Saturday, March 7, 2026
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क्या मोदी सरकार ने 10 साल में किया है कुछ परिवर्तन ?

आज हम आपको बताएंगे कि मोदी सरकार ने 10 साल में क्या कुछ परिवर्तन किया है! बीजेपी ने ‘अबकी बार, 400 पार’ का नारा दिया तो विपक्ष ने भी इस नारे को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है बल्कि वह इसके पीछे की मंशा पर जोर-शोर से सवाल उठा रहा है। विपक्ष के कई नेता दावा कर रहे हैं कि बीजेपी 400 पार का नारा इसलिए दे रही है क्योंकि उसकी मंशा संविधान बदलने की है। उनका दावा है कि अगर एनडीए को 400 से ज्यादा सांसद मिल गए तो नई सरकार संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी। दूसरी तरफ, यह डर दिखाया जा रहा है कि 400 पार का नारा सफल रहा तो देश में लोकतंत्र खत्म कर दिया जाएगा और तानाशाही शासन का ऐलान हो जाएगा। कांग्रेस समेत कई पार्टियां मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही हैं कि बीजेपी जीत गई तो यह आखिरी चुनाव होगा क्योंकि नई सरकार लोकतंत्र खत्म कर देगी।2014 में जब बीजेपी को अकेले दम पर बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार ने सबसे पहला संविधान संशोधन उच्च अदालतों में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया बदलने को लेकर किया। मोदी सरकार ने अपना पहला संविधान संशोधन किया था, वह संविधान का 99वां संविधान संशोधन था। संविधान (99वां संशोधन) अधिनियम, 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) की संरचना एवं कामकाज का जिक्र है। अधिनियम में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ की ओर से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के चयन के लिए एक पारदर्शी एवं व्यापक आधार वाली प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। यह 13 अप्रैल, 2015 को नोटिफाइ किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी एक्ट को रद्द कर दिया।

 भारत और बांग्लादेश के बीच हुई जमीनी सीमा संधि के लिए संविधान में 100वां संशोधन किया गया। 1 अगस्त, 2015 को लागू इस कानून का मकसद 41 सालों से पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ चल आ रहे सीमा विवाद को सुलझाना है। कानून बनने के बाद दोनों देशों ने आपसी सहमति से कुछ भू-भागों का आदान-प्रदान भी किया। समझौते के तहत बांग्लादेश से भारत आए लोगों को भारतीय नागरिकता भी दी गई।

इस संशोधन अधिनियम का संबंध वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) से है। एक देश, एक टैक्स सिस्टम का यह कानून 1 जुलाई, 2017 को लागू हुआ था। 1 जुलाई, 2018 को जीएसटी का एक साल हुआ तो भारत सरकार ने इसे जीएसटी डे के रूप में मनाया। जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर है जिसे पूरे देश को एक साझा बाजार समझकर लागू किया गया है। जीएसटी ऐक्ट लागू करने के लिए संविधान में 101वां संशोधन किया गया।

मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए 2018 में 102वां संविधान संशोधन संसद में पेश किया था। इस संशोधन के जरिए संविधान में तीन नए अनुच्छेद शामिल किए गए। नए अनुच्छेद 338बी के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। इसी तरह एक और नया अनुच्छेद 342ए जोड़ा गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची से संबंधित है। तीसरा नया अनुच्छेद 366(26सी) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को परिभाषित करता है। इस संशोधन के माध्यम से पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला।

मोदी सरकार ने पहली बार सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी शिक्षा और नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण (ईडब्ल्यूएस रिजर्वेशन) की व्यवस्था की। सरकार ने इसके लिए वर्ष 2019 में संसद से 103वां संविधान संशोधन प्रस्ताव पारित करवाया। ईडब्ल्यूएस रिजर्वेशन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो अदालत ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण देने के प्रावधान में कोई खामी नहीं है। यानी कथित अगड़ी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण के कानून को सुप्रीम कोर्ट से भी हरी झंडी मिल गई। यह आरक्षण सिर्फ जनरल कैटिगरी यानी सामान्य वर्ग के लोगों के लिए है। इस आरक्षण से एससी, एसटी, ओबीसी को बाहर किया गया है।

केंद्र सरकार ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने का अधिकार राज्य सरकारों को दे दिया। संसद के मानसून सत्र में 11 अगस्‍त, 2021 को 127वां संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया था। लोकसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने कहा था कि फिर से संख्या अंकित करने के बाद यह विधेयक 105वां संविधान संशोधन विधेयक माना जाएगा। इस संविधान संशोधन के बाद राज्यों को अधिकार मिल गया कि वो ओबीसी लिस्ट में संशोधन कर सके।

मोदी सरकार में हुए इन आठ संविधान संशोधनों में कोई एक भी ऐसा नहीं जिसे लोकंत्र विरोधी या आरक्षण के खात्मे का प्रयास बताया जा सकता है। बल्कि मोदी सरकार ने एससी, एसटी, ओबीसी तो छोड़िए सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की। तो सवाल है कि आखिर विपक्ष को ऐसा क्यों लगता है कि 400 सीटें मिलने पर एनडीए सरकार संविधान बदल देगी? सवाल यह भी है कि सरकार ने जीएसटी एक्ट को आम सहमति से पास करवाया था तब तो उसके पास 400 सीटें नहीं थी। ऐसे में सवाल यह भी है कि अगर मोदी सरकार संविधान बदलना भी चाहे तो ऐसी क्या मजबूरी है कि 400 सीटें चाहिए ही चाहिए? आखिर इंदिरा गांधी की सरकार ने जब 42वें संशोधन के जरिए एक मिनी संविधान ही बना दिया था तब तो उसके पास 352 सांसद ही थे। उधर, 2019 में एनडीए के 353 सांसद जीते थे। जब इंदिरा गांधी ने 352 सांसदों के साथ ही संविधान बदल दिया तो 353 सीटों के साथ आई मोदी सरकार को भला संविधान बदलने से कौन रोक लेता?

गृहमंत्री अमित शाह की फर्जी वीडियो पर क्या बोली बीजेपी ?

हाल ही में बीजेपी ने गृहमंत्री अमित शाह की फर्जी वीडियो पर कांग्रेस को आड़े हाथ ले लिया है! केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी पर राजनीति का स्तर गिराने का गंभीर आरोप लगया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष पूरा जतन कर रहे हैं कि राजनीति को और गर्त में धकेल दिया जाए। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने एक फर्जी वीडियो का जिक्र करते हुए कहा कि पूरी कांग्रेस पार्टी चुनावों में होने वाली अपनी दुर्दशा की आशंका से हताश हो गई है। उन्होंने असम के गुवाहाटी में कहा, उनकी कांग्रेस की हताशा इस स्तर तक पहुंच गई है कि उन्होंने मेरे और कई अन्य भाजपा नेताओं के फर्जी वीडियो फैलाए हैं। मुख्यमंत्रियों, प्रदेश अध्यक्ष और अन्य लोगों ने भी इस फर्जी वीडियो को फॉरवर्ड किया है, आज कांग्रेस पार्टी के एक प्रमुख नेता को आपराधिक मामले का सामना करना पड़ रहा है।’ शाह ने राहुल गांधी को खास निशाना बनाते हुए कहा, ‘जब से राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली है, तब से वो राजनीति के स्तर को नए निम्न स्तर पर ले जाने का काम कर रहे हैं।’ शाह के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि भाजपा को वीडियो बनाने और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को बदनाम करने में विशेषज्ञता हासिल है। उन्होंने कहा, ‘लोगों की छवि खराब करने के लिए वो जो करेंगे, हम वह कभी नहीं कर सकते। हम केवल यही चाहते हैं कि देश एक रहे और सभी लोग मिलकर काम करें। कोई भी नफरत फैलाने वाला भाषण नहीं होना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी हमेशा नफरत फैलाने वाले भाषण देते हैं… प्रधानमंत्री मोदी को कम से कम चुनावों में तो इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए, लेकिन वे ऐसा कर रहे हैं। इसलिए मैं अपील करता हूं कि कम से कम थोड़ा धैर्य रखें, हताशा में इस तरह की बातें न करें।’

