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आखिर मणिपुर में सीआरपीएफ क्यों नहीं चाहती फोर्स?

वर्तमान में मणिपुर में सीआरपीएफ की नियुक्ति फोर्स नहीं चाहती है! गृह मंत्रालय ने मणिपुर से असम राइफल्स की दो बटालियन कम कर उन्हें जम्मू-कश्मीर भेजने और उनकी जगह पर सीआरपीएफ की बटालियन तैनात करने का निर्देश दिया है। हालांकि असम राइफल्स इसके पक्ष में नहीं था। सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय के लिखित आदेश आने के काफी पहले से इसे लेकर बातचीत चल रही थी और असम राइफल्स की तरफ से यह बात रखी गई थी कि अभी मणिपुर में असम राइफल्स की जरूरत है और मौजूदा हालात में यहां से बटालियन कम करना सही नहीं होगा। मणिपुर में स्थिति कंट्रोल में करने के लिए असम से भी असम राइफल्स के सैनिकों को मणिपुर में तैनात किया गया है। सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि मणिपुर के चूराचांदपुर के कन्गवाई से और केपीआई के कामचुक से असम राइफल्स की दो बटालियन हटाकर जम्मू-कश्मीर भेजी जाएं। कई सीनियर अधिकारियों से बात करने पर उन्होंने बताया कि अगर मणिपुर से असम राइफल्स के सैनिकों को हटाकर सीधे जम्मू-कश्मीर भेज दिया जाए तो उनका मनोबल कम होगा और उन्हें लगेगा कि उन्हें सजा के तौर पर हटाया गया है। इसलिए इस पर चर्चा चल रही है कि मणिपुर से इन दो बटालियन को अरुणाचल प्रदेश भेजा जाए और वहां से दो बटालियन को जम्मू-कश्मीर भेजा जाए।

जिन्होंने हिंसा की साजिश की और उसे पोषित किया, पता होना चाहिए कि मणिपुर को तोड़ने की कोई भी कोशिश राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे रीजन में सतत और हिंसक संघर्ष को आमंत्रित करना है।एक अधिकारी ने कहा कि इस वक्त फोर्स का मनोबल बनाए रखना भी बेहद जरूरी है। करीब दो साल पहले भी असम राइफल्स की दो बटालियन को जम्मू-कश्मीर भेजा गया था और वो अभी वहीं तैनात हैं।

कुकी समुदाय के संगठनों ने असम राइफल्स की बटालियन हटाकर सीआरपीएफ लगाने का विरोध किया है। कुकी समुदाय से आने वाले मणिपुर के विधायकों ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने को कहा है कि जातीय हिंसा से ग्रस्त मणिपुर में असम राइफल्स संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करती रहे और उनकी जगह सीआरपीएफ ना लगाई जाए। दूसरी तरफ मैतई संगठन COCOMI ने असम राइफल्स पर कुकी लोगों का साथ देने के आरोप लगाए हैं। मैतई संगठनों ने असम राइफल्स की जगह सीआरपीएफ और बीएसएफ को लाने की मांग की है।

इनर मणिपुर से कांग्रेस सांसद अंगोमचा अकोइजम ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं मणिपुर का अपमान या नुकसान पहुंचाने के किसी भी प्रयास का मूकदर्शक बनने राजनीति में नहीं आया हूं। उन्होंने लिखा कि उन विभाजनकारी और सांप्रदायिक ताकतों और उनके आकाओं को जिन्होंने हिंसा की साजिश की और उसे पोषित किया, पता होना चाहिए कि मणिपुर को तोड़ने की कोई भी कोशिश राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे रीजन में सतत और हिंसक संघर्ष को आमंत्रित करना है।

मणिपुर के राज्यसभा सांसद और बीजेपी सदस्य लैशेम्बा सनाजाउबा ने एक सोशल मीडिया पोस्ट को अपने एक्स पोस्ट पर शेयर किया है। जिसमें असम राइफल्स की बटालियन जम्मू-कश्मीर भेजे जाने के बारे में लिखा है कि यह मणिपुर की स्थिति को संभालने के लिए सकारात्मक कदम है। केंद्र सरकार ने अब मणिपुर के लोगों की मांगें पूरी करना शुरू किया है। बता दें कि सीनियर अधिकारियों से बात करने पर उन्होंने बताया कि अगर मणिपुर से असम राइफल्स के सैनिकों को हटाकर सीधे जम्मू-कश्मीर भेज दिया जाए तो उनका मनोबल कम होगा और उन्हें लगेगा कि उन्हें सजा के तौर पर हटाया गया है। इसलिए इस पर चर्चा चल रही है कि मणिपुर से इन दो बटालियन को अरुणाचल प्रदेश भेजा जाए और वहां से दो बटालियन को जम्मू-कश्मीर भेजा जाए।

समय आ गया है कि हम केंद्र और राज्य सरकार पर भरोसा करें ताकि वे मणिपुर में स्थायी शांति के लिए काम करें। इस पोस्ट में लिखा है कि हम मैतई अपनी पहली जीत देख रहे हैं। यही नहीं कुकी समुदाय के संगठनों ने असम राइफल्स की बटालियन हटाकर सीआरपीएफ लगाने का विरोध किया है। कुकी समुदाय से आने वाले मणिपुर के विधायकों ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने को कहा है कि जातीय हिंसा से ग्रस्त मणिपुर में असम राइफल्स संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करती रहे और उनकी जगह सीआरपीएफ ना लगाई जाए। अगर हमें अभी अहसास नहीं हुआ तो अगले 10-20 सालों में मैतीय कहीं नहीं रहेगा।

क्या अब ऑर्गन ट्रांसपोर्टेशन को आ गए हैं नए नियम?

अब ऑर्गन ट्रांसपोर्टेशन को नए नियम आ गए हैं! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मानव अंगों ह्यूमन ऑर्गन के ट्रांसपोर्टेशन के लिए पहली बार गाइडलाइंस एसओपी जारी की है। ट्रांसपोर्ट के विभिन्न माध्यमों से मानव अंगों को बिना किसी परेशानी से आसानी से संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके, इसको ध्यान में रखते हुए यह एसओपी दी गई है, जिसका पालन करना जरूरी होगा। ऑर्गन को ले जाने वाली एयरलाइनों को प्राथमिकता टेक-ऑफ और लैंडिंग के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल से अनुरोध करने और आगे की पंक्ति की सीटों की व्यवस्था करने के दिशा- निर्देश शामिल हैं। देश में अंगदान की बड़ी ज़रूरत को पूरा करने के लिए मृत लोगों और ‘ब्रेन स्टेम डेड’ लोगों से अंगदान को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। स्पेन, अमेरिका और चीन जैसे कई देश अंगदान में काफी आगे हैं, लेकिन भारत ने भी हाल के दिनों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। सरकार ने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाने को कहा है कि प्रत्यारोपित होने से पहले कोई अंग बर्बाद न हो।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने कहा कि ऑर्गन ट्रांसपोर्ट प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करके सरकार का लक्ष्य कीमती अंगों के उपयोग को अधिकतम करना और जीवन रक्षक प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे रोगियों को आशा प्रदान करना है। यह एसओपी देश भर में अंग प्रत्यारोपण संस्थानों के लिए एक रोडमैप हैं, जो बेस्ट प्रैक्टिस और क्वॉलिटी स्टैंडर्ड का पालन सुनिश्चित करते हैं। जीवित अंग को अस्पतालों के बीच तब ले जाने की जरूरत होती है, जब अंग दाता और अंग प्राप्तकर्ता दोनों एक ही शहर के भीतर या अलग-अलग शहरों में अलग-अलग अस्पतालों में होते हैं। अंगदान के मूल्यों को आत्मसात किया जा सके। अंग प्रत्यारोपण की मांग को कम करने के लिए ये अभियान गतिविधियां स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और अंग खराब होने से बचाने के लिए कदम उठाने को भी बढ़ावा देती हैं।जब हमें कोई किसी ब्रेन-डेड व्यक्ति मिलता हैं तो समय कम होता है और हमें 12 घंटों में अंग निकालने होते हैं और प्रत्यारोपण भी कम समय में ही करना होता है। इसलिए हमें अपनी प्रणाली में सुधार करना होगा।

दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि फ्लाइट कैप्टन उड़ान के दौरान यह घोषणा कर सकता है कि मानव अंगों को ले जाया जा रहा है। एसओपी में कहा गया है कि हवाई अड्डे और एयरलाइन कर्मचारियों द्वारा आगमन पर विमान से एम्बुलेंस तक अंग बॉक्स ले जाने के लिए ट्रॉलियों की व्यवस्था की जा सकती है। हर राज्य व शहर में अंग परिवहन के लिए ‘ग्रीन कॉरिडोर’ के निर्माण से संबंधित मुद्दों को संभालने के लिए पुलिस विभाग से एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है। मेट्रो के लिए भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं कि मेट्रो अधिकारी क्लीनिकल टीम को मेट्रो में ले जा सकते हैं और ऑर्गन बॉक्स के लिए कम से कम आवश्यक क्षेत्र की घेराबंदी कर सकते हैं।

भारतीय अंगदान दिवस 2010 से हर साल मनाया जाता है ताकि ब्रेन स्टेम डेथ और अंगदान के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके, अंगदान से जुड़े मिथकों एवं गलत धारणाओं को दूर किया जा सके और देश के नागरिकों को मृत्यु के बाद अंग एवं ऊतक दान करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया जा सके, साथ ही उनके जीवन में अंगदान के मूल्यों को आत्मसात किया जा सके। अंग प्रत्यारोपण की मांग को कम करने के लिए ये अभियान गतिविधियां स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और अंग खराब होने से बचाने के लिए कदम उठाने को भी बढ़ावा देती हैं।

इस वर्ष “अंगदान जन जागरूकता अभियान” के तहत देश भर में शहर से लेकर गांव स्तर तक विभिन्न जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया है, जिसमें सभी केंद्रीय सरकारी मंत्रालयों/विभागों, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकारों/राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं राज्य अंग और ऊतक नेटवर्किंग संगठनों/अस्पतालों/संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों, गैर सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों को शामिल किया गया है। अमेरिका और चीन जैसे कई देश अंगदान में काफी आगे हैं, लेकिन भारत ने भी हाल के दिनों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। सरकार ने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाने को कहा है कि प्रत्यारोपित होने से पहले कोई अंग बर्बाद न हो।नागरिकों को अंग और ऊतक दान के लिए प्रतिज्ञा लेने में सुविधा प्रदान करने के लिए, एक वेब पोर्टल शुरू किया गया है। इसके माध्यम से अब तक 1.7 लाख से अधिक नागरिक आगे आए हैं।

क्या अब आयुष्मान भारत योजना में होने वाले हैं परिवर्तन?

आने वाले समय में आयुष्मान भारत योजना में परिवर्तन होने वाले हैं! आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना को लागू हुए अब पांच वर्ष से ज्यादा का समय हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस योजना में ज्यादा से ज्यादा अस्पतालों को जोड़ने, पैकेज सिस्टम में सुधार करने, अस्पतालों के बिलों के जल्द से जल्द भुगतान से लेकर बड़े सुधारों की दिशा में एक विशेष कमिटी बनाई थी, जो जल्द ही स्वास्थ्य मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है। नीति आयोग के सदस्य स्वास्थ्य डॉ. वी.के. पॉल की अध्यक्षता में यह कमिटी बनाई गई है, जिसकी सिफारिशों के बाद योजना को लेकर नये प्रयोग भी किए जा सकते हैं। सरकार ने बीमा कंपनियों से भी अंग प्रत्यारोपण को कवर करने का आह्वान किया है। आयुष्मान योजना के तहत केंद्र सरकार की ओर से पांच लाख तक के इलाज की सुविधा तो लोगों को मिल ही रही है लेकिन कुछ राज्य इसके अलावा भी लोगों को सुविधा दे रहे हैं।अब यह इंश्योरेंस कवरेज भी बढ़ाई जा सकती है। पांच वर्षों के बाद अब इस योजना के सभी पहलुओं को देखा जा रहा है। बड़ी संख्या में लोग इस योजना का फायदा उठा रहे हैं, वहीं अब सरकार 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को आयुष्मान भारत योजना के दायरे में लाने की भी तैयारी कर रही है।केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने बताया कि प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना लागू हुए पांच साल से ज्यादा का समय हो गया है और अब इस योजना का फायदा और ज्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे, इस मकसद को पूरा करने के लिए डॉ. वी. के. पॉल की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई गई है। यह कमिटी देख रही है कि ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों को इस योजना के साथ कैसे जोड़ा जाए, उनकी पेमेंट के तरीकों को और बेहतर कैसे बनाया जाए।

मंत्रालय को इस कमिटी की जब रिपोर्ट मिलेगी, उस पर विचार करने के बाद फैसला लिया जाएगा। अस्पतालों के पेमेंट सिस्टम में कैसे नये बदलाव किए जा सकते हैं, इस योजना का दायरा कैसे बढ़ाया जाए, ये सब मुद्दे हैं, जिन पर कमिटी काम कर रही है। इसके साथ ही सरकार 70 या इससे उम्र के सभी लोगों को आयुष्मान स्कीम के दायरे में लाने की तैयारी भी कर रही है।

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना के तहत बीमा योजना का दायरा बढ़ाया जा सकता है। इंश्योरेंस कवरेज को बढ़ाने की दिशा में भी विचार किया जा रहा है। अभी आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है और अब यह इंश्योरेंस कवरेज भी बढ़ाई जा सकती है। पांच वर्षों के बाद अब इस योजना के सभी पहलुओं को देखा जा रहा है। बड़ी संख्या में लोग इस योजना का फायदा उठा रहे हैं, वहीं अब सरकार 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को आयुष्मान भारत योजना के दायरे में लाने की भी तैयारी कर रही है।

70 साल से ऊपर का हर बुजुर्ग, चाहे वो गरीब हो, मध्यम वर्ग का हो या फिर उच्च मध्यम वर्ग से ही क्यों न हो, उन्हें भी इस योजना का लाभ मिलेगा। सरकार ने किडनी प्रत्यारोपण को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत शामिल किया गया है। सरकार ने बीमा कंपनियों से भी अंग प्रत्यारोपण को कवर करने का आह्वान किया है। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना लागू हुए पांच साल से ज्यादा का समय हो गया है और अब इस योजना का फायदा और ज्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे, इस मकसद को पूरा करने के लिए डॉ. वी. के. पॉल की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई गई है।आयुष्मान योजना के तहत केंद्र सरकार की ओर से पांच लाख तक के इलाज की सुविधा तो लोगों को मिल ही रही है लेकिन कुछ राज्य इसके अलावा भी लोगों को सुविधा दे रहे हैं। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना के तहत बीमा योजना का दायरा बढ़ाया जा सकता है। इंश्योरेंस कवरेज को बढ़ाने की दिशा में भी विचार किया जा रहा है।इस योजना का दायरा कैसे बढ़ाया जाए, ये सब मुद्दे हैं, जिन पर कमिटी काम कर रही है। इसके साथ ही सरकार 70 या इससे उम्र के सभी लोगों को आयुष्मान स्कीम के दायरे में लाने की तैयारी भी कर रही है।यह कमिटी देख रही है कि ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों को इस योजना के साथ कैसे जोड़ा जाए, उनकी पेमेंट के तरीकों को और बेहतर कैसे बनाया जाए।इस कार्ड से अब केंद्र सरकार के साथ- साथ राज्यों की स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी आम लोगों को मिल रहा है।

आखिर क्या है मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर प्रोजेक्ट?

