Tuesday, March 10, 2026
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आखिर क्या है अमेरिका का H-1B वीजा?

आज हम आपको अमेरिका का H-1B वीजा के बारे में जानकारी देने वाले हैं! अमेरिका की ओर से हर साल गैर आप्रवासी वीजा जारी किया जाता है, जिसके लिए भारतीय प्रोफेशनल्स सपने देखते हैं। दरअसल, भारतीयों को अमेरिका में अच्छी सैलरी ऑफर की जाती है, जिसके बाद उन्हें H-1B वीजा जारी किया जाता है। हालांकि, कई बार यह सपना इसलिए टूट जाता है, क्योंकि भारतीय प्रोफेशनल्स को यह वीजा नहीं मिल पाता है। अक्सर इस वीजा को पाने में लॉटरी सिस्टम भी आड़े आता है। सोशल मीडिया पर बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें इस तरह के वीजा की जरूरत होती है, मगर उन्हें यह नहीं मिल पाता है। लिंक्डइन पर ऐसा ही एक वीडियो वायरल हो रहा, जिसमें एक प्रोफेशनल ने H-1B वीजा नहीं मिलने की वजह से सपने टूटने की दुहाई दी है। उसके वीडियो को अब तक 20 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। वित्त वर्ष 2022 में अमेरिका की ओर से कुल 4.41 लाख H-1B वीजा आवेदन प्रॉसेस किया गया था, जिनमें से 3.20 लाख वीजा भारतीयों को आवंटित किए गए। यह कुल मंजूर किए गए H-1B वीजा का 72.6 फीसदी था। वहीं, वित्त वर्ष 2021 में अमेरिका की ओर से कुल 4.07 लाख H-1B वीजा आवेदन स्वीकृत किए गए, जिनमें से 3.01 लाख वीजा भारतीय लोगों को आवंटित किए गए। यह कुल मंजूर वीजा का 74 फीसदी बैठता है। भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच एच-1बी वीजा की काफी मांग है। हर साल लगभग तीन-चौथाई H-1B वीजा भारतीय पेशेवरों को मिलते हैं।

H-1B वीजा की मांग ज्यादा होने की वजह से हर साल सीमित संख्या में इसे जारी किया जाता है। 2023 में प्रति वित्तीय वर्ष 65,000 वीजा की सीमा निर्धारित की गई थी। हालांकि, यदि किसी आवेदक के पास अमेरिकी संस्थान से मास्टर डिग्री या पीएचडी है तो वे भाग्यशाली हैं। ऐसे लोगों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा उपलब्ध हैं। H-1B रजिस्ट्रेशन 10 डॉलर से बढ़कर 215 डॉलर कर दिया गया है। वहीं एल-1 वीजा का शुल्क 460 डॉलर से बढ़ाकर 1,385 डॉलर कर दिया गया है। वहीं, निवेशक वीजा के रूप में पॉपुलर E-B5 वीजा का शुल्क 3,675 डॉलर से बढ़ाकर 11,160 डॉलर कर दिया गया है।

हाल ही में ये खबर भी आई कि कई भारतीय आईटी कंपनियों के बीते 8 साल में अमेरिकी वीजा प्रोग्राम में करीब 56 फीसदी गिरावट आई है। आम तौर पर भारतीय प्रोफेशनल्स विदेश जाने के बजाय देश में ही रहकर नौकरी करने को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। वहीं अमेजन जैसी अमेरिकी कंपनियों में स्थानीय लोगों को हायर करने का चलन ज्यादा बढ़ा है। H-1B वीजा के तहत किसी गैर आप्रवासी को अमेरिका में 3 साल की अवधि के लिए रहने की अनुमति देता है। इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है लेकिन यह 6 साल से अधिक नहीं हो सकता है। बता दें कि लिंक्डइन पर ऐसा ही एक वीडियो वायरल हो रहा, जिसमें एक प्रोफेशनल ने H-1B वीजा नहीं मिलने की वजह से सपने टूटने की दुहाई दी है। उसके वीडियो को अब तक 20 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है।H-1B रजिस्ट्रेशन 10 डॉलर से बढ़कर 215 डॉलर कर दिया गया है। वहीं एल-1 वीजा का शुल्क 460 डॉलर से बढ़ाकर 1,385 डॉलर कर दिया गया है। वहीं, निवेशक वीजा के रूप में पॉपुलर E-B5 वीजा का शुल्क 3,675 डॉलर से बढ़ाकर 11,160 डॉलर कर दिया गया है। वित्त वर्ष 2022 में अमेरिका की ओर से कुल 4.41 लाख H-1B वीजा आवेदन प्रॉसेस किया गया था, जिनमें से 3.20 लाख वीजा भारतीयों को आवंटित किए गए। यह कुल मंजूर किए गए H-1B वीजा का 72.6 फीसदी था। ठहरने की अवधि को ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी एक्ट में अमेरिकी प्रतिस्पर्धात्मकता के तहत बढ़ाया जा सकता है। यह नियम उन लोगों के लिए भी है, जिन्होंने स्थायी निवास के लिए आवेदन किया है और यह आवेदन लंबित है।

H-1B वीजा हासिल करने के लिए सबसे पहले एच-1बी लॉटरी में एंट्री ली जाती है, जिसकी फीस 10 डॉलर है। अमेरिका की ओर से कुल 4.41 लाख H-1B वीजा आवेदन प्रॉसेस किया गया था, जिनमें से 3.20 लाख वीजा भारतीयों को आवंटित किए गए। यह कुल मंजूर किए गए H-1B वीजा का 72.6 फीसदी था। वहीं, वित्त वर्ष 2021 में अमेरिका की ओर से कुल 4.07 लाख H-1B वीजा आवेदन स्वीकृत किए गए, जिनमें से 3.01 लाख वीजा भारतीय लोगों को आवंटित किए गए।किसी उम्मीदवार के चयनित होने की स्थिति में प्रायोजक कंपनी को फॉर्म I-129 के लिए 460 डॉलर देने होंगे, जो एक गैर-आप्रवासी कर्मचारी के लिए एक तरह से अपील की फीस है। एच-1बी वीजा प्राप्त करने की कुल लागत अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग हो सकती है।

क्या हो चुका है सीतापुर हत्याकांड का पूरा खुलासा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सीतापुर हत्याकांड का पूरा खुलासा हो चुका है या नहीं! सीतापुर जिले के रामपुर मथुरा के पल्हापुर हत्याकांड का खुलासा हुआ है। हत्याकांड के मास्टरमाइंड अजीत को लेकर चौंकाने वाला राज खुला है। सीतापुर जिले के रामपुर मथुरा थाना क्षेत्र के पल्हापुर गांव में बीते शनिवार सामूहिक हत्याकांड हुआ था। आरोपी अजीत ने अपने भाई अनुराग के पूरे परिवार के साथ मां सावित्री की भी हत्या कर दी थी। जानकारी देते हुए पुलिस ने बताया की अजीत सिंह ने पूछताछ में इस बात का कबूलनामा किया है।अजीत सिंह ने पूछताछ में बताया कि उसके पिता वीरेंद्र सिंह लगभग 1 वर्ष पूर्व निधन होने के पश्चात इसकी तथा उसके भाई अनुराग सिंह के बीच पैसे वह जमीन को लेकर कहा सुनी वाद विवाद होने लगा। अनुराग सिंह जो एक पढ़ा लिखा युवक होने के बावजूद लगातार शराब के सेवन का आदी था। इसके कारण अजीत सिंह स्वयं को समाज में अपमानित महसूस करता था। अजीत सिंह के पिता के द्वारा केसीसी लोन की कुल 24 लाख की रकम बकाया थी। इसका भुगतान करने से पूर्व ही अजीत सिंह के पिता की मृत्यु हो गई। अजीत सिंह के अनुसार लोन की रकम कौन चुकाएगा, इस बात को लेकर अजीत सिंह व अनुराग सिंह तथा अनुराग सिंह की पत्नी प्रियंका सिंह के बीच कई बार वाद विवाद हुआ। अनुराग सिंह के द्वारा गर्मी के अंत में तरबूज की फसल की बिक्री के बाद अपने हिस्से का लोन चुकाने का वादा किया गया था। दिनांक 10.5.2024 की शाम को अजीत सिंह अपने गांव पल्हापुरा आया जहां उसकी मां सावित्री सिंह व भाभी प्रियंका सिंह द्वारा उसे बताया गया कि वह अनुराग सिंह लोन चुकाने में असमर्थ है।

