Saturday, March 7, 2026
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आखिर क्या है देश के चुनाव चिन्हों की कहानी?

आज हम आपको देश के चुनाव चिन्हों की कहानी सुनाने जा रहे है! 31 वर्षीय अधिवक्ता मनीष कुमार द्विवेदी ने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। लेकिन दूसरे चरण से पहले, कुर्ता-पायजामा पहने वह उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर की गलियों में हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन कर रहे थे। उनके समर्थक उनका फोटो और चुनाव चिन्ह एक साधारण चाय की केतली वाली पर्चे बांट रहे थे। पिछले दो सालों से द्विवेदी एक सामाजिक अभियान का हिस्सा थे, जो कोविड लॉकडाउन के कारण कर्ज में फंसे छोटे व्यापारियों और उद्यमियों की चिंताओं को आवाज देता था। द्विवेदी ने कहा कि जबकि बड़े निगमों को अक्सर कर्ज माफी मिल जाती है, वहीं छोटे लोग संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें बैंक ऋण और क्रेडिट कार्ड बिल का भुगतान करने में कोई राहत नहीं मिल रही है। उनकी बात कौन करेगा?। द्विवेदी का कहना है कि कर्ज माफी और चुकाने की अवधि बढ़ाने के लिए उन्होंने और उनकी टीम ने कई राजनीतिक दलों और सांसदों को पत्र लिखे, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। इसी वजह से उनके समूह ने राजनीति के मैदान में उतरने का फैसला किया। दरअसल, अखिल भारतीय परिवार पार्टी की सभी 543 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना थी। ये सभी लोग पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आते हैं। उन्होंने बताया कि चुनाव चिन्ह का विचार जनता से सुझाव मांगकर जुटाया गया था। उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ रोजगार का प्रतीक था, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘चायवाला’ छवि पर भी एक व्यंग्य था। उन्होंने कहा कि चुनाव चिन्ह यह कहने का एक तरीका था कि हमें सिर्फ चाय नहीं चाहिए, पूरी केतली चाहिए।

चाय की केतली उन कई चुनाव चिन्हों में से एक है, जिन्हें द्विवेदी जैसे उम्मीदवारों ने मौजूदा चुनाव में अपनाया है। आम आदमी की रसोई में इस्तेमाल होने वाली रोजमर्रा की चीजों से लेकर ऊंची उम्मीदों वाले उपकरणों और गैजेट्स तक, सभी चुनाव लड़ रहे हैं। जब चुनाव चिन्हों की शुरुआत हुई थी, तब देश की साक्षरता दर सिर्फ 16% थी। उस समय लोगों से सीधा जुड़ने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता था। आज भी ये उतने ही महत्वपूर्ण हैं, यहां तक कि पार्टी के गुट आपस में फूट पड़ने पर भी चुनाव चिन्ह पर अपना हक जमाने के लिए कोर्ट तक चले जाते हैं।

बड़े राजनीतिक दलों के उलट, निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव आयोग की ओर से लगातार अपडेट की जाने वाली आजाद चुनाव चिन्हों की सूची में से चुनते हैं। इनमें अंगूर, डंबल, वैक्यूम क्लीनर, बैटर आदि शामिल हैं। गौर करने वाली बात ये है कि दशकों से इन चुनाव चिन्हों को एक ही व्यक्ति बनाता आया है। वर्ष 1950 में एम.एस. सेठी को मतपत्र समिति द्वारा ड्राफ्ट्समैन के रूप में नियुक्त किया गया था और 1992 में सेवानिवृत्त हुए। सालों भर उन्होंने साधारण एचबी पेंसिल और कागज की मदद से इन चुनाव चिन्हों को बनाया, जो भारतीय चुनावों का मुख्य हिस्सा बन गए। हालांकि 2000 के दशक में उनका निधन हो गया, उनकी बनाई गई तस्वीरें आज भी वोटिंग मशीनों, पोस्टरों और घरों में नजर आती हैं। भले ही ये चुनाव चिन्ह साधारण दिखते हों और हाथ से बने स्केच से मिलते-जुलते हों, लेकिन उनके पीछे की कहानियां कहीं अधिक जटिल होती हैं।

राजस्थान के चूरू से चुनाव लड़ रहे वकील युसूफ अली खान ने बच्चे के चलने का सहारा (Baby Walker) को अपने चुनाव चिन्ह के रूप में चुना है। खान बताते हैं कि हमारी मारवाड़ी भाषा में इसे ‘रेरूला’ कहते हैं। यह उस चीज का प्रतीक है जिससे बच्चा चलना सीखता है। उसी तरह मैं अपने समुदाय को अपने पैरों पर चलने में मदद करना चाहता हूं। 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव लड़ चुके खान का कहना है कि उनकी लोकसभा चुनाव लड़ने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन फिर उन्हें पता चला कि कांग्रेस ने राजस्थान में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं खड़ा किया है। खान बताते हैं और कहते हैं कि शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना और छात्रवृत्ति के अवसर देना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उनके शब्दों में ‘हम राज्य की आबादी का 9% हैं, लेकिन हमारी कोई आवाज़ नहीं है। मैं इसे बदलना चाहता हूं।’ इसी बीच, सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन सिंह राठौर तरणनगर में लोगों को अपने मकसद के बारे में बताने के लिए अपने चुनाव चिन्ह “बेल्ट” का उपयोग कर रहे हैं। वो कहते हैं कि कोई भी काम करने से पहले कमर कसनी पड़ती है। इसके लिए हमें एक बेल्ट की जरूरत होती है।

एक अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले ये शख्स कहते हैं कि सरकारें आईं और गईं, लेकिन सामाजिक न्याय और आरक्षण के फायदे अभी भी कुछ इलाकों और लोगों तक नहीं पहुंचे हैं। उनके पास आंकड़े हैं जो बताते हैं कि इन समाजों का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है। वो गांव-गांव घूम रहे हैं और लोगों से कह रहे हैं कि जागरूक हों और अपने हक की मांग करें। ये चुनाव उनके लिए “पहला और आखिरी” होगा। कुछ लोग तो ये भी पक्का कर रहे हैं कि चुनाव के दिन जनता उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह ना भूल जाए। अलीगढ़ के पंडित केशव देव ने सबका ध्यान खींचा। वो अपने चुनाव क्षेत्र में घूम रहे थे, गले में चप्पलों की माला पहने हुए, क्योंकि चप्पल ही उनका चुनाव चिन्ह है। डंबल के प्रतीक पर चुनाव लड़ रहे चेन्नई दक्षिण के वी शिवकुमार ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है और लखीमपुर के देबनाथ पैत के लिए, ‘फव्वारे’ के साथ परेड करना लगभग असंभव हो सकता है। लेकिन जैसा कि वे कहते हैं, चुनाव कई आश्चर्य पैदा कर सकते हैं।

क्या अब भारतीय पुलिस के पास भी होगी हाईटेक गन?