आज हम आपको मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी देने वाले हैं! ठाणे क्रीक के चमकते पानी के नीचे, एक अद्भुत इंजीनियरिंग का कमाल जल्द ही बनने वाला है। भारत की पहली समुद्री सुरंग पर काम अब एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। यह मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर का 7 किलोमीटर का हिस्सा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के लिए सबसे बड़ी सुरंग खोदने वाली मशीन (टीबीएम) को साल के अंत तक शुरू कर दिया जाएगा। पूरी भूमिगत सुरंग की लंबाई 21 किमी है। इस 7 किमी समुद्री सुरंग वाले हिस्से पर काम करने में अनोखी चुनौतियां हैं। इनमें जटिल भौगोलिक परतों और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पानी के नीचे खुदाई करना शामिल है। अभी तक, कोलकाता मेट्रो के पास हुगली नदी के नीचे से गुजरने वाली देश की पहली पानी के नीचे वाली ट्रेन सुरंग है, इसके बाद मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन की लाइन 3 है, जो बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स और धारावी स्टेशनों को जोड़ते हुए मिठी नदी के नीचे जाती है। हालांकि, आने वाली समुद्री सुरंग नदियों के नीचे बनाई गई सुरंगों से अलग होगी। 21 किलोमीटर लंबी यह सुरंग दो ऊपर और नीचे की पटरियों के लिए एक ही ट्यूब होगी। इसे बनाने के लिए, 13.6 मीटर व्यास वाले कटर हेड वाली टीबीएम का इस्तेमाल किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि आमतौर पर, एमआरटीएस [मेट्रो सिस्टम] में इस्तेमाल होने वाली शहरी सुरंगों के लिए 6-8 मीटर व्यास के कटर हेड का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि ये सुरंगें केवल एक ट्रैक को ही एडजस्ट करती हैं।

1.08 लाख करोड़ रुपये की बुलेट ट्रेन परियोजना पर काम की गति गुजरात में महाराष्ट्र की तुलना में बहुत तेज है। कुल 502 किलोमीटर की दूरी में से, गुजरात के माध्यम से 352 किलोमीटर का मार्ग अगस्त 2026 में सूरत और बिलिमोरा के बीच 50 किलोमीटर के सेक्शन के खुलने के बाद 2027 में चालू होने की उम्मीद है। पूरे कॉरिडोर को मुंबई तक 2028 के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है, जो इसकी मूल समय सीमा से छह साल आगे है।

1.08 लाख करोड़ रुपये की बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर काम की गति गुजरात में महाराष्ट्र की तुलना में बहुत तेज है। कुल 502 किलोमीटर की दूरी में से, गुजरात के माध्यम से 352 किलोमीटर का मार्ग अगस्त 2026 में सूरत और बिलिमोरा के बीच 50 किलोमीटर के सेक्शन के खुलने के बाद 2027 में चालू होने की उम्मीद है। पूरे कॉरिडोर को मुंबई तक 2028 के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है, जो इसकी मूल समय सीमा से छह साल आगे है।

महाराष्ट्र के मुंबई और ठाणे जिलों में बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के 21 किलोमीटर के भूमिगत हिस्से का निर्माण कार्य चल रहा है। इसमें बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में 1 किलोमीटर लंबे और 32 मीटर गहरे भूमिगत स्टेशन के लिए खुदाई, सुरंग निर्माण के लिए शाफ्ट और पोर्टल का निर्माण शामिल है। ठाणे क्रीक में समुद्री सुरंग जमीनी स्तर से लगभग 25 से 57 मीटर नीचे बनाई जाएगी। 16 किलोमीटर की भूमिगत दूरी, जिसमें 7 किलोमीटर लंबा समुद्री खंड भी शामिल है, की खुदाई के लिए तीन मेगा टीबीएम लगाए जाएंगे। शेष 5 किलोमीटर का निर्माण न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथडोलॉजी (एनएटीएम) का उपयोग करके किया जाएगा। इसमें सुरंग निर्माण की प्रगति के साथ सामने आने वाली चट्टान के प्रकार के आधार पर विभिन्न दीवार सुदृढ़ीकरण तकनीकों का अनुकूलन करने के लिए निगरानी शामिल है।

सिविल स्ट्रक्चर और सर्विस यूटिलिटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, निर्माण स्थलों पर और उनके आसपास झुकावमापी, कंपन मॉनिटर, जमीन की बस्ती मार्कर, झुकाव मीटर सहित अत्यधिक संवेदनशील भू-तकनीकी निगरानी उपकरण तैनात किए जा रहे हैं। ये उपकरण यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि खुदाई और सुरंग निर्माण जैसे चल रहे भूमिगत कार्यों को न ही कोई जोखिम हो और न ही साइट के आसपास की संरचनाओं को। ये उपकरण गतिविधियों को रिकॉर्ड करने और मॉनिटर करने के लिए अपने संबंधित मॉड्यूल से जुड़े होते हैं। यह संभावित जोखिमों की समय पर पहचान करने में मदद करते हैं। साथ ही उन्हें कम करने के लिए समय पर जरूरी कदम उठाने में सक्षम बनाते हैं।

पहली समुद्री सुरंग के साथ कई चुनौतियां भी हैं। इनमें अलाइमेंट लेकर इकोलोजी और पर्यावरण पर कम से कम प्रभाव सुनिश्चित करने तक शामिल है। 11 से 24 दिसंबर, 2018 के बीच समुद्र तल के नीचे एक भूकंपीय प्रतिरोध टेस्ट किया गया। पानी के नीचे उच्च ऊर्जा ध्वनि तरंगें दागी गईं। इससे चट्टान के घनत्व का पता लगाने में मदद मिली, जिससे अलाइमेंट को अंतिम रूप देने में मदद मिली। ठाणे क्रीक में संरक्षित फ्लेमिंगो अभयारण्य और मैंग्रोव वन बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को अंडरग्राउंड ले जाने के प्रमुख कारण हैं। यह मुंबई जैसे स्थान की कमी वाले शहर में भूमि अधिग्रहण की चुनौती से बचने में भी मदद करता है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय मैंग्रोव सर्वेक्षण (एमएसआई) और राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (एनआईओ) ने इस क्षेत्र में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन किया है। भूमिगत जाने से यह सुनिश्चित होगा कि ठाणे क्रीक में कोई भी मैंग्रोव्ज नहीं काटा जाएगा। एनएचएसआरसीएल के अनुसार, खुदाई के लिए, पर्याप्त ध्वनि और वायु प्रदूषण रोकथाम उपायों के साथ कई नियंत्रित विस्फोट किए गए हैं, ताकि आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरण और आबादी को कम से कम परेशानी हो।

