Saturday, March 7, 2026
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जब पहला आम चुनाव कराने में लगे थे 6 महीने !

एक ऐसा समय भी था जब पहला आम चुनाव कराने में 6 महीने लगे थे! वोटर लिस्ट में महिलाओं के नाम फलाने की बीवी, फलाने की माता या फलाने की बेटी…आपको शायद यह पढ़कर बेहद अटपटा लगे, मगर देश के पहले आम चुनाव के वक्त वोटर लिस्ट में महिलाओं का नाम सीधे-सीधे नहीं लिखवाया जाता था। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का परिचय कुछ इसी तरह से दिया जाता रहा है। लेकिन, एक व्यक्ति की कोशिशों ने यह तस्वीर बदलकर रख दी। वह थे देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन, जो नाम से भले ही सुकुमार थे, मगर फैसलों से बेहद सख्त। बात तब की है, जब 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हो चुका था। उस वक्त अंतरिम सरकार चल रही थी। ऐसे में यह सोचा गया कि देश का शासन लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार द्वारा चलाया जाए। लोग यह मानते रहे कि यह काम कुछ ही महीने का है। हालांकि, नई सरकार का गठन इतना भी आसान नहीं था। जनवरी, 1950 में चुनाव आयोग बना और होनहार सुकुमार सेन को देश का पहला चुनाव आयुक्त की कमान दी गई।

सुकुमार सेन के सामने चुनाव क्षेत्रों के नामांकन से लेकर वोटर लिस्ट बनाने जैसी कई बड़ी चुनौतियां थीं। आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद मतदाता लिस्ट का पहला मसौदा प्रकाशित हुआ तो पता चला कि इसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए। इन महिलाओं को फलाने की बेटी या फलाने की बीवी के रूप में दर्ज किया गया था। आजादी से पहले कुछ इसी तरह से महिलाओं के नाम लिखे जाते थे। मगर, ये आजाद भारत था। सुकुमार सेन अड़ गए और कहा कि महिलाओं को उनके अपने नाम से ही जाना जाएगा। इसके बाद से आम चुनावों में महिला वोटर्स के नाम ही उनकी पहचान बने। आजादी के वक्त देश में 17 करोड़ वोटर्स थे, जो आज की तारीख में करीब 98 करोड़ हो चुके हैं। इतना लंबा सफर तय करने में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इससे ज्यादा भूमिका सुकुमार सेन जैसे ईमानदार और दृढ़ कर्तव्य वाले चुनाव आयुक्तों की रही। सुकुमार सेन ने वोटर्स को ताकतवर बनाने का बीड़ा उठाया। 17 करोड़ वोटर्स को 3200 विधायक और लोकसभा के लिए 489 सांसद चुनने थे। इन वोटर्स में से महज 17 फीसदी ही साक्षर थे। ऐसे में चुनाव आयोग को मतदान के खास तरीके ईजाद करने पड़े। आयोग ने चुनाव कराने के लिए 3 लाख से ज्यादा अफसरों और चुनावकर्मियों को ट्रेनिंग दी गई।

सुकुमार सेन की कवायद का अंग्रेज मजाक उड़ाते कि आने वाले वक्त में दुनिया लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदी नौटंकी देखेगी। किसी ने कहा कि भारत में यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स कराने का आइडिया ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय तक यूरोप के बहुत से देशों और यहां तक कि खुद को लोकतंत्र का बड़ा नुमाइंदा कहलाने वाले अमेरिका में भी महिलाओं को वोटिंग राइट्स नहीं थे। मगर, सुकुमार सेन लोगों के खिल्ली उड़ाने की परवाह नहीं की और न ही उन्होंने सफल चुनाव कराने के लिए किसी तरह का कोई समझौता ही किया। पहले आम चुनाव में सुकुमार सेन ने यह फैसला किया कि हर एक मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी रखी जाएगी और मतपेटी पर प्रत्याशी का चुनाव चिह्न छपा होगा। हर वोटर को एक खाली मतपत्र दिया जाएगा, जिसे वह अपने पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालेगा। इस काम के लिए 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ। चुनाव चिन्ह और बाकी ब्यौरों को दर्ज करने के लिए मतपेटी को पहले सरेस कागज या ईंट के टुकड़े से रगड़ना पड़ता था। शुरुआती दो चुनावों के बाद यह तरीका बदल दिया गया। अब मतपत्र पर हर उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यही तरीका अगले 40 सालों तक अपनाया जाता रहा। 90 के दशक के आखिर में आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल शुरू किया और 2004 तक पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा।

सुकुमार सेन ने आखिर सारी तैयारियों के बाद अक्टूबर, 1951 से फरवरी, 1952 तक चुनाव कराया। यह 1952 का ही चुनाव कहा जाता है, क्योंकि ज्यादातर चुनाव 1952 में हुआ। चुनाव कैंपेन, वोटिंग और मतगणना में 6 महीने लग गए। लोगों ने इस चुनाव में जमकर भागीदारी की। कुल वोटर्स में से 50 फीसदी से ज्यादा ने वोट डाले। यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स वाले इस चुनाव ने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। पूरी दुनिया तक यह मैसेज गया कि भारत ने कामयाबी के साथ इतना बड़ा चुनाव करा लिया। 1952 का चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

आखिर बीजेपी के वार रूम में क्या-क्या चल रहा है?

आज हम आपको बताएंगे कि बीजेपी के वार रूम में आखिर क्या-क्या चल रहा है! लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी अपनी रणनीति को पूरी तरह से अंजाम देने में जुटी हुई है। अबकी बार, 400 पार के लिए पार्टी ने दिल्ली में एक खास वॉर रूम तैयार किया है। 11 अशोक रोड वाला पुराना ऑफिस पार्टी के लिए वॉर रूम के रूप में काम कर रहा है। इस पुराने पार्टी कार्यालय में कुछ चुनिंदा बीजेपी पदाधिकारी सक्रिय हैं। माना जा रहा है कि अपना पुराना जीत का रिकॉर्ड दोहराने के लिए पार्टी पुराने ऑफिस में शिफ्ट हुई है। बीजेपी पदाधिकारियों की एक टीम ने अपना ठिकाना यहीं पुराने ऑफिस में शिफ्ट कर लिया है। यहां पार्टी की लोकसभा चुनाव को लेकर कैंपेन की रणनीति बनाई जा रही है। वॉर रूम में सोशल मीडिया, न्यूजपेपर्स की रिपोर्टों और समाचार चैनलों पर कार्यक्रमों के फीडबैक के आधार पर जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद अगले कदम पर चर्चा होती है। पार्टी के इलेक्शन कैंपेन के लिए विज्ञापन तैयार करने वाले और कैंपने से जुड़ी सामग्री और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोग यहां संबंधित टीमों से भी मिलते हैं। खास बात है कि इस परिसर में मीडिया की एंट्री पूरी तरह से बैन है। लोकसभा चुनाव के बचे हुए छह चरणों में मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए भाजपा ने विशेष रणनीति तैयार की है। पार्टी की कोशिश है कि अपने कार्यकर्ताओं को ज्यादा से ज्यादा उत्साहित कर मतदाताओं को वोटिंग वाले दिन मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करें।