आने वाले समय में अब भारतीय पुलिस के पास भी हाइटेक गन हो सकती है! जर्मनी ने हाल ही में भारत को छोटे हथियार बेचने पर लगी रोक हटा दी है। यह कदम दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सैन्य संबंध मजबूत होने का संकेत माना जा रहा है। सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। पहले, जर्मनी गैर-नाटो देशों को छोटे हथियार बेचने पर रोक लगाता था। लेकिन, अब भारत को एक अपवाद के तौर पर छूट दे दी है। इसका मतलब है कि अब जर्मनी से भारत की सेना और राज्य पुलिस को छोटे हथियार मिल सकेंगे। दूतावास से जुड़े सूत्रों के अनुसार, जर्मनी ने इस महीने की शुरुआत में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड को उनकी MP5 सबमशीन गन के लिए अतिरिक्त पुर्जे और सामान खरीदने की अनुमति दे दी है। जर्मन कंपनी हेकलर एंड कोच ही MP5 सबमशीन गन बनाती है, जो अभी भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड और नौसेना के मार्कोस कमांडो इस्तेमाल करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, जर्मनी ने हाल ही में अपने हथियार निर्यात के नियमों को भी आसान बना दिया है। पिछले महीने भारत की कई डिमांड को मंजूर किया है। पहले भी, छोटे हथियारों के अलावा, 95% भारतीय डिमांड मंजूर हो जाते थे, लेकिन प्रक्रिया में बहुत समय लगता था। इसी वजह से जर्मनी ने अब नियमों को आसान बनाया है। भारत और जर्मनी के आपसी संबंध मजबूत हो रहे हैं और दोनों देश रणनीतिक साझेदार बनकर उभर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच सहयोग कई क्षेत्रों में बढ़ रहा है, खासकर अंतरराष्ट्रीय जल में जहाजों के स्वतंत्र आवागमन की आजादी, रास्ते के अधिकार और समुद्री कानून से जुड़े अन्य अधिकारों को लेकर। ये अधिकार संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों पर आधारित हैं। साथ ही, दोनों देशों की विदेश नीति के लक्ष्य भी काफी हद तक मिलते-जुलते हैं।

इस बढ़ते सहयोग की एक मिसाल ये भी है कि जर्मनी और भारत के बीच सैन्य सहयोग भी मजबूत हो रहा है। उदाहरण के तौर पर, इस साल अगस्त में होने वाले बहुराष्ट्रीय वायु युद्धाभ्यास ‘तंरग शक्ति’ में जर्मनी पहली बार बड़े पैमाने पर भाग लेगा। इस महीने की शुरुआत में, भारतीय नौसेना का एक दल जर्मनी के दौरे पर गया था, जहां उन्होंने जर्मनी द्वारा पेश किए जाने वाले Air Independent Propulsion System का निरीक्षण किया। यह दल स्पेनिश कंपनी नवांटिया के AIP सिस्टम का भी निरीक्षण करेगा, जो पनडुब्बी कार्यक्रम के लिए एक अन्य दावेदार है।जर्मनी अपने लड़ाकू विमानों के साथ इस अभ्यास में हिस्सा लेगा और एयरबस कंपनी द्वारा बनाए गए A-400M परिवहन विमान को भी प्रदर्शित करेगा। भारतीय वायुसेना अपने पुराने AN-32 विमानों को बदलने के लिए 18 से 30 टन तक का सामान ले जाने वाले मध्यम परिवहन विमान (MTA) की तलाश कर रही है, जिसमें कई अंतरराष्ट्रीय विमान निर्माता रुचि दिखा रहे हैं।

इसके अलावा, अक्टूबर के आखिर में जर्मनी के दो जहाज-संभवत: एक फ्रिगेट और एक टैंकर जहाज, भारत आने वाले हैं। ये जहाज भारत आने के बाद भारतीय नौसेना के साथ कुछ नौसैनिक युद्धाभ्यास में भी शामिल होंगे।सबमशीन गन के लिए अतिरिक्त पुर्जे और सामान खरीदने की अनुमति दे दी है। जर्मन कंपनी हेकलर एंड कोच ही MP5 सबमशीन गन बनाती है, जो अभी भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड और नौसेना के मार्कोस कमांडो इस्तेमाल करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, जर्मनी ने हाल ही में अपने हथियार निर्यात के नियमों को भी आसान बना दिया है। पिछले महीने भारत की कई डिमांड को मंजूर किया है। पहले भी, छोटे हथियारों के अलावा, 95% भारतीय डिमांड मंजूर हो जाते थे, लेकिन प्रक्रिया में बहुत समय लगता था। इसी वजह से जर्मनी ने अब नियमों को आसान बनाया है। जर्मनी भारत के भविष्य के हल्के टैंकों के लिए इंजन उपलब्ध कराने पर भी बातचीत कर रहा है, हालांकि यह अभी शुरुआती चरण में है और इस पर विचार किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, जर्मनी की तरफ से भारत की नौसेना के लिए 6 आधुनिक परंपरागत पनडुब्बियों की बिक्री के लिए भारत और जर्मनी के बीच एक सरकारी-सरकारी समझौते के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। इस महीने की शुरुआत में, भारतीय नौसेना का एक दल जर्मनी के दौरे पर गया था, जहां उन्होंने जर्मनी द्वारा पेश किए जाने वाले Air Independent Propulsion System का निरीक्षण किया। यह दल स्पेनिश कंपनी नवांटिया के AIP सिस्टम का भी निरीक्षण करेगा, जो पनडुब्बी कार्यक्रम के लिए एक अन्य दावेदार है।

क्या अमेरिका में हो रहा है लोगों पर अत्याचार?

वर्तमान में अमेरिका में लोगों पर अत्याचार हो रहा है !अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अकसर अमेरिका भारत को प्रवचन देता रहता है। लेकिन वो खुद अपने गिरेबां में झांक कर नहीं देखता कि उनके यहां क्या हो रहा। किस तरह कैंपस में घुसकर अमेरिकी पुलिस गुंडागर्दी कर रही। स्टूडेंट्स को अरेस्ट कर रही। यहां तक कि छात्राओं को पुरुष पुलिसवाले गिरफ्तार कर रहे। फिलीस्तीन के समर्थन में विरोध-प्रदर्शन करने के आरोप में एक भारतीय मूल की छात्रा को अरेस्ट किया गया है। स्टूडेंट्स ही नहीं अमेरिकी पुलिस महिला प्रोफेसर को भी नहीं बख्श रही। उन्हें भी घसीटते हुए अरेस्ट करती नजर आ रही। इस चौंकाने वाली घटना वीडियो भी वायरल हो रहा जिसमें दो पुरुष पुलिसकर्मी महिला प्रोफेसर को जमीन पर पटक देते हैं और टॉर्चर करते हुए गिरफ्तार करते हैं। इस वीडियो को देखकर कोई भी सन्न रह जाए। यही नहीं पुलिस टॉर्चर का एक और चौंकाने वाला मामला अमेरिका के ओहयो स्टेट में सामने आया। पुलिस ने एक अश्वेत शख्स को पकड़ने के दौरान इसकदर प्रताड़ित किया कि 53 वर्षीय युवक की मौत हो गई। इस घटना को लेकर भी पुलिस की कड़ी आलोचना हो रही। अमेरिका में हो रही इन घटनाओं ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर खुद को चैंपियन के तौर पर पेश करता रहा है। उसने भारत समेत दूसरे देशों पर इसे लेकर सवाल भी उठाए हैं। हालांकि, अभी जो अमेरिका में हो रहा इससे उसके दोहरे मानदंड का पता चलता है। कैसे वो अपने घर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन तो करता दिख ही रहा, विदेशों में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हेरफेर करता नजर आता है। इसके कई उदाहरण एक के बाद एक सामने आ रहे हैं।