7 किलोमीटर लंबी समुद्री सुरंग महत्वाकांक्षी मुंबई और अहमदाबाद के बीच हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का हिस्सा है। इसकी लंबाई 508 किलोमीटर है। 1.1 लाख करोड़ रुपये की इस परियोजना को एनएचएसआरसीएल की तरफ से जापान से 50 साल के लिए 88,087 करोड़ रुपये के कर्ज लेकर बनाया जा रहा है। इस कर्ज पर ब्याज की दर 0.1% है। कर्ज मिलने के 15 साल बाद कर्ज की किस्तें शुरू होंगी। जापान की बुलेट ट्रेनों पर आधारित ये अत्याधुनिक ट्रेनें 320 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार से दौड़ेंगी। ये भारत की मौजूदा सबसे तेज ट्रेनों – गतिमान एक्सप्रेस और वंदे भारत एक्सप्रेस की 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दोगुने से भी ज्यादा है। हालांकि, दूसरे देशों में और भी तेज रफ्तार की ट्रेनें हैं। जैसे चीन की शंघाई मैग्लेव (460 किमी/घंटा) और सीआर हार्मनी (350 किमी/घंटा); जर्मनी की डीबी इंटरसिटी एक्सप्रेस-3 (350 किमी/घंटा)। 508 किलोमीटर के रास्ते में से 468 किलोमीटर ऊंचाई पर होगा, 27 किलोमीटर सुरंगों में (महाराष्ट्र में 21 किलोमीटर और गुजरात में 6 किलोमीटर) और बाकी 13 किलोमीटर जमीन पर होगा। महाराष्ट्र वाले हिस्से में समुद्री सुरंग होगी।

ढाका से एयर इंडिया का विशेष विमान 205 लोगों को दिल्ली वापस लेकर आया.

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अंततः राहत मिली! और 205 भारतीय बंगाल से घर लौटे! वे बुधवार सुबह एयर इंडिया की विशेष उड़ान से ढाका से दिल्ली लौटे। यात्रियों की सूची में छह बच्चे भी शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, एयर इंडिया बुधवार से दिल्ली-ढाका रूट पर उड़ान सेवाएं फिर से शुरू कर रही है। लेकिन अभी स्थिति सामान्य नहीं है. वर्तमान में उस मार्ग पर प्रति दिन केवल दो उड़ानें संचालित हो रही हैं। इसके अलावा, विस्तारा और इंडिगो भी बांग्लादेश में सामान्य सेवाएं फिर से शुरू करने की राह पर हैं। विस्तारा की एक उड़ान हर दिन मुंबई से ढाका के लिए रवाना होगी। इसके अलावा दिल्ली और ढाका के बीच तीन साप्ताहिक उड़ानें होंगी. आम तौर पर, इंडिगो एयरलाइंस की दिल्ली, मुंबई और चेन्नई से ढाका के लिए तीन दैनिक उड़ानें हैं। कोलकाता से ढाका के लिए दो दैनिक उड़ानें हैं। हालांकि, स्थिति सामान्य होने तक दोनों देशों के बीच रोजाना कितनी उड़ानें संचालित की जाएंगी, यह कहना संभव नहीं है।

संयोग से, सोमवार को बांग्लादेश में कानून व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर सख्त अलर्ट जारी किया था। बांग्लादेश में अशांत हालात के चलते हवाई यातायात भी रोक दिया गया है. भारत से बांग्लादेश जाने वाली ट्रेनें और बसें रोक दी गईं. परिणामस्वरूप, कई नागरिक दोनों देशों में फंस गए। हालांकि, पेट्रापोल, बेनापोल, हेली में भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा के भूमि बंदरगाह द्वार मंगलवार दोपहर से खोल दिए गए हैं। बुधवार को हवाई सेवा भी शुरू हो गई.

शेख हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के आवास ‘गण भवन’ को लूट लिया गया. पिछले सोमवार को सैकड़ों लोग वहां घुस आए. लूट की सूची में पालतू जानवरों से लेकर कपड़ों या मेज-कुर्सियों तक कुछ भी नहीं छूटा। हालांकि, कुछ लोग लूटा गया सामान वापस कर रहे हैं। बांग्लादेशी मीडिया प्रोथोम अलो ने बताया कि प्रिंटर, कंप्यूटर सीपीयू, कपड़े और कुछ किताबें पहले ही वापस कर दी गई हैं।

हसीना ने सोमवार को गणभवन छोड़ दिया। मंगलवार तक वहां कोई सुरक्षा नहीं थी. जब कोई वहां प्रवेश कर रहा था. न केवल गनोभवन, बल्कि बांग्लादेश के संसद भवन को भी खुलेआम लूटा जा रहा था। बुधवार से गण भवन और संसद भवन की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। सेना के जवान सरकारी इमारतों की सुरक्षा कर रहे हैं. जहां दीवारें गिराई गईं, वहां अस्थायी बंदी लगा दी गई है। कुछ जगहों पर कंटीले तार लगाए गए हैं तो कुछ जगहों पर दरारें टिन या तख्तों से ढक दी गई हैं.

प्रोथोम अलो की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ बांग्लादेशी छात्र बुधवार को संसद भवन और गनोभवन के दरवाजे के सामने खड़े थे और लूटा हुआ सामान वापस ले रहे थे। उनके हाथों में तख्तियों पर लिखा था, ”यहां गनोभबन और संसद भवन का सामान स्वीकार किया जा रहा है.” खबर है कि कई लोगों ने वहां चीजें जमा कर दी हैं.

लूटे गए सामानों में अब तक एक कंप्यूटर सीपीयू, एक प्रिंटर, वॉकी-टॉकी, कुछ किताबें, कुछ कपड़े बरामद किए गए हैं। उन्हें सावधानी से रखा गया है. लूट क्यों हुई? आइटम क्यों लौटाए जा रहे हैं? एकत्रित छात्रों के अनुसार, कई लोग उत्साह के कारण गनोभवन में प्रवेश कर गए। उसने बाकी लोगों द्वारा देखी गई चीजें भी उठा लीं. लेकिन अब जब मामला थोड़ा शांत हुआ है तो उन्हें मामला समझ में आ गया है. तो फिर लौट रहा हूँ.

कई लोग प्रधानमंत्री आवास देखने भी आ रहे हैं. हालांकि, बुधवार से हर किसी को वहां पहुंच नहीं मिल रही है. कई लोगों को बांग्लादेशी सेना ने गनोभवन के द्वार से वापस भेज दिया। बांग्लादेश में सोमवार को शेख हसीना की सरकार गिर गई. उसके बाद, बांग्लादेश सरकार के दो ‘विशेष’ कैदियों, अब्दुल्लाहिल अमान आज़मी और मीर अहमद बिन कासेम को हसीना जमाना के ‘मिरर हाउस’ से रिहा कर दिया गया। आजमी बांग्लादेश सेना के पूर्व ब्रिगेडियर हैं। उनके पिता दिवंगत गुलाम आजम जमात-ए-इस्लामी के ‘अमीर’ (प्रमुख) थे। और कासेम मारे गए जमात नेता मीर कासेम अली का सबसे छोटा बेटा है। पेशे से बैरिस्टर. आठ साल पहले, दोनों को बांग्लादेश की कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने उनके घरों से पकड़ लिया था। उसके बाद से उनका पता नहीं चल पाया है. ‘अयनाघर’ से रिहाई के बाद बांग्लादेशी सेना प्रमुखों के एक वर्ग और बांग्लादेशी नागरिकों के एक वर्ग ने मांग की कि ‘अयनाघर’ के बाकी कैदियों को भी रिहा किया जाना चाहिए।

कांग्रेस सांसद का दावा, नरेंद्र मोदी सरकार एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से प्रस्तावना हटा रही है.

