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आखिर शेख हसीना ने क्यों छोड़ा बांग्लादेश?

आज हम आपको बताएंगे कि शेख हसीना ने बांग्लादेश को क्यों छोड़ा! बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन बेकाबू हो गए हैं। प्रदर्शनकारी ढाका में स्थित पीएम हाउस में घुस चुके हैं। इस बीच प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका छोड़ दिया है। शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया है। कहा जा रहा है कि वो भारत की शरण लेंगी। छात्रों के प्रदर्शन से शुरू हुआ आंदोलन इतना कैसे बढ़ गया कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा? शेख हसीना के बैकफुट पर आने के बड़े कारण हम आपको बता रहे हैं। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। ये प्रदर्शन देखते देखते हिंसक हो गया। विवाद उस 30 प्रतिशत आरक्षण को लेकर है, जो स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को दिए जा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि मेरिट के आधार पर सरकारी नौकरियां नहीं दी जा रही है। सरकार अपने समर्थकों को आरक्षण देने के पक्ष में है।

बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर शुरु हुए छात्र आंदोलन में विपक्षी दल भी फ्रंटफुट पर आ गए। विपक्ष ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध किया। विपक्षी पार्टी बांग्‍लादेश नैशनल‍िस्‍ट पार्टी ने खालिदा जिया के नेतृत्‍व में लाखों की भीड़ जुटाकर शेख हसीना की कुर्सी को हिला दिया। विपक्ष ने हसीना से इस्तीफे की मांग की। सरकार भी विपक्ष के विरोध का सामना करने में विफल रही। बांग्लादेश में चल रहे प्रदर्शनों में सेना ने भी सरकार का साथ देने से मना कर दिया। हिंसक प्रदर्शनों में 90 लोगों की जान जा चुकी है। इसके बाद बांग्लादेश की सेना ने कहा कि अब वह प्रदर्शनकारियों पर गोलियां नहीं चलाएंगे। सेना मुख्यालय में बांग्‍लादेश आर्मी चीफ ने हालात के बारे में चर्चा की और ऐलान किया कि अब प्रदर्शनकारियों पर एक भी गोली नहीं चलाई जाएगी। इस बयान के बाद सेना का प्रर्दशनकारियों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर नजर आया।

बांग्लादेश में हिंसा भड़काने में पाकिस्तान का भी हाथ है। बांग्लादेश की सिविल सोसायटी ने पाकिस्तान उच्चायोग पर कट्टरपंथी छात्र प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान अंदरखाने छात्रों को समर्थन के जरिए बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। कुछ रिपोर्ट में खुलासा हुआ है क पाकिस्तान ‘मिशन पाकिस्तान’ समर्थक जमात से जुड़े छात्र प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग के संपर्क में है, जो बांग्लादेश में प्रतिबंधित है।

बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब थी, वहीं इस आंदोलन से इसे और झटका लगा है। वहां तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है। शेख हसीना लंबे समय से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। हाल ही में जब वो फिर से बांग्लादेश की पीएम बनीं, तो बेरोजगारों छात्रों में गुस्सा बढ़ गया। छात्र सड़क पर उतर आए और आंदोलन करने लगे। यही नहीं बांग्लादेश में दिख रहे एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स को लेकर उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया पार्ट ऑफ लाइफ हो गया है। वहां किसी चीज का विरोध करने के लिए भारत को बीच में खींचकर लाना एक प्रैक्टिस हो गया है। पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स की बात है तो ये साजिशें रची जाती हैं। बांग्लादेश में भी पाकिस्तानी एजेंसी ऐसी साजिश करती रही है। पर बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते बहुत प्रगाड़ है और वहां एंटी इंडिया सेंटिमेंट सफल नहीं हो सकेगा। मालदीव में देखें तो वह भी वेलकम इंडिया की बात कर रहे हैं।

विदेश मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के पड़ोस में अस्थिरता बढ़ रही है लेकिन भारत का अप्रोच नेबहुड फर्स्ट का है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि ये सही है कि फिलहाल बांग्लादेश की राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी बीएनपी और जमात के इतिहास को देखा जाए तो ऐसे में अगर इन दलों को वहां की राजनीति में स्पेस मिलता है तो पूर्वोत्तर के लिए भारत विरोधी गतिविधियों और अवैध नारकोटिक्स के खतरे पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा। ये दो ऐसे तत्व हैं, जि्न्हें काबू में करने को लेकर शेख हसीना की सरकार ने बहुत काम किया है।

इसे लेकर भारत पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से संयम के साथ नजर बनाए हुए रहा है। सब जानते हैं कि एक बार कोई देश राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जाए तो उस के बाद राजनीतिक सिस्टम को मुख्यधारा में लौटने में कितना वक्त लगता है, पड़ोसी देश श्रीलंका इसका एक उदाहण रहा है।पड़ोस में स्थितियां भारत के लिए चुनौतीपूर्ण जरूरी हैं लेकिन भारत की जो क्षमता है, अप्रोच है, भारत अपना रचनात्मक रोल अदा करता रहेगा।

क्या बांग्लादेश में आ सकता है एंटी इंडिया प्रधानमंत्री?

आने वाले समय में बांग्लादेश में एंटी इंडिया प्रधानमंत्री आ सकता है! बांग्लादेश में शेख हसीना के राज का अंत भले ही बांग्लादेश के युवा नई आजादी की तरह देख रहे हैं और सोशल मीडिया में भी इसका जश्न मना रहे हैं। लेकिन शेख हसीना का जाना भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि शेख हसीना के जाने से बांग्लादेश में भारत विरोध सेंटिमेंट्स को और बढ़ावा मिलने का डर है। हालांकि बांग्लादेश में वहां की आर्मी ने टेकओवर किया है और बांग्लादेश आर्मी के भारत की आर्मी के साथ अच्छे संबंध हैं। भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ तैनात हैं लेकिन बांग्लादेश के मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय सेना भी अलर्ट पर है। फॉरेन अफेयर्स एक्सपर्ट पारुल चंद्रा कहती हैं कि शेख हसीना का जाना भारत के लिए बहुत बड़ा सेटबैक है क्योंकि पिछले 15 साल से जब से वह प्रधानमंत्री थीं भारत-बांग्लादेश के संबंध बहुत अच्छे थे। उन्होंने भारत के स्ट्रैटजिक- सिक्योरिटी इंटरेस्ट का बहुत ध्यान रखा। उन्होंने जो भी कदम उठाए, अगर वे भारत से संबंधित थे तो वे भारत के स्ट्रैटजिक इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर लेती थी। जबकि भारत इतने सालों में भी उनको तीस्ता अग्रीमेंट नहीं दे पाया। ये उनके लिए डोमेस्टिक स्तर पर काफी मुश्किल स्थिति पैदा करता था क्योंकि वहां के दूसरे राजनीतिक दल और जनता ये मुद्दा बार बार उठाते थे कि बांग्लादेश में तीस्ता का पानी कब आएगा। फिर भी उन्होंने अपनी तरफ से भारत जो चाहता था वह भारत को दिया चाहे वह कनेक्टिविटी, सिक्योरिटी, ट्रेड हो या फिर नॉर्थ ईस्ट के इंसर्जेंट को वहां से भगाना हो।

