Saturday, March 7, 2026
Home Blog Page 665

क्या भारत अब बनने वाला है डिफेंस सप्लायर?

आने वाले समय में भारत अब डिफेंस सप्लायर बनने वाला है! भारत ने इस महीने की 19 अप्रैल को फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का पहला बैच दिया। इसके साथ ही भारत ने एशिया में एक प्रमुख डिफेंस एक्सपोर्टर बनने की दिशा बड़ा कदम बढ़ा दिया है। दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र ने भारत से हथियार प्रणाली खरीदने के लिए 37.5 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जनवरी 2022 के समझौते के तहत, नई दिल्ली मिसाइलों की तीन बैटरियों, उनके लॉन्चरों और संबंधित उपकरणों की सप्लाई करेगी। यह भारत की तरफ से ब्रह्मोस मिसाइल का पहला एक्सपोर्ट था। अर्जेंटीना सहित कुछ अन्य देशों ने भी भारत से इन मिसाइलों को खरीदने में रुचि दिखाई है। मिसाइलों की डिलीवरी विवादित दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य ताकत के बीच नई दिल्ली और मनीला के बीच बढ़ते सैन्य संबंधों को दर्शाती है। भारत और फिलीपींस दोनों दक्षिण चीन सागर में विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और अनुपालन की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से यूएनसीएलओएस (समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) का जिक्र भी होता है। दोनों पक्ष दक्षिण चीन सागर पर संयुक्त राष्ट्र अदालत द्वारा मध्यस्थ पुरस्कार के कार्यान्वयन का भी समर्थन कर रहे हैं। पिछले साल हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक स्पेशल इंटरव्यू में, फिलीपींस के विदेश सचिव एनरिक मनलो ने कहा था कि भारत और फिलीपींस इस अर्थ में नेचुरल पार्टनर हैं कि दोनों एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक के विचार का समर्थन करते हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र जो विविधता के लिए खुला है और लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता का उद्देश्य मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग के माध्यम से क्षेत्र में लोगों की समृद्धि को बढ़ावा देना है। ब्रह्मोस सौदे पर मनलो का कहना था कि समुद्री सहयोग के संदर्भ में भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध यह सुनिश्चित करने का अवसर भी प्रदान करते हैं कि हम एक स्वतंत्र और खुले, स्थिर और समृद्ध इंडो-पैसिफिक को बनाए रखने में मदद करें। उनका कहना था कि यह शायद केवल शुरुआत है, न केवल हथियारों के मामले में, बल्कि प्रशिक्षण और सर्वोत्तम प्रथाओं के मामले में भी रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाना चाहते हैं। भारत अपने घरेलू तेजस लड़ाकू विमानों के निर्यात के लिए फिलीपींस के साथ भी बातचीत कर रहा है।

ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड, भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस के एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया या एनपीओएम के बीच एक संयुक्त उद्यम है। यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का उत्पादन करता है। इन्हें पनडुब्बियों, जहाजों, विमानों या भूमि प्लेटफार्मों से लॉन्च किया जा सकता है। 2.8 मैक या ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना अधिक गति से उड़ने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल माना जाता है। भारत ने ब्रह्मोस के सभी वेरिएंट का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। ब्रह्मोस को मिसाइल प्रणाली को पाकिस्तान और चीन से खतरे के दो मोर्चों के बीच पनी सेना में शामिल किया है। 2019 में, घरेलू मिसाइल की रेंज को 500 किमी तक बढ़ा दिया गया था। एक शीर्ष अधिकारी ने कहा था कि भारत अब लंबी दूरी की मिसाइलों को लड़ाकू जेट, सुखोई 30 में इंटीग्रेट करने वाला दुनिया का एकमात्र देश है।

भारत और रूस संयुक्त रूप से मिसाइल के हाइपरसोनिक एडिशन पर भी काम कर रहे हैं। इसे अस्थायी रूप से ब्रह्मोस-II नाम दिया गया है। दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) के अनुसार, ब्रह्मोस-II हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट तकनीक पर आधारित होगा। ऐसे हथियार का मुख्य उद्देश्य गहराई में दबे दुश्मन के परमाणु बंकरों और अत्यधिक संरक्षित स्थानों को निशाना बनाना है। देश की तीनों सैन्य सेवाएं इस हथियार का उपयोग करेंगी। रूस हाइपरसोनिक मिसाइलों में अग्रणी खिलाड़ी है। ये मिसाइलें मैक 5 से अधिक गति से उड़ सकती हैं। यूक्रेन में चल रहे युद्ध के बीच, रूस ने कथित तौर पर फरवरी के पहले सप्ताह में कीव पर हाइपरसोनिक जिरकोन मिसाइल से हमला किया था। जिरकोन की मारक क्षमता 1,000 किमी है और यह ध्वनि की गति से नौ गुना अधिक गति से चलती है। सैन्य विश्लेषकों ने कहा है कि इसकी हाइपरसोनिक गति का मतलब हवाई सुरक्षा के लिए प्रतिक्रिया समय को बहुत कम करना और बड़े, गहरे और कठोर लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता हो सकती है।

हालांकि, भारत को अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। अपने रक्षा-औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए चल रहे प्रयासों के बावजूद, भारत ने दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक का खिताब बरकरार रखा है। नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि 2014-18 और 2019-23 के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4.7% की वृद्धि हुई है। वैश्विक थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की तरफ से अंतरराष्ट्रीय हथियार हस्तांतरण पर रिपोर्ट जारी की थी। । रूस भारत का मुख्य हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। रूस से भारत के हथियारों के कुल आयात का 36% हिस्सा है। हालांकि, रूस की कुल हिस्सेदारी में लगातार गिरावट आ रही है क्योंकि भारत सैन्य हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के साथ-साथ स्वदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए पश्चिमी देशों की ओर रुख कर रहा है। SIPRI के अनुसार, 2019-23 की अवधि 1960-64 के बाद पहला पांच साल का चरण था जब डिलीवरी हुई सोवियत संघ/रूस से भारत के हथियारों के आयात का आधे से भी कम हिस्सा था। 2014-18 और 2019-23 के बीच भारत में रूस के निर्यात में 34% की कमी आई। विश्लेषकों के अनुसार, हालांकि सरकार ने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए बहुत जरूरी कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

पतंजलि द्वारा दिए जा रहे भ्रामक विज्ञापन के लिए क्या बोले सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पतंजलि द्वारा दिए जा रहे भ्रामक विज्ञापन के लिए एक बयान दिया गया है! भ्रामक विज्ञापन मामले में पतंजलि की ओर से अखबार में विज्ञापन देकर बिना शर्त माफी मांगने की बात कही गई, तब सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद से सवाल पूछा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्या आपने न्यूजपेपर में जो विज्ञापन देकर माफी मांगी है वह उसी साइज का विज्ञापन है जैसा विज्ञापन आपने पहले दिया था? सुप्रीम कोर्ट ने बहरहाल पतंजलि आयुर्वेद और योगगुरु रामदेव के वकील से कहा है कि कोर्ट के सामने विज्ञापन संबंधित रेकॉर्ड दो दिनों में पेश करें। कोर्ट ने कहा कि हम विज्ञापन का साइज देखना चाहते हैं। अगर आप माफी मांगते हैं तो इसक मतलब यह नहीं है कि वह हम माइक्रोस्कोप से देखें। सुप्रीम कोर्ट में आईएमए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर अर्जी दाखिल कर पतंजलि के खिलाफ वेक्सिनेशन अभियान और मॉडर्न मेडिसिन के खिलाफ मुहीम चालने का आरोप लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने योग गुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के एमडी आचार्य बालकृष्ण की ओर से बिना शर्त माफी मांगने के लिए दायर किए गए हलफनामे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में योगगुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के एमडी बालकृष्ण ने भ्रामक विज्ञापन मामले में पब्लिक में माफी मांगने की बात कही थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इसके लिए एक हफ्ते का वक्त दिया है।