इस बात पर अजीत सिंह गुस्से से भर गया उसने शाम के समय घर में बनी खिचड़ी में नींद की चार-पांच गोलियां मिला दी और सभी के सोने का इंतजार करने लगा। अजीत सिंह के द्वारा बताया गया कि उसका उद्देश्य अपने भाई व भाभी की हत्या करना था। मां-व बच्चों को केवल नींद की गोली देकर सुलाना चाहता था। तब पश्चात अजीत सिंह को पता चला कि परिवार के सभी लोग बाहर से खाना खाकर आए हैं। लगभग 5:00 बजे अजीत सिंह के पड़ोस में रहने वाली तारीख के चिल्लाने पर गांव के लोग बड़ी संख्या में धीरे-धीरे एकत्र हो गए।किसी के द्वारा उस खिचड़ी को नहीं खाया गया।

अजीत सिंह के द्वारा प्रथम स्थल पर बने अपने कमरे में जाकर लेट गया रात्रि 2:00 बजे के पश्चात अजीत सिंह के द्वारा प्रथम तल पर बने प्रियंका सिंह व बच्चों के कमरे का बिजली का मेंन पावर स्विच ऑफ कर दिया। इससे गर्मी के कारण प्रियंका सिंह कमरे से बाहर आ गई, जहां अजीत सिंह ने उसकी हत्या कर दी। इसके बाद गोली की आवाज सुनकर जगने के कारण मां की हत्या की गई। फिर अनुराग सिंह के कमरे में उसकी हत्या की गई। फिर अजीत सिंह ने बड़ी लड़की को साथ ले जाकर यसमझाने की कोशिश की कि उसके पिता द्वारा मां व पत्नी की हत्या कर स्वयं आत्महत्या की है किंतु बड़ी लड़की अर्न सिंह नहीं मानी और चिल्लाने लगी अन्य दोनों बच्चे भी चिल्लाने लगे। अतः अजीत सिंह द्वारा तीनों को बारी-बारी ले जाकर छत से फेंक दिया गया।

फिर नीचे आकर उनके तब तक जिंदा होने के कारण पुनः हत्या का प्रयास किया गया। इससे पश्चात उसके द्वारा फोन करके अपनी पत्नी अन्य रिश्तेदार व गांव के अन्य व्यक्तियों को अपनी बनाई हुई कहानी बताई गई। सभी फोन कॉल प्रातः 4:00 बजे के बीच किया गया। लगभग 5:00 बजे अजीत सिंह के पड़ोस में रहने वाली तारीख के चिल्लाने पर गांव के लोग बड़ी संख्या में धीरे-धीरे एकत्र हो गए।

घटना अकेले अजीत सिंह द्वारा कारित की गई घर में किसी भी प्रकार की अन्य आमद के साथ अभी तक जांच में उपलब्ध नहीं है। सीडीआर एनालिसिस से ज्ञात हुआ की घटना के समय अजीत सिंह की पत्नी साला ससुर बहन बहनोई ताई के दोनों लड़के व अन्य प्रमुख रिश्तेदार अपने-अपने घरों पर मौजूद थे। इससे घटना में उनकी संलिप्त का सच नहीं मिला मौके पर भी ऐसा कोई अन्य मोबाइल नंबर एक्टिव नहीं पाया गया। जो संदिग्ध हो

अनुराग सिंह वर्ष 2023 में 1 महीने नशा मुक्ति केंद्र तथा वर्ष 2024 में एक दिन के लिए नशा मुक्ति केंद्र लखनऊ में रहा के सीसी का लोन भी शेष होना पाया गया जिससे अजीत सिंह के द्वारा उक्त अपराध कारित करने का कारण स्पष्ट होता है।

आखिर चुनाव में कैसे खारिज होते हैं उम्मीदवारों के नामांकन?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर चुनावों से पहले उम्मीदवारों के नामांकन कैसे खारिज हो जाते हैं! आपकी जानकारी के लिए बता दे कि वर्तमान में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं! इसी बीच लोगों के मन में कई सवाल उठने लगे हैं कि आखिर चुनाव से पहले उम्मीदवारों के नामांकन कैसे खारिज हो जाते हैं! क्योंकि हाल ही में कई ऐसे उम्मीदवार थे, जिनके नामांकन खारिज कर दिए गए हैं! तो आज हम आपको इसी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि देश में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं। चार चरणों का चुनाव हो चुका है। तीन चरण अभी बाकी हैं। इस दौरान, कई उम्मीदवारों का नामांकन-पत्र खारिज किया गया है। चुनावी दौर में लोगों के मन में सवाल उठते होंगे कि आखिर किन वजहों से उम्मीदवार के नामांकन पत्र कैंसल हो सकते हैं। चुनाव अधिकारियों ने बताया कि चुनाव लड़ने वाले किसी भी उम्मीदवार की उनकी जानकारी के बिना नामांकन पत्र कैंसल नहीं किया जा सकता है। एक अधिकारी ने बताया कि जब भी कोई उम्मीदवार लोकसभा या विधानसभा चुनाव के लिए रिटर्निंग अफसर या असिस्टेंट रिटर्निंग अफसर के सामने अपना नामांकन पत्र दाखिल करते हैं, तो उसी वक्त उसकी जांच की जाती है। अधिकारियों को अगर उसमें कहीं कोई कमी लगती है तो उम्मीदवार को वहीं पर एक चेक लिस्ट दी जाती है। उसमें उनके नामांकन पत्र में जहां-जहां जो भी कमियां रह गई होती हैं उन सभी की जानकारी दी जाती है।

मसलन, नामांकन पत्र दाखिल करते वक्त अगर उम्मीदवार ने शपथ नहीं ली, सिक्यॉरिटी मनी जमा नहीं कराई, कोई कॉलम खाली छोड़ दिया, नामांकन पत्र के हर पेज पर साइन नहीं किए, नियमों के मुताबिक, प्रस्तावक नहीं दिए, अपने आपराधिक रेकॉर्ड, संपत्ति का ब्योरा, जूलरी, हथियार और पढ़ाई-लिखाई समेत इसी तरह की दूसरी जानकारियों वाले एफिडेविट नहीं दिए, तो इन कमियों के बारे में बताया जाता है। चेकलिस्ट में उम्मीदवार को यह बताया जाता है कि जो भी कमी उन्होंने नामांकन पत्र में छोड़ी है उन सभी को लास्ट डेट से पहले कितने दिनों में पूरा करके देना है।

