Thursday, March 12, 2026
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क्या विपक्ष ने हल्के में ले लिया है मोदी जी को?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी जी को विपक्ष ने हल्के में ले लिया है या नहीं! एग्जिट पोल के आए नतीजों और 4 जून को आने वाले असली नतीजों में कोई बड़ा फर्क नहीं हुआ तो विपक्ष के सामने कोई एक दो सवाल नहीं होंगे। सवाल ऐसे कि शायद ही अगले कुछ महीनों, वर्षों में विपक्ष उसका जवाब खोज पाए। विपक्षी दल खासकर कांग्रेस के लिए मुश्किल घड़ी होगी। जैसा एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं उसके मुताबिक विपक्ष के लिए यह चुभने वाली हार होगी। कांग्रेस समेत दूसरे दलों की ओर से चुनाव में तमाम बड़े वादे किए गए लेकिन लगता है कि पब्लिक को उस पर यकीन नहीं हुआ। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी जिनकी बातों पर जनता को अब भी काफी भरोसा है। जो गारंटी की बात कही उस पर विश्वास है। बीजेपी की जीत और विपक्ष की हार के बाद विश्लेषण भी होगा लेकिन एक बात तो तय है कि विपक्ष एक बार फिर पीएम मोदी को पढ़ने में भूल कर गया। चुनाव में टकाटक, फटाफट और चुनाव खत्म होने से कुछ दिन पहले बिहार की धरती से सफाचट की बात कही गई। अब यह उल्टा पड़ता दिख रहा है। एक ओर एनडीए गठबंधन जिसकी अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे थे। तो वहीं दूसरी ओर विपक्ष जिसकी अगुवाई कौन कर रहा किसी को पता नहीं। एनडीए की ओर से सिर्फ मोदी की गारंटी थी तो वहीं विपक्ष की ओर से कांग्रेस, सपा, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, डीएमके के अपने-अपने वादे। कोई टकाटक अकाउंट में पैसे देने की बात कर रहा था तो कोई CAA खत्म करने की बात। कोई पीडीए की बात कर रहा था तो कोई पूरे देश में फ्री बिजली देने की बात कर रहा था। कई दल और कई सारे वादे। इन दलों की ओर से कहा जा रहा था कि बहुमत मिला तो हम अपने वादे पूरे कराने के लिए दबाव डालेंगे। कुल मिलाकर कहें कि जितने मुंह उतनी बातें। सभी दलों ने अपने-अपने राज्यों और वोटर्स के हिसाब से वादे किए। वहीं दूसरी ओर सिर्फ मोदी की गारंटी। अब एग्जिट पोल के नतीजों के हिसाब से यह गारंटी सब पर भारी पड़ रही है।

विपक्षी दलों की ओर से मेहनत नहीं की गई या उनकी रैलियों में भीड़ नहीं हुई, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तेजस्वी, ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव समेत और दूसरे दलों के नेताओं की ओर से कई रैलियां की गईं। फिर ऐसा क्या हुआ कि नतीजे पूरी तरह तो क्या थोड़े बहुत भी फेवर में जाते नहीं दिख रहे। विपक्ष को लेकर जनता के मन में शुरू से सवाल था और यह सवाल पता नहीं कब से है। आखिर कौन विपक्ष की अगुवाई कर रहा है। इन दलों को यह समझना होगा कि सिर्फ यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि नतीजों के बाद तय कर लिया जाएगा। यह कहना ही कई बार जनता के मन में संदेह पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से महिलाओं को एक खास रकम देने की बात कही गई और भी कई वादे किए गए लेकिन उस पर जनता को यकीन नहीं हुआ। वहीं मोदी अपनी जीत को लेकर शुरू से ही आश्वस्त दिख रहे हैं। फ्री राशन, आवास, जल ऐसी कई योजनाएं थीं जिसका पब्लिक को सीधा लाभ मिल रहा है। यह बात मोदी के फेवर में जाती दिख रही हैं।

2014, 2019 और अब एग्जिट पोल नतीजों के हिसाब से 2024 में जीत के बाद मोदी हैट्रिक बनाने जा रहे हैं। 4 जून को नतीजे उलट नहीं हुए तो विपक्ष चाहें जो दलील दे लेकिन एक बात तय है कि पब्लिक के मन में चुनाव की शुरुआत से ही कोई शंका नहीं थी। पब्लिक किसी किंतु परंतु के मूड में शुरू से नहीं है। विपक्ष भले ही जनता और मोदी को भांपने में चूक कर रही थी लेकिन पब्लिक का मत एकदम क्लियर था। लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटना कोई आसान काम नहीं। मोदी ऐसा करते हुए दिख रहे हैं। सिर्फ केंद्र ही नहीं हाल के कई राज्यों के चुनाव में भी जनता अपना मत स्पष्ट तौर पर दे रही है। जिस दल को सत्ता सौंपनी है उसे पूरी मजबूती के साथ कुर्सी पर बिठाना है। कोई एक या दो बात मोदी के फेवर में गई है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। विपक्षी दलों ने मिलकर इंडिया गठबंधन तो बना लिया लेकिन पब्लिक को उस पर पूरी तरह यकीन नहीं हो रहा था। जो साथ आ भी रहे थे वह कंडीशन के साथ। ऐसे में लगता है कि जनता को नियम और शर्तें लागू वाली बात पसंद नहीं आई।

आखिर कौन सी पार्टी है पैन इंडिया पार्टी, कांग्रेस या बीजेपी?

आज हम आपको बताएंगे कि कौन सी पार्टी पैन इंडिया पार्टी है कांग्रेस या बीजेपी! क्या बीजेपी वाकई उत्तर भारत या हिंदी बेल्ट की पार्टी है? क्या भाजपा दक्षिण भारत में कांग्रेस के मुकाबले बहुत कमजोर है? कम-से-कम धारणा तो यही है कि बीजेपी सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी है, पैन इंडिया पार्टी तो कांग्रेस ही है। लंबे समय से यह नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है कि कांग्रेस का पूरे भारत में जनाधार है, लेकिन बीजेपी उत्तर भारत तक सीमित है। नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लोकसभा चुनाव लड़ने से 2014 में बीजेपी के दबदबे वाले राज्यों की लिस्ट बढ़ी और पश्चिमी भारत के प्रदेश भी जुड़ गए लेकिन दक्षिण का किला तो फिर भी अजेय रहा। ऐसा बताने वाले कर्नाटक को अपवाद बताते हैं और कहते हैं कि तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुलता है। लेकिन सच्चाई यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण के राज्यों से बीजेपी को 30 सीटें आई थीं जबकि कांग्रेस को 29 सीटें। इस बार के लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल्स के नतीजे जिस ओर इशारा कर रहे हैं, उससे तो यह साफ संकेत मिल रहा है कि बीजेपी का दक्षिण के सभी राज्यों में खाता खुल सकता है। अब आइए पैन इंडिया वाले नैरेटिव की पड़ताल करते हैं। इसके लिए हमने देश के सभी राज्यों को चारों दिशाओं के आधार पर बांटा है। पूरब में कुल 13 राज्य और 153 लोकसभा सीटें हैं। पश्चिम के चार राज्यों में लोकसभा के 101 निर्वाचन क्षेत्र हैं। वहीं, उत्तर भारत के 10 राज्यों में 155 जबकि दक्षिण के नौ प्रदेशों में कुल 134 लोकसभा सीटें हैं। चारों दिशाओं की कुल सीटों को जोड़ें तो लोकसभा की कुल 543 सीटें हो जाती हैं। अब 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में इलाका दर इलाका बीजेपी और कांग्रेस को मिलीं सीटों का आकलन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि बीजेपी हर दिशा में कांग्रेस से आगे रही। दक्षिण का इलाका छोड़ दें तो बीजेपी अन्य दिशाओं में कांग्रेस से कई गुना आगे है। मजे की बात है कि जिस कांग्रेस को दक्षिण के राज्यों के आधार पर ही पैन इंडिया पार्टी बताया जाता है, वहां भी उसे बीजेपी के मुकाबले एक सीट कम ही आई थी।