जेडीएस सांसद प्रज्वल रेवन्ना से जुड़े ‘अश्लील वीडियो’ मामले के बारे में पूछे जाने पर अमित शाह ने कहा कि केंद्र कोई कार्रवाई नहीं कर सकता क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का मामला है। उन्होंने आगे सवाल किया कि राज्य सरकार ने इस मामले में कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? उन्होंने कहा, ‘भाजपा का रुख स्पष्ट है कि हम देश की मातृशक्ति के साथ खड़े हैं। मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि वहां किसकी सरकार है? सरकार कांग्रेस पार्टी की है। उन्होंने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?’ शाह ने कहा, ‘हमें इस पर कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह राज्य के कानून-व्यवस्था का मुद्दा है, राज्य सरकार को इस पर कार्रवाई करनी है… हम जांच के पक्ष में हैं और हमारे सहयोगी जेडी(एस) ने भी इसके खिलाफ कार्रवाई करने की घोषणा की है।’

अमेठी और रायबरेली से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की उम्मीदवारी के बारे में पूछे जाने पर अमित शाह ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि वे चुनाव लड़ेंगे या नहीं, लेकिन उनमें जो भ्रम है, उससे पता चलता है कि उनमें आत्मविश्वास की कमी है। उत्तर प्रदेश में स्थिति यह है कि वे अपनी पारंपरिक सीटें छोड़कर भाग गए हैं।’

कांग्रेस के इस आरोप पर कि भाजपा सत्ता में आने पर आरक्षण समाप्त कर देगी, अमित शाह ने कहा, ‘कांग्रेस अफवाह फैला रही है कि भाजपा 400 सीटें पार करने के बाद आरक्षण समाप्त कर देगी। ये बातें निराधार और तथ्यहीन हैं… मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि भाजपा एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण की समर्थक है और हमेशा संरक्षक की भूमिका निभाएगी।’ उन्होंने आगे कहा कि भाजपा धर्म के आधार पर आरक्षण में विश्वास नहीं रखती है। उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी हमेशा नफरत फैलाने वाले भाषण देते हैं… प्रधानमंत्री मोदी को कम से कम चुनावों में तो इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए, लेकिन वे ऐसा कर रहे हैं। इसलिए मैं अपील करता हूं कि कम से कम थोड़ा धैर्य रखें, हताशा में इस तरह की बातें न करें।”भाजपा धर्म के आधार पर आरक्षण में विश्वास नहीं रखती। हम देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्ष में हैं।’ उन्होंने कहा कि भाजपा को दक्षिणी राज्यों में भी मतदाताओं का बहुत अच्छा समर्थन मिल रहा है। गृह मंत्री ने कहा, ‘हम मतदाताओं को अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के रूप में नहीं देखते। भाजपा असम में 14 लोकसभा सीट में से 12 पर जीत दर्ज करेगी।’

क्या भारतीय सत्ता के लिए सुरक्षित है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?

आज हम आपको बताएंगे कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन भारतीय सत्ता के लिए सुरक्षित है या नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से डाले गये वोट का ‘वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल’ के साथ 100% मिलान कराने का अनुरोध करने वाली सभी याचिकाएं शुक्रवार को खारिज कर दिया। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने मामले में सहमति से दो फैसले सुनाए। पीठ ने 38 पेज का फैसला लिखा। अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है उनमें दोबारा बैलेट पेपर से चुनाव कराने की प्रकिया पुन: अपनाने का अनुरोध करने वाली याचिका भी शामिल रही। इन याचिकाओं में गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की एक याचिका भी शामिल थी। इसमें मतपत्रों से चुनाव कराने की पुरानी प्रणाली फिर से अपनाने के लिए निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर की मंशा पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि कुछ निहित स्वार्थी समूहों द्वारा राष्ट्र की उपलब्धियों को कमतर करने का प्रयास किए जाने की प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की प्रगति को बदनाम करने, कमतर करने और कमजोर करने का एक समन्वित प्रयास किया जा रहा है और ऐसे किसी भी प्रयास को नाकाम किया जाना चाहिए। वहीं, पीएम मोदी ने इस फैसले को विपक्ष के मुंह पर करारा तमाचा बताया। हालांकि, विपक्ष दल कांग्रेस ने कहा है कि वह चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए वीवीपैट के अधिक से अधिक उपयोग पर राजनीतिक अभियान जारी रखेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद ईवीएम पर सवाल उठने बंद हो जाएंगे।  ईवीएम सुरक्षित और उपयोगकर्ताओं के अनुकूल है। मतदाता, उम्मीदवार और उनके प्रतिनिधि तथा निर्वाचन आयोग के अधिकारी ईवीएम प्रणाली की मूलभूत विशेषताओं से अवगत हैं। ईवीएम को हैक करने या इसमें हेरफेर करने या नतीजों को बदलने की संभावना नहीं है।

वीवीपैट को शामिल कर एक स्वतंत्र वोट सत्यापन प्रणाली, जो मतदाताओं को यह जानने में सक्षम बनाती है कि उनके वोट सही ढंग से दर्ज किए गए हैं या नहीं, वोट सत्यापन के सिद्धांत को मजबूत करता है जिससे चुनावी प्रक्रिया की समग्र जवाबदेही बढ़ जाती है।

‘VVPAT’ पर्चियां देना समस्या पैदा करेगा। यह अव्यावहारिक है। ऐसा करना इसका दुरुपयोग किए जाने एवं विवादों को बढ़ावा देगा।

जब तक ईवीएम के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए जाते, तब तक आगे कदम बढ़ाते हुए सुधार के साथ मौजूदा प्रणाली जारी रहेगी। बैलेट पेपर या ईवीएम के किसी भी विकल्प को अपनाने के प्रतिगामी उपायों से बचना होगा, जो भारतीय नागरिकों के हितों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं करते हैं।

चाहे नागरिक हों, न्यायपालिका हो, निर्वाचित प्रतिनिधि हों, या यहां तक कि चुनावी मशीनरी, लोकतंत्र खुले संवाद, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रथाओं में सक्रिय भागीदारी द्वारा व्यवस्था में लगातार सुधार के माध्यम से अपने सभी स्तंभों के बीच सद्भाव और विश्वास पैदा करने के प्रयास से संबंधित है।

अदालत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की प्रभावशीलता के बारे में याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं और अटकलों के आधार पर आम चुनावों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाने और उसे प्रभावित करने की अनुमति नहीं दे सकती।

याचिकाकर्ता ना तो कभी यह दिखा पाए कि चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के सिद्धांत का कैसे उल्लंघन करता है और न ही डाले गए सभी वोट से वीवीपैट पर्चियों के शत प्रतिशत मिलान के अधिकार को साबित कर सके।सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने रेखांकित किया कि कम से कम 40 मौकों पर संवैधानिक अदालतों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज की हैं। पदाधिकारियों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) राजीव कुमार की उस टिप्पणी को भी रेखांकित किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ईवीएम ‘शत प्रतिशत सुरक्षित हैं’ और राजनीतिक दल भी ‘दिल की गहराई से जानते हैं’ की मशीन सही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि यह फैसला कांग्रेस नीत विपक्ष के लिए “करारा तमाचा” है और ईवीएम को लेकर अविश्वास पैदा करने के लिए ‘माफी’ मांगनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार के अररिया और मुंगेर में चुनावी सभाओं में कहा कि यह कांग्रेस-नीत ‘इंडिया’ गठबंधन को करारा तमाचा है। उसे ईवीएम के खिलाफ अविश्वास पैदा करने के लिए जनता से माफी मांगनी चाहिए। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इसने निर्वाचन आयोग को बदनाम करने की कोशिश करने वाली कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों को बेनकाब कर दिया है।