अमेरिका में इस सबसे बड़ा मुद्दा कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में छात्रों के प्रदर्शन से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, ये प्रदर्शन इजरायल के खिलाफ और फिलीस्तीन के समर्थन में हो रहे हैं। वैसे ये प्रदर्शन कई दिनों से चल रहा था लेकिन हाल के दिनों में ये काफी तेजी से बढ़ता दिख रहा। इसकी वजह है अमेरिकी पुलिस की कॉलेज-यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसकर की गई कार्रवाई। जिसमें कई छात्र-छात्राओं को पकड़ा गया। एक भारतीय मूल की छात्रा को भी अरेस्ट किया गया। मामला अमेरिका के प्रिंसटन विश्वविद्यालय का है, जहां पढ़ने वाली भारतीय मूल की छात्रा समेत दो स्टूडेट्स को कैंपस में फिलस्तीन के समर्थन में विरोध-प्रदर्शन के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उनके कैंपस में प्रवेश करने पर रोक लगा दी गई है। छात्रा का नाम अचिंत्य शिवलिंगन कोयंबटूर में जन्मी और कोलम्बस में पली-बढ़ी हैं। अचिंत्य को यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रवेश से रोक दिया गया है और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा रही है।

वहीं अमेरिकी पुलिस की ज्यादती का एक और मामला तब सामने आया जब यूनिवर्सिटी की एक महिला प्रोफेसर को गिरफ्तार किया गया। महिला प्रोफेसर को पकड़ने के लिए पुरुष पुलिसकर्मी आए थे। प्रोफेसर ने इसका विरोध किया तो पुलिस ने उन्हें जमीन पर गिरा दिया और फिर टॉर्च करते हुए हथकड़ी लगा दी। इस दौरान वह महिला चिल्ला रही थी कि वो एक प्रोफेसर हैं। फिर भी पुलिसकर्मी नहीं माने। पूरा घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। इस वीडियो को देखकर पुलिस के रवैये पर सवाल खड़े हो जाते हैं। जरा सोचिए, जिस तरह की कार्रवाई अमेरिकी यूनिवर्सिटी के कैंपस में हुई अगर भारत में ऐसा हुआ होता, तो बवाल ही मच जाता। अमेरिका खुद ऐसी घटना पर रिएक्ट किए बिना रहता।

अमेरिकी पुलिस की ज्यादती का ये अकेला मामला नहीं है। यूएस के ओहयो स्टेट में पुलिस का बर्बर रूप नजर आया। हुआ ये कि पुलिस जब अश्वेत शख्स 53 वर्षीय फ्रैंक टायसन को पकड़ने गई तो उन्होंने उसकी गर्दन को पैरों से जकड़ लिया। उसे जमीन पर गिराकर हथकड़ियां लगाईं। गिरफ्तारी के दौरान वो शख्स बार-बार चिल्लाता रहा कि सांस नहीं ले पा रहा। बावजूद इसके पुलिस ने उसकी बात पर गौर नहीं किया। इस दौरान उस शख्स की हालत इतनी बिगड़ गई कि करीब 15 मिनट में ही उसकी मौत हो गई। टायसन 18 अप्रैल को हुई एक कार दुर्घटना के मामले में आरोपी थे। हालांकि जिस तरह से पुलिस ने उनके साथ सलूक किया वो सन्न करने वाला था। ये पूरा घटनाक्रम पुलिसवालों के बॉडीकैम में रिकॉर्ड हो गया। जिसे देखने के बाद हर कोई पुलिसिया करतूत पर सवाल खड़े कर रहा।

वहीं अमेरिका में हो रहे इन प्रदर्शन को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी रिएक्ट किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी है। इस दौरान उन्होंने अमेरिका को टारगेट करते हुए कहा कि हम सभी को इस बात से आंका जाता है कि हम घर में क्या करते हैं, न कि इस आधार पर कि हम विदेश में क्या करते हैं। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इंडियन एंबेसी भारतीय छात्रों के साथ संपर्क में है।

हाल के वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में गिरावट आई है। द न्यूयॉर्क टाइम्स और सिएना कॉलेज की ओर से आयोजित 2022 के राष्ट्रीय सर्वे में 66% प्रतिभागियों का कहना है कि उन्हें विश्वास नहीं है कि अमेरिकी स्वतंत्र भाषण का आनंद लेते हैं। 8% का यह भी कहना है कि अमेरिकियों को बोलने की आजादी नहीं है। फ्री स्पीच इंस्टीट्यूट की 2022 यूएस स्टेट फ्री स्पीच इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश राज्यों का प्रदर्शन स्वतंत्र भाषण और सभा के अधिकार का सम्मान करने में खराब है।

आखिर क्या है ADR, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल?

आज हम आपको ADR के बारे में जानकारी देने वाले हैं जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए थे! देश में अभी चुनावी माहौल चरम पर है। ऐसा इसलिए क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव में दो फेज की वोटिंग हो चुकी है। अभी पांच चरणों का चुनाव बाकी है। हालांकि, इसी चुनावी घमासान के बीच ईवीएम और वीवीपैट को लेकर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जिसमें सर्वोच्च अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में विश्वास जताया। कोर्ट ने शुक्रवार को VVPAT से हर वोट के वेरिफिकेशन की मांग को लेकर दायर अर्जियों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि ‘निहित स्वार्थी समूह’ ने ईवीएम को बदनाम करने और चुनावी प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालने का प्रयास किया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने ईवीएम-वीवीपैट पर फैसले के दौरान कहा कि हाल के वर्षों में कुछ निहित स्वार्थी समूह की ओर से एक प्रवृत्ति तेजी से विकसित हो रही, जो राष्ट्र की उपलब्धियों को कम करने की कोशिश कर रही। ऐसा लगता है कि हर संभव मोर्चे पर इस महान राष्ट्र की प्रगति को बदनाम करने, कम करने और कमजोर करने का एक ठोस प्रयास किया जा रहा है। इस तरह के किसी भी प्रयास को शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाना चाहिए। कोई भी संवैधानिक अदालत तो बिल्कुल भी इस तरह के प्रयास को तब तक सफल नहीं होने देगी, जब तक कि मामले में उसकी बात मानी जाती है। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद एडीआर चर्चा में आ गया। आइये जानते हैं क्या है एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) भारत में एक गैर-लाभकारी संगठन है। ये ऐसा समूह है जो चुनाव सुधारों पर ध्यान केंद्रित करता है। भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अहमदाबाद के प्रोफेसरों के एक ग्रुप ने 1999 में इसकी स्थापना की थी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, भारत की राजनीतिक और चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की वकालत करने में अहम रोल निभाता रहा है। पिछले दो दशकों के दौरान कोर्ट में एडीआर के हस्तक्षेप से कई महत्वपूर्ण चुनावी सुधार हुए हैं। अकसर कोर्ट और कुछ अवसरों पर चुनाव आयोग ने भी इन सुधारों की वकालत की है, तब भी जब सरकार ने बदलावों का विरोध किया।

साल 2000-2001 में ADR ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। इसमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक बैकग्राउंड की जानकारी का खुलासा करने की मांग की गई। साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने ADR की जनहित याचिका के जवाब में ऐतिहासिक निर्णय दिया। इसमें कोर्ट ने कहा कि चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को चुनाव आयोग के साथ एक हलफनामा दायर करके अपनी आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना होगा।

चुनावी प्रक्रिया में खुलासे और पारदर्शिता के दायरे को बढ़ाने के लिए ADR ने विभिन्न कानूनी लड़ाइयों में हिस्सा लेना जारी रखा। कई चुनाव सुधारों में इनका योगदान रहा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स अलग-अलग चुनावों में उम्मीदवारों की ओर से दायर हलफनामों पर विस्तृत विश्लेषण रिपोर्ट प्रकाशित करता है। इसमें आपराधिक केस, संपत्ति और शैक्षिक योग्यता जैसे पहलुओं का जिक्र रहता है। ADR ने चुनावी उम्मीदवारों के बैकग्राउंड को मतदाताओं तक आसानी से पहुंचाने के लिए MyNeta ऐप विकसित किया।