मामले की सुनवाई के दौरान पतंजलि आयुर्वेद की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पिछले विज्ञापन में की गई गलती और प्रेस कॉन्फ्रेंस के संदर्भ में सोमवार को कुछ न्यूजपेपर में विज्ञापन देकर माफी मांगी गई है। पतंजलि के वकील मुकुल रोहतगी ने इस बारे में कोर्ट को अवगत कराया। इस दौरान पतंजलि आयुर्वेद के एमडी बालकृष्ण और योगगुरु रामदेव दोनों ही कोर्ट में मौजूद थे। तब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पहले जो विज्ञापन आपने दिया था उसी साइज के विज्ञापन में आपका माफीनामा है?

रोहतगी ने कहा कि 67 पब्लिकेशन में विज्ञापन दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि विज्ञापन की कटिंग व संबंधित रेकॉर्ड कोर्ट के सामने दो दिनों में पेश करें। हम असल साइज देखना चाहते हैं कि कितना बड़ा विज्ञापन है। फोटोकॉपी से साइज बड़ा हो सकता है और वह हमें गवारा नहीं होगा। हम असल साइज देखना चाहते हैं कि कितना बड़ा विज्ञापन का साइज है। अगर आप माफीनामा देते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम उसे माइक्रोस्कोप से देखें।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान गुमराह करने वाले हेल्थ के दावों से संबंधित मुद्दों पर भी ध्यान दिया और कहा कि हम इस व्यापक मुद्दे को देखेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफएमसीजी कंपनियां कई गुमराह करने वाले हेल्थ संबंधित दावे करती है हम उसे देखेंगे। कोर्ट ने उपभोक्ता मामले और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया है। बेंच ने केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण भी मांगा है। केंद्र के आयुष मंत्रालय ने लेटर जारी कर राज्यों से कहा है कि वह आयुष उत्पाद के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 1945 के नियम 170 के तहत एक्शन ना लें। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट में आईएमए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर अर्जी दाखिल कर पतंजलि के खिलाफ वेक्सिनेशन अभियान और मॉडर्न मेडिसिन के खिलाफ मुहिम चालने का आरोप लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोर्ट के आदेश के बावजूद जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई थी।स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में योगगुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के एमडी बालकृष्ण ने भ्रामक विज्ञापन मामले में पब्लिक में माफी मांगने की बात कही थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इसके लिए एक हफ्ते का वक्त दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने योग गुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के एमडी आचार्य बालकृष्ण की ओर से बिना शर्त माफी मांगने के लिए दायर किए गए हलफनामे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने कहा था कि जब हमने रामदेव और बालकृष्ण को पेश होने के लिए कहा था तो उन्होंने उससे भी बचने की कोशिश की थी। बाद में रामदेव और बालकृष्ण को इस बात की इजाजत दी थी कि वह मामले में पब्लिक में माफीनामा पेश करें।

क्या नोटा बटन से निर्विरोध जीतना नियम अनुसार सही है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नोटा बटन से निर्विरोध जीतना नियम अनुसार सही है या नहीं! लोकसभा चुनाव, 2024 में भाजपा ने पहली जीत दर्ज की है। गुजरात में सूरत में पार्टी के उम्मीदवार मुकेश दलाल निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। दरअसल, नामांकन पत्र वापसी के अंतिम दिन सभी आठ प्रत्याशियों ने अपनी उम्मीदवारी पीछे खींच ली। इसके बाद भाजपा कैंडिडेट मुकेश दलाल निर्विरोध निर्वाचित हो गए। सूरत में एक दिन पहले कांग्रेस प्रत्याशी नीलेश कुंभाणी का पर्चा रद्द होने के बाद से दलाल की निर्विरोध जीत के कयास लग रहे थे। वहीं, बसपा कैंडिडेट प्यारे लाल भारती ने सबसे आखिरी में पर्चा वापस लिया। मुकेश दलाल को बीजेपी के प्रदेश प्रमुख सीआर पाटिल को करीबी और विश्वस्त माना जाता है। सूरत के इतिहास में निर्विरोध निर्वाचित होने वाले दलाल पहले सांसद बने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2013 में एक फैसला दिया था, जिसके बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में नोटा का इस्तेमाल शुरू किया गया। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह निर्देश दिया था कि वह बैलट पेपर्स या ईवीएम में नोटा का प्रावधान करे ताकि वोटर्स को किसी को भी वोट नहीं करने का हक मिल सके। इसके बाद आयोग ने ईवीएम में नोटा का बटन आखिरी विकल्प के रूप में रखा। नीचे दिए ग्राफिक से जानते हैं कि देश में आजादी के बाद से अब तक कितने प्रत्याशी निर्विरोध लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं!

दरअसल, रूल 49-O के नियम के अनुसार, किसी वोटर को यह हक है कि वह वोट नहीं करे। नोटा से पहले कोई वोटर अगर किसी प्रत्याशी को वोट नहीं देना चाहता था तो उसे फॉर्म 490 भरना पड़ता था। हालांकि, पोलिंग स्टेशन पर ऐसे फॉर्म भरना उस वोटर के लिए खतरा भी हो सकता था। यह कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 का उल्लंघन भी था। इससे वोटर की गोपनीयता भंग होती थी। पॉलिटिकल एक्सपर्ट राशिद किदवई कहते हैं कि तकनीकी रूप से देखा जाए तो किसी प्रत्याशी को निर्विरोध जीत ठहराना सही नहीं है, क्योंकि ईवीएम मशीन में नोटा का विकल्प होता है। हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा कर पाना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि किसी न किसी को जीत का सेहरा तो पहनाना ही होगा। वैसे भी नोटा सभी वोटर्स का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। यह कुछ ही लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। अगर वोटिंग कराई जाए और 1 वोट भी प्रत्याशी के समर्थन में पड़ा तो भी उसे ही जीता हुआ माना जाएगा। वैसे भी लोकतंत्र में नोटा को उम्मीदवार नहीं माना जा सकता है। जो भी प्रत्याशी निर्विरोध जीतता है तो उसकी जीत कानूनी रूप से सही मानी जाएगी।

सूरत जैसी स्थिति से बचने के लिए विपक्ष को काफी तैयारी करनी चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं की। ऐसे में विपक्ष को डमी कैंडिडेट भी खड़ा करना चाहिए। अपने उम्मीदवार को कवर देना चाहिए। जैसे अजीत पवार ने अपनी पत्नी के पक्ष में किया था, क्योंकि नामांकन किसी भी वजह से रद्द हो सकता है। अब आरोप लगाने का कोई फायदा नहीं होने वाला है। हालांकि, चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए कि जहां इतने सारे उम्मीदवार नामांकन वापस ले रहे हों, वहां अपने स्तर से जांच जरूर करानी चाहिए।