अगर उम्मीदवार ने अपने नामांकन-पत्र में छोड़ी गई कमियों को तय समय में पूरा कर दिया तो उनका नामांकन पत्र कैंसल नहीं होता। अगर, उम्मीदवार ने चेकलिस्ट दिए जाने के बाद भी समय पर उन कमियों को पूरा नहीं किया तो नामांकन पत्रों की जांच के दौरान उसका नामांकन पत्र रद्द कर दिया जाता है। चेकलिस्ट दिए जाने के बाद उम्मीदवार को फोन करके या किसी दूसरी तरीके से उन कमियों को पूरा करने की याद नहीं दिलाई जाती।बता दें कि जब भी कोई उम्मीदवार लोकसभा या विधानसभा चुनाव के लिए रिटर्निंग अफसर या असिस्टेंट रिटर्निंग अफसर के सामने अपना नामांकन पत्र दाखिल करते हैं, तो उसी वक्त उसकी जांच की जाती है। अधिकारियों को अगर उसमें कहीं कोई कमी लगती है तो उम्मीदवार को वहीं पर एक चेक लिस्ट दी जाती है। उसमें उनके नामांकन पत्र में जहां-जहां जो भी कमियां रह गई होती हैं उन सभी की जानकारी दी जाती है। यह उम्मीदवार की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नामांकन पत्र में छोड़ी गई कमियों को तय समय में पूरा करे।

रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट-1951 के तहत कोई भी शख्स जो भारत का नागरिक हो, उसका नाम वोटर लिस्ट में हो और वह चुनाव लड़ने के लिए तय उम्र हासिल कर चुका है, तो वह चुनाव लड़ सकता है। 

चुनावी अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय जैसे राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को एक प्रस्तावक चाहिए होता है। निर्दलीय उम्मीदवार को 10 प्रस्तावक चाहिए होते हैं। नामांकन पत्र के हर पेज पर साइन नहीं किए, नियमों के मुताबिक, प्रस्तावक नहीं दिए, अपने आपराधिक रेकॉर्ड, संपत्ति का ब्योरा, जूलरी, हथियार और पढ़ाई-लिखाई समेत इसी तरह की दूसरी जानकारियों वाले एफिडेविट नहीं दिए, तो इन कमियों के बारे में बताया जाता है।लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 25 हजार और SC-ST वर्ग से संबंध रखने वाले उम्मीदवार को 12.5 हजार रुपये की जमानत राशि जमा करानी होती है। अगर, किसी शख्स को किसी मामले में कम-से-कम दो साल की सजा मिली होती है तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता। अधिकतम दो सीटों से चुनाव लड़ा जा सकता है। तो यह है वह प्रक्रिया जिसके तहत चुनाव आयोग किसी भी उम्मीदवार के नामांकन को खारिज कर सकता है!

लोकसभा चुनाव का ऐसा उम्मीदवार जिसकी कुल संपत्ति ₹2 रुपये है!

आज हम आपको लोकसभा चुनाव का ऐसा उम्मीदवार बताने जा रहे हैं, जिसकी कुल संपत्ति मात्र ₹2 की है! जानकारी के लिए बता दे कि वर्तमान में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं! इसी बीच सभी लोकसभा उम्मीदवारों की कुल संपत्ति का अंदाजा लगाया जा रहा है! लेकिन क्या आप जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में इस बार एक ऐसा उम्मीदवार भी खड़ा हुआ है, जिसकी कुल संपत्ति मात्र ₹2 है! जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना.. दो रुपए… दो रुपए में आज क्या ही कुछ आता है? लेकिन ऐसे में इस उम्मीदवार के द्वारा अपना नामांकन भरा गया है!

आपको बता दें कि लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर 4 चरणों का मतदान समाप्त हो चुका है। वहीं अब पांचवे चरण के मतदान की तैयारी जारी है। पांचवे चरण में 8 राज्यों की 49 सीटों के लिए मतदान किया जाएगा। अलग-अलग राज्यों के उम्मीदवार अपने नामांकन के दौरान चुनावी हलफनामा निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत करते हैं। 54 वर्षीय नवीन जिंदल नामी उद्योगपति हैं। वे 14वीं और 15वीं लोकसभा के सांसद चुने गए हैं। वे अभी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के अध्यक्ष हैं। साथ ही वे ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं। सबसे अमीर उम्मीदवारों की लिस्ट में सुल्तानपुर सीट से चुनाव लड़ रहीं मेनका गांधी का भी नाम शामिल है। उनके पास कुल संपत्ति 97 करोड़ रुपये है।  इस हलफनामें में उन उम्मीदवारों की शिक्षा, क्राइम कुंडली, कुल संपत्ति इत्यादि की जानकारी होती है। ऐसे में आज हम आपकों सबसे गरीब उम्मीदवार के बारे में बताने वाले हैं जिसकी कुल संपत्ति 2 रुपये की है। 

दरअसल लोकसभा चुनाव के छठे चरण में चुनाव लड़ने वालों में जहां अन्य उम्मीदवारों के पास करोड़ों रुपये की संपत्ति है। वहीं दूसरी तरफ एक उम्मीदवार ऐसा भी है जिसके पास मात्र 2 रुपये की संपत्ति है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर द्वारा एक रिपोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक छठे चरण का चुनाव 25 मई को होने जा रहा है। इस चरण के सबसे गरीब उम्मीदवार का नाम है मास्टर रणधीर सिंह। रणधीर सिंह रोहतक से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। सबसे कम संपत्ति की घोषणा करने वालों में रणधीर सिंह का नाम पहले स्थान पर है। उन्होंने दो रुपये की संपत्ति घोषित की है। यही नहीं छठे चरण में सबसे रईस उम्मीदवार नवीन जिंदल हैं। वे बीजेपी के टिकट पर हरियाणा के कुरुक्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं। इस चरण में सबसे कम संपत्ति वाले प्रत्याशियों की लिस्ट में मास्टर रणधीर सिंह का नाम सबसे अव्वल है। वे रोहतक से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं।नवीन जिंदल की कुल संपत्ति 1241 करोड़ रुपये है। 54 वर्षीय नवीन जिंदल नामी उद्योगपति हैं। वे 14वीं और 15वीं लोकसभा के सांसद चुने गए हैं। वे अभी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के अध्यक्ष हैं। साथ ही वे ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं। सबसे अमीर उम्मीदवारों की लिस्ट में सुल्तानपुर सीट से चुनाव लड़ रहीं मेनका गांधी का भी नाम शामिल है। उनके पास कुल संपत्ति 97 करोड़ रुपये है।  

रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे स्थान पर हैं प्रतापगढ़ में SUIC के उम्मीदवार रामकुमार यादव। इसके अलावा गुरुग्राम से आईएनडी प्रत्याशी फौजी जय कुंवर त्यागी (दीक्षित) की कुल संपत्ति 113 करोड़ रुपये है। वहीं, सुलतानपुर से बीजेपी प्रत्याशी मेनका गांधी की कुल संपत्ति 97 करोड़ रुपये है। फरीदाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र प्रताप सिंह की कुल संपत्ति 90 करोड़ रुपये है। भिवानी से जेजेपी प्रत्याशी बहादुर सिंह की कुल संपत्ति 88 करोड़ रुपये है। नई दिल्ली से बीएसपी प्रत्याशी राज कुमार आनंद की कुल संपत्ति 83 करोड़ रुपये है।राम कुमार यादव ने अपनी कुल संपत्ति 1,686 रुपये घोषित की है। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक छठे चरण के चुनाव लड़ रहे 866 उम्मीदवारों से 338 उम्मीदवार यानी 39 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं। इनकी औसत संपत्ति 6.21 करोड़ रुपये हैं।विष्णुपुर से बीएसपी प्रत्याशी जयदेव धानक की कुल संपत्ति 5 हजार रुपये है। सोनीपत से आईएनडी प्रत्याशी अश्विनी की कुल संपत्ति 5319 रुपये है। मछलीशहर से आईएनडी उम्मीदवार सुभाष की कुल संपत्ति 10 हजार रुपये है। मेदिनीपुर से आईएनडी प्रत्याशी संजीब डे की कुल संपत्ति 13056 रुपये है। दक्षिणी दिल्ली से आईएनडी उम्मीदवार की कुल संपत्ति 14000 रुपये है। सबसे अमीर उम्मीदवार हैं भाजपा के कुरुक्षेत्र से उम्मीदवार नवीन जिंदल। जिनकी कुल संपत्ति 1,241 करोड़ रुपये है। उनके बाद संतरूप मिश्रा की कुल संपत्ति 482 करोड़ रुपये हैं। तीसरे स्थान पर हैं सुशील गुप्ता जिनकी कुल संपत्ति 169 करोड़ है। वहीं 411 उम्मीदवार यानी 47 फीसदी उम्मीदवार ने अपने हलफनामें में देनदारियों की घोषणा की है। यानी सीधी सी बात यह है कि रणधीर सिंह एक ऐसे उम्मीदवार है, जो लोकसभा चुनाव में अब तक के सबसे गरीब इंसान है!