इससे मतदान का प्रतिशत भी बढ़े और पार्टी की जीत का अंतर भी।पार्टी के 11 अशोक रोड स्थित यह ऑफिस बीजेपी के राज्यों से लेकर केंद्र की चुनावी जीत का साक्षी रहा है।पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल, विनोद तावड़े, तरुण चुग, अरुण सिंह और दुष्यंत गौतम शामिल हैं। पीएम मोदी इन नेताओं के साथ पहले ही हाई लेवल मीटिंग कर चुके हैं। साल 2018 में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर बने नए मुख्यालय में शिफ्ट करने से पहले पार्टी के लिए इस ऑफिस में ही कई राज्यों में जीत के लिए योजनाएं बनी हैं। बीजेपी के इस ऑफिस में पहले भी सोशल मीडिया और चुनाव मैनेजमेंट से जुड़े लोग बैठते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अहम रणनीति यहीं बैठकर तैयार हुई थी। लुटियन जोन में होने के कारण यहां पार्टी के नेताओं को आने में कोई परेशानी होती है।बीजेपी अब बूथ स्तर तक जाकर चुनाव के बचे हुए 6 चरणों मे मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए विभिन्न उपायों पर फोकस कर रही है। साथ ही पार्टी की रणनीति उन सीटों पर स्पेशल फोकस करने की है जहां पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थी।

बीजेपी के चुनाव में जीत की रणनीति बनाने में पीएम मोदी शाह के अलावा भी कई नाम शामिल हैं। इसमें पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल, विनोद तावड़े, तरुण चुग, अरुण सिंह और दुष्यंत गौतम शामिल हैं। पीएम मोदी इन नेताओं के साथ पहले ही हाई लेवल मीटिंग कर चुके हैं।

पार्टी के 11 अशोक रोड स्थित यह ऑफिस बीजेपी के राज्यों से लेकर केंद्र की चुनावी जीत का साक्षी रहा है। साल 2018 में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर बने नए मुख्यालय में शिफ्ट करने से पहले पार्टी के लिए इस ऑफिस में ही कई राज्यों में जीत के लिए योजनाएं बनी हैं। बता दें कि पदाधिकारियों की एक टीम ने अपना ठिकाना यहीं पुराने ऑफिस में शिफ्ट कर लिया है। यहां पार्टी की लोकसभा चुनाव को लेकर कैंपेन की रणनीति बनाई जा रही है। वॉर रूम में सोशल मीडिया, न्यूजपेपर्स की रिपोर्टों और समाचार चैनलों पर कार्यक्रमों के फीडबैक के आधार पर जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद अगले कदम पर चर्चा होती है। पार्टी के इलेक्शन कैंपेन के लिए विज्ञापन तैयार करने वाले और कैंपने से जुड़ी सामग्री और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोग यहां संबंधित टीमों से भी मिलते हैं। खास बात है कि इस परिसर में मीडिया की एंट्री पूरी तरह से बैन है। बीजेपी के इस ऑफिस में पहले भी सोशल मीडिया और चुनाव मैनेजमेंट से जुड़े लोग बैठते रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अहम रणनीति यहीं बैठकर तैयार हुई थी। लुटियन जोन में होने के कारण यहां पार्टी के नेताओं को आने में कोई परेशानी होती है।

संपत्ति के बंटवारे विवाद पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के बंटवारे विवाद पर एक बयान दिया है! संपत्ति के फिर से बंटवारे पर बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि संविधान का उद्देश्य ‘सामाजिक बदलाव की भावना’ लाना है। यह कहना ‘खतरनाक’ होगा कि किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति को ‘समुदाय का भौतिक संसाधन’ नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) की जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर की 1977 की मार्क्सवादी व्याख्या का पालन नहीं कर सकती है। इसमें कहा गया था कि सार्वजनिक भलाई के लिए एक समुदाय के ‘भौतिक संसाधनों’ में पुनर्वितरण के लिए निजी संपत्तियां शामिल होंगी। सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हृषिकेश रॉय, बी वी नागरत्ना, एस धूलिया, जे बी पारदीवाला, मनोज मिश्रा, आर बिंदल, एस सी शर्मा और ए जी मसीह वाली नौ-जजों की पीठ ने यह बात कही। पीठ विभिन्न याचिकाओं से उत्पन्न जटिल कानूनी प्रश्न पर विचार कर रही है कि क्या निजी संपत्ति को संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के तहत ‘समुदाय का भौतिक संसाधन’ माना जा सकता है। संविधान का अनुच्छेद 39(बी) राज्य नीति निर्देशक तत्वों (डीपीएसपी) का हिस्सा है। बेंच ने स्पष्ट कहा कि संविधान का उद्देश्य ‘सामाजिक बदलाव की भावना’ लाना है और यह कहना ‘खतरनाक’ होगा कि किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति को ‘समुदाय का भौतिक संसाधन’ नहीं माना जा सकता। साथ ही ‘सार्वजनिक भलाई’ के लिए राज्य प्राधिकारों द्वारा उस पर कब्जा नहीं किया जा सकता।

सीजेआई ने कहा कि हमें 1977 के रंगनाथ रेड्डी मामले में [अनुच्छेद 39(बी) की] जस्टिस कृष्णा अय्यर की मार्क्सवादी समाजवादी व्याख्या तक जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन सामुदायिक संसाधनों में निश्चित रूप से वे संसाधन शामिल होंगे जिन पर वर्तमान पीढ़ी भरोसा करती है। उन्होंने कहा कि इस पर दो चरम विचार थे: “मार्क्सवादी समाजवादी दृष्टिकोण यह है कि सब कुछ राज्य और समुदाय का है। पूंजीवादी दृष्टिकोण व्यक्तिगत अधिकारों को महत्व देता है। इसके अलावा अंतर-पीढ़ीगत समानता की रक्षा के लिए संसाधनों को भरोसे में रखने का गांधीवादी दृष्टिकोण है। सीजेआई ने कहा कि सामुदायिक संपत्ति में प्राकृतिक संसाधन शामिल होंगे। इनका प्रयोग सुप्रीम कोर्ट की परिभाषित सतत विकास मानदंडों के जरिये शासित होता है।

पीठ ने कहा कि यह कहना थोड़ा अतिवादी हो सकता है कि ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों’ का अर्थ सिर्फ सार्वजनिक संसाधन हैं और उसकी उत्पत्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति में नहीं है। हम आपको बताएंगे कि ऐसा दृष्टिकोण रखना क्यों खतरनाक है। पीठ ने कहा, ‘खदानों और निजी वनों जैसी साधारण चीजों को लें। उदाहरण के लिए, हमारे लिए यह कहना कि अनुच्छेद 39(बी) के तहत सरकारी नीति निजी वनों पर लागू नहीं होगी… इसलिए इससे दूर रहें। यह बेहद खतरनाक होगा। पीठ ने 1950 के दशक की सामाजिक और अन्य प्रचलित स्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान का मकसद सामाजिक बदलाव लाना था और हम यह नहीं कह सकते कि निजी संपत्ति पर अनुच्छेद 39(बी) का कोई उपयोग नहीं है। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को जर्जर इमारतों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार देने वाला महाराष्ट्र कानून वैध है या नहीं, यह पूरी तरह से भिन्न मुद्दा है और इस पर अलग से विचार किया जाएगा।