जुलाई, 2020 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा था कि नोटा का चिकल्प वहां लागू नहीं हो सकता, जहां चुनाव में बस एक ही उम्मीदवार हो। ऐसे प्रत्याशी की निर्विरोध जीत होगी। जहां चुनाव में कई उम्मीदवार होंगे, वहां नोटा का नियम लागू होगा। दरअसल, हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की गई थी कि जहां एक प्रत्याशी हो वहां भी नोटा का विकल्प होना चाहिए। तब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस बी कृष्णमोहन की पीठ ने कहा कि इस तरह का प्रावधान लागू नहीं किया जा सकता है। अगर कोई भी इस तरह का बदलाव चाहते हैं तो आप चुनाव आयोग, केंद्र और राज्य सरकार के पास जाएं।

अगर प्रत्याशी ने सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा नहीं किया है तो उसका नामांकन रद्द हो सकता है। नामांकन पत्र पर प्रत्याशी के अपने असली दस्तखत होने चाहिए। अगर यह साबित हो गया कि प्रत्याशी के बदले किसी और ने नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं तो वह नामांकन खारिज हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रत्याशी का नाम मतदाता सूची में जरूर होना चाहिए। इसके अलावा, नामांकन पत्र में प्रत्याशी ने खुद से जुड़ी कोई जानकारी छिपाई या गलत जानकारी दी तो भी उसका नामांकन रद्द हो सकता है।

चुनाव आयोग के मुताबिक, उम्मीदवार को नामांकन पत्र दाखिल करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। इसके साथ ही रिटर्निंग अधिकारी को नामांकन प्रस्तुत करते समय उसी समय प्रारंभिक जांच करनी चाहिए। अगर, पहली नजर में उसे कोई गलती दिखाई देती है, तो उसे उम्मीदवार के ध्यान में लाना चाहिए। नामांकन पत्र में लिपिकीय या मुद्रण संबंधी गलतियों को नजरअंदाज किया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार को नामांकन पत्र दाखिल करते समय सावधानी नहीं बरतनी चाहिए और रिटर्निंग ऑफिसर को ऐसी गलतियों को उम्मीदवार के ध्यान में नहीं लाना चाहिए।

देश में हो रहे हिंदुत्व के मुद्दे पर क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने देश में हो रहे हिंदुत्व के मुद्दे पर एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव में दूसरे फेज की वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फुल एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि वो विपक्ष पर हमले का कोई मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहते। हाल ही में उन्होंने ‘मुस्लिमों’ को लेकर ऐसी टिप्पणी की जिस पर हंगामा मच गया। कांग्रेस पर अटैक करते हुए उन्होंने जो कुछ कहा विपक्षी पार्टी उस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग तक पहुंच गई। इसके बाद भी पीएम मोदी विपक्ष को बख्शने के मूड में नहीं दिख रहे। उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में कांग्रेस के नहीं शामिल होने पर सवाल उठाए। सनातन को लेकर भी विपक्ष को घेरा। यही नहीं आज हनुमान जयंती के मौके पर उन्होंने हनुमान चालीसा का जिक्र कर विपक्षी पार्टी खास कर कांग्रेस पर करारा अटैक किया। प्रधानमंत्री लगातार हिंदुत्व के मुद्दे को धार देकर चुनावी रण में सियासी पारा और बढ़ाते दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राजस्थान में एक चुनावी रैली के दौरान कांग्रेस पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि इस पार्टी के शासन में ‘हनुमान चालीसा सुनना भी अपराध हो गया था।’ टोंक-सवाई माधोपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने दावा किया कि राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकार में रामनवमी मनाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस के राज में हनुमान चालीसा सुनना भी गुनाह हो गया था। राजस्थान इसका भुक्तभोगी रहा है। इस बार रामनवमी पर पहली बार राजस्थान में शोभा यात्रा निकाली गई। राजस्थान जैसे राज्य में जहां लोग राम-राम का जाप करते हैं, वहां कांग्रेस ने रामनवमी पर प्रतिबंध लगा दिया।

इस रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस शासित कर्नाटक में कथित तौर पर हनुमान चालीसा बजाने पर एक दुकानदार के ऊपर हमले का जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि आज हनुमान जयंती पर आपसे बात करते हुए मुझे कुछ दिन पहले की एक तस्वीर याद आ रही है। कुछ दिन पहले कांग्रेस शासित कर्नाटक में एक दुकानदार को सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीटा गया क्योंकि वो अपनी दुकान में बैठकर हनुमान चालीसा सुन रहा था। पीएम मोदी ने ये भी दावा किया कि कांग्रेस सरकार में हनुमान चालीसा सुनना एक अपराध है।

प्रधानमंत्री मोदी ने टोंक की जनसभा में कांग्रेस पर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के आरक्षण को मजहब के आधार पर मुसलमानों को देने की कोशिश करने का आरोप लगाया। पीएम मोदी ने गारंटी देते हुए कहा कि देश में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों का आरक्षण न खत्म होगा और न ही उसे धर्म के नाम पर बांटने दिया जाएगा। उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस को ललकारते हुए पूछा कि क्या कांग्रेस ऐलान करेगी कि वे संविधान में दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के आरक्षण को कम करके इसे मुसलमानों को नहीं बांटेगी? प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि वह संविधान को समझते हैं और उसके प्रति समर्पित हैं। मोदी बाबा साहब आंबेडकर की पूजा करने वाला व्यक्ति है।

पीएम मोदी ने कहा कि 2004 में जैसे ही कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनी उसके सबसे पहले किए गए कार्यों में से एक आंध्र प्रदेश में एससी, एसटी के आरक्षण को कम कर मुसलमानों को रिजर्वेशन देने का प्रयास था। जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक भाषण दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। ये संयोग नहीं था। ये अकेला बयान नहीं था। कांग्रेस की सोच हमेशा से तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति की रही है। ये एक पायलट प्रोजेक्ट था, जिसे कांग्रेस पूरे देश में आजमाना चाहती थी। 2004 से 2010 के बीच कांग्रेस ने चार बार आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण लागू करने की कोशिश की लेकिन सुप्रीम कोर्ट की जागरूकता के कारण वो अपने मंसूबे पूरे नहीं कर पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे पहले रविवार को भी मुस्लिमों के संबंध में एक कमेंट किया था। राजस्थान की एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा था कि विपक्षी पार्टी और इंडिया ब्लॉक की नजर ‘लोगों की कमाई और संपत्ति पर है’। कांग्रेस सरकार देश की संपत्ति को ‘घुसपैठियों’ और ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ में बांट देगी। उन्होंने यह भी कहा था कि कांग्रेस का आशय मुसलमानों से है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शहजादे कहते हैं कि वे जांच करवाएंगे कि कौन कितना कमाता है। आपके पास कितनी संपत्ति है, आपके पास कितना पैसा है, आपके पास कितने घर हैं। सरकार इस संपत्ति पर कब्जा करेगी और इसे सभी को बांटेगी। पीएम मोदी ने कहा कि हमारी माताओं और बहनों के पास सोना है। यह स्त्रीधन है, इसे पवित्र माना जाता है। कानून भी इसकी रक्षा करता है। उनकी नजर आपके मंगलसूत्र पर है। पीएम मोदी के इस कमेंट पर कांग्रेस तुरंत पलटवार के मूड में आ गई। पीएम मोदी के ‘मंगलसूत्र’ वाले कमेंट पर कांग्रेस ने चुनाव आयोग पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी ने ‘विभाजनकारी और दुर्भावनापूर्ण’ बयान देकर आचार संहिता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है। पार्टी ने चुनाव आयोग से पीएम मोदी के खिलाफ एक्शन की मांग कर दी है।

