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क्या विपक्ष कर रहा था नीतीश कुमार की सरकार से नाराजगी का इंतजार?

हाल ही में विपक्ष नीतीश कुमार की सरकार से नाराजगी का इंतजार कर रहा था लेकिन हुआ कुछ और ही! नरेंद्र मोदी की तीसरे राउंड की सरकार के पहले आम बजट से सबसे अधिक अगर किसी को निराश हुई है तो वह है विपक्ष। सदन से लेकर सड़क तक विपक्षी पार्टियों के समर्थक बजट प्रावधानों की आलोचना कर रहे हैं। राहुल गांधी तो इसे कांग्रेस की न्याय योजना का कापी-पेस्ट बता रहे हैं तो साथ में यह भी कह रहे कि सहयोगी दलों को खुश करने वाला यह बजट है। यानी कुर्सी बचाने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। ममता बनर्जी को भी बजट रास नहीं आ रहा। आरजेडी नेताओं और समाजवादी पार्टी के अखिलेश-डिंपल यादव को भी बजट अच्छा नहीं लग रहा है। दरअसल विपक्ष का दर्ज कुछ और है। विपक्ष को यह पक्का भरोसा था कि देर-सबेर एनडीए में शामिल सांसदों की संख्या के हिसाब से दो बड़े दल जेडीयू और टीडीपी देर-सबेर उसके साथ आ जाएंगे। उन्हें साथ लाने की विपक्ष ने कोशिश भी की थी। फर्क यही रहा कि लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों का महत्व विपक्ष के किसी नेता को समझ नहीं आया। चुनाव परिणाम आए और महज 40 सदस्यों के बंदोबस्त से सरकार विपक्ष की सरकार बन जाने की संभावना दिखी तो कांग्रेस और उसके साथ इंडिया ब्लाक के सभी दलों ने हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए। आंध्र प्रदेश में टीडीपी के 16 सांसदों को अपने पाले में करने के लिए विपक्ष ने चंद्रबाबू नायडू पर डोरे डालने शुरू किए तो जेडीयू के 12 सांसदों की वजह से नीतीश कुमार भी विपक्ष के लिए आदरणीय हो गए। नायडू और नीतीश के फोन पर विपक्षी नेताओं के काल आने लगे। नीतीश को तो पीएम बनाने का भी आफर दिया गया। नायडू को भी ऐसा ही कोई आकर्षक प्रस्ताव मिला हो तो आश्चर्य की बात नहीं। पर, विपक्ष इस कोशिश में नाकाम रहा। दोनों नेता एनडीए छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

अतीत में चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार एनडीए को धोखा दे चुके हैं। इसलिए इन दोनों नेताओं के पिछले आचरण को देखते हुए विपक्ष को उम्मीद थी कि वे कभी भी एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं। बिहार में नीतीश कुमार दो बार एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं। चंद्रबाबू नायडू के समर्थन वापस लेने से ही अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार गिर गई थी। यही वजह है कि विपक्ष इन दोनों नेताओं की ओर अब तक टकटकी लगाए था। उसे उम्मीद थी कि किसी न किसी कारण से ये नेता बिदकेंगे और इनके सहारे बनी नरेंद्र मोदी की सरकार धराशायी हो जाएगी। पर, मोदी ने ऐसी चाल चली कि विपक्ष ताकते रह गया।

नीतीश कुमार बिहार को विशेष दर्जा की मांग कर रहे थे। विशेष दर्जा न मिल पाने की स्थिति में उन्होंने विशेष पैकेज की मांग रखी थी। विपक्ष को पता था कि बिहार ही नहीं, किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलना मुश्किल है। नीति आयोग ने इसके जो मानक तय किए हैं, उसमें बिहार एक भी शर्त पूरी नहीं करता। ऐसी स्थिति में नीतीश के बिदकने की बाट विपक्ष जोह रहा था। मोदी सरकार ने बिहार को करीब 59 हजार करोड़ रुपए देकर नीतीश को बिदकने का मौका ही नहीं दिया। विशेष राज्य का दर्जा देने से केंद्र के इनकार के बाद तो विपक्ष ने नीतीश को चने की झाड़ पर भी चढ़ाने की कोशिश की। लालू यादव उन्हें इस्तीफा देने की सलाह देने लगे। कांग्रेस उनकी अंतरात्मा जगाने लगी। विपक्ष यह मान कर चल रहा था कि मोदी-3 सरकार बनते ही जिस तरह नीतीश ने विशेष राज्य की मांग उठाई है, पूरी न होने पर वे जरूर बिदकेंगे और एनडीए से अलग हो जाएंगे। पर, विपक्ष की उम्मीदों पर पानी फिर गया। चंद्रबाबू नायडू हमेशा आंध्र प्रदेश के लिए आर्थिक मदद के आग्रही रहे हैं। विपक्ष को उम्मीद थी कि मदद न मिलने या कम मिलने पर वे भी नाराज होंगे। पर, दोनों के लिए केंद्र सरकार ने बजट में इतनी रकम का प्रावधान कर दिया कि दोनों खुश हैं। वे बजट की तारीफों के पुल बांध रहे हैं।

जब विपक्ष की उम्मीदों परल पानी फिर गया तो वह अब दूसरा राग अलापने लगा है। विपक्ष के मुताबिक यह घुटना टेक बजट है। कुर्सी बचाने वाला बजट है। अगर इसे सच भी मान लें तो बुरा क्या है। जब सरकार गठबंधन की हो तो साथी दलों के मन-मिजाज के हिसाब से काम करना गलत कैसे है। केंद्र में इंडिया ब्लाक भी सरकार बनाता तो क्या वह अपने सहयोगी दलों की उपेक्षा कर पाता। सच यही है कि विपक्ष की उम्मीदों पर मोदी ने पानी फेर दिया है। नीतीश और नायडू से इंडिया ब्लाक को भारी निराशा मिली है। इसलिए बौखलाहट में विपक्ष सदन में हंगामा मचा रहा है। बजट को कुर्सी बचाने की कवायद कह रहा है। सहयोगी दलों के आगे घुटने टेकने की मोदी सरकार पर लांछन लगा रहा है।

आखिर सरकार का बायकाट क्यों कर रहा है विपक्ष?