कांग्रेस ने शुक्रवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने VVPAT से संबंधित जिन याचिकाओं को खारिज किया है उनमें वह किसी भी तरह से पक्ष नहीं थी। पार्टी चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए वीवीपैट के अधिक से अधिक उपयोग पर राजनीतिक अभियान जारी रखेगी। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘वीवीपैट पर जिन याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया, उनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक पक्ष नहीं थी। हमने दो जजों की पीठ के फैसले पर विचार किया है और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए वीवीपैट के अधिक से अधिक उपयोग पर हमारा राजनीतिक अभियान जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ता के पास अभी भी रिव्यू पिटिशन और क्यूरेटिव पिटिशन का विकल्प है। हालांकि, गौर करने वाली बात है कि रिव्यू पिटिशन पर वही पीठ विचार करती है जिसने फैसला सुनाया होता है। आमतौर पर चैंबर में ही रिव्यू पिटिशन का निपटारा होता है। पहले जितने भी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ रिव्यू पिटिशन और क्यूरेटिव पीटिशन दाखिल की गई है उनमें से करीब अधिकतर याचिकाएं खारिज ही हुई हैं।

आखिर कौन होगा अमरोहा का आने वाला सांसद?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर अमरोहा का आने वाला सांसद कौन होगा! उत्तर प्रदेश की अमरोहा लोकसभा सीट पर राजनीति इस बार कुछ अलग ही दिखी। जिस प्रकार का चुनावी माहौल यहां बना, उसने मतदाताओं के सामने कई ऑप्शन रख दिए। लोकसभा सीट पर जीत का समीकरण तैयार करने की कोशिश में तमाम दल दिखे। अमरोहा लोकसभा सीट कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा है। यहां पर मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है। ऐसी स्थिति में मुस्लिम वोट बैंक को साधकर जीत दर्ज करने की कोशिश करते तमाम विपक्षी दल दिखे हैं। अमरोहा सीट कांग्रेस-सपा गठबंधन के तहत कांग्रेस के पाले में गई। कांग्रेस ने यहां से कुंवर दानिश अली को उम्मीदवार बनाया। कुंवर दानिश अली बसपा के टिकट पर जीत दर्ज कर वर्ष 2019 में लोकसभा तक का सफर तय कर चुके हैं। वे एक बार फिर लोकसभा सीट का गणित साधने में जुटे रहे।बहुजन समाज पार्टी ने अमरोहा से मुजाहिद हुसैन को टिकट देकर मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सपा-बसपा गठबंधन के तहत यह सीट बसपा के पास वर्ष 2019 में गई थी। उस समय समय बसपा के टिकट पर उतरे कुंवर दानिश अली ने बदले समीकरण के जरिए इस सीट पर जीत का परचम लहरा दिया। 2019 में मोदी-योगी लहर के बाद भी दानिश अली समीकरण साधने में सफल रहे। एक बार फिर कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में वह उसी प्रकार का करिश्मा दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, अमरोहा का इतिहास रहा है कि यहां से लगातार दो बार कोई भी उम्मीदवार जीत दर्ज करने में कामयाब नहीं रहा। इसलिए, उनकी चुनौती बढ़ी हुई है। इस बार अधिक मतदान को अग्रेसिव वोटिंग के रूप में माना जा रहा है। अमरोहा लोकसभा सीट पर पिछले चुनाव के परिणाम को देखें तो समीकरण कुछ-कुछ साफ होता दिखता है। दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में कुंवर दानिश अली बसपा-सपा गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में उतरे थे। उन्होंने 51.41 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। कुंवर दानिश अली को 6,01,082 वोट मिले थे। वहीं, भाजपा के कंवर सिंह तंवर को 5,37,834 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे। इस प्रकार, दानिश अली 63,248 वोटों से जीत दर्ज करने में कामयाब हुए। भाजपा के कंवर सिंह तंवर को इस चुनाव में 46 फीसदी वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस उम्मीदवार सचिन चौधरी 1.07 फीसदी वोट हासिल करने में ही कामयाब हो पाए थे।

2014 के लोकसभा चुनाव को इसी आधार पर देखें तो उस समय भारतीय जनता पार्टी के कंवर सिंह तंवर ने 45.24 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी की हुमेरा अख्तर 31.7 फीसदी वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रही थीं। वहीं, बहुजन समाज पार्टी की फरहत हसन 13.94 फीसदी वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर रहे। भाजपा के कंवर सिंह तंवर को 5,28,880 वोट मिले थे। वहीं, सपा की हुमेरा अख्तर को 3,70,066 वोट मिले थे। बसपा की फरहत हसन 1,62,983 वोट हासिल करने में कामयाब हुए थे।

पिछले दो लोकसभा चुनाव के परिणामों को देखें तो भाजपा के वोट प्रतिशत में कोई बड़ा बदलाव होता नहीं दिखा है। वहीं, बसपा के साथ सपा का वोट बैंक जैसे ही 2019 के चुनाव में जुटा, अमरोहा का रिजल्ट बदल गया। 2019 में अमरोहा में कांग्रेस कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है। लोकसभा सीट पर कांग्रेस को करीब चार दशकों से जीत का इंतजार है। वहीं, इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार को बसपा की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। रालोद के साथ आने से जाट वोट बैंक भी एकजुट है। इससे भाजपा की उम्मीदें बढ़े वोट प्रतिशत के साथ बढ़ती दिख रही हैं।

बहुजन समाज पार्टी ने 2019 में जीती इस सीट को एक बार फिर जीतने की कोशिश की है। मायावती स्वयं इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए उतरीं। उन्होंने दानिश अली को विश्वासघाती करार देते हुए मुस्लिम-दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश की। अन्य वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश करती मायावती दिख रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्षत्रियों की नाराजगी को दूर करने के लिए जिस प्रकार से बसपा ने लामबंदी की है। उसका असर अमरोहा लोकसभा सीट पर दिखने की उम्मीद पार्टी करती दिख रही है।

भारतीय जनता पार्टी ने 2019 की हार के बाद खुद को बूथ स्तर पर मजबूत किया है। भाजपा उम्मीदवार कंवर सिंह तंवर ने हिंदू वोट बैंक को एक पाले में लाने की कोशिश की है। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के कार्यों के आधार पर वह वोट मांगते नजर आए। अमरोहा में जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने चुनावी रैली को संबोधित किया। यहां पर अपनी बातों को रखा। उसने क्षेत्र के चुनावी समीकरण को गर्मा दिया था। अब चार जून को आने वाले रिजल्ट में इस सीट पर वोटरों की ओर से ईवीएम में कैद किए गए मतदान का रिजल्ट आएगा तो स्थिति साफ होगी।

यूपी की 8 लोकसभा सीटों पर 26 अप्रैल को वोटिंग हुई। करीब 54.85 फीसदी वोटिंग इस दौरान दर्ज की गई। लेकिन, अमरोहा में गरमाए चुनावी समीकरण के बीच जबर्दस्त मतदान देखने को मिला। करीब 64.02 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई है। हालांकि, लोकसभा चुनाव 2019 से करीब 5 फीसदी कम मतदान होने की भी बात कही जा रही है। अमरोहा के जातीय समीकरण को अगर आप देखें तो यहां मुस्लिम आबादी करीब 42 फीसदी है। इसके बाद जाटव करीब 13 फीसदी हैं। इनके अलावा राजपूत 8 प्रतिशत, जाट 7 फीसदी, खागी 7 प्रतिशत, सैनी 5 फीसदी, गुर्जर 4 फीसदी और अन्य वोट बैंक करीब 4 प्रतिशत इस क्षेत्र में हैं। मायावती के साथ जाटव वोट बैंक का जाना तय माना जा रहा है। साथ ही, मुजाहिद हुसैन के साथ भी मुस्लिम वोट बैंक जुड़ सकता है। वहीं, दानिश अली मुस्लिम के साथ अन्य वोट बैंक पर नजर गड़ाए रहे। हालांकि, उनके पक्ष में कोई बड़ा नेता क्षेत्र में नहीं उतर पाया। वहीं, कंवर सिंह तंवर दो मुस्लिम उम्मीदवारों की लड़ाई के बीच अपनी जीत का समीकरण 2014 की तरह तलाशने में जुटे रहे हैं।

बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी डॉ. मुजाहिद हुसैन राजनीतिक परिवार से आते हैं। 59 वर्षीय मुजाहिद के पिता का नाम जाहिद हुसैन है। वे गाजियाबाद के दस विस्ता बड़ा बाजार, डासना के रहने वाले हैं। डासना धौलाना विधानसभा क्षेत्र में शामिल है। इसलिए वे खुद को हापुड़ का बताते हैं। मुजाहिद ने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीयूएमएस किया है। हालांकि, वे डॉक्टरी सेवा से जुड़े नहीं हैं। शाहबेरी में उनका अपना बाजार है। यही उनकी आजीविका का साधन है। मुजाहिद के भाई साजिद हुसैन डासना नगर पंचायत के तीन बार अध्यक्ष रहे हैं। अभी इनकी पत्नी बागे जहां अध्यक्ष हैं। मुजाहिद पहली बार चुनावी मैदान में उतरे हैं। अमरोहा से सीधा कोई नाता नहीं है। हालांकि, उनके लिए प्रचार करने स्वयं मायावती अमरोहा में उतरी। इसके बाद उनके पक्ष में माहौल बनने लगा। वे खुद गांव-गांव में प्रचार करते देखे गए। इसलिए, उन्हें चुनावी मुकाबले में माना जा रहा है।

क्या अमेरिका में रह रहे भारतीय छात्र खतरे में है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अमेरिका में रह रहे भारतीय छात्र खतरे में हैं या नहीं! एक बागान मालिक के बेटे जॉर्ज वॉशिंगटन को कभी यह अहसास भी नहीं रहा होगा कि वह एक दिन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति बन जाएंगे। युद्धों से अमेरिका को बनाने वाले वॉशिंगटन ने कहा था कि इसे हम महान लोगों का देश बनाएंगे, जो सबके लिए होगा। सबके लिए सुरक्षित होगा। बाद में कुछ यही बात अमेरिका से दासता को खत्म करने वाले राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन और बराक ओबामा ने भी कही। हालांकि, बीते कुछ सालों से ये भरोसा टूट रहा है। आज जॉर्ज वॉशिंगटन के देश अमेरिका में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों पर बीते कुछ सालों से हमले हो रहे हैं। कुछ छात्र तो ऐसे हैं, जो कभी अपने घर में तो कभी कॉलेज कैंपस में मृत पाए गए। कुछ को नस्लीय हिंसा करने वाले हमलावरों ने मार दिया। नतीजा…अमेरिका जैसे देश में आज भी कइयों को इंसाफ नहीं मिला। जो लोग मृत पाए गए, उनके बारे में अमेरिकी पुलिस यह पता भी नहीं लगा पाई कि इनकी मौत क्यों हुई? हाल ही में अमेरिका में भारतीय छात्रों की मौत की घटनाओं पर एक बार फिर अमेरिका ने तसल्ली दी है। अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने कहा है कि अमेरिका एक सुरक्षित देश है। हमारा यह देश भारतीय छात्रों का काफी ख्याल रखता है। उन्होंने भारतीय स्टूडेंट्स के गार्जियन को यह भरोसा दिया कि आपके बच्चे जब अमेरिका में होते हैं तो वे हमारे बच्चे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अनुसार, 2023 में अमेरिका में 10 लाख इंटरनेशनल स्टूडेंट्स रह रहे थे। इनमें से करीब 2.69 लाख छात्र भारत और भारतीय मूल के हैं। सार्क यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर देवनाथ पाठक के अनुसार, अमेरिका समेत दूसरे देशों में रह रहे भारतीयों को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी की है। सबसे पहले आपको इंडियन एंबेसी या इंडियन कौंसुलेट के ऑफिस जाकर संपर्क करना चाहिए।

किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ अपना बैंक अकांउट, क्रेडिट कार्ड या कोई और डॉक्यूमेंट जैसी अपनी कोई भी निजी जानकारी बिल्कुल भी शेयर न करें। अपराधों में शामिल लोगों और पैसों के लिए लूटपाट करने वालों से सावधान रहें। ऐसे लोग इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स और फोन के माध्यम से भारतीय छात्रों से फ्रेंडशिप करते हैं और फिर उनसे लूटपाट करते हैं। किसी भी इमरजेंसी के हालात में लोकल पुलिस से फौरन संपर्क करें। लोकल पुलिस का नंबर अपने मोबाइल में जरूर रखें, ताकि वक्त पड़ने पर आप फौरन उन्हें कॉल कर सकें। अपनी यूनिवर्सिटी में सेफ्टी रूल्स के बारे में जानें और हॉस्टल्स के बारे में भारतीय छात्रों के लिए बनाए गए हेल्प सेंटर्स की मदद लें।

फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज ने आकलन किया है कि भारतीयों पर हमलों की बड़ी वजहों में संदिग्ध गोलीबारी या अपहरण, सेफ्टी अवेयरनेस की कमी है। इसके अलावा, हाइपोथर्मिया यानी ज्यादा ठंड लगने,आत्महत्या के लिए मजबूर करने जैसी भी वजहे हैं। इसके अलावा, नस्लीय हिंसा और भारतीयों के प्रति नफरती सोच रखने की वजह से भी हमले हो रहे हैं। अगर कोई इस तरह की बात करता दिख जाए तो आप सतर्क हो जाएं।

अमेरिका में भारतीय छात्रों की सुरक्षा में एकदम तत्पर एक संस्था आईडीपी के अनुसार, सभी अमेरिकी यूनिवर्सिटी में अपने छात्रों की सुरक्षा को लेकर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। ज्यादातर कैंपस में 24 घंटे सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहते हैं। तकरीबन हर यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की सुरक्षा के लिए एक सेफ्टी कमीशन होता है। ऐसे में आपको दाखिला लेने के साथ ही सिक्योरिटी ऑफिसर का नंबर अपने फोन में रखना चाहिए। कुछ कॉलेज और यूनिवर्सिटी तो जहां आप रह रहे हैं, वहां से कैंपस तक लाने-ले जाने के लिए शटल सुविधा देती हैं, जिसमें आपकी सुरक्षा के बढ़िया इंतजाम रहते हैं। कुछ के पास तो अपना मोबाइल ऐप भी है, जिसे आप डाउनलोड करके सीधे संपर्क में रह सकते हैं। इसके अलावा, यूनिवर्सिटी कैंपस और उसके आसपास सीसीटीवी लगी रहती हैं, जो दिन-रात निगरानी करती रहती हैं।

आप अमेरिका में जहां भी रहें, या जाएं अपने परिवार या दोस्तों से संपर्क बनाए रखें। जहां आप रहते हैं, वहां आसपास किसी परिचित का लोकल नंबर अपने परिवार, यूनिवर्सिटी ऑफिस, दोस्तों और रूममेट से शेयर जरूर करें। अपना फोन हमेशा फुल चार्ज रखें। खासकर घर से बाहर निकलते वक्त तो यह काम जरूर करें, जाने कब जरूरत पड़ जाए। जब आप क्लासरूम में न हों, तब आप इसे रिंगिंग मोड में रखें। अगर आप कहीं दूसरे शहर या शॉपिंग मॉल में जा रहे हों, तब किसी को जरूर बताएं। अगर आप कहीं अनसेफ महसूस कर रहे हैं तो आप अपना लाइव लोकेशन किसी भरोसेमंद साथी को जरूर शेयर करें। अमेरिका में पढ़ने के लिए सबसे सुरक्षित स्टेट हैं-यूटाह, मेसाचुसेट्स, न्यू हैंपशायर, व्योमिंग, आइयोवा, वरमॉन्ट, मिनिसोटा और माइने। यहां पर रहना, खाना-पीना और घूमना भी सुरक्षित है। भारतीय छात्रों को हो सके तो इन स्टेट की यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना चाहिए।