पीएम मोदी ने इसके बाद छत्तीसगढ़ की रैली में भी कांग्रेस पर जोरदार अटैक किया। उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर देश को बांटने वाली कांग्रेस आजादी के बाद पहले दिन से तुष्टीकरण में लगी हुई थी। तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति कांग्रेस के DNA में है। तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस को दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों का हक भी छीनना पड़े तो एक सेकंड भी नहीं लगाएगी। 2014 से पहले करीब 60 वर्ष तक, कांग्रेस के एक ही परिवार ने सीधा या रिमोट से सरकार चलाई। कांग्रेस कभी नहीं चाहती कि दलित, पिछड़े, आदिवासियों की भागीदारी बढ़े। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने अब एक और बड़ा खेल शुरू कर दिया है। पहले कर्नाटक से कांग्रेस सांसद ने कहा कि दक्षिण भारत को अलग देश घोषित कर देंगे। अब कांग्रेस के गोवा से उम्मीदवार कह रहे हैं कि गोवा में देश का संविधान लागू नहीं होता, गोवा पर देश का संविधान थोपा गया है। ये भारत का और बाबा साहेब आंबेडकर का अपमान है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुत्व के मुद्दे पर भी कांग्रेस को जमकर घेरा। छत्तीसगढ़ में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने इस साल 22 जनवरी को अयोध्या राम मंदिर के ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया। जांजगीर-चांपा में प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस नेता खुद को भगवान राम से ऊपर मानते हैं। उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। क्या यह छत्तीसगढ़ का अपमान नहीं है? यह भगवान राम का ननिहाल’ है। क्या यह माता शबरी का अपमान नहीं है? कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति करती रहती है, यह उनके डीएनए में है।

जब अभिनेता सुनील दत्त ने पंजाब में निकली थी महा शांति रैली !

एक ऐसा समय जब अभिनेता सुनील दत्त ने पंजाब में महा शांति रैली निकाली थी! दिग्गज अभिनेता और राजनेता सुनील दत्त को भला कौन नहीं जानता। भले ही आज वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके अभिनय और राजनीतिक पारी के दौरान किए गए कार्यों को भला कौन भूल सकता है। याद करिए 1987 का वो दौर जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था। तब सद्भाव और भाईचारा स्थापित करने के लिए सुनील दत्त ने मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक महाशांति पदयात्रा की। करीब 78 दिनों तक चली इस यात्रा के दौरान सुनील दत्त 2000 किलोमीटर पैदल चलकर अमृतसर पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान उन्हें पीलिया हो गया, पैरों में छाले तक पड़ गए। बावजूद इसके सुनील दत्त का मनोबल नहीं टूटा। उनकी ‘महाशांति पदयात्रा’ में बेटी प्रिया दत्त भी शामिल थीं। इनके अलावा भी सैकड़ों की संख्या में लोग उनके साथ चल रहे थे। इस पदयात्रा के दौरान कहा जाता है कि सुनील दत्त ने 500 से ज्यादा सभाएं की थी। सुनील दत्त ने 1987 में जब महाशांति पदयात्रा का आगाज किया तो शुरू में ऐसा कहा गया कि इसमें बम्बईया सिनेमा की झलक देखने को मिली। एक्टर ने एक ऐसा मिशन चुना जो किसी फिल्म की कहानी जैसा लग रहा था। इसमें खास बात ये थी कि उनकी बेटी प्रिया पूरा सपोर्ट दे रही थीं। वो भारतीय ध्यज को हाथ में लिए पूरी ताकत से यात्रा का नेतृत्व कर रही थीं। बॉम्बे से आए युवाओं के ग्रुप ने भी खास कार्यक्रमों के जरिए अलग ही माहौल बना दिया। जब तक ये यात्रा पंजाब नहीं पहुंची थी तो अलग नजर आ रही थी। हालांकि, पंजाब में एंट्री के बाद ये यात्रा फिल्मी जैसी नहीं रह गई। इसमें जबरदस्त बदलाव आया। उन दिनों पंजाब के हालात खराब थे और चारों ओर डर का माहौल था। हालांकि, पंजाब में यात्रा के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुई जो दिल को छू लेने वाली थी।

सुनील दत्त ने भी जब यात्रा शुरू की होगी तो शायद ही उन्हें इस बात का अहसास रहा होगा कि पंजाब में लोग उनके साथ जुड़ने की कोशिश करेंगे। हालांकि, पंजाब में उन्हें जोरदार सपोर्ट मिला। उनका स्वागत ऐसे किया गया मानो वे ऐसे ‘मसीहा’ हैं जिनका इंतजार लोग लंबे समय से कर रहे थे। एक ऐसा ‘मसीहा’ जो जहां भी जाएं तो शांति लाने में सक्षम हों। पंजाब में यात्रा के दौरान रास्ते में लोगों की भारी भीड़ उनके साथ शामिल थी। उनकी पदयात्रा के दौरान एक्टर पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसाईं गईं और माला भी पहनाई गई। इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘जो बोले सो निहाल’ के नारे भी लगाए गए।

सुनील दत्त की यात्रा में कई बेहद भावुक पल भी आए जब महिलाएं उनके पैरों में आंसू भरकर झुक कर बस यही अपील करतीं कि ‘बस हमको शांति चाहिए’। सुनील दत्त पर भी वहां की महिलाओं और आम लोगों की अपील का गहरा असर नजर आया। वो जिस टारगेट के साथ यात्रा के लिए उतरे थे अब उसे पूरा का मानो जूनून सवार हो गया। आखिरकार सुनील दत्त की 78 दिनों की यात्रा भावनात्मक रूप से तब संपन्न हुई जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में प्रार्थना की। वहां सिख धर्म गुरु और उग्रवादियों के साथ विचार-विमर्श भी किया।

सुनील दत्त की बेटी प्रिया ने अपने पिता की उस यात्रा से जुड़ी बातों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता सुनील दत्त जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पहुंचे थे और उन्हें अंदर जाने के लिए पुलिस ने बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने की सलाह दी थी। हालांकि उन्होंने इसे पहनने से इनकार कर दिया। जब वो अंदर गए तो वहां हथियार बंद लोगों ने उन्हें अपने साथ ले लिया। उन सबके हाथ में बंदूकें थीं। प्रिया दत्त ने बताया कि स्वर्ण मंदिर के गेट पर मौजूद लोगों ने सुनील दत्त को पहचान लिया था। उन्होंने सादे ड्रेस में पुलिसकर्मियों को अंदर जाने से रोक दिया था। उस समय उन हथियारबंद लोगों ने कहा था कि सुनील दत्त अब उनकी जिम्मेदारी हैं। वे वही लोग थे जिन्होंने स्वर्ण मंदिर को अपने कब्जे में लिया था। पूजा के बाद सुनील दत्त सकुशल बाहर आ गए। उनकी इस यात्रा ने पंजाब की स्थिति को सुधारने में अहम रोल निभाया था।

