Home Blog Page 781

आखिर कांग्रेस के घोषणा पत्र की तुलना किस से कर रही है बीजेपी?

हाल ही में बीजेपी ने कांग्रेस के घोषणा पत्र की तुलना एक मुस्लिम घोषणा पत्र से कर दी है! लोकसभा के चुनावी रण में जैसे-जैसे वोटिंग की तारीख करीब आ रहा सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है। हाल ही में कांग्रेस ने इस चुनाव को लेकर पार्टी का घोषणा-पत्र जारी किया। कांग्रेस ने इसका नाम न्याय पत्र दिया है, जिसमें 5 ‘न्याय’ और 25 ‘गारंटी’ का जिक्र किया गया है। हालांकि, कांग्रेस का न्याय पत्र सामने आते ही बीजेपी ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी ने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ‘मुस्लिम लीग की छाप’ नजर आ रही। पीएम मोदी ने पहले बिहार के नवादा, फिर यूपी के सहारनपुर और इसके बाद पुष्कर रैली में भी इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में वही सोच झलकती है, जो आजादी के समय मुस्लिम लीग में थी। जैसे ही ये मुद्दा उठा तो कांग्रेस ने इसे लेकर चुनाव आयोग से शिकायत कर दी। कांग्रेस ने चुनाव आयोग से कहा कि पीएम मोदी ने नवादा, सहारनपुर और पुष्कर की रैलियों में कांग्रेस के घोषणा-पत्र (न्याय पत्र) को पूरी तरह से मुस्लिम लीग की छाप वाला बताया था। साथ ही यह भी कहा था कि न्याय पत्र का जो हिस्सा बचा हुआ है, उस पर वामपंथियों का प्रभाव है। इसे लेकर विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग को छह शिकायतें दी हैं। इनमें दो शिकायत पीएम मोदी को लेकर भी है। कांग्रेस ने भले ही अपनी शिकायत चुनाव से कर दी है। दूसरी ओर बीजेपी ने भी स्पष्ट किया कि उन्होंने किन मुद्दों के आधार पर कांग्रेस के घोषणा-पत्र में मुस्लिम लीग की छाप होने का जिक्र किया है। पार्टी ने इसके लिए मुस्लिम लीग का 88 साल पुराना मेनिफेस्टो पेश किया है।

बीजेपी ने मुस्लिम लीग के 1936 में आए घोषणा-पत्र और कांग्रेस के 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर आए न्याय पत्र में उठाए गए मुद्दों की तुलना की। इसमें उन्होंने तीन प्वाइंट्स को फोकस किया। बीजेपी ने कहा कि 1936 में आए मुस्लिम लीग के घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मुस्लिमों के लिए शरिया पर्सनल लॉ की रक्षा की जाएगी। अब 2024 में कांग्रेस के घोषणा-पत्र में पार्टी ने वादा किया है कि अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ हों। 1936 में आए मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र में उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी बहुसंख्यकवाद के खिलाफ लड़ेगी। कुछ ऐसा ही जिक्र 2024 चुनाव को लेकर आए कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी देखने को मिला है। कांग्रेस ने इसमें कहा है कि भारत में बहुसंख्यकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। बीजेपी ने बताया कि 1936 के मुस्लिम लीग की ओर से जारी मेनिफेस्टो में उन्होंने कहा था कि हम मुसलमानों के लिए खास छात्रवृत्ति और नौकरियों के लिए संघर्ष करेंगे। वहीं 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने जो घोषणा पत्र निकाला है उसमें वादा किया है कि मुस्लिम छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिले, इसे इंश्योर किया जाएगा।

उधर, कांग्रेस ने उसके चुनावी घोषणा़पत्र में ‘मुस्लिम लीग की छाप’ होने संबंधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी को लेकर सोमवार को चुनाव आयोग का रुख किया। इस मामले में कार्रवाई की मांग की। पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के समक्ष इस विषय के साथ कुछ और मुद्दों को रखा। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक और सलमान खुर्शीद, कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा और कांग्रेस कार्य समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य गुरदीप सप्पल शामिल थे। प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार के नवादा जिले में रविवार को एक चुनावी सभा में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया था कि उसके चुनाव घोषणापत्र में मुस्लिम लीग की छाप है। उसके नेताओं के बयानों में राष्ट्रीय अखंडता और सनातन धर्म के प्रति शत्रुता दिखाई देती है।

सलमान खुर्शीद ने कहा कि पीएम मोदी ने अपने भाषणों में कांग्रेस के घोषणा पत्र को झूठ का पुलिंदा कहा है, यह काफी दुखद है। आप किसी भी पार्टी से मतभेद रख सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के घोषणा पत्र के बारे में ऐसा कहना दुखी करने वाली बात है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि यह उन पार्टियों का घोषणा पत्र लगता है, जो हमारे धर्मनिरपेक्ष समाज की आजादी का विरोध कर रहे हैं। हम समझते हैं कि प्रधानमंत्री को ऐसी बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। खुर्शीद ने कहा कि हमने इस मामले को चुनाव आयोग के समक्ष रखा है और उनसे विशेष अनुरोध किया है कि वे इसे गंभीरता से लें और इस पर कार्रवाई करें।

क्या अभी भी फंसा हुआ है बीजेपी के अंदर सीटों का पेंच?

बीजेपी के अंदर सीटों का पेंच अभी भी फंसा हुआ है! देश में पहले और दूसरे फेज के आम चुनावों को लेकर प्रचार जोरों पर है। हालांकि, देश के दो राष्ट्रीय पार्टियों BJP और कांग्रेस की ओर कुछ अहम सीटों पर उम्मीदवारी को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। BJP अब तक 418 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। इसमें पार्टी अब तक 92 मौजूदा सांसदों का टिकट काट चुकी है। इसके अलावा, कुछ सांसद पहले ही विधानसभा चुनाव लड़कर विधायक बन गए हैं। इस तरह BJP अब तक अपने 104 सांसद बदल चुकी है। उसे अभी 35-40 और सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान करना है। पिछले लोकसभा चुनाव में वह 436 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इस बार BJP करीब 450 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। BJP ने अभी कई उन सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान नहीं किया है, जहां कुछ पेच फंसा है। उसने अभी महाराष्ट्र की मुंबई उत्तर मध्य लोकसभा सीट से उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। यह सीट पिछले दो बार से लगातार वही जीत रही है। BJP नेता रहे प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन इस सीट से दो बार सांसद चुनी गईं। वह 2014 और 2019 की चुनाव जीतीं। 2004 और 2009 में इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार जीते थे। कहा जा रहा है कि BJP इस सीट से नया कैंडिडेट दे सकती है। इसी तरह यूपी की कैसरगंज सीट पर भी पेंच फंसा है। BJP ने अभी यहां उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। इसी सीट से मौजूदा सांसद BJP के विवादित नेता बृजभूषण शरण सिंह हैं। वह कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं और महिला पहलवानों ने उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी बृजभूषण को फिर से टिकट देने के मूड में नहीं है। उन्हें इसकी जानकारी देकर यह कहा गया है कि इस सीट पर उनकी जगह उनकी पत्नी या बेटे को चुनाव लड़ाया जा सकता है। हालांकि बृजभूषण इसके लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए मामला अटका हुआ है। BJP ने VIP सीट माने जाने वाली रायबरेली लोकसभा सीट से भी उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है।