एडीआर ने चुनावी बॉन्ड में पारदर्शिता की वकालत की। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, राजनीतिक फंडिंग के लिए चुनावी बॉन्ड योजना का मुखर आलोचक रहा। वो दानदाताओं के संबंध में अधिक पारदर्शिता की वकालत करता रहा है। एडीआर को अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं से आलोचना और प्रतिक्रियाओं का भी सामना करना पड़ा है। पारदर्शिता और जवाबदेही की वकालत करने में अहम रोल निभाता रहा है। पिछले दो दशकों के दौरान कोर्ट में एडीआर के हस्तक्षेप से कई महत्वपूर्ण चुनावी सुधार हुए हैं। अकसर कोर्ट और कुछ अवसरों पर चुनाव आयोग ने भी इन सुधारों की वकालत की है, तब भी जब सरकार ने बदलावों का विरोध किया।इसके अलावा एडीआर को कई अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के काम ने भारत में चुनावी परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया है। इससे चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो गई है। राजनीति में पैसों और अपराध के प्रभाव को कम करने में मदद मिली है। चुनाव सुधारों को बढ़ावा देने में आगे बढ़कर काम करने के लिए इस संगठन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है।

क्या चीन ने बना लिया है अपना नया सैन्य अड्डा?

चीन ने अपना एक नया सैन्य अड्डा बना लिया है! चीन अमेरिका को उसके घर में घेरने के लिए कैरेबियाई देश एंटीगुआ में सैन्य अड्डा स्थापित करने की तैयारी में है। इसके लिए चीन ने एंटीगुआ के बंदरगाहों, हवाई अड्डों, वाटर सिस्टम सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों में निवेश को बढ़ा दिया है। इससे एंटीगुआ पर चीनी कर्ज काफी ज्यादा हो गया है। एंटीगुआ अमेरिका के वर्जिन द्वीप समूह के तट से केवल 220 मील की दूरी पर स्थित है। इस देश में करीब 1000 चीनी सुरक्षा गार्ड तैनात हैं। चीन ने एंटीगुआ के एक 1000 एकड़ के द्वीप को अपना ठिकाना बनाया हुआ है। माना जा रहा है कि इस द्वीप का इस्तेमाल अमेरिका की जासूसी करने और भविष्य में उसे सैन्य अड्डे के रूप में इस्तेमाल करने के लिए किया जा सकता है। एंटीगुआ में चीन की मौजूदगी से पूरे कैरिबियाई देशों में अमेरिका के लिए टेंशन बढ़ सकती है। न्यूजवीक की रिपोर्ट के अनुसार, एंटीगुआ की इस द्वीप को चीन एक विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करेगा। चीन के कब्जे वाले इस द्वीप की अपनी सीमा शुल्क और आव्रजन औपचारिकताएं होंगी। इसके अलावा इस द्वीप के लिए एक शिपिंग बंदरगाह और एक समर्पित एयरलाइन भी होगी। इतना ही नहीं, चीनी अधिकारी इस द्वीप के निवासियों के लिए पासपोर्ट जारी करने में सक्षम होंगे।जहां केवल 97,000 लोग रहते है। ब्राउन ने कहा, पश्चिमी देश एंटीगुआ को आवश्यक मदद नहीं दे रहे हैं। चीन यहां लॉजिस्टिक्स से लेकर क्रिप्टोकरेंसी, चेहरे की सर्जरी से लेकर “वायरोलॉजी” तक सब कुछ प्रदान करने वाले व्यवसाय स्थापित करेगा।

न्यूजवीक ने सरकार और कॉरपोरेट दस्तावेजों की जांच के बाद बताया कि चीन, उसकी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियां और संबद्ध निजी व्यवसाय द्वीप राष्ट्र एंटीगुआ और बारबुडा और इस रणनीतिक क्षेत्र के अन्य कैरेबियाई देशों में तेजी से विस्तार कर रहे हैं। कैरिबियाई देशों को लंबे समय से “अमेरिका की तीसरी सीमा” के रूप में जाना जाता है। 1960 के दशक में क्यूबा में सोवियत संघ की स्थापना के बाद से चीन की बढ़ती क्षेत्रीय उपस्थिति संभावित रूप से अमेरिका के लिए सबसे बड़ी बाहरी चुनौती है। इससे अमेरिकी सेना भी चिंतित है। अमेरिकी सेना के फ़्लोरिडा स्थित दक्षिणी कमान (साउथकॉम) के एक प्रवक्ता ने न्यूज़वीक को बताया, “हम जानते हैं कि चीन सैन्य उद्देश्यों के लिए अपनी वाणिज्यिक और राजनयिक उपस्थिति का उपयोग कर सकता है। एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में, चीन पहले ही सैन्य उद्देश्यों के लिए मेजबान देश के बंदरगाहों पर वाणिज्यिक समझौतों का दुरुपयोग कर चुका है; हमारी चिंता यह है कि वह यहां भी भी ऐसा ही कर सकता है। एंटीगुआ की इस द्वीप को चीन एक विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करेगा। चीन के कब्जे वाले इस द्वीप की अपनी सीमा शुल्क और आव्रजन औपचारिकताएं होंगी। इसके अलावा इस द्वीप के लिए एक शिपिंग बंदरगाह और एक समर्पित एयरलाइन भी होगी। इतना ही नहीं, चीनी अधिकारी इस द्वीप के निवासियों के लिए पासपोर्ट जारी करने में सक्षम होंगे।आलोचकों का कहना है कि चीन से करोड़ों डॉलर के ऋण और अनुदान और चीनी राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों द्वारा बंदरगाहों, हवाई अड्डों और जल प्रणालियों सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के व्यापक निर्माण से एंटीगुआ अब चीन के सामने के यार्ड में बदल रहा है।

एंटीगुआ के प्रधानमंत्री गैस्टन ब्राउन ने सेंट जॉन्स में एक न्यूजवीक को दिए इंटरव्यू में चीन और उसके नेता शी जिनपिंग की प्रशंसा की। 170 वर्ग मील में फैला सेंट जॉन्स एंटीगुआ की राजधानी है, जहां केवल 97,000 लोग रहते है। ब्राउन ने कहा, पश्चिमी देश एंटीगुआ को आवश्यक मदद नहीं दे रहे हैं। ब्राउन ने कहा, “हालांकि, मैं चीन को एक ऐसे देश के रूप में देखता हूं जो सच्चाई पर कायम है, और एक ऐसा देश है, जिसमें कम से कम छोटे राज्यों और आम तौर पर वैश्विक स्तर पर गरीबों और वंचित व्यक्तियों के लिए कुछ हद तक सहानुभूति है।” यही नहीं आपको बता दें कि चीन ने करीब एक दशक बाद अपनी सेना में बड़ा बदलाव किया है और आधुनिक युद्ध यानी मॉडर्न वॉरफेयर की चुनौतियों से निपटने के लिए एक नई यूनिट बनाने की घोषणा की है. इस यूनिट को नाम दिया है इन्फॉर्मेशन सपोर्ट फोर्स (ISF). 19 अप्रैल को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स, जो इंटेलिजेंस कलेक्शन से लेकर साइकोलॉजिकल वायरफेयर, इन्फॉर्मेशन वारफेयर, स्पेस वायरफेयर और इलेक्ट्रॉनिक वायरफेयर के लिए जिम्मेदार थी, उसे भंग कर दिया गया और उसकी जगह इस नई यूनिट को बनाने का ऐलान किया गया. 