वर्तमान में विपक्ष सरकार का बायकाट करता हुआ नजर आ रहा है! बहुमत से दूर खड़ी मोदी सरकार को विपक्ष चुनौती देने का कोई मौका छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। संसद से लेकर सड़क तक मोदी सरकार की नीतियों का विरोध और आम जनता के अधिकारों की बात करने वाले विपक्ष ने शनिवार को पीएम मोदी की अध्यक्षता में होने वाली नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक का बॉयकॉट कर सरकार और सत्तारूढ़ दल को एक बड़ा संकेत देने की कोशिश की है। दरअसल, जिस तरह से हालिया बजट को लेकर समूचा विपक्ष गैर एनडीए शासित प्रदेशों की अनदेखी का आरोप संसद से सड़क तक लगा रहे हैं, उसके बाद गैर एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का नीति आयोग की बैठक में न आना उस विरोध पर एक औपचारिक मुहर की तरह सामने आया। विपक्ष ने कहीं न कहीं यह संकेत देने की कोशिश की कि भले ही अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं, लेकिन एक बड़े मुद्दे पर पूरा विपक्ष एकजुट है। उल्लेखनीय है कि बैठक का सबसे पहले बॉयकॉट का फैसला तमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन ने लिया। उसके बाद कांग्रेस के तीनों मुख्यमंत्रियों कर्नाटक के सिद्धारमैया, तेलंगाना के रेवंत रेड्डी व हिमाचल के सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी इसमें भाग न लेने की बात कही। पंजाब के सीएम भगवंत मान ने दूरी बनाई तो केरल के सीएम पिनराई विजयन भी नहीं आए। विपक्ष की ओर से वेस्ट बंगाल सीएम ममता बनर्जी व झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने आने की बात कही थी, लेकिन ऐन मौके पर सोरेन भी नहीं पहुंचे। जबकि ममता शामिल तो हुईं, लेकिन बोलने न देने और माइक बंद करने का आरोप लगाते हुए बीच बैठक से निकल गईं। हालांकि इस बैठक से बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भी दूरी बनाई है, लेकिन बिहार सरकार की तरफ से बाकायदा इसकी सफाई सामने आई है। उनके न आने की वजह एक अहम मीटिंग बताई गई, जबकि नीतीश कुमार की जगह उनके दोनों डिप्टी सीएम विजय कुमार और सम्राट चौधरी ने बिहार का प्रतिनिधित्व किया।

उल्लेखनीय है कि हर राज्य की केंद्र सरकार से शिकायत है कि उसे केंद्र से अपने हिस्से का फंड नहीं मिलता है और उसका पैसा केंद्र के पास बकाया है। इस बार के बजट में जिस तरह से केंद्र सरकार ने बिहार व आंध्र प्रदेश के लिए अपना खजाना खोला, उसने बाकी राज्यों में असंतोष और बढ़ा दिया। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सिर्फ अपनी सरकार वाले राज्यों के अलावा अपने घटक दलों पर मेहरबानी करता है, बाकी राज्यों के साथ भेदभाव का आरोप लगा रहा है। वहीं विपक्ष मोदी सरकार पर सहकारी संघवाद की अनदेखी का आरोप भी लगाता रहा है। ऐसे में नीति आयोग जैसे मंच जो संघवाद की अहम कड़ी के तौर पर काम करते हैं, वहां शामिल न होकर विपक्ष ने सरकार व सत्तारूढ़ दल को साफ संकेत दिया है। सरकार का विरोध कर विपक्षी दल अपने राज्य के लोगों को संदेश देना चाहते हैं कि विपक्षी राज्य होने के नाते उनकी अनदेखी हो रही है, लेकिन अपने लोगों के लिए वे लड़ते रहेंगे। इन दिनों संसद के दोनों सदनों में फिलहाल बजट पर चल रही चर्चा के दौरान इंडिया गठबंधन के तमाम दल इसी लाइन पर मोदी सरकार पर हमलावर दिखे।

हालांकि ममता बनर्जी के आरोपों के बाद विपक्षी दलों ने बनर्जी के पक्ष में आवाज बुलंद की। डीएमके चीफ स्टालिन ने ममता के आरोपों के मद्देनजर केंद्र सरकार को घेरते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या यही सहकारी संघवाद है? क्या मुख्यमंत्री के साथ व्यवहार करने का यही तरीका है? केंद्र की बीजेपी नीत सरकार को यह समझना चाहिए कि विपक्षी दल हमारे लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं और उन्हें दुश्मन नहीं समझा जाना चाहिए। सहकारी संघवाद के लिए संवाद और सभी आवाजों का सम्मान जरूरी है। वहीं कांग्रेस ने नीति आयोग की बैठक में ममता बनर्जी के साथ हुए व्यवहार को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया।

कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश का कहना था कि है। दस साल पहले स्थापित होने के बाद से ही नीति आयोग प्रधानमंत्री का एक अटैच्ड ऑफिस रहा है। यह प्रधानमंत्री के लिए ढोल पीटने वाले तंत्र के रूप में काम करता है। रमेश ने दावा किया कि नीति आयोग किसी भी तरह से सहकारी संघवाद को मजबूत नहीं कर रहा। इसका काम करने का तरीका साफतौर से पक्षपात से भरा रहा है। यह कतई पेशेवर और स्वतंत्र नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि इसकी बैठकें महज दिखावा मात्र की होती हैं। जबकि आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का कहना था कि ये लोग पूरे विपक्ष का अपमान करने पर आमादा हैं। उन्होंने मीडिया में कहा कि बनर्जी का इस बैठक में जाने का मकसद सच्चाई जानना था और उन्होंने सच्चाई जानने के बाद ही अपना बयान दिया।

विपक्षी दलों का ऐसी बैठकों से दूरी बनाना कोई नई बात नहीं है। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के 10 साल की सरकार में ऐसे कई मौके आए जब एनडीसी की बैठकों से गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने दूरी बनाई। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री, ओडिशा के तत्कालीन सीएम नवीन पटनायक, तमिलनाडु की जयललिता, यूपी की मायावती और वेस्ट बंगाल की ममता बनर्जी के साथ मिलकर एनडीसी की बैठक में सहकारी संघवाद की अनदेखी का आरोप लगाते हुए विरोधी सुर बुलंद किए थे। गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुए नरेंद्र मोदी ने जिन अहम मुद्दों पर विरोध का सुर उठाया था उसमें से जीएसटी भी एक था।

क्या पीएम मोदी लेने वाले हैं कोई बड़े फैसले?

