दस्तखत किए थे। मैरीलैंड के कैंप डेविड में 12 दिनों की सीक्रेट बातचीत के बाद इन दो समझौतों पर अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मौजूदगी में व्हाइट हाउस में हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों से मिस्र और इजरायल के बीच 1979 की मिस्र-इजरायल शांति संधि की राह खुली। इन्हीं समझौतों की वजह से सादात और बेगिन को संयुक्त रूप से 1978 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। हालांकि, अमेरिका के हालिया रुख से अभी समझौते की गुंजाइश नहीं दिखती है।