अनुच्छेद 39 (बी) केवल व्यापक भलाई के लिए सामुदायिक संसाधनों के ‘वितरण’ के बारे में बात करता है, न कि इन्हें कैसे हासिल किया जाए। इसके लिए राज्य द्वारा अलग-अलग विधायी और कार्यकारी उपाय किए जाने हैं। पीठ ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि अनुच्छेद 39 (बी) सामुदायिक संसाधनों के अधिग्रहण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह केवल संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित लक्ष्य को आगे बढ़ाता है। पीठ ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है जिससे सुप्रीम कोर्ट को अवश्य निपटना चाहिए। एडवोकेट टी श्रीनिवास मूर्ति ने कहा कि अनुच्छेद 39(बी) को संसाधनों के अधिग्रहण के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता है। उन्होंने कहा, अगर सरकार गरीबों को घर उपलब्ध कराने के लिए किसी आवासीय परियोजना का अधिग्रहण करना चाहती है, तो उसे पहले मौजूदा मालिकों को उचित मुआवजा देने के बाद परियोजना का अधिग्रहण करना होगा। उन्होंने कहा कि राज्य के लिए यह वास्तव में आवश्यक नहीं है कि वह विशेष रूप से अनुच्छेद 39 (बी) की सहायता मांगे और उचित मुआवजे के भुगतान पर सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण की शक्ति के रूप में अनुच्छेद 31 सी के तहत सुरक्षा प्राप्त करने के लिए इस आशय की घोषणा करे।

क्या वर्तमान में सोशल मीडिया पर हो रही है बॉडी शेमिंग की घटनाएं?

वर्तमान में सोशल मीडिया पर बॉडी शेमिंग की घटनाएं बढ़ती जा रही है! किसी भी बच्चे के जीवन का पहली बड़ी परीक्षा हाईस्कूल का बोर्ड एग्जाम होता है। बच्चा ही नहीं उनके माता-पिता भी परीक्षा देते हैं। जिस घर में किसी बच्चे का बोर्ड एग्जाम होता है, पूरी गृहस्थी उसकी परीक्षा की तैयारियां के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। फिर बोर्ड रिजल्ट आने के बाद अगर बिटिया टॉप कर जाए तो पूरे परिवार की खुशी का बस अंदाजा लगाइए। वो बेटी उम्मीदों के आसमान पर सवार होगी। बुलंद हौसले से लबरेज उसकी आंखों में जीवन में कुछ कर गुजरने के सपने जीवंत हो उठे होंगे। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। वो बिटिया जब सोशल मीडिया पर आएगी या उसके परिवार वाले आएंगे तो देखेंगे यहां तो उसके नाम पर अलग ही जंग छिड़ी हुई है। वो बेटी अपने नाम के साथ ‘बॉडी शेमिंग’ जैसे शब्द का इस्तेमाल पहली बार देखेगा। वह देखेगी कि एक्स से लेकर फेसबुक, इंस्टाग्राम सभी जगह लोग उसकी बॉडी शेमिंग करने वालों को आड़े हाथों ले रहे हैं। लेकिन उसे दोषी कोई दिखाई नहीं दे रहा है। वो बच्ची ये समझ नहीं पा रही है कि आखिर बॉडी शेमिंग कर काैन रहा है? वह ढूंढ़ने की काफी कोशिश करती है लेकिन उस पर बॉडी शेमिंग करने वाले किसी शख्स की पोस्ट उसे नहीं मिल पाती। लेकिन मोर्चा खुला हुआ है। उसके बेटी के नाम पर ज्ञान बांटने वाले लोग बॉडी शेमिंग करने वाले ‘अज्ञात’ पर लानत-मलानत दे रहे हैं। UP के सीतापुर जिले की लड़की प्राची निगम। प्राची यूपी बोर्ड हाईस्कूल की टॉपर बनी है। इससे ज्यादा चर्चाएं उसकी मूंछों की हैं। जो लोग बधाई दे रहे हैं, उन्होंने सबसे पहले इस तस्वीर को देखकर “मजाक का पात्र” भी बनाया होगा। निसंदेह, ऐसा सिर्फ आज नहीं, प्राची के साथ हर दिन हुआ होगा। घर, पड़ोस रिश्तेदार, स्कूल सब जगह पहले भी इन मूंछों की चर्चा होती रही होगी। इन सब बातों को दरकिनार करके प्राची आगे बढ़ी और UP बोर्ड परीक्षा में झंडे गाड़ दिए। शानदार, जानदार, जबरदस्त !!

दिन रात REEL बनाने वाले और REEL स्क्रॉल करने वाले आज प्राची निगम पर हंस रहे हैं और भद्दी टिप्पणियाँ कर रहे हैं। यही REEL बनाने वाले लो-IQ कल बॉडी पॉज़िटिविटी पर भी REEL बना रहे होंगे जब प्राची निगम ISRO और NASA जैसे संस्थानों का हिस्सा होंगी। कुछ लोग प्राची निगम का मज़ाक़ उड़ा रहे है… पर तुम मज़ाक़ बनाते रहना ये बेटी कुछ साल बाद जब कुछ बन जायेगी तब ज़िंदगी तुम्हारा मज़ाक़ बना देगी…ये तो हार्मोन चेंज के कारण है कुछ साल बाद ठीक हो जायेगी आज भी सुंदर है कल और सुंदर लगेगी पर तुम्हारी गिरी सोच कभी ठीक ना होगी।

मैंने देखा कुछ लोग प्राची निगम का मजाक बना रहे हैं, उनमें ऐसे लोग भी हैं जिनका आइक्यू रूम टेंपरेंचर से भी कम होगा और रील्स बनाकर वे लोग खुद को तोपची समझ रहे हैं। प्राची निगम, यूपी बोर्ड की टॉपर हैं ऐसे कुशाग्र बुद्धि बच्चे देश की विरासत हैं। आप हमारा गर्व हो प्राची जिंदाबाद रहेगा। एएनआई ने यूपी बोर्ड हाईस्कूल टॉपर्स के बारे में ट्वीट किया, उनकी फोटो भी पोस्ट की। प्राची निगम को 98.50% और शुभम वर्मा को 97.80% नंबर मिले। लोगों ने प्राची की फोटो पर बहुत भद्दे कॉमेंट किए। हार्मोनल इंबैलेंस के चलते बहुत सी लड़कियों के चेहरे पर या ओठों पर बाल दिखते हैं।” एक यूजर लिखते हैं, “इस समाज में लोगों से लड़कियों के लिए अच्छी-अच्छी बातें चाहे जितनी करवा लो, लेकिन उनकी असलियत खुलने में, उनकी असंवेदनशीलता बाहर आने में एक मिनट भी नहीं लगता।”

जरा सोचिए हाईस्कूल टॉपर बच्ची क्या ये नहीं सोचेगी कि ये कैसे हितैषी हैं? जो सबसे ज्यादा उसे दर्द दे रहे हैं? आज तक उसके मां-पिता ने कभी इस तरह की ‘दिलासा’ नहीं दी। स्कूल में टीचर, क्लासमेट, दोस्त किसी ने भी उससे इस तरह का बर्ताव नहीं किया। वहां तो वह टॉपर है, अच्छे पढ़ने वाले बच्चों में शामिल है। फिर ये सोशल दुनिया में ऐसा क्यों? ‘बॉडी शेमिंग’ जैसे शब्द, जिन्हें हम सभी अच्छा नहीं मानते, आज उसका मतलब अच्छे से उस बच्ची को समझ आ रहा होगा। इसे ‘कंठस्थ’ करने के बाद उसके मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या किसी को फुर्सत है ये सोचने की?