कांग्रेस खेमे से जिन कुछ अहम सीटों पर लगातार सस्पेंस बना हुआ है, उनमें उत्तर प्रदेश की अमेठी और रायबरेली के अलावा गठबंधन में दिल्ली में कांग्रेस के खाते में आई तीन सीटों चांदनी चौक, नॉर्थ-ईस्ट और नॉर्थ-वेस्ट की सीट शामिल हैं। अमेठी और रायबरेली पर सस्पेंस कायम होने का एक बड़ा कारण इन सीटों का गांधी परिवार से सीधा संबंध है। इस पर गांधी परिवार के दो सदस्य सोनिया गांधी और राहुल गांधी लड़ते रहे हैं। सोनिया गांधी रायबरेली छोड़कर राज्यसभा चली गई हैं, जबकि राहुल के अमेठी से लड़ने पर सस्पेंस बना हुआ है। हालांकि रायबरेली से प्रियंका गांधी के नाम की चर्चा है। इन सीटों पर बने सस्पेंस पर उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे का कहना है, ‘हमने रणनीति के तहत इन सीटों पर उम्मीदवारी के ऐलान को होल्ड पर रखा है। सही वक्त आने पर इस पर फैसला होगा।’ चर्चा है कि दूसरे फेज के चुनाव के बाद इन सीटों का ऐलान हो सकता है। केरल में दूसरे फेज का चुनाव 26 अप्रैल को होना है, जहां की वायनाड सीट से राहुल गांधी मैदान में हैं। माना जा रहा है कि वहां से चुनाव निबटने के बाद ही अमेठी पर फैसला होगा।

कांग्रेस अब तक तकरीबन 14 लिस्ट के जरिए 244 उम्मीदवारों को ऐलान कर चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, लगभग 60 सीटों पर उम्मीवारी को लेकर तस्वीर साफ होनी बाकी है। पिछले लोकसभा चुनावों में पार्टी 423 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन इस बार यह संख्या कम होने जा रही है। पार्टी के एक अहम रणनीतिकार ने कहा कि पिछली बार पार्टी लगभग सभी जगह अकेले चुनाव लड़ी थी, जबकि इस बार कई राज्यों में गठबंधन है। इस बार पार्टी 300+ सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

अभी तक अमेठी-रायबरेली UP में कुल तीन और दिल्ली की आती सीटों के अलावा ओडिशा, बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड में कुछ सीटें रहती हैं। आखिरी चरण में होने वाले उत्तर भारत के तीन अहम राज्यों हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश को लेकर अभी तक एक भी उम्मीदवार का नाम सामने नहीं आया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, आगामी 13 अप्रैल को पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होनी है। इसके बाद इन राज्यों में तस्वीर साफ हो सकती है। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल और पंजाब मिलाकर कुल कांग्रेस की 29 सीटें बचती हैं। दिल्ली और हरियाणा छोड़ बाकी सभी जगह कांग्रेस अकेले उतरने जा रही है। दिल्ली, गुजरात और हरियाणा में साथ लड़ने वाली कांग्रेस और AAP पंजाब में अलग-अलग मैदान में हैं।

आखिर कांग्रेस में क्या अहमियत रखते हैं के सी वेणुगोपाल?

आज हम आपको बताएंगे कि के सी वेणुगोपाल कांग्रेस में क्या अहमियत रखते हैं! कांग्रेस के संगठन महासचिव के. सी. वेणुगोपाल काफी चर्चा में हैं। यह चर्चा तारीफ से ज्यादा आलोचना के रूप में हो रही है। हाल ही में कांग्रेस से निकाले गए मुंबई के मुखर नेता संजय निरूपम ने के. सी. वेणुगोपाल को लेकर न सिर्फ जमकर निशाना साधा, बल्कि उन्हें पार्टी का पांचवां पावर सेंटर तक करार दिया। निरूपम का कहना था कि पार्टी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अलावा सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के बाद अगला पावर सेंटर वेणुगोपाल हैं। यह कोई पहला मौका नहीं था, जब पार्टी छोड़ने वालों ने उन पर ऐसे आरोप लगाए हों। इससे पहले भी कुछ लोग वेणुगोपाल की ओर इशारा कर चुके हैं। संगठन के भीतर उनके बढ़ते कद और वर्चस्व को लेकर उनकी तुलना लगभग दो दशकों तक सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव रहे अहमद पटेल से होने लगी। वेणुगोपाल राहुल गांधी के काफी करीबी और भरोसेमंद माने जाते हैं। अशोक गहलोत के बाद जब राहुल गांधी ने तमाम सीनियर नेताओं की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए दक्षिण से आए अपेक्षाकृत इस युवा चेहरे को संगठन महासचिव जैसी अहम जिम्मेदारी दी तो पार्टी के भीतर तमाम नजरें तिरछी हुई थीं। समय के साथ वेणुगोपाल इतने मजबूत होते चले गए कि पार्टी के भीतर बाकायदा उनका एक कैंप माना जाने लगा, जिसमें तमाम लोग उनकी गुड लिस्ट में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी मशक्कत करते दिखे। ऐसा नहीं है कि वेणुगोपाल सिर्फ पार्टी छोड़ने वालों के ही निशाने पर हों, बल्कि पार्टी के भीतर भी कई लोग असंतुष्ट बताए जाते हैं।

पार्टी के भीतर उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संगठन महासचिव के दायरे से आगे जाकर पावर हाथ में लेने की कोशिश की है। ऐसा ही एक उदाहरण पार्टी के भीतर कांग्रेस अध्यक्ष और संगठन के चुनाव से जुड़ी एआईसीसी डेलीगेट्स बनाने की प्रक्रिया लेकर दिया जाता है। इसकी लिस्ट वेणुगोपाल की ओर से उनके दस्तखत से जारी की गई है। डेलिगेट्स बनाने का काम पार्टी के केंद्रीय चुनाव संघ का होता है। उनके आलोचकों का कहना था कि पार्टी के आज तक के इतिहास में यह पहला मामला होगा, जहां एआईसीसी डेलिगेट्स की लिस्ट सीईए की बजाय संगठन महासचिव की ओर से जारी की गई हो। यह वेणुगोपाल के बढ़ते प्रभाव का ही संकेत है कि वह पार्टी की तमाम अहम मीटिंग में अक्सर शामिल रहते हैं। पार्टी ने उन्हें I.N.D.I.A. की समन्वयक टीम में भी रखा है। राहुल गांधी से उनकी नजदीकी का संकेत इससे भी मिलता है कि 2019 में यह वेणुगोपाल ही थे, जिन्होंने राहुल गांधी को अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड सीट से न सिर्फ लड़ने का सुझाव दिया, बल्कि उन्हें लड़ने के लिए तैयार भी किया। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दोनों चरणों में वेणुगोपाल लगातार उनके साथ रहे।

छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले वेणुगोपाल फिलहाल राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं। वह केरल की अलापुझा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। स्कूल-कॉलेज में वॉलीबॉल खेलने वाले वेणुगोपाल ने मैथमेटिक्स में मास्टर किया और उसके बाद सक्रिय राजनीति में कदम रखा। केरल के पूर्व सीएम के. करुणाकरण वेणुगोपाल के राजनीतिक गुरु रहे हैं, लेकिन आगे चलकर उनका अपने गुरु से वैचारिक मतभेद हो गया। इसके बाद उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपने समय के तमाम युवा नेताओं को साथ लेकर एक अलग खेमा तैयार किया, जो केरल की आगामी राजनीति की दिशा बदलने का सूत्रधार बना। इस खेमे में उनके साथ रमेश चेनिथल्ला, जी. कार्तिकेयन और एम. आई. शानवाज जैसे लोग थे।

वेणुगोपाल के राजनीतिक गुरु करुणाकरण ने 1991 में पहली बार कासरगोड से उन्हें विधायक का चुनाव लड़ाया, हालांकि वह जीत नहीं पाए। 1996 में वह अलापुझा से पहली बार विधायक चुने गए। समय के साथ वेणुगोपाल इतने मजबूत होते चले गए कि पार्टी के भीतर बाकायदा उनका एक कैंप माना जाने लगा, जिसमें तमाम लोग उनकी गुड लिस्ट में अपनी जगह बनाने के लिए कड़ी मशक्कत करते दिखे। ऐसा नहीं है कि वेणुगोपाल सिर्फ पार्टी छोड़ने वालों के ही निशाने पर हों, बल्कि पार्टी के भीतर भी कई लोग असंतुष्ट बताए जाते हैं।2001 और 2006 में एक बार फिर उन्होंने यहां से असेंबली का रास्ता तय किया। 2004 में वह ओमन चांडी सरकार में मंत्री भी रहे। केरल की राजनीति कर रहे वेणुगोपाल का राष्ट्रीय राजनीति में आना 2009 में तब हुआ, जब वह पहली बार अलापुझा से जीत कर लोकसभा पहुंचे। 2014 में भी वेणुगोपाल यहां से जीते। 2019 में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इस बार एक बार फिर वह इसी सीट से मैदान में हैं।

मयंक यादव को टी20 वर्ल्ड कप 2024 में खेलने का मौका.