क्या सरकार सच में आरक्षण खत्म कर सकती है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार सच में आरक्षण खत्म कर सकती है या नहीं! 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की आखिरी बैठक चल रही थी। संविधान बनाने वाली प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर संविधान सभा की बैठक में कई आशंकाओं और सवालों के जवाब देने के लिए उठ खड़े हुए। उन्होंने कहा-अगर हमने देश से गैर बराबरी खत्म नहीं की तो पीड़ित लोग उस ढांचे को खत्म कर देंगे, जिसे संविधान सभी ने बड़ी मेहनत के बाद बनाया है। उन्होंने यह भी कहा था कि अच्छे संविधान की कामयाबी उन लोगों पर निर्भर करेगी, जो देश को चलाएंगे। इसके अगले ही दिन संविधान सभा ने देश के लिए संविधान मंजूर कर लिया और भारतीय गणराज्य के लोगों के हाथों में संविधान सौंप दिया गया। आंबेडकर ने तब आरक्षण की अस्थाई व्यवस्था करते हुए कहा था कि अगर आरक्षण से किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो अगली पीढ़ी को आरक्षण का फायदा नहीं दिया जाना चाहिए। आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं, जिसके सहारे पूरा जीवन काट दिया जाए। उन्होंने 10 साल में आरक्षण दिए जाने की समीक्षा की बात कही थी। 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के करीब 74 साल बाद भी राजनीतिक पार्टियां आरक्षण के मुद्दे पर हंगामा कर रही हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आरक्षण एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी चुनावी रैलियों में यह आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। 400 पार का नारा इसीलिए दिया जा रहा है। वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी ने पलटवार करते हुए कहा-कांग्रेस देश में धर्म आधारित आरक्षण लागू करना चाहती है। इसका उदाहरण कर्नाटक है जहां कांग्रेस धर्म आधारित आरक्षण को लागू करना चाहती है। आज हम यह जानेंगे कि क्या वाकई में कोई सरकार आरक्षण खत्म कर सकती है? आरक्षण कैसे लागू किया गया था। संविधान में आरक्षण को लेकर क्या प्रावधान हैं? या आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा हटाई जा सकती है।

संविधान लागू होने के साथ ही एससी-एसटी को आरक्षण दिया गया था। मगर, तब यह भी कहा गया था कि इसे 10 साल के लिए दिया जा रहा है। इसके बाद इसकी समीक्षा की जाएगी कि आरक्षण से किसको कितना फायदा हुआ। जिस वर्ग को फायदा पहुंचेगा, उसे फिर आरक्षण नहीं दिया जाएगा। मगर, ऐसा हो नहीं सका और बाद में आने वाली सरकारें इसे संविधान संशोधन करके बढ़ाती रहीं। एससी-एसटी के रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। इसका मतलब यह है कि एससी-एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति को उसकी आर्थिक स्थिति चाहे कुछ भी हो या उसके माता-पिता किसी सरकारी नौकरी में हों, उन्हें हर हाल में आरक्षण दिया जाएगा।

1991 की बात है, जब वीपी सिंह सरकार ने अरसे से अटकी पड़ी मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर दिया। इसके तहत ओबीसी को सरकारी नौकरियों और हायर एजुकेशन में 27 फीसदी कोटा दिया गया। इसी कोटे में क्रीमी लेयर की अवधारणा भी लागू की गई। यानी आरक्षण का फायदा ओबीसी कैटेगरी में उन्हीं को मिलेगा, जो नॉन क्रीमी लेयर से आते हैं। क्रीमी लेयर में इनकम और सोशल स्टेटस जैसे पैरामीटर्स को ध्यान में रखा जाता है। जो लोग पहले से ही सुविधा प्राप्त हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इसके बाद 2019 से आर्थिक आधार पर ईडब्ल्यूएस को भी 10 फीसदी कोटा दिया जाने लगा।

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट और संवैधानिक मामलों के जानकार अनिल सिंह श्रीनेत बताते हैं कि आईआईटी, आईआईएम जैसे सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं में अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 15(6) के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। वहीं, आईएएस, आईपीएस जैसी सरकारी नौकरियों में अनुच्छेद 16(4) और 16(6) के तहत आरक्षण दिया जाता है। जबकि लोकसभा और विधानसभाओं में अनुच्छेद 334 के तहत आरक्षण दिया जाता है। संविधान में आरक्षण देने आधार सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है। मगर, 2019 से 103वां संविधान संशोधन करके इसमें आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को भी आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992 के मामले में यह व्यवस्था दी कि आरक्षण के प्रावधान को इतनी सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता है कि समानता की अवधारणा ही नष्ट हो जाए। ऐसे में अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत दिया जाने वाला आरक्षण किसी भी हाल में 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। हालांकि, विशेष प्रावधानों के तहत तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण दिया जा रहा है। वहीं, सार्क यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर देवनाथ पाठक के अनुसार, केंद्र के स्तर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए सत्ता पास लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। यही स्थिति आरक्षण को हटाने को लेकर भी है। अगर कोई सरकार आरक्षण खत्म करना चाहती है तो उसे लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना होगा। चूंकि राज्यसभा में मोदी सरकार के पास अभी बहुमत नहीं है तो ऐसे में संविधान संशोधन नहीं हो सकता है। इसके अलावा, किसी भी सत्ताधारी पार्टी को आरक्षण हटाने के लिए राजनीतिक रूप से मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए, जो अभी किसी में नहीं दिखती। यह मुद्दा बस सियासी बनकर रह गया है।

1973 में यूपी सरकार ने पद्दोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी, जिसके बाद 1992 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया था। 17 जून 1995 को केंद्र सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए 82वां संविधान संशोधन कर दिया। इस संशोधन के बाद राज्य सरकारों को प्रमोशन में आरक्षण देने का कानूनी हक मिला। 2002 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण के लिए संविधान में 85वां संशोधन किया और एससी-एसटी आरक्षण के लिए कोटे के साथ वरिष्ठता भी लागू कर दी। एससी-एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने के एम नागराज के फैसले में 2006 में पांच जजों की पीठ ने संशोधित संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 16(4)(ए), 16(4)(बी) और 335 को तो सही ठहराया था लेकिन कोर्ट ने कहा था कि एससी-एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने से पहले सरकार को उनके पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाने होंगे।

क्या इस बार राजनेताओं को अपने भाषण पर नियंत्रण रखना होगा?