सीधी सी बात ये है कि इन सभी हितैषियों को उस बच्ची के हाईस्कूल में प्रदर्शन से कुछ लेना देना नहीं है। उन्हें तो बस ‘बॉडी शेमिंग’ शब्द ‘उड़ाकर’ अपनी काबिलियत का बखान करना है। ये दिखाना है कि वो कितने सभ्य, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक हैं। रिपोस्ट, लाइक जुटाने हैं। आखिर में ऐसे सभी माननीयों से छोटी सी अपील ही कर सकते हैं। वो ये है कि सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखने, विचार व्यक्त करने से पहले दो बार सोचें जरूर- जिस शख्स के समर्थन के लिए कुछ लिखने, बोलने जा रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि आपकी पोस्ट ही उसके लिए ‘जहर’ बन जाए।

क्या यूपी से खड़े होने वाले अधिकतर उम्मीदवार गरीब है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यूपी से खड़े होने वाले अधिकतर उम्मीदवार गरीब है या नहीं या उनके लिए भ्रामक खबरें फैलाई जा रही है! देश के सबसे बड़े सदन लोकसभा में पहुंचने के लिए चुनावी जंग जारी है। एक तरफ जहां प्रमुख दलों के टिकट पर लड़ रहे प्रत्याशी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो वहीं कई ऐसे भी प्रत्याशी हैं, जिनकी झोली में महज कुछ हजार रुपये ही हैं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में 8 सीटों पर मतदान होना है। इन सीटों पर एक तरफ जहां अरबपति और करोड़पति उम्मीदवारों की लिस्ट है। वहीं गरीब उम्मीदवारों की सूची भी कम नहीं है। दूसरे फेज में यूपी के करीब दर्जन भर उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी कुल जमा राशि ढाई लाख रुपये के कम है। इसमें भी एक के पास तो कुल जमा-पूंजी ही 6 हजार रुपये की है। यूपी की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव में सबसे गरीब उम्मीदवार मथुरा के बाबा प्रवेशानंद गिरी हैं। पौने तीन अरब की घोषित संपत्ति की मालकिन बीजेपी की हेमा मालिनी के खिलाफ ताल ठोक रहे प्रवेशानंद पुरी दूसरे चरण के सबसे गरीब उम्मीदवार हैं। उनकी कुल संपत्ति 6 हजार रुपये की है। प्रवेशानंद पुरी मथुरा के बल्देव पटलौनी के नगला मोहन में स्थित परम ज्ञान आश्रम के निवासी है। उनकी आय का स्रोत मंदिर सेवा है।

इसके बाद गाजियाबाद सीट से निर्दलीय उम्मीदवार अवधेश कुमार सबसे गरीब उम्मीदवारों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर आते हैं। अवधेश कुमार के पास 24,923 रुपए कुल संपत्ति है। जबकि गाजियाबाद सीट से ही राइट टू रिकॉल पार्टी से चुनाव लड़ रही पूजा सक्सेना के पास 33,037 रुपए की कुल संपत्ति है। वहीं अमरोहा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार दानिश के पास कुल संपत्ति के नाम पर मात्र 60 हजार रुपए ही है। वहीं गरीब उम्मीदवारों की लिस्ट में मथुरा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे मुकेश धनगर का नाम पांचवें नंबर पर है। कांग्रेस उम्मीदवार मुकेश धनगर के पास कुल संपत्ति के नाम पर एक लाख 25 हजार 1,25,016 रुपए ही मात्र है। वहीं मथुरा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी मोनी फलहारी बापू डेढ़ लाख की कुल संपत्ति है। इसके साथ ही अमरोहा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार नईमुद्दीन के पास 1 लाख 80 हजार रुपए की कुल संपत्ति है।

अमरोहा सीट से ही चुनाव लड़ रहे जीतपाल के पास भी कुल संपत्ति के नाम पर 2 लाख 15 हजार रुपए ही मात्र है। अमरोहा सीट से चुनाव लड़ निर्दलीय उम्मीदवार नरेंद्र सिंह के पास 2 लाख 12 हजार 406 रुपए की कुल संपत्ति है। वहीं अलीगढ़ सीट से मौलिक अधिकार पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सुरेंद्र के पास 1 लाख 28 हजार 500 रुपए की चल और 1 लाख रुपये की अचल संपत्ति है। इस तरह सुरेंद्र के पास 2 लाख 28 हजार 500 रुपये की कुल संपत्ति है। दूसरे चरण में यूपी के 10 सबसे गरीब उम्मीदवारों में 4 अमरोहा के हैं। इसके साथ ही मथुरा के 3 और गाजियाबाद के 2 प्रत्याशी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि उम्मीदवारों की कुल संपत्ति का आंकलन उनके द्वारा शपथपत्र में घोषित किए गए विवरण के आधार पर किया गया है।

चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद भी प्रत्याशी पानी की तरह पैसा बहाने से बाज नहीं आते हैं। जबकि चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने का पूरा खर्चा तय कर रखा है। चुनाव आयोग के मुताबिक लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार 95 लाख रुपए तक खर्च कर सकते हैं।वहीं गरीब उम्मीदवारों की लिस्ट में मथुरा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे मुकेश धनगर का नाम पांचवें नंबर पर है। कांग्रेस उम्मीदवार मुकेश धनगर के पास कुल संपत्ति के नाम पर एक लाख 25 हजार 1,25,016 रुपए ही मात्र है। वहीं मथुरा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी मोनी फलहारी बापू डेढ़ लाख की कुल संपत्ति है। वहीं दूसरे चरण में कुछ ऐसे भी प्रत्याशी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं, जिनके पास 10 हजार रुपए तक की कुल संपत्ति नहीं है। 2024 के चुनावी रण में उतरे कई उम्मीदवारों के पास बेतहाशा दौलत है। लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में कई ऐसे कैंडिडेट है जिनके पास करोड़ों, अरबों की संपत्ति है और उनके चुनाव प्रचार में जहां बड़े बड़े नेता-मंत्री जुटे हुए हैं। यूपी में 26 अप्रैल को दूसरे चरण में 8 सीटों पर होने वाली वोटिंग में सबसे अमीर कैंडिडेट भाजपा से हैं। मथुरा सीट से चुनाव लड़ रही बीजेपी उम्मीदवार और अभिनेत्री हेमा मालिनी सबसे पैसे वाली उम्मीदवार है। हेमा मालिनी के पास 2 अरब 78 करोड़ 93 लाख 68 हजार 227 रुपए की कुल संपत्ति है। वहीं अमरोहा सीट से बीजेपी प्रत्याशी कंवर सिंह तंवर के पास 214 करोड़ से ज्यादा की कुल संपत्ति है।

आखिर कुछ हफ्तों से वंदे भारत ट्रेन के खाने में क्यों आ रही है खराबी?