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा अनुमोदित पाठ्यपुस्तकों को लेकर बुधवार को लोकसभा में सवाल उठाया गया। केरल से कांग्रेस सांसद सोफी परम्बिल ने बताया कि एनसीईआरटी द्वारा अनुमोदित पाठ्यपुस्तक से संविधान की प्रस्तावना को क्यों हटा दिया गया। संयोग से, मंगलवार को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में दावा किया गया कि छठी कक्षा के लिए एनसीईआरटी द्वारा अनुमोदित पाठ्यपुस्तक से संविधान की प्रस्तावना को हटाने का निर्णय लिया गया है। हालांकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सीधे तौर पर इससे इनकार करते हुए कहा, ”ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है.” हालांकि, केरल के वडकारा से कांग्रेस सांसद सोफी ने मंगलवार को कहा, ”नरेंद्र मोदी सरकार की मंशा दो शब्दों ‘समाजवादी और” को छुपाने की है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ का उल्लेख है।

लोकसभा चुनाव के बाद से एनसीईआरटी द्वारा अनुमोदित सामाजिक और राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों का ‘संशोधन’ बहस के घेरे में है। जून में, एजेंसी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने कहा कि, सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम को संशोधित करने के लिए एक उच्च स्तरीय पैनल की सिफारिशों के अनुसार, उनकी अनुमोदित पाठ्यपुस्तकों में भारत भी शामिल होगा। इसके तुरंत बाद, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “एनसीईआरटी आरएसएस से संबद्ध निकाय की तरह काम कर रहा है।”

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा अनुमोदित पाठ्यपुस्तकों में भारत के साथ-साथ भारत भी शामिल है। यह बात आज संस्था के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने कही। यह निर्णय सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम को संशोधित करने के लिए एक उच्च स्तरीय पैनल की सिफारिशों पर आधारित है। कांग्रेस ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि 2014 से एनसीईआरटी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोगी की तरह काम कर रहा है.

एनसीईआरटी की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में अयोध्या-अध्याय में संशोधन किया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के नियंत्रण वाली इस स्वायत्त संस्था ने विवादों के बीच एक नया आदेश जारी किया है. एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश ने कहा, ”अगर पाठ्यपुस्तकों में भारत और इंडिया का इस्तेमाल किया जाता है तो कोई आपत्ति नहीं है। यह संविधान सम्मत है…इस पर आपत्ति क्यों होगी? हम इस बहस में नहीं हैं. जहां जरूरी होगा वहां भारत और इंडिया और जहां जरूरी होगा वहां इंडिया का इस्तेमाल किया जाएगा. कथित तौर पर पैनल ने इंडिया के साथ-साथ इंडिया शब्द के इस्तेमाल को भी मंजूरी दे दी।

जयराम ने आरोप लगाया कि एनसीईआरटी संघ परिवार की संबद्ध संस्था की तरह काम कर रही है। उन्होंने कहा, ”संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता का स्पष्ट उल्लेख है. जो भारत गणराज्य की नींव में से एक है। लेकिन एनसीईआरटी लगातार संविधान की धर्मनिरपेक्षता पर हमला कर रही है.” एआईसीसी के महासचिव (जनसंपर्क) ने नीट प्रश्न पत्र लीक को लेकर भी केंद्र पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा शासनकाल में उत्तर प्रदेश में 40 से अधिक प्रश्न लीक हुए
घटना घटी. अटकलें लगाई जा रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में संविधान में संशोधन कर ‘इंडिया’ हटाकर केवल भारत नाम को मान्यता दे सकती है। ऐसे में केंद्र ने स्कूली पाठ्यपुस्तकों से ‘इंडिया’ शब्द को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) स्वीकृत सभी पाठ्यपुस्तकों के नाम बदलने के लिए दिशानिर्देश जारी करने जा रही है। समाचार एजेंसी एनएनआई ने बुधवार को बताया कि संगठन की संबंधित समिति ने सिफारिश की है कि सभी एनसीईआरटी-अनुमोदित स्कूली पाठ्यपुस्तकों से ‘इंडिया’ नाम हटाकर ‘भारत’ लिखने का आदेश दिया जाए। वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।

सितंबर की शुरुआत में जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को राष्ट्रपति द्रौपदी मुरमुर के रात्रिभोज का निमंत्रण सामने आने के बाद अटकलें शुरू हो गईं कि मोदी सरकार लोकसभा चुनाव से पहले देश का नाम बदलकर सिर्फ ‘इंडिया’ करने जा रही है। क्योंकि, जब भारत के राष्ट्रपति किसी को पत्र लिखते हैं तो उसमें परंपरागत रूप से ‘भारत का राष्ट्रपति’ शब्द लिखा होता है। लेकिन G20 नेताओं को दिए गए निमंत्रण पत्र में ‘भारत के राष्ट्रपति’ शब्द लिखा हुआ है. इसके बाद सवाल उठा कि आखिर इतने अचानक बदलाव की वजह क्या है?

उस विवाद के बीच बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने अपने एक्स हैंडल (पूर्व में ट्विटर) पर प्रधानमंत्री मोदी के इंडोनेशिया दौरे का शेड्यूल जारी कर दिया. वहां मोदी की पोस्ट पर लिखा था, ‘भारत के प्रधानमंत्री’. संयोग से, 18 जुलाई को बेंगलुरु में भाजपा विरोधी गठबंधन ‘भारत’ (भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन) की आधिकारिक शुरुआत के बाद ही भाजपा खेमे में ‘सक्रियता’ देखी गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग के अनुसार, यह जानते हुए कि नाममहात्म्य के कारण विपक्षी खेमा राष्ट्रवाद में शामिल हो सकता है, मोदी ने विपक्षी खेमे पर तंज कसते हुए कहा, ”आतंकवादी संगठन ‘इंडियन मुजाहिदीन’ और प्रतिबंधित संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ भी ‘ उनके नाम पर ‘भारत’. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जिसने भारत पर कब्ज़ा किया, उसके नाम में भी ‘इंडिया’ था।”

देश के अन्य ओलंपियन मानसिक रूप से कमजोर.

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विनेश फोगाट की घटना से भारत के अन्य ओलंपियन निराश हैं. पीवी सिंधु, साक्षी मलिक शायद सोच नहीं पा रही होंगी. वे खिलाड़ी के जीवन के सबसे कठिन क्षण में विनेश के साथ खड़े हैं। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि विनेश फाइनल में पहुंचने के बाद भी सिर्फ 100 ग्राम वजन के कारण अयोग्य करार दी जाएंगी. दो बार की ओलंपिक पदक विजेता सिंधु बुधवार सुबह विनेश की खबर सुनकर हैरान रह गईं। उन्होंने भावनात्मक रूप से निराश बिनेश को प्रोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर लिखा, “प्रिय बिनेश, आप हमारी नजरों में हमेशा एक चैंपियन हैं। मुझे वाकई उम्मीद थी कि आप सोना लेकर लौटेंगे। मुझे आपके साथ थोड़ा समय बिताने का अवसर मिला। मैंने सामने से देखा कि कैसे एक महिला हर दिन बेहतर होने के लिए संघर्ष करती है। आपकी लड़ाई मुझे प्रेरणा देती है. मैं हमेशा आपके साथ हूं. मैं चाहता हूं कि दुनिया की सारी शक्तियां आपके साथ रहें।

साक्षी ने रियो ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बनीं। विनेश की तरह साक्षी भी पिछले साल बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों के एक समूह द्वारा किए गए आंदोलन का एक चेहरा थीं। उन्होंने कहा, ”मेरा मन बहुत परेशान है. मैं सोच भी नहीं सकता कि विनेश के साथ क्या हुआ. इस बार ओलंपिक में जितने भी भारतीय खिलाड़ी गए हैं उनमें विनेश की हालत सबसे खराब है. मुझे समझ नहीं आया कि ये कैसे हुआ. यदि संभव होता तो मैं उसे अपना पदक दे देता।

देश के कई खिलाड़ी मुश्किल वक्त में विनेश के साथ खड़े रहे हैं. इस बार उन्हें हिम्मत देने की कोशिश की जा रही है. मानसिक रूप से मजबूत रहने की कोशिश कर रहा हूं. साइना नेहवाल जैसे कई लोगों का मानना ​​है कि विनेश को अधिक सावधान रहना चाहिए था।

संजय सिंह को फिर मिली भारतीय कुश्ती संगठन की जिम्मेदारी. इस संजय संस्था के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के करीबी हैं. भारतीय ओलंपिक संगठन ने कुश्ती का नेतृत्व करने वाली तदर्थ समिति को हटा दिया और यह जिम्मेदारी संजय को वापस मिल गई है। बिनेश फोगाट और साक्षी मलिक इसमें फंस गए हैं. विरोध कर रहे दोनों पहलवानों ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बृजभूषण को खेल प्रशासन से हटाने की अपील की है.