फॉरेन अफेयर्स एक्सपर्ट पारुल कहती हैं कि चीन ने अफगानिस्तान से लेकर नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव सब जगह अपनी पकड़ बनाई है। चीन से बांग्लादेश को भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में बहुत मदद मिलती थी, फिर भी शेख हसीना यह ध्यान रखती थी की भारत के इंटरेस्ट पर असर ना पड़े। वह कहती हैं कि शेख हसीना के साथ भारत का नाम इतना जुड़ा था कि अब बांग्लादेश में भारत विरोध सेंटिमेंट्स को बढ़ावा मिलने का खतरा है। बांग्लादेश नैशनल पार्टी, जमाते इस्लामी को प्रो पाकिस्तान माना जाता है। भारत को इस बात की भी चिंता रहेगी कि बांग्लादेश में जो रेडिकल एलिमेंट्स हैं उनका भारत में क्या असर होगा।

आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि यह देखना होगा कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में अवामी लीग रहेगी या नहीं। बांग्लादेश में दिख रहे एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स को लेकर उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया पार्ट ऑफ लाइफ हो गया है। वहां किसी चीज का विरोध करने के लिए भारत को बीच में खींचकर लाना एक प्रैक्टिस हो गया है। विदेश मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के पड़ोस में अस्थिरता बढ़ रही है लेकिन भारत का अप्रोच नेबहुड फर्स्ट का है। पड़ोस में स्थितियां भारत के लिए चुनौतीपूर्ण जरूरी हैं लेकिन भारत की जो क्षमता है, अप्रोच है, भारत अपना रचनात्मक रोल अदा करता रहेगा। वह कहते हैं कि जहां तक पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स की बात है तो ये साजिशें रची जाती हैं। बांग्लादेश में भी पाकिस्तानी एजेंसी ऐसी साजिश करती रही है। पर बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते बहुत प्रगाड़ है और वहां एंटी इंडिया सेंटिमेंट सफल नहीं हो सकेगा। मालदीव में देखें तो वह भी वेलकम इंडिया की बात कर रहे हैं।

आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि बांग्लादेश आर्मी के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं। 2007 से बांग्लादेश आर्मी के साथ भारत का संबंध बदला है। भारत रीजनल पावर है। इसलिए बांग्लादेश में जो भी रिजीम रहे चाहे वह मिलिट्री रीजीम हो, वह भी चाहेगा कि इंडिया का सपोर्ट रहे। भारत की आर्मी और बांग्लादेश की आर्मी की जॉइंट एक्सरसाइज होती रहती हैं।अगर वे भारत से संबंधित थे तो वे भारत के स्ट्रैटजिक इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर लेती थी। जबकि भारत इतने सालों में भी उनको तीस्ता अग्रीमेंट नहीं दे पाया। ये उनके लिए डोमेस्टिक स्तर पर काफी मुश्किल स्थिति पैदा करता था क्योंकि वहां के दूसरे राजनीतिक दल और जनता ये मुद्दा बार बार उठाते थे कि बांग्लादेश में तीस्ता का पानी कब आएगा। नेवी और कोस्ट गार्ड के साथ ही एयरफोर्स के साथ भी एक्सरसाइज होती है। भारत की नैशनल डिफेंस अकेडमी में बांग्लादेश के ऑफिसर भी ट्रेनिंग लेते हैं।

क्या बांग्लादेश की अस्थिरता का भारत पर पड़ेगा प्रभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बांग्लादेश की अस्थिरता का भारत पर प्रभाव पड़ेगा या नहीं! बीते 21 जून को जब शेख हसीना नई दिल्ली में थीं, तो वो उनका 15 दिनों के भीतर दूसरा भारत दौरा था। अपने इस दौरे में उन्होंने ना सिर्फ पीएम मोदी से मुलाकात की, बल्कि इसके साथ ही वो विपक्षी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके परिवार से बेहद आत्मीयता से मिलीं। इसके बाद वो चीन के दौरे पर गई, लेकिन दौरा छोड़कर वापस आ गई। माना जा रहा है कि चीन को ये बात रास नहीं कि हसीना ने दो हफ्तों के भीतर दूसरी बार भारत का दौरा किया। हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश उन पड़ोसी देशों में से रहा है, जिसके भारत के साथ बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। अब ढाका में सेना के बूटों की धमक है,प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं, राजनीतिक उठापठक मची है, स्थिरता कोसों दूर है। लेकिन इस अस्थिरता का असर भारत पर भी पड़ना तय है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष वी पंत कहते हैं कि शेख हसीना ने साल 2009 से बांग्लादेश को संभाले हुई थी। अब कौन आएगा और उस देश को संभालेगा, जिसमें फिलहाल इतनी विभाजनकारी रेखाएं देखने को मिल रही हैं। खासतौर से 2009 के बाद से वहां आर्थिक तौर पर देश अच्छा कर रहा था। भारत बांग्लादेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करता है। अब सवाल ये है कि अगर सेना भविष्य में नई सरकार की बहाली की दिशा में काम करती है तो वहां किस तरह के राजनीतिक विकल्प होंगे ये कोई नहीं जानता।

फिलहाल खालिदा जिया हों या फिर जमात, राजनीतिक स्थिरता को लेकर किसी के पास भी कोई जवाब नहीं हैं। चरमपंथी समूहों का क्या रोल होगा, कोई नहीं जानता और इसे लेकर भारत के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी ही। एक शांत बांग्लादेश ही भारत के हित में है यही वजह है कि भारत ने कभी भी वहां हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। भारत ने हमेशा से बांग्लादेश का अंदरूनी मामला बताया। दरअसल भारत और बांग्लादेश 4100 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं।