अगर कोई कहे कि दक्षिण भारत में भले ही कांग्रेस से एक सीट ज्यादा लाई हो, लेकिन उसे तो कर्नाटक से ही एकमुश्त सीटें आईं, बाकी प्रदेशों में उसकी मौजूदगी नहीं है। तो यह भी सच है कि कांग्रेस को भी एकमुश्त केरल से ही सीटें आई हैं, उसका भी दक्षिण के अन्य राज्यों में कोई मजबूत मौजूदगी नहीं है। हमने दक्षिण के राज्यों में कुल 10 प्रदेशों को रखा है- कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, आंध्र प्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, दादर एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव, लक्षद्वीप और पुदुचेरी को रखा है। इन 10 में से कांग्रेस ने छह प्रदेशों मे खाता खोला था तो बीजेपी को तीन प्रदेशों से सीटें आई थीं। बीजेपी ने कर्नाट के साथ-साथ तेलंगाना और दादर एवं नगर हवेली से सीटें मिली थीं। वहीं, कांग्रेस कर्नाटक में एक सीट से सिर्फ खाता खोल पाई थी जबकि तेलंगाना में उस बीजेपी से एक सीट कम मिली थी।

इस तरह उसे सिर्फ केरल और तमिलनाडु में बढ़त मिली जहां बीजेपी का खाता नहीं खुल पाया था। आंध्र प्रदेश में बीजेपी शून्य रही तो कांग्रेस भी जीरो पर ही आउट हुई थी। उसके खाते में दक्षिण का एक अतिरिक्त प्रदेश पुदुचेरी के रूप में जुड़ा जहां लोकसभा की महज एक सीट है। इस तरह सैद्धांतिक तौर पर तो दक्षिण में बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस की मौजूदगी दोगुने राज्यों में है, लेकिन हकीकत में सिर्फ दो राज्य केरल और तमिलनाडु ही हैं जहां कांग्रेस को सीटें मिलीं और बीजेपी ऑल आउट रही। तो ये है दक्षिण में कांग्रेस की मौजूदगी और बीजेपी के नदारद रहने के नैरेटिव की सच्चाई। अब अगर एग्जिट पोल के नतीजे 4 जून को असली रिजल्ट्स में तब्दील हो गए तो इस बार केरल, तमिलनाडु से बीजेपी की गैर-मौजूदगी का सिलसिला भी थम जाएगा। लगभग सभी एग्जिट पोल्स बता रहे हैं कि दक्षिण के इन दोनों राज्यों में इस बार बीजेपी का खाता खुल रहा है। कुछ एग्जिट पोल्स तो तमिलनाडु में 5 से 8 जबकि केरल में 2 से 4 सीटें तक दे रहे हैं। ऐसा हुआ तो इन दोनों राज्यों में बीजेपी का खाता खुलना नहीं कहलाएगा बल्कि दमदार मौजूदगी होगी।

अब अगर दक्षिणी राज्यों की बात कर लें तो कांग्रेस आंध्र प्रदेश (25), दादर नागर हवेली और दमन एवं दीव (2) और लक्षद्वीप (1) यानी कुल तीन ऐसे प्रदेशों से नदारद रही जहां कुल 28 सीटें हैं जबकि बीजेपी के लिए यह आंकड़ा क्रमशः 7 और 87 (तमिलनाडु – 39, केरल – 20, आंध्र प्रदेश – 25, अंडमान निकोबार द्वीप समूह – 1, दादर एवं नगर हवेली – 1, लक्षद्वीप और पुदुचेरी -1) हैं। अब पूरे देश की बात करें तो कांग्रेस कुल 120 सीटों वाले 18 प्रदेशों से गायब रही जबकि बीजेपी कुल 11 ऐसे प्रदेशों से गायब रही जहां से कुल मिलाकर 93 सीटे हैं। मतलब, प्रदेशों और लोकसभा सीटों की संख्या, दोनों पैमानों पर बीजेपी की मौजूदगी कांग्रेस से कहीं अधिक है। तो क्या यह नैरेटिव सही है कि कांग्रेस तो पैन इंडिया पार्टी है, लेकिन कांग्रेस नहीं?

ऊपर के आंकड़ों से आप समझ गए होंगे कि कांग्रेस के असल में राष्ट्रीय दल और बीजेपी के उत्तर-पश्चिम तक सीमित रहने की धारणा कितनी गलत है। जहां तक बात 2024 के लोकसभा चुनावों की है तो अधिकतर पोल्स बता रहे हैं कि बीजेपी का भौगोलिक विस्तार और भी बड़ा हो रहा है।

आखिर कौन है भारतीय मूल की रुचिरा कंबोज?

आज हम आपको भारतीय मूल की रुचिरा कंबोज के बारे में बताने जा रहे हैं! संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली महिला स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज रिटायर हुईं। रुचिरा 2 अगस्त, 2022 को न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं थी। वे 35 साल की सेवा के बाद रिटायर हुई हैं। इस दौरान उन्होंने भूटान, दक्षिण अफ्रीका और यूनेस्को में भारतीय राजदूत के रूप में काम किया। कंबोज 1987 बैच की आईएफएस अधिकारी हैं। उन्होंने शनिवार को सोशल मीडिया पर लिखा, ‘भारत को असाधारण वर्षों और अविस्मरणीय अनुभवों के लिए धन्यवाद।ट पिछले दो सालों में, रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध के दौरान, कंबोज ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में चर्चाओं में भारत का नेतृत्व किया। मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया है और उन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और भारत की बात को दमदार तरीके से रखने के लिए जाना जाता है।रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं। 2 अगस्त 2022 को वह न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं। कंबोज हिंदी, अंग्रेजी और फ्रेंच तीन भाषाओं की जानकार हैं। उन्होंने 1989 से 1991 तक फ्रांस में भारतीय दूतावास में तीसरे सचिव के रूप में अपने कूटनीतिक कैरियर की शुरुआत की। इंडियन मिशन की वेबसाइट के अनुसार, 2002 से 2005 तक वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में काउंसलर रहीं, जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार, मध्य पूर्व संकट आदि जैसे कई राजनीतिक मुद्दों को देखा।

रूचिरा कंबोज का शानदार करियर यहीं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय में महासचिव कार्यालय की उप प्रमुख के रूप में भी काम किया है। 2011 से 2014 तक, वह भारत की चीफ ऑफ प्रोटोकॉल रहीं, जो इस पद को संभालने वाली सरकार में अब तक की पहली और इकलौती महिला हैं। पेरिस में यूनेस्को में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान, उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। कंबोज भारतीय विदेश मंत्रालय में यूरोप वेस्ट डिवीजन में अंडर सेक्रेटरी, मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं।रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया है और उन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और भारत की बात को दमदार तरीके से रखने के लिए जाना जाता है।