आने वाले समय में पीएम मोदी कुछ बड़े फैसले लेने वाले हैं! नरेंद्र मोदी का पीएम के रूप में तीसरा कार्यकाल शुरू हो चुका है। पिछली दो बार के उलट इस बार गठबंधन में सहयोगी दलों पर निर्भरता अधिक है। इस बीच संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष पीएम मोदी के साथ ही केंद्र सरकार पर लगातार हमले कर रहा है। जम्मू कश्मीर में बढ़ते आतंकी हमलों ने विपक्ष को सरकार को निशाने पर लेने का एक मौका दे दिया है। इस बीच मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए बीएसएफ के डीजी को उनके पद से हटा दिया है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार की तरफ से इसी तर्ज पर कई और फैसले लिए जाएंगे। खास बात है कि पीएम मोदी जब तीसरी बार कुर्सी पर बैठे तो कयासों के उलट अपने कैबिनेट से लेकर नौकरशाही में शीर्ष स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं किया। इसे पीएम मोदी के काम करने का तरीका समझा जा सकता है। विपक्ष के साथ ही नौकरशाही को लगा कि पीएम मोदी गठबंधन के दबाव में ऐसे में वह इस बार बड़े फैसले लेने में हिचकेंगे।आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पीएम मोदी विपक्ष को रणनीति को कुंद करने की तैयारी में हैं। पीएम मोदी इस बात को जानते हैं कि महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों में पार्टी को सत्ता विरोधी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, मोदी सरकार के एक साथ दो शीर्ष अधिकारियों को लेकर अचानक हुए इस ऐक्शन ने इस भ्रम को काफी हद तक दूर कर दिया होगा। माना जा रहा है कि मोदी सरकार इसके बाद जल्द ही कई और बड़े फैसले ले सकती है।

आने वाले समय में सबसे पहले नौकरशाही में बदलाव देखने को मिलेंगे। इसकी वजह है कि कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गौबा और होम सेक्रेटरी अजय भल्ला का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बात के पुख्ता संकेत हैं कि इन पदों पर नए लोगों को रखा जाएगा। खबर है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष अधिकारियों के प्रदर्शन से भी खुश नहीं हैं। ऐसे में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की सलाह से यहां भी बड़ा बदलाव संभव है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से सुरक्षा बलों की जानें गई हैं, ऐसे में केंद्र सरकार नहीं चाहती कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी यहां फिर से पहले की तरह अपनी जड़ें मजबूत करें। ऐसे में खुफिया और सुरक्षा नेटवर्क की भी समीक्षा की जाएगी।

आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पीएम मोदी विपक्ष को रणनीति को कुंद करने की तैयारी में हैं। पीएम मोदी इस बात को जानते हैं कि महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों में पार्टी को सत्ता विरोधी का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही इंडिया गठबंधन जातिगत विभाजन का फायदा उठाकर मुस्लिम वोटबैंक को मजबूत करने की रणनीति पर चल रहा है। ऐसे में मोदी सरकार ने पहले से ही मजबूती का संदेश देना चाहती है। बता दें कि पीएम मोदी के काम करने का तरीका समझा जा सकता है। विपक्ष के साथ ही नौकरशाही को लगा कि पीएम मोदी गठबंधन के दबाव में ऐसे में वह इस बार बड़े फैसले लेने में हिचकेंगे। हालांकि, मोदी सरकार के एक साथ दो शीर्ष अधिकारियों को लेकर अचानक हुए इस ऐक्शन ने इस भ्रम को काफी हद तक दूर कर दिया होगा।

इसी बीच विपक्ष की ओर से वेस्ट बंगाल सीएम ममता बनर्जी व झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने आने की बात कही थी, लेकिन ऐन मौके पर सोरेन भी नहीं पहुंचे। जबकि ममता शामिल तो हुईं, लेकिन बोलने न देने और माइक बंद करने का आरोप लगाते हुए बीच बैठक से निकल गईं। हालांकि इस बैठक से बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भी दूरी बनाई है, लेकिन बिहार सरकार की तरफ से बाकायदा इसकी सफाई सामने आई है।  यह प्रधानमंत्री के लिए ढोल पीटने वाले तंत्र के रूप में काम करता है। रमेश ने दावा किया कि नीति आयोग किसी भी तरह से सहकारी संघवाद को मजबूत नहीं कर रहा। इसका काम करने का तरीका साफतौर से पक्षपात से भरा रहा है। यह कतई पेशेवर और स्वतंत्र नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि इसकी बैठकें महज दिखावा मात्र की होती हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऐसी खबरें हैं कि महाराष्ट्र में मुस्लिम धर्म गुरु सीएम के रूप में उद्धव ठाकरे का समर्थन कर सकते हैं। ऐसे में पार्टी मजबूती से राज्य की इकाइयों के भीतर मतभेदों को दूर करने में जुटी हुई है।

आखिर गृह मंत्री के खिलाफ क्यों आया विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव?

हाल ही में गृहमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव आ चुका है! वायनाड लैंडस्लाइड हादसे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दावों के खिलाफ शुक्रवार को कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया। जयराम रमेश ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर वायनाड भूस्खलन को लेकर झूठ बोलने का आरोप लगाया है। जयराम रमेश ने अपने पत्र में लिखा है, ‘अमित शाह के दावे को मीडिया ने गलत पाया है।’ रमेश ने ‘द हिंदू’ अखबार में छपी एक फैक्ट चेक रिपोर्ट का भी हवाला दिया है। इससे पहले पंजाब के जालंधर से कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक अन्य मामले में लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की थी। जयराम रमेश ने कहा, ‘केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में केरल के वायनाड में हुई भूस्खलन की घटना को लेकर अपनी बात रखी थी।’ उन्होंने आगे कहा, ‘केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व चेतावनी प्रणाली पर कई दावे किए, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे केंद्र सरकार ने वायनाड में हुई त्रासदी से पहले ही अलर्ट जारी किए जाने के बावजूद भी केरल सरकार ने उनका इस्तेमाल नहीं किया है।’ रमेश ने कहा कि मीडिया ने इन दावों की जांच की है। रमेश ने कहा, ‘अमित शाह के बयान पूरी तरह से झूठे हैं, ऐसे में यह स्पष्ट है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने केंद्र सरकार की ओर से जारी पूर्व चेतावनी पर अपने जोरदार बयानों से राज्यसभा को गुमराह किया है।’

इससे पहले राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसदों की ओर से विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया है। वहीं केरल से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के तीन सांसदों ने राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ से अनुरोध किया है कि वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को वायनाड त्रासदी पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान दिए गए अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दें। शाह ने कहा था कि राज्य सरकार ने केंद्र की मौसम चेतावनी को नजरअंदाज किया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने केरल के वायनाड में हुई घटना के लिए केरल सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। इसे लेकर अमित शाह के खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया। इस मामले पर आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि गृह मंत्री ने सीधे तौर पर राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। अमित शाह ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। वह देश के गृह मंत्री हैं। उनकी जवाबदेही और जिम्मेदारी क्या है?