क्या भारत के लिए महत्वपूर्ण बन चुका है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत के लिए महत्वपूर्ण बन चुका है! क्या मशीन या कंप्यूटर आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता या आर्टिफिशल इंटेलिजेंस निकट भविष्य में मानवीय बुद्धिमत्ता के करीब पहुंच जाएगी या उसे पीछे छोड़ देगी? यह सवाल इन दिनों ड्रॉइंग रूम की चर्चाओं से लेकर बड़ी टेक्नॉलजी कंपनियों के बोर्डरूम और नीति-निर्माताओं के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट फॉर ह्यूमन सेंटर्ड AI की ताजा रिपोर्ट- AI इंडेक्स, 2024 के मुताबिक, पिछले साल AI ने कई तरह के कामों – जैसे तस्वीरों के वर्गीकरण, दृश्य तार्किकता और अंग्रेजी भाषा की समझ – में मनुष्यों के प्रदर्शन के बेंचमार्क को पीछे छोड़ दिया, लेकिन कई ज्यादा जटिल कामों में वह मानवीय बुद्धिमत्ता से काफी पीछे है। ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि AI को मानवीय बुद्धिमत्ता के स्तर तक पहुंचने में अभी दशकों लगेंगे। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक, AI मानवीय बुद्धिमत्ता के स्तर पर कभी नहीं पहुंच पाएगी। इस मामले में भविष्यवाणी मुश्किल है। लेकिन AI की कारोबारी और रणनीतिक संभावनाओं के दोहन को लेकर अमीर देशों के साथ चीन और दुनिया की बड़ी टेक्नॉलजी कंपनियों में होड़ मची हुई है। इस होड़ को देखते हुए लगता है कि AI कुछ वर्षों में कई और मामलों में मानवीय बुद्धिमत्ता को टक्कर देने लगेगी।

विकसित देशों की सरकारें और बड़ी टेक कंपनियां AI रिसर्च पर अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। AI इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल बिगड़ती वैश्विक आर्थिक स्थितियों के कारण AI रिसर्च में निजी निवेश में गिरावट आई। लेकिन जेनरेटिव AI में निजी निवेश 2022 की तुलना में आठ गुणा बढ़कर 2520 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। बड़ी टेक कंपनियां अपने AI मॉडल को ट्रेनिंग देने पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं। उदाहरण के लिए, OpenAI ने ChatGPT-4 की ट्रेनिंग पर बीते साल 7.8 करोड़ डॉलर और गूगल ने जेमिनाय अल्ट्रा की ट्रेनिंग पर 19.1 करोड़ डॉलर खर्च किए।नतीजा यह कि एक बार फिर अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और चीन और पूर्वी एशिया (दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, जापान आदि) और उनकी बड़ी टेक कंपनियां AI रिसर्च, पेटेंट और नए मॉडल विकसित करने के मामले में बहुत आगे निकल गई हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश इस होड़ में एक बार फिर पिछड़ रहे हैं। AI इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, 2022 तक AI से जुड़े कुल पेटेंटों में चीन और पूर्वी एशिया का हिस्सा 75.2%, उत्तर अमेरिका 21.2%, यूरोपीय संघ का हिस्सा 2.33% था। भारत के हिस्से कुल पेटेंटों का मात्र 0.23% आया है।

इसका मतलब यह नहीं कि चीन और पूर्वी एशिया के देशों ने AI के मामले में अमेरिका और यूरोपीय संघ का दबदबा तोड़ दिया है। पिछले साल जो महत्वपूर्ण AI मॉडल रिलीज हुए, उनमें 61 अमेरिका से, 21 यूरोपीय संघ के देशों से और 15 चीन से आए। इसी तरह अहम AI मॉडल के विकास में अमीर विकसित देशों की टेक कंपनियां आगे बनी हुई हैं। बीते साल इन कंपनियों ने 51 मशीन लर्निंग मॉडल विकसित किए, जबकि अकादमिक शोध संस्थाओं से 15 मॉडल और दोनों के सहयोग से 21 मॉडल तैयार हुए।  भारत और दूसरे बड़े विकासशील देश और उनकी टेक कंपनियां इस दौड़ में पीछे छूट रही हैं। पिछले सप्ताह केंद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद ने माना कि भारत अगर अपना विज्ञान और अपनी तकनीक विकसित नहीं करता है तो वह अपेक्षित तेज आर्थिक वृद्धि दर हासिल नहीं कर पाएगा। उनके मुताबिक, भारत पहले कई महत्वपूर्ण तकनीकी विकास में पीछे रह गया, लेकिन वह AI, क्वांटम तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक आदि के मामले में ऐसा नहीं होने दे सकता।

यही नहीं, AI की रणनीतिक भूमिका को देखते हुए भी बड़े विकसित देश इसके शोध में भारी निवेश कर रहे हैं। इसलिए भारत को AI रिसर्च में न सिर्फ सार्वजनिक निवेश बढ़ाने पर जोर देना चाहिए बल्कि AI के रेग्युलेशन के मानक तय करने में भी अगुआई करनी चाहिए। उसे G20 प्लैटफॉर्म और अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर सुरक्षित और विश्वसनीय AI विकसित करने की मुहिम को आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि मुनाफे के लालच में AI के साथ जुड़े जोखिमों पर कम ध्यान दिया जा रहा है या उसे पूरी तरह से बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया खासकर जनमत और चुनावों को प्रभावित करने के लिए AI का इस्तेमाल करके डीप फेक ऑडियो और विडियो तैयार किए जा रहे हैं, जो चिंताजनक है। रिपोर्ट AI में निहित पूर्वाग्रहों और राजनीतिक-वैचारिक झुकावों की चर्चा भी करती है। यही नहीं, मतदाताओं की निगरानी की जा रही है और उनके मानसिक-भावनात्मक व्यवहार को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिशें बढ़ रही हैं। AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल और उसकी बढ़ती ताकत के मद्देनजर इन सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