हाल ही के कुछ हफ्तों से वंदे भारत ट्रेन के खाने में खराबी आ रही है! देश की प्रीमियम ट्रेनों में भी सबसे अलग है वंदे भारत । वंदे भारत का किराया भी अन्य समकक्ष ट्रेनों से ज्यादा है। इस ट्रेन को भारतीय रेल की शान मानी जाती है। तभी तो इसे हरी झंडी सिर्फ प्रधानमंत्री ही दिखाते हैं। रेल मंत्री भी इसका उद्घाटन नहीं करते हैं। इसे देखते हुए माना जाता है कि इसमें सर्विस हो या फूड हो, सभी ट्रेनों से बेहतर मिलेगी। लेकिन इसमें बार-बार खराब खाने की शिकायत मिलती है। एक बार फिर से खराब खाना परोसे जाने की शिकायत सामने आई है। यह वाकया देहरादून से आनंद विहार के बीच चलने वाली वंदे भारत का है। इसमें एक यात्री ने फफूंद लगी दही परोसे जाने की शिकायत की है।सोशल मीडिया साइट एक्स पहले ट्वीटर पर कल ही हर्षद टोपकर @hatopkar नाम के यूजर ने एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने लिखा है कि वह वंदे भारत एक्सप्रेस से देहरादून से आनंद विहार के बीच एक्जीक्यूटिव क्लास इस ट्रेन का सबसे ऊंचा दर्जा में सफर कर रहे हैं। उन्हें भोजन में जो दही परोसा गया, उसमें फफूंद दिखा। इस तरह के भोजन की कम से कम वंदे भारत की सर्विस में तो आशा नहीं ही की जा सकती है। उन्होंने फफूंद वाला दही का फोटो खींच कर भी ट्वीट में लगाया है।

इस ट्रेन की कैटरिंग सर्विस संभालने वाली सरकारी कंपनी इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन ने इस ट्वीट पर रिस्पांड किया है। उसका कहना है कि इस मसले पर तुरंत ही एक्शन लिया गया। उस ट्रेन में चल रहे सुपरवाइजर ने खराब दही को तुरंत ही बदला। जांच में पाया गया कि दही का पैक एक्सपाइरी डेट के लिमिट में था। अब इस मामले को दही के निर्माता के पास उठाया जा रहा है। हर्षद टोपकर के ट्वीट से पता चलता है कि यह दही अमूल का है। यूं तो अमूल के प्रवक्ता से इस बारे में प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई। लेकिन दूध-दही के प्रोसेसिंग से जुड़ी कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इस मामले में जांच की आवश्यकता है। उनके मुताबिक दूध के प्रोसेसिंग के बाद जो भी प्रोडक्ट बनाए जाते हैं, उसे एक्सपायरी डेट तक कंट्रोल्ड टैम्परेचर में स्टोर करना पड़ता है। मान लिया जाए कि जिस प्रोडक्ट को माइनस 7 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर करना है, उसे नार्मल टैम्परेचर पर स्टोर किया जाए तो उसका खराब होना तय है।

यह घटना एक फरवरी 2024 का है। डॉ. शुभेन्दु केशरी ने एक घटना को ट्वीट किया था। उसने लिखा है कि वह 20173 रानी कमलापति से जबलपुर के बीच चलने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस में सफर कर रहे हैं। उनके चावल में मरा हुआ कॉकरोच निकला था। इस पर आईआरसीटीसी ने यात्री के पोस्ट पर रिप्लाई करते हुए लिखा, ‘आपके अनुभव के लिए हमें बेहद खेद है। इस मामले को गंभीरता से लिया गया है और संबंधित सेवा प्रदाता पर भारी जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा, स्रोत पर निगरानी कड़ी कर दी गई है।’

इस पोस्ट को फरवरी के पहले सप्ताह में ही 50 हजार से ज्यादा लोग देख चुके थे। उस पर यूजर्स तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देते हुए अपना गुस्सा भी जाहिर कर रहे थे। एक यूजर ने लिखा, ‘चिंता मत करो सर वो एक्सट्रा के पैसे नहीं लेंगे।’ दूसरे यूजर ने लिखा, ‘कॉकरोच ही तो है, उससे टेस्ट और बढ़ता होगा शायद।’ तीसरे यूजर ने लिखा, ‘उन्हें मत बताओ, वो कॉकरोच के भी पैसे ले लेंगे।’ चौथे यूजर ने लिखा, ‘ये तो चिकन रेसिपी है जिसमें कॉकरोच डाला गया है।’ वंदे भारत ट्रेन में खराब खाने की शिकायत कोई पहली बार नहीं मिली है। इससे पहले 6 जनवरी 2024 को आकाश केसरी नाम के पैसेंजर ने इंडियन रेलवे और अश्चिनी वैष्णव को टैग करते हुए एक ट्वीट किया था। उसने लिखा था कि वह 22416, नई दिल्ली-वाराणसी वंदे भारत में सफर कर रहे हैं। उन्हें जो खाना परोसा गया है, उससे बदबू आ रही है। फूड की क्वालिटी भी बेहद खराब है। रेलवे के ये वेंडर वंदे भारत एक्सप्रेस का नाम खराब कर रहे हैं।

गोवा वंदे भारत में भी खराब खाना परोसने की शिकायत मिल चुकी है। एक जुलाई 2023 को हिमांशु मुखर्जी ने ट्वीट कर एक शिकायत की है। उसने कहा कि 22230 मडगांव छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के बीच चलने वाली वंदे भारत में इतना खराब परोसा जाता है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता है। उन्होंने इस ट्वीट में दो फोटो शेयर किया है। पहला फोटो उद्घाटन वाले दिन चली स्पेशल वंदे भारत की है जबकि दूसरा फोटो बाद के दिनों का। वह लिखते हैं 22230 वंदे भारत के इनआगरल रन के दिन आहुजा कैटरर्स ने शानदार भोजन परोसा। आज उसी ट्रेन में आज घटिया और बासी Pathetic and Stale Food भोजन परोसा जा रहा है। भोजन के बारे में वह लिखते हैं- पत्थर की तरह कठोर पनीर, ठंडा खाना और बासी और नमक से भरी दाल। यह भी तब जबकि पैसेंजर्स से इसी खाने के 250 रुपये वसूले जा रहे हैं।