मई 2014 में, विदेश मंत्रालय ने उन्हें एक खास कार्य के लिए दिल्ली बुलाया, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का संचालन किया जा सके। फरवरी 2019 में वह भारतीय राजदूत के रूप में भूटान गईं और अपने कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण पहल कीं। वह जुलाई 2017 से 2019 की शुरुआत तक दक्षिण अफ्रीका में भारत की उच्चायुक्त भी रहीं, साथ ही लेसोथो साम्राज्य में भी मान्यता प्राप्त थीं। उनकी निजी जिंदगी के बारे में बताएं तो, उनकी शादी दिवाकर कंबोज से हुई है और उनकी एक बेटी है। बता दें कि भारत को असाधारण वर्षों और अविस्मरणीय अनुभवों के लिए धन्यवाद।ट पिछले दो सालों में, रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध के दौरान, कंबोज ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में चर्चाओं में भारत का नेतृत्व किया। रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं।

2 अगस्त 2022 को वह न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं। उनके दिवंगत पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत की प्रोफेसर रही हैं।यहि नहीं पेरिस में यूनेस्को में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान, उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। कंबोज भारतीय विदेश मंत्रालय में यूरोप वेस्ट डिवीजन में अंडर सेक्रेटरी, मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं। रुचिरा कंबोज ने हाल ही में अपने चार दशक के शानदार करियर के बाद रिटायरमेंट ली है। उनके योगदान और उनकी सेवाओं को भारतीय विदेश सेवा में बहुत सराहा गया है।

आखिर 2024 में भी कैसे बनी एनडीए की सरकार?

आज हम आपको बताएंगे कि 2024 में भी एनडीए की सरकार कैसे बनी! लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद एग्जिट पोल के नतीजों में एनडीए एक बार फिर से सत्ता में वापसी करती दिख रही है। लगभग सभी एग्जिट पोल में बीजेपी नीत एनडीए को 350 से 400 सीट मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है। यदि 4 जून के नतीजे एग्जिट पोल के नतीजों की तर्ज पर ही होते हैं तो एनडीए के साथ ही पीएम मोदी भी सत्ता में हैट्रिक लगाने में कामयाब होंगे। अब सवाल है कि आखिर एनडीए की इस कामयाबी के पीछे की वजह क्या है। राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मोदी सरकार की नीतियों का जिक्र करते हैं। दूसरी तरफ एनडीए की कामयाबी को लेकर चुनावी पंडित या एग्जिट पोल करने वाले विश्लेषक क्या सोचते हैं। इस बारे में जानने की कोशिश करते हैं। लोकसभा चुनाव को लेकर एग्जिट पोल में एनडीए की सत्ता में वापसी को लेकर CVOTER के संस्थापक, यशवंत देशमुख कहते हैं, NDA मुख्य रूप से इसलिए जीत रहा है क्योंकि पीएम मोदी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा वे जहां भी जीत रहे हैं, वहां अलग-अल राज्यों में वोट शेयर का बहुत बड़ा अंतर है। देशमुख ने कहा कि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र अच्छा मुकाबला देखने को मिल रहा है।तेलंगाना विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल आए, तो उस समय सीएम पद के लिए प्रस्तावित नेता ने टीवी चैनलों पर आकर इंटरव्यू दिए कि पार्टी इन एग्जिट पोल को देखने के लिए उत्साहित है। उस समय सभी एग्जिट पोल ने कहा था कि कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाएगी। इन दोनों राज्यों में प्रत्येक सीट पर मुकाबला है। इन राज्यों से परे, लगभग सभी राज्य एकतरफा बीजेपी और एनडीए के पक्ष में दिख रहे हैं। एग्जिट पोल को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से ‘मोदी फैंटेसी पोल को लेकर भी देशमुख ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राजनेता जो चाहें कहने के लिए स्वतंत्र हैं। वे कह सकते हैं कि वे पीएम मोदी के फैंटेसी पोल हैं, लेकिन जब हमारे एग्जिट पोल दिखा रहे थे कि कांग्रेस कर्नाटक या तेलंगाना या पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब, केरल और तमिलनाडु में अन्य INDIA गठबंधन सहयोगियों में जीत रही है, जब भी हम कह रहे थे कि वे आगे चल रहे हैं और वे जीत रहे हैं, तो क्या हम राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी या स्टालिन के फैंटेसी पोल थे?

वहीं, एग्जिट पोल कर ने वाली एक अन्य एजेंसी जन की बात के संस्थापक प्रदीप भंडारी ने कहा कि हम लोगों ने जमीन पर लोगों से बातचीत की है। डेटा सर्वे और बातचीत के आधार पर यह सामने आ रहा है कि देश की जनता नरेंद्र मोदी को तीसरी बार जनादेश देना चाहती है। उन्होंने कहा कि हमारे जमीनी विश्लेषण के आधार पर देश की जनता नरेंद्र मोदी को बड़ा जनादेश दे रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इस बयान पर कि “यह एग्जिट पोल नहीं, मोदी मीडिया पोल है। यह उनका काल्पनिक पोल है। इस पर भंडारी ने कहा कि शायद राहुल गांधी राजनीतिक मजबूरियों के कारण सेलेक्टिव मेमरी लॉस से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि जब तेलंगाना विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल आए, तो उस समय सीएम पद के लिए प्रस्तावित नेता ने टीवी चैनलों पर आकर इंटरव्यू दिए कि पार्टी इन एग्जिट पोल को देखने के लिए उत्साहित है। उस समय सभी एग्जिट पोल ने कहा था कि कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाएगी। दुख की बात है कि जब एग्जिट पोल आपके पक्ष में नहीं होते हैं – तो यह उन हजारों पेशेवरों का अपमान है जो इस भीषण गर्मी में जमीन पर कड़ी मेहनत करते हैं।

सी वोटर के एग्जिट पोल के मुताबिक, देश में एनडीए तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने जा रही है। एनडीए को 353-383 सीटें मिल सकती है। एग्जिट पोल के अनुसार एनडीए 2019 के लोकसभा चुनाव से बड़ी जीत दर्ज कर सकती है। बता दें कि NDA मुख्य रूप से इसलिए जीत रहा है क्योंकि पीएम मोदी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा वे जहां भी जीत रहे हैं, वहां अलग-अल राज्यों में वोट शेयर का बहुत बड़ा अंतर है। देशमुख ने कहा कि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र अच्छा मुकाबला देखने को मिल रहा है। इन दोनों राज्यों में प्रत्येक सीट पर मुकाबला है। इन राज्यों से परे, लगभग सभी राज्य एकतरफा बीजेपी और एनडीए के पक्ष में दिख रहे हैं। वहीं, इंडिया गठबंधन को 152-182 और अन्य को 0-4 सीट मिलने का अनुमान है। वोट शेयर की बात करें तो , एनडीए का 45 प्रतिशत, इंडिया गठबंधन का 40 प्रतिशत और अन्य का 15 प्रतिशत वोट शेयर रह सकता है।