ऐतिहासिक तौर पर बांग्लादेश की राजनीति की धुरी दो ही राजनीतिक दलों के इर्द गिर्द रही है। अवामी लीग और खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी साल 2009 से पहले जब जिया शासन में थी तो उस वक्त एंटी इंडिया सेंटीमेंट खासतौर पर देखने को मिला था। पार्टी पर आईएसआई से संबंध के भी आरोप लगते रहते हैं। माना जाता है कि उस दौरान भारत विरोधी राजनीतिक माहौल ने भारतीय विदेश नीति के लिए खासी चुनौती सामने रख दी थी।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि ये सही है कि फिलहाल बांग्लादेश की राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी बीएनपी और जमात के इतिहास को देखा जाए तो ऐसे में अगर इन दलों को वहां की राजनीति में स्पेस मिलता है तो पूर्वोत्तर के लिए भारत विरोधी गतिविधियों और अवैध नारकोटिक्स के खतरे पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा। ये दो ऐसे तत्व हैं, जि्न्हें काबू में करने को लेकर शेख हसीना की सरकार ने बहुत काम किया है।

कहा जा रहा है कि छात्रों के गुस्से से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के पीछे आईएसआई का भी हाथ होने के संकेत नजर आ रहे हैं, ऐसे में भारत जानता है कि अगर पड़ोसी देश इस्लामी कट्टरपंथ के चंगुल में ना आ तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसे ही होगा, इसे लेकर भारत पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से संयम के साथ नजर बनाए हुए रहा है। सब जानते हैं कि एक बार कोई देश राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जाए तो उस के बाद राजनीतिक सिस्टम को मुख्यधारा में लौटने में कितना वक्त लगता है, जिसमें फिलहाल इतनी विभाजनकारी रेखाएं देखने को मिल रही हैं। खासतौर से 2009 के बाद से वहां आर्थिक तौर पर देश अच्छा कर रहा था। भारत बांग्लादेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करता है। अब सवाल ये है कि अगर सेना भविष्य में नई सरकार की बहाली की दिशा में काम करती है तो वहां किस तरह के राजनीतिक विकल्प होंगे ये कोई नहीं जानता।पड़ोसी देश श्रीलंका इसका एक उदाहण रहा है। अमिताभ सिंह कहते हैं कि भारत के लिए एक खतरा चीन की और से भी है। अपने सामरिक हितों को देखते हुए चीन बदली हुई हर राजनीतिक परिस्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेगा, जो कम से कम भारत के हित में तो बिल्कुल नहीं होगी।

बांग्लादेश में अचानक से कैसे हो गया तख्तापलट?

आज हम आपको बताएंगे कि बांग्लादेश में अचानक से तख्तापलट कैसे हो गया! बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन और बढ़ते बवाल के बीच शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। यही नहीं बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने उनके आवास पर धावा बोला। बिगड़ते हालात को देखते हुए शेख हसीना भारत पहुंची हैं। उनका विमान दिल्ली से सटे गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर उतरा है। इस बीच एनएसए अजीत डोभाल ने शेख हसीना से मुलाकात की है। वहीं बांग्लादेश में हालात पर भारत की भी निगाहें हैं। बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर हाई अलर्ट घोषित किया है। बीएसएफ जवानों की गश्त सीमा पर बढ़ा दी गई है। बीएसएफ के डीजी खुद बॉर्डर एरिया पर पहुंच चुके हैं। उधर विदेश मंत्री एस. जयशंकर बांग्लादेश के हालात पर चर्चा के लिए पीएम मोदी से मिलने पहुंचे हैं। उन्हें बांग्लादेश के हर अपडेट की जानकारी दी। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बांग्लादेश छोड़ भारत पहुंचीं शेख हसीना से मिलने के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पहुंचे। शेख हसीना का विमान गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर उतरा है। वहीं शेख हसीना से एनएसए डोभाल मिले हैं। माना जा रहा कि करीब आधे घंटे तक उनकी ये मुलाकात हुई है।मुलाकात के बाद अजीत डोभाल की गाड़ी हिंडन एयरबेस के अंदर से निकली। कई गाड़ियों का काफिला साथ में था। वेस्टर्न एयर कमांड के एयर मार्शल पंकज मोहन सिन्हा भी एयरबेस से बाहर निकले।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर बांग्लादेश की स्थिति पर अपडेट लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंचे हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने पीएम मोदी को बांग्लादेश के हालात पर जानकारी दी है। जिस तरह से शेख हसीना का विमान भारतीय सरजमीं पर उतरा और बांग्लादेश में जैसे हालात हैं, माना जा रहा कि उस पर भी प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जयशंकर के बीच चर्चा हुई।

बांग्लादेश में बिगड़े राजनीतिक हालात और हिंसा के मद्देनजर विदेश मंत्रालय ने ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। नागरिकों को बांग्लादेश नहीं जाने की अपील की गई है। एअर इंडिया ने ढाका में विमान सेवाएं सस्पेंड कर दी है। बांग्लादेश और भारत के बीच चलने वाली रेल सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। पहले रेल सर्विस रद्द करने के बाद फ्लाइट सर्विस सस्पेंड किया गया है। भारत में बांग्लादेश हाई कमीशन की सुरक्षा बढ़ाई गई है। बांग्लादेश में भयंकर विरोध प्रदर्शनों के बीच, प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यही नहीं वो अपनी बहन के साथ राजधानी ढाका छोड़कर ‘सुरक्षित स्थान’ के लिए रवाना हो गईं। जानकारी के मुताबिक, नई दिल्ली आ रही हैं। उनका विमान झारखंड-बिहार होते हुए दिल्ली में लैंड करेंगे। वहीं बांग्लादेश में बिगड़े हालात तो भारतीय सीमाओं पर भी चौकसी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों के अनुसार, सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर अपनी सभी इकाइयों को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा है। उधर केंद्र सरकार ने ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। भारत ने बांग्लादेश में जारी हिंसा के कारण अपने सभी नागरिकों को अगली सूचना तक पड़ोसी देश की यात्रा न करने की सलाह दी है।

बांग्लादेश में पूरा घटनाक्रम तब सामने आया है जब प्रदर्शनकारियों ने कोटा विरोध प्रदर्शनों के बीच हसीना के इस्तीफे की मांग की थी। इन विरोध प्रदर्शनों में लगभग 300 लोग मारे जा चुके हैं। इस बीच, हालात इतने बिगड़ गए हैं कि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हजारों प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री आवास में घुस गए। दूसरी ओर से प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हिंसक विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहे देश से भागने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेख हसीना एक सैन्य हेलीकॉप्टर से भारत रवाना हुईं। वह और उनकी बहन सुरक्षित स्थान के लिए प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास छोड़ चुकी हैं।

सूत्रों के मुताबिक, शेख हसीना देश छोड़ने से पहले देशवासियों को संबोधित करना चाहती थी। वो एक भाषण रिकॉर्ड करना चाहती थीं। लेकिन उन्हें ऐसा करने का अवसर नहीं मिल सका। रविवार को, राजधानी ढाका में घातक झड़पें हुईं, करीब 94 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में 14 पुलिस अधिकारी शामिल हैं, और सैकड़ों अन्य घायल हुए हैं। बढ़ती हिंसा के जवाब में, सेना ने ढाका और कई अन्य प्रमुख शहरों और जिलों में कर्फ्यू लगा दिया। यह कर्फ्यू राजधानी और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में लगाया गया है। इस बीच सरकार ने सोमवार से बुधवार तक तीन दिन की छुट्टी का ऐलान किया है। अदालतों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का भी आदेश दिया।

हिमाचल प्रदेश में बादल फटने से फिर 13 लोगों की मौत.

