Sunday, March 8, 2026
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आखिर क्या था 10 साल पुराना नालसा जजमेंट?

आज हम आपको 10 साल पुराना नालसा जजमेंट के बारे में जानकारी देने वाले हैं! नालसा जजमेंट को दस साल पूरे हो गए हैं। जब श्रीगौरी सावंत ने दस साल पहले सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को मान्यता दिलाने के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं थी। लेकिन चौंकाने वाली बात ये रही कि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) का जजमेंट भारत में उनके समुदाय के लिए नागरिक स्वतंत्रता की आधारशिला बन गया। इस जजमेंट में लिंग और लैंगिक पहचान के अंतर को माना गया, एक अलग थर्ड जेंडर का कानूनी दर्जा बनाया गया और केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांस लोगों के मूलभूत अधिकार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। आज एक बार फिर श्रीगौरी निराश हैं। वो कहती हैं, ‘ट्रांस लोगों को जो पहचान मिली है वो हमारी लड़ाई की वजह से है, सरकार की वजह से नहीं। गरीबी और सामाजिक वर्ग एक बड़ी समस्या है। बड़ी कंपनियों में रंगीन बाल रखने वाले लोगों की स्थिति शायद बेहतर हो, लेकिन जो ट्रांस लोग दस साल पहले रेड लाइट एरिया में थे, वो आज भी वहीं हैं। श्रीगौरी एक एनजीओ ‘सखी चार चौघी ट्रस्ट’ चलाती हैं जो ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के लिए काम करता है।

नालसा का ऐतिहासिक जजमेंट 15 अप्रैल 2014 को आया था। इस जजमेंट में लिंग को “व्यक्ति की अपनी लैंगिक पहचान की जन्मजात अनुभूति’ के रूप में परिभाषित किया गया, जिससे ट्रांस लोगों को खुद को चुनने का अधिकार मिला। दिल्ली स्थित वकीलों के संगठन “लॉयर्स कलेक्टिव” की उप-निदेशक, वकील त्रिप्ति टंडन कहती हैं, ‘नालसा की कानूनी लड़ाई में शामिल होना एक बड़ी जीत थी। उससे पहले कुछ छिटपुट मुकदमे होते थे, लेकिन कानून की नजर में ट्रांसजेंडर लोग गैर-मौजूद थे। उनके लिए कोर्ट का दरवाजा तक बंद था। वो एक ऐसे मुवक्किल को याद करती हैं जो हमेशा जजमेंट की एक प्रति अपने पास रखते थे ताकि लोगों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की याद दिला सकें। एक और मुवक्किल के परिवार ने जजमेंट के बाद उनकी पहचान स्वीकार कर ली। सरकारों को दिए गए निर्देशों को तीन मुख्य भागों में बांटा जा सकता है। पहला, खुद की पहचान चुनने का अधिकार, दूसरा सामाजिक कल्याण योजनाओं में ट्रांस लोगों को शामिल करना और तीसरा शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में दाखिले के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाना।

मुस्कान तिब्रेवाला, जो सेंटर फॉर जस्टिस लॉ एंड सोसाइटी में लॉ एंड मार्जिनेलाइजेशन क्लिनिक की सहायक निदेशक हैं और ट्रांस लोगों को निशुल्क कानूनी सेवाएं देती हैं, उनका कहना है कि भले ही नालसा के फैसले से ट्रांस समुदाय को कानूनी मान्यता मिली, लेकिन पिछले 10 सालों में इस फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करने की कोशिशों में कमी रही है। तिब्रेवाला कहती हैं, भीख पर रोक लगती है, कई राज्यों में ट्रांसजेंडर स्टेट बोर्ड काम नहीं कर रहे हैं और सिर्फ दो राज्यों ने ही पुलिस स्टेशनों में ट्रांसजेंडर सुरक्षा सेल बनाए हैं, जैसा कि निर्देश दिया गया था। हरियाणा में एक कार्यकर्ता को इसे अदालत में ले जाना पड़ा।

दूसरे लोग भी इस बात से सहमत हैं कि भले ही नालसा ने सामाजिक बदलाव हासिल करने के लिए व्यवस्था बनाई, लेकिन ट्रांस लोगों को अब भी हर कदम पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। जैसा कि श्रीगौरी कहती हैं, ‘यह ऐसा है जैसे किसी को घर पर रात के खाने पर बुलाया जाए लेकिन यह भी कहा जाए कि आप तभी आ सकते हैं अगर आपके पास चांदी की थाली और सोने का चम्मच हो।’

फैसले और उससे निकले “ट्रांसजेंडर अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 2019 में स्वयं लिंग पहचान की बात की गई है। नालसा का यही वह हिस्सा है जिसे सबसे ज्यादा लागू किया गया है। इससे पहले, आपको लिंग बदलने के लिए सर्जरी करवानी पड़ती थी, लेकिन अब दो प्रमाणपत्र हैं। आप कानूनी रूप से खुद को ट्रांस के रूप में पहचान सकते हैं, लेकिन अगर आप कानूनी रूप से पुरुष या महिला के रूप में पहचान बनाना चाहते हैं तो आपको हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) या मनोचिकित्सा मूल्यांकन जैसे मेडिकल प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। समस्या यह है कि जमीनी स्तर पर इस प्रक्रिया को बहुत ही खराब तरीके से लागू किया जाता है।

हाल ही में पुणे पुलिस ने ट्रांस समुदाय द्वारा भीख मांगने पर रोक लगा दी। सखी सावंत कहती हैं, ‘यह कहना आसान है कि भीख मत मांगो, लेकिन क्या हमें खुद का गुजारा करने के लिए एक पैसा भी मिल रहा है? क्या हमें नौकरियां मिल रही हैं? कोई भी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगता। नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स में सेवा देने वाली कल्कि सुब्रमण्यम कहती हैं, ‘शिक्षा, उद्यमिता या आजीविका की पहल के अवसरों के बिना, सिस्टम ट्रांस लोगों को भीख मांगने से कैसे रोक सकता है? हमें अपने परिवारों से अलग कर दिया जाता है, जिससे हमारे पास सिर्फ भीख मांगने या देह व्यापार करने का विकल्प बचता है।’

मोगली का कहना है कि ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ अत्याचारों के प्रावधानों के मामले में 2019 का अधिनियम एक मजाक है। यह कानून नालसा के फैसले के जनादेश के जवाब में बनाया गया था। हालांकि, सजा 6 महीने से दो साल तक की है, और अपराधियों को थाने से ही जमानत मिल सकती है। उन्हें इसके लिए कोर्ट जाने की भी जरूरत नहीं पड़ती।

राहुल गांधी और कांग्रेस के बारे में क्या बोले राजनाथ सिंह?