क्या हथियारों की खरीदारी से बढ़ती है देश में गरीबी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हथियारों की खरीदारी से देश में गरीबी बढ़ती है या नहीं! 1960 के दशक की बात है, जब अमेरिका वियतनाम युद्ध में अपनी नाक बचाने के लिए लड़ रहा था। सैन्य खर्चों और हथियारों समेत साजोसामान पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा था। उस वक्त अमेरिका में द ग्रेट सोसायटी प्रोग्राम की शुरुआत की गई, जिसका मकसद था देश को गरीबी से निजात दिलाना। दरअसल, जॉन एफ केनेडी के बाद नए नवेले राष्ट्रपति बने लिंडन बी जॉनसन के सामने बड़ी चुनौती यह थी कि देश को गरीबी से कैसे उबारा जाए।उन्होंने 1965 में इसी प्रोग्राम की शुरुआत की। यही नारा उन्होंने चुनाव के वक्त दिया था जो लोगों में काफी पॉपुलर भी रहा और जॉनसन अमेरिकी इतिहास में करीब 1.5 करोड़ के अंतर से चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने। दरअसल, युद्धों ने अमेरिका को तबाह कर दिया था, जिसका नतीजा बाद में 1974 में यह रहा कि वहां पर मंदी आ गई। सैन्य खर्चों ने अमेरिका जैसे पूंजीपति देश को गरीबी में धकेल दिया। इसके बाद इससे उबरने के लिए अमेरिकी सरकारों ने कई प्रोग्राम चलाए। अगर आपसे ये सवाल पूछा जाए कि देश से गरीबी दूर करने की जरूरत है या हथियार खरीदने में पैसे लगाए जाएं। कुछ लोगों का जवाब ये हो सकता है कि देश की ताकत बढ़ाने के लिए हथियारों की खरीद जरूरी है। वहीं कुछ लोग यह कह सकते हैं कि गरीबी जैसी बड़ी चुनौती से पार पाने के लिए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का ज्यादा हिस्सा खर्च होना चाहिए। चलिए-इस बहस को यहीं छोड़ते हैं और एक रिपोर्ट जानते हैं। दरअसल, भारत सैन्य पर पैसे खर्च करने के मामले में अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया में चौथा सबसे बड़ा देश बन चुका है। बीते साल भारत का सैन्य बजट पर 83.6 बिलियन डॉलर यानी करीब 6.9 लाख करोड़ रुपए रहा। दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि यह बहस अरसे से चली आ रही है। हालांकि, जीडीपी का जितना हिस्सा सैन्य खर्चों में जाता है, उससे काफी कम में गरीब आदमी के रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई पर खर्च किया जा सकता है। सरकार कोई भी हो, उसे लोगों के सामने यह दिखाना होता है कि उसका देश किसी से ताकत में कम नहीं है। यही वजह है कि ऐसे सैन्य खर्चों में बढ़ोतरी होती है। सरकारें गरीबी दूर करने पर भी खर्च करती हैं, मगर वह इतना मामूली होता है कि उससे गरीब भी बने रहते हैं और गरीबी भी कम नहीं होती। बस आंकड़ों में गरीबी कम होती जाती है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की हाल में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने 2022 के मुकाबले सैन्य खर्चों में 4.2 फीसदी की बढ़ोतरी की। लद्दाख में सीमा पर तनाव के बाद से अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने और सैन्य ढांचे को मजबूत करने के लिए यह बजट दिनोंदिन बढ़ रहा है। 2013 से अब तक भारत ने अपने सैन्य खर्चों में 47 फीसदी की बढ़ोतरी की है। अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देख लेते हैं। भारत ने 2024-25 के लिए डिफेंस बजट को जो पैसे दिए हैं, वो देश के सकल घरेलू विकास यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) का 1.89 फीसदी बैठता है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की 2016 में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि भारत को गरीबी से निपटने के लिए हर साल अपनी कुल जीडीपी का 3.7% यानी 5.2 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की जरूरत है। इसका मतलब यह है कि जितना भारत सैन्य खर्च कर रहा है, उससे कहीं कम देश से गरीबी दूर करने में मदद मिल सकती है।

अमेरिका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में एरोल एंथनी हैंडरसन की एक रिसर्च छपी ‘मिलिट्री स्पेंडिंग एंड पॉवर्टी’। इस रिसर्च में कहा गया है कि सेना और साजो-सामान पर जितना ज्यादा खर्च होता है, गरीबी उतनी ही बढ़ती जाती है। हालांकि, युद्ध के समय सैन्य खर्चों में बढ़ोतरी से गरीबी में कमी आती है। शांतिकाल में सैन्य खर्चों में बढ़ोतरी से गरीबी में इजाफा होता है। SIPRI की हालिया रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में 2023 में सैन्य खर्च 2022 के मुकाबले 6.8 फीसदी बढ़कर 24.4 खरब डॉलर पर पहुंच गया। 2022 में यह सैन्य खर्च 22.4 खरब डॉलर था। यानी ये कहा जा सकता है भले ही हम सैन्य साजो-सामान पर बहुत ज्यादा खर्च कर रहे हैं, मगर दुनिया पहले के मुकाबले ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही है।

अगर इनकम से गरीब नापी जाए तो गरीबी रेखा मॉनीटरी इनकम की वह सीमा है, जिसमें कोई व्यक्ति जीवन जीने के लिए बुनियादी सुविधाएं हासिल करता है। विश्व बैंक ने कहा है कि औसतन जो व्यक्ति हर दिन करीब 180 रुपए से कम कमाता है, उसे गरीबी रेखा से नीचे माना जा सकता है। हालांकि, कई देशों में आर्थिक स्थिति के आधार पर बुनियादी जरूरतों के हिसाब से गरीबी रेखा अलग-अलग हो सकती है। भारत में गरीबी रेखा की सीमा शहरी क्षेत्रों के लिए 1,286 रुपए प्रति माह और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 1,059.42 रुपए प्रति माह तय की गई है।

ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स के मुताबिक, 2006 से लेकर 2016 तक भारत ने गरीबी कम करने काफी सफलता पाई है। इन 10 साल में भारत ने 27 करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी से उबारने में कामयाब रहा। इसी ग्लोबल MPI के मुताबिक 2020 तक भारत में करीब 26 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे थे, जो अब भारत जैसे देश के लिए टेंशन वाली बात है। नीति आयोग ने भी कहा है कि देश की करीब 25 फीसदी आबादी गरीबी में जी रही है। उसे रोटी-कपड़ा और मकान के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

जब पहली बार अस्तित्व में आई इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन!

एक ऐसा समय जब पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन अस्तित्व में आई थी! सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर सुनवाई हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ईवीएम के सोर्स कोड का खुलासा कभी नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। इस टिप्पणी से 47 साल पीछे भारत के चुनावी इतिहास में चलते हैं। 1977 के आम चुनाव की बात है, जब देश में आपातकाल लगा हुआ था। मार्च में हुए इस चुनाव में देश के 29 लोकसभा सीटों पर हथियारबंद लोगों द्वारा जबरन बैलेट पेपर लूट लिए गए और बूथ कैप्चरिंग की गई। उस वक्त एक कश्मीरी पंडित और लोकसभा सचिवालय के बड़े अधिकारी रह चुके शामलाल शकधर चुनाव में ऐसी घटनाओं से बड़े आहत हुए। जून, 1977 में वह देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि कुछ भी करके चुनावी यज्ञ को बिना किसी बाधा के संपन्न कराना है। उनके मन में यह ख्याल आया कि जब 1952 से संसद की कार्यवाहियों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है तो फिर चुनावों में क्यों नहीं। उनके दिमाग में आया यह विचार ही देश में निष्पक्ष चुनावों की नींव रखने वाला बना। शामलाल शकधर 1953 में लोकसभा के पहले संयुक्त सचिव बने थे। ऐसे में उनका यह अनुभव बेहद काम आया। उन्होंने पद संभालते ही सबसे पहले हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड(ECIL) का दौरा किया और उसे वोटिंग मशीन का एक प्रोटोटाइप डेवलप करने को कहा। उस वक्त आपातकाल लगाने वालीं इंदिरा गांधी हार चुकी थीं। दिल्ली की सत्ता पर जनता पार्टी की सरकार आ चुकी थी। शकधर ने सरकार से चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के इस्तेमाल की संभावना तलाशने को कहा। 1980 में ECIL ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पहला प्रोटोटाइप बनाकर चुनाव आयोग को सौंप दिया। इस मशीन में तब 6 बटन लगे थे, जो 6 चिप से जुड़े थे। हरेक बटन एक चुनाव उम्मीदवार से संबंधित था। यह मशीन सभी वोट को रिकॉर्ड कर लेती थी। आयोग के सामने इसका प्रदर्शन बेहतर रहा, मगर इसमें प्रत्याशियों के नाम रखने की संख्या सीमित थी। इसके बाद आयोग ने तब भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) से वोटिंग मशीन बनाने को कहा, जिसमें एकसाथ 64 प्रत्याशियों के नाम दर्ज रहते थे। अप्रैल, 1981 में चुनाव आयोग के सामने इस मशीन का प्रदर्शन इतना बेहतरीन रहा कि आयोग ने BEL को ऐसी मशीनों को बनाने की मंजूरी दे दी।