आखिर क्या है राजस्थान के श्याम प्रभु श्री खाटू श्याम मंदिर का रहस्य?

आज हम आपको राजस्थान के श्याम प्रभु श्री खाटू श्याम मंदिर का रहस्य बताने जा रहे हैं! जानकारी के लिए बता दें कि हमारे देश में कई भगवानों को पूजा जाता है! उनकी आराधना की जाती है, लेकिन भारत के एक राज्य राजस्थान के जिले सीकर में एक ऐसा मंदिर है जहां पर जाने से हर भक्त की मनोकामना पूर्ण हो जाती है! यदि कोई भक्त आर्थिक तंगी से गुजर रहा है, तो वह इस मंदिर में जाकर अपने आप को धन-धान्य से परिपूर्ण कर सकता है! जी हां, हम बात कर रहे हैं कलयुग के राजा और श्री कृष्ण का रूप कहे जाने वाले श्री खाटू श्याम मंदिर की! जो राजस्थान के सीकर में है, लेकिन एक सवाल कि आखिर खाटू श्याम जी के मंदिर का रहस्य क्या है, और य़ह इतना प्रसिद्ध क्यों है? तो आज हम आपको इसी सवाल का जवाब देने वाले हैं! 

आपको बता दे कि भारत में लाखों मंदिर हैं। हर मंदिर के बनने के पीछे कोई न कोई रहस्‍य छिपा हुआ है। ऐसा ही एक रहस्यमयी और चमत्कारिक मंदिर है खाटू श्‍याम मंदिर। राजस्‍थान के सीकर जिले में स्थित यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। आज लाखों लोग न केवल खाटू बाबा को मानते हैं, बल्कि हर मौके पर यहां भक्‍ताें की भीड़ उमड़ती है। मान्‍यता है कि जो लोग यहां आकर भगवान खाटू के दर्शन करते हैं, उनके जीवन की हर समस्‍या दूर हो जाती है। 

जानकारी के लिए बता दें कि बाबा को हारे का सहारा कहा जाता है। इसलिए लोग यहां अपनी परेशानियां लेकर आते हैं। खाटू श्याम बाबा मंदिर से जुड़ी कई बाताें के बारे में आपने सुना होगा। लेकिन आज हम आपको बाबा खाटू श्याम के मंदिर का रहस्य बताने जा रहे हैं.. जानकारी के लिए बता दें कि आज पूरा भारत जिन्‍हें खाटू श्याम बाबा के रूप में पूजता है, असल में वे श्रीकृष्ण का कलयुग अवतार हैं। इसलिए उनका जन्‍म भी कार्तिक शुक्‍ल देवउठनी ग्‍यारस के दिन मनाया जाता है। इस दिन परिसर में विशाल मेला लगता है , जो ग्‍यारस मेला के नाम से मशहूर है। 

दरअसल, खाटू श्‍याम बाबा द्वापर या महाभारत काल के समय में बर्बरीक के रूप में जाने जाते थे। वे तीन बाण धारी शक्तिशाली योद्धा थे। वे पांडव पुत्र भीम के नाती और घटोत्कच के पुत्र थे। बर्बरीक की माता का नाम हिडिम्बा था। बताया जाता है कि महाभारत के दौरान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से शीश दान में मांगा था। बर्बरीक ने कुछ सोचे बिना उन्हें अपना शीश दान दे दिया। तब श्रीकृष्ण ने प्रसन्‍न होकर उन्‍हें वरदान दिया था कि कलयुग में तुम मेरे नाम से जाने जाओगे। जो हारा हुआ भक्‍त तुम्‍हारे पास आएगा, तुम उसका सहारा बनोेगे। इसी वजह से उन्‍हें हारे का सहारा भी कहा जाता है। मान्‍यता के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होते ही श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश को रूपवती नदी में बहा दिया था। जिसके बाद यह खाटू गांव की जमीन में दफन हो गया। 

एक दिन वहां से गाय गुजरी, तो उसके थन से अपने आप ही दूध बहना लगा। यह देखकर गांव वाले हैरान रह गए और यह खबर खाटू के राजा तक पहुंचाई गई। खाटू के राजा जब यह देखने के लिए उस जगह पहुंचे, तो उन्हें याद आया कि कुछ दिन पहले रात को उन्हें सोते समय एक ऐसा ही सपना आया था। सपने में भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें आदेश दिया था कि एक जगह पर जमीन में शीश दफन है उस जमीन से शीश को निकालकर खाटू गांव में ही स्थापित कर मंदिर का निर्माण करवाना होगा। यही नहीं बता दे कि बर्बरीक की माता का नाम हिडिम्बा था। बताया जाता है कि महाभारत के दौरान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से शीश दान में मांगा था। बर्बरीक ने कुछ सोचे बिना उन्हें अपना शीश दान दे दिया। तब श्रीकृष्ण ने प्रसन्‍न होकर उन्‍हें वरदान दिया था कि कलयुग में तुम मेरे नाम से जाने जाओगे। जो हारा हुआ भक्‍त तुम्‍हारे पास आएगा, तुम उसका सहारा बनोेगे। इसी वजह से उन्‍हें हारे का सहारा भी कहा जाता है। जिसके बाद खाटू के राजा ने उस जगह की खुदाई करने का आदेश दिया और वहां जमीन से एक शीश निकला। शीश के निकलने के बाद राजा ने उस शीश को खाटू में ही एक जगह पर स्थापित कर मंदिर का निर्माण करा दिया। आज वह मंदिर बाबा खाटू श्याम के नाम से पूरे भारत में मशहूर है। तो यह है बाबा खाटू श्याम मंदिर के रहस्य की कहानी!