हाल ही में राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी और कांग्रेस के बारे में एक बयान दिया है! रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस और सांसद राहुल गांधी दोनों को निशाने पर लिया। राजनाथ सिंह ने कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी में कोई आग नहीं है जबकि उनकी पार्टी चुनावी फायदे के लिए हिंदू-मुस्लिम विभाजन की कोशिश कर आग से खेल रही है। रक्षा मंत्री ने इंटरव्यू में यह संकेत देते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में आने पर समान नागरिक संहिता और ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसी बड़ी योजनाओं पर अमल करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें विश्वास है कि एनडीए 400 सीटों का आंकड़ा पार करेगा और भाजपा को 370 से अधिक सीट मिलेंगी क्योंकि यह अनुमान जमीनी स्थिति के विस्तृत मूल्यांकन के बाद लगाया गया है। संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य पर बात करते हुए रक्षा मंत्री ने कांग्रेस पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक आधार पर तनाव पैदा करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वे चुनावी फायदे के लिए हिंदू-मुस्लिम विभाजन का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस धार्मिक आधार पर तनाव पैदा करने की कोशिश कर रही है।

सिंह ने कहा, ‘कांग्रेस सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना चाहती है। वे मुस्लिम समुदाय को केवल वोट बैंक के रूप में देखते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों में 66 से लेकर 67 प्रतिशत तक कम मतदान के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि यह भाजपा के लिए चिंता की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल अपने समर्थकों को बाहर निकलकर वोट करने के लिए उत्साहित नहीं कर पा रहे हैं।मैं उन्हें सुझाव देना चाहता हूं – राजनीति केवल सरकार बनाने के लिए नहीं की जानी चाहिए। राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण होना चाहिए।’

राजनाथ सिंह ने कहा, ‘राहुल गांधी में कोई आग नहीं है, लेकिन कांग्रेस आग से खेल रही है।’रक्षा मंत्री ने कहा कि देश के लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर विश्वास जताएंगे और पिछले पांच साल में सरकार के प्रदर्शन के आधार पर भाजपा की सीटों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार होगा। उन्होंने कहा, ‘उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हमारी सीट बढ़ेंगी और तमिलनाडु में हमें कुछ सीट मिलेंगी। केरल में भी हमारा खाता खुलेगा। हम आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी अच्छी-खासी सीट जीत रहे हैं।’उन्होंने कहा कि भाजपा 370 का आंकड़ा पार करेगी। ओडिशा, झारखंड और असम में भी हमारी सीट बढ़ेंगी। हम छत्तीसगढ़ में सभी सीट जीतेंगे। उन्होंने कहा कि भाजपा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में 75 सीटें तक जीतने के लिए तैयार है। यह पूछे जाने पर कि क्या महाराष्ट्र में भाजपा की सीटें कम होंगी, इस पर उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि वहां सीटें ऊपर-नीचे हो सकती हैं।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने संपत्ति के पुन: वितरण की कांग्रेस की योजना को लेकर उस पर निशाना साधा। राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था पर इसके विनाशकारी परिणाम होंगे। सिंह ने कहा, ‘संपत्ति के पुन: वितरण की अवधारणा से मंदी आएगी। संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य पर बात करते हुए रक्षा मंत्री ने कांग्रेस पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक आधार पर तनाव पैदा करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वे चुनावी फायदे के लिए हिंदू-मुस्लिम विभाजन का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस धार्मिक आधार पर तनाव पैदा करने की कोशिश कर रही है।अर्जेंटीना और वेनेजुएला ने इसे लागू किया और विनाशकारी परिणामों का सामना किया। निवेशकों का भारत से भरोसा उठ जाएगा।’ सत्ता में लौटने पर यूसीसी और ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ जैसी भाजपा की बड़ी योजनाएं लागू करने के बारे में सिंह ने कहा कि वह भारत के लोगों से जो वादा करती है, उन्हें पूरा भी करती है। भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में सत्ता में लौटने पर यूसीसी लागू करने का संकल्प लिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि पार्टी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ लागू करने के संकल्प के साथ आगे बढ़ेगी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कांग्रेस भय का माहौल पैदा करना चाहती है, वे हिंदू-मुस्लिम कार्ड का इस्तेमाल करना चाहते हैं। सिंह ने आरोप लगाया, ‘उन्हें कोई समस्या नहीं है। वे जाति, नस्ल और धर्म के नाम पर समाज को बांटकर सरकार बनाना चाहते हैं और उन्होंने हमेशा ऐसा ही किया है।’ लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों में 66 से लेकर 67 प्रतिशत तक कम मतदान के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि यह भाजपा के लिए चिंता की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल अपने समर्थकों को बाहर निकलकर वोट करने के लिए उत्साहित नहीं कर पा रहे हैं।

अपने स्कूल समय के लिए क्या बोले CJI चंद्रचूड़?

हाल ही में CJI चंद्रचूड़ के द्वारा अपने स्कूल समय के लिए एक बात बताई गई है! स्कूल में पिटाई यानी शारीरिक दंड अब बच्चों को अनुशासित करने के लिए एक क्रूर तरीका माना जाता है। हालांकि, कुछ दशक पहले तक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों के लिए ये एक वास्तविकता थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के लिए भी ये ज्यादा अलग नहीं था। इस बात का जिक्र उन्होंने शनिवार को एक सेमिनार में किया। सीजेआई ने बताया कि एक बार छोटी सी गलती के लिए उन्हें स्कूल में डंडे से पीटा गया था। उन्होंने कहा कि मुझे अभी भी याद है कि मैंने अपने टीचर से अपील करते हुए कहा था कि वे मेरे हाथ पर नहीं बल्कि मेरे पीछे डंडे से मारिए। बावजूद इसके मेरे शिक्षक ने मेरी एक नहीं सुनी। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उस समय मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा था, जब मेरे टीचर ने छोटी सी गलती पर मुझे बेंत से पीटा था। उन्होंने बताया कि शर्म के कारण वह अपने माता-पिता को भी यह बात नहीं बता सके। यही नहीं उनसे अपनी चोटिल दाहिनी हथेली को 10 दिनों तक छिपाना पड़ा था। किशोर न्याय पर चर्चा करते समय, हमें कानूनी विवादों में उलझे बच्चों की कमजोरियों और विशिष्ट जरूरतों को पहचानने की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी न्याय प्रणाली करुणा, पुनर्वास और समाज में फिर एकीकरण के अवसरों के साथ रिएक्ट करें।सीजेआई ने कहा कि आप बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, इसका उनके पूरे जीवन में दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है। मैं स्कूल में बिताए उस दिन को कभी नहीं भूल सकता। जब मेरे हाथों पर बेंत मारे गए, तब मैं कोई अपराधी नहीं था। मैं क्राफ्ट सीख रहा था और असाइनमेंट के लिए सही आकार की सुइयां क्लास में नहीं लाया था।

भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ काठमांडू में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की ओर से जुवेनाइल जस्टिस पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल होने पहुंचे थे। इसी दौरान बोलते हुए उन्होंने घटना साझा की। उन्होंने कहा कि बच्चे मासूम होते हैं। लोग जिस तरह से बच्चों के साथ व्यवहार करते हैं, उसका उनके दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुझे अभी भी याद है कि 5वीं क्लास में जब टीचर मुझे मार रहे थे तो मैंने उनसे कहा था कि वे मेरे हाथ पर नहीं बल्कि मेरे पीछे मारें। हालांकि, उन्होंने ऐसा नहीं किया।

सीजेआई चंद्रचूड़ बोले कि शारीरिक घाव तो भर गया, लेकिन मन और आत्मा पर वह घटना अमिट छाप छोड़ गई। जब मैं अपना काम करता हूं, तो यह आज भी मुझे याद आता है। बच्चों पर इस तरह के अपमान का प्रभाव बहुत गहरा होता है। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय पर चर्चा करते समय, हमें कानूनी विवादों में उलझे बच्चों की कमजोरियों और विशिष्ट जरूरतों को पहचानने की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी न्याय प्रणाली करुणा, पुनर्वास और समाज में फिर एकीकरण के अवसरों के साथ रिएक्ट करें।