क्या लोकसभा चुनाव में काम आया मोदी जी का फैक्टर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में मोदी जी का फैक्टर काम आया या नहीं! लोकसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं। एग्जिट पोल के बाद अब देश को इंतजार है 4 जून का। इस दिन सात चरणों में चली कवायद का परिणाम देश के सामने होगा। एग्जिट पोल में बीजेपी की हैट्रिक की भविष्यवाणी की गई है। ऐसे में सवाल है कि आखिर क्या वजह है कि बीजेपी नीत एनडीए केंद्र में हैट्रिक लगा सकता है। इस बारे में देश के जाने माने चुनाव विश्लेषक और सर्वे एजेंसी एक्सिस माय इंडिया के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. प्रदीप गुप्ता ने बातचीत की। इस दौरान प्रदीप ने एग्जिट पोल, लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर का असर, राहुल गांधी के ‘खटाखट’ वाले बयान सहित कई मुद्दे पर अपनी खुलकर राय रखी। भाजपा के लिए ‘मोदी फैक्टर’ सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर काम आया है और हमने पाया ‘स्ट्रांग प्रो इनकंबेंसी’ मोदी सरकार के फेवर में है। राहुल गांधी या कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन के लिए चुनाव लड़ा है। क्षेत्रीय पार्टियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में चुनाव लड़ा है, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड में चुनाव वहां की क्षेत्रीय पार्टियों ने लड़ा है। राहुल गांधी ब्रांड के तौर पर तो नजर नहीं आते, कांग्रेस की जहां सरकार है कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश में वहां पर कांग्रेस के मतदाता राहुल गांधी के नाम पर वोट नहीं देते हैं,तमिलनाडु और केरल में इसके बाद भी भाजपा 2-4 सीट ही ला रही है। लेकिन, शुरुआत किसी पार्टी के लिए इसी तरह की होती है। बल्कि वहां की कांग्रेस सरकार सुविधाओं और व्यवस्थाओं के आधार पर वोट मांगती है और स्थानीय लोग इसी पर वोट देते हैं।

चुनाव के दौरान ‘खटाखट-खटाखट’ जैसे कैंपेन और मुहावरे तब काम आते हैं, जब कंटेंट हो और प्रोडक्ट होना चाहिए, तभी उसकी मार्केटिंग की जा सकती है। पैकेजिंग और मार्केटिंग एक अभिन्न हिस्सा है, लेकिन आपके प्रोडेक्ट के बिना मार्केटिंग अमूमन काम नहीं आती है। अंगूर खट्टे वाली बात है, वो उनका अधिकार है, वो किसी भी रूप में सर्वे को ले सकते हैं, उनको खुद को पता है कि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना में इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में उनको भारी जीत मिली थी तब उनको बहुत अच्छा लग रहा था। ‘आज तक’ के सेट पर अंजना से कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे थे कि प्रदीप गुप्ता आज तो बहुत सुहावने लग रहे हैं। वह रिकॉर्ड निकालकर देख लें, उनको जवाब मिल जाएगा।

एक समय के बाद जनता परिवर्तन चाहती है, दक्षिण की जनता देख रही है पिछले 10 साल में देश के अन्य राज्यों में केंद्र सरकार की योजनाओं का लोगों को लाभ मिला है। भाजपा ने दक्षिण में काफी मेहनत की है। जहां पर वह कमजोर थी, उन्होंने वहां पर अपनी पूरी ताकत और रिसोर्स लगाए। तमिलनाडु और केरल में इसके बाद भी भाजपा 2-4 सीट ही ला रही है। लेकिन, शुरुआत किसी पार्टी के लिए इसी तरह की होती है।

अरविंद केजरीवाल की बात है, हमने 2014 और 2019 के चुनाव में देखा है कि विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी अच्छा करती है, इस बार एमसीडी में अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन, मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अलग प्रकार से वोट करते हैं, अलग पार्टियों को चुनते हैं और केंद्र में मोदी सरकार है। सभी यह जानते हैं कि जो आम आदमी पार्टी को वोट देंगे तो उससे उनकी सरकार नहीं बनेगी। आज की तारीख में जनता ‘क्लियर कट मेंडेट’ देने में विश्वास रखती है, फिर चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव।क्षेत्रीय पार्टियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में चुनाव ल9ड़ा है, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड में चुनाव वहां की क्षेत्रीय पार्टियों ने लड़ा है। राहुल गांधी ब्रांड के तौर पर तो नजर नहीं आते, कांग्रेस की जहां सरकार है कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश में वहां पर कांग्रेस के मतदाता राहुल गांधी के नाम पर वोट नहीं देते हैं, बल्कि वहां की कांग्रेस सरकार सुविधाओं और व्यवस्थाओं के आधार पर वोट मांगती है और स्थानीय लोग इसी पर वोट देते हैं। हर व्यक्ति मजबूत सरकार चाहता है, किसी भी पार्टी का गठबंधन न होना यह दर्शाता है कि आपके आपसी मतभेद हैं तो फिर आप किस आधार पर वोट मांग रहे हैं। पश्चिम बंगाल में पिछली बार भाजपा की 18 सीटें आई थी। वहीं, टीएमसी 22 सीटों पर जीती थी। जनता इसी आधार पर वोट डाल रही है कि हम जिसे चुने, उसी की सरकार बननी चाहिए।

आखिर कब तक जारी रहेगा लू का सितम?

आज हम आपको बताएंगे कि लू का सितम आखिर कब तक जारी रहेगा! भीषण गर्मी से लू का असर सोमवार को पूरे उत्तर भारत में देखने को मिलेगा। मौसम विभाग के अनुसार आज पंजाब, हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली, जम्मू संभाग, हिमाचल प्रदेश, UP, राजस्थान, मध्य प्रदेश, विदर्भ, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के अलग-अलग इलाकों में लू चलने की संभावना है। दिल्ली में आज बादल छाए रहने और गरज के साथ हल्की बारिश होने की संभावना है। इसी के साथ 25 से 35 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का भी अनुमान है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देश में चल रही गर्मी की स्थिति और मॉनसून की शुरुआत की तैयारियों की समीक्षा के लिए एक बैठक की अध्यक्षता की। आधिकारिक बयान के मुताबिक, लू की स्थिति पर मोदी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि आग की घटनाओं को रोकने और उससे निपटने के लिए नियमित आधार पर उचित अभ्यास किए जाने चाहिए। PM ने रेमल चक्रवात से पैदा हुए हालात और राहत कामों की समीक्षा बैठक भी ली। बैठक में उन्हें को बताया गया कि चक्रवात से किस राज्य में कितना असर पड़ा है। त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, असम और मेघालय में बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान और लोगों पर पड़े असर पर भी पीएम ने रिपोर्ट ली। उन्होंने कहा कि भारत सरकार चक्रवात प्रभावित राज्यों को पूरा सहयोग देना जारी रखेगी। PM दफ्तर के मुताबिक, मोदी ने गृह मंत्रालय से कहा है कि वे स्थिति की लगातार निगरानी रखे और सभी जरूरी सहायता उपलब्ध कराएं। नियमित तौर पर स्थिति की समीक्षा करने को भी कहा गया है। असम में 28 मई से बाढ़, बारिश और चक्रवात से छह लोगों की मौत हुई है और राज्य के नौ जिलों में दो लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। मणिपुर में भी चक्रवात से 1 लाख 88 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। मेघालय में राष्ट्रीय राजमार्ग-6 का एक हिस्सा बह गया है। प्रधानमंत्री ने पर्यावरण दिवस मनाने की तैयारियों की बैठक भी ली। पर्यावरण दिवस बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी है। 4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आएंगे और 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा।