शनिवार को 58 केंद्रों पर वोटिंग, महबूबा, कन्हैया, राज बब्बर, मेनका, खट्टर मैदान में l

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शनिवार को छठे एपिसोड में 58 केंद्रों पर वोटिंग, महबूबा, कन्हैया, राज बब्बर, मेनका, खट्टर मैदान में
देश के छह राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में शनिवार को छठे चरण में मतदान हो रहा है। 18वीं लोकसभा चुनाव के इस पूर्व-निष्कर्ष चरण में 58 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होगा। इसमें पश्चिम बंगाल के 42 निर्वाचन क्षेत्रों में से आठ – बांकुरा, बिष्णुपुर, तमलुक, कांथी, घाटल, मेदिनीपुर, झाड़ग्राम और पुरुलिया शामिल हैं।

छठे चरण में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 14, हरियाणा की सभी 10, बिहार की 40 में से आठ, ओडिशा की 21 में से छह और झारखंड की 14 में से चार सीटों पर मतदान होगा। इस चरण में दिल्ली के सभी सात केंद्र शासित प्रदेशों और जम्मू-कश्मीर के पांच लोकसभा क्षेत्रों में से एक पर मतदान होगा। अनंतनाग-राजौरी में तीसरे चरण का मतदान 7 मई को होना था, लेकिन चुनाव आयोग ने बाद में इसे छठे चरण के लिए स्थगित कर दिया। छठे चरण में कांग्रेस (उत्तर पूर्वी दिल्ली) के कन्हैया कुमार अहम उम्मीदवारों में शामिल हैं. उनके प्रतिद्वंदी बीजेपी के मनोज तिवारी हैं. दिवंगत सुषमा स्वराज की बेटी बंशुरी नई दिल्ली सीट पर आप मंत्री सोमनाथ भारती के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। हरियाणा में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर (करनाल), उद्योगपति नवीन जिंदल (कुरुक्षेत्र) और कांग्रेस के राज बब्बर (गुरुग्राम) मैदान में हैं।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में भले ही बेटे वरुण गांधी को टिकट नहीं दिया गया लेकिन मां मेनका को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश ने आज़मगढ़ में अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र को मैदान में उतारा है. नरेंद्र मोदी कैबिनेट के सदस्य राधामोहन सिंह बिहार के पूर्वी चंपारण और धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के संबलपुर से उम्मीदवार हैं। ओडिशा के पुरी में बीजेपी के अखिल भारतीय प्रवक्ता संबित पात्रा मैदान में हैं. अनंतनाग-राजौरी में पीडीपी अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती चुनावी मैदान में हैं।

पहले दो चरणों के मतदान में मतदान प्रतिशत को लेकर असमंजस की स्थिति शुरू हो गई है. चुनाव आयोग ने जो जानकारी पहले जारी की थी, बाद में उसमें बदलाव कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया गया कि आयोग ने चुनाव से जुड़ी सूचनाएं प्रकाशित करने में देरी क्यों की. याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि आयोग चुनाव के दौरान मतदान दर के संबंध में सारी जानकारी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करे। शुक्रवार को शीर्ष अदालत ने याचिका खारिज कर दी.

मतदान की अवधि समाप्त होने के कई दिनों बाद, पहले दो चरणों में मतदान प्रतिशत में वृद्धि को लेकर देश भर में संदेह व्यक्त किया गया था। कांग्रेस, तृणमूल समेत विभिन्न विपक्षी दलों ने आयोग के इस काम पर संदेह जताया है. चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं. इसीलिए ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ नामक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसले के दौरान कहा, ”हम उस चीज़ को नहीं रोक सकते जो पहले से ही चल रही है।” हम किसी भी प्रक्रिया में बाधा नहीं डालेंगे. हमें अधिकारियों पर भरोसा करना होगा।”

बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा था कि आयोग बूथवार मतदान दर का डेटा भी सार्वजनिक करे. वादी ने यह भी सवाल उठाए कि जानकारी हाथ में होने के बाद इसका खुलासा क्यों नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में आयोग ने कोर्ट को दिए हलफनामे में कहा कि बूथ आधारित वोटिंग की जानकारी जनता को देने का कोई कानून नहीं है. अगर यह जानकारी सामने आती है तो यह मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है. ऐसे मामलों में जहां जीत का अंतर कम है, खासकर ऐसे मामलों में जहां फॉर्म 17सी (बूथ-वार वोटिंग दर) से डेटा जारी किया जाता है, इसका मतदाताओं पर प्रभाव पड़ेगा। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”अभी चुनाव चल रहा है. इसलिए अब इस मामले में दखल नहीं दिया जा सकता.” शीर्ष अदालत ने यह भी कहा, ”शनिवार को देश में छठे दौर का चुनाव है.” ऐसे में आयोग को मैनपावर की जरूरत है. इसलिए मामले की सुनवाई गर्मी की छुट्टियों के बाद दोबारा होगी.

बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा था कि आयोग बूथवार मतदान दर का डेटा भी सार्वजनिक करे. वादी ने यह भी सवाल उठाए कि जानकारी हाथ में होने के बाद इसका खुलासा क्यों नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में आयोग ने कोर्ट को दिए हलफनामे में कहा कि बूथ आधारित वोटिंग की जानकारी जनता को देने का कोई कानून नहीं है. अगर यह जानकारी सामने आती है तो यह मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है. ऐसे मामलों में जहां जीत का अंतर कम है, खासकर ऐसे मामलों में जहां फॉर्म 17सी (बूथ-वार वोटिंग दर) से डेटा जारी किया जाता है, इसका मतदाताओं पर प्रभाव पड़ेगा।

केजरीवाल की टिप्पणी से अवामी लीग नाराजl

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बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल की ‘फर्जी’ टिप्पणियों पर अपना गुस्सा जाहिर किया है। आज एक इंटरव्यू में जब केजरीवाल से नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की संभावना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”वे संविधान बदल देंगे और देश तानाशाही की ओर बढ़ जाएगा. या तो चुनाव नहीं होंगे, या यह रूस जैसा होगा, जहां पुतिन ने देश के सभी विपक्षियों को या तो जेल में डाल दिया है या मार डाला है। बांग्लादेश में शेख हसीना ने भारी अंतर से जीत हासिल की है.

बांग्लादेश में हाल के राष्ट्रीय चुनावों पर भारतीय राजनेता की टिप्पणी से स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ अवामी लीग के भीतर गुस्सा पैदा हो गया। बिप्लब बरुआ प्रधानमंत्री के सहायक के पद पर हैं. उनकी प्रतिक्रिया, “यह टिप्पणी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण, अप्रत्याशित और अनपेक्षित है। ऐसा लगता है कि अरविंद केजरीवाल को बांग्लादेश की राजनीतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि के बारे में सही जानकारी नहीं थी. बांग्लादेश के आम लोगों की इच्छा हमारे राष्ट्रीय चुनावों में परिलक्षित हुई है। सभी ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर निर्णय लिया है।” उनके शब्दों में, ”राजनीतिक कारणों से या रणनीति के तहत उन्हें अपने ही देश में वोट के सामने कई बातें कहनी पड़ सकती हैं। लेकिन यह असत्य और अवास्तविक है।”

इसके अलावा अवामी लीग के संयुक्त सचिव महबाबुल हक हनीफ ने कहा, ”दिल्ली के मुख्यमंत्री बहुत लोकप्रिय नेता हैं. लेकिन इस मामले में ऐसा लग रहा है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में बिना जाने-समझे ऐसी टिप्पणी कर दी. क्योंकि जो जमात और बीएनपी गठबंधन चुनाव को विफल करना चाहते थे, उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है. लोकतंत्र की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति मतदान है। जमात बीएनपी समूह ने मांग की कि प्रधान मंत्री शेख हसीना को चुनाव से पहले इस्तीफा देना चाहिए। इसके बाद उन्होंने उस मांग पर आंदोलन के नाम पर हिंसा शुरू कर दी. सड़क पर गाड़ियों में आग लग गई. पिछले साल 26 अक्टूबर को उसने सरेआम पुलिस वालों की हत्या कर दी थी. मुख्य न्यायाधीश के आवास पर हमला किया गया. पुलिस ने अस्पताल में घुसकर 8 कारों को आग के हवाले कर दिया. इन सभी घटनाओं में शामिल लोगों पर विशिष्ट आरोपों के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में कानून के अनुसार गिरफ्तार किया गया। राजनेता कानून से बड़े नहीं हैं।”

बांग्लादेश की अवामी लीग सरकार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल की ‘फर्जी’ टिप्पणियों पर अपना गुस्सा जाहिर किया है। आज एक इंटरव्यू में जब केजरीवाल से नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की संभावना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”वे संविधान बदल देंगे और देश तानाशाही की ओर बढ़ जाएगा. या तो चुनाव नहीं होंगे, या यह रूस जैसा होगा, जहां पुतिन ने देश के सभी विपक्षियों को या तो जेल में डाल दिया है या मार डाला है। बांग्लादेश में शेख हसीना ने भारी अंतर से जीत हासिल की है.