सेमिनार में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका का भी जिक्र किया जिसमें नाबालिग बलात्कार पीड़िता के गर्भ को समाप्त करने की मांग की गई थी। टीचर से अपील करते हुए कहा था कि वे मेरे हाथ पर नहीं बल्कि मेरे पीछे डंडे से मारिए। बावजूद इसके मेरे शिक्षक ने मेरी एक नहीं सुनी। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उस समय मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ रहा था, जब मेरे टीचर ने छोटी सी गलती पर मुझे बेंत से पीटा था। उन्होंने कहा कि बच्चे मासूम होते हैं। लोग जिस तरह से बच्चों के साथ व्यवहार करते हैं, उसका उनके दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुझे अभी भी याद है कि 5वीं क्लास में जब टीचर मुझे मार रहे थे तो मैंने उनसे कहा था कि वे मेरे हाथ पर नहीं बल्कि मेरे पीछे मारें। हालांकि, उन्होंने ऐसा नहीं किया।उन्होंने बताया कि शर्म के कारण वह अपने माता-पिता को भी यह बात नहीं बता सके। यही नहीं उनसे अपनी चोटिल दाहिनी हथेली को 10 दिनों तक छिपाना पड़ा था।उन्होंने भारत की जुवेनाइल जस्टिस के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में भी बात की। इसमें एक बड़ी चुनौती अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और संसाधन हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में, जिसके कारण जुवेनाइल जस्टिस सेंटर्स में भीड़भाड़ और घटिया दर्जे की स्थिति है। इसी कारण किशोर अपराधियों को उचित सहायता प्रदान करना और पुनर्वास प्रदान करने के प्रयासों में बाधा आ सकती है।

क्या POK के लोग भारत में हो सकते हैं शामिल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या POK के लोग भारत में शामिल होंगे या नहीं! रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर भारत अपना दावा कभी नहीं छोड़ेगा। हालांकि, इस पर बलपूर्वक कब्जा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के लोग कश्मीर में विकास को देखने के बाद खुद भारत का हिस्सा बनना चाहेंगे। राजनाथ सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ बातचीत में कहा कि जम्मू-कश्मीर की जमीनी स्थिति में काफी सुधार हुआ है। ऐसा समय आएगा जब इस केंद्र शासित प्रदेश में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। हालांकि, रक्षा मंत्री ने कहा कि यह मुद्दा केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और वह इसमें उपयुक्त फैसला लेगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव भी जरूर होंगे, लेकिन उन्होंने इसके लिए कोई समयसीमा नहीं बताई। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि भारत को कुछ नहीं करना पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से जमीनी हालात बदले हैं, क्षेत्र में जिस तरह से आर्थिक प्रगति हो रही है और वहां जिस तरह से शांति लौटी है। मुझे लगता है कि पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में फरवरी 2019 में भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया था।पीओके के लोगों की ओर से यह मांग उठेगी कि उनका भारत में विलय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें पीओके पर कब्जा करने के लिए बल प्रयोग नहीं करना पड़ेगा क्योंकि वहां के लोग ही कहेंगे कि हमें भारत में विलय करना चाहिए। ऐसी मांगें अब उठ रही हैं।

रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि पीओके हमारा था… है और हमारा रहेगा। जम्मू-कश्मीर में जमीनी हालात में सुधार होने का हवाला देते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि वहां जल्द ही विधानसभा चुनाव होंगे लेकिन उन्होंने इसके लिए कोई टाइम लिमिट नहीं बताई। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से स्थिति में सुधार हो रहा है, उसे देखकर मुझे लगता हैऔर वहां जिस तरह से शांति लौटी है। भारत का कहना है कि वह पाकिस्तान के साथ पड़ोसी देशों की तरह सामान्य संबंध रखना चाहता है लेकिन इसके लिए आतंकवाद और शत्रुता से मुक्त माहौल बनाने की जिम्मेदारी इस्लामाबाद पर है। कि ऐसा समय आएगा जब वहां अफस्पा की आवश्यकता नहीं होगी। यह मेरा विचार है और इस पर निर्णय गृह मंत्रालय को लेना है। ‘अफस्पा’ सुरक्षा बलों को अभियान चलाने और बिना किसी पूर्व वारंट के किसी को भी गिरफ्तार करने की शक्ति देता है।

रक्षा मंत्री ने जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के ‘छद्म युद्ध ‘ का जिक्र करते हुए कहा कि इस्लामाबाद को सीमा पार आतंकवाद को रोकना होगा। वे भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं और हम ऐसा नहीं होने देंगे। भारत सीमा पार आतंकवाद से निपटने पर ध्यान केंद्रित करता रहेगा।पीओके के लोगों की ओर से यह मांग उठेगी कि उनका भारत में विलय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें पीओके पर कब्जा करने के लिए बल प्रयोग नहीं करना पड़ेगा क्योंकि वहां के लोग ही कहेंगे कि हमें भारत में विलय करना चाहिए। ऐसी मांगें अब उठ रही हैं। पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में फरवरी 2019 में भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया था।

इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बेहद तनाव पैदा हो गया। भारत की ओर से पांच अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटेने की घोषणा किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच संबंध और भी खराब हो गए। बता दें कि जम्मू-कश्मीर की जमीनी स्थिति में काफी सुधार हुआ है। ऐसा समय आएगा जब इस केंद्र शासित प्रदेश में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। हालांकि, रक्षा मंत्री ने कहा कि यह मुद्दा केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और वह इसमें उपयुक्त फैसला लेगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव भी जरूर होंगे, लेकिन उन्होंने इसके लिए कोई समयसीमा नहीं बताई। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि भारत को कुछ नहीं करना पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से जमीनी हालात बदले हैं, क्षेत्र में जिस तरह से आर्थिक प्रगति हो रही है और वहां जिस तरह से शांति लौटी है। भारत का कहना है कि वह पाकिस्तान के साथ पड़ोसी देशों की तरह सामान्य संबंध रखना चाहता है लेकिन इसके लिए आतंकवाद और शत्रुता से मुक्त माहौल बनाने की जिम्मेदारी इस्लामाबाद पर है।