बिनेश एक्स (पूर्व-ट्विटर) हैंडल से लिखा गया, “प्रधानमंत्री स्पिन के मास्टर हैं। वह नारी शक्ति का प्रदर्शन कर विपक्ष को जवाब देना जानती हैं। मोदी जी, हम भी महिलाओं की शक्ति देखना चाहते हैं।” विनेश यह भी लिखती हैं, ”महिलाओं का अपमान करने वाले बृजभूषण ने फिर से कुश्ती पर कब्ज़ा कर लिया है। आशा है कि प्रधानमंत्री महिलाओं को ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं करेंगे।’ इसके बजाय, बृजभूषण को देश के खेल प्रशासन से हटा दें।” गवाह ने आरोप लगाया कि भारतीय कुश्ती संगठन के प्रभारी अधिकारी ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे वे कानून से ऊपर हैं। उन्होंने कहा, ”इतिहास गवाह है कि भारत में सत्ता में बैठे लोगों ने महिलाओं की अस्मिता के साथ छल किया है. कुश्ती के प्रभारी लोग सोचते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं। केंद्र सरकार द्वारा नई समिति को बर्खास्त करने के बाद जिस तरह से बृजभूषण और उनके साथियों ने लगातार इस निर्देश के खिलाफ आवाज उठाई है, उससे यह स्पष्ट है।”

पेरिस ओलंपिक सामने हैं. उनकी बातों को ध्यान में रखते हुए ओलंपिक संगठन ने संजय सिंह की कमेटी से तदर्थ कमेटी को हटा दिया. यानी विरोध करने वाले दो पहलवानों बजरंग पुनिया और विनेश को ओलंपिक क्लीयरेंस मिलेगी या नहीं, इस पर आखिरी फैसला संजय ही लेंगे. शायद इसीलिए विरोध कर रहे पहलवानों ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की. फाइनल में पहुंचने के बाद भी विनेश फोगाट को अयोग्य घोषित कर दिया गया। कुश्ती में वह महिलाओं के 50 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में पहुंचीं। लेकिन बुधवार सुबह जब उसका वजन मापा गया तो पता चला कि उसका वजन 100 ग्राम ज्यादा है. विनेश को फाइनल में अमेरिका की सारा हिल्डरब्रांट के खिलाफ खेलना था। लेकिन भारतीय ओलंपिक संगठन ने कहा कि विनेश को अयोग्य घोषित कर दिया गया है.

कुश्ती में अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार बार-बार वजन मापा जाता है। इस वजन को मापने के कुछ नियम हैं. प्रतियोगिता के अनुच्छेद 11 के अनुसार, यदि कोई पहलवान वजन उठाने में चूक जाता है या उसका वजन अधिक है, तो उसे प्रतियोगिता से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। इस प्रतियोगी को कोई रैंक नहीं मिलेगी.

मनु भाकर का कांस्य पदक थामने पर जॉन अब्राहम को ट्रोल किया जा रहा है.

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जॉन अब्राहम की फिल्म ‘वेदा’ 15 अगस्त को रिलीज होगी। इसीलिए एक्टर कैंपेन में हैं. हाल ही में वह पेरिस ओलंपिक की युगल पदक विजेता निशानेबाज मनु भाकर से मिलने गए थे। बुधवार सुबह मनु दिल्ली लौट आए। एयरपोर्ट पर उनके माता-पिता मौजूद थे. उन्होंने देश के लिए एक मिसाल कायम की है. मनु ने ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल व्यक्तिगत और मिश्रित स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। वह 25 मीटर पिस्टल में भी चौथे स्थान पर रहे। जॉन अब्राहम ने मनु से मुलाकात की और उनके साथ तस्वीर ली। उन्होंने इसे अपने इंस्टाग्राम पेज पर भी शेयर किया. लेकिन समस्या यहीं है. जॉन लिखते हैं, “मनु भाकर और उनके परिवार से मिलकर सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने देश को गौरवान्वित किया है.” संलग्न तस्वीर में मनु के एक हाथ में दो कांस्य पदक हैं और दूसरा जॉन के हाथ में है.

ऐसी तस्वीरें देखकर नेटिजन्स दीवाने हो गए हैं। एक नेटीजन ने कमेंट किया, ”आप मेडल को छू नहीं सकते.” एक अन्य नेटीजन ने लिखा, ”आप बहुत असफल अभिनेता हैं, मेडल की गरिमा खराब मत करो. यह पदक मनु, उनके परिवार और खिलाड़ियों की संपत्ति है। आप ओलंपिक पदक छूने के लायक नहीं हैं।” एक अन्य नेटीजन ने लिखा, ”मनु अपने हाथों में दो पदक पकड़ सकते हैं। आपने ऐसा क्यों सोचा? आप बस एक प्रशंसक के रूप में खड़े रह सकते हैं।”

एक अन्य नेटवर्कर ने जॉन के पास से गुजरते हुए मनु से कहा, ”अपनी मेहनत से कमाया हुआ मेडल किसी आदमी को मत देना.” हालांकि, जॉन ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की.

जॉन अब्राहम 15 अगस्त को निखिल आडवाणी की फिल्म ‘वेदा’ में नजर आएंगे। शरबरी, तमन्ना भाटिया, मौनी रॉय हैं. मनु भाकर देश लौट आईं. पेरिस ओलंपिक के दोहरे पदक विजेता निशानेबाज बुधवार सुबह दिल्ली लौट आए। उनके कोच यशपाल राणा उनके साथ थे. महिला निशानेबाजों ने एक ही ओलंपिक में दोहरे पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। देश ने उनका स्वागत किया.

मनु पेरिस से दिल्ली लौटे. एयर इंडिया की फ्लाइट एक घंटे देरी से दिल्ली पहुंची. मनु सुबह 9:20 बजे घर लौटे. दिल्ली की बारिश को झेलते हुए करीब 100 लोग एयरपोर्ट पर मनु का इंतजार कर रहे थे। हालांकि टी20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय टीम का जिस स्वागत का इंतजार था वह बुधवार सुबह देखने को नहीं मिला.