0

मयंक यादव उम्र 21 साल. दाएं हाथ के तेज गेंदबाज ने पहले ही जवाब दे दिया है। आईपीएल में उनकी रफ्तार ने सभी को हैरान कर दिया है. नियमित रूप से 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंदबाजी करते हैं. लाइन और लेंथ पर भी नियंत्रण होता है. क्या प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सिर्फ एक मैच खेलने वाला ये मयंक टी20 वर्ल्ड कप खेलने जा रही भारतीय टीम में जगह बना पाएगा?

टी20 वर्ल्ड कप टीम अभी तय नहीं हुई है. हालाँकि, चक्रवर्ती इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण हैं कि अगर आप आईपीएल में अच्छा खेलते हैं, तो आप सीधे विश्व कप टीम में प्रवेश कर सकते हैं। उन्होंने 2021 आईपीएल में अच्छा खेला और विश्व कप टीम में जगह बनाई। मयंक का नाम भी उस लिस्ट में आ सकता है. टी20 टीम में तेज गेंदबाज के तौर पर यशप्रित बुमरा की जगह पक्की है. लेकिन उनका पार्टनर कौन होगा? मोहम्मद शमी घायल. वह पाया नहीं जा सकता. मोहम्मद सिराज इस बार आईपीएल में जिस फॉर्म में हैं, उसे देखते हुए हैदराबाद के तेज गेंदबाज को टीम में शामिल करने पर सवाल उठ सकता है। वह हर मैच में रन दे रहे हैं. सीनियर पेसर होने के बावजूद सिराज जिम्मेदारी के साथ खेलने में नाकाम रहे. नतीजतन, यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी जगह पक्की है. तो फिर कौन होगा बुमराह का पार्टनर?

मुकेश कुमार, आकाश दीप, प्रसिद्ध कृष्णा और अबेश खान जैसे तेज गेंदबाजों को भारतीय क्रिकेट बोर्ड के साथ बुमराह, सिराज, शमी के वार्षिक अनुबंध से बाहर कर दिया गया है। मुकेश इस बार आईपीएल में नियमित नहीं हैं. उन्होंने 2 मैचों में 4 विकेट लिए. आकाश ने इस आईपीएल में अब तक सिर्फ एक ही मैच खेला है. प्रशीद को चोट लगी है. अबेश ने पांच मैचों में सिर्फ तीन विकेट लिए हैं. ऐसे में मयंक निश्चित तौर पर टी20 वर्ल्ड कप टीम में एंट्री के लिए दावेदारी कर सकते हैं. अर्शदीप सिंह मयंक से लड़ेंगे. बाएं हाथ का तेज गेंदबाज इस आईपीएल में 5 मैचों में 8 विकेट लेकर ऑरेंज हैट के लिए संघर्ष कर रहा है। उसका परीक्षण किया जाता है. उन्होंने 2022 टी20 वर्ल्ड कप भी खेला था. उन्होंने देश की जर्सी में 44 टी20 खेले हैं. उन्हें इस साल अफगानिस्तान के खिलाफ टी20 टीम में भी शामिल किया गया था. परिणामस्वरूप, वह विश्व कप टीम में बने रह सकते हैं।

मयंक ने वहां तीन मैच खेले. इनमें से एक मैच में वह एक ओवर फेंकने के बाद मैदान से बाहर चले गये थे. उसकी पीठ में दर्द है. मयंक ने दो मैचों में 6 विकेट लिए. उन दोनों मैचों में उन्हें मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला। मयंक की तेजी देखकर इयान बिशप ने कहा, ”मैं एक दोस्त से मयंक यादव के बारे में बात कर रहा था. ऐसी प्रतिभा का प्रबंधन किया जाना चाहिए. अगले दो साल तक उन्हें एक पर्सनल ट्रेनर, एक डॉक्टर की जरूरत पड़ेगी. उसका ख्याल रखना होगा।” इस बात के प्रमाण मिले हैं कि बिशप के विचार अचूक नहीं थे। मयंक चोट के कारण टीम से बाहर हैं. लखनऊ सुपर जायंट्स के सीईओ विनोद बिस्ट ने कहा, ”मयंक पेट दर्द से पीड़ित थे। इसीलिए उन्हें हटा दिया गया. हो सकता है कि वह इस सप्ताह दोबारा न खेलें। मयंक को आराम की जरूरत है. लेकिन वह जल्द ही मैदान पर वापसी करेंगे।”

अगर मयंक टी20 वर्ल्ड कप से पहले ठीक हो जाते हैं और अपनी फॉर्म बरकरार रखते हैं तो इसकी बिल्कुल भी संभावना नहीं है. बंगाल के सहायक कोच सौराशीष लाहिड़ी ने कहा, ”भारत में अब एक से एक तेज गेंदबाज उभर रहे हैं. अलग-अलग राज्यों से युवा तेज गेंदबाज उभरकर सामने आ रहे हैं। इसके पीछे राज्य स्तरीय प्रशिक्षकों का होना जरूरी है. अचानक इतने सारे तेज गेंदबाज उठ नहीं सकते. उनके लिए समय देना होगा. आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि आप कितने मैच खेलेंगे। यदि नहीं, तो तेज गेंदबाज घायल हो जायेंगे। अगर मयंक ठीक हो जाते हैं और उसी गति से गेंदबाजी करते हैं तो उन्हें मौका मिल सकता है.” मयंक को उनके पिता ने बनाया था. उन्होंने अपने बेटे के आईपीएल में अच्छा खेलने को लेकर बड़े सपने देखना शुरू कर दिया है. मयंक के पिता ने कहा, ”जब वह 12 साल का था तो मुझे पता था कि वह क्रिकेटर बनेगा. वह मेरा हाथ पकड़ कर खेलने लगा. 14 साल की उम्र में जब वह पहली बार ट्रायल के लिए गए तो वह बाकियों से आगे थे। इसके बाद भी मयंक ने कड़ी मेहनत की. मुझे कभी नहीं छोड़ा. मैं 100 फीसदी आश्वस्त हूं और भारतीय टीम में खेलूंगा।”

हालांकि मयंक खुद अभी टी20 वर्ल्ड कप में खेलने के बारे में नहीं सोच रहे हैं. उनके दिमाग में सिर्फ आईपीएल ही है. मयंक ने कहा, ”मैं अभी टी20 वर्ल्ड कप के बारे में नहीं सोच रहा हूं. मैं बस अच्छा कहना चाहता हूं. अब अच्छा कह रहा हूं तो अच्छा लग रहा है. मैं वर्तमान प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं. मैं फिलहाल आईपीएल पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं।” हालांकि, यह कहते हुए कि वह निश्चित रूप से भारतीय टीम में खेलना चाहते हैं, मयंक ने कहा, ‘लगातार दो मैचों में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिलना अच्छा लगता है। लेकिन दोनों मैच जीतने से ज्यादा खुशी है. मेरा असली लक्ष्य देश के लिए खेलना है।’ यात्रा अभी शुरू हुई है।”