नेपाल द्वारा बनाए गए नए नोट पर क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में विदेश मंत्री के द्वारा नेपाल द्वारा बनाए गए नए नोट विवाद पर एक बयान दिया गया है! नेपाल ने नए नोट जारी किए हैं। इन नोटों पर भारत के कुछ इलाकों को दिखाने के मामले पर विवाद हो गया है। नोटों के विवाद पर बोलते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बनाना जटिल होता है। उन्होंने यह भी माना कि अक्सर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में राजनीति का भी ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने रविवार को कटक में एक प्रेस वार्ता में कहा कि कभी-कभी पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते में थोड़ी बहुत राजनीति भी शामिल हो जाती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसे अपने और उनके हितों को मिलाकर चल सकते हैं। उन्होंने कुछ उदाहरणों का जिक्र किया जहां भारत के बारे में अच्छी राय नहीं थी। उन्होंने कहा कि श्रीलंका जैसे देशों में जाकर आप सरकारी अधिकारियों या आम लोगों से भारत के बारे में कुछ नकारात्मक राय सुन सकते हैं। जयशंकर ने इस बात को भी रेखांकित किया कि भारत ने कोविड-19 महामारी और यूक्रेन जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौरान अपने पड़ोसी देशों की मदद की है, जिससे भारत की छवि सकारात्मक बनी है। जयशंकर ने आगे कहा कि अगर आप पूरी तस्वीर देखें, खासकर कोविड संकट के दौरान जब हमने जरूरतमंदों की मदद की थी, या यूक्रेन जैसे संघर्षों के वक्त जहां हमने प्रभावित लोगों तक जरूरी सामान पहुंचाए थे। तो हमारे कार्यों से ही बहुत कुछ पता चलता है। उन्होंने बताया कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के अपने वादे को पूरा करने के लिए प्रभावित इलाकों तक जरूरी चीजें पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है। विदेश मंत्री (ईएएम) एस जयशंकर ने यह भी बताया कि कई बार हमारे पड़ोसी देश, जैसे प्याज की कमी होने पर, अतिरिक्त मदद मांगते हैं। इससे यह पता चलता है कि सकारात्मक और दोनों देशों के लिए फायदेमंद रिश्ते बनाए रखना कितना जरूरी है।

विदेश नीति और व्यापार दोनों में ही कभी-कभी परेशानी आना आम बात है। जयशंकर ने कहा कि लेकिन हम इनका समाधान ढूंढते हैं और आगे बढ़ते हैं, और अंत में सफलता प्राप्त करते हैं। ये टिप्पणी नेपाल के अपने नोटों में कुछ भारतीय इलाकों को शामिल करने के फैसले को लेकर बढ़ते तनाव के बीच आई है, जिसके चलते दोनों देशों के बीच राजनयिक चर्चा हो रही है। नेपाल की मंत्रिमंडल की बैठक में शुक्रवार को 100 रुपये के पर नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा छापने का फैसला किया गया है, जिसमें विवादित इलाके लिपुलेख , लिम्पियाधुरा और कालापानी को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है।

मई 2020 की शुरुआत में, नेपाल के नक्शा विभाग ने जमीन प्रबंधन मंत्रालय को एक नया नक्शा सौंपा था। इस नए नक्शे में वो इलाके भी शामिल थे जो पहले के नक्शे में नहीं दिखाए गए थे। विभाग का दावा है कि इस नक्शे में सही पैमाना, दिशा और निर्देशांक प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है। मई 2020 के मध्य में, नेपाल की ओर से अपने राजनीतिक नक्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को शामिल करने के बाद नेपाल और भारत के बीच तनाव बढ़ गया था। ये वो इलाके हैं जिन्हें भारत ने अपने नवंबर 2019 के नक्शे में शामिल किया था। 2032 ईस्वी में जारी किए गए पुराने नक्शे में गुंजी, नाभी और कुरिया गांवों को शामिल नहीं किया गया था। हाल ही में संशोधित नक्शे में इन गांवों को शामिल कर लिया गया है, जिससे कुल क्षेत्रफल 335 वर्ग किलोमीटर बढ़ गया है। भारत ने कोविड-19 महामारी और यूक्रेन जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौरान अपने पड़ोसी देशों की मदद की है, जिससे भारत की छवि सकारात्मक बनी है। जयशंकर ने आगे कहा कि अगर आप पूरी तस्वीर देखें, खासकर कोविड संकट के दौरान जब हमने जरूरतमंदों की मदद की थी, या यूक्रेन जैसे संघर्षों के वक्त जहां हमने प्रभावित लोगों तक जरूरी सामान पहुंचाए थे। तो हमारे कार्यों से ही बहुत कुछ पता चलता है।8 मई 2020 को लिपुलेख कैलाश मानसरोवर को जोड़ने वाली सड़क के उद्घाटन के बाद दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए थे। इस उद्घाटन का विरोध करते हुए नेपाल ने भारत को एक राजनयिक नोट सौंपा था। इस राजनयिक नोट को सौंपने से पहले भी, नेपाल ने भारत की ओर से सड़क बनाने के एकतरफा फैसले का कड़ा विरोध किया था। नेपाल के कड़े विरोध के बाद, भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से होकर जाने वाली यह सड़क पूरी तरह भारत के क्षेत्र में आती है।

आखिर आतंकवादी पन्नू को कौन मारना चाहता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आतंकवादी पन्नू को कौन मारना चाहता है! अमेरिका में इंटेलिजेंस कम्यूनिटी के एक वर्ग ने वाशिंगटन के एक दैनिक समाचार पत्र के सहयोग से खालिस्तानी नेता पन्नू को लेकर बड़ा दावा किया। इसमें खालिस्तानी आंदोलन के उत्तरी अमेरिका स्थित नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित कोशिश का आरोप लगाया गया। ये भी कहा गया कि अमेरिकी धरती पर भारत सरकार की ओर से हत्या की ये कवायद थी। कनाडा की जस्टिन ट्रूडो सरकार के साथ मिलकर सीआईए ने भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रॉ पर खालिस्तानी अलगाववादियों के खिलाफ जंग में नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। यही नहीं सीआईए ने एक कदम आगे बढ़कर विक्रम यादव की पहचान सार्वजनिक कर दी है, जिसके बारे में उसका दावा है कि वह इस मिशन का ऑपरेशन हेड था। सीआईए की ओर से यह भी दावा किया गया कि तत्कालीन रॉ प्रमुख पूरी तरह इस मामले से वाकिफ थे। इस खुलासे के बाद अमेरिकी आधिकारिक हलकों में यह धारणा बन गई कि भारत सरकार उत्तरी अमेरिका में खालिस्तानियों के स्पष्ट रूप से दुष्ट आचरण की जांच करने के लिए गंभीर नहीं है। अमेरिकी धरती पर भारत की ओर से ‘हत्या की साजिश’ पर वाशिंगटन में दिखावटी आक्रोश ने नरेंद्र मोदी के घरेलू आलोचकों को सवाल करने का मौका दिया। ऐसा कहा कि यह कल्पना से परे है इस तरह के एक बड़े अंडरकवर ऑपरेशन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री दोनों का समर्थन नहीं मिला। यह भी छिपा खतरा है कि जब तक भारत कुछ कदम पीछे नहीं हटता और अलगाववादियों के खिलाफ अपने आक्रामक अभियान को नहीं छोड़ता, तब तक भारत-अमेरिका संबंधों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि रॉ के खिलाफ अमेरिकी डोजियर का अधिकांश हिस्सा मान्यताओं पर आधारित है, इसलिए यह पता लगाना सार्थक है कि क्या होता अगर निखिल गुप्ता की ओर से कॉन्ट्रैक्टेड हत्यारा, जिसे खुद पन्नू से निपटने के लिए रॉ की ओर से डील दी गई थी, एक अंडरकवर अमेरिकी एजेंट नहीं निकलता। अगर खालिस्तानी नेता को वास्तव में मार दिया गया होता, तो कुछ समय के लिए हंगामा होता। हालांकि, यह देखते हुए कि पन्नू के सार्वजनिक बयान जिम्मेदार अमेरिकी नागरिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, यह संभावना है कि मामला दर्ज कर लिया गया होता और फिर इसे भुला दिया जाता।