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हिमाचल प्रदेश में श्रीखंड के पास समेज और बागी सेतु के बीच के क्षेत्र में बुधवार देर रात एक और बादल फटा। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) ने गुरुवार सुबह तक 13 शव बरामद किए हैं। अभी भी एक गायब है. इससे पहले 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान उन छह कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के समर्थन में ‘क्रॉस वोटिंग’ की थी. उनके साथ-साथ सुक्खू सरकार के समर्थक तीन स्वतंत्र दलों ने भी बीजेपी को वोट दिया. क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। 68 सदस्यीय विधानसभा में दोनों पार्टियों को 34-34 वोट मिले और विजेता का फैसला लॉटरी से हुआ।

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले का समेज गांव. 31 जुलाई की मूसलाधार बारिश के बाद फिर वही आफत इस समुदाय पर आई। इससे पहले वहां कम से कम 33 लोग लापता थे. एक के बाद एक घर पानी में बह गये। इस बार बुधवार रात आई आपदा में 13 लोगों की मौत हो गई. एनडीआरएफ आपदा प्रभावित इलाकों में बचाव अभियान चला रही है. एनडीआरएफ कमांडेंट बलजिंदर सिंह ने न्यूज एजेंसी को बताया, ”राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया टीम हिमाचल के विभिन्न दूरदराज के इलाकों में बचाव अभियान के लिए पहले से ही तैयार थी. समाज में बार-बार बादल रहित बारिश होना एक ऐसी आपदा है। बचाव कार्य सक्रियता के साथ जारी है. आज सुबह तक 13 शव बरामद किये जा चुके हैं.

मौसम विभाग के मुताबिक 7 अगस्त को हिमाचल भारी बारिश से तरबतर हो गया. 24 घंटे में मंडी जिले के जोगिंदरनगर में सबसे ज्यादा 110 मिमी बारिश हुई. सिरमौर जिले में भी भारी बारिश हुई. अगले कुछ दिनों के लिए राज्य के बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, चंबा और मंडी जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। संयोग से, हिमाचल प्रदेश के शिमला, मंडी और कुल्लू जिले 31 जुलाई से मूसलाधार बारिश और भूस्खलन से प्रभावित हैं। ढहने से कई घर, स्कूल, अस्पताल नष्ट हो गए। कई लोग लापता हैं, मृतकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 27 जून से 3 अगस्त तक राज्य में अकेले बारिश के कारण हुए हादसों में 79 लोगों की मौत हो गई. 31 जुलाई की रात को शिमला के निरमंड, मलाणा, मंदिर पधर, रामपुर, हरपा बने कुल्लू में कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई। हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पिछले हफ्ते स्थानीय लोगों से मुलाकात की थी. लापता लोगों की तलाश के लिए बचाव अभियान जारी है।

दिल्ली ही नहीं, देश के एक राज्य में भी शनिवार को होने वाले मतदान की ‘नियति’ तय होगी. कांग्रेस नेता सुखविंदर सिंह सुक्खू हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह पाएंगे या नहीं, इसका स्पष्ट संदेश छह विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में मिल जाएगा.

2022 के हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में वे सभी छह सीटें कांग्रेस के खाते में चली गईं। उस चुनाव में जीतने वाले छह पूर्व विधायक फिर से उन सीटों के लिए उम्मीदवार हैं। लेकिन कांग्रेस का नहीं, बीजेपी का टिकट! ये हैं रवि ठाकुर (लाहुल-स्पीति), राजेंद्र राणा (सुजानपुर), सुधीर शर्मा (धर्मशाला), इंद्रदत्त लक्ष्मणपाल (बड़सर), चैतन्य शर्मा (गगरेट) और देवेंद्र भुट्टो (कुटलेहा)।

संयोगवश, 29 फरवरी को हिमाचल विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने पार्टी व्हिप की अवज्ञा करने और मुख्यमंत्री सुखुर सरकार के बजट प्रस्ताव से संबंधित धन विधेयक के पक्ष में मतदान नहीं करने के लिए छह बागी कांग्रेस विधायकों को ‘दल-बदल विरोधी अधिनियम’ के तहत बर्खास्त कर दिया। .

इससे पहले 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान उन छह कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के समर्थन में ‘क्रॉस वोटिंग’ की थी. उनके साथ-साथ सुक्खू सरकार के समर्थक तीन स्वतंत्र दलों ने भी बीजेपी को वोट दिया. क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। 68 सदस्यीय विधानसभा में दोनों पार्टियों को 34-34 वोट मिले और विजेता का फैसला लॉटरी से हुआ।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त की पीठ ने छह निलंबित कांग्रेस विधायकों द्वारा हिमाचल विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने 18 मार्च को कहा था कि 1 जून को होने वाले चुनाव के साथ ही हिमाचल की चार लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव होंगे.

68 सीटों वाली हिमाचल विधानसभा में फिलहाल छह सीटें खाली हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास 34 विधायक हैं. विपक्षी खेमे में बीजेपी के 25 और उनके तीन सहयोगी दल निर्दलीय हैं. यानी अगर बीजेपी उपचुनाव में छह सीटें जीतती है तो दोनों पार्टियों के विधायकों की संख्या 34 हो जाएगी! ऐसे में मुख्यमंत्री सुक्खू का भविष्य अनिश्चित हो जायेगा.

कांग्रेस ने वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध किया.

बिल गुरुवार को लोकसभा में पेश किया गया. विपक्ष ने पहले ही कानून में संशोधन की कोशिश शुरू कर दी थी. इस बार कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और हिबी ईडन ने लोकसभा में संशोधन बिल पेश किए जाने के खिलाफ नोटिस दिया. उन्होंने संसद में बार-बार भारतीय संविधान का हवाला दिया और विभिन्न धर्मों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का विरोध किया।

वक्फ संशोधन बिल गुरुवार को लोकसभा में पेश किया गया. विपक्ष ने पहले ही कानून में संशोधन की कोशिश शुरू कर दी थी. इस बार कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल और हिबी ईडन ने लोकसभा में संशोधन बिल पेश किए जाने के खिलाफ नोटिस दिया. उन्होंने संसद में बार-बार भारतीय संविधान का हवाला दिया और विभिन्न धर्मों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का विरोध किया।

समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद के मुताबिक, ”यह बिल सरकार द्वारा वक्फ संपत्ति हड़पने की कोशिश है.” उद्धवंती शिव सेना सांसद प्रियंका चतुवेर्दी का कहना है, ”क्या यह बिल सभी गठबंधनों से चर्चा के बाद लाया जा रहा है? क्या जेडीयू और टीडीपी ने इस वक्फ बिल को देखा है और इस बिल पर सहमत हैं? यदि नहीं, तो इसमें शामिल सभी पक्षों से परामर्श किया जाना चाहिए। अगर जरूरी हो तो बिल में संशोधन किया जाना चाहिए. आरएसपी सांसद एनके प्रेमचंद्रन फिर कहते हैं, ”हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव सामने हैं. उस वोट को ध्यान में रखते हुए धार्मिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से यह बिल लाया जा रहा है.