केरल की एक विधानसभा सीट थी पेरावायुर, जिसने तब मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां मई, 1982 में चुनाव कराए गए। इसके 123 पोलिंग बूथों में से 50 पर परंपरागत बैलेट पेपर की जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल किया गया। यहां मतदान बेहद शांतिपूर्ण और ईवीएम का ट्रायल पूरी तरह सफल रहा। इस ट्रायल के बाद 10 और उपचुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ। इसी के साथ चुनावों में ईवीएम मशीन के सफर की शुरुआत हो गई। यह सफर आज इतना हो चुका है कि लोकसभा चुनाव, 2024 में देश में 55 लाख ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

केरल की जिस सीट पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था, उस चुनाव को ही सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रद्द कर दिया। 1984 में इस मामले से जुड़ी एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना संसद में कानून बने चुनावों में ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इस वजह से 2 साल तक ईवीएम मशीनों को कोल्ड स्टोरेज में रहना पड़ा। 1989 में आखिरकार संसद में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन किया गया और चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल के प्रावधान को जोड़ा गया।

1998 में फिर से ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर आम सहमति बनी। मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के 25 विधानसभा क्षेत्रों में ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद 1999 में गोवा ऐसा पहला राज्य बना, जहां नई विधानसभा के लिए पूरे राज्य में ईवीएम मशीनों से ही चुनाव कराए गए। इसके बाद इनका इस्तेमाल 1999 में 45 लोकसभा क्षेत्रों में किया गया। इसके बाद मई, 2001 में तमिलनाडु, केरल, पुड्डुचेरी और पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल किया गया। 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार सभी संसदीय सीटों पर ईवीएम से ही चुनाव कराए गए। इन सीटों पर 10 लाख से ज्यादा ईवीएम का इस्तेमाल हुआ।

ईवीएम और वीवीपैट की खासियत यह है कि इन्हें बाहरी पावर सप्लाई की जरूरत नहीं होती। इनके पास अपनी बैटरी और पावर पैक होता है। इससे इनकी हैकिंग की आशंका भी नहीं रहती है। वीवीपैट का इस्तेमाल कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 में संशोधन के बाद शुरू हुआ। 14 अगस्त, 2013 को आयोग ने इसका इस्तेमाल शुरू किया। चुनाव में पहली बार नगालैंड की नोकसेन विधानसभा सीट पर 4 सितंबर, 2013 को हुए उपचुनाव में वीवीपैट का इस्तेमाल हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने बीते बुधवार को यह साफ किया है कि ईवीएम सोर्स कोड का कभी भी खुलासा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने चुनाव के दौरान ईवीएम से डाले गए वोटों के साथ मतदाता वीवीपैट पर्चियों के मिलान के निर्देश देने की मांग वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह मौखिक टिप्पणी की।

आखिर देश के मुसलमान के पास कितनी है प्रॉपर्टी?

आज हम आपको बताएंगे कि देश के मुसलमान के पास कितनी प्रॉपर्टी है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक चुनावी रैली में कहा था कि कांग्रेस माताओं-बहनों के सोने का हिसाब करेगी। फिर उस संपत्ति को उनको बांटेगे जिनके बारे में मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा था कि संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। मोदी के इस बयान के बाद प्रचंड गर्मी में सियासी पारा और बढ़ गया है। कांग्रेस पीएम मोदी के इस बयान को लेकर चुनाव आयोग तक पहुंच गई है। सियासी बयानबाजी जो भी हो, लेकिन यह हकीकत है कि देश में मुसलमानों के पास संपत्ति की ज्यादा कमी नहीं है। बीते साल अल्पसंख्यक मंत्रालय ने फरवरी में लोकसभा में यह जानकारी दी थी कि मुस्लिमों की संस्था वक्फ बोर्ड के पास दिसंबर, 2022 तक कुल 8,65,646 अचल संपत्ति थी। एक आंकड़े के अनुसार, भारत में वक्फ की कुल संपत्ति करीब 8 लाख एकड़ है। यह संपत्ति इतनी ज्यादा है कि सेना और रेलवे के बाद वक्फ के पास सबसे ज्यादा प्रॉपर्टी है। 2009 में यह प्रॉपर्टी करीब 4 लाख एकड़ ही थी, जो अब दोगुनी हो चुकी है। वक्फ को मुस्लिमों का रहनुमा कहा जाता है, फिर भी देश में मुस्लिमों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। सच्चर कमेटी के अनुसार, देश में मुस्लिमों की हालत अनुसूचित जातियों से भी ज्यादा बदतर है।

भारत में वक्फ की शुरुआत दिल्ली सल्तनत से हुई। एस अतहर हुसैन और एस खालिद राशिद की किताब वक्फ लॉज एंड एडमिनिस्ट्रेशन इन इंडिया (1968) में कहा गया है कि सुल्तान मुइजुद्दीन सैम घावोर ने मुल्तान की जामा मस्जिद को दो गांव दिए थे। जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत थी, तब भी वक्फ की संपत्ति को लेकर खूब विवाद हुआ। यह विवाद इतना बढ़ा कि लंदन स्थित प्रिवी काउंसिल तक जा पहुंचा। 4 ब्रिटिश जजों ने वक्फ को अवैध करार दिया था। मगर, उनके फैसले को तत्कालीन ब्रिटिश भारत की सरकार ने नहीं माना। मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट, 1913 के जरिए वक्फ को बचा लिया गया। अब चुनाव में जिस सोने की बात की जा रही है, जरा उसका ब्यौरा नीचे दिए ग्राफिक से समझते हैं। यह जानते हैं कि किसके पास कितना सोना है?

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में वक्फ एक्ट बनाया, जिसका काम वक्फ का केंद्रीयकरण करना था। इसी एक्ट के तहत सरकार ने 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल का गठन किया। 1995 में कानूनों में बदलाव किया गया। हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में वक्फ बोर्ड बनाने की अनुमति दी गई। वक्फ की प्रॉपर्टी को लेकर किसी मामले में सेंट्रल वक्फ काउंसिल केंद्र को सलाह देती है। किसी विवाद की स्थिति में वक्फ प्रॉपर्टी ट्रिब्यूनल ही फैसला करेगा।

देश में मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का हाल जानने के लिए 2005 में सच्चर कमेटी बनी थी। इस कमेटी 2006 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि एससी, एसटी और अल्पसंख्यक आबादी वाले गांवों और आवासीय इलाकों में स्कूल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, सस्ते राशन की दुकान, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाओं की काफी कमी है। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय की हालत अनुसूचित जाति और जनजाति से भी खराब है। 2006 में सरकारी नौकरियों में महज 4.9 फीसदी ही मुस्लिम थे।

2020 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ दलित स्टडीज की एक स्टडी प्रकाशित हुई। ‘स्टडी रिपोर्ट ऑन इंटर ग्रुप इनइक्वलिटी इन वेल्थ ओनरशिप इन इंडिया’ के अनुसार, देश की कुल संपत्ति का करीब 41 फीसदी संपत्ति हिंदुओं के हाथ में है। इसके बाद 31 फीसदी संपत्ति हिंदु ओबीसी के पास है। वहीं, मुस्लिमों के पास 8 फीसदी, अनुसूचित जाति के पास 7.3 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के पास 3.7 फीसदी संपत्ति है। रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुओं की अगड़ी जातियों के पास जितनी संपत्ति है, उसकी कुल कीमत 1,46,394 अरब रुपए है, जो एसटी के 13,268 अरब रुपए से 11 गुना ज्यादा है। मुस्लिमों के पास 28,707 अरब रुपए की संपत्ति है।