कनाडा में हालात इसके विपरीत है, जहां खालिस्तान समर्थक सिख वोट बैंक बन गए हैं और तीन मुख्यधारा की पार्टियों की ओर उनका समर्थन किया जा रहा है। वे अमेरिका में अपेक्षाकृत महत्वहीन हैं। कुछ राज्य स्तरीय प्रतिनिधियों को छोड़कर, डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियां खालिस्तानी मांगों का समर्थन करने के लिए बाध्य महसूस नहीं करते हैं। वे भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के बीच सफल प्रोफेशनल और धनवानों को आकर्षित करना पसंद करते हैं। फिर भी, यह निर्विवाद है कि ऑपरेशन पन्नून विफल रहा। अगर प्राग जेल में बंद और अमेरिका में प्रत्यर्पण की प्रतीक्षा कर रहे अभागे निखिल गुप्ता ने किसी दूसरे कॉन्ट्रैक्ट किलर को चुना होता, तो परिणाम शायद काफी अलग होते। इस विफलता के बाद, R&AW के अंदर की गंदी पेशेवर प्रतिद्वंद्विता ने सेंटर स्टेज पर कब्जा कर लिया है। इसकी प्रतिष्ठा को खराब करने की जिम्मेदारी विक्रम यादव और पूर्व R&AW प्रमुख सामंत गोयल पर डाली गई है। दोनों पर आरोप लगाया गया है कि वे बेपरवाह पुलिसकर्मी हैं, जो न्यूयॉर्क और पंजाब में ऑपरेशन के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं।

आलोचकों का सुझाव है कि रॉ के मोसाद जैसे दृष्टिकोण को त्यागकर एजेंसी को अलगाववाद से लड़ने के लिए प्री-मोदी दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए। यह भी कि अमेरिका का हमला एक अयोग्य रॉ ऑपरेटिव के खिलाफ है, जिसके पास संदिग्ध ट्रेड क्राफ्ट है। जिसने अपनी सीमाओं को भी पार कर लिया है, आंशिक रूप से सही है। क्या पन्नून, हाल के कुछ क्वार्टर्स ऐसा सस्पेक्ट बन गया कि अमेरिकी खुफिया संपत्ति के रूप में दोगुना हो गया है। वो इतना कीमती क्यों है, यह पता नहीं है। हालांकि, जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि अमेरिका ने इस कथित हत्या की साजिश पर कैसे प्रतिक्रिया दी है।

यह मानना कि अमेरिका अपनी धरती को पवित्र मानता है और अपने सभी नागरिकों को समान रूप से महत्व देता है, बकवास है। पन्नून अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से मिलकर बने फाइव आईज गठबंधन को संगठित करने में काम आया है। जिससे प्रवासी खालिस्तानियों के प्रति अपने आक्रामक विरोध को कम करने के लिए दिल्ली की सरकार पर दबाव डाला जा सके। हालांकि भारत की खुफिया एजेंसियों ने पड़ोस में ऐसी मजबूत पकड़ बनाई है, खास तौर से पाकिस्तान के अंदर जो जबरदस्त प्रतिष्ठा हासिल की है, वो बेहद अहम है। उसने भारत के पुशओवर और सॉफ्ट स्टेट की स्थिति से बाहर निकलने में मदद की है। भारत के विरोधी डरे हुए हैं।

यह भी सर्वविदित है कि यह सब बल प्रयोग को बढ़ावा देने वाले सिद्धांत के तहत हुआ है। जवाबी सर्जिकल स्ट्राइक और रणनीतिक स्वायत्तता के दावों के लिए राजनीतिक समर्थन के मद्देनजर पश्चिमी प्रतिष्ठानों के एक वर्ग में यह भावना है कि मोदी सरकार को एक या दो पायदान नीचे लाया जाना चाहिए। पीएम मोदी और अजित डोवाल के खिलाफ मीडिया अभियान की टाइमिंग को अधिक महत्व देना शायद गलत हो, लेकिन इसे पूरी तरह से अलग नहीं किया जा सकता। पश्चिम में राजनीतिक नेतृत्व इस प्रोजेक्ट में उतना इन्वेस्ट नहीं कर सकता है, लेकिन खुफिया एजेंसियां अपनी ऑपरेशनल स्वायत्तता का इस्तेमाल करने के लिए जानी जाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को राष्ट्रीय हितों को बिना किसी समझौते के बनाए रखने के अपने दृढ़ संकल्प से पीछे नहीं हटना चाहिए। रॉ का स्किल अपग्रेडेशन देश के रणनीतिक सिद्धांतों को शामिल किए बिना हो सकता है। जिससे उन देशों की संवेदनशीलता को समायोजित किया जा सके जो लंबे समय से दोस्तों और दुश्मनों के बीच अंतर करने की क्षमता खो चुके हैं।

टी20 वर्ल्ड कप शुरू होने से कुछ दिन पहले पूरी भारतीय टीम अमेरिका पहुंचेगी. ऐसे में विश्व कप की तैयारी को लेकर सवाल l

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टी20 वर्ल्ड कप शुरू होने से कुछ दिन पहले पूरी भारतीय टीम अमेरिका पहुंचेगी. ऐसे में विश्व कप की तैयारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. बीसीसीआई सचिव को इसकी चिंता नहीं है.
आईपीएल के बाद टी20 वर्ल्ड कप शुरू होगा. आईपीएल फाइनल 26 मई भारत का पहला विश्व कप मैच 5 जून को आयरलैंड के खिलाफ है। यानी रोहित शर्मा, विराट कोहली को आईपीएल के बाद अमेरिका जाना होगा. भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) ने भारतीय टीम के विश्व कप खेलने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है।

बीसीसीआई सचिव जय शाह ने कहा कि भारतीय टीम के सदस्यों को दो बार अमेरिका भेजा जाएगा. विश्व कप टीम में शामिल जो क्रिकेटर आईपीएल प्लेऑफ़ में नहीं खेलेंगे वे 24 मई को विश्व कप में उतरेंगे। पहले चरण में कोच राहुल द्रविड़ और अन्य कोचिंग स्टाफ अमेरिका जाएंगे. जो लोग आईपीएल के प्लेऑफ में खेलेंगे वे 26 मई को आईपीएल फाइनल के बाद अमेरिका के लिए उड़ान भरेंगे। भारतीय टीम प्रतियोगिता से कुछ दिन पहले अमेरिका पहुंचेगी. ऐसे में विश्व कप की तैयारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. हालांकि, बीसीसीआई सचिव चिंतित नहीं हैं. इस संबंध में जॉय ने कहा, ”कल्पना कीजिए कि ट्रैविस हेड और अभिषेक शर्मा बल्लेबाजी कर रहे हैं। उनके खिलाफ बोल रहे हैं जसप्रीत बुमरा. इससे बेहतर अभ्यास क्या हो सकता है.”

वह नियमित रूप से आईपीएल में बेंगलुरु के लिए ओपनिंग करते रहे। हालांकि टी20 वर्ल्ड कप में उन्हें तीन से पिछड़ना पड़ सकता है. सौरव गंगोपाध्याय का मानना ​​है कि विश्व कप में कोहली से ओपनिंग कराई जानी चाहिए। सौरव ने ये बात आईपीएल के प्रदर्शन के बारे में सोचकर कही.