राजस्थान के कुछ भागों में गरज के साथ हल्की बारिश दर्ज की गई। इससे तापमान में गिरावट आने के साथ ही लोगों को भीषण गर्मी से कुछ राहत मिली। राज्य में सबसे ज्यादा बारिश राजगढ़, चूरू में 11-11 मिमी, जबकि सीकर में 8 मिमी दर्ज की गई है। रविवार को भी बीकानेर, जयपुर, भरतपुर, अजमेर, जोधपुर संभाग के कुछ भागों में दोपहर बाद बारिश हुई। इस दौरान कहीं-कहीं कहीं तेज हवाएं और हल्की-मध्यम बारिश हुई। आने वाले दिनों में ज्यादातर जगह अधिकतम तापमान 45 डिग्री से नीचे रहने और लू से राहत मिलने की संभावना है।

असम में बाढ़ की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। 10 जिलों में 6 लाख से ज्यादा लोग अब भी प्रभावित हैं। भारी बारिश से नदियों का जलस्तर बढ़ गया। लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले जाया गया। कोपिली, बराक और कुशियारा नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। बाढ़ के कारण हैलाकांडी होजाई, मोरीगांव, करीमगंज, नागांव, कछार, डिब्रूगढ़, गोलाघाट, कार्बी आंगलोंग पश्चिम और दीमा हसाओ जिलों में कुल 6,01,642 लोग प्रभावित हुए हैं। 28 मई से अब तक बाढ़ और तूफान में मरने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। नागांव में सबसे ज्यादा 2.79 लाख से ज्यादा लोगों पर असर पड़ा। 40,000 से ज्यादा लोगों ने राहत शिविरों में शरण ली है। कई हिस्सों में सड़क और रेल संपर्क बाधित हो गया है।

2024 के शुरुआती पांच महीनों में मौसम की प्रतिकूल स्थिति रहने के मद्देनजर हर कोई सवाल कर रहा था कि यह किस ओर जा रहा है। जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल गर्मी के मौसम में तापमान चिंताजनक है, हालांकि हैरानीभरा नहीं है। IIT गांधीनगर में सिविल इंजीनियरिंग और पृथ्वी विज्ञान विभाग के विक्रम साराभाई चेयर के प्रफेसर विमल मिश्रा ने कहा, ‘यह पिछले 120 वर्षों में उत्तर भारत के लिए सबसे भीषण गर्मी हो सकती है। इतने बड़े क्षेत्र में जो घनी आबादी वाला भी है, तापमान कभी इतना अधिक, 45-47 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं रहा है। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है।’ IIT बॉम्बे में पृथ्वी प्रणाली के वैज्ञानिक रघु मुर्तुगुडे कहते हैं, ‘पश्चिम एशिया बहुत तेजी से गर्म हो रहा है क्योंकि रेगिस्तान ग्लोबल वॉर्मिंग के दौरान ऊष्मा को अवशोषित कर लेता है। इससे अरब सागर के ऊपर की हवाएं गर्मियों में और मॉनसून के दौरान भी उत्तर की ओर मुड़ जाती हैं। दिल्ली में कंक्रीट के ढांचों ने स्थिति को और भयानक बनाया है। कंक्रीट और डामर से बनी जमीन दिन में ज्यादा गर्मी सोख लेती है। शाम को तापमान गिरने पर इसे छोड़ती है। यह गर्मी स्पेस में नहीं जाती, बल्कि इमारतों के बीच ही रहती है।’

क्या 2004 जैसे हालात 2024 में भी होंगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2024 में 2004 जैसे हालात होंगे या नहीं! एक तारीख को आए एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सभी ने प्री-पोल सर्वे में कहा था कि भारतीय जनता पार्टी आराम से चुनाव जीत रही है। मगर किसी ने उनकी सीटें इतनी बढ़कर आने की कल्पना शायद नहीं की थी। खास तौर से चुनाव के दौरान ढेर सारी ऐसी बातें उठीं कि कई जगह कांटे का मुकाबला हो गया है! यह कहा गया कि हो सकता है बीजेपी को आसानी से 272 भी ना मिले! उस लिहाज से ये चौंकाने वाले आंकड़े हैं। सवाल उठता है कि क्या 4 जून को जब असली नतीजे आएंगे, तो चीजें बदल जाएंगी? मेरा मानना है कि नहीं। ज्यादातर एग्जिट पोल में राष्ट्रीय स्तर पर जो संख्या दी गई है, लगभग एक जैसी है। सभी ने कहा है कि BJP आराम से 320 या उससे ऊपर जा सकती है और NDA 370-375 के ऊपर। वहीं कांग्रेस अपनी सीटों में मामूली सा ही इजाफा करेगी। चूंकि सारे पोल्स में एक समानता है तो नतीजे इसके उलट आने बहुत ही मुश्किल हैं। हद से हद 10-15 सीटें इधर-उधर हो सकती हैं, पर अब यह मान लिया जाए कि BJP पूर्ण बहुमत से, और 2019 के मुकाबले में ज्यादा सीटें और वोट लेकर सत्ता में आ रही है।

दूसरी बड़ी बात हमने एग्जिट पोल में यह देखी कि BJP अपने कोर स्टेट में 2014-2019 जैसा ही प्रदर्शन कर रही है। ये राज्य हैं- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कनार्टक, गुजरात और मध्य प्रदेश। उसे थोड़ा-बहुत जो नुकसान हो सकता है, वह हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड और बिहार में हो सकता है। इसी कड़ी में आप असम और नॉर्थ ईस्ट भी जोड़ सकते हैं। मगर ये नुकसान बहुत ही छोटे होंगे। BJP बंगाल की खाड़ी के किनारे लगभग सभी राज्यों में बड़ा फायदा पाने जा रही है। मेरे ख्याल से इतने लाभ की कल्पना शायद BJP ने भी नहीं की होगी। बंगाल में माना जा रहा था कि शायद दो-चार सीटें बढ़ेंगी, वहां पर वह बड़ी जीत हासिल कर सकती है। ओडिशा-तेलंगाना में भी यही हो रहा है। आंध्र में TDP के साथ गठबंधन में काफी सीटें जीत रही है। अगर एग्जिट पोल सही होता है तो यह पहली बार होगा जब देश के हर बड़े राज्य में BJP का कम से कम एक सांसद होगा।

एग्जिट पोल बताते हैं कि कांग्रेस ने केरल और पंजाब में अपना गढ़ बचाकर रखा है। थोड़ा-बहुत उसे लाभ है तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान में। पर मोटी बात यह है कि कांग्रेस के प्रदर्शन में खास सुधार नहीं हुआ है। सबसे बड़ा झटका लगता दिख रहा है आम आदमी पार्टी को, जिसके पास शायद कोई भी सीट ना हो, या एक-दो सीटें पंजाब से आएं। भारत राष्ट्र समिति को भी तेलंगाना में धक्का लग रहा है। बीजू जनता दल को ओडिशा में तो तृणमूल कांग्रेस को वेस्ट बंगाल में झटका लग रहा है।

यह स्थिति इस वजह से भी हुई कि शायद विपक्ष की जो रणनीति चुनाव के दौरान बन रही थी, वह सफल नहीं हुई। विपक्ष ने सितंबर 2023 से लेकर फरवरी 2024 तक अपना समय गठबंधन की इन बातों में गंवाया कि कौन बाहर जा रहा है, कौन कितनी सीटें लड़ेगा? अंतत: उसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। 1 जून को जो एग्जिट पोल में दिखा है अगर वह 4 जून को सच होता है तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा बदलाव होगा। पहला बदलाव 2014 से शुरू हुआ। जिसमें BJP जो पहले सिर्फ उत्तर-पश्चिम की पार्टी थी, वह 2019 में पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंच गई, और 2024 में उसने अपना दायरा बढ़ा लिया। वह बंगाल की खाड़ी से सटे राज्यों और साउथ में भी चली गई। दूसरी बात, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली BJP सरकार लगातार तीसरे टर्म में जब वापस आ रही है तो हर बार अपना वोट और सीट शेयर बढ़ाती जा रही है।

यह बहुत ही अनोखी चीज है। ऐसा पहले भारत में कभी नहीं हुआ। नेहरू जी भी तीन टर्म जीतकर आए थे पर उनकी पार्टी का फैलाव बढ़ नहीं रहा था। यही चीज इंदिरा जी के साथ भी हुई। तीसरी बात, अगर ये नतीजे सही हुए तो आने वाले समय में विपक्ष के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि विधानसभा चुनाव के स्तर पर मुकाबला टक्कर का नहीं होगा और BJP आसानी से जीत जाएगी। पर नैशनल लेवल पर BJP को चुनौती देने का विपक्ष का जो सपना है, अब वह पांच साल के लिए मुल्तवी हो चुका है।

आखिर मोदी और मुसलमान का कैसा है रिश्ता?