बांग्लादेश में हाल के राष्ट्रीय चुनावों पर भारतीय राजनेता की टिप्पणी से स्वाभाविक रूप से सत्तारूढ़ अवामी लीग के भीतर गुस्सा पैदा हो गया। बिप्लब बरुआ प्रधानमंत्री के सहायक के पद पर हैं. उनकी प्रतिक्रिया, “यह टिप्पणी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण, अप्रत्याशित और अनपेक्षित है। ऐसा लगता है कि अरविंद केजरीवाल को बांग्लादेश की राजनीतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि के बारे में सही जानकारी नहीं थी. बांग्लादेश के आम लोगों की इच्छा हमारे राष्ट्रीय चुनावों में परिलक्षित हुई है। सभी ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर निर्णय लिया है।” उनके शब्दों में, ”राजनीतिक कारणों से या रणनीति के तहत उन्हें अपने ही देश में वोट के सामने कई बातें कहनी पड़ सकती हैं। लेकिन यह असत्य और अवास्तविक है।”

इसके अलावा अवामी लीग के संयुक्त सचिव महबाबुल हक हनीफ ने कहा, ”दिल्ली के मुख्यमंत्री बहुत लोकप्रिय नेता हैं. लेकिन इस मामले में ऐसा लग रहा है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में बिना जाने-समझे ऐसी टिप्पणी कर दी. क्योंकि जो जमात और बीएनपी गठबंधन चुनाव को विफल करना चाहते थे, उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है. लोकतंत्र की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति मतदान है। जमात बीएनपी समूह ने मांग की कि प्रधान मंत्री शेख हसीना को चुनाव से पहले इस्तीफा देना चाहिए। इसके बाद उन्होंने उस मांग पर आंदोलन के नाम पर हिंसा शुरू कर दी. सड़क पर गाड़ियों में आग लग गई. पिछले साल 26 अक्टूबर को उसने सरेआम पुलिस वालों की हत्या कर दी थी. मुख्य न्यायाधीश के आवास पर हमला किया गया. पुलिस ने अस्पताल में घुसकर 8 कारों को आग के हवाले कर दिया. इन सभी घटनाओं में शामिल लोगों पर विशिष्ट आरोपों के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में कानून के अनुसार गिरफ्तार किया गया। राजनेता कानून से बड़े नहीं हैं।”

श्रीलंका के राष्ट्रपति चाहें तो कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी भी ले सकते हैं.

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बड़ी जटिल वोट-संख्या, लेकिन 80 के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति चाहें तो कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी भी ले सकते हैं. इस देश में 1978 तक सरकार का मुखिया प्रधानमंत्री के हाथमें होता था. अब राष्ट्रपति-केंद्रित शासन में प्रधानमंत्री का पद वस्तुतः प्रतीकात्मक है।

इस देश के संसदीय चुनावों में किसी भी पार्टी के पास किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में कोई विशिष्ट उम्मीदवार नहीं है। मतदाताओं को मतपत्र पर अंकित करना होगा कि प्रत्याशियों में से कौन उनकी पहली पसंद है, कौन दूसरी, कौन तीसरी.

श्रीलंका चुनाव के बारे में कई दिलचस्प तथ्य हैं। वयस्कों को मतदान का अधिकार देने वाला श्रीलंका दक्षिण एशिया का पहला देश था। यह 1931 था, ब्रिटिश काल। श्रीलंका के पड़ोसी देशों, अर्थात् भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल ने वयस्क मतदान अधिकार बहुत बाद में पेश किए। हालाँकि, अगर आपको इस देश में चुनाव लड़ना है तो आपकी जेब में ताकत होनी चाहिए। इसलिए, श्रीलंका में उप-चुनावों को छोड़कर, केवल अमीर लोग ही वोट के लिए खड़े दिखाई देते हैं।

1948 से 1978 तक श्रीलंका में भारत की तरह संसदीय ढांचा था। संसदीय चुनावों में सबसे अधिक सीटें पाने वाली पार्टी ने प्रधान मंत्री चुना। उन्होंने मंत्रिमंडल का गठन किया. वह सरकार के मुखिया थे. राष्ट्रपति (तब गवर्नर जनरल कहा जाता था) देश का औपचारिक प्रमुख होता था।

1978 से राष्ट्रपति सत्ता का केंद्र बन गया है। उन्हें हर पांच साल में जनता द्वारा सीधे चुना जाता था। बहुदलीय लोकतंत्र वाले इस देश में संसद का भी हर पांच साल में अलग-अलग चुनाव होता है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री सहित मंत्रिमंडल के सदस्यों को सबसे बड़ी पार्टी से चुनता है। श्रीलंका के मंत्रिमंडल का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, प्रधान मंत्री नहीं। राष्ट्रपति भी चाहे तो कैबिनेट मंत्री का पद ले सकता है। राष्ट्रपति के पास आमतौर पर वित्त और रक्षा मंत्रालय होते हैं। उन्होंने संसद की बहसों में भी हिस्सा लिया. राष्ट्रपति को धन विधेयक पारित करने के लिए संसद पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में प्रधानमंत्री ने कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की. यह सुनिश्चित करना प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रपति को बहुमत दल का समर्थन मिले और उसके विधेयक संसद द्वारा पारित हो जाएं। एक तरह से श्रीलंका के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और संसद के बीच की कड़ी हैं।

श्रीलंकाई संसद में 225 सदस्य हैं। उनमें से 196 देश भर के 25 प्रशासनिक जिलों से सीधे वोट से जीते। शेष 29 सांसदों को नामांकित किया जाता है – किसी पार्टी को मिलने वाले वोटों के अनुपात के आधार पर। मतदान प्रक्रिया काफी जटिल है. भारत में एक पार्टी एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए केवल एक ही उम्मीदवार को नामांकित करती है। लेकिन श्रीलंका में प्रत्येक जिला एक निर्वाचन क्षेत्र है। इस बार उस जिले की जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है कि वहां संसद की कितनी सीटें होंगी. मान लीजिए कि कोलंबो जिले में 20 सीटें हैं। उस स्थिति में, प्रत्येक राजनीतिक दल उस केंद्र और जिले के लिए 20 उम्मीदवारों की सूची तैयार करेगा। इसमें तीन अतिरिक्त वैकल्पिक उम्मीदवारों के नाम होंगे.