कोहली के पास फिलहाल आईपीएल में ऑरेंज हैट है। 12 मैचों में 634 रन बनाए. औसत 70.44. स्ट्राइक रेट 153.51. सौरव ने न्यूज एजेंसी से कहा, ”कोहली कमाल का खेल रहे हैं. कोहली ने गुरुवार रात जिस तरह से बल्लेबाजी की और तेजी से 90 रन बनाए, निश्चित रूप से उन्हें विश्व कप में ओपनिंग करने की जरूरत है। मैं इस बारे में बात कर रहा हूं कि जब वह आईपीएल में ओपनिंग करने उतरेंगे तो उन्होंने पिछली कुछ पारियों में क्या खेला है।”

सौरव को लगता है कि भारत की विश्व कप टीम में पर्याप्त संतुलन है। सौरव का मानना ​​है कि वे 17 साल ट्रॉफियों पर बिता सकेंगे. उनके शब्दों में, “एक अद्भुत टीम। जो सर्वश्रेष्ठ टीम चुनी जा सकती थी वही हुआ। न केवल बल्लेबाजी की गहराई, बल्कि गेंदबाजी विभाग भी शानदार दिखता है।”

सौरव ने कहा, “बुमराह इस समय दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तेज गेंदबाज हैं। कुलदीप, अक्षर, सिराज अनुभवी गेंदबाज हैं. यह अब तक का सबसे अच्छा संयोजन है।” दिनेश कार्तिक ने हाल ही में वर्ल्ड कप टीम में मौका पाने की इच्छा जताई थी. लेकिन टीम में नहीं आये. सौरव के मुताबिक, चयनकर्ताओं ने विकेटकीपर के तौर पर ऋषभ पंत और संजू सैमसन को लेकर सही काम किया है।

सौरव ने कहा, ”दिनेश ने अच्छा खेला. लेकिन उनसे भी अच्छे क्रिकेटर हैं. संजू और पंथ को किसी भी तरह से बाहर किया जा सकता है।

आईपीएल, टी20 वर्ल्ड कप खत्म होने पर बोर्ड कोहली-रोहित को दो राउंड में भेजेगा, कब जाएंगे?
टी20 वर्ल्ड कप शुरू होने से कुछ दिन पहले पूरी भारतीय टीम अमेरिका पहुंचेगी. ऐसे में विश्व कप की तैयारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. बीसीसीआई सचिव को इसकी चिंता नहीं है. आईपीएल के बाद टी20 वर्ल्ड कप शुरू होगा. आईपीएल फाइनल 26 मई भारत का पहला विश्व कप मैच 5 जून को आयरलैंड के खिलाफ है। यानी रोहित शर्मा, विराट कोहली को आईपीएल के बाद अमेरिका जाना होगा. भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) ने भारतीय टीम के विश्व कप खेलने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है।

बीसीसीआई सचिव जय शाह ने कहा कि भारतीय टीम के सदस्यों को दो बार अमेरिका भेजा जाएगा. विश्व कप टीम में शामिल जो क्रिकेटर आईपीएल प्लेऑफ़ में नहीं खेलेंगे वे 24 मई को विश्व कप में उतरेंगे। पहले चरण में कोच राहुल द्रविड़ और अन्य कोचिंग स्टाफ अमेरिका जाएंगे. जो लोग आईपीएल के प्लेऑफ में खेलेंगे वे 26 मई को आईपीएल फाइनल के बाद अमेरिका के लिए उड़ान भरेंगे।

भारतीय टीम प्रतियोगिता से कुछ दिन पहले अमेरिका पहुंचेगी. ऐसे में विश्व कप की तैयारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है. हालांकि, बीसीसीआई सचिव चिंतित नहीं हैं. इस संबंध में जॉय ने कहा, ”कल्पना कीजिए कि ट्रैविस हेड और अभिषेक शर्मा बल्लेबाजी कर रहे हैं। उनके खिलाफ बोल रहे हैं जसप्रीत बुमरा. इससे बेहतर अभ्यास क्या हो सकता है.”

असदुद्दीन ओवैसी वक्फ बोर्ड से अपील l

माधवीलता प्रचार में डार्ट फेंक रही हैं. जत्रा तत्र असदुद्दीन ओवैसी पर निशाना. लेकिन क्या हैदराबाद एमआईएम नेता ‘वेसी बध’ की छाती पर खड़ा होना संभव है? या फिर बीजेपी उम्मीदवार माधवील्टा डेविड और गोलियथ की तरह असमान लड़ाई में हैं? 49 साल की वह महिला नेता, जिसे लेकर निज़ाम के शहर का पारंपरिक समाज इस समय उथल-पुथल में है।

चारमीनार पर एक शाम. ऐसा लगता है कि पूरा हैदराबाद चार्मिना स्क्वायर में बस गया है। भीड़ भनभना रही है. दिन की तेज़ गर्मी काफी हद तक ख़त्म हो जाने के बाद, हुसैन सागर की हल्की हवा चारमीनार की दीवारों को सहलाती है। मंसूर का पीने का फव्वारा मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने है। उनके मुताबिक, हैदराबाद की धरती पर वेसी को हराना लगभग नामुमकिन है। उन्होंने कहा, ”कोई सवाल ही नहीं है.” हैदराबाद लोकसभा की सभी सात विधानसभाओं में एमआईएम के विधायक हैं। उसके बाद कोई लड़ाई नहीं है.”

भाग्यलक्ष्मी मंदिर चारमीनार के मुख्य द्वार के पास स्थित है। इसी मंदिर में माधवीलता ने उपदेश देना शुरू किया था। गंगाधर रेड्डी अपनी पत्नी के साथ पूजा करने पहुंचे. पेशे से बनिया. मधबीलता इस बार जिस तरह से असदुद्दीन को चलता कर रही हैं, उससे वह खुश हैं. मंदिर में पूजा खत्म करने के बाद उन्होंने कहा, ”पहले एकतरफा वोटिंग होती थी. समझ नहीं आया कि हैदराबाद से बीजेपी का कोई उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है. इस बार स्थिति अलग है. संपूर्ण हिंदू समाज मध्वीला के पीछे है।”

स्थानीय सनातन धर्मावलंबी हैदराबाद में सत्ता परिवर्तन की पुरजोर मांग कर रहे हैं. वह जहां भी जाती हैं महिलाएं उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ती हैं। मधबीलता अभियान में दूरियों की सारी बाधाएं तोड़ रही हैं और सभी ज्ञात-अज्ञात के घरों में प्रवेश कर रही हैं। अल्पसंख्यकों के घरों को भी नहीं छोड़ा गया है. वहां तक ​​पहुंचने में भी उन्हें कोई झिझक नहीं हो रही है. मतलब, बीजेपी का मतलब मुस्लिम विरोधी होना बिल्कुल भी नहीं है. तथ्य यह है कि उन्होंने असदुद्दीन को एक महिला के रूप में मैदान में उतारा है, यह खुद एमआईएम प्रमुख के आंदोलनों से स्पष्ट है। माधबिलतार के क्षणिक हमले को रोकने के लिए वेसी व्यावहारिक रूप से हैदराबाद से बाहर नहीं जा सके। वह अपने मध्य में जमीन पर लेटा हुआ है।
हैदराबाद लोकसभा के सात विधानसभा क्षेत्रों के कुल 28 किमी क्षेत्र में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। खैरताबाद के बीजेपी दफ्तर में बैठे शरद राव मानते हैं कि 60 फीसदी मुस्लिम समुदाय से लड़कर हैदराबाद केंद्र में जीत संभव नहीं है. उनके मुताबिक, ”जीतना मुश्किल है. लेकिन मध्वीला के उम्मीदवार होने से यहां का हिंदू समाज एकजुटता का संदेश दे रहा है. माना जा रहा है कि इससे न सिर्फ हैदराबाद बल्कि पूरे राज्य को फायदा होगा. एमआईएम नेतृत्व को यह भी लगता है कि पिछली बार भागवत राव को 300,000 वोटों से हराने के बावजूद माधवीला इस यात्रा में अंतर को कम जरूर करेंगे.