यदि प्रस्तावित संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है, तो अधिनियम का नया नाम अब ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम’ होगा। विधेयक में पुराने कानून में 44 संशोधन का प्रस्ताव है। लेकिन संशोधन का मुख्य उद्देश्य एक केंद्रीय पोर्टल के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को विनियमित करना है। इसके अलावा, अन्य प्रस्तावित संशोधनों में मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व के साथ एक केंद्रीय वक्फ परिषद के साथ-साथ प्रत्येक राज्य में वक्फ बोर्ड का गठन भी शामिल है।

पहला वक्फ अधिनियम 1954 में पारित किया गया था। 1995 में, वक्फ अधिनियम में संशोधन किया गया और सभी शक्तियां वक्फ बोर्ड को हस्तांतरित कर दी गईं। तब से, बोर्ड के एकाधिकार अधिकारों को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं। सरकार के मुताबिक इस बार मामले में स्पष्टता लाने के लिए मौजूदा बिल में 44 संशोधन लाने का फैसला किया गया है. वर्तमान में वक्फ अधिनियम की धारा 40 के अनुसार किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने का अधिकार वक्फ बोर्ड के पास है। परिणामस्वरूप, वक्फ बोर्ड पर बार-बार कई गरीब मुसलमानों की संपत्ति और अन्य धर्मों के लोगों की संपत्ति हासिल करने का आरोप लगाया गया है। नये संशोधन में वक्फ बोर्ड का विशेष अधिकार छीनकर कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय लेने की शक्ति जिला मजिस्ट्रेट या समकक्ष रैंक के अधिकारी को दे दी जायेगी.

वक्फ संशोधन के अनुसार, नवगठित केंद्रीय वक्फ परिषद की अध्यक्षता केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री करेंगे। इसके अलावा परिषद के सदस्यों में भी फेरबदल होगा. नए प्रस्ताव में कहा गया है कि परिषद में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों का होना अनिवार्य है। इसमें दो महिला सदस्य भी होंगी. साथ ही राज्यों में बनने वाला वक्फ बोर्ड अगर शिया वक्फ बोर्ड है तो सभी सदस्य शिया होंगे. इसी तरह अगर सुन्नी वक्फ बोर्ड होगा तो वहां सिर्फ सुन्नी ही होंगे.

हालाँकि, मुस्लिम संगठनों का कहना है कि केंद्र वक्फ बोर्ड की सभी विवादित संपत्तियों को हड़पने के लिए विधेयक ला रहा है क्योंकि वे विभिन्न शहरों के बीचों-बीच स्थित हैं। जमात-ए-इस्लामी हिंद के संयुक्त सचिव इनामुर रहमान खान के अनुसार, गेरवा खेमा दिल्ली समेत देश के महत्वपूर्ण स्थानों पर वक्फ संपत्तियों को हड़पने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहा है। इसीलिए संशोधन विधेयक को जल्द पारित कराना चाहते हैं. हालांकि, केंद्र का तर्क है कि मुस्लिम समाज के गरीब और महिलाएं ही इतने लंबे समय से वक्फ कानून में सुधार की मांग कर रहे हैं. यदि प्रस्तावित संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है, तो अधिनियम का नया नाम अब ‘एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास अधिनियम’ होगा। विधेयक में पुराने कानून में 44 संशोधन का प्रस्ताव है। लेकिन संशोधन का मुख्य उद्देश्य एक केंद्रीय पोर्टल के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को विनियमित करना है। इसके अलावा, अन्य प्रस्तावित संशोधनों में मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व के साथ एक केंद्रीय वक्फ परिषद के साथ-साथ प्रत्येक राज्य में वक्फ बोर्ड का गठन भी शामिल है।

चुनाव आयोग की एक टीम विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा के लिए श्रीनगर पहुंची.

चुनाव के लिए कितना तैयार है जम्मू-कश्मीर? असली तस्वीर के निरीक्षण में घाटी में मुख्य चुनाव आयुक्त. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि जम्मू-कश्मीर में इस साल 30 सितंबर तक विधानसभा चुनाव कराए जाएं. घाटी के हालात की जांच के लिए राष्ट्रीय चुनाव आयोग का एक प्रतिनिधिमंडल दो दिवसीय दौरे पर श्रीनगर में है। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय चुनाव आयोग के अधिकारियों ने गुरुवार को श्रीनगर का दौरा किया। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के नेतृत्व में आयोग की टीम दो दिनों तक कश्मीर घाटी में रहेगी. वे ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल क्या सोच रहे हैं. गुरुवार को श्रीनगर पहुंचकर राष्ट्रीय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक बैठक की. नेताओं की राय लेने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और उनकी टीम राज्य के 20 जिलों के पुलिस प्रमुखों से भी चर्चा करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही जम्मू-कश्मीर में चुनाव की समयसीमा तय कर दी थी. पिछले साल 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करना असंवैधानिक नहीं है. उस दिन कोर्ट ने आदेश दिया कि इस साल 30 सितंबर तक चुनाव करा लिये जाएं. आयोग की तैयारी भी शुरू हो गयी है.