आज हम आपको बताएंगे कि मोदी और मुसलमान का रिश्ता आखिर कैसा है! उनकी गहरी राजनीतिक सूझबूझ को देखते हुए यह मानना सही होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंटरव्यू में अपने इस दावे के खिलाफ होने वाली प्रतिक्रिया का अनुमान लगाया होगा कि उन्होंने ‘हिंदू-मुस्लिम’ नहीं किया। पहली नजर में, यह एक साहसी दावा था, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान में ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ राजनीतिक तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण पर हमले हावी रहे हैं, जिनमें से कुछ सबसे आक्रामक दावे उन्होंने खुद किए हैं।यह खास तौर पर दुस्साहसिक था, क्योंकि यह राजस्थान के बांसवाड़ा में 21 अप्रैल को दिए गए उनके विवादास्पद भाषण के महज कुछ हफ्ते बाद आया था, जिसमें उन्होंने कांग्रेस पर देश के संसाधनों को ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ और ‘घुसपैठियों’ को सौंपने का आरोप लगाया था। इसे व्यापक रूप से मुसलमानों के संदर्भ में समझा गया, जिन पर बीजेपी की तरफ से लगातार यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे जनसांख्यिकीय संतुलन को अपने पक्ष में करने के लिए कथित षड्यंत्र के तहत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं। उन्होंने यही कहा था, ‘पहले जब उनकी सरकार थी, उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब, ये संपत्ति इकट्ठी करके किसको बाटेंगे? जिनके ज्यादा बच्चे हैं उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे। क्या आपके मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा? आपको मंजूर है ये?’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि वे माताओं और बेटियों के सोने का जायजा लेंगे, और फिर वे उस धन को उन लोगों में बांट देंगे, जिनके बारे में मनमोहन सिंह सरकार ने कहा था ‘धन पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।’ भाइयो और बहनो, यह शहरी नक्सली सोच मेरी माताओं और बहनों के मंगलसूत्र को भी नहीं छोड़ेगी।’

भले ही उन्होंने सीधे तौर पर मुसलमानों का जिक्र नहीं किया, लेकिन जब इसे ‘जिनके ज्यादा बच्चे हैं उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे’ के साथ पढ़ा जाए तो यह मुसलमानों की ओर एक छिपा हुआ इशारा था। एक प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवी ने, जो खुलकर सामने नहीं आना चाहते थे, कहा: ‘भले ही बांसवाड़ा में उनके भाषण का कुछ हिस्सा अनुवाद में खो गया हो, लेकिन उससे सीधे-सीधे इनकार करना भी ठीक नहीं।’ हालांकि, अपने एक टीवी इंटरव्यू में मोदी ने जोर देकर कहा, ‘मैंने हिंदू या मुसलमान नहीं कहा। मैंने कहा है कि आपको उतने ही बच्चे पैदा करने चाहिए, जितने का आप पालन-पोषण कर सकते हैं। ऐसी स्थिति न बनाएं कि सरकार को मदद करनी पड़े।’ जब उनसे पूछा गया कि क्या मुसलमान उन्हें वोट देंगे, तो उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि मेरे देश के लोग मुझे वोट देंगे। मैं जिस दिन हिंदू-मुसलमान करूंगा ना, उस दिन मैं सार्वजनिक जीवन में रहने योग्य नहीं रहूंगा। और मैं हिंदू-मुसलमान नहीं करूंगा। ये मेरा संकल्प है।’

फिर भी, जैसा कि कई लोगों ने खुशी-खुशी बताया, अपने इनकार के 24 घंटे के भीतर ही वे फिर से ‘हिंदू-मुस्लिम’ पर आ गए और कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए केंद्रीय बजट का 15% विशेष रूप से मुसलमानों पर खर्च करने की योजना बनाई थी, लेकिन उनकी पार्टी के विरोध के बाद इसे छोड़ दिया। खास बात ये है कि उनकी टिप्पणियों ने मुसलमानों की तुलना में उदार हिंदुओं में अधिक उत्साह पैदा किया है, जिन्होंने ऐसी बातों को सहजता से लेना सीख लिया है। अधिकांश ने व्यंग्यात्मक मुस्कान और जानबूझकर कंधे उचकाकर प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस बीच, इस लेखक के लिए, इंटरव्यू का सबसे दिलचस्प और रोचक हिस्सा यह था कि मोदी ने पड़ोसियों, दोस्तों और सहकर्मियों के रूप में मुसलमानों के साथ अपनी निकटता को साबित करने के लिए किस हद तक प्रयास किया। उन्होंने कहा कि वे उन मुसलमानों के बीच पले-बढ़े हैं जो हिंदुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रहते थे और उन्होंने अपने शुरुआती वर्ष मुसलमानों के साथ तकरीबन रोज मिलते-जुलते थे, बातें किया करते थे। उन्होंने कहा, ‘हमने सभी त्योहार एक साथ मनाए। ईद के दिन हमारे यहां खाना नहीं बनता था, इतना खाना आ जाता है हमारे मुसलमान पड़ोसियों से।’

उन्होंने याद किया कि मुहर्रम के दिन उन्हें और अन्य बच्चों को ताजिया जुलूसों में शामिल होने में बहुत मजा आता था। उन्होंने एक उत्साही मुस्लिम महिला पत्रकार रुबिका लियाकत से बातचीत में कहा, ‘मैं ऐसे माहौल में पला बढ़ा हूं।’ मोदी ने दावा किया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मुसलमान नियमित रूप से उनकी सरकार की तरफ से उनके जीवन में सुधार के लिए किए जा रहे कार्यों के लिए उन्हें धन्यवाद देते थे।

गुजरात में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द और आलोचकों के ‘दुष्प्रचार’ के बावजूद मुस्लिम समुदाय के उनके प्रति स्नेह के उदाहरण के रूप में मोदी ने अहमदाबाद के प्रसिद्ध मानेक चौक का उदाहरण दिया, जो सुबह सब्जी बाजार, दोपहर में सर्राफा बाजार और रात में व्यस्त स्ट्रीट फूड बाजार में तब्दील हो जाता है।