सुनील दत्त के राजनीतिक करियर पर नजर डालें तो वो पांच बार सांसद रहे। उन्होंने 1984 में कांग्रेस के टिकट पर अपना पहला लोकसभा चुनाव बॉम्बे नॉर्थ वेस्ट सीट अब मुंबई से लड़ा और जीते भी। उन्होंने 1989 और 1991 के चुनावों में इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। फिर 1999, 2000 और 2004 में सुनील दत्त फिर यहां से सांसद चुने गए। 1984 में सिख मतदाताओं ने बॉम्बे नॉर्थ वेस्ट लोकसभा क्षेत्र में दिवंगत अभिनेता-राजनेता सुनील दत्त को सिक्कों से तौला था।

क्या सुप्रीम कोर्ट से रामदेव बाबा को लग चुका है एक और तगड़ा झटका?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से रामदेव बाबा को एक और तगड़ा झटका लग चुका पतंजलि आयुर्वेद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई का दायरा बढ़ा लिया है। सर्वोच्च अदालत ने एफएमसीजी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों पर कड़ा रुख अपनाया। तीन केंद्रीय मंत्रालयों से जनता के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे चलन को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। इस बीच योग गुरु रामदेव और उनके सहयोगी पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के बालकृष्ण ने कोर्ट में सार्वजनिक माफी का जिक्र किया। जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ को उन्होंने बताया कि भ्रामक विज्ञापनों पर 67 समाचार पत्रों में बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांग ली है। वे अपनी गलतियों के लिए बिना शर्त माफी मांगते हुए अतिरिक्त विज्ञापन भी जारी करना चाहते हैं। पीठ ने कहा कि अखबारों में प्रकाशित सार्वजनिक माफी रिकॉर्ड पर नहीं है। यह दो दिन के भीतर दाखिल किया जाए। कोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 30 अप्रैल की तारीख निर्धारित की। पतंजलि मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि औषधि और जादुई इलाज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, औषधि और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के कार्यान्वयन और संबंधित नियमों की भी बारीकी से पड़ताल की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा केवल पतंजलि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दैनिक इस्तेमाल के सामान बनाने वाली (एफएमसीजी) सभी कंपनियों तक फैला हुआ है। ये भ्रामक विज्ञापन जारी कर रही हैं और जनता को धोखा दे रही हैं। खासकर नवजात बच्चों, स्कूल जाने वाले बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में गलत बयानी के आधार पर प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं।पीठ ने कहा कि हमें यह स्पष्ट करना चाहिए कि हम यहां किसी विशेष पार्टी या किसी खास एजेंसी, प्राधिकारी के लिए बंदूक चलाने के लिए नहीं आए हैं। यह एक जनहित याचिका है और उपभोक्ताओं के व्यापक हित में जनता को पता होना चाहिए कि वह किस रास्ते पर जा रही है। उसे कैसे और क्यों गुमराह किया जा सकता है। अधिकारी इसे रोकने के लिए कैसे काम कर रहे हैं। कोर्ट ने केंद्रीय उपभोक्ता मामले, सूचना-प्रसारण और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालयों से यह बताने को कहा कि उन्होंने उपभोक्ता कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या कार्रवाई की है।

सर्वोच्च अदालत ने आयुष मंत्रालय की ओर से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लाइसेंसिंग अधिकारियों और आयुष के दवा नियंत्रकों को अगस्त 2023 में जारी किए गए पत्र पर केंद्र से स्पष्टीकरण भी मांगा। इस पत्र में उनसे औषधि और सौंदर्य प्रसाधन नियम 1945 के रूल 170 के तहत कोई कार्रवाई न करने को कहा गया था। पीठ ने पतंजलि विज्ञापन मामले में याचिकाकर्ता इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) से भी अपना घर व्यवस्थित करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि आईएमए के सदस्यों के कथित अनैतिक कृत्यों के बारे में भी कई शिकायतें की गई हैं जो अत्यधिक महंगी दवाएं और इलाज लिखते हैं। पीठ ने अदालत को प्रभावी सहायता के लिए मामले में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) को भी प्रतिवादी बनाने का आदेश दिया।

शुरुआत में, रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के प्रबंध निदेशक बालकृष्ण की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ को बताया कि उन्होंने अपनी ओर से हुई गलतियों के लिए सोमवार को बिना शर्त माफी मांगी है। पीठ ने पूछा कि कहां? इसे दायर क्यों नहीं किया गया? रोहतगी ने कहा कि इसे सोमवार को देशभर के 67 अखबारों में जारी किया गया। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता से जब यह पूछा कि प्रतिवादियों ने सार्वजनिक माफी प्रकाशित करने से पहले पूरे एक सप्ताह तक इंतजार क्यों किया, रोहतगी ने कहा कि इसकी भाषा बदलनी पड़ी।

पीठ ने कहा कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लाइसेंसिंग अधिकारियों को भी मामले में सह-प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जाएगा।कोर्ट ने केंद्रीय उपभोक्ता मामले, सूचना-प्रसारण और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालयों से यह बताने को कहा कि उन्होंने उपभोक्ता कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या कार्रवाई की है। कोर्ट ने आईएमए के वकील से कहा कि जब वे पतंजलि पर उंगलियां उठा रहे हैं, तो अन्य चार उंगलियां आईएमए पर भी उठ रही हैं। कोर्ट ने रामदेव और बालकृष्ण को 16 अप्रैल को हिदायत दी थी कि वे एलोपैथी को नीचा दिखाने का कोई प्रयास नहीं करें। न्यायालय ने उन्हें पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के भ्रामक विज्ञापन के मामले में एक सप्ताह के भीतर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और पछतावा प्रकट करने की अनुमति दी थी।

आखिर कैसी थी भारत में चलने वाली पहली रेलगाड़ी?

भारत में एक समय ऐसा भी था जब पहली बार पैसेंजर ट्रेन चलाई गई थी और उस ट्रेन को खींचने के लिए तीन इंजन की जरूरत पड़ी थी… हाल ही में 16 अप्रैल 2024 को रेलगाड़ी का जन्मदिन निकला है ,जी हां रेलगाड़ी का जन्मदिन ….1853 में पहली बार रेल गाड़ी चलाई गई थी… जिसके बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं! 