कश्मीर में परिस्थितिजन्य समस्याओं के कारण लम्बे समय तक विधानसभा चुनाव नहीं हुए। वहां आखिरी विधानसभा चुनाव 2014 में हुए थे. इसके बाद 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया – एक जम्मू-कश्मीर, दूसरा लद्दाख। बाद में, जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 370 को रद्द करने का फैसला संवैधानिक था, तो शीर्ष अदालत ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए। संयोग से, पिछले महीने जम्मू-कश्मीर का दौरा करने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि जम्मू-कश्मीर में जल्द ही चुनाव होंगे।

इस बार जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के दमन की जिम्मेदारी देश की सबसे पुरानी अर्धसैनिक बल को मिल रही है। ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार असम राइफल्स की दो बटालियनों को जम्मू भेजने का फैसला किया है।

गृह मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि विशेष रूप से जंगल युद्ध में प्रशिक्षित दो अर्धसैनिक बटालियनों को मणिपुर से लाया जाएगा और सांबा सेक्टर के उत्तर में माचेडी में तैनात किया जाएगा। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों ने हाल ही में पहाड़ियों और जंगलों से घिरे इलाके में सुरक्षा बलों पर कई बर्बर हमले किए हैं।

सुरक्षा विशेषज्ञों का एक समूह नरेंद्र मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे कई कारण देखता है। सबसे पहले, जम्मू और उत्तर-पूर्व के क्षेत्र की भौगोलिक समानता के कारण, असम राइफल्स के अधिकारियों और जवानों, जिनमें मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी नागरिक शामिल हैं, के साथ काम करना बीएसएफ या अन्य केंद्रीय बलों की तुलना में आसान होगा। सीआरपीएफ. दूसरे, परिणामस्वरूप, कश्मीर घाटी में सुरक्षा का जिम्मा संभाल रही राष्ट्रीय राइफल्स की किसी भी बटालियन को जम्मू नहीं भेजना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही जम्मू-कश्मीर में चुनाव की समयसीमा तय कर दी थी. पिछले साल 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करना असंवैधानिक नहीं है. उस दिन कोर्ट ने आदेश दिया कि इस साल 30 सितंबर तक चुनाव करा लिये जाएं. आयोग की तैयारी भी शुरू हो गयी है. पिछले महीने जम्मू-कश्मीर का दौरा करने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि जम्मू-कश्मीर में जल्द ही चुनाव होंगे।

कुछ हफ्ते पहले खबरें आई थीं कि जम्मू के पहाड़ी इलाकों में 40 से 50 आतंकी छिपे हुए हैं. घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में प्रशिक्षित किया जाता है। उनके पास आरपीजी, मशीन गन सहित आधुनिक हथियार, नाइट विज़न और उन्नत सैटेलाइट फोन हैं। पिछले कुछ सालों से जम्मू में आतंकी लगातार कहर बरपा रहे हैं. 2021 से अब तक वहां आतंकी हमलों में 50 से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके हैं. संयोग से, 1835 में ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत गठित असम राइफल्स देश का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल है। असम राइफल्स केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत एकमात्र बल है जिसका नियंत्रण और संचालन भारतीय सेना के अधिकारियों द्वारा किया जाता है। आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने के अलावा, बल ने 1962 में चीनी आक्रमण का जवाब देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एस जयशंकर ने बांग्लादेश की स्थिति पर ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड लैमी से बात की.

एस जयशंकर ने ब्रिटिश विदेश सचिव से की बात, विदेश मंत्रालय ने कहा, लेकिन हसीना लंदन में? अनुमान। शेख हसीना बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गईं. सूत्रों के मुताबिक, वह लंदन जाना चाहते हैं। ब्रिटेन से अभी तक हरी झंडी नहीं. भारत के विदेश मंत्री ने ब्रिटिश विदेश सचिव से बात की. भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बांग्लादेश के हालात पर ब्रिटिश विदेश सचिव डेविड लैमी से बात की. विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस का संचालन किया. उन्होंने कहा कि जयशंकर ने कुछ घंटे पहले ब्रिटिश विदेश सचिव से फोन पर बातचीत की थी. उन्होंने बांग्लादेश की स्थिति और पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा की।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना पिछले सोमवार को भारत पहुंचीं। वह अभी भी दिल्ली में हैं. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, भारत सरकार को अभी भी नहीं पता कि उनकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं। उन्होंने कहा, हमें अभी भी हसीना की योजना का पता नहीं है. उन्हें सोचने का समय दिया गया है. यह बात खुद जयशंकर ने पिछले मंगलवार को संसद में कही थी.

सुनने में आ रहा है कि हसीना लंदन जाना चाहती हैं। लेकिन ब्रिटेन से अभी तक हरी झंडी नहीं मिली है. उनकी बहन रेहाना ब्रिटिश नागरिक हैं। रेहाना की बेटी ट्यूलिप वहां सत्तारूढ़ लेबर पार्टी की सांसद हैं। इसलिए इस बात की संभावना ज्यादा है कि हसीना लंदन जाएंगी. अटकलों के बीच जयशंकर ने ब्रिटिश विदेश सचिव से बात की. यह स्पष्ट नहीं है कि उनके बीच हसीना को राजनीतिक शरण देने को लेकर कोई चर्चा हुई या नहीं. रणधीर ने भी इस बारे में कुछ नहीं बताया.

हालांकि, विदेश मंत्रालय ने कहा कि बांग्लादेश की स्थिति पर नजर रखी गई है. रणधीर ने कहा, ”बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर कई हमले हुए हैं. भारत भी उनकी हालत पर नजर बनाए हुए है. बांग्लादेश में कई समूह और संगठन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे आए हैं।”

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आगे कहा, ”किसी भी देश के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है. हमें उम्मीद है कि बांग्लादेश में जल्द ही शांति और व्यवस्था लौटेगी।’ यह उस देश और व्यापक क्षेत्र के लिए भी राहत की बात है।”

बांग्लादेश में गुरुवार रात नई अंतरिम सरकार का गठन होने की उम्मीद है. नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस उस सरकार के प्रमुख होंगे। अगर नई सरकार बनती है तो भारत उस सरकार के साथ अच्छे रिश्ते बनाना चाहेगा. रणधीर ने कहा, ”पिछले सोमवार से बांग्लादेश में क्या हुआ, हम हर पल का विश्लेषण कर रहे हैं. देखते हैं क्या होता है.”काशिमपुर जेल के बाद बांग्लादेश में एक और जेल है. गुरुवार सुबह से ही गाजीपुर जिला जेल में कैदियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. उनसे निपटने के लिए हिमशिम खान जेल अधिकारी। बंदूकें चलाई जाती हैं. इस घटना में जेल में 16 लोग घायल हो गये. इनमें जेल प्रहरी भी शामिल हैं. शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में पिछले कुछ दिनों से अराजकता का माहौल है। जेल में कैदी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. काशिमपुर जेल से मंगलवार को 200 से ज्यादा कैदी दीवार फांदकर फरार हो गए. इनमें कई उग्रवादी भी शामिल हैं. ऐसे में जेल में विरोध प्रदर्शन की खबरें हवा में फैल रही हैं. देश की अन्य जेलों में विरोध प्रदर्शन की खबर सुनकर गुरुवार को गाजीपुर जेल में भी कैदियों ने अपनी रिहाई की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. ग़ाज़ीपुर जिला जेल अस्पताल के डॉक्टर मकसुदा ने बांग्लादेशी मीडिया “प्रोथम अलो” को बताया कि जेल में कैदियों ने विद्रोह की घोषणा कर दी है। उन्हें रोकने के लिए गार्डों ने फायरिंग कर दी. 16 लोग घायल हो गये. किसी को पैर में चोट लगी, किसी को सिर में, किसी को आँखों में। उन्हें अस्पताल में प्राथमिक उपचार दिया गया. घायलों में तीन गार्ड भी शामिल हैं.