एयरपोर्ट पर मनु के पिता राम किशन और मां सुमेधा मौजूद थे. दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से भी कुछ लोग मनु के स्वागत के लिए आये थे. कोच राणा के पिता भी वहां थे. मनुरा के पहुंचने से काफी पहले ही लोग हवाईअड्डे पर जमा हो गए थे। वे ढोल बजाकर मनु का स्वागत करते हैं। कई लोग नाचते-गाते भी नजर आ रहे हैं. राणा के पिता उत्तराखंड के पूर्व खेल मंत्री नारायण सिंह राणा हैं। उन्होंने कहा, ”यह हमारे लिए बहुत गर्व की बात है. देश की बेटी ओलंपिक में इतिहास रचकर लौटी. मनु ने एक ही ओलंपिक में दो पदक जीते। स्वतंत्र भारत में इससे पहले कोई भी यह उपलब्धि हासिल नहीं कर सका। मनु ने ऐसा तब किया जब वह महज 22 साल के थे। मेरा बेटा यशपाल भी लौट रहा है. अभिनव बिंद्रा और यशपाल ने एक साथ निशानेबाजी से देश का सपना साकार करना शुरू किया. उन्होंने देश को गौरवान्वित भी किया।”

मनु ने ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल व्यक्तिगत और मिश्रित स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। 25 मीटर पिस्टल में वह चौथे स्थान पर रहे। टोक्यो ओलंपिक से पहले मनु भाकर ने यशपाल राणा का साथ छोड़ दिया। इस बार ओलिंपिक से पहले मनु अपने पुराने कोच के पास वापस चले गए। उनके नेतृत्व में, उन्होंने पेरिस ओलंपिक में निशानेबाजी में दो कांस्य पदक जीते। शिष्य की सफलता के बाद गुरु खुलते हैं. यशपाल ने आरोप लगाया कि मनु का करियर खत्म करने की कोशिश की गई.

यशपाल ने मीडिया को बताया, “फिर से जोड़ी बनाने से पहले, हमने एक-दूसरे को एक शब्द दिया। हमने तय किया कि हम अतीत के बारे में कभी बात नहीं करेंगे। मैं जो हुआ उसे भूल जाऊंगा और नई शुरुआत करूंगा।’ वह काम किया। उन्होंने मनु को ख़त्म करने की कोशिश की. उन्होंने राष्ट्रीय संपदा को नष्ट करने की कोशिश की. मनु सिर्फ मेरा छात्र नहीं है. वह एक देश के खिलाड़ी हैं।”

हालाँकि शिकायत करते हुए उन्होंने यह नहीं बताया कि यशपाल ‘वे’ कहकर किसके बारे में बात कर रहे थे। लेकिन उनकी बातों से साफ है कि उनके और मनु के बीच गलतफहमी के पीछे कोई है. वे नहीं चाहते थे कि मनु यशपाल के अधीन रहे। इस बार यशपाल ने वह शिकायत सार्वजनिक तौर पर कर दी.

आखिर महान गायक मोहम्मद रफी के सात बच्चे क्यों नहीं बन पाए सिंगर?

आज हम आपको बताएंगे की महान गायक मोहम्मद रफी के सात बच्चे आखिर सिंगर क्यों नहीं बन पाए! खोया खोया चांद, खुला आसमान, आंखों में सारी रात जाएगी… सुरों के सरताज मोहम्‍मद रफी ने अपनी मदहोश करने वाली आवाज में जब यह गाया, तब ना जाने कितनी आंखों से नींद गायब हो गई। उन्‍होंने हमें महबूब की राहों में बहारों से गुजारिश कर फूल बरसाना सिखाया। भारतीय सिनेमाई गायिकी में रफी साहब जैसा ना कोई था और ना ही कोई है। पंजाब में पैदा हुए रफी की आवाज आज भी दिलों में गूंजती है। उनके गाए 28000 से अध‍िक गानों की रवानी ऐसी है कि हर बैचेन मन को सुकून मिलता है। वह इश्‍क की तड़प को बढ़ाना भी जानते थे और गम में मरहम लगाना भी। बुधवार, 31 जुलाई को रफी साहब की पुण्‍यतिथ‍ि है। इस महान गायक ने अपने पीछे गीत-संगीत की एक अमूल्‍य व‍िरासत छोड़ी है। लेकिन क्‍या आपने कभी सोचा है कि उनकी सात संतानों में से कभी कोई सिंगर क्‍यों नहीं बना? सिंगर बनना तो दूर, उनकी 3 बेटियों और 4 बेटों में में किसी ने कभी इस विधा में कोई कोश‍िश भी नहीं की। मोहम्मद रफी का जन्‍म 24 दिसम्बर 1924 को ब्रिटिश पंजाब के कोटला सुल्‍तान सिंह (अब अमृतसर का हिस्‍सा) में हुआ था। उनके माता-पिता अल्‍ला राखी और हाजी अली मोहम्‍मद जट मुस्‍लिम परिवार से थे। रफी साहब को घरवाले प्‍यार से फीको बुलाते थे। साल 1945 में ‘गांव की गोरी’ फिल्‍म से रफी साहब ने हिंदी सिनेमा में करियर शुरू किया। धीरे-धीरे उनका करियर परवान चढ़ा। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्‍होंने हर तरह के गाने गाए। उनमें गजब की वर्सेटैलिटी थी। वह देशभक्ति के गीत गाते थे, दुख भरे नगमों की तान छेड़ते थे। रोमांटिक गानों में उनका कोई सानी नहीं था। कव्वाली से लेकर गजल और भजन से लेकर शास्त्रीय गानों तक उन्‍होंने हर तरह के गीत में अपना जलवा दिखाया। जितनी मधुर आवाज, उतनी ही सौम्‍य शख्‍य‍ियत के मालिक मोहम्‍मद रफी ने छह फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। उन्‍हें एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। साल 2001 में भारत सरकार ने उन्‍हें पद्मश्री का सम्‍मान दिया।

रफी साहब ने दो शादियां की थीं। पहली पत्‍नी बशीरा बीबी उनकी कजिन थीं। 1938 में दोनों का निकाह हुआ, लेकिन 1942 में यह रिश्‍ता टूट गया, क्‍योंकि बशीरा बीवी लाहौर से दूर नहीं जाना चाहती थीं। फिर 1945 में मोहम्‍मद रफी ने बिलकिस बानो से निकाह किया। उन्‍हें पहली शादी से एक बेटा सईद हुआ। जबकि दूसरी बेगम से तीन बेटियां और तीन बेटे हुए। लेकिन इनमें से किसी ने भी पिता की तरह संगीत में करियर नहीं बनाया। असल में इसकी वजह खुद मोहम्‍मद रफी थे। रफी साहब पर लिखी अपनी किताब ‘मोहम्‍मद रफी- माय अब्‍बा’ में उनकी बहू और बहुत बड़ी फैन यास्‍म‍ीन खालिद रफी ने इसका खुलासा किया है।

यास्‍म‍ीन बताती हैं, ‘रफी साबह खुद कभी नहीं चाहते थे कि उनके बच्‍चे भी उनकी तरह गायिकी करें। इसलिए उन्‍होंने अपने बच्‍चों को शुरू से ही बोर्डिंग स्‍कूल में पढ़ाया। वह बड़े आध्‍यात्‍मिक इंसान थे। वह कहते थे कि मुझ पर ऊपर वाले का करम है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरे बच्‍चे वो कर पाएंगे, जो मैंने किया है। वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्‍चे समाज के उस दबाव को महसूस करें कि एक महान सिंगर के बच्‍चे भी उनकी तरह ही महान गायक बनें।’

यास्‍म‍ीन आगे बताती हैं कि रफी साहब निजी जिंदगी में एक बेहद शांत व्यक्ति थे। वह हर रोज सुबह 5 बजे उठते थे और दो घंटे रियाज करते थे। शाम को उन्हें अपना खाना गर्म और समय पर चाहिए होता था। उन्‍हें घर का खाना पसंद था, फिर चाहे वह साधारण दाल-चावल ही क्यों न हो। वह रात 10 बजे तक सो जाते थे। उन्हें मीडिया इंटरव्‍यूज से डर लगता था। वह अक्‍सर इंटरव्‍यू की बात सुन तनाव में आ जाते थे और कहते थे, ‘मैं एक साधारण आदमी हूं। मेरे पास उन्हें बताने के लिए कुछ भी मसालेदार नहीं है।’