इतिहासकार डॉ. दानपाल सिंह के अनुसार, मुस्लिम समुदाय या वक्फ बोर्ड के पास पर्याप्त प्रॉपर्टी है। उन्हें हिंदुओं से लेने की जरूरत नहीं है। सबसे जरूरी बात है मुस्लिमों की शिक्षा की। सच्चर कमेटी कहती है कि आम आबादी के 70 फीसदी बच्चों के मुकाबले केवल 59 फीसदी मुस्लिम बच्चे की प्राइमरी एजुकेशन ले पाते हैं। मुस्लिम बच्चों में बहुत से ऐसे हैं जिन्हें बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ता है। वहीं, हायर एजुकेशन के मामले में तो हालात और खराब हैं। केवल 4.9 फीसदी मुस्लिम बच्चे ही यूनिवर्सिटी में दाखिला ले पाते हैं। वो कहते हैं कि वक्फ बोर्ड ज्यादातर धार्मिक काम ही करता है। वह अपने मालिकाना हक वाली जमीनों और मस्जिदों के रखरखाव पर पैसे खर्च करता है। इसी के साथ वक्फ की जमीन पर बनी यूनिवर्सिटी, स्कूलों और मदरसों का प्रबंधन भी करता है। ऐसे में उसे मुस्लिम समुदाय के उत्थान के लिए मुस्लिम समुदाय की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। वक्फ अगर अपनी मिल्कियत मुस्लिमों की एजुकेशन में लगाए तो मुसलमानों के हालात बेहतर हो सकते हैं। मुस्लिम समाज को सामाजिक और आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है, ताकि देश की जीडीपी में वो बेहतर योगदान कर सकें।

आखिर क्या है संपत्ति के पुनर्वितरण का विवाद?

आज हम आपको संपत्ति के पुनर्वितरण के विवाद को बताने जा रहे हैं! अच्छी बात है कि भारत में आखिरकार पुनर्वितरण पर बहस हो रही है। यह मुद्दा लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन इसे जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा था। औपनिवेशिक युग और उससे पहले की ऐतिहासिक असमानता ने एक लंबी छाया छोड़ी है और आजादी के बाद भारत सरकार ने जो समाजवादी नीतियां अपनाईं, उसका भी असर हुआ। ऐसे देश में जहां ज्यादातर लोग अमीर नहीं हैं, redistribution राजनीतिक बयानबाजी का एक जरिया है। ऐसे देश में जो अमीर नहीं है, वहां इस तरह की पहल नुकसान पहुंचा सकती है क्योंकि इसमें केवल एक चीज जो redistribute होती है, वह है गरीबी। आइए, पुनर्वितरण के बारे में पांच जरूरी बातों पर नजर डालते हैं। पहली बात, राष्ट्रीय संपत्ति क्या है, जिसका पुनर्वितरण होता है? यह दरअसल निजी संपत्ति का एक अंश है, जिसे टैक्स के रूप में भारत सरकार लेती है। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर का एक प्रसिद्ध वाक्य है कि सरकारी पैसा जैसी कोई चीज नहीं होती। असल में यह टैक्सपेयर्स का पैसा होता है।

वेल्थ क्रिएट करते हैं उद्यमी। मध्य वर्ग और यहां तक कि निम्न मध्य वर्ग भी बचत करता है। फिर वह इसे जमीन, गोल्ड और इक्विटी में निवेश करता है। यह पैसा बहुत मेहनत से कमाया जाता है। अगर बहुत अधिक टैक्स लिया जाएगा तो लोग धन जुटाने के लिए क्यों प्रोत्साहित होंगे और अगर हुए भी तो वे अनौपचारिक जरियों से कमाई करेंगे। किसी भी भारतीय को ब्लैक इकॉनमी के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। हां, सरकार के पास रुपये छापने और उसे बांटने का अधिकार है, लेकिन इससे केवल महंगाई बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था तबाह होगी। क्या Redistribution का अर्थ है अमीरों पर टैक्स लगाना और गरीबों को देना? पुनर्वितरण का पहला जरिया है टैक्स सिस्टम। डायरेक्ट टैक्स जैसे कि इनकम टैक्स प्रोग्रेसिव होता है। इसी वजह से जो लोग ज्यादा कमाते हैं, वे ज्यादा टैक्स देते हैं। लेकिन, इनडायरेक्ट टैक्स का प्रोग्रेसिव होना जरूरी नहीं है। आप अमीर हों या गरीब, जब कोई सामान खरीदते हैं या सर्विस लेते हैं, तो उस पर एक जैसा टैक्स देना पड़ता है। भारत में indirect taxes का हिस्सा direct taxes से बहुत कम नहीं है।

तार्किक रूप से redistribution का फायदा गरीबों को मिलना चाहिए। लेकिन, भारत की राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा नहीं होता। यहां जाति और धर्म को लेकर redistribution के बारे में तर्क दिए जाते हैं। साथ ही, उन समुदायों की पहचान की जाती है, जो ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव के चलते सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। यह तरीका बेअसर हो सकता है, क्योंकि इन सभी कैटिगरी में क्रीमी लेयर है। यह क्रीमी लेयर बाकी समुदाय के लाभ हथिया लेती है। इसके अलावा व्यवहार में भी देखें तो redistribution के फायदे बिचौलिये हड़प कर लेते हैं। वर्तमान सरकार ने अपनी ओर से प्रयास किया है कि योजनाओं का फायदा सही लोगों तक पहुंचे, बीच में ही बिचौलिये हक न मार ले जाएं। लेकिन, गड़बड़ी करने का रास्ता फिर खोजा जा सकता है। redistribution आमतौर पर तब अच्छा काम करता है, जब स्टेट कैपेसिटी ज्यादा हो। भारत में इरादा अच्छा है, लेकिन स्टेट कैपेसिटी कम।

Redistributed amount किस पर खर्च किया जाता है? यह पैसा या तो सशक्तीकरण में लगाया जा सकता है या फिर राहत देने में। राहत देने का मतलब है कि बिना किसी काम के कैश ट्रांसफर या फिर मनरेगा पर खर्च, जिसमें कोई वास्तविक प्रोडक्टिव वर्क नहीं होता। सशक्तीकरण का मतलब है शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, बिजली, साफ पानी वगैरह पर खर्च करना। इन सबसे एक आम भारतीय का जीवन बेहतर होता है। जब इस रणनीति के साथ पुनर्वितरण किया जाता है, तो परिणाम बेहतर होते हैं। पूर्वी एशिया इसका प्रमुख उदाहरण है। पश्चिम खासकर यूरोप ने खैरात पर भारी खर्च किया। इसका असर पड़ा उनकी अर्थव्यवस्था की प्रोडक्टिविटी और वर्क कल्चर पर।

Redistribution के पक्ष में जो बातें हैं, उनसे इकॉनमिक सिस्टम के बारे में क्या पता चलता है? असल में, इसमें सरकार को प्राथमिकता दी जाती है, मार्केट को नहीं। इस व्यवस्था से विकास की दर तेज नहीं होती। किसी भी भारतीय को इसके बारे में ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। आखिर, गैर-जिम्मेदार खर्चों के कारण 1990-91 में भारत अपने सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। अतीत में देश ने redistribution की जो नीति अपनाई थी, उसका खामियाजा उसे 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी भुगतना पड़ा। 2010 के दशक के पहले हिस्से में जो आर्थिक संकट था, उसका संबंध राजकोषीय घाटे से था। गैरजरूरी टैक्स ने भारत को निवेश के लिए अनाकर्षक बना दिया था। वर्तमान सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स को एशिया के दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों के बराबर किया। अब टैक्स को खैरात से ज्यादा प्रोडक्टिव इन्वेस्टमेंट पर खर्च किया जा रहा है। इसी रास्ते पर चलते रहने की जरूरत है, क्योंकि भारत तेजी से विकास के लिए अनुकूल घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का लाभ उठाने को तैयार है।