उन्होंने कहा कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्हें ‘बदनाम’ करने की कोशिशों के बाद, उन्होंने मानेक चौक में मुस्लिम मूड का सर्वे करने का आदेश दिया। उन्होंने इस क्षेत्र को इसके अनोखे मिश्रित चरित्र के कारण चुना। उन्होंने बताया, ‘वहां सारे व्यापारी मुसलमान हैं और सारे खरीदार हिंदू हैं। दिवाली में वो खचाखच भरा रहता है।’ उन्होंने कहा कि सर्वे में पता चला कि मुसलमानों में मोदी के प्रति गहरी आस्था है। जब शोधकर्ताओं ने उन्हें मोदी के खिलाफ कुछ कहने के लिए उकसाया तो उन्हें चुप रहने को कहा गया। पीएम ने सर्वे के नतीजों के बारे में बताया, ‘उन्होंने कहा मोदी के खिलाफ कुछ मत कहना, वरना बीवी रात को खाना नहीं देगी। वो इतने खुश हैं कि मोदी के कारण हमारे बच्चे स्कूल जा रहे हैं, उनका जीवन बन रहा है।’

क्या लोकसभा चुनाव में अभिनेता अभिनेत्री कर पाए कमाल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में अभिनेता और अभिनेत्री कमाल कर पाए या नहीं! उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिल्मी सितारों की धमक से लोकतंत्र को नई ऊंचाई मिलने लगी है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, हर पार्टी में सिने अभिनेता और अभिनेत्री अपने अपने भाग्य आजमाते रहे हैं और कुछ तो अभी आजमा भी रहे हैं। राजनीति में इनके पदार्पण ने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। अभिनेता से नेता बने कलाकारों में हिंदी और भोजपुरी दोनों क्षेत्र के कलाकार हैं। भोजपुरी के दिग्गज कलाकार रवि किशन शुक्ला हों या आजमगढ़ से सांसद दिनेश लाल निरहुआ, या फिर हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां हेमा मालनी और काजल निषाद और अभिनेता से नेता बने कांग्रेस के दिग्गज अब नेता राजबब्बर, सबने खूब भीड़ जुटाई है। इस लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने यूपी से दो दिग्गज भोजपुरी स्टार रवि किशन को गोरखपुर से और आजमगढ़ से दिनेश लाल निरहुआ को उम्मीदवार बनाया है। बॉलीवुड में बड़ा नाम हेमा मालिनी का मथुरा लोकसभा सीट से लगातार कई चुनावों से उम्मीदावार होना भी इसका जीता जागता उदाहरण है। इतना ही नहीं, रामानंद सागर के रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा करने वाले अरुण गोविल भी चुनावी समर में उतर चुके हैं और मेरठ लोकसभा क्षेत्र से चुनावी योद्धा बनकर न सिर्फ राजनीति में पदार्पण कर चुके हैं। बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और स्वस्थ राजनीति के गवाह बनने की ओर कदम बढ़ा चुके हैं।भोजपुरी अभिनेता रवि किशन गोरखपुर से पहले ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर चुके हैं। वर्ष 2014 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले रवि किशन शुक्ला ने वर्ष 2014 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद जौनपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि उनकी राजनीतिक इच्छा और बलवती हुई और वर्ष 2017 में भाजपा का दामन थामा फिर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में संसद तक का सफर तय किया।

भोजपुरी फिल्मी दुनिया के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन शुक्ला पर भाजपा ने एक बार फिर दांव लगाया है। इधर, इंडिया गठबंधन ने शुक्ला के खिलाफ टीवी कलाकार काजल निषाद को चुनाव मैदान में उतारा है। भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव ने 2019 में भाजपा के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। भाजपा के टिकट पर उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा, तब वह हार गए थे। 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव लड़ा और लोकसभा सीट छोड़ दी, उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर उपचुनाव हुआ और निरहुआ ने अखिलेश के भाई और सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव को हरा दिया। 2024 में उनका सामना एक बार फिर सपा मुखिया अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव से ही है।

वरिष्ठ अभिनेत्री हेमा मालिनी उत्तर प्रदेश की मथुरा लोकसभा चुनाव से तीसरी बार मैदान में हैं। वह लगातार दो बार यहां से सांसद रह चुकी हैं। हेमा मालिनी भले ही फिल्मी दुनिया में अब न दिख रही हों, लेकिन वह राजनीति में काफी सक्रिय हैं। अभिनेत्री के रूप में हेमा मालिनी को दर्शकों ने पसंद किया है। रामानंद सागर के दूरदर्शन पर प्रसारित हुए शो ‘रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा कर अरुण गोविल ने घर-घर में अपनी पहचान बनाई। सालों तक इसी किरदार के साथ जीने वाले अरुण गोविल ने अपना राजनीतिक करियर भाजपा से शुरू किया है।

भाजपा ने उन्हें मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल का टिकट काट कर अपना उम्मीदवार बनाया है। शुरुआती दौर में उन्होंने कई फिल्मों में साइड हीरो का किरदार निभाया और फिर राजश्री प्रोडक्शन ने अरुण गोविल को फिल्म ‘सावन को आने दो’ में ब्रेक दिया। धारावाहिक ‘रामायण’ में राम की भूमिका में लोगों ने अभिनेता को काफी पसंद किया। आलम ये था कि लोग उन्हें असल में भगवान राम मानने लगे। भाजपा की वरिष्ठ नेता और मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ धारावाहिक में ‘तुलसी’ का किरदार निभाकर हर घर में लोकप्रिय हो गईं। वे उन चंद कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी स्क्रीन लोकप्रियता को राजनैतिक सफलता में बदल दिया। हालांकि अब वो टीवी की दुनिया से अलग एक बड़ी राजनेता के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने 2019 के चुनाव में अमेठी से कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को हरा कर सबको चौंका दिया था। वह अपने क्षेत्र अमेठी में लगातर सक्रिय हैं। भाजपा ने उन्हें एक बार फिर अमेठी से ही अपना प्रत्याशी बनाया है।

पिछले कुछ सालों से देखने को मिला है कि फिल्मी कलाकार अपनी राजनीतिक राय खुलेआम देने से हिचकते नहीं है। इसके पहले उनकी लोकप्रियता के आधार पर टिकट दिया जाता था। चाहे विनोद खन्ना हों, धर्मेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा हों, लेकिन उसके बाद देखने को मिला कि जिस प्रकार से पॉलिटिकल फिल्में बनने का चलन शुरू हुआ, जो लोग उन फिल्मों में रहते हैं वो लोग राजनीति से प्रेरित बयान ऑफ द स्क्रीन भी देते हैं। चाहे वो विवेक अग्निहोत्री हों, कंगना रनौत हों या फिर अनुपम खेर। इनकी फिल्मी अपील और राजनीतिक झुकाव उनको एक आईडियल उम्मीदवार बनाता है।