उधर, काशिमपुर जेल में मंगलवार को हुए प्रदर्शन और कैदी के भागने के मामले में जेल प्रशासन पर कार्रवाई की गयी. उस जेल के अधीक्षक सुब्रत कुमार बाला को हटा दिया गया है और नये अधीक्षक को लाया गया है. गुरुवार से नए सुपर ने कार्यभार संभाल लिया। मंगलवार को काशिमपुर जेल में हालात काबू करने के लिए सेना तैनात करनी पड़ी. कैदी सीढ़ी लगाकर दीवार फांदकर भाग निकले। कुछ लोग फिर दीवार तोड़कर भाग निकले। गार्डों की गोलीबारी में तीन उग्रवादियों समेत छह लोग मारे गये. सेना पहुंची और स्थिति पर काबू पाया. लेकिन कैदियों को वापस नहीं किया जा सका. ऐसी ही एक घटना गुरुवार को गाजीपुर जेल में हुई. हालाँकि, बताया जाता है कि उस जेल से कोई भी कैदी भाग नहीं सका।

सीबीआई ने रिश्वत लेने के आरोप में ईडी के एक सहायक निदेशक को गिरफ्तार किया.

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CBI ने ED के असिस्टेंट डायरेक्टर को किया गिरफ्तार, आरोप हैं गंभीर, दिल्ली से रंगे हाथ पकड़ा गया। ईडी अधिकारी पर एक कारोबारी से उसके बेटे को केस से बचाने का वादा करके रिश्वत लेने का आरोप है। गुरुवार को सीबीआई ने दिल्ली से गिरफ्तार किया. दोनों केंद्रीय जांच एजेंसियां ​​हैं. सीबीआई और ईडी. बंगाल की राजनीति के लिहाज से दोनों संगठन फिलहाल काफी सक्रिय हैं. दो केंद्रीय जांच एजेंसियों ने राज्य में भ्रष्टाचार के कई आरोपों में नेताओं और मंत्रियों को गिरफ्तार किया है। इस बार एक केंद्रीय जांच एजेंसी ने दूसरी जांच एजेंसी के अधिकारी को गिरफ्तार किया है. ईडी के एक अधिकारी को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है. फिर, वह कोई अधिकारी नहीं है, ईडी के सहायक निदेशक रैंक के एक अधिकारी को गिरफ्तार किया गया है। उसे गुरुवार को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, ईडी के गिरफ्तार असिस्टेंट डायरेक्टर का नाम संदीप सिंह यादव है.

जांच एजेंसी के एक सूत्र से मिली जानकारी के आधार पर एएनआई ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली के एक ज्वैलर के बेटे के खिलाफ मामला दर्ज किया है. उस मामले में कारोबारी अपने बेटे को बचाने की कोशिश कर रहा था. ऐसे में ईडी अधिकारी पर अपने बेटे को केस से बचाने का वादा करके कारोबारी से बड़ी रिश्वत लेने का आरोप लगा था. आरोप है कि उन्होंने कुल 20 लाख रुपये की रिश्वत ली. इस संबंध में एक अन्य केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को शिकायत मिली थी. उस शिकायत के मद्देनजर सीबीआई अधिकारियों ने दिल्ली के लाजपत नगर में जाल बिछाया. सूत्रों का दावा है कि ईडी अधिकारी को लाजपत नगर में एक गुप्त ऑपरेशन में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है। इससे पहले दिल्ली एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में भी रिश्वत लेने के आरोप में ईडी के सहायक निदेशक स्तर के एक अधिकारी समेत कुल सात अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था. उन्हें दिल्ली के एक कारोबारी से 5 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रेलवे नौकरियों के बदले जमीन से संबंधित अवैध धन हस्तांतरण के एक मामले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद और उनके बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर आरोप लगाया है। मंगलवार को विशेष अदालत में लालू और तेजस्वी समेत कुल 11 लोगों पर आरोप तय किये गये हैं. मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त को.

पहली यूपीए सरकार (2004-09) में रेल मंत्री के रूप में लालू के कार्यकाल के दौरान आरोप लगे थे कि बिहार के कई युवाओं को जमीन और पैसे के बदले रेलवे में ग्रुप डी पदों पर भर्ती किया गया था। इस घटना में लालू की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनकी दोनों बेटियां मीसा और हेमा को आरोपी बनाया गया है. बाद में घटना की जांच में लालू के बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री का नाम भी सामने आया.

ईडी का आरोप है कि नौकरी के बदले कई युवाओं से जमीन ली गई. उनके पास लालू के परिवार के सदस्यों और कंपनी ‘एके इंफोसिस्टम्स’ के नाम पर जमीन थी। ईडी का दावा है कि लालू के परिवार के सदस्य उस संगठन से जुड़े हुए हैं. कुछ साल पहले इस घटना की जांच सीबीआई ने शुरू की थी. उन्होंने पटना, दिल्ली समेत देश के कई जगहों पर सर्च ऑपरेशन चलाया. इसके बाद कई राजद नेताओं के घर पर छापेमारी की गयी. जुलाई 2023 में ही सीबीआई ने लालू, राबड़ी और तेजस्वी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी थी.

ईडी सूत्रों के मुताबिक, भर्ती मामले की जांच के सिलसिले में मुर्शिदाबाद के बरन्या से तृणमूल विधायक जिबंकृष्ण साहा को सोमवार को सीजीओ कॉम्प्लेक्स में बुलाया गया था। लेकिन सुबह देखा गया कि वह ईडी दफ्तर नहीं बल्कि विधानसभा चले गये. दोपहर तक वहां से निकल जाना. वह ईडी दफ्तर जाएंगे या नहीं, इस पर जिबंकृष्णा ने कहा कि उनसे जो दस्तावेज मांगे गए थे, उन्होंने ईडी को भेज दिए हैं.

बड़ान्या विधायक सोमवार को विधानसभा सत्र में शामिल हुए। वह पूरे सत्र में थे. इसके बाद बाणमहोत्सव के मौके पर असेंबली गार्डन के उद्घाटन के मौके पर भी जीबनकृष्ण मौजूद थे. समारोह के अंत में वह सभा से चले गये. ईडी के समन को लेकर उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं बुलाया गया. उनसे कुछ दस्तावेज मांगे गये. उन्होंने इसे सीजीओ कॉम्प्लेक्स भेज दिया.