मयंक से पहले आईपीएल में उमरान मलिक की चर्चा थी. वह 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भी गेंदबाजी कर सकते थे. लेकिन वो चर्चा एक सीज़न में ही ख़त्म हो गई. अब उमरान को हर मैच में जगह भी नहीं मिलती. हालाँकि, मयंक और उमरान के बीच एक अंतर है। मयंक का लाइन और लेंथ पर नियंत्रण है. उमरान के पास वह नहीं था. वर्तमान बल्लेबाजों को केवल गति के आधार पर रोका नहीं जा सकता। इसलिए उमरान को पहले कुछ दिनों तक सफलता मिली लेकिन अब वह छिप गया है। देखूंगा मयंक क्या करता है. हालांकि, लखनऊ के गेंदबाजी कोच मोर्नी मोर्कल ने कहा, ‘मयंक ने न सिर्फ अच्छी गेंदबाजी की बल्कि अहम विकेट भी चटकाए. पिछला सीजन उनके लिए अच्छा नहीं गया था. वह पहले तैयारी मैच में घायल हो गये थे. मैंने उनसे केवल एक ही बात कही, अच्छा क्रिकेट खेलने के लिए आपको बुनियादी चीजें सही करने की जरूरत है। मैंने आपसे कहा था कि गेंद की लाइन और लेंथ को लेकर सावधान रहें। मयंक यही करने की कोशिश करता है। मैच में कुछ अतिरिक्त करने की कोशिश नहीं की. उनकी गेंद की गति एक प्लस है।”

भारतीय बल्लेबाज विराट कोहली ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज मिशेल जॉनसन के बारे में बात की.

0

विराट कोहली का नाम अब कई गेंदबाजों के लिए एक बुरे सपने जैसा है. कई बड़े गेंदबाज ये नहीं सोचते कि उन्हें कैसे बताया जाए. लेकिन विराट आज भी 10 साल पहले मिचेल जॉनसन की एक गेंद को नहीं भूल पाए हैं. उस समय जॉनसन उनका आतंक बन गया था.

2014 में भारत ऑस्ट्रेलिया में खेलने गया था. उस दौरे पर विराट टेस्ट कप्तान बने थे. महेंद्र सिंह धोनी ने दिया इस्तीफा. दौरे की शुरुआत में विराट ने एक घटना का जिक्र किया. बताते हैं कि कैसे सारी योजनाएँ बदल गईं जब जॉनसन का एक बाउंसर उनके सिर पर लगा। विराट ने कहा, ”दौरे के पहले मैच में जॉनसन की पहली गेंद उनके सिर पर लगी. यह बहुत बड़ा सदमा था. यह अविश्वसनीय लग रहा था।”

विराट पहले मैच में 31वें ओवर में बल्लेबाजी कर रहे थे. जॉनसन कह रहा था. और कुछ ही देर में लंच ब्रेक. जॉनसन ने पहली गेंद उछाली. विराट गेंद की लाइन से अपना सिर नहीं हटा सके. गेंद हेलमेट पर जोर से लगी. विराट ने कहा, ”मैं दो महीने से जॉनसन के खिलाफ खेलने की तैयारी कर रहा था। मैं कल्पना कर रहा था कि गेंद को कैसे खेलूं। लेकिन गेंद हेलमेट पर लगने के बाद सारी योजनाएं बदल गईं. यह बहुत तेज़ था. मेरी आँखों में सरशेफुल दिख रहा था. बायीं आंख सूजी हुई थी. हालाँकि उस समय मुझे यह समझ नहीं आया था।” 2013-14 में विराट और जॉनसन के बीच लड़ाई काफी तीखी रही थी. जॉनसन उस समय बल्लेबाजों के लिए एक आतंक था। विराट को भी धीरे-धीरे अपनी जाति का पता चल रहा है. विराट ने जॉनसन के सिर पर गेंद लगने के बाद उनके रवैये के बारे में बात की. उन्होंने कहा, ”दोपहर के भोजन के दौरान मेरे पास सोचने का समय था. मुझे लगा कि मेरे पास दो विकल्प हैं। एक तो मैं लड़ूंगा, दो मैं भाग जाऊंगा। मैंने पहला चुना. मैंने सोचा कि उसकी मेरे सिर पर मारने की हिम्मत कैसे हुई। जॉनसन एक के बाद एक चौका लगाते नजर आए. वही मैंने किया।”

विराट कोहली ने आईपीएल में अब तक सबसे ज्यादा रन बनाए हैं. लेकिन गुरुवार को वह दौड़ नहीं सके. महज 3 रन पर आउट हो गए. इसके बाद पाकिस्तान के तेज गेंदबाज जुनैद खान ने विराट की आलोचना की. वह विराट का नाम लेने की हिम्मत नहीं कर सके. लेकिन उन्होंने अपने स्ट्राइक रेट को लेकर मजाक किया.

जुनैद ने पाकिस्तान के लिए 22 टेस्ट खेले. 76 वनडे मैच खेले. उन्होंने टी20 खेला है. उस तेज गेंदबाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. वहां उन्होंने विराट का नाम लिए बिना लिखा, ”स्ट्राइक रेट 33.33”. उन्होंने हैशटैग में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और मुंबई इंडियंस का नाम लिखा। विराट ने गुरुवार को मुंबई के खिलाफ 9 गेंदों पर 3 रन बनाए। उनका स्ट्राइक रेट 33.33 है. इसमें कोई शक नहीं कि जुनैद का इशारा विराट की तरफ था.

यह पहली बार नहीं है, जुनैद इससे पहले भी विराट की आलोचना कर चुके हैं. विराट ने इस बार आईपीएल में शतक लगाया. लेकिन उन्होंने ये रन बनाने के लिए आईपीएल के इतिहास में सबसे ज्यादा गेंदें खेलीं. राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ उस पारी के तुरंत बाद जुनैद ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘आईपीएल इतिहास का सबसे धीमा शतक बनाने के लिए विराट को बधाई।’ विराट ने इस आईपीएल में अब तक 319 रन बनाए हैं. शतक बनाया. दो अर्द्धशतक बनाए. विराट अब नारंगी टोपी के मालिक हैं. उनके नाम आईपीएल में 7500 से ज्यादा रन हैं. विराट ने भारत के लिए टी20 में 4037 रन बनाए हैं. ऐसे ही एक क्रिकेटर पर जुनैद ने व्यंग्य किया है.

बाएं हाथ के तेज गेंदबाज को 2019 के बाद पाकिस्तान के लिए खेलने का मौका नहीं मिला। जुनैद ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 107 मैचों में कुल 189 विकेट लिए। इनमें 22 रेड बॉल मैचों में उनके नाम 71 विकेट हैं। टी20 में उन्होंने 9 मैचों में 8 विकेट लिए. जुनैद ने आखिरी बार घरेलू क्रिकेट 2022 में खेला था। 11 अप्रैल: वानखेड़े स्टेडियम में भीड़ ने हार्दिक पंड्या की फिर से हूटिंग की। विराट कोहली ने उन्हें शांत करने के लिए हाथ जोड़कर विनती की.

रोहित शर्मा की जगह हार्दिक को मुंबई इंडियंस का कप्तान बनाए जाने की घोषणा के बाद से क्रिकेट प्रेमियों का एक वर्ग नाराज है। घरेलू मैदान वानखेड़े में दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ पिछले मैच में भी उन्हें भीड़ के तानों का शिकार होना पड़ा था। यह दिन कोई अपवाद नहीं था. मुंबई बनाम आरसीबी मैच के दौरान दोनों टीमों के कई क्रिकेटरों ने हार्दिक पर तंज कसना बंद करने का अनुरोध किया। और जब मुंबई के कप्तान बल्लेबाजी करने उतरे तो विराट दर्शकों से उनके नाम पर जीत का नारा लगाने के लिए कहते दिखे!