क्या वर्तमान के युवा जीवन से हो गए हैं परेशान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान के युवा जीवन से परेशान हो गए हैं! उत्‍तर प्रदेश के मथुरा में बिहार की नौंवी पास तीन किशोरी लड़कियों ने ट्रेन के आगे आकर अपना जीवन समाप्‍त कर लिया। वह घर में लिखकर निकली थीं कि बाबा ने बुलाया है। भक्ति के लिए हिमालय जा रहे हैं। किसी ने तलाश करने या वापस बुलाने की कोशिश की तो वह खुदकुशी कर लेंगी। अब सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए उनके परि‍जनों ने शव के चीथड़ों से अपनी बच्चियोंं की शिनाख्‍त की। इसी तरह कन्‍नौज में 21 और 23 साल के दो युवकों ने जहर खाकर जान दे दी। बदहवास परिवारवाले अपने बच्‍चों को लेकर अस्‍पताल पहुंचे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। सुसाइड से पहले इनमें से एक युवक ने अपना स्‍टेटस लगाया था- मृत्यु ही सत्य है। अरे भई! कौन इनकार कर रहा है मृत्यु की सच्‍चाई से। लेकिन एक बार तो सोचिए जरा, जीवन इतना सस्ता है क्‍या? हताशा आ रही है तो जूझिए, रास्‍ता निकालिए, एक दिन सफलता जरूर जीत मिलेगी। नहीं भी मिली तो भी प्रयास जारी रखिए। जिन्‍होंने अभी तक दुनिया ही ठीक से नहीं देखी, वे किशोर, युवा अपनी जिंदगी खत्‍म कर ले रहे हैं। शायद इसलिए बड़े-बूढ़े हमेशा से कहते आए हैं कि अधकचरा ज्ञान जानलेवा होता है। अरे अगर आध्‍यात्‍म के मार्ग पर जाना है तो जाइए न, किसने मना किया है, फि‍र ये आत्‍महत्‍या क्‍यों? चाहे जो भी परिस्थिति आत्‍महत्‍या को तो कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। मथुरा के हाईवे थाना क्षेत्र में 24 मई दोपहर 1:20 बजे आगरा-दिल्ली रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ी से कटकर तीन किशोरी लड़कियों की मौत हो गई। जिस मालगाड़ी से तीनों छात्राओं ने कटकर जान दी, उसका पायलट शिव कुमार घटना का चश्मदीद गवाह है। शिव कुमार ने पुलिस को बताया कि वह मथुरा-दिल्ली रोड पर ट्रेन ले जा रहा था। तभी तीनों छात्राएं एक दूसरे का हाथ पकड़ कर सामने आ गईं। ट्रेन करीब 90 मीटर की दूरी पर ही रही होगी। शिव कुमार ने ब्रेक लगाया, लेकिन ट्रेन वहां तक नहीं रुक सकी। तीनों ट्रेन से कट गई। ट्रेन रुकी तो गार्ड ने उतर कर देखा तो तीनों की मौत हो चुकी थी।

एक लड़की के कपड़ों पर मुजफ्फरपुर के टेलर की स्लिप मिलने पर मथुरा पुलिस ने बिहार के मुजफ्फरपुर पुलिस से संपर्क किया। मथुरा पहुंचे परिजनों ने बैग और कपड़ों से शिनाख्त कर ली। पता चला कि तीनों लड़कियां सहेलियां थींं। तीनों की पहचान माही, टाउन थाना के कंपनी बाग जोगिया मठ निवासी 14 वर्षीय गौरी और 13 वर्षीय माया के रूप में की गई। तीनों ने इसी साल नौवीं कक्षा पास की थी। तीनों 13 मई को एक साथ अपने घर से निकली थीं। माया की मां सोनी देवी ने 22 मई को गुमशुदगी दर्ज कराई थी।

परिजनों ने बताया कि घर से निकलने से पहले तीनों एक-एक पत्र छोड़कर आई थी। इसमें उन्होंने लिखा था, बाबा ने बुलाया है। भक्ति के लिए हिमालय जा रहे हैं। किसी ने तलाश करने या वापस बुलाने की कोशिश की तो वह खुदकुशी कर लेंगी। 3 महीने बाद 13 अगस्त को वह खुद वापस आ जाएंगी। जांच में पता चला कि माया और माही के पास मोबाइल था। लेकिन मथुरा में रेलवे ट्रैक के पास मोबाइल नहीं मिले, जबकि उनके बैग और अन्य सामान पास पाए गए। जांच में पता चला कि माही का मोबाइल कानपुर में बंद हुआ था। वहीं, माया का मोबाइल मुजफ्फरपुर से निकलते समय ही बंद हो गया था। मंगलवार शाम शिनाख्त और पोस्टमार्टम के बाद तीनों का अंतिम संस्कार मथुरा में ही कर दिया गया।

दूसरी घटना जालौन की है। यहां कालपी थाना क्षेत्र में 23 साल के अमन वर्मा और 21 वर्षीय बालेंद्र ने कर्बला के मैदान में सल्फास खाकर जान दे दी। अमन ने इसके बाद परिजनों को फोन करके सूचना दी। परिवारवाले भागे-भागे पहुंचे और दोनों को कालपी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, मगर दोनों की इलाज होने से पहले मौत हो गई। पुलिस ने जांच की तो पता चला कि‍ अमन और बालेंद्र में जिगरी दोस्त थे। अमन का मेडिकल स्टोर और वह शादी शुदा था, जबकि बालेंद्र की शादी नहीं हुई थी। दोनों मंगलवार को कब्रिस्तान गए जहां उन्होंने सल्फास खाकर जान दे दी।

पता चला कि दोनों मेडिकल स्टोर पर ही बैठते थे। दोनों ही ओशो के प्रवचन से काफी प्रभावित थे। अमन ने सुसाइड करने से पहले 3 स्टेटस लगाए थे। पहले स्टेटस में लिखा- तुम अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते। इस वीडियो में कुछ लोग एक लाश ले जाते दिख रहे हैं। वहीं दूसरे स्टेटस में लिखा- जीवन में ऐसा काम चुनें, जो आपका आनंद हो, व्यवसाय नहीं। तीसरे स्टेटस में एक जलती हुई लाश का वीडियो लगाया। वहीं जहर खाने से पहले ही बालेंद्र ने फोन में स्टेटस लगाया था कि मृत्यु ही सत्य है, जिसके बाद दोनों ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। इस मामले में कालपी सीओ डॉक्टर देवेंद्र पचौरी का कहना है कि मामले की जांच कर रही है कि किन परिस्थितियों में दोनों ने आत्महत्या की है।

राजस्थान के भीलवाड़ा में हमीरगढ़ तहसील में तखतपुरा गांव है। यहां मोहन लाल अहीर नाम के शख्‍स की किसी ने हत्‍या कर दी। पता चला जमीनी विवाद था। घर में चीख-पुकार, मातम का माहौल के बीच मोहन लाल की बेटी लक्ष्मी पिता के गम में थी। उसका बोर्ड एग्‍जाम चल रहा था, चौबीस घंटे बाद उसकी अंग्रेजी की परीक्षा थी। ले‍किन लक्ष्‍मी ने अपने गम को जब्‍त किया और परीक्षा देने गई। रि‍जल्‍ट आया तो लक्ष्‍मी ने 12वीं में 90.80 फीसदी नंबर हासिल किए। लक्ष्मी कहती हैं, ‘परीक्षा के वक्त भले ही पापा साथ नहीं थे, लेकिन उनका आशीर्वाद हमेशा उनके पास रहा। और ये उनका आशीर्वाद ही है, जिसकी वजह से मैं आज कामयाब हो पाई।’

तमिलनाडु में वेल्लोर इलाके के विन्नमंगलम में रहने वाले के. जयगणेश का जीवन शुरुआत से ही कठिनाइयों से भरा था। अपने परिवार का गुजारा करने के लिए उनके पिता एक फैक्ट्री में बेहद कम सैलरी पर काम करते थे। घर के ऐसे आर्थिक हालत देखकर जयगणेश जल्द से जल्द अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी करना चाहते थे। गांव के ही स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने करने के बाद उन्होंने एक पॉलिटेक्निक कॉलेज में एडमिशन ले लिया। जयगणेश को भरोसा था कि पॉलिटेक्निक करने के बाद ग्रेजुएशन पूरी होने तक उन्हें नौकरी मिल जाएगी।