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने शुक्रवार को वायनाड भूस्खलन को लेकर केरल सरकार द्वारा दिए गए आदेश पर सवाल उठाए हैं। पूनावाला ने आपदा में मारे गए लोगों के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार बताया है। पूनावाला ने वीडियो बयान में कहा कि केरल में जो मानव निर्मित आपदा आई है उसे केरल सरकार ने स्वीकार लिया है। जिस प्रकार का गैग ऑर्डर, फतवा, तालिबानी फरमान केरल सरकार ने वैज्ञानिकों के खिलाफ और टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूशन के खिलाफ निकाला है वो इसकी पुष्टि करता है। उनका फरमान है कि वो लैंडस्लाइड के विषय में किसी से कुछ बात नहीं कर सकते। उन्होंने प्रदेश सरकार पर कई आरोप लगाए।

केरल के वायनाड में 30 जुलाई को भूस्खलन हुआ था। इसमें मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। शुक्रवार सुबह तक मलवे से तीन सौ से ज्यादा लोगों के शवों को निकाला जा चुका है। भूस्खलन के कारण ढही इमारतों को मलबे में लोगों को तलाशने का काम जारी है। 200 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इस सबके बीच केरल के सीएम पिनाराई विजयन सरकार की ओर से दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। जिसमें वैज्ञानिकों को प्रभावित स्थलों पर जाने और इस बारे में कोई भी बयान जारी करने पर प्रतिबंध लगाने को कहा गया है।

अमित शाह से पहले पंजाब के जालंधर से कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की थी। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को चिट्टी लिखकर अपील की थी कि वो प्रधानमंत्री के खिलाफ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की अनुमति दें। चन्नी का कहना था कि केंद्रीय मंत्री और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर के भाषण की कुछ बातें लोकसभा की कार्यवाही से हटा दी गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने हटाए गए शब्दों को भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया है।

क्या पेनकिलर बन सकती है लाखों मौतों का कारण?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एक पेनकिलर लाखों मौतों का कारण बन सकती है या नहीं! 26 मार्च, 1993 को, द न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक बेहद कमजोर सूडानी बच्चे की एक तस्वीर प्रकाशित की थी, जिसको गिद्ध निहार रहा था। बच्चा बच गया था। तस्वीर ने 1994 में पुलित्जर पुरस्कार जीता। फोटोग्राफर केविन कार्टर ने उसी साल आत्महत्या कर ली। 1993 में और भी कुछ हुआ जिस पर ध्यान नहीं दिया गया। 20 साल पुरानी दवा का पेटेंट खत्म हो गया। यह दवा आम दर्द निवारक डिक्लोफेनैक थी, जो वोलिनी, वोवेरन आदि प्रोडक्ट में पाई जाती है। 1993 तक, इसकी आपूर्ति स्विस फार्मा फर्म सिबा-गेइगी (अब नोवार्टिस) द्वारा कंट्रोल की जाती थी, लेकिन पेटेंट खत्म होने के साथ, जेनेरिक उत्पादन शुरू हो गया। कीमतें हर जगह गिर गईं। उदाहरण के लिए, श्रीलंका में, अगस्त 1995 में ब्रांडेड उत्पाद के लिए 8 रुपये के मुकाबले जेनेरिक डिक्लोफेनैक की कीमत 1 रुपये थी। दवा का पशुओं के इलाज में प्रयोग भारत में भी हुआ। आखिरकार, भारतीय जेनेरिक निर्माता डिक्लोफेनैक की कीमत कम कर रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि 1994 में, डिक्लोफेनैक का यूज पशुओं के इलाज में आम हो गया। किसानों ने इसका इस्तेमाल घायल या बीमार जानवरों में चोटों, सूजन और बुखार के इलाज के लिए करना शुरू कर दिया। इसका कारण यह था कि डिक्लोफेनैक सस्ता था, आसानी से उपलब्ध था। खास बात कि यह 15 मिनट में काम करता था।

लेकिन फिर, कुछ ऐसा होने लगा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। भारतीय गिद्ध बड़ी संख्या में मरने लगे। जब तक जानवरों के शवों में गिद्धों की मौत और डिक्लोफेनैक के बीच संबंध का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भारत की गिद्धों की आबादी का लगभग सफाया हो गया। 1990 के दशक की शुरुआत में लगभग 40 लाख से, गिद्ध 2000 के दशक की शुरुआत में दुर्लभ हो गए।

फ्रैंक और सुदर्शन लिखते हैं कि भारत में गिद्धों की संख्या में सबसे तेजी से गिरावट आई है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में कुछ ही वर्षों में लगभग 95% वन्य आबादी गायब हो गई। राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव नेशनल पार्क के आंकड़े बताते हैं कि यह कितनी तेजी से हुआ। 1984 में, पार्क में 353 घोंसले वाले गिद्ध जोड़े देखे गए थे। 1996 में डिक्लोफेनैक के पशुओं के इलाज में उपयोग शुरू होने के दो साल बाद – केवल आधी संख्या ही बची थी। 1999 में, कोई नहीं था। लेकिन यह एक पुरानी कहानी है। अब, शोधकर्ताओं एयाल फ्रैंक और अनंत सुदर्शन की एक नई रिपोर्ट का दावा है कि गिद्धों के नुकसान के कारण अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों की मौत हुई। फ्रैंक और सुदर्शन ने अपने पेपर ‘द सोशल कॉस्ट्स ऑफ कीस्टोन स्पीशीज कोलैप्स: एविडेंस फ्रॉम द डिक्लाइन ऑफ वल्चर इन इंडिया’ में कहा है: गिद्धों का कार्यात्मक विलुप्त होने से मानव मृत्यु दर में 4% से अधिक की वृद्धि हुई। यह एक बहुत बड़ा बदलाव नहीं लग सकता है, लेकिन हम यहां मानव जीवन की बात कर रहे हैं, कार के माइलेज की नहीं। अगर किसी देश में हर साल 100,000 लोग मरते हैं, तो 4% का बदलाव का मतलब है 4,000 अतिरिक्त मौतें। रिसर्चस का दावा है कि 2000 और 2005 के बीच “औसतन 104,386 अतिरिक्त मौतें” हुईं। उन्होंने इन अतिरिक्त मौतों से देश को हुए आर्थिक नुकसान का भी अनुमान लगाया है। इससे देश को प्रति वर्ष लगभग 70 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।