हार्दिक के पक्ष में खड़े होते हुए विराट ने ये भी कहा कि गौतम गंभीर के साथ उनका मनमुटाव खत्म हो गया है. नवीन उल हक से कोई विवाद नहीं है. एक कार्यक्रम में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के स्टार को यह कहते हुए सुना गया, “लोग मेरे व्यवहार से निराश हैं। मैंने नवीन को गले लगा लिया. उस दिन गौती भाई ने मुझे गले लगाया. परिणामस्वरूप, अब कोई मसाला नहीं रह गया है। इसलिए लोग निराश हैं. वे मजाक उड़ा रहे हैं. अरे, क्या हम अभी भी बच्चे हैं!

गिरफ्तारी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 15 अप्रैल को सुनवाई करेगा.

0

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में केजरी के मामले की सुनवाई हुई, जेल हिरासत के बाद केजरी ने ईडी की गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में केस दायर किया. लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि ईडी की गिरफ्तारी अवैध नहीं थी. उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उत्पाद शुल्क मामले में अरविंद केजरीवाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा. दिल्ली के मुख्यमंत्री के मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त की खंडपीठ द्वारा किये जाने की संभावना है। केजरी ने ईडी की गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में केस दायर किया. लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि ईडी की गिरफ्तारी अवैध नहीं थी. आम आदमी पार्टी (आप) प्रमुख ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

केजरीवाल को दिल्ली एक्साइज मामले में ईडी ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था. इसके बाद आप प्रधान ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया. पिछले मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि केजरी की गिरफ्तारी अवैध नहीं थी. ईडी ने कोर्ट को बताया कि उनके पास केजरी के खिलाफ सबूत हैं. केंद्रीय जांच एजेंसी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री की पहचान उत्पाद शुल्क मामले के ‘प्रमुख’ के रूप में भी की है। इसके अलावा उन पर जांच में सहयोग न करने का भी आरोप है. इसलिए, उच्च न्यायालय की टिप्पणी है कि गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा दायर याचिका समय की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया. पिछले बुधवार को उनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने केजरी के मामले की जल्द सुनवाई की अपील की थी. लेकिन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने इसे खारिज कर दिया. सूत्रों के मुताबिक, मामले की सुनवाई सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में होगी.

वहीं, 1 अप्रैल को दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने केजरीवाल को एक्साइज मामले में 14 दिन जेल में रखने का आदेश दिया था. उप प्रधान की जेल अवधि सोमवार को समाप्त हो रही है। केजरी को 15 अप्रैल को राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया जाएगा. दिल्ली एक्साइज मामले में ईडी ने 100 करोड़ के लेनदेन का मामला दर्ज किया था. केंद्रीय जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) नेता के कविता ने आप नेताओं को फायदे के बदले 100 करोड़ रुपये दिए थे! इस बार एक और केंद्रीय एजेंसी सीबीआई ने शुक्रवार को कोर्ट में दावा किया कि दक्षिणी शराब डीलर से 100 करोड़ रुपये लेने में कविता की सक्रिय भूमिका थी.

तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव की बेटी कविता को ईडी ने उत्पाद शुल्क मामले में गिरफ्तार किया है। कोर्ट के आदेश पर वह तिहाड़ जेल में थे. मामले की जांच के लिए गुरुवार को सीबीआई ने तिहाड़ जाकर चंद्रशेखर-कन्या से पूछताछ की. इसके बाद जांच एजेंसी ने उन्हें जेल के अंदर से गिरफ्तार कर लिया.

शुक्रवार को सीबीआई ने कविता को कोर्ट में पेश किया. उन्होंने उसे अपनी हिरासत में लेने के लिए आवेदन किया. सीबीआई ने कोर्ट में दावा किया, ”16 मार्च 2022 को एक दक्षिण भारतीय शराब कारोबारी दिल्ली गया और मुख्यमंत्री कार्यालय में अरविंद केजरीवाल से मिला. बिजनेसमैन बिजनेस करने के लिए केजरीवाल की मदद चाहता है. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया. साथ ही इस मामले पर चर्चा के लिए कविता से संपर्क करने को भी कहा. यहां तक ​​कि, सुविधा पाने के लिए पैसे की भी मांग की गई।” इसके तुरंत बाद, सीबीआई ने दावा किया, ”तेलंगाना की बीआरएस नेता कविता ने शराब डीलर से संपर्क किया। उन्हें हैदराबाद में मिलने के लिए कहा गया. कविता से मुलाकात के दौरान बिजनेसमैन ने केजरी का जिक्र किया. संयोग से, विजय को ईडी ने एक उत्पाद शुल्क मामले में गिरफ्तार किया था।

केंद्रीय जांच एजेंसी ने कोर्ट में शिकायत की, ”कविता ने बिजनेसमैन से कहा, ‘हमें 100 करोड़ रुपये देने होंगे. तभी बीआरएस नेता ने उन्हें 50 करोड़ रुपये देने की पेशकश की.’

दिल्ली एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में ईडी ने 15 मार्च को कविता के हैदराबाद स्थित घर पर छापा मारा था. तलाशी और पूछताछ चल रही है. दोपहर बाद उन्हें घर से गिरफ्तार कर लिया गया और दिल्ली ले जाया गया। कविता ने दावा किया कि ईडी की गिरफ्तारी ‘अवैध’ थी. उन्होंने गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद कविता ने निचली अदालत में जमानत के लिए अर्जी दी. लेकिन दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी. पिछले मंगलवार को कविता को 14 दिन जेल में रखने का आदेश दिया गया था. इसी बीच सीबीआई ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया.

एनएचआरसी ने संदेशखाली घटना पर राज्य प्रशासन से उनकी सिफारिशों पर रिपोर्ट मांगी है.

0

सन्देशखाली-किस उपाय की सिफ़ारिश? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग दो महीने के भीतर नबन्ना से जवाब चाहता है. संदेशखाली में शाहजहां की सेना पर ग्रामीणों की जमीन पर जबरन कब्जा करने का आरोप लगाया गया है. इसे देखते हुए आयोग की सिफारिश है कि ‘कब्जी की गई’ जमीन को उसके असली मालिकों को लौटाया जाए। संदेशखाली में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे थे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी उस शिकायत को स्वीकार कर लिया गया. आयोग के अनुसार, संदेशखाली घटना में “मानवाधिकार उल्लंघन की कई घटनाएं” हुई हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने में लापरवाही को लेकर प्रशासन पर उंगलियां उठती रही हैं. इतना ही नहीं, आयोग ने संदेशखाली की स्थिति को ‘सामान्य’ बनाने के लिए 12 बिंदुओं की सिफारिश की है. राज्य प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वह उस अनुशंसा के आधार पर की गयी कार्रवाई से दो सप्ताह के भीतर मुख्य सचिव और राज्य पुलिस महानिदेशक को अवगत करायें.