आखिर कब आएगा यूपी बिहार की रेलवे में सुधार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यूपी बिहार की रेलवे में सुधार कब आएगा! सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स के एक यूजर ने बीते शुक्रवार को भीड़ भरी ट्रेन का एक वीडियो साझा किया था। पोस्ट को कैप्शन देते हुए यूजर ने लिखा, “यह जनरल कोच नहीं है… यह स्लीपर कोच नहीं है… यह 3AC कोच नहीं है… यह 2nd AC कोच है… भीड़ भारतीय ट्रेनों के सबसे प्रीमियम कोचों में से एक तक पहुंच गई है।”यात्रा करने के लिए केवल फर्स्ट एसी बचा है…” ट्रेन में एक यात्री द्वारा बनाए गए वीडियो में लोगों को वॉशरूम का रास्ता अवरुद्ध करते हुए और प्रवेश और निकास द्वार पर खड़े देखा गया है।इस ट्वीट के जवाब में भारतीय रेलवे ने एक और वीडियो पोस्ट किया जिसके बारे में उसने कहा कि यह उसी कोच का है। इसमें लिखा था, ”कोच का मौजूदा वीडियो। कोई भीड़-भाड़ नहीं। कृपया भ्रामक वीडियो साझा करके भारतीय रेलवे की छवि खराब न करें।”

एक्स यूजर के वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर ने लिखा, “भारत में हम करदाता असहाय हैं। हम दिन में 12-14 घंटे काम करते हैं, कमाते हैं, 33% प्रत्यक्ष कर, 3% सेस, 18% जीएसटी और अन्य कर चुकाते हैं। अपनी मेहनत की कमाई में बचता है 40% से भी कम। इसके बदले पाते हैं कमतर सार्वजनिक शिक्षा, प्रशासनिक प्रणाली और चिकित्सा, सामाजिक सुरक्षा, आदि।” इस बीच एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की,रेलवे बोर्ड के एक रिटायर्ड मेंबर से जब यह सवाल पूछा गया तो उनका विचार था कि जहां तेज गति से चलने वाली लोकल ट्रेन ज्यादा है, वहां लोग रिजर्व डिब्बे में नहीं चलते। बिहार में सड़क परिवहन ना के बराबर है। बस का भाड़ा भी ट्रेन से ज्यादा है। लोकल या पैसेंजर ट्रेन ज्यादा है नहीं। इसलिए मजबूरी में लोग रिजर्व डिब्बे में सफर करते हैं। “ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। मुझे भी एक दुखद अनुभव हुआ, जहां कन्फर्म सीट होने के बावजूद मेरा पूरा परिवार मुंबई से वडोदरा तक 6 घंटे तक खड़े होकर आया। हमारी सारी शिकायतें अनसुनी हो रही हैं। यह एक असंवेदनशील सरकार है।”

देश के हिंदी पट्टी, खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इन इलाकों के मेल व एक्सप्रेस ट्रेन के रिजर्व डिब्बों में अनऑथराइज्ड पैसेंजर ठुंसे रहते हैं। इनमें से कुछ तो बेटिकट होते हैं जबकि कुछ को रेलवे के टीटीई जुर्माना काट कर टिकट बना देते हैं। भले ही उनका टिकट बन गया हो, लेकिन रहते हैं वे अनऑथराइज्ड ही। हमने पिछले दिनों ही पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में यात्रा की थी। उसमें एसी3 में सफर कर रहे एक अनऑथराइज्ड पैसेंजर से पूछा तो उसने जवाब दिया “क्या करें हम। जनरल डिब्बे में तो इतने पैसेंजर ढुंसे हैं कि घुस भी नहीं पाएंगे। बता दें कि यात्रा करने के लिए केवल फर्स्ट एसी बचा है…” ट्रेन में एक यात्री द्वारा बनाए गए वीडियो में लोगों को वॉशरूम का रास्ता अवरुद्ध करते हुए और प्रवेश और निकास द्वार पर खड़े देखा गया है।इस ट्वीट के जवाब में भारतीय रेलवे ने एक और वीडियो पोस्ट किया जिसके बारे में उसने कहा कि यह उसी कोच का है। मजबूरन स्लीपर डिब्बे में घुसना पड़ता है। इस ट्रेन में स्लीपर के पहले 10 डिब्बे होते थे। उसे घटा कर 4 कर दिया गया है। ऐसे में तो एसी3 ही सहारा बचता है ना।”

हमने आनंद विहार से बिहार जाने वाली कई सुपरफास्ट ट्रेनों को देखा। उन ट्रेनों में जनरल डिब्बे दो या तीन थे। आनंद विहार से ट्रेन रवाना होती है और यहीं इतने पैसेंजर्स हैं कि कोई उसमें घुस भी नहीं सकता। स्थिति यह है कि लोग शौचालयों में सफर कर रहे हैं। जनरल डिब्बे में चार शौचालय होते हैं, चारों पर पैसेंजर्स का कब्जा। एक शौचालय में तो बड़े-बच्चे मिला कर 10 व्यक्ति दिखे। अब समझिए कि उस डिब्बे में यात्रा करने वालों को नेचर्स कॉल आए तो वह कैसे फारिग होंगे?

रेलवे बोर्ड के एक रिटायर्ड मेंबर से जब यह सवाल पूछा गया तो उनका विचार था कि जहां तेज गति से चलने वाली लोकल ट्रेन ज्यादा है, वहां लोग रिजर्व डिब्बे में नहीं चलते। बिहार में सड़क परिवहन ना के बराबर है। बस का भाड़ा भी ट्रेन से ज्यादा है। लोकल या पैसेंजर ट्रेन ज्यादा है नहीं। इसलिए मजबूरी में लोग रिजर्व डिब्बे में सफर करते हैं। इसका निदान यह हो कि लोकल पैसेंजर्स के लिए भी पर्याप्त ट्रेन हो। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी ट्रेन भी समय पर चले।

आखिर ट्रेन में जनरल यात्रियों को कब मिलेगा सम्मान?

यह सवाल उठना लाजिमी है की ट्रेन में जनरल यात्रियों को सम्मान कब मिलेगा! रेलवे ने एक बार फिर से ‘बेचारे’ रेल यात्रियों की सुध लेने की बात की है। जी हां, ट्रेन के बेचारे यात्री का मतलब ‘सेकेंड क्लास’ या ‘जनरल कोच’ में यात्रा करने वाले यात्रियों से है। इनकी बेचारगी की हालत देखनी हो तो नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, आनंद विहार आदि जैसे रेलवे स्टेशन पहुंचिए। वहां से पूरब की तरफ जाने वाली किसी भी लोकप्रिय रेलगाड़ी का जनरल डिब्बा देख लीजिए। इसमें बुरी तरह से ये बेचारे ठुंसे होते हैं। स्थिति यह होती है कि जनरल डिब्बे के शौचालयों में भी पैसेंजर ठुंसे रहते हैं। अब इसी जनरल कोच यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए रेलवे ने पूड़ी-सब्जी के स्पेशल पैकेट बिकवाने की बात की है। रेलवे बोर्ड के आरामदायक और एयर कंडीशंड कमरे में बैठने वाले अधिकारियों को इन दिनों जनरल कोच और स्लीपर कोच में यात्रा करने वाले पैसेंजर्स याद आ रहे हैं। कुछ लोग इसकी वजह ‘आम चुनाव’ को बताते हैं। इनका कहना है कि जिस तरह से देश में गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है, एसी में रहने वाले लोग वोट डालने निकल नहीं रहे हैं। यूपी की लोकप्रिय ट्रेन के जनरल कोच को आप एक बार देख लेंगे तो आपको मिचली होने लगेगी। इस ट्रेन में यात्रा करना तो दूर, आप घुस भी नहीं पाएंगे। इस ट्रेन की यात्रा चाहे आप एक घंटे की करें या 24 घंटे की, आप नेचर्स कॉल यानी मल-मूत्र भी नहीं त्याग पाएंगे। क्योंकि इस डिब्बे के शौचालय में भी यात्री ही ठुंसे रहते हैं। अब आप कल्पना कीजिए के उनकी यात्रा कैसे होती होगी?वोट डालने में आगे रहते हैं इन्हीं ‘जनरल’ कोच में यात्रा करने वाले ‘आम आदमी’। रेल मंत्री भी राजनीतिक व्यक्ति हैं। उन्हें जनरल कोच में यात्रा करने वालों की अहमियत पता है। इसलिए अब जनरल कोच के यात्रियों की खातिर सस्ती पूड़ी-सब्जी का इंतजाम किया जा रहा है।