इंसानों ने चीतों को विलुप्तता की ओर धकेल दिया। बिना किसी गंभीर परिणाम के बाघों को विलुप्तता की कगार पर ला दिया। फिर गिद्धों के लगभग विलुप्त होने से इतना नुकसान क्यों हुआ? इस सवाल का जवाब फ्रैंक और सुदर्शन के पेपर के शीर्षक में ‘कीस्टोन’ शब्द में छिपा है। वे गिद्धों को एक आधारशिला या कीस्टोन प्रजाति के रूप में वर्णित करते हैं क्योंकि अगर उन्हें हटा दिया जाता है, तो इको सिस्टम पर प्रभाव संभावित रूप से बड़ा होता है। यह अतिशयोक्ति नहीं है। एक पल के लिए, कार्टर की सूडानी बच्चे की तस्वीर पर वापस जाएं। गिद्ध उसकी मौत का इंतजार क्यों कर रहा था? इसका उत्तर है: गिद्ध शिकारी नहीं, बल्कि सड़ा हुआ मांस खाने वाले जीव के रूप में विकसित हुए हैं। हालांकि कभी-कभी आप उनके बारे में अफवाहें सुनते हैं कि वे पशुओं को मार देते हैं।

लाखों टन मांस को पर्यावरण से हटाकर, गिद्धों ने न केवल रोगजनकों के प्रसार को रोका बल्कि चूहों और जंगली कुत्तों जैसे अन्य सफाई करने वालों की संख्या को भी कम किया जो घातक रेबीज वायरस फैलाते हैं। फ्रैंक और सुदर्शन का कहना है कि जैसे-जैसे गिद्धों की आबादी कम होती गई, वैसे-वैसे शहरों और गांवों के बाहर ‘जानवरों के कब्रिस्तान’ उभरने लगे। शवों को जमीन में गहराई से दबाना या जलाना महंगा था, इसलिए उन्हें देश में विभिन्न हिस्सों में आबादी से दूर बाहरी इलाकों में फेंक दिया जाता था। कभी-कभी, शवों को पानी में फेंक दिया जाता था, या सड़ते हुए शरीरों से निकलने वाले तरल पदार्थ नदियों, तालाबों और झीलों में बह जाते थे।

फ्रैंक और सुदर्शन ने गिद्धों की आबादी में गिरावट से पहले और बाद में मृत्यु दर की सावधानीपूर्वक जांच की। अपने विश्लेषण के लिए, उन्होंने अलग-अलग उन क्षेत्रों का अध्ययन किया जिनमें मूल रूप से बड़ी गिद्ध आबादी थी, और जिनमें नहीं थी। डेटा से पता चला कि 1988 और 1993 के बीच गिद्धों के लिए अनुपयुक्त क्षेत्रों में मामूली रूप से अधिक मृत्यु दर (प्रति 1,000 लोगों पर 1.2 अतिरिक्त मौत) थी। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि कम गिद्धों वाले क्षेत्र – ठंडे और सूखे स्थानों – में सड़ते हुए शवों की समस्या थी जिससे बीमारी और मौत हुई। लेकिन जब 1996 में गिद्धों की संख्या में नाटकीय रूप से गिरावट आई, तो उन क्षेत्रों में मृत्यु दर जो हमेशा बड़ी गिद्ध आबादी वाले थे। ऐसे में प्रति 1,000 लोगों पर 0.65 मौतें” बढ़ गईं।

आखिर किस मिशन के लिए इसरो और नासा हुए एक?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इसरो और नासा किस मिशन के लिए एक हुए हैं! इसरो ने अमेरिका के साथ मिलकर स्पेस मिशन के लिए अपने अंतरिक्ष यात्री को चुना गया है। इसरो ने इंडो यूएस स्पेस मिशन के लिए ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को चुना है। शुक्ला मुख्य मिशन पायलट होंगे। वहीं, ग्रुप कैप्टन प्रशांत नायर बैकअप के रूप में काम करेंगे। भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक अमेरिकी मिशन के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करेंगे। इसरो ने अमेरिकी एजेंसी के साथ अंतरिक्ष उड़ान समझौते (एसएफए) पर हस्ताक्षर किए हैं। जानते हैं आखिर ये समझौता क्या है। भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक अमेरिकी मिशन के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करेंगे। इसरो ने वास्तव में एक्सिओम स्पेस के साथ एक अंतरिक्ष उड़ान समझौते (एसएफए) पर हस्ताक्षर किए हैं। एक्सिओम स्पेस नासा की तरफ से संबद्ध सर्विस प्रोवाइडर है। यह यह समझौता आई.एस.एस. के आगामी एक्सिओम-4 मिशन के लिए है। यह समझौता भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) भेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसरो के अनुसार नियुक्त चालक दल के सदस्यों को बहुपक्षीय चालक दल संचालन पैनल की तरफ से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उड़ान भरने की मंजूरी दी जाएगी। यह स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ता है, इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी रुचि पैदा करने की संभावना है। संभावित रूप से स्पेस एक्सप्लोरेशन में भविष्य के संयुक्त उपक्रमों का रास्ता खोलेगा।ये गगनयात्री अगस्त, 2024 के पहले सप्ताह से मिशन के लिए अपना प्रशिक्षण शुरू करेंगे। मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ आईएसएस पर साइंटिफिक रिसर्च और टेक्नोलॉजी प्रदर्शन प्रयोग करेंगे। इसके साथ ही अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल होंगे।

एक्सिओम-4 मिशन के तहत ही भारतीय अंतरिक्ष यात्री आईएसएस जाएंगे। यह नासा का चौथा निजी अंतरिक्ष यात्री मिशन है। इसे प्राइवेट अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस मैनेज कर रही है। मिशन के तहत आईएसएस के साथ चौदह दिनों तक डॉक करने की उम्मीद है। पिछले साल जब एक्सिओम-4 मिशन की घोषणा की गई थी, तो नासा ने कहा था कि एक्स-4 चालक दल के सदस्य अपनी उड़ान के लिए नासा, अंतरराष्ट्रीय भागीदारों और स्पेसएक्स के साथ ट्रेनिंग करेंगे। एक्सिओम स्पेस ने स्पेसएक्स के साथ लॉन्च प्रोवाइड कराने के लिए कॉन्ट्रेक्ट किया है।नासा की वेबसाइट के अनुसार यह मिशन इस साल अगस्त से पहले संभव नहीं हो सकेगा। इसमें अंतरिक्ष स्टेशन से ट्रांसपोर्टेशन के लिए, और प्राइवेट अंतरिक्ष यात्रियों को ड्रैगन अंतरिक्ष यान के लिए सिस्टम, प्रक्रियाओं और आपातकालीन तैयारी से परिचित कराना शामिल है।