इस बार राजनेताओं को अपने भाषण पर नियंत्रण रखना ही होगा! अगर कोई चीज दिखने में बत्तख जैसी लगती है, तैरती भी बत्तख की तरह है और आवाज भी बत्तख की निकालती है, तो फिर भी ये हो सकता है कि वो असल में बत्तख ना हो! यही बात नफरती भाषणों पर भी लागू होती है। चुनावों के दौरान नेता अक्सर भड़काऊ और गलत मतलब वाली बातें कर देते हैं। ये बातें सुनकर देश के लोग थोड़ा परेशान तो होते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में नेता बाद में सफाई दे देते हैं कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया या फिर गलत समझा गया।’ बाद में माफी मांगने से कुछ नहीं होता। एक बार जो बात कह दी वो वापस नहीं ली जा सकती। अहम बात ये है कि हेट स्पीच किसी के दिमाग में एक विचार को जन्म दे सकती है। चुनाव आयोग ने एक सख्त कदम उठाते हुए, गलती करने वालों के लिए माफी मांगने का रास्ता बंद कर दिया है। चुनाव आयोग ने लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 का इस्तेमाल किया है और पार्टी अध्यक्षों को जिम्मेदारी दी है कि वे अपने पार्टी के स्टार प्रचारकों को नियंत्रण में रखें। आयोग ने यह भी कहा है कि राजनीतिक पार्टी के उच्च पदों पर बैठे लोगों के चुनाव प्रचारों का जनता पर ज्यादा गंभीर असर पड़ता है। अब हम इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं कि जेपी नड्डा, नरेंद्र मोदी के साथ बैठेंगे और कहेंगे ‘बॉस, थोड़ा संभाल के।’ उसी तरह मल्लिकार्जुन खरगे भी राहुल गांधी से बात करेंगे। शायद ये उन्हें याद दिलाने के लिए होगा कि राहुल गांधी वाकई में पार्टी के ‘स्टार प्रचारक’ हैं। हो सकता है कि रॉबर्ट वाड्रा भी खरगे के दफ्तर के बाहर इंतजार कर रहे हों, ये सोचकर कि वो भी ‘स्टार प्रचारक’ हैं। पार्टी अध्यक्षों को उनकी पार्टी के अनाम ‘स्टार प्रचारकों’ को नियंत्रित करने के लिए कहकर, चुनाव आयोग ने सभी उच्च पदों पर बैठे लोगों को जिम्मेदार ठहराया है। यह एक चालाक तरीका है।

जब प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले हफ्ते राजस्थान में एक रैली में कांग्रेस के सत्ता में आने पर देश के संसाधनों को ‘घुसपैठियों’ और ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ में बांटने के बारे में बात की, तो वे मेरे स्थानीय नेपाली मोमो मैन रंजीत या मेरे दिवंगत परदादा-परदादी के बारे में बात नहीं कर रहे थे, जिन्होंने 11 बच्चों को जन्म दिया था, जो कांग्रेस के शासन में दूसरों की कीमत पर अमीर बनने की संभावना रखते हैं। हालांकि, ‘एम’ शब्द का सीधा उल्लेख न करके वो अपने भाव जनता तक पहुंचा रहे थे। यह उनकी मंशा को साफ जाहिर कर रहा था। शायद तभी चुनाव आयोग के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। राहुल गांधी भी जांच के दायरे में थे। उनकी मौखिक चूक में भारत में गरीबी बढ़ने के बारे में झूठे दावे करना और ‘उत्तर-दक्षिण’ विभाजन को बढ़ावा देना शामिल था।

चुनाव प्रचार के गलत तरीकों की बात करें तो, ऐसा लगता है कि हेट स्पीच सबसे बड़ी समस्या नहीं है। इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है और इसे बदला जा सकता है, लेकिन आम तौर पर इसका मतलब किसी समूह या समुदाय के प्रति नफरत की भावना पैदा करने वाला भाषण होता है। चुनाव आयोग ने कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला पर भाजपा सांसद हेमा मालिनी के बारे में अशोभनीय टिप्पणियों के लिए 48 घंटे का प्रचार प्रतिबंध लगाया था।आयोग ने उनके बयान को महिलाओं का अपमान माना और इस वजह से प्रतिबंध लगाया, न कि नफरती भाषण की कैटेगिरी में बैन लगाया। तो क्या ये वाकई नफरती भाषण नहीं था?

पिछले साल, तमिलनाडु के डीएमके मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से की थी, जिन्हें खत्म करने की जरूरत है। यह सीधी और स्पष्ट रूप से हेट स्पीच का एकदम साफ उदाहरण था। पिछले महीने, कर्नाटक में एक दुकानदार की हनुमान चालीसा बजाने की वजह से पिटाई की खबरों के बाद, बीजेपी मंत्री शोभा करंदलाजे ने मीडिया से कहा, ‘तमिलनाडु के लोग यहां (कर्नाटक) आते हैं, यहीं ट्रेनिंग लेते हैं और यहीं बम रखते हैं।’ बेंगलुरु में 1 मार्च को हुए आईईडी धमाके का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘दिल्ली से एक आदमी आकर विधान सौधा में पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाता है। केरल से एक आदमी आकर कॉलेज स्टूडेंट्स पर तेजाब फेंकता है। ये सरकार अल्पसंख्यकों की रक्षा कर रही है और हिंदू विरोधी है।’ ये सब नफरत फैलाने वाली बातें हैं। इस तरह के बयानों को राजनीति से जोड़ने पर मामला गंभीर होता है।

1984 में, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के बाद एक चुनावी रैली में एक प्रधानमंत्री ने लोगों से कहा, ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो जमीन हिल जाती है।’ इस बात को आमतौर पर और सही मायने में, दंगों को सही ठहराने के रूप में लिया गया था। लेकिन यह वाक्य दो अर्थों वाला था। ‘धरती थोड़ी हिलती है’ को शायद दुख जताने के तौर पर भी माना जा सकता था। लेकिन चुनाव आयोग ने राजीव गांधी को या किसी भी बड़े नेता को हेट स्पीच के लिए कोई सजा नहीं दी। गौर करने वाली बात ये है कि अब चुनाव आयोग बड़े नेताओं के प्रभाव में नहीं आता है, जिसे अच्छी बात माना जाना चाहिए।

आखिर नेहरू के 10 साल और मोदी के 10 साल में क्या अंतर है?

आज हम आपको बताएंगे कि नेहरू के 10 साल और मोदी के 10 साल में आखिर अंतर क्या है! पीएम मोदी से पूछ गए सवाल कि दो फेज की वोटिंग के बाद आपका क्या आकलन है? क्या आपको अब भी उम्मीद है कि 400 का आंकड़ा पार करेंगे? इस सवाल के जवाब में पीएम मोदी ने कहा कि आदर्श आचार संहिता की घोषणा के बाद मैं अब तक 70 से ज्यादा रैलियां और रोड शो कर चुका हूं। मैं जहां भी गया हूं मुझे बेमिसाल प्यार, स्नेह और समर्थन मिला है। यह लोगों का समर्थन है जो हमें विश्वास दिलाता है कि हम 400 का आंकड़ा पार करने की राह पर हैं। लोगों ने देखा है कि हम क्या कर सकते हैं। हमारा मानना है कि लोग बेहतर कल चाहते हैं और वे जानते हैं कि BJP के लिए वोट का मतलब विकास के लिए वोट देना है। पीएम मोदी से लगातार तीन जीत के बाद नेहरू के रेकॉर्ड की बराबरी से भी जुड़ा सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि सच कहूं तो इन रेकॉर्ड्स के बारे में मुझे नहीं पता। ऐसे ट्रेंड्स का विश्लेषण करना आपका काम है। मैं बस अपना काम करता रहता हूं। अब आपने यह प्रश्न पूछा है, तो मैं आपसे इसका विश्लेषण करने का आग्रह करूंगा। आप उस समय के राजनीतिक परिदृश्य, विपक्षी दलों और उनके नेताओं को देख सकते हैं। आप लोगों के बीच उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता के स्तर के साथ-साथ उनकी शिक्षा के स्तर को भी देख सकते हैं। आप मीडिया की उपस्थिति देख सकते है। नेहरू जी के 10 साल बनाम हमारे 10 साल में देश कैसे आगे बढ़ा, इसकी तुलना करके विश्लेषण किया जाना चाहिए। हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं क्योंकि देश अगले 25 वर्षों के लिए एक रोडमैप तैयार कर रहा है और यह जनता को जागरूक करेगा।