लेकिन असदुद्दीन वीसी को कुल मिलाकर जीत को लेकर कोई संदेह नहीं है. वेसी परिवार 1984 से इस सीट पर जीत हासिल कर रहा है। पहले पिता सलाउद्दीन वेसी, 2004 से असदुद्दीन हैदराबाद सेंटर के ‘सिंगल किंग’ हैं. लेकिन वेसी परिवार के चालीस वर्षों तक हैदराबाद से जीतने के बावजूद, पुराने शहर की सड़कें संकरी हैं, भारी यातायात से घिरा हुआ है, हर कोने पर कूड़े के ढेर हैं। स्वास्थ्य देखभाल नाम की कोई चीज नहीं है. पीने के पानी की भी समस्या है. स्कूल तो बस एक मदरसा है. फिर भी छात्रों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है. बिजली संकट से आम लोगों से लेकर व्यवसायी वर्ग तक प्रभावित है. स्थानीय युवाओं के लिए नौकरी का कोई अवसर नहीं है. अधिकांश गरीब मुस्लिम परिवारों के बच्चे जब थोड़े बड़े होते हैं तो उनके माता-पिता उन्हें स्कूल छोड़ने के बाद मजदूरी करने के लिए भेज देते हैं। अतिरिक्त आय की आशा है. और पिछले चार दशकों से हैदराबाद के मुस्लिम समुदाय के मन में अपनी ख़राब हालत को लेकर गुस्सा जमा हुआ है.

टैक्सी ड्राइवर अरशद ‘ओल्ड सिटी’ का रहने वाला है. वैज़ान वेसी पर हिंसक गुस्सा. उनके शब्दों में, “वेसी ने केवल अपने परिवार के बारे में सोचा। वेसी परिवार खिल गया है। लेकिन आम आदमी नहीं सुधरा. हम तीन दशक पहले जहां थे, हम अब भी अंधेरे में हैं।”

क्रोध के उस छेद वाले रास्ते से माधवीलात का मुस्लिम मोहल्ले में प्रवेश। तीन तलाक बिल पास होने के बाद पहली बार अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाएं इस कानून के फायदे समझाने के लिए मैदान में उतरीं. तब से वह हैदराबाद के मुस्लिम मोहल्ले में रह रहे हैं। मधबीलता खुद कई शैक्षणिक संगठनों और अस्पतालों की अध्यक्ष हैं। इसलिए वह पिछले डेढ़ साल से लगातार स्वास्थ्य शिविर लगा रहे हैं
सालों के लिए जहां स्थानीय मुसलमानों को मुफ्त इलाज का मौका मिला है. उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की है। कुल मिलाकर, वह हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए एक घरेलू नाम बन गया है।

इतने दिनों तक अंबानी-अडानी के खिलाफ बोलने के बाद राहुल चुप क्यों हैं? पार्टी मोदी का समर्थन नहीं करती

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इतने दिनों तक अंबानी-अडानी के खिलाफ बोलने के बाद राहुल चुप क्यों हैं? पार्टी मोदी का समर्थन नहीं करती
कांग्रेस का दावा है कि राहुल के दबाव के कारण मोदी को अपने करीबी दो उद्योगपतियों को निशाना बनाना पड़ा है. कांग्रेस ने अडानी के चार्टर्ड विमान पर मोदी की तस्वीर के साथ भी प्रचार किया है।
आमतौर पर जब मोदी विपक्ष पर निशाना साधते हैं तो पूरी बीजेपी मैदान में उतर जाती है. सोशल मीडिया पर अब अपने नाम के आगे ‘मोदी का परिवार’ लिखने वाले बीजेपी नेता भी मोदी की बात दोहराते रहते हैं. इस बार एक अपवाद था.

मोदी ने बुधवार को तेलंगाना में सवाल उठाया कि पांच साल तक अंबानी-अडानी की बात कर राहुल चुप क्यों रहे? राहुल को उनसे कितने पैसे मिले? कांग्रेस के पास कितने बैग काला धन पहुंचा? लेकिन ये बात किसी बीजेपी नेता ने नहीं सुनी. राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने कल से ही मोदी को चुनौती देते हुए कहा है कि अगर प्रधानमंत्री को पता है कि उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के पास काला धन है तो वह इसे ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग को क्यों नहीं भेज रहे हैं? सीपीआई सांसद विनय विश्वम ने मोदी को पत्र लिखकर यही मांग की है.

कांग्रेस का दावा है कि राहुल के दबाव के कारण मोदी को अपने करीबी दो उद्योगपतियों को निशाना बनाना पड़ा है. कांग्रेस ने अडानी के चार्टर्ड विमान पर मोदी की तस्वीर के साथ भी प्रचार किया है। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेते ने कहा, ”इससे ​​पहले कभी कोई प्रधानमंत्री इतना कमजोर और हताश नहीं दिखा.” वह खुद अब उद्योगपति मित्रों के काले धन की बात कर रहे हैं।”

राहुल का कटाक्ष, टेलीप्रॉम्प्टर की भी झूठ बोलने की सीमा होती है. लेकिन मोदी ऐसा नहीं करते. एक वीडियो संदेश में युवा समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ”नरेंद्र मोदी के हाथ से वोट फिसल रहे हैं. अगले 4-5 दिनों में वह आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ नाटक करेगा. उनके झूठे प्रचार से मूर्ख मत बनो। 4 जून को भारत गठबंधन की सरकार आ रही है. मैं वादा करता हूं, 15 अगस्त तक हम 30 लाख सरकारी नौकरियों की भर्ती शुरू कर देंगे.”

इस पर बीजेपी चुप है. वहीं, तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई ने कहा, ”कांग्रेस 2019 से उद्योगपतियों को बदनाम कर रही है. दरअसल प्रधानमंत्री कहना चाहते थे कि जब राहुल गांधी इतने दिनों से बीजेपी पर उद्योगपतियों से पैसे लेने का आरोप लगा रहे हैं तो अब बताएं कि उन्होंने चुप रहने के लिए कितने पैसे लिए.

मोदी की आज कोई सार्वजनिक बैठक नहीं थी. जेपी नड्डा, अमित शाह ने जनसभाएं कीं लेकिन किसी ने भी मोदी का हमला नहीं दोहराया. कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश का सवाल, ‘आज रफ्तार धीमी क्यों चल रही है?’ झूठ के शहंशाह नरेंद्र मोदी ने कुछ नहीं कहा! क्या वह अपने दो दोस्तों के काले धन के बारे में खुलकर बात करने के बाद उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहे हैं?’

नरेंद्र मोदी इतने समय से दहशत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस हिंदुओं की संपत्ति, घरेलू भैंस, मंगलसूत्र छीनकर मुसलमानों में बांटना चाहती है. इस बार बीजेपी ने प्रधानमंत्री की वित्तीय सलाहकार परिषद की रिपोर्ट का हवाला देते हुए मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी को लेकर ‘हिंदू खतरे में है’ मंत्र के साथ फिर से प्रचार किया.