इसरो कहा कि मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल होंगे। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि इस मिशन के दौरान प्राप्त अनुभव भारतीय मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए फायदेमंद होंगे। इससे इसरो और नासा के बीच मानव अंतरिक्ष उड़ान सहयोग भी मजबूत होगा। यह सहयोग भारत के स्पेस एक्सप्लोरेशन प्रयासों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ता है, इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी रुचि पैदा करने की संभावना है। संभावित रूप से स्पेस एक्सप्लोरेशन में भविष्य के संयुक्त उपक्रमों का रास्ता खोलेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले साल वाशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद कहा था कि भारत और अमेरिका 2024 में एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजने के लिए सहयोग कर रहे हैं। पिछले साल ही नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान कहा था कि अंतरिक्ष एजेंसी 2024 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के मिशन के लिए एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को ट्रेनिंग देगी। बता दें कि इसरो के अनुसार नियुक्त चालक दल के सदस्यों को बहुपक्षीय चालक दल संचालन पैनल की तरफ से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उड़ान भरने की मंजूरी दी जाएगी। ये गगनयात्री अगस्त, 2024 के पहले सप्ताह से मिशन के लिए अपना प्रशिक्षण शुरू करेंगे। एक्सिओम-4 मिशन के तहत ही भारतीय अंतरिक्ष यात्री आईएसएस जाएंगे। यह नासा का चौथा निजी अंतरिक्ष यात्री मिशन है। इसे प्राइवेट अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस मैनेज कर रही है।मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ आईएसएस पर साइंटिफिक रिसर्च और टेक्नोलॉजी प्रदर्शन प्रयोग करेंगे। नासा की वेबसाइट के अनुसार यह मिशन इस साल अगस्त से पहले संभव नहीं हो सकेगा।

क्या देश में फिर से बढ़ रहे हैं डेंगू के मामले?

वर्तमान में देश में फिर से डेंगू के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं !देश में बढ़ रहे डेंगू के केस को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने शुक्रवार को डेंगू की स्थिति को लेकर उच्च स्तरीय बैठक की। इस बैठक में राज्यों को सलाह दी गई कि मॉनसून के इस सीजन में डेंगू से बचाव के साथ-साथ अस्पताल में तैयारियों में कोई कमी न हो। बारिश का मौसम आते ही डेंगू का खतरा बढ़ जाता है और ऐसे मे जरूरी है कि सभी जागरूक रहे। राज्यों के नगर निगमों को भी कहा गया है कि लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाएं और पानी का जमाव न हो, इस पर ध्यान दिया जाए। स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों को कहा है कि हॉट स्पॉट की खास निगरानी की जाए, जहां पर डेंगू के फैलने का ज्यादा खतरा होता है। अस्पतालों में डेंगू से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए विशेष बेड्स का इंतजाम हो। मॉनसून के मौसम से पहले एहतियाती कदम उठाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों की जरूरत है, जब डेंगू के मामले आमतौर पर अगस्त, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के आसपास चरम पर होते हैं। बैठक में बताया गया कि पिछले चार वर्षों में साल दर साल मामले बढ़ रहे हैं। हालांकि डेंगू के मामले आमतौर पर अक्टूबर में चरम पर होते हैं लेकिन इस साल के रुझान से पता चलता है कि 31 जुलाई 2024 तक मामलों की संख्या पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में सतर्कता बरतने की बहुत जरूरत है।

दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, यूपी, पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के साथ- साथ विभिन्न राज्यों के नगर निगमों के अधिकारियों ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया। अगस्त- सितंबर में डेंगू के काफी केस देखने को मिलते हैं और कई राज्यों में डेंगू के केस बढ़ भी रहे हैं। इस वर्ष पिछले साल की तुलना में डेंगू के मामलों में इजाफा देखा जा रहा है। एडीज मच्छर के काटने से डेंगू व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां होती हैं। स्कूल के लिए भी राज्यों को एडवाइजरी भेजी जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार ने जांच किट के लिए राज्यों को हर प्रकार की आवश्यक सहायता प्रदान की है और फॉगिंग तथा सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) कार्यों के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से कहा है कि केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा।

एडीज मच्छर के काटने से डेंगू व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां होती हैं। स्कूल के लिए भी राज्यों को एडवाइजरी भेज रहे हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की यूनिफॉर्म ऐसी हो, जिसमें उनका ज्यादातर तन ढका हो ताकि मच्छर न काट सकें। केंद्रीय अस्पतालों में विशेष वॉर्ड में 24 घंटे डॉक्टर रहे। एक सेंट्रल हेल्पलाइन शुरू करने को कहा गया है। राज्य भी अगले चार- पांच दिनों में हेल्पलाइन शुरू करें ताकि डेंगू के बारे में जानने या मदद की जरूरत हो, तो उस व्यक्ति को मदद मिल सके। बैठक में यह बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय समेत सभी के सहयोग से डेंगू से होने वाली मौतों की संख्या में कमी आई है। स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने कहा कि 1996 में डेंगू से मृत्यु दर 3.3 प्रतिशत थी, जो 2023 में घटकर 0.17 प्रतिशत रह गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार ने जांच किट के लिए राज्यों को हर प्रकार की आवश्यक सहायता प्रदान की है और फॉगिंग तथा सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) कार्यों के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। बता दें कि जब डेंगू के मामले आमतौर पर अगस्त, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के आसपास चरम पर होते हैं। बैठक में बताया गया कि पिछले चार वर्षों में साल दर साल मामले बढ़ रहे हैं।

हालांकि डेंगू के मामले आमतौर पर अक्टूबर में चरम पर होते हैं लेकिन इस साल के रुझान से पता चलता है कि 31 जुलाई 2024 तक मामलों की संख्या पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में सतर्कता बरतने की बहुत जरूरत है।स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से कहा है कि केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा। स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा।

आखिर कैसा है देश के मौसम का मिजाज ?

आज हम आपको बताएंगे कि देश के मौसम का मिजाज आखिर कैसा है! दिल्ली-NCR से लेकर यूपी बिहार तक में सावन झूमकर बरस रहा है। बीते कुछ दिनों से राजधानी में रोजाना हो रही बारिश से मौसम काफी सुहावना हो गया और उमस भी काफी कम हो गई है। वहीं अन्य राज्यों में भी बारिश ने गर्मी को मात दे दी है लेकिन पहाड़ों पर बारिश का विकराल रूप देखने को मिल रहा है। पहाड़ों पर बारिश लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है।बता दें कि हिमाचल प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड के भी लोगों का बारिश ने बुरा हाल कर दिया है। यहां पर मौसम कब पलटी मार जाए कोई नहीं बता सकता है। आज के लिए भी IMD ने उत्तरकाशी के जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने देहरादून समेत चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और नैनीताल में येलो अलर्ट जारी किया है। हिमाचल प्रदेश में तो बादल फटने से काफी नुकसान हुआ है। वहीं उत्तराखंड में नदियां उफान पर हैं। आइए जानते हैं आज कैसा रहेगा देशभर का मौसम। दिल्ली में वीकेंड की शुरुआत बारिश के साथ होने वाली है।