आपको बता दें कि भले ही आज सुपरफास्ट और बुलेट ट्रेन का जमाना हो, लेकिन भारतीय रेलवे के इतिहास में 16 अप्रैल के दिन की खास अहमियत है और हमेशा रहेगी। दरअसल, 16 अप्रैल, 1853 को देश में पहली रेल चली थी। ऐसे में हम ये भी कह सकते हैं कि 16 अप्रैल भारतीय रेल का जन्मदिन है। जन्मदिन इस मायने में कि साल 1853 को इसी दिन भारत में पहली पैसेंजर ट्रेन चली थी। ये ट्रेन बम्बई से ठाणे के बीच चली थी। उस समय महज 14 डिब्बों वाली इस ट्रेन को खींचने के लिए तीन इंजन लगाए गए थे। इसमें 400 यात्रियों ने सफर किया था। आपको बता दें कि भारत में ट्रेन की शुरुआत अंग्रेजों के जमाने से ही हो गई है. दरअसल 1832 में पहली बार भारत में ट्रेन चलाने का विचार किया गया था. उस वक्त ब्रिटेन में भी ट्रेन बस शुरू ही हुई थी. अंग्रेजों को पता था कि भारत जैसे विशाल देश में ट्रेन चलाने का उन्हें बहुत फायदा मिलने वाला है. जिसके बाद 1844 में भारत में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड हार्डिंग इस काम में पूरे जी जान से जुट गएं. इसके बाद भारत में ट्रेन को लाने के लिए अंग्रेजों ने दो कंपनियों ‘ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी’ और ‘ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे’ का गठन किया. जिसके बाद देश में रेल का काम और भी तेजी से शुरू हो गयाइन सारे प्रयासों के बाद देश में पहली ट्रेन आज से 170 साल पहले यानि 16 अप्रैल, 1853 में शुरू हुई. देश में पहली ट्रेन तत्कालीन बंबई के बोरीबंदर से लेकर ठाणे के बीच चली थी. ये ट्रेन दोपहर 3 बजकर 35 मिनट पर मुंबई से निकली और 4 बजकर 45 मिनट पर ठाणे पहुंची. करीब 35 किलोमीटर के इस सफर को पूरे करने में इसे 1 घंटा और 10 मिनट का समय लगा. . बता दें कि भारतीय रेल की पहली ट्रेन 16 अप्रैल, 1853 को दोपहर 03:35 पर रवाना हुई थी। यह रवानगी तत्कालीन बॉम्बे के बोरीबंदर रेलवे स्टेशन से हुई थी। डेस्टिनेशन 33 किलोमीटर दूर का, थाने था। देश की पहली ट्रेन में 14 डिब्बे लगाए गए थे। इनमें 400 यात्री बैठे थे। यह देश के लिए कितना बड़ा कार्यक्रम था, इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब ट्रेन रवाना हुई तो उसे 21 तोपों की सलामी दी गई थी।  इंडियन रेलवे फैन क्लब एसोसिएशन के मुताबिक, इस ट्रेन ने 33.80 किलोमीटर की यात्रा एक घंटा 15 मिनट में पूरी की थी। 1845 में कलकत्ता में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेल कंपनी की स्थापना हुई और इसी कंपनी ने 1850 में मुंबई से ठाणे तक रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था। भारत में सन् 1856 में भाप के इंजन बनना शुरू हुए, इसके बाद धीरे-धीरे रेल की पटरियां बिछाई गईं, पहले नैरोगेज पर रेल चली, उसके बाद मीटरगेज और ब्रॉडगेज लाइन बिछाई गई। 1 मार्च 1969 को देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन ब्रॉडगेज लाइन पर दिल्ली से हावड़ा के बीच चलाई गई थी। भारतीय रेलवे की खास बात यह भी है कि देश की सबसे धीमी रफ्तार वाली ट्रेन की गति इतनी धीमी है कि लोग चलती ट्रेन से आसानी से उतर और चढ़ सकते हैं। सबसे धीमी रफ्तार वाली ट्रेन 10 किमी. प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है।

उस ट्रेन के डिब्बों की , आज के रेल के डिब्बों से तुलना करें तो वे माचिस की डिब्बी लगेंगे। तब भी वो जमाना अलग था। उत्साह अलग था। 34 किलोमीटर के सफर में ये ट्रेन दो स्टेशनों पर रूकी। बोरीबंदर स्टेशन से रवाना होकर 8 किलोमीटर चलने के बाद यह ट्रेन भायखला में रूकी। यहां इसके इंजन में पानी भरा गया। फिर वहां से रवाना होकर थोड़ी देर के लिए सायन में स्टॉपेज रहा। इस पूरे डेढ़ घंटे के सफर में रेल 15-15 मिनट के लिए 2 स्टेशनों पर ठहरी। अब सवाल ये कि क्या भारतीय रेल भी अपनी पहली पैसेंजर ट्रेन यात्रा की तारीख 16 अप्रैल 1853 ही बताता है। बिल्कुल ऐसा है। हालांकि, सवाल ये उठता है क्या उसी दिन देश में पहली रेल चली थी तो इसका जवाब है नहीं। दरअसल, बंबई से ठाणे के बीच चली ये ट्रेन भारत में पहली व्यावसायिक यात्री सेवा थी। वास्तव में, कुछ अन्य रेलवे कंपनियों ने भारत में कंस्ट्रक्शन मैटेरियल ढोने के लिए 1853 से पहले ही ट्रेनों का संचालन शुरू कर दिया था। ऐसे प्रमाण हैं कि साल 1835 में ही, मद्रास में चिंताद्रिपेट के पास एक छोटी प्रायोगिक रेल लाईन बिछाई गई थी। यह 1837 में खोला गया था। लेकिन यह थी देश की पहली छुक छुक करती पैसेंजर रेलगाड़ी!

कांग्रेस द्वारा मुसलमान के तुष्टीकरण के लिए क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने कांग्रेस द्वारा मुसलमान के तुष्टीकरण के लिए एक बयान दिया है! कांग्रेस यदि सत्ता में आती है तो वह लोगों की संपत्ति लेकर मुसलमानों को बांट देगी… दूसरे चरण की वोटिंग से पहले पीएम मोदी के इस बयान ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। वहीं इस बयान के बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों में ठन गई है। पीएम मोदी ने रविवार राजस्थान में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस केंद्र की सत्ता में यदि आती है तो वह लोगों की संपत्ति लेकर मुसलमानों को बांट देगी। मोदी ने यह बात पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक बयान का हवाला देते हुए कही, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि देश के संसाधनों पर ‘पहला हक’ अल्पसंख्यक समुदाय का है। मोदी ने कहा कि ये अर्बन नक्सल वाली सोच…. मेरी माताओ- बहनों ये आपका मंगलसूत्र भी बचने नहीं देंगे। इस हद तक चले जाएंगे। उन्होंने दावा करते हुए कहा ये कांग्रेस का घोषणापत्र कह रहा है कि वे माताओं बहनों के सोने का हिसाब करेंगे, उसकी जानकारी लेंगे और फिर उस संपत्ति को बांट देंगे। पीएम मोदी के इस बयान के बाद कांग्रेस की ओर से भी इसका जवाब दिया गया है। पीएम मोदी का बयान, कांग्रेस का घोषणा पत्र और मनमोहन सिंह के पुराने भाषण ने 2024 के चुनाव में एक नए सियासी बहस को जन्म दे दिया है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ दिनों पहले तेलंगाना में एक चुनावी रैली में जितनी आबादी उतना हक के नारे का जिक्र करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो एक सर्वे कराया जाएगा। एक वित्तीय और संस्थागत सर्वेक्षण पार्टी कराएगी कि देश की अधिकतर संपत्ति पर किसका नियंत्रण है। जाति जनगणना के अलावा वेल्थ सर्वे कराया जाएगा। कांग्रेस के घोषणा पत्र में आर्थिक असमानताओं के मुद्दे पर प्रकाश डाला गया है। पीएम मोदी के बयान के बाद के बाद कांग्रेस पार्टी ने जोर देकर कहा है कि इसमें किसी से कुछ लेकर बांटने की बात नहीं कही गई है और व्यापक सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना का समर्थन किया गया है। कांग्रेस ने यह दावा भी किया था कि राहुल गांधी ने सात अप्रैल 2024 को हैदराबाद में देश की संपत्ति के ‘पुनर्वितरण’ का वादा नहीं किया और उनके शब्दों को गलत तरीके से पेश किया गया।