आज के अखबारों में यह खबर छपी है। खबर है कि देश के 100 रेलवे स्टेशनों पर जनरल कोच के यात्रियों को ध्यान में रख कर सस्ते पूड़ी-सब्जी के पैकेट बिकवाने की व्यवस्था की जा रही है। 20 रुपये के इस पैकेट में सात पूड़ी, सब्जी और अचार रहेगा। साथ ही 50 रुपये में छोले-भठूरे, पाव भाजी, राजमा चावल, छोले चावल आदि भी बिकवाने की व्यवस्था की जा रही है। इनके लिए रेल नीर की भी व्यवस्था की जा रही है। ताकि यात्रा के दौरान इन्हें खाने-पीने को मिल जाए। बिहार-यूपी की लोकप्रिय ट्रेन के जनरल कोच को आप एक बार देख लेंगे तो आपको मिचली होने लगेगी। इस ट्रेन में यात्रा करना तो दूर, आप घुस भी नहीं पाएंगे। इस ट्रेन की यात्रा चाहे आप एक घंटे की करें या 24 घंटे की, आप नेचर्स कॉल यानी मल-मूत्र भी नहीं त्याग पाएंगे। क्योंकि इस डिब्बे के शौचालय में भी यात्री ही ठुंसे रहते हैं। अब आप कल्पना कीजिए के उनकी यात्रा कैसे होती होगी?

चलती ट्रेन में सस्ती पूड़ी-सब्जी के पैकेट कोई नया कांसेप्ट नहीं है। दरअसल, जब 1977 में जनता सरकार बनी थी, तभी ‘जनता एक्सप्रेस’ और ‘जनता खाना’ का कांसेप्ट आया था। जनता एक्सप्रेस में सिर्फ सेकेंड क्लास के डिब्बे थे। इसमें सिर्फ आम आदमी या गरीब आदमी सफर करते थे। बता दें कि रेलवे ने पूड़ी-सब्जी के स्पेशल पैकेट बिकवाने की बात की है। रेलवे बोर्ड के आरामदायक और एयर कंडीशंड कमरे में बैठने वाले अधिकारियों को इन दिनों जनरल कोच और स्लीपर कोच में यात्रा करने वाले पैसेंजर्स याद आ रहे हैं। कुछ लोग इसकी वजह ‘आम चुनाव’ को बताते हैं। इनका कहना है कि जिस तरह से देश में गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है, एसी में रहने वाले लोग वोट डालने निकल नहीं रहे हैं। वोट डालने में आगे रहते हैं इन्हीं ‘जनरल’ कोच में यात्रा करने वाले ‘आम आदमी’। रेल मंत्री भी राजनीतिक व्यक्ति हैं। उन्हें जनरल कोच में यात्रा करने वालों की अहमियत पता है। इसलिए अब जनरल कोच के यात्रियों की खातिर सस्ती पूड़ी-सब्जी का इंतजाम किया जा रहा है। अमीरों के लिए फर्स्ट क्लास था। इसी तरह जनता खाना मतलब सस्ती पूड़ी-सब्जी का पैकेट। अमीरों के लिए तो तरह तरह के व्यंजनों का इंतजाम तो पहले से ही था। कालांतर में जनता खाना रेलवे स्टेशन और ट्रेनों के लिए दुर्लभ चीज हो गया। इसी को फिर से चालू कराने का प्रयास है।

प्रदेश की हॉट सीटों के लिए बीजेपी ने क्या बनाई है रणनीति?

बीजेपी ने प्रदेश की हॉट सीटों के लिए एक रणनीति बना ली है! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बीजेपी की ओर से अधिकांश उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गई है लेकिन कुछ सीटों पर नाम का ऐलान अब भी बाकी है। ये वो सीटें हैं जिन पर यह चर्चा है कि क्या मौजूदा सांसद को रिपीट किया जाएगा या नहीं। यूपी के कैसरगंज सीट से सांसद और पूर्व डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह, मुंबई उत्तर मध्य सांसद पूनम महाजन और लद्दाख के सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल। इन तीन प्रमुख चेहरों को इस बार टिकट मिलने की संभावना कम है। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया है कि बृजभूषण शरण सिंह की पत्नी केतकी देवी जो पूर्व में गोंडा से सांसद रह चुकी हैं उनको बीजेपी उम्मीदवार बना सकती है। यौन उत्पीड़न मामले में अदालत के आदेश के मद्देनजर अंतिम फैसला बाकी है। इस माह के अंतिम सप्ताह तक फैसला आने की उम्मीद है। सूत्रों ने कहा कि पूर्व डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष फिर से चुनाव लड़ने पर अड़े थे, लेकिन उन्हें महिला पहलवानों द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामले में फैसला आने तक अपनी दावेदारी रोकने की सलाह दी गई है। पार्टी सूत्रों ने तर्क दिया कि केतकी देवी की उम्मीदवारी को महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने के रूप में देखा जाएगा, जो पार्टी के प्रमुख चुनावी मुद्दों में से एक है। दिल्ली की एक अदालत ने पिछले सप्ताह सिंह के खिलाफ आरोप तय करने पर अपना आदेश टाल दिया था। 20 मई को मतदान होना है, जिसके लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 3 मई है। हालांकि बीजेपी पूनम महाजन की जगह किसे मैदान में उतारेगी इसका खुलासा नहीं किया। लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि प्रतिष्ठित मुंबई उत्तर मध्य सीट के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम के नाम पर विचार किया जा रहा है।छह महिला पहलवानों ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इस आरोप का उन्होंने खंडन किया है।

कैसरगंज सीट से टिकट के ऐलान पर देरी को लेकर जब बृजभूषण से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हम बीजेपी से बड़े तो नहीं हैं। हो सकता है कि पार्टी की इसके पीछे ही कोई रणनीति हो। उन्होंने कहा कि टिकट मिलना या ना मिलना हमारी चिंता नहीं है। कैसरगंज सीट से बृजभूषण 3 बार के सांसद हैं। महिला पहलवानों के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद उनके टिकट में देरी हो रही है। भाजपा के साथ ही समाजवादी पार्टी ने भी यहां से अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