कई मीडिया रिपोर्टों के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 21 फरवरी को संदेशखालीकांड पर स्वतःस्फूर्त कार्रवाई की. आयोग की एक टीम ने वहां की स्थिति देखी. उसके आधार पर कुल 12 बिंदुओं की अनुशंसा की गयी है. सिफारिशों में संदेशखाली में कानून के शासन में लोगों का विश्वास बहाल करना, आपराधिक कृत्यों के गवाहों को सुरक्षा प्रदान करना और शिकायतों का निपटारा करना, यौन अपराधों के पीड़ितों के लिए परामर्श और पुनर्वास प्रदान करना शामिल है।

संदेशखाली में शाहजहां शेख और उनकी सेना पर ग्रामीणों की जमीन पर जबरन कब्जा करने का आरोप लगाया गया था. इसे देखते हुए मानवाधिकार आयोग की सिफारिश है कि ‘जब्त’ की गई जमीन को उसके वैध मालिकों को लौटा दिया जाए. इसके अलावा, आयोग की सिफारिशों में केंद्रीय जांच एजेंसी (ईडी) द्वारा की गई शिकायतों की निष्पक्ष जांच, स्थानीय लोगों की जागरूकता बढ़ाना, उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करना, कब्जे वाली भूमि को खेती के लिए उपयुक्त बनाना, जांच करना शामिल है। संदेशखाली पुलिस स्टेशन क्षेत्र में ‘लापता’ लड़कियों को बचाया गया। आयोग ने राज्य पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को दो महीने के भीतर एक रिपोर्ट सौंपने को कहा है ताकि पता चल सके कि इन सिफारिशों के आधार पर प्रशासन क्या कदम उठा रहा है. आयोग के मुताबिक संदेशखाली लोगों के मन से ‘डर निकालना’ और उनके ‘अच्छे स्वास्थ्य के साथ जीने के अधिकार’ को सुनिश्चित करना जरूरी है. आयोग ने कहा कि संदेशखालिकांडे में पुलिस-प्रशासन द्वारा 25 मामले दर्ज किये गये हैं. आयोग की टिप्पणियों के अनुसार, ‘अत्याचार’ झेलने वाले कई ग्रामीण आरोपियों के राजनीतिक प्रभाव के कारण चुप रहे। इसके अलावा आयोग ने संदेशखाली में पक्षपात और मतदान के अधिकार में बाधा डालने के आरोपों पर भी चिंता व्यक्त की है.

सरकारी पैसा नौ हो गया! महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया है! प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शाहजहां शेख के भाई शेख आलमगीर, पार्टनर शिवप्रसाद हाजरा के खिलाफ यह आरोप दर्ज किया है. संदेशखाली में भेड़ रखने और डराने-धमकाने के आरोपों की जांच के बाद ईडी के अधिकारियों ने स्थानीय लोगों के बयान एकत्र किए हैं. उसी बयान के आधार पर ईडी की विशेष अदालत ने केंद्रीय जांच एजेंसी से यह मांग की है. हालांकि, सुरक्षा की दृष्टि से ईडी ने कोर्ट में गवाहों के नाम का खुलासा नहीं किया है.

शाहजहां के भाई आलमगीर, साथी शिवप्रसाद हाजरा और कार्यकर्ता दीदार मोल्ला को शुक्रवार को विशेष ईडी अदालत में पेश किया गया। जज ने उन्हें 22 अप्रैल तक ईडी की हिरासत में भेज दिया. ईडी ने अदालत में दावा किया कि भूमि अधिग्रहण के पैसे को सफेद करने के लिए शाहजहां की कंपनी से करोड़ों रुपये आलमगीर, शिबू और दीदार के खातों में गए। ईडी के अधिकारियों ने यह जानने के लिए संदेशखाली के कई लोगों से बात की कि आलमगीर ने वह पैसा कैसे कमाया। उनके बयान अदालत में पेश कर दिए गए हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से उनकी पहचान उजागर नहीं की गई है।

6 अप्रैल को ईडी को दिए बयान में संदेशखाली के एक निवासी ने दावा किया कि आलमगीर और शिबू ने सरकारी पैसा चुराया है. महिलाओं का अपहरण कर लिया. उसने महिला कर्मियों का यौन उत्पीड़न किया. उन्होंने यह भी दावा किया कि आलमगीर चारों तरफ बंदूकें लेकर घूमता था. लोगों को धमकाया. 2 अप्रैल को एक व्यक्ति ने इसी दावे की गवाही दी. आलमगीर हमेशा अपनी जेब में बंदूक रखता था. वह जब भी अपने ऑफिस आता था तो बंदूक लेकर आता था। शाहजहाँ के नाम पर उसका भाई ज़मीन छीन लेता था, उगाही करता था, धमकी देता था और हत्या भी कर देता था। 1 अप्रैल को एक शख्स ने शाहजहां के भाई आलमगीर के खिलाफ भी ईडी अधिकारियों के पास डकैती की शिकायत दर्ज कराई थी. उसने दावा किया कि वह आम लोगों को डराने के लिए उनसे उगाही करता था, धमकी देता था और लूटपाट करता था।

400 पार वाले नारे के लिए भाजपा के बारे में क्या बोले कन्हैया कुमार?

हाल ही में कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने भाजपा के 400 पार वाले नारे के लिए एक बयान दिया है! कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने बीजेपी के ‘400 पार’ के नारे को ‘परसेप्शन मैनेजमेंट’ और वास्तविकता बदलने का कुत्सित प्रयास करार दिया। उन्होंने कहा कि बीजेपी को हार का डर है और ऐसे में वह देश को धोखा देने की कोशिश कर रही है। कन्हैया कुमार ने ‘पीटीआई’ के साथ बातचीत में यह सवाल भी किया कि जो नेता कांग्रेस में रहकर चुनाव नहीं जीत सकते, उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के लिए भला क्या उपयोगिता है? उन्होंने साथ ही कहा कि पहले सत्ता में रहे दलों की कहीं न कहीं यह विफलता रही कि लोग ‘बीजेपी के अतिवाद’ की तरफ आकर्षित हो गए, लेकिन यह स्थिति कभी भी बदल सकती है क्योंकि भारत का समाज प्रेम, समानता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता के साथ खड़ा होता है। यह पूछे जाने पर कि बीजेपी ‘400 पार’ का नारा दे रही है, तो ऐसे में क्या यह नहीं लगता कि विमर्श की लड़ाई में विपक्ष कहीं पीछे छूट रहा है। कन्हैया कुमार ने इस पर रिएक्ट करते हुए कहा कि इस बात में ही बीजेपी की हताशा झलकती है, हार का डर झलकता है। क्या आपने सुना है कि भारतीय क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से मैच खेलने गई हो और मैच से पहले कह रही हो, 400 पार। नहीं कहती है। कहती है कि अच्छा खेलेंगे और विश्व कप जीतेंगे। कन्हैया कुमार ने दावा किया कि ‘परसेप्शन मैनेजमेंट’ से वास्तविकता को बदलने की कोशिश की जा रही है।

कन्हैया कुमार ने आगे कहा कि धारणा के आधार पर वास्तविकता को बदलने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। अगर 400 पार हो ही रहा है तो ‘फुके हुए कारतूसों’ को अलग-अलग जगह से अपनी पार्टी में शामिल कराने का क्या मतलब है? मान लीजिए आप मैच जीत रहे हैं तो ऑस्ट्रेलिया के कप्तान को घूस देने का क्या मतलब है या उसके संन्यास ले चुके खिलाड़ियों को अपने साथ लेने की क्या जरूरत है? कन्हैया ने सवाल किया कि अगर कोई कांग्रेस में रहकर चुनाव नहीं जीत रहा है तो बीजेपी में उसकी क्या उपयोगिता है? उन्होंने कांग्रेस के कई नेताओं के पाला बदलने का हवाला देते हुए कहा कि आप जिन लोगों को बुरा-भला कहते थे अब उनकी तारीफ कर रहे हैं। कई ऐसे लोग थे जिन्हें राष्ट्रविरोधी शब्द से संबोधित किया जाता था, लेकिन अब वे बीजेपी में हैं। ऐसा लगता है कि बीजेपी को बेशर्मी की खदान हाथ लग गई है जब मौका मिलता है थोड़ी बेशर्मी निकाल लाती है। जो टीवी स्टूडियो में मुर्गे की तरह लड़ रहे थे, अब एक तरफ जाकर बैठे हैं।

कन्हैया कुमार ने दावा किया कि क्या यह 400 पार का आत्मविश्वास है? यह धोखा है। यह देश को धोखा देने का कुत्सित प्रयास है। यह इसलिए कहा जा रहा है ताकि 400 की संख्या में हजारों सवालों को गायब कर दिया जाए। कोई पूछे नहीं कि पेट्रोल 100 के पार क्यों चला गया, इतनी महंगाई क्यों है? कहते हैं कि अर्थव्यवस्था पांच हजार अरब डॉलर के पार जा रही है। अगर ऐसा है तो 80 करोड़ लोग कौन हैं जिन्हें मुफ्त का अनाज दिया जा रहा है और सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। उन्होंने कहा कि वास्तविकता छिपाने का बार-बार प्रयास किया जा रहा है। यह देश के उन लोगों का अपमान है जिन्हें वोट देना है। अगर पहले से तय है कि सीट 400 पार होनी ही हैं तो चुनाव क्यों करा रहे हैं?