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार दिल्ली में आज बादल छाए रहेंगे जो गरजने के साथ बरस भी सकते हैं। बुधवार को हुई झमाझम बारिश की वजह से राजधानी का मौसम कूल-कूल हो गया है। ऐसे में दिल्लीवासियों के इस वीकेंड में उमस कोई दखल नहीं देगी। वहीं आज राजधानी का अधिकतम तापमान 34 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26 डिग्री रहने की उम्मीद है। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले तीन-चार दिनों तक दिल्ली में रिमझिम बारिश होती रहेगी।

दिल्ली के साथ ही यूपी में भी बारिश का दौर चल पड़ा है लेकिन अच्छी बारिश के लिए उत्तर प्रदेश के लोगों को थोड़ा इंतजार करना पडे़गा। मौसम विभाग ने आज भी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में बारिश की संभावना जताई है। IMD ने आज यूपी के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, संतरबिदासनगर व आसपास इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। वहीं बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, हापुर, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, कासगंज, एटा, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, बिजनौर, अमरोहा में बारिश के साथ ही बिजली गिरने की भी चेतावनी दी है।

हिमाचल प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड के भी लोगों का बारिश ने बुरा हाल कर दिया है। यहां पर मौसम कब पलटी मार जाए कोई नहीं बता सकता है। आज के लिए भी IMD ने उत्तरकाशी के जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने देहरादून समेत चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और नैनीताल में येलो अलर्ट जारी किया है। बीते कुछ दिनों से उत्तराखंड के कई जिलों में भारी बारिश हो रही है।

बिहार में भी मॉनसून मेहरबान होता दिख रहा है। मौसम विभाग ने बिहार के नौ जिलों के लिए अगले 36 घंटे के दौरान आंधी और आकाशीय बिजली गिरने और भारी बारिश होने का ‘रेड अलर्ट’ जारी किया है। वहीं अरवल, बेगूसराय, भागलपुर, गया, जमुई, जहानाबाद, कैमूर, कटिहार, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, नालंदा, नवादा, रोहतास और शेखपुरा जैसे जिलों के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ भी जारी किया। IMD के अनुसार अगले दो-तीन दिन में औरंगाबाद, बांका, भागलपुर, गया, जमुई, कटिहार, मुंगेर, नवादा और रोहतास जिलों में अलग-अलग स्थानों पर बादल गजरने के साथ बरस भी सकते हैं।

यही नहीं दिल्ली में दो दिनों से बारिश नहीं हो रही है लेकिन राजधानी में ठंड़ी हवाओं का जोर देखने को मिल रहा है। मौसम विभाग की मानें तो आज दिल्ली के कुछ इलाकों में बारिश पड़ सकती है। आज दिल्ली का अधिकतम तापमान 34 डिग्री और न्यूनतम तापमान 27 डिग्री रहने की संभावना है जो कल के तापमान से अधिक है। वहीं इस सप्ताह के अंत तक दिल्ली का अधिकतम तापमान गिरकर 31 डिग्री सेल्सियस पर आ सकता है। मैदानी ही नहीं पहाड़ी इलाकों में भी बारिश की वजह से लोग काफी परेशान हैं। मौसम विभाग ने उत्तराखंड में अगले 3-4 दिनों के लिए भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। IMD के अनुसार अगले चार-पांच दिन उत्तराखंड के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। इसके साथ ही राज्य के दो जिलों देहरादून और बागेश्वर में मंगलवार से भारी बारिश हो सकती है। वहीं उत्तरकाशी, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली, नैनीताल, पौड़ी और टिहरी में लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। IMD ने बारिश का अलर्ट जारी करते हुए लोगों से अपील की गई है कि वे फिलहाल पहाड़ों की यात्रा करने से बचें।

आखिर क्या है सुप्रीम कोर्ट में आया नया दूसरी पत्नि का पेंशन केस?

आज हम आपको सुप्रीम कोर्ट में आया नया दूसरी पत्नी का पेंशन केस के बारे में जानकारी देने वाले हैं ! सुप्रीम कोर्ट ने एक अनोखे मामले में दूसरी पत्नी को पेंशन देने का फैसला सुनाया है। मामला इसलिए भी खास है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई बार कह चुका है कि पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करना गैरकानूनी है। जस्टिस संजीव खन्ना, संजय कुमार और आर. महादेवन की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के एक कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी की मौत के बाद उसकी दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए अर्जी दी थी, जिसे कंपनी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह शादी गैरकानूनी थी। महिला ने इसके बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लगभग 23 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा कि महिला की ‘पत्नी’ के रूप में स्थिति पर कोई विवाद नहीं है, सिवाय इसके कि उसने उस व्यक्ति से तब शादी की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीनों एक साथ रहते थे। कोर्ट ने मामले के तथ्यों को बहुत ही असामान्य बताते हुए अपने स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए महिला को राहत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि हम मानते हैं कि जय नारायण महाराज और राधा देवी, 20 अप्रैल 1984 को राम सवारी देवी (पहली पत्नी) की मौत के बाद एक-दूसरे के साथ रहे। एक-दूसरे की देखभाल की। राधा देवी को इस उम्र में ‘पत्नी का दर्जा’ देने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जो उन्हें पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने का अधिकार देता है। यह उन्हें सम्मान के साथ जीने और आर्थिक रूप से हेल्प में सहयोग करेगा। ऐसी परिस्थितियों में, मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और पूर्ण न्याय करने के लिए कोर्ट ने फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हैं और निर्देश देते हैं कि राधा देवी को पेंशन मिलेगी। 1 जनवरी 2010 से आज तक या 31 दिसंबर को या उससे पहले पारिवारिक पेंशन का भुगतान किया जाएगा। उन्हें अपनी मृत्यु तक पारिवारिक पेंशन मिलेगी। जय नारायण महाराज साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड में काम करते थे और 1983 में रिटायर हुए थे। उनकी पहली पत्नी का देहांत 1984 में हुआ था और 2001 में उनका निधन हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद, उनकी दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए आवेदन किया था, जिसे कंपनी ने खारिज कर दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी महिला को राहत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राधा देवी को पेंशन देने का आदेश दिया है।