कांग्रेस पार्टी के युवराज घमंड के बारे में बात करने वाले आखिरी व्यक्ति होने चाहिए। मगर, यह सच है कि अब कांग्रेस पार्टी सिर्फ झटकों और आश्चर्यों पर निर्भर है। उनकी एकमात्र आशा यह है कि कोई चमत्कार होगा जो उन्हें चुनाव जिता देगा। यहां तक कि उनके सबसे अनुभवी और महत्वपूर्ण नेताओं ने भी हार मान ली है। चुनाव समसामयिक मुद्दों पर आधारित होते हैं, इसलिए चुनावों की तुलना करना सही नहीं है। 2024 में हमें न केवल नए सहयोगी मिले हैं, बल्कि जनता का अभूतपूर्व समर्थन भी मिला है, जो हमें शानदार जीत का विश्वास दिलाता है।

मुझे नहीं लगता कि वे किसी भी स्तर पर समाधान हैं। यह वास्तव में समाधान के रूप में छिपी हुई खतरनाक समस्याएं हैं। अगर सरकार संपत्ति के नए सिरे से बंटवारे के नाम पर आखिर में आपका पैसा छीन लेगी तो क्या आप दिन-रात काम करेंगे? आज हम 3 करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनने के लिए सशक्त बना रहे हैं। ऐसी नीतियां यह सुनिश्चित करेंगी कि महिलाएं लखपति न बनें और उनकी आकांक्षाएं आगे न बढ़ें। अगर किसी ने मुद्रा लोन लिया है और वह आगे बढ़ रहा है तो उसकी तरक्की रुक जाएगी। हमारे रेहड़ी-पटरी वाले जो अब हमारी नीतियों के कारण बढ़ रहे हैं वे भी नहीं बढ़ पाएंगे। आज हम दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम हैं। ऐसी नीतियां आपके युवाओं की स्टार्ट-अप क्रांति को खत्म कर देंगी। यह नीति केवल उनके वोट-बैंक को खुश करने का एक तरीका है। अगर हम वास्तव में लोगों का विकास सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो हमें बस उनकी बाधाओं को दूर करना होगा और उन्हें सशक्त बनाना होगा। यह उनकी उद्यमशीलता क्षमता को उजागर करता है जैसा कि हमने अपने देश में टियर-2, टियर-3 शहरों में भी देखा है जो बहुत सारे स्टार्ट-अप और खेल के सितारों को जन्म दे रहे हैं। इन्हीं कारणों से संपत्ति का नए सिरे से बंटवारा, संपत्ति कर आदि कभी सफल नहीं होते क्योंकि वे कभी गरीबी दूर नहीं करते। वे तो बस इसे बांटते हैं ताकि हर कोई समान रूप से गरीब हो। गरीब गरीबी से त्रस्त रहते हैं और धन सृजन रुक जाता है। गरीबी एकसमान हो जाती है। ये नीतियां कलह फैलाती हैं और समता के हर रास्ते को रोक देती हैं। ये नफरत पैदा करती हैं और देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को भी अस्थिर करती

हमें कांग्रेस की इस भयावह योजना को एक बेकार धमकी की तरह नहीं मानना चाहिए। यह खतरा बहुत वास्तविक है और हमारे देश को अपरिवर्तनीय रूप से नुकसान पहुंचाने वाला है। यह माओवादी सोच और विचारधारा का उदाहरण है। कांग्रेस और उसके युवराज को ऐसे माओवादी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए देखना दुखद है। यह विनाश की ओर ले जाएगा। आपने युवराज को यह कहते हुए देखा होगा कि हम एक्स-रे कराएंगे। यह एक्स-रे हर घर पर छापा मारने के अलावा और कुछ नहीं है। वे किसानों पर छापा मारकर देखेंगे कि उनके पास कितनी जमीन है। वे आम आदमी पर छापा मारकर देखेंगे कि उसने हस्तकला से कितनी संपत्ति अर्जित की है। वे हमारी स्त्रियों की जूलरी पर धावा बोल देंगे। हमारा संविधान सभी अल्पसंख्यकों की संपत्ति की रक्षा करता है। इसका मतलब यह है कि जब कांग्रेस नए सिरे से बंटवारे की बात करती है, तो वह अल्पसंख्यकों की संपत्तियों को नहीं छू सकती है। वह वक्फ की संपत्तियों पर विचार नहीं कर सकती है, लेकिन वह दूसरे सभी समुदायों की संपत्तियों पर नजर रखेगी। इससे सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा होगा। यह ऐसी चीज है, जिसके लिए हमें बहुत सावधान रहना होगा। हम किसी को भी देश और उसके लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाने दे सकते। चाहे उनके पास कोई भी कारण हो। हमारा राष्ट्र, हमारे प्रत्येक नागरिक का कल्याण हमारी पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता है। हमारी सरकार बहुसंख्यकों को लाभ पहुंचाने के लिए नीतियां नहीं बनाती है। हम ऐसी नीतियां नहीं बनाते हैं जिससे अल्पसंख्यकों को लाभ हो। हम ऐसी नीतियां बनाते हैं, जो बिना किसी भेदभाव के हमारे देश और इसके 140 करोड़ नागरिकों को फायदा पहुंचाती हैं।

सीएम केजरीवाल और प्रवर्तन निदेशालय के बारे में क्या बोले पीएम मोदी ?

हाल ही में पीएम मोदी ने सीएम केजरीवाल और प्रवर्तन निदेशालय के बारे में एक बयान दिया है!कई राज्यों में जहां विपक्षी दलों की सरकार है वहां राज्यपालों के साथ टकराव चल रहा है। विपक्षी दलों की ओर से उनके काम में हस्तक्षेप का आरोप लगाया जा रहा है। विपक्ष के आरोप और इन सवालों का पीएम मोदी ने जवाब दिया। पीएम मोदी ने कहा कि राज्यपाल राज्य के संवैधानिक अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। राजनीतिक मतभेदों की परवाह किए बिना सभी दलों द्वारा उनकी स्थिति का सम्मान किया जाना चाहिए। पीएम मोदी ने विपक्षी दल खासकर कांग्रेस पार्टी को लेकर कहा कि राज्यपाल पद की शुचिता के बारे में उन्हें बोलने का कोई अधिकार नहीं है। पीएम मोदी ने दिल्ली के मौजूदा सीएम से जुड़े सवाल का भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यह मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को इस मुद्दे पर पूरा पर्स्पेक्टिव दिखाएं कि दिल्ली के लोग कैसे पीड़ित हैं, अदालतों ने मामले में क्या कहा है। मैं आशावादी हूं कि यह एक मिसाल नहीं बनेगा। मुझे लगता है कि अन्य राजनेताओं में नैतिकता की इतनी कमी नहीं होगी और वे इस हद तक नहीं जाएंगे।

राजभवनों को कांग्रेस भवन में बदलने वाली कांग्रेस पार्टी को राज्यपाल पद की शुचिता के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री बनने से पहले मैं एक दशक से अधिक समय तक एक राज्य का मुख्यमंत्री था। उन वर्षों में मैंने कांग्रेस के राज्यपालों के अधीन काम किया। मैं उनका सम्मान करता था और हमारे मतभेदों के बावजूद वे मेरा सम्मान करते थे। भारत की आजादी के बाद शायद पहली बार हम विभिन्न राज्यों में राज्यपालों पर इस स्तर के हमले देख रहे हैं। हमें यह समझना चाहिए कि राज्यपाल केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक सेतु का काम करता है, जो विविध और विशाल राष्ट्र के प्रशासन में जरूरी संतुलन लाता है। लेकिन यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ राज्यों में हम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा राज्यपाल के काफिले को रोकने और कुछ राज्यों में राजभवन पर पेट्रोल बम फेंकने के बारे में सुन रहे हैं। इस तरह का व्यवहार खतरनाक और अस्वीकार्य है। जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो वे उस राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति के बारे में गंभीर चिंता पैदा करते हैं।