बांसवाड़ा में अपनी रैली में मोदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस अब वामपंथियों के चंगुल में फंसी हुई है और पार्टी ने अपने घोषणापत्र में जो कहा है वह चिंताजनक है गंभीर है। उन्होंने कहा कि ये माओवाद की सोच को जमीन पर उतारने की उनकी कोशिश है। मोदी ने कहा कि यदि कांग्रेस की सरकार बनेगी तो हरेक की प्रॉपर्टी का सर्वे किया जायेगा। हमारी बहनों के पास सोना कितना है उसकी जांच की जाएगी, उसका हिसाब लगाया जायेगा। हमारे आदिवासी परिवारों में चांदी होती है, उसका हिसाब लगाया जायेगा। ये जो गोल्ड है बहनों का और जो और संपत्ति है ये सबको समान रूप से वितरित कर दी जाएगी। मोदी ने कहा, क्या आपको ये मंजूर है। आपकी संपत्ति सरकार को ऐंठने का अधिकार है क्या। क्या आपकी संपत्ति को, आपकी मेहनत करके कमाई संपत्ति को सरकार को ऐंठने का अधिकार है क्या। माताओं व बहनों के जीवन में सोना दिखाने के लिए नहीं होता, वो उनके स्वाभिमान से जुड़ा होता है। मोदी ने कहा, उनका मंगलसूत्र सोने की कीमत का मुद्दा नहीं, उनके जीवन के सपनों से जुड़ा होता है। आप उसे छीनने की बात कर रहे हो अपने मेनिफेस्टो में।

पीएम मोदी का इशारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 2006 में की गई विवादास्पद पहला हक टिप्पणी की ओर था। हालांकि उस वक्त भी जब इस पर बवाल मचा तब पीएमओ की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया था। वहीं दलित चिंतक दिलीप मंडल ने मनमोहन सिंह की ओर दिए गए बयान पर ट्वीट करते हुए लिखा है कि मनमोहन सिंह का बयान अचानक नहीं आया था। SC की लिस्ट में मुसलमानों को घुसाया जाए और मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में अलग से15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। मुसलमानों को संसाधनों पर पहला हक देना सिर्फ बयान नहीं था बल्कि इसकी प्रक्रिया चल रही थी। दिलीप मंडल ने लिखा है कि मनमोहन सिंह के बयान से ठीक एक महीना पहले सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई थी, जिसने ये गलत बयानी की थी कि मुसलमानों की दलितों से खराब हालत है। दिलीप मंडल की ओर रिटायर्ड चीफ जस्टिस और कांग्रेसी नेता रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है।

राहुल गांधी के बयान पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने स्पष्टीकरण दिया। कांग्रेस ने सोमवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा 2021 की जनगणना नहीं कराना बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान को खत्म करने की साजिश है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी पर जहरीली भाषा के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया। रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किया कि प्रधानमंत्री जहरीली भाषा में दुनिया भर की बातें बोलते हैं। उन्हें एक सीधे से सवाल का जवाब भी देना चाहिए। उन्होंने कहा 1951 से हर दस साल के बाद जनगणना होती आ रही है। इससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी का वास्तविक डेटा सामने आता है। इसे 2021 में कराया जाना चाहिए था लेकिन आज तक किया नहीं गया। इस पर प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं। रमेश ने आरोप लगाया कि यह बाबासाहेब आंबेडकर के संविधान को खत्म करने की साजिश है।

आखिर क्या है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन? इसके अंदर क्या-क्या होता है?

आज हम आपको बताएंगे कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के अंदर क्या-क्या होता है और इसे कौन सी कंपनी बनाती है! लोकसभा चुनाव की शुरुआत हो चुकी है,19 अप्रैल 2024 को पहला चरण संपन्न हो चुका है… और अब 26 अप्रैल की बारी है… लेकिन इसी बीच आज हम आपको इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इतिहास, वर्तमान और इसके टेक्निकल terms के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दें कि देश में 19 अप्रैल से आम चुनाव की शुरुआत हो चुकी है.. चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बहुत ही महत्वपूर्ण रोल होता है, बता दे कि यह सिस्टम अभी पूरी तरह से लागू नहीं है, साल 2014 में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था… बता दे कि साल 1980 में , एम. बी. हनीफा ने पहली वोटिंग मशीन को बनाया था. उस वक्त इसे इलेक्ट्रॉनिक्ली ऑपरेटेड वोट काउंटिंग मशीन नाम दिया गया था. इसका ओरिजनल डिजाइन आम लोगों को तमिलनाडु के छह शहरों में हुए सरकारी एग्जीबिशन में दिखाया गया था वैसे तो EVM हर बार राजनीति का शिकार होती रही है, सभी आरोपी के बाद भी EVM देश को नई सरकार देने में मदद करती आई है… आज हम आपको EVM के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं… जानकारी के लिए बता दे की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल लोकसभा और विधानसभा चुनाव में शुरू हुआ था…. EVM ने भारत में बैलेट पेपर के इस्तेमाल को रिप्लेस किया है… 

बता दें कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर कई बार आप लगे हैं, लेकिन आज तक कोई इसे सिद्ध नहीं कर पाया है… इन आरोपों के बाद इलेक्शन कमीशन ने वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रायल यानी VVAPT सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया… हालांकि यह सिस्टम अभी पूरी तरह से लागू नहीं है, साल 2014 में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था…बता दें कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है, जबकि बैलेट यूनिट को दूसरी तरफ रखा जाता है, जहां से लोग वोट डाल पाते हैं… दबाया हुआ बटन कहीं गलती से ना दब जाए इसके लिए दो सेफगार्ड भी होते हैं… इस बटन को तब तक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जब तक क्लोज बटन ना दबाया जाए और वोटिंग प्रक्रिया पूरी तरह से खत्म ना हो जाए बता दे कि साल 1980 में , एम. बी. हनीफा ने पहली वोटिंग मशीन को बनाया था. उस वक्त इसे इलेक्ट्रॉनिक्ली ऑपरेटेड वोट काउंटिंग मशीन नाम दिया गया था. इसका ओरिजनल डिजाइन आम लोगों को तमिलनाडु के छह शहरों में हुए सरकारी एग्जीबिशन में दिखाया गया था… 

बता दें कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पहली बार इस्तेमाल 1982 में केरल के उत्तर परबुर में हुए उप चुनाव में हुआ था…. शुरुआती दिनों में चुनाव आयोग को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल को लेकर बहुत से विरोध का सामना करना पड़ा…. साल 1998 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल 16 विधानसभा में हुए चुनावो में हुआ था, इसके बाद 1999 में इसका विस्तार हुआ और 46 लोकसभा सीट पर इन्हें इस्तेमाल किया गया…. साल 2004 में लोकसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल सभी सीट पर हुआ…. बता दें कि EVM में दो यूनिट्स- कंट्रोल और बैलेट होती है. यानी एक यूनिट जिस पर बटन दबा कर आप अपना वोट देते हैं और दूसरी यूनिट जिसमें आपके वोट को स्टोर किया जाता है…

कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है, जबकि बैलेट यूनिट को दूसरी तरफ रखा जाता है, जहां से लोग वोट डाल पाते हैं… दबाया हुआ बटन कहीं गलती से ना दब जाए इसके लिए दो सेफगार्ड भी होते हैं… इस बटन को तब तक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जब तक क्लोज बटन ना दबाया जाए और वोटिंग प्रक्रिया पूरी तरह से खत्म ना हो जाए… यह बटन छुपी हुई होती है और इसे सुरक्षा टर्म से सील रखा जाता है, इस सील को सिर्फ काउंटिंग सेंटर पर ही तोड़ा जाता है…. बता दे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को दो कंपनियां मिलकर बनती है… इसे इलेक्शन कमीशन, भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड बेंगलुरु, मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड हैदराबाद के साथ मिलकर तैयार किया जाता है.. अतः इसे 46 लोकसभा सीट पर इन्हें इस्तेमाल किया गया…. साल 2004 में लोकसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल सभी सीट पर हुआ…. बता दें कि EVM में दो यूनिट्स- कंट्रोल और बैलेट होती है. यानी एक यूनिट जिस पर बटन दबा कर आप अपना वोट देते हैं और दूसरी यूनिट जिसमें आपके वोट को स्टोर किया जाता है… … तो यह है इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पूरा इतिहास, वर्तमान और इसके टेक्निकल टर्म्स!

पहले चरण के कम मतदान पर क्या बोला चुनाव आयोग?

हाल ही में चुनाव आयोग ने पहले चरण के कम मतदान पर बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के पहले फेज में वोटिंग प्रतिशत ने अब इलेक्शन कमीशन को भी चिंता में डाल दिया है। चुनाव आयोग को जो आंकडे़ मिले हैं, उसके हिसाब से 2019 की तुलना में इस बार कुल मतदान में लगभग तीन प्रतिशत अंकों की गिरावट देखी गई है। अब बाकी चरणों के लिए ईसीआई नए तरीके से अपनी रणनीति पर काम करेगा। नवीनतम आंकड़ों की मानें तो अब तक 66% फीसदी मतदान पहले चरण में हुआ है। यह अभी भी 2019 के 69 फीसदी के मुकाबले कम है। चुनाव आयोग इस बात को मानता है कि मतदान कम होने का कारण उन्हें बहुत चिंता है। आयोग के एक बड़े अधिकारी ने कहा कि लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह तो था, लेकिन इतना काफी नहीं था कि वे मतदान केंद्र पर जाकर वोट डाल सकें। उन्होंने बताया कि मतदान बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने बहुत कोशिशें कीं। स्वीप कार्यक्रम (SVEEP) के तहत मतदान बढ़ाने की योजना बनाई गई, मशहूर हस्तियों को चुनाव आयोग का दूत बनाकर लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया गया, क्रिकेट मैच के दौरान भी लोगों को वोट डालने के लिए जागरूक किया गया और मतदान केंद्रों को भी बेहतर बनाया गया ताकि वोट डालना आसान हो। लेकिन ऐसा लगता है कि ये कोशिशें काफी नहीं रहीं।

चुनाव आयोग कम मतदान के कारणों का विश्लेषण कर रहा है। चुनाव आयोग के पदाधिकारी ने कहा कि इस मुद्दे पर सप्ताह के अंत में होने वाली बैठकों में चर्चा की गई थी और हम मतदान कार्यान्वयन कार्यक्रम के तहत सोमवार तक और अधिक रणनीतियों के साथ सामने आएंगे। सूत्रों के अनुसार, कम मतदान का संभावित कारण गर्मी हो सकती है क्योंकि इस बार मतदान 2019 की तुलना में आठ दिन बाद शुरू हुआ। कई मतदाताओं द्वारा परिणाम को एक पूर्व निष्कर्ष मानते हुए उदासीनता और त्योहार और शादी के मौसम के साथ टकराव को भी फैक्टर माना जा रहा है।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, केवल तीन राज्यों-छत्तीसगढ़, मेघालय और सिक्किम में 2019 की तुलना में अधिक मतदान हुआ। नागालैंड में 57.7 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2019 की तुलना में 25 प्रतिशत से अधिक कम है। मणिपुर में 7.7 प्रतिशत अंक, मध्य प्रदेश में 7 प्रतिशत अंक और राजस्थान और मिजोरम में 6 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई। बिहार में सबसे कम 49.2% मतदान दर्ज किया गया। हालांकि इसने चुनाव आयोग को आश्चर्यचकित नहीं किया क्योंकि सर्वेक्षण में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र को शामिल किया गया था, 2019 में मतदान 53.47% था। यूपी में भी इस बार पहले फेज में 66.5 प्रतिशत से घटकर 61.1 प्रतिशत हो गया।

तमिलनाडु में बड़े टिकट अभियान के बावजूद यह प्रतिशत 69.7% से 72.1% तक गिर गया। इसमें डीएमके और भाजपा की तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन की विवादास्पद ‘सनातन धर्म’ टिप्पणी पर बहस भी खास असर नहीं दिखा पाई। उत्तराखंड में भी मतदाताओं का उत्साह कम देखा गया, जहां मतदान 2019 में 61.5 प्रतिशत से घटकर 57.2 प्रतिशत हो गया। पश्चिम बंगाल, जो एक उच्च-टर्नआउट राज्य रहा है, ने 81.9% पर प्रभावशाली मतदान देखा, लेकिन यह भी 2019 के 84.7% के आंकड़े से कम था।

निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने कहा कि उन मतदाताओं की श्रेणी की पहचान करना मुश्किल है जिन्होंने कम मतदान में योगदान दिया हो सकता है। उन्होंने कहा कि हम मतदाताओं की प्रोफाइल नहीं बनाते हैं और उन्हें अलग-अलग श्रेणियों के रूप में गिनते हैं। मशहूर हस्तियों को चुनाव आयोग का दूत बनाकर लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया गया, क्रिकेट मैच के दौरान भी लोगों को वोट डालने के लिए जागरूक किया गया और मतदान केंद्रों को भी बेहतर बनाया गया ताकि वोट डालना आसान हो। लेकिन ऐसा लगता है कि ये कोशिशें काफी नहीं रहीं।ईसी के एक अधिकारी ने कहा कि इसका एकमात्र समाधान उदासीनता को दूर करने और गणना किए जाने के लिए सभी श्रेणियों को प्रोत्साहित करना और तैयार करना है। उम्मीद है कि आयोग 26 अप्रैल को अगले दौर के मतदान से पहले मतदान बढ़ाने की संशोधित रणनीतियों के साथ सामने आएगा।

सोशल मीडिया में ऐसे भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पहले चरण में कम वोटिंग से भारतीय जनता पार्टी भी टेंशन में आ गई है। सोशल मीडिया साइट्स जैसे एक्स पर लो वोटिंग पर्सेंट कम होने पर बीजेपी के हारने की भी बात भी कह रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी चर्चा है कि कम वोटिंग पर्सेंट से जीतने का मार्जिन भी कम हो सकता है।