श्रीलंका में मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से नहीं बल्कि कागज़ के मतपत्रों से होता है। मतपत्र में सभी पार्टियों के नाम और चुनाव चिन्ह होते हैं। वहीं पूरे जिले में हर पार्टी के सभी प्रत्याशियों के नाम हैं. मतपत्र में मतदाता को सबसे पहले अपनी पसंद के राजनीतिक दल को वोट देना होता है। दूसरा, उन्हें अपनी पसंदीदा पार्टी के उम्मीदवारों की सूची में से चुनना होगा, जो संभावित सांसद के रूप में उनकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद हैं। बेशक, कोई स्वतंत्र के रूप में खड़ा हो सकता है।

यदि किसी पार्टी को कुल वोटों का पांच प्रतिशत से कम वोट मिलता है, तो उसे गिनती की शुरुआत में ही बाहर कर दिया जाता है। सीट उस पार्टी को जाती है जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, लेकिन सांसद कौन होगा यह तय करने के लिए पहली, दूसरी और तीसरी वरीयता के वोट गिने जाते हैं। श्रीलंका में नेताओं के बीच पहली पसंद बनने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है। इसलिए यहां चुनाव लड़ने की कीमत भी ज्यादा है. प्रत्याशियों को प्रचार के लिए जिले भर में घूमना पड़ रहा है। पहले मतदान केंद्र छोटे होते थे। मतदाताओं और सांसदों के बीच संचार की एक लाइन खुली थी। अब एक बड़ा अंतर है. कई लोग पुरानी चुनावी प्रक्रिया पर वापस जाना चाहते हैं. हालाँकि, राष्ट्रपति चुनाव के दौरान पहली, दूसरी और तीसरी पसंद को एक ही तरह से चुनने की व्यवस्था होती है। लेकिन अक्सर मतदाता केवल एक ही व्यक्ति को चुनते हैं। निर्वाचित होने के लिए 50 प्रतिशत वोटों की आवश्यकता होती है। यदि दो से अधिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं और उनमें से किसी को भी 50 प्रतिशत वोट नहीं मिलते हैं, तो पहले और दूसरे उम्मीदवार के लिए दोबारा मतदान करना पड़ता है। हालाँकि, श्रीलंका का यह अब तक का दूसरा राष्ट्रपति चुनाव है
राउंड पर नहीं गए.

इस देश में इस साल सितंबर-अक्टूबर में दोबारा राष्ट्रपति चुनाव होंगे। 2025 में संसद चुनाव. हालाँकि, प्रांतीय और नगरपालिका चुनाव लंबे समय से रुके हुए हैं। सीटों का पुनर्गठन, चुनावी प्रक्रिया में धांधली जैसी कई योजनाएँ थीं। व्यवस्थागत समस्याओं के अलावा कोविड महामारी और वित्तीय संकट ने इसमें बाधा डाली है. श्रीलंका की जनसंख्या में महिलाएँ लगभग 52 प्रतिशत हैं, लेकिन निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में 5 प्रतिशत से भी कम हैं। इसका एक कारण उम्मीदवार बनने की उच्च लागत है। 90 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में इस देश के चुनावों में हिंसा की घटनाएं काफी नियमित हो गईं। कई महिलाएं हिंसा के डर से पीछे हट जाती हैं। श्रीलंका में मुख्य रूप से राजनीतिक परिवारों की महिलाएं चुनाव लड़ती हैं।

श्रीलंका का चुनाव आयोग चुनाव का प्रभारी है। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि छुट्टी के दिन मतदान होगा। मतदान के समय सड़कें झंडे-पोस्टर-कटआउट से पट जाती हैं। राजनीति को लेकर बातें और बहसें होती रहती हैं. श्रीलंका में वोटों में धांधली, बूथ कैप्चरिंग अब बहुत कम हो गई है। देश में संकट के बावजूद श्रीलंकाई लोगों का मतदान के प्रति उत्साह कम नहीं हुआ है। मतदान प्रतिशत 80 प्रतिशत से अधिक हो गया। (लेखक कोलंबो में पत्रकार हैं)

दोपहर का खाना खाने का सही समय क्या है? व्यस्त होने पर भी समय पर खाना कितना महत्वपूर्ण है?

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दोपहर का खाना एक निश्चित समय पर खाना जरूरी है। लेकिन दोपहर का खाना खाने का सही समय क्या है? शरीर कब स्वस्थ रहेगा? समय पर खाने का कोई विकल्प नहीं है. यदि आप घड़ी के अनुसार भोजन करते हैं तो स्वस्थ भोजन खाना स्वस्थ रह सकता है। हालांकि सुबह और रात को सही समय पर खाना संभव है, लेकिन व्यस्त शेड्यूल के कारण दोपहर के भोजन का समय सही नहीं है। काम का दबाव कम होगा तो दिन जल्दी कटेगा. यदि यह फिर से व्यस्त है, तो दोपहर बीत जाती है। यह निरंतर अनियमितता शरीर पर विभिन्न प्रभाव डालती है। इसलिए दोपहर का खाना एक निश्चित समय पर खाना जरूरी है। लेकिन दोपहर का खाना खाने का सही समय क्या है? शरीर कब स्वस्थ रहेगा?

दिन के प्रत्येक भोजन के बीच कितनी जगह छोड़नी चाहिए, इस बारे में अलग-अलग राय हैं। कई लोग कहते हैं कि यह विभिन्न तरीकों से स्वास्थ्य स्थितियों से संबंधित है। पोषण विशेषज्ञों का मानना ​​है कि हृदय की स्थिति से लेकर वजन बढ़ने तक सब कुछ जुड़ा हुआ है। इसलिए दोपहर का खाना किस समय खाना चाहिए यह काफी हद तक नाश्ते के समय पर निर्भर करता है। क्योंकि दो भोजन के बीच कम से कम 3-5 घंटे का अंतर होना चाहिए।

क्या इसका मतलब यह है कि सुबह 8 बजे खेलने से दोपहर का भोजन 12 बजे से पहले कभी खत्म नहीं होगा? लेकिन यह नहीं है। पोषण विशेषज्ञ एक बात का ध्यान रखने को कहते हैं। यानी अगर आप भूखे हैं तो आप अपने पेट को इंतजार नहीं करवा सकते। नतीजतन, अगर आपको 11 बजे भूख लगे तो तुरंत खाना खा लेना चाहिए। खाली पेट खतरनाक है. गैस और सीने में जलन का डर रहता है. इसके साथ ही ज्यादा देर तक पेट खाली रखने से अल्सर होने का डर रहता है। इसलिए न खाना ही बेहतर है. भले ही आपके पास बैठकर खाने का समय न हो, फिर भी थोड़ा-थोड़ा भोजन करते रहें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अलग-अलग पार्टियों के आठ सांसदों के साथ लंच किया. उन्होंने संसद की कैंटीन में बातचीत करते हुए उन आठ सांसदों के साथ खाना खाया. उन्होंने स्पेशल लड्डू खाया. लंच के वक्त प्रधानमंत्री की अपनी पार्टी बीजेपी के सांसद तो मौजूद थे ही, उन आठ लोगों में दूसरी पार्टियों के सांसद भी मौजूद थे.

भाजपा सांसद हिना गावित, एस फांगन कोनियाक, जामयांग सेरिंग नामग्याल, एल मुरुगन संसद कैंटीन में दोपहर के भोजन के लिए प्रधानमंत्री के साथ शामिल हुए। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद राममोहन नायडू, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के सांसद रितेश पांडे और बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद सस्मित पात्रा भी मौजूद थे।

बजट सत्र चल रहा है. इसके लिए वे आठ सांसद संसद भवन में थे. सूत्रों के मुताबिक, उन्हें दोपहर करीब ढाई बजे प्रधानमंत्री के साथ लंच का निमंत्रण मिला। एक अन्य सूत्र के मुताबिक, मोदी ने आमंत्रित सांसदों से कहा, “आइए, मैं आपको एक सजा देना चाहता हूं।”

इसके बाद प्रधानमंत्री आठ सांसदों के साथ संसद भवन की कैंटीन में खाना खाने गये. मेनू में चावल, दाल, खिचड़ी और रागी आधारित लड्डू शामिल थे। दोपहर का भोजन 45 मिनट तक चलता है। सूत्रों के मुताबिक, खाने के दौरान प्रधानमंत्री की जीवनशैली पर भी सवाल उठते हैं। मोदी जब उठते हैं तो क्या खाना खाते हैं इसकी भी चर्चा होती है. सूत्रों ने बताया कि लंच के दौरान राजनीति का मुद्दा नहीं उठा।