मोहम्‍मद रफी का लंदन में अपना घर था। यास्‍मीन बताती हैं, ‘वहां पहुंचकर मैंने दाल-चावल और चटनी बनाई। डैडी ने प्‍याज और टमाटर का सलाद भी तैयार करने को कहा। घर का खाना खाते ही उनके चेहरे पर मुस्‍कान बिखर गई। उन्‍होंने मुझे दुआएं दीं। वह वाकई खुशी से किसी बच्‍चे की तरह चहक रहे थे। फिर वहां से हम तीनों वापस कोविंट्री के लिए रवाना हो गए।’

सादगी पसंद मोहम्मद रफी बड़ी जल्‍दी इस दुनिया से रुखसत हो गए। उनका निधन 31 जुलाई, 1980 को रात 10:25 बजे दिल का दौरा पड़ने से हुआ। वह 55 साल के थे। बताया जाता है कि उन्‍होंने अपना आख‍िरी गीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए फिल्‍म ‘आस पास’ में गाया था। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रफी साहब ने ‘शाम फिर क्यों उदास है दोस्त… तू कहीं आस पास है दोस्त’ गाने को अपनी मौत से कुछ ही घंटे पहले रिकॉर्ड किया था।

जब मौत के मुंह से निकलकर बाहर आए थे अमिताभ बच्चन!

एक ऐसा समय भी था जब अमिताभ बच्चन मौत के मुंह से निकलकर बाहर आए थे! अमिताभ बच्चन का बर्थडे वैसे तो हर साल 11 अक्टूबर को आता है, पर 2 अगस्त को भी उनका बर्थडे मनाया जाता है। फैंस और शुभचिंतकों के लिए 2 अगस्त अमिताभ बच्चन का दूसरा जन्म दिवस है। यह वो दिन है, जब अमिताभ 42 साल पहले मौत को चकमा देकर घर वापस लौटे थे। तब उनका खूब गर्मजोशी से स्वागत किया गया था। सभी देशवासियों ने जश्न मनाया था। दो अगस्त 2024 को कई फैंस ने अमिताभ का दूसरा बर्थडे मनाया, जिसके लिए उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में सभी का धन्यवाद दिया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, जो 42 साल पुराना है, जिसमें अमिताभ बच्चन अस्पताल से ठीक होने के बाद घर लौटे। धूमधाम से उनका स्वागत किया गया। भारी भीड़ थी और उसके बीच अमिताभ की आरती उतारी गई।

दरअसल, 26 जुलाई 1982 में फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को गंभीर चोट आई थी। एक एक्शन सीन के दौरान पुनीत इस्सर ने अमिताभ के पेट में जोरदार मुक्का मार दिया था। मुक्का लगते ही अमिताभ जमीन पर गिर पड़े थे और दर्द से कराहने लगे थे। पुनीत इस्सर मार्शल आर्ट में माहिर थे और उनका मुक्का तेज लगा। अमिताभ को तेज दर्द हो रहा था। डॉक्टरों को भी दिखाया, पर परेशानी पकड़ में नहीं आई।

इसी बीच अमिताभ बच्चन की हालत बिगड़ती चली गई। बार-बार टेस्क के बाद भी पता नहीं चल पा रहा था कि दिक्कत क्या है। तब वेल्लोर के डॉ. भट्ट ने अमिताभ का टेस्ट किया और बताया कि उनके पेट में चोट लगी है और मवाद पड़ने लगा है। अमिताभ की तुरंत ही इमर्जेंसी सर्जरी की गई। उस वक्त पूरा देश उनके लिए प्रार्थना करने लगा। जगह-जगह हवन किए जाने लगे। लेकिन सर्जरी के बाद भी अमिताभ की हालत नहीं सुधरी। फिर उन्हें ब्रीचकैंडी हॉस्पिटल लाया गया, जहां वह कुछ देर के लिए ‘क्लीनिकली डेड’ घोषित कर दिए गए थे। पूरे देश में मातम सा पसर गया था। मंदिर से मस्जिद, दरगाह, चर्च और गुरुद्वारों में सभी ने अपने हीरो के लिए दुआ और प्रार्थना शुरू कर दी।

धीरे-धीरे अमिताभ बच्चन की हालत सुधरने लगी और 2 अगस्त 1982 को डॉक्टरों की मेहनत के दम पर अमिताभ फिर से जी उठे। उनका हालत ठीक होने लगी और वह घर वापस लौट आए। जब घर आए तो उनके शानदार स्वागत के लिए भारी भीड़ उमड़ी थी। यही नहीं 12वीं फेल’ के डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा ने एक बार जब अमिताभ बच्चन को चार करोड़ की रोल्स रॉयस गिफ्ट की थी, तो मां ने उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया था। यह साल 2007 की बात है, जब वह अमिताभ के साथ फिल्म ‘एकलव्य: द रॉयल गार्ड’ में काम कर रहे थे। विधु विनोद चोपड़ा ने अब एक इंटरव्यू में मां के थप्पड़ मारने और उस फिल्म के शूट का किस्सा सुनाया है। विधु विनोद चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया, ‘वहां क्राइसिस ये था कि मैं अमिताभ के लिए कमरा बुक कर सकता था, लेकिन फिर मैं अन्य स्टार्स- सैफ अली खान और संजय दत्त को नहीं छोड़ सकता था। मुझे उनके लिए कमरे भी बुक करने पड़ते और इसी तरह फिल्में बजट से अधिक हो जाती हैं। तब मैं ‘एकलव्य’ जैसी बारीक फिल्म नहीं बना पाता। उस स्थिति में, आप एक खराब फल्म बना सकते हैं, जो हर जगह काम करती है।’ ‘एकलव्य’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी, पर इसे क्रिटिक्स ने खूब सराहा था। यही नहीं, इस फिल्म को उस साल भारत की तरह से ऑस्कर्स में भी भेजा गया था।

अमिताभ बच्चन को 4 करोड़ की रोल्स रॉयस गिफ्ट करने पर मां ने उन्हें थप्पड़ मारा था, जबकि वह खुद मारुति चलाते थे। वह बोले, ‘मैं उस घटना को कभी नहीं भूलूंगा। जब मैं अमिताभ को कार गिफ्ट कर रहा था तो मैं मां को अपने साथ ले गया था। उन्होंने अमिताभ को चाबियां दीं और वापस आकर मेरी कार में बैठ गईं, जो नीले रंग की मारुति वैन थी। उन्होंने बिग बी को ‘लंबू’ कहा। उस समय मेरे पास ड्राइवर नहीं था, इसलिए मैं गाड़ी चला रहा था। मां ने मुझसे कहा, ‘तू लम्बू नु गाड़ी देदी? मैंने कहा कि हां, तो उन्होंने पूछा, ‘तू खुद क्यूं नहीं लेता गाड़ी?’ मैंने जवाब दिया कि ले लूंगा, अभी टाइम है। फिर उन्होंने गाड़ी की कीमत पूछी और कहा कि 11 लाख की तो होगी। मैं जोर से हंसा क्योंकि मां को पता नहीं था कि वो गाड़ी 4 करोड़ रुपये की थी।’ विधु विनोद चोपड़ा ने जैसे ही मां को गाड़ी की कीमत बताई तो उन्होंने थप्पड़ मार दिया और उन्हें बेवकूफ कहा।