यही नहीं जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि शादी एक पवित्र बंधन है जिसके कानूनी पहलू और सामाजिक मान्यता होती है। हमारी संस्कृति में नैतिकता को बहुत महत्व दिया जाता है। लेकिन समय के साथ हम पश्चिमी सभ्यता को अपना रहे हैं जो कि हमारी संस्कृति से अलग है। भारत का एक वर्ग लिव-इन रिलेशनशिप को अपना रहा है। जस्टिस मौदगिल ने ये बात एक ऐसे मामले में कही जिसमें एक लिव-इन कपल ने सुरक्षा की मांग की थी।इस मामले में एक 40 साल से ज़्यादा उम्र की महिला और 44 साल से ज़्यादा उम्र के पुरुष ने याचिका दायर की थी। दोनों ने अपने परिवार वालों से जान का खतरा बताया था। दोनों ने कोर्ट से सुरक्षा की मांग करते हुए कहा था कि परिवार वाले उनके रिश्ते में दखल न दें। इस मामले में महिला का पहले से तलाक हो चुका है जबकि पुरुष शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं। दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं और लिव-इन में रहना चाहते हैं।

कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी नहीं माना जा सकता। सिवाय इसके कि उसने उस व्यक्ति से तब शादी की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीनों एक साथ रहते थे। कोर्ट ने मामले के तथ्यों को बहुत ही असामान्य बताते हुए अपने स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए महिला को राहत दी।दोनों का रिश्ता शादी की तरह नहीं है क्योंकि इसमें शादी जैसे गुण नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर इस रिश्ते को शादी माना गया तो ये उस पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय होगा जो इस रिश्ते के खिलाफ हैं।

आखिर बारिश के चलते क्यों हो रही है प्रशासन की लापरवाही?

वर्तमान में बारिश के चलते प्रशासन की लापरवाही देखी जा सकती है! राजधानी दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में पिछले हफ्ते एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में डूबने से 3 छात्रों की मौत हो गई। ये मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ कि विश्वस्तरीय दिल्ली में बारिश के पानी में डूबने से 2 और मौतें हो गईं। बुधवार को मूसलाधार बारिश के बाद दिल्ली की सड़कें दरिया का रूप ले लीं। गाजीपुर इलाके में भारी जलजमाव में डूबने से 22 साल की एक महिला और उसके 3 साल के बेटे की मौत हो गई। ये हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है। गुरुवार को राजस्थान की राजधानी जयपुर में भारी बारिश के बाद बेसमेंट में डूबने से 3 लोगों की मौत हो गई।

देहरादून में आर्मी से रिटायर्ड शख्स समेत 2 की डूबने से मौत हो गई। दिल्ली से सटे गुरुग्राम में राह चलते करंट लगने से 3 जिंदगियां खत्म हो गईं। सोचकर देखिए कि दुनिया की उभरती महाशक्तियों में खुद को गिन रहा देश, दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देश, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश, विश्वगुरु बनने का सपना देखने वाला देश, 2047 तक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने को लालायित देश…और उसकी राजधानी में मौसमी बरसात के पानी में डूबने से जिंदगियां चली जा रही हैं।डिसिल्टिंग के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं लेकिन अक्सर काम सिर्फ कागजों में होता है। बारिश के पानी की निकासी के लिए बनने वालीं स्टॉर्म वॉटर ड्रेन मिट्टी, कूड़े और कचरे से चोक रहती हैं। ऊपर से स्टॉर्म वॉटर ड्रेन से ही सीवेज लाइन को भी कनेक्ट कर दिया जाता है, इससे समस्या और बढ़ती है। बाकी शहरों का भी वही हाल है। जरा सी बारिश क्या हुई, सड़कें तालाब बन जाती हैं। सड़कें दरिया बन जाती हैं। स्विमिंग पूल बन जाती हैं।मौत का ट्रैप बन जाती हैं। क्या पता पानी के नीचे कोई मेनहोल खुला हो जिसमें राह चलता शख्स समा जाए। क्या पता पानी के भीतर तारों के मकड़जाल से निकलकर छिपा हुआ कोई तार मौत बनकर इंतजार कर रहा हो। कुछ भी हो सकता है। हो सकता क्या है, हो रहा है।

आखिर जरा सी बारिश में हमारे शहर घंटों तक तालाब में क्यों तब्दील हो जाते हैं? इसके लिए दोषी सरकारें तो हैं ही, हम भी कम नहीं हैं। अतिक्रमण की वजह से नालियां तक पाट दी जाती हैं। चोक कर दी जाती हैं। बढ़ते शहरीकरण की अंधी दौड़ में कुकुरमुत्तों की तरह नई-नई अवैध कॉलोनियां उग जाती हैं। अनियमित कॉलोनियां। जहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। अवैध कॉलोनियां बसती भी तो ऐसे हैं। न सड़क, न नाली। वोट बैंक की वजह से सियासी चुप्पी और नौकरशाही के करप्शन या फिर लापरवाही की वजह से ऐसी कॉलोनियां उगती ही जाती हैं।

दुनिया की बड़ी ताकतों में शुमार होने का दम भरने वाला देश अपने शहरों में प्रॉपर ड्रेनेज सिस्टम तक नहीं बना पा रहा। शहरों से पानी ड्रेनेज लाइन के जरिये नदियों तक छोड़ा जाता है। लेकिन आम तौर पर ड्रेनेज सिस्टम ब्लॉक रहते हैं। मॉनसून से पहले गाद नहीं निकलता। डिसिल्टिंग के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं लेकिन अक्सर काम सिर्फ कागजों में होता है। बारिश के पानी की निकासी के लिए बनने वालीं स्टॉर्म वॉटर ड्रेन मिट्टी, कूड़े और कचरे से चोक रहती हैं। ऊपर से स्टॉर्म वॉटर ड्रेन से ही सीवेज लाइन को भी कनेक्ट कर दिया जाता है, इससे समस्या और बढ़ती है।

भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। शहरों पर लोड बढ़ रहा लेकिन उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर उस लोड को सहने लायक नहीं रहते। बता दें कि सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देश, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश, विश्वगुरु बनने का सपना देखने वाला देश, 2047 तक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने को लालायित देश…और उसकी राजधानी में मौसमी बरसात के पानी में डूबने से जिंदगियां चली जा रही हैं। यही नहीं मौत का ट्रैप बन जाती हैं। क्या पता पानी के नीचे कोई मेनहोल खुला हो जिसमें राह चलता शख्स समा जाए। क्या पता पानी के भीतर तारों के मकड़जाल से निकलकर छिपा हुआ कोई तार मौत बनकर इंतजार कर रहा हो। कुछ भी हो सकता है। इन्हीं सबका नतीजा है जरा सी बारिश से सड़कों पर सैलाब और उनमें दम तोड़तीं जिंदगियां। आखिर कब जागेंगे हम? एक देश के तौर पर। एक समाज के तौर पर। एक व्यक्ति के तौर पर। आखिर कब जागेंगे हम?