यह कानून के शासन के प्रति लोगों के सम्मान के टूटने का संकेत देता है। जहां तक राज्य के मामलों में राजभवन के हस्तक्षेप की बात है, तो हमें इतिहास पर एक नजर डालने की जरूरत है। किस पार्टी और सत्तारूढ़ लोगों ने राज्य मशीनरी को पंगु बनाने के लिए आर्टिकल 356 का सबसे अधिक दुरुपयोग किया? किस प्रधानमंत्री ने खास तौर पर विपक्ष की चुनी गई सरकारों को गिराने के लिए आर्टिकल 356 का पचास बार इस्तेमाल किया? वहीं, 2014 के बाद से भारत ने कितनी निर्वाचित राज्य सरकारों को अनैतिक रूप से गिराते देखा है? कोई नहीं। इसके बजाय, केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर संबंधों को बढ़ावा देने के प्रयासों के साथ कोऑपरेटिव फेडरलिज्म में बढ़ोतरी हुई है।

हमारे सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को अच्छी तरह से खत्म कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला EVM के महत्व और पारदर्शिता के बारे में विस्तार से बताता है। विपक्ष हमेशा देश को बूथ कैप्चरिंग के युग की ओर ले जाना चाहता है जो केवल बैलट पेपर के जरिए ही संभव है। मुझे नहीं लगता कि जब EVM की बात आती है तो विपक्षी गठबंधन के सदस्यों ने कभी तर्कपूर्ण बात की होगी। उनके लिए EVM हमेशा हार के बाद सुविधाजनक बलि का बकरा रही है। देखिए इस बार क्या अलग होता है।

विपक्ष को सत्ता नहीं मिलने के कारण वह विश्व मंच पर भारत को बदनाम करने में लग जाता है। वे हमारे लोगों, हमारे लोकतंत्र और हमारी संस्थाओं के बारे में अफवाहें फैलाते हैं। युवराज को चुनाव लड़ना पड़ रहा है और भारत के लोग उनसे प्रभावित नहीं हैं, इससे भारत कम लोकतांत्रिक नहीं हो जाता। मुझे नहीं लगता कि विदेशी राजधानियों में इस तरह के आरोपों को स्वीकार करने वाले ज्यादा लोग हैं। वे अक्सर अपने देशों में प्रमाणपत्र की दुकानों की तुलना में वास्तविकता के साथ अधिक तालमेल रखते हैं। जब मैं विश्व नेताओं के साथ बातचीत करता हूं, तो मुझे हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और हमारी संस्थाओं को लेकर सच्ची प्रशंसा दिखाई देती है। जब वे हमारी चुनावी प्रक्रिया के पैमाने और गति को गहराई से समझते हैं, तो वे हमारी कुशलता से आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए एक बयान दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम तुष्टीकरण को लेकर कांग्रेस पर हमलावर हैं। वो करीब-करीब हर रैली में कांग्रेस पार्टी की तुष्टीकरण की राजनीति की चर्चा करते हैं और आम जनता को बताते हैं कि कैसे कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों को बेजा फायदा दिया है। पीएम को ये आरोप लगाने के मौके खुद कांग्रेस ने दिए हैं और दे भी रही है। राहुल गांधी को ही देख लीजिए, उन्होंने एक चुनावी रैली में कहा कि राजा-महाराजा गरीबों को लूटा करते थे। उन्हें जो चीज पसंद आ जाती थी, उस पर कब्जा कर लिया करते थे।विरोधी ताकतें केंद्र में एक ‘कमजोर’ सरकार चाहती हैं ताकि वे अपनी नापाक साजिश को अंजाम दे सकें। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अचानक रद्द कर दिया। इससे लाखों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।उन्होंने विरासत टैक्स पर कांग्रेस के खिलाफ अपने आरोप को दोहराते हुए इस पर पीएम मोदी ने राहुल गांधी को ललकारा कि वो ऐसा ही बयान नवाबों को लेकर देकर दिखाएं। पीएम ने कहा कि राहुल गांधी ने राजाओं-महाराजाओं को लुटेरा बताकर महान शख्सियतों की विरासत का अपमान किया है। पीएम ने दोटूक कहा कि राहुल गांधी ऐसी ही बातें नवाबों के लिए नहीं बोल सकते। पीएम बोले, ‘तुष्टिकरण की आदत कांग्रेस को नवाबों, निजामों, सुल्तानों और बादशाहों के अत्याचारों को लेकर ऐसा ही बोलने से रोकती है।’ पीएम मोदी रविवार को कर्नाटक के बेलगावी में चुनाव प्रचार कर रहे थे। वहां उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस के शहजादे कहते हैं कि हमारे राजा और महाराजा क्रूर थे। उन्होंने छत्रपति शिवाजी और कित्तूर की रानी चेन्नम्मा जैसे लोगों का अपमान किया है, जिनकी बहादुरी और देशभक्ति आज भी हमें राष्ट्रीय गौरव से भर देती है। क्या वो (राहुल) मैसूर के शाही परिवार के बारे में नहीं जानते, जिनका हम सभी बहुत सम्मान करते हैं और जिन पर हमें गर्व है?’ मोदी ने कहा कि यह स्पष्ट है कि राहुल के बयान ‘सावधानीपूर्वक सोचे-समझे’ थे और ‘एक विशेष वोट बैंक को खुश करने के लिए’ थे।

उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस औरंगजेब के घोर अत्याचारों को भूल गई है, जिसने हमारे हजारों मंदिरों को नष्ट कर दिया था। शहजादे उसके और अन्य लोगों के बारे में बात नहीं करते जिन्होंने हमारे तीर्थ स्थलों को नष्ट कर दिया, उन्हें लूट लिया, हमारे लोगों को मार डाला… कांग्रेस अब उन पार्टियों के साथ गठबंधन कर रही है जो औरंगजेब का महिमामंडन करती हैं।’ मोदी ने कहा कि भारत के विकास की विरोधी ताकतें केंद्र में एक ‘कमजोर’ सरकार चाहती हैं ताकि वे अपनी नापाक साजिश को अंजाम दे सकें। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अचानक रद्द कर दिया। इससे लाखों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।राजा-महाराजा गरीबों को लूटा करते थे। उन्हें जो चीज पसंद आ जाती थी, उस पर कब्जा कर लिया करते थे। इस पर पीएम मोदी ने राहुल गांधी को ललकारा कि वो ऐसा ही बयान नवाबों को लेकर देकर दिखाएं। पीएम ने कहा कि राहुल गांधी ने राजाओं-महाराजाओं को लुटेरा बताकर महान शख्सियतों की विरासत का अपमान किया है। पीएम ने दोटूक कहा कि राहुल गांधी ऐसी ही बातें नवाबों के लिए नहीं बोल सकते। पीएम ने बेलगावी के निकट होसा वन्तामुरी गांव में एक अनुसूचित जनजाति की महिला को नग्न अवस्था में घुमाने, चिक्कोडी में एक जैन संत की हत्या और बेंगलुरू के एक कैफे में विस्फोट की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि कर्नाटक में कानून-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई है।

प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र पर भी हमला बोल रहे हैं। उन्होंने कर्नाटक की विभिन्न रैलियों में भी कहा कि कांग्रेस की मंशा आपकी संपत्तियां छीनकर एक खास वर्ग में बांटने की है। तीर्थ स्थलों को नष्ट कर दिया, उन्हें लूट लिया, हमारे लोगों को मार डाला… कांग्रेस अब उन पार्टियों के साथ गठबंधन कर रही है जो औरंगजेब का महिमामंडन करती हैं।’ मोदी ने कहा कि भारत के विकास की विरोधी ताकतें केंद्र में एक ‘कमजोर’ सरकार चाहती हैं ताकि वे अपनी नापाक साजिश को अंजाम दे सकें। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अचानक रद्द कर दिया। इससे लाखों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।उन्होंने विरासत टैक्स पर कांग्रेस के खिलाफ अपने आरोप को दोहराते हुए कहा कि पार्टी जमीन, गाड़ी, बैंक लॉकर, सोना और मंगलसूत्र सहित सभी संपत्तियों की जांच करवाना चाहती है, ताकि उसे अपने वोट बैंक में बांट सके।