कन्हैया कुमार ने कहा कि यह ‘परसेप्शन’ धारणा बनाने का खेल है। कांग्रेस इसे समझ रही है। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी के समय में ‘इंडिया शाइनिंग’ की धारणा पैदा की गई थी, लेकिन चुनावी नतीजे आए तो पता चला कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार चली गई और यूपीए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी। यह पूछे जाने पर कि हालिया चुनावी सफलताओं में नजर आई बीजेपी की बढ़ती स्वीकार्यता का कारण क्या है और क्या ऐसा कांग्रेस के नेतृत्व के कारण है। कन्हैया कुमार ने कहा कि बीजेपी अतिवाद, हिंसा और नफरत को प्राथमिकता देती है और दूसरी तरफ गांधी का विचार है जिसमें सर्वधर्म समभाव, एकता और प्रेम है। कन्हैया कुमार ने कहा कि जो पुरानी पार्टियां हैं, जो सत्ता में रही हैं उनकी विफलता को हम छिपाने का प्रयास नहीं कर रहे। कहीं न कहीं हमारी विफलता है। यह बात कैमरे के सामने स्वीकार करते हैं। अगर हम अपनी चीजों को जनता तक उनकी भाषा में लेकर जाते, विश्वास को बनाकर रखते तो लोग अतिवाद की तरफ नहीं जाते, क्योंकि अतिवाद इस समाज का स्वभाव नहीं है। उन्होंने कहा कि अतिवादी विचार समाज में हावी उस समय होता है जब मानवीय गुण क्षीण हो जाता है तथा यह सामाजिक राजनीतिक संकट है। कांग्रेस नेता ने कहा कि पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यह बदलेगा। अंतत: समाज प्रेम, समानता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता के साथ जाता है।

क्या है CPEC वाले ग्वादर पोर्ट की ऐतिहासिक कहानी?

आज हम आपको CPEC वाले ग्वादर पोर्ट की ऐतिहासिक कहानी बताने जा रहे हैं! इंदिरा गांधी सरकार के दौरान ‘कच्चातिवु’ द्वीप श्रीलंका को दिए जाने का मुद्दा 50 साल बाद लोकसभा चुनाव में भी गूंज रहा है। इस मुद्दे पर बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तकरीबन हर रैलियों में इस मुद्दे को उठाते हुए कांग्रेस को घेर रहे हैं। उस पर देश की संप्रभुता से समझौते का आरोप लगा रहे हैं। कच्चातिवु द्वीप तो भारत ने 1974 में श्रीलंका को दिया था लेकिन 1950 के दशक में ही भारत के हाथ से एक महत्वपूर्ण बंदरगाह फिसल गया था। यहां बात हो रही ग्वादर पोर्ट की। वही ग्वादर पोर्ट जो अब पाकिस्तान में है और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा का अहम हिस्सा है। ओमान ने 1950 के दशक में भारत को ग्वादर बेचने की पेशकश की थी, जो उस समय एक छोटा मछली पकड़ने वाला गांव था। हालांकि, तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। 1950 के दशक में ओमान से मिले ऑफर को तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू सरकार ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान ने 1958 में इसे तीन मिलियन पाउंड में खरीद लिया। कैसे ग्वादर, जो आज एक रणनीतिक पोर्ट है कभी भारत का हो सकता था, लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने इस प्रस्ताव को क्यों ठुकराया? जानिए ग्वादर से जुड़ा पूरा इतिहास।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत स्थित मकरान तट पर ये ग्वादर पोर्ट स्थित है। शुरू में ये क्षेत्र हथौड़े के आकार का नजर आता था, जिसे लोग मछली पकड़ने वाला गांव कहते थे। हालांकि, आज ये पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है। चीन के सपोर्ट से अब ये क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर नजर आ रहा। हालांकि, ग्वादर हमेशा पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था। ग्वादर 1783 से ओमान के सुल्तान के कब्जे में था। यह 1950 के दशक तक करीब 200 वर्षों तक ओमानी शासन के अधीन था। 1958 में ग्वादर आखिरकार पाकिस्तानी कब्जे में आया। हालांकि, इससे पहले ओमान ने ग्वादर को भारत की सरकार को ऑफर किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।

रिटायर्ड ब्रिगेडियर गुरमीत कंवल ने 2016 में एक ओपिनियन पीस ‘द हिस्टोरिक ब्लंडर ऑफ इंडिया नो वन टॉक्स अबाउट’ में इस बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ओमान के सुल्तान से बेशकीमती गिफ्ट स्वीकार नहीं करना देश की आजादी के बाद हुई रणनीतिक भूलों की लंबी लिस्ट में एक और बड़ी गलती थी। पाकिस्तान के पास ये क्षेत्र जाने से पहले कलत के खान, मीर नूरी नसीर खान बलूच ने मस्कट के राजकुमार, सुल्तान बिन अहमद को यह एरिया उपहार में दिया था। आर्किविस्ट मार्टिन वुडवर्ड के लेख ‘ग्वादर: द सुल्तान पजेशन’ के अनुसार, 1895 और 1904 के बीच कलत के खान और ब्रिटिश इंडिया सरकार दोनों की तरफ से ओमान से ग्वादर खरीदने के लिए प्रस्ताव दिए गए, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया गया।

विशेष रूप से, यह वही कलत के खान था जिसने बलूचिस्तान पर शासन किया था, जब तक कि इसे मार्च 1948 में मुहम्मद अली जिन्ना के अधीन नव स्वतंत्र पाकिस्तान की ओर से कब्जा नहीं कर लिया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य प्रमित पाल चौधरी ने बताया कि दो भारतीय राजनयिकों की निजी बातचीत के अनुसार, जो रिकॉर्ड सामने आए उसके मुताबिक, ओमान के सुल्तान ने भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ग्वादर की पेशकश की थी। प्रमित पाल चौधरी कहते हैं कि मेरा मानना है कि यह प्रस्ताव 1956 में आया था। तब जवाहरलाल नेहरू ने इसे ठुकरा दिया। 1958 में, ओमान ने ग्वादर को पाकिस्तान को 3 मिलियन पाउंड में बेच दिया।

रिटायर्ड ब्रिगेडियर गुरमीत कंवल के अनुसार, यह प्रस्ताव शायद मौखिक रूप से दिया गया था। प्रमित पाल चौधरी कहते हैं कि राष्ट्रीय अभिलेखागार में ग्वादर बहस पर दस्तावेज और कुछ समाचार पत्र लेख हैं, लेकिन भारतीय अधिकारियों के विचारों को एडिट किया गया है। वास्तव में, भारत का जैन समुदाय ओमान से ग्वादर खरीदने में रुचि रखता था। अजहर अहमद ने अपने पेपर ‘ग्वादर: ए हिस्टोरिकल कैलिडोस्कोप’ में लिखा कि ब्रिटिश सरकार की ओर से घोषित दस्तावेजों से पता चलता है कि भारत में जैन समुदाय ने भी ग्वादर खरीदने की पेशकश की थी। जैन समुदाय के पास बहुत धन था और वह अच्छी कीमत दे सकता था। अजहर ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव अकरम जाकी के साथ 2016 की बातचीत के आधार पर कहा कि 1958 में, यह जानने के बाद कि भारतीय भी ग्वादर खरीदने की कोशिश कर रहा, पाकिस्तान सरकार ने अपने प्रयासों को तेज किया। यही नहीं 1 अगस्त, 1958 को ब्रिटिश सरकार के साथ एक समझौता करने में सफल रही। ग्वादर को ओमान से ब्रिटिश नियंत्रण में स्थानांतरित कर दिया गया, बाद में पाकिस्तान को सौंप दिया गया।

भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने ग्वादर खरीदने में रुचि क्यों नहीं दिखाई इसे लेकर कई बातें सामने आईं। प्रमित पाल चौधरी बताते हैं कि तर्क यह था कि ग्वादर पाकिस्तान के किसी भी हमले से बचाव योग्य नहीं था। यह देखते हुए कि नेहरू अभी भी पाकिस्तान के साथ एक सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने की उम्मीद कर रहे थे। ऐसे में ग्वादर जैसा एक क्षेत्र शायद व्यर्थ में उकसावे की वजह बन सकता था। वहीं अगर नेहरू ने ग्वादर के प्रस्ताव को खारिज नहीं किया होता तो इसके क्या परिणाम होते, प्रमित पाल चौधरी ने बताया कि अगर ये भारत में होता तो यह कुछ ही समय के लिए बचाव योग्य होता। ऐसा इसलिए क्योंकि ग्वादर का एरिया और इसकी भौगोलिक स्थिति। ग्वादर के ऑफर को अस्वीकार करने का निर्णय उस समय की वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया था।

क्या बीजेपी की जीत में नारों का भी है असर?

बीजेपी की जीत में नारों का भी असर देखने को मिलता है! 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की नजर हैट्रिक लगाने पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता पर काबिज होने की कवायद में जुटी है। इसके लिए पार्टी ने ‘अब की बार 400 पार’ का नारा दिया है। इसके साथ ही पार्टी ‘मोदी की गारंटी’ का भी जोर-शोर से प्रचार कर रही है। ये कोई पहली बार नहीं है जब बीजेपी नेतृत्व ने आकर्षक टैगलाइन यानी नारों से जनमानस में अपनी दावेदारी और मजबूत करने की कोशिश की है। आकर्षक नारों का इस्तेमाल करना बीजेपी के लिए 2014 से ही एक प्रमुख रणनीति रही है, जब वे पहली बार ‘अब की बार मोदी सरकार’ के नारे के साथ सत्ता में आए थे। फिर 2019 चुनावों में ‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारे ने सुर्खियां बटोरी। दोनों ही चुनाव बीजेपी ने शानदार तरीके से जीता। बीजेपी ने 2014 में अपना चुनावी अभियान कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार और महंगाई आदि मुद्दों पर केंद्रित किया था। उस समय पार्टी ने ‘अच्छे दिन’ का वादा किया। हालांकि, इसके बारे में विपक्ष का दावा है कि पिछले 10 वर्षों में कभी नहीं आया। 2013 के अंत में, जब देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे समाचार पत्रों में छाए हुए थे ऐसे वक्त में बीजेपी ने पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के साथ टैगलाइन दी- ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’। जिसका उस चुनाव में गहरा असर नजर आया। ‘अब की बार मोदी सरकार’ जैसी वन-लाइनर ने पार्टी के लिए जादू का काम किया। 2014 के आसपास सोशल मीडिया के उदय ने भी बीजेपी की इस चुनावी रणनीति को सही रफ्तार दी। इसका रिजल्ट ये हुआ कि पार्टी ने 543 लोकसभा सीटों में से 282 सीटें जीतकर अपना ऐतिहासिक जनादेश हासिल किया।

2019 लोकसभा चुनाव की बात करें तो उस समय बीजेपी सत्ता में वापसी सुनिश्चित करने के लिए अपना रिपोर्ट कार्ड तैयार कर रही थी। विपक्ष ने भारत और फ्रांस के बीच राफेल लड़ाकू जेट सौदे को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला किया। विपक्षी नेताओं, मुख्य रूप से तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस सौदे में ‘गलत तरीके से ट्रांजेक्शन’ हुआ था क्योंकि इस डील में पारंपरिक प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया था। राफेल विवाद की पृष्ठभूमि में, कांग्रेस ने नारा दिया ‘देश का चौकीदार चोर है’। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने अपने ‘पूंजीवादी दोस्तों’ को कथित अनुचित लाभ दिया था। पीएम मोदी पर कांग्रेस के इस हमले का बीजेपी की ओर से करारा जवाब दिया गया। इसमें बीजेपी नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल नाम के आगे ‘मैं भी चौकीदार’ जोड़ दिया।

दिलचस्प बात यह है कि पीएम मोदी ने जैसे सी इस कैंपेन को लॉन्च किया, कुछ ही घंटों बाद ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान दुनिया भर में ट्विटर के टॉप ट्रेंड में आ गया। राहुल गांधी को उनके ‘चौकीदार चोर है’ कमेंट पर बैकफुट में लाने लिए प्रधानमंत्री ने करारा वार किया। उन्होंने कांग्रेस नेता पर चौकीदारों के समुदाय को नीचा दिखाने का आरोप लगाया। पीएम मोदी ने कहा कि चूंकि उनके विरोधियों में उनका नाम सीधे लेने की हिम्मत नहीं है, इसलिए वे ऐसे नारों का सहारा ले रहे हैं जिन्होंने हर चौकीदार को संदेह के घेरे में डाल दिया है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारा भी दिया। इसमें पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक की कार्रवाई और विकास के रिकॉर्ड पर जोर दिया गया। इसका काफी असर हुआ और बीजेपी ने 2019 चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 300 पार का आंकड़ा हासिल किया।

बीजेपी हमेशा से विपक्षी हमलों को ही अपने कैंपेन का हिस्सा बनाती रही है। कुछ ऐसा ही 2024 आम चुनाव से ठीक पहले देखने को मिला। बीजेपी की ओर से परिवारवाद के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों को घेरने पर आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने करारा अटैक किया। उन्होंने पीएम मोदी के परिवार पर कमेंट किया। लालू यादव ने पटना में इंडिया ब्लॉक की रैली को संबोधित करते हुए वंशवादी राजनीति का मुद्दा उठाने के लिए पीएम मोदी पर निशाना साधा और पूछा कि पीएम का परिवार क्यों नहीं है। बस फिर क्या था पीएम मोदी ने आरजेडी मुखिया की इस बात पर करारा पलटवार करते हुए कहा कि 140 करोड़ भारतीय उनका परिवार है। इसी के बाद बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने ‘मोदी का परिवार’ अभियान शुरू किया।

इसके साथ ही बीजेपी 2024 के चुनावी अभियान में ‘मोदी की गारंटी’ पर खास फोकस कर रही। इसमें प्रधानमंत्री मोदी के उन वादों का जिक्र किया जा रहा जिन्हें उन्होंने पूरा किया। पीएम मोदी ने कहा कि ‘मोदी की गारंटी’ का मतलब गारंटी को पूरा करने की गारंटी है, जो इस कैंपेन का केंद्र बिंदु भी बन गया है। बीजेपी लगातार ‘गारंटी’ का इस्तेमाल केंद्र सरकार की ओर से पूरे किए गए वादों को बताने के लिए कर रही है। इसमें राम मंदिर उद्घाटन जैसे प्रमुख वादे भी शामिल हैं। इसके साथ ही पार्टी का एक और चुनावी नारा चर्चा में है ‘अबकी बार 400 पार’। अब इस टैगलाइन का लोगों पर कितना असर होगा ये तो 4 जून को नतीजों के बाद क्लीयर हो जाएगा। फिलहाल 2014 हो या 2019 या फिर 2024 का चुनावी रण, बीजेपी की ये टैगलाइन लोगों की जुबां पर जरूर चढ़ जाती हैं।