प्रधानमंत्री की वित्तीय सलाहकार परिषद के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 1950 और 2015 के बीच भारत की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी में 7.8 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़कर 43.15 फीसदी हो गई है. भले ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक इस बारे में खुलकर बात नहीं की है, लेकिन भाजपा नेताओं ने आज मुसलमानों की ‘जनसंख्या वृद्धि’ पर चिंता व्यक्त की। इसके लिए कांग्रेस अल्पमत ने तोषण की राजनीति को जिम्मेदार ठहराया. कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि यह रिपोर्ट नरेंद्र मोदी को ध्रुवीकरण का हथियार सौंपने के लिए प्रधानमंत्री की वित्तीय सलाहकार परिषद ने तैयार की है. मोदी इतने समय से झूठे आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस हिंदुओं की संपत्ति मुसलमानों में बांटना चाहती है. वह प्रचार कर रहे थे कि कांग्रेस दलितों, आदिवासियों, ओबीसी से लेकर मुस्लिमों को आरक्षण देगी. क्योंकि मोदी के पास जातीय जनगणना और ओबीसी को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने के कांग्रेस के वादों का कोई जवाब नहीं था. इस बार मोदी मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि पर अभियान चलाएंगे. क्योंकि पहले तीन दौर के मतदान के बाद वह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ देखकर डर गए हैं.

संदेशखाली पीड़ितों को शिकायत वापस लेने के लिए किया जा रहा है मजबूर

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संदेशखाली पीड़ितों को शिकायत वापस लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है: राष्ट्रीय महिला आयोग ने चुनाव आयोग से भी कहा संदेशखाली की घटना अचानक विपरीत दिशा में मुड़ गयी है. गुप्त कैमरे से कैद किये गये वीडियो में संदेशखाली की महिलाओं का बयान सामने आया है. हालांकि आनंदबाजार ऑनलाइन उस वीडियो की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है. तृणमूल ने राष्ट्रीय महिला आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए जब संदेशखाली महिलाओं के बयान कि उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया गया था, कई वीडियो के माध्यम से फैल गया (आनंदबाजार ऑनलाइन उन सभी वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है)। इस संबंध में उन्होंने कहा कि वे शुक्रवार को चुनाव आयोग से शिकायत करेंगे. उस घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर, राष्ट्रीय महिला आयोग ने चुनाव आयोग में तृणमूल के खिलाफ जवाबी शिकायत दर्ज की।

शुक्रवार को राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख रेखा शर्मा ने मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को पत्र लिखकर शिकायत से अवगत कराया. रेखा ने पत्र में लिखा, संदेशखाली के पीड़ितों पर यातना के आरोप वापस लेने के लिए दबाव डाला जा रहा है. और ये काम जमीनी स्तर के कार्यकर्ता करते हैं. महिला आयोग के मुताबिक, बंगाल की सत्ताधारी पार्टी बनकर तृणमूल ऐसा कर रही है.

एक सप्ताह में संदेशखाली की घटना अचानक विपरीत दिशा में मुड़ गयी है. संदेशखाली-द्वितीय ब्लॉक मंडल अध्यक्ष गंगाधर कयाल, बशीरहाट भाजपा उम्मीदवार और संदेशखाली आंदोलन के चेहरों में से एक रेखा पात्रा और अन्य महिलाओं के बयान गुप्त कैमरों द्वारा कैद किए गए एक के बाद एक वीडियो में सामने आए हैं। आनंदबाजार ऑनलाइन ने इन सभी वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की है। लेकिन उस वीडियो में सभी ये कहते सुनाई दे रहे हैं कि रेप और टॉर्चर के आरोप सच नहीं हैं. गंगाधर को यह भी कहते सुना गया है कि पूरा आंदोलन सुनियोजित है और इसके पीछे बंगाल में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की करतूत है. इन वीडियो को सामने रखकर इस बार तृणमूल ने बीजेपी पर जवाबी हमला बोला है. परिणामस्वरूप राष्ट्रीय महिला आयोग भी ‘विडम्बना’ में पड़ गया है।

क्योंकि, आयोग के प्रमुख खुद ‘पीड़ितों’ के बयान सुनने संदेशखाली आए थे. राहाब महिलाओं के साथ ‘दुर्व्यवहार’ के ख़िलाफ़ थीं. उन्होंने इसकी शिकायत देश के राष्ट्रपति से भी की. लेकिन तृणमूल ने दावा किया कि एक महिला ने आरोप लगाया था कि दिल्ली महिला आयोग के प्रतिनिधि संदेशखाली गए और झूठी बलात्कार की शिकायत पर एक श्वेत पत्र पर हस्ताक्षर किए।

शुक्रवार को तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और तृणमूल प्रवक्ता शशि पांजा ने इस मुद्दे पर अलग से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि रेखा पूरे संदेशखाली कांड में ‘साजिशकर्ता’ थीं. इसलिए तृणमूल चुनाव आयोग से उनके खिलाफ कार्रवाई करने की अपील करने जा रही है. तृणमूल ए ने यह भी कहा कि महिला आयोग प्रमुख ने “अपने पद का दुरुपयोग किया”।

तृणमूल की शिकायत के कुछ ही घंटों के भीतर रेखा का पत्र चुनाव आयोग तक पहुंच गया. रेखा ने कहा कि संदेशखाली की घटना के बारे में विभिन्न मीडिया से मिली खबरों के आधार पर उन्होंने एक जांच समिति का गठन किया. उस समिति के सदस्यों ने संदेशखाली जाकर वहां की महिलाओं से बात की. संदेशखाली की कई महिलाएं आईं और उन्हें बताया कि कैसे संदेशखाली जिला परिषद सदस्य शेख शाहजहां के साथियों ने उनका यौन शोषण किया. इस संबंध में उन्होंने आयोग से लिखित शिकायत भी की. लेकिन अब उन्हें पता चला है कि महिलाओं पर अपनी शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है. बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल क्या कर रही है. रेखा ने अनुरोध किया, “आयोग को इस संबंध में तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।”

स्थानीय बीजेपी नेता गंगाधर कयाल ने संदेशखाली के वीडियो को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. कथित तौर पर उनकी तस्वीर का इस्तेमाल कर एक ‘फर्जी’ वीडियो बनाया गया. इसके बाद ये सोशल मीडिया पर फैल गया. गंगाधर ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में केस दायर करने की इजाजत मांगी है. जस्टिस जॉय सेनगुप्ता की बेंच ने इजाजत दे दी. मामले की सुनवाई अगले सोमवार को होने की संभावना है.

पिछले शनिवार को संदेशखाली का एक वीडियो सामने आया था. जिसने प्रदेश की राजनीति में लगभग हलचल मचा दी है. यह वीडियो संदेशखाली में ‘स्टिंग ऑपरेशन’ या गुप्त कैमरा ऑपरेशन द्वारा बनाया गया था. वहां गंगाधर नजर आये. वीडियो में देखा जा सकता है कि वह खुद अज्ञात लोगों के सामने स्वीकार कर रहे हैं कि उन्होंने संदेशखाली आंदोलन का आयोजन किया था. पैसों के बदले में वहां की महिलाओं ने तृणमूल नेताओं के खिलाफ बलात्कार और प्रताड़ना की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं. हालाँकि, आनंदबाजार ऑनलाइन द्वारा उस वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की गई है।