लंच में मौजूद एक सांसद ने मीडिया एनडीटीवी को बताया, ”प्रधानमंत्री ने उन्हें संसद कैंटीन में लंच के लिए आमंत्रित किया. सौहार्दपूर्ण आदान-प्रदान होता है। कहानी यह है वह एक अच्छा समय था।’ एक अन्य सांसद के शब्दों में, ”हमने एक बार भी नहीं सोचा कि हम प्रधानमंत्री के साथ खाना खा रहे हैं.” भाजपा सांसद हिना गावित, एस फांगन कोनियाक, जामयांग सेरिंग नामग्याल, एल मुरुगन संसद कैंटीन में दोपहर के भोजन के लिए प्रधानमंत्री के साथ शामिल हुए। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद राममोहन नायडू, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के सांसद रितेश पांडे और बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद सस्मित पात्रा भी मौजूद थे। 51 बीरभूम का कंकालीतला सतीपीठों में से एक है। वहाँ मार्ग बहूत व्यस्त है। इनमें कई लोग ऐसे भी हैं जिनके पास दो वक्त का पेट भरने लायक खाना भी नहीं है. इस बार उस समस्या से छुटकारा पाएं. 1 रूपये के बदले में गरीब लोग नरकंकाल के आगोश में समा जायेंगे। स्वच्छ वातावरण में खाना पकाने की सुविधा प्रदान करने के लिए मंदिर के बगल में एक टिन शेड का निर्माण किया गया है। कांचीदेश मंदिर समिति ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाया है। गुरुवार को कंकालीतला मंदिर सेवायत, साधुसंत, कंकालीतला ग्राम पंचायत के सदस्यों ने भोजन सुविधा का उद्घाटन किया। उद्घाटन के बाद क्षेत्र के पांच सौ से अधिक लोगों ने दोपहर का भोजन किया. कंकालीतला ग्राम पंचायत के उपप्रधान मोहम्मद ओहीउद्दीन ने कहा, ”कंकालीताला मंदिर से सटे इलाके में साधु, आवारा और दुखी लोग रहते हैं. इनके बारे में सोचकर आपको इस बार से सिर्फ 1 टका में भरपेट लंच मिल जाएगा। इलाके के लोग भी भूखे लोगों को खाना देने के लिए आगे आए हैं.

‘वे सांप्रदायिक हैं, इसलिए धर्म के आधार पर आरक्षण लाना चाहते हैं’! मोदी का लक्ष्य ‘भारत’

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विपक्ष ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में धर्म का हवाला देकर चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं. उस शिकायत के चलते चुनाव आयोग ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को नोटिस भेजा था. चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में मोदी शनिवार को बिहार के पाटलिपुत्र गए और विपक्षी गठबंधन ‘भारत’ पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ”भारत (विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’) के नेता सांप्रदायिक हैं. इसलिए वे धर्म के आधार पर आरक्षण लागू करना चाहते हैं। उन्होंने वोट बैंक पर कब्ज़ा करते हुए ‘मुजरा’ शुरू किया.

मोदी ने आरोप लगाया कि विपक्षी गठबंधन का उद्देश्य अनुसूचित जाति (एससी-एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मताधिकार से वंचित करना और अपने वोट बैंक की खातिर इसे मुसलमानों को देना है। उन्हें पहले भी कई बैठकों में यह शिकायत करते सुना गया है. गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश में बीजेपी के सहयोगी टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने घोषणा की है कि अगर वह राज्य में सत्ता में आते हैं (आंध्र प्रदेश में भी लोकसभा चुनाव होते हैं) तो मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षित करेंगे। लेकिन सहयोगी दल के नेता के वादे पर न तो मोदी और न ही किसी अन्य भाजपा नेता ने कोई टिप्पणी की.

कांग्रेस ने अप्रैल की शुरुआत में अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया। इसके बाद राजस्थान में वोट के लिए प्रचार करने पहुंचे मोदी ने कहा, ‘कांग्रेस का घोषणापत्र देखकर आजादी से पहले की मुस्लिम लीग की याद आती है. इसके बाद मध्य प्रदेश के मुरैना और उत्तर प्रदेश के आगरा में सभाओं में उन्होंने कहा,’ उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने घर में रखे सोने के गहनों से लेकर हिंदू विवाहित महिलाओं के मंगलसूत्र तक पर संपत्ति कर लगाकर मुसलमानों से वह पैसा छीनने की कोशिश की।

विपक्ष का आरोप है कि 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के बाद मोदी समेत बीजेपी नेताओं ने प्रतिकूल स्थिति को समझते हुए धीरे-धीरे ध्रुवीकरण का सुर तेज कर दिया. पिछले 21 अप्रैल को मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा में बीजेपी की एक बैठक में कहा था, ”पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहले कहा था कि देश की संपत्ति पर सबसे बड़ा अधिकार मुसलमानों का है. इसीलिए कांग्रेस ने सर्वे कराने की योजना बनाई है. ताकि देशवासियों की मेहनत की कमाई को मुसलमानों और घुसपैठियों में बांटा जा सके।”

गंगा प्रदूषण से मुक्त नहीं है. इसके बजाय, केंद्र सरकार द्वारा आवंटित हजारों करोड़ रुपये ‘पानी में’ डूब गए हैं।’ बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस ने यह आरोप लगाया था. पटना में चुनाव प्रचार कर रहे पार्टी के अखिल भारतीय प्रवक्ता जयराम रमेश ने शनिवार को कहा, “पटना को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने का कार्यक्रम और नामानी गंगे परियोजना का फंड गंगा के पानी में बह गया है।”

वह गंगा को स्वच्छ बनाएंगे। नरेंद्र मोदी ने ये शपथ 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर ली थी. धार्मिक भावनाओं के कारण गंगा के परिशोधन की पुरानी परियोजना को नया नाम ‘नमामि गंगे’ मिला। उन्होंने जल संसाधन मंत्रालय में गंगा पुनरुद्धार नामक एक विभाग भी जोड़ा। अब तक कुल 20 हजार करोड़ रुपये के आवंटन का आधे से अधिक खर्च किया जा चुका है। हालांकि विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्टों में गंगा का प्रदूषण कम नहीं हुआ है। आरोप है कि कुछ साल पहले जब विपक्ष ने मुद्दा उठाया तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट से यह रिपोर्ट गायब हो गई. सरकार के साथ-साथ बोर्ड भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। जयराम ने शनिवार को कहा कि पटना शहर और उपनगरों का प्रदूषित, गंदा पानी सीधे गंगा में न गिरे इसके लिए 11 ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट’ के निर्माण की घोषणा की गई है. लेकिन केवल चार ही बनाये गये।

केंद्र और बिहार की एनडीए सरकार पर निशाना साधते हुए जयराम ने शनिवार को कहा, ‘लेकिन जिम्मेदार संस्था बिहार शहरी आधारभूत संरचना विकास निगम’ ने आवंटित 3,288 करोड़ रुपये में से लगभग पूरा खर्च कर दिया है! क्या मोदी जी बता सकते हैं कि लोगों का पैसा इस तरह क्यों बर्बाद किया गया?” उन्होंने 2021 तक पटना के पास बिहटा हवाई अड्डे का निर्माण पूरा नहीं करने और पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं देने के वादे को पूरा नहीं करने पर भी सवाल उठाया।

आरोप है कि कुछ साल पहले जब विपक्ष ने मुद्दा उठाया तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट से यह रिपोर्ट गायब हो गई. सरकार के साथ-साथ बोर्ड भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। जयराम ने शनिवार को कहा कि पटना शहर और उपनगरों का प्रदूषित, गंदा पानी सीधे गंगा में न गिरे इसके लिए 11 ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट’ के निर्माण की घोषणा की गई है. लेकिन केवल चार ही बनाये गये।