ईडी सूत्रों के मुताबिक, जीवनकृष्ण को कक्षा IX-X और XI-XII की भर्ती में अनियमितताओं के आरोपों की जांच के लिए बुलाया गया था। इस मामले में ईडी पहले ही उनकी पत्नी टैगरी से पूछताछ कर चुकी है. ईडी के एक सूत्र के मुताबिक, ‘खोजखबर’ के आधार पर जिबनकृष्णा से उनकी पत्नी की संपत्ति के बारे में पूछताछ की गई. भर्ती मामले में बड़ान्या विधायक का नाम पहले से ही शामिल था।

पिछले साल 14 अप्रैल को, सीबीआई ने जिबनकृष्णा के कांडी स्थित घर पर व्यापक तलाशी ली थी। तृणमूल विधायक से पूछताछ की जा रही थी. कथित तौर पर, जीवनकृष्ण ने पूछताछ और तलाशी के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे दो मोबाइल फोन घर के पीछे तालाब में फेंक दिए। पानी से जीवन का फोन ढूंढने के लिए जांचकर्ताओं को तेजी लानी होगी। उसके बाद, कोलकाता से सीबीआई की एक और टीम केंद्रीय बलों के साथ 17 अप्रैल की आधी रात को जिबनकृष्णा के कांडी घर पहुंची। उसे गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव के दौरान 14 मई को प्रेसीडेंसी जेल में बंद जिबनकृष्णा की जमानत याचिका मंजूर कर ली। बरन्या के विधायक को करीब 13 महीने बाद प्रेसीडेंसी जेल से जमानत मिल गई.

आखिर वक्फ बोर्ड संशोधन पर क्यों खामोश है विपक्ष?

वर्तमान में पूरा विपक्ष वक्फ बोर्ड संशोधन पर खामोश नजर आ रहा है! वक्फ बोर्ड अधिनियम में 40 से अधिक संशोधन किए जा सकते हैं। इन संशोधनों पर कांग्रेस फिलहाल चुप है, लेकिन उसके सहयोगी दल खुलकर अपना विरोध जता रहे हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) वक्फ बोर्ड के कामों का समर्थन करती है। उसका कहना है कि वक्फ बोर्ड कई शिक्षण संस्थान और अनाथालय चलता है। राष्ट्रीय जनता दल भी इस पर अपनी राय रख चुका है। उसका कहना है कि संसद भवन से कोई ऐसा विचार कोई ऐसा संवाद न हो जिससे समाज में बंटवारा हो। दरअसल, 8 दिसंबर 2023 को वक्फ बोर्ड अधिनियम 1995 को निरस्त करने का निजी विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया था। राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने इस बिल का विरोध करते हुए कहा कि संसद का यह दायित्व है कि संसद भवन से कोई ऐसा विचार कोई ऐसा संवाद न हो जिससे समाज में बंटवारा हो। अब आधिकारिक तौर पर सरकार एक अलग विधेयक संसद में पेश कर सकती है।यह विधेयक उत्तर प्रदेश से भाजपा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पेश किया था। राज्यसभा में यह विधेयक पेश करते समय विवाद हुआ था और सदन में विधेयक पेश करने के लिए भी मतदान कराया गया था। तब विधेयक को पेश करने के समर्थन में 53 जबकि विरोध में 32 सदस्यों ने मत दिया।

यह विधेयक पेश करने की अनुमति मांगते हुए भाजपा सांसद ने कहा था कि ‘वक्फ बोर्ड अधिनियम 1995’ समाज में द्वेष और नफरत पैदा करता है। यह अपनी अकूत ताकत का दुरुपयोग करता है। समाज की एकता और सद्भाव को विभाजित करता है। अपनी अकूत शक्तियों के आधार पर सरकारी, निजी संपत्तियों तथा मठ, मंदिरों पर मनमाने तरीके से कब्जा करता है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि यह कानून पीड़ित पक्षों को उनके अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अदालत जाने से रोकता है जो न्यायपालिका और अदालत की सर्वोच्चता को खंडित करता है। केंद्र सरकार बोर्ड के ऐसे अधिकारों एवं प्रावधानों को नियंत्रित करना चाहती है।भाजपा सांसद ने सदन से “देश हित में” वक्फ बोर्ड अधिनियम 1995 को निरस्त करने के वाले विधेयक को पुरस्थापित करने की इजाजत मांगी थी।

राज्यसभा के कई सांसद इस निजी विधेयक के खिलाफ थे। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने मत विभाजन की मांग की थी। माकपा के इलामारम करीम ने इस विधेयक का विरोध किया था। वक्फ बोर्ड का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था कि वक्फ बोर्ड कई शिक्षण संस्थान और अनाथालय चलता है। उन्होंने कहा कि यह एक काफी संवेदनशील विषय है और यह समाज के विभिन्न संप्रदायों के बीच नफरत और बंटवारा पैदा करेगा, इसलिए इस विधेयक को सदन में पेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने इस बिल का विरोध करते हुए कहा कि संसद का यह दायित्व है कि संसद भवन से कोई ऐसा विचार कोई ऐसा संवाद न हो जिससे समाज में बंटवारा हो। अब आधिकारिक तौर पर सरकार एक अलग विधेयक संसद में पेश कर सकती है।

बीते शुक्रवार को मंत्रिमंडल ने वक्फ अधिनियम में 40 से अधिक संशोधनों पर चर्चा की है। सूत्रों का कहना है कि इसमें वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र की जांच करने वाले कई संशोधन हैं। विधेयक उत्तर प्रदेश से भाजपा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पेश किया था। राज्यसभा में यह विधेयक पेश करते समय विवाद हुआ था और सदन में विधेयक पेश करने के लिए भी मतदान कराया गया था। तब विधेयक को पेश करने के समर्थन में 53 जबकि विरोध में 32 सदस्यों ने मत दिया।कई कानूनविद् भी वक्फ को दिए गए अधिकारों को मनमाना मानते हैं। बता दें कि राष्ट्रीय जनता दल भी इस पर अपनी राय रख चुका है। उसका कहना है कि संसद भवन से कोई ऐसा विचार कोई ऐसा संवाद न हो जिससे समाज में बंटवारा हो। दरअसल, 8 दिसंबर 2023 को वक्फ बोर्ड अधिनियम 1995 को निरस्त करने का निजी विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया था। यही कारण है कि अब केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड के इस प्रकार के ‘असीमित’ अधिकारों पर लगाम लगाना चाहती है। माकपा के इलामारम करीम ने इस विधेयक का विरोध किया था। वक्फ बोर्ड का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था कि वक्फ बोर्ड कई शिक्षण संस्थान और अनाथालय चलता है।माना जा रहा है कि केंद्र सरकार बोर्ड के ऐसे अधिकारों एवं प्रावधानों को नियंत्रित करना चाहती है।