बृजभूषण शरण सिंह के अलावा पार्टी सूत्रों के अनुसार पूनम महाजन और नामग्याल को भी टिकट मिलने की संभावना कम है। सांसद के रूप में इनके प्रदर्शन और उनके निर्वाचन क्षेत्रों से मिले फीडबैक को आधार बताया जा रहा है। इन तीनों सीटों पर पांचवें चरण में 20 मई को मतदान होना है, जिसके लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 3 मई है। हालांकि बीजेपी पूनम महाजन की जगह किसे मैदान में उतारेगी इसका खुलासा नहीं किया। लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि प्रतिष्ठित मुंबई उत्तर मध्य सीट के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम के नाम पर विचार किया जा रहा है।

मुंबई उत्तर मध्य सीट को एक वक्त तक कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। बाद में बीजेपी की सहयोगी शिव सेना ने अपने प्रत्याशियों विद्याधर गोखले 1989, नारायण अठावले 1996 और मनोहर जोशी 1999 की जीत के साथ यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बता दें कि सांसद पूनम महाजन और लद्दाख के सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल। इन तीन प्रमुख चेहरों को इस बार टिकट मिलने की संभावना कम है। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया है कि बृजभूषण शरण सिंह की पत्नी केतकी देवी जो पूर्व में गोंडा से सांसद रह चुकी हैं उनको बीजेपी उम्मीदवार बना सकती है। यौन उत्पीड़न मामले में अदालत के आदेश के मद्देनजर अंतिम फैसला बाकी है। इस माह के अंतिम सप्ताह तक फैसला आने की उम्मीद है। सूत्रों ने कहा कि पूर्व डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष फिर से चुनाव लड़ने पर अड़े थे, लेकिन उन्हें महिला पहलवानों द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामले में फैसला आने तक अपनी दावेदारी रोकने की सलाह दी गई है। 2014 मोदी लहर में पूनम महाजन को इस निर्वाचन क्षेत्र से पहली जीत मिली और 2019 में भी उन्होंने सीट बरकरार रखी। नामांकन दाखिल करने में कुछ ही दिन बाकी है और बीजेपी की ओर से लगातार इन सीटों को लेकर मंथन जारी है।

आखिर कन्नौज सीट से चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे अखिलेश यादव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अखिलेश यादव कन्नौज सीट से चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे! लोकसभा चुनाव 2024 का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दल चुनावी रणनीति के साथ ही मुद्दों पर बात कर रहे हैं। वहीं, यूपी की सियासत की बात करें तो यहां भी प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा जा रहा है। ऐसे में सोमवार को समाजवादी पार्टी की तरफ से दो लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं। इसमें एक बलिया की सीट है तो दूसरी कन्नौज लोकसभा सीट है, जहां पर 1998 से 2014 तक सपा का कब्जा रहा है। सपा के इस ऐलान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी नहीं उतरेंगे। करीब 25 साल के राजनीतिक सफर में अखिलेश यादव चार बार लोकसभा और एक बार विधानसभा का चुनाव लड़े। यहीं नहीं 100 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से उन्होंने सभी चुनाव में जीत हासिल की है।सपा मुखिया अखिलेश यादव के कन्नौज से चुनाव नहीं लड़ने पर भारतीय जनता पार्टी हमलावर हो गई है। हज समिति के अध्यक्ष मोहसिन रजा ने कहा कि आज समाजवादी पार्टी की एक और चुनावी लिस्ट आई है, जिसमें पूरी तरह से सपा मुखिया ने हार को स्वीकार करते हुए कन्नौज में अपने परिवार के किसी सदस्य (तेज प्रताप यादव) को टिकट दे दिया है। मोहसिन रजा ने कहा कि अखिलेश को खुद हार का डर सताने लगा है, इसलिए सपा मुखिया चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वहीं, इंडिया गठबंधन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा और कांग्रेस का एक ही जैसा हाल है। हार के डर से ही उन्होंने भी अमेठी और रायबरेली की सीट छोड़ दी है।

करीब 25 साल के राजनीतिक सफर में अखिलेश यादव दूसरी बार लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। वर्ष 2000 में उन्होंने कन्नौज लोकसभा उपचुनाव से राजनीति की शुरुआत की थी। इसके बाद 2004 और 2009 में यहां से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। चूंकि, 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, इसलिए 2014 में लोकसभा चुनाव नहीं लड़े। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ से उतरकर जीत हासिल की थी। यही नहीं जीत का अंतर भी काफी ज्यादा था। यहां अखिलेश ने भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ को 2.59 लाख वोटों से शिकस्त दी थी। अखिलेश को आजमगढ़ में 6 लाख 21 हजार 578 वोट मिले थे, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यूपी की करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की।

अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने 2012- 2017 तक यूपी की सत्ता संभाली। सीएम की कुर्सी संभालने से पहले वो लगातार तीन बार सांसद भी रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश ने 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया। उनकी पार्टी को राज्य में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद 15 मार्च 2012 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। बता दें कि 1998 से 2014 तक सपा का कब्जा रहा है। सपा के इस ऐलान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी नहीं उतरेंगे। करीब 25 साल के राजनीतिक सफर में अखिलेश यादव चार बार लोकसभा और एक बार विधानसभा का चुनाव लड़े। यहीं नहीं 100 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से उन्होंने सभी चुनाव में जीत हासिल की है।सपा मुखिया अखिलेश यादव के कन्नौज से चुनाव नहीं लड़ने पर भारतीय जनता पार्टी हमलावर हो गई है। हज समिति के अध्यक्ष मोहसिन रजा ने कहा कि आज समाजवादी पार्टी की एक और चुनावी लिस्ट आई है 2019 में आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़कर जीत हासिल की। 2022 विधानसभा चुनाव में करहल सीट से मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रो.सत्यपाल सिंह बघेल को हराकर पहली बार विधायक बने और आजमगढ़ लोकसभा सदस्य से इस्तीफा दे दिया था।

2019 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज सीट पर बहुत ही करीबी मुकाबला हुआ था। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा का गठबंधन था, इस चुनाव में डिंपल यादव को 5,50,734 वोट मिले थे, जबकि उनके सामने चुनाव लड़े बीजेपी के सुब्रत पाठक को 5,63,087 वोट मिले थे। 2014 लोकसभा चुनाव में भी मुकाबला बेहद करीबी रहा था। अखिलेश को आजमगढ़ में 6 लाख 21 हजार 578 वोट मिले थे, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यूपी की करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की।तब बीजेपी के सुब्रत पाठक को 4,69,257 वोट मिले थे, जबकि सपा की डिंपल यादव को 4,89,164 वोट हासिल हुए थे। डिंपल यादव यह चुनाव करीब बीस हजार वोटों से जीत गई थीं। इस चुनाव में बीएसपी के प्रत्याशी निर्मल तिवारी को 1,27,785 वोट हासिल हुए थे।