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जानिए कहानी क्रांतिकारी वीर राव तुलाराम की!

आज हम आपको क्रांतिकारी वीर राव तुलाराम की कहानी सुनाने जा रहे हैं! इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट से नई दिल्ली की तरफ आने पर पड़ता है राव तुला राम मार्ग। इस नाम पर बस सड़क ही नहीं, फ्लाईओवर, अस्पताल, कॉलेज और इमारतें भी हैं। राव तुला राम वह क्रांतिकारी हीरो हैं, जिन्होंने देश की आजादी के पहले संग्राम में अहम रोल अदा किया। उनका जन्म रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था, 9 दिसंबर 1825 को। तब रेवाड़ी को अहिरवाल का लंदन भी कहा जाता था, जहां राव तुला राम के पिता राव पूर्ण सिंह का राज था। उनकी रियासत आज के दक्षिण हरियाणा में फैली थी, जिसमें करीब 87 गांव थे। राव तुला राम महज 14 साल के थे जब उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें सिंहासन संभालना पड़ा। लेकिन अंग्रेजों की नजर भी गद्दी पर थी और उन्होंने धीरे-धीरे आधी रियासत पर कब्जा जमा लिया। अपनी जमीन वापस पाने के लिए राव तुला राम ने सेना तैयार करनी शुरू कर दी।

इस बीच 1857 की क्रांति भड़क गई। राव तुला राम और उनके चचेरे भाई गोपाल देव ने अहिरवाल का नेतृत्व संभाल लिया। राव तुला राम को दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर का भी साथ मिला। उन्होंने हरियाणा में अंग्रेजों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। 17 मई 1857 को राव तुला राम 400 से 500 लोगों के साथ रेवाड़ी की तहसील पहुंचे और सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया। काबुल में उनका शाही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। रामपुरा गांव में आज भी उनके वंशज रहते हैं।अपना हेडक्वॉर्टर बनाने के लिए उन्होंने रामपुरा गांव को चुना। उन्होंने रेवाड़ी के लोगों से दान और कर्ज लेकर पांच हजार लोगों की सेना तैयार कर ली। 2 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स को राव तुला राम को हराने के लिए भेजा गया।

राव तुला राम को अंदाजा हो गया था कि रामपुरा के मिट्टी के किले में ब्रिटिश सेना को रोक पाना मुमकिन नहीं। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया। राव तुला राम के सैनिक बहादुरी से डटे रहे, मगर उनकी हार हुई। लेकिन वह वहां से निकलने में कामयाब रहे।इसलिए उन्होंने किला छोड़ दिया। शोवर्स ने राव तुला राम के पास पैगाम भेजा कि अगर वह सरेंडर कर दें तो उनके साथ बेहतर सलूक किया जाएगा। राव तुला राम ने यह ऑफर ठुकरा दिया और आजादी की शर्त सामने रखी। इस बात से गुस्साए अंग्रेजों ने 10 नवंबर 1857 को एक और बड़ी सेना भेज दी। इस बार जबरदस्त तोपखाने के साथ कर्नल जेरार्ड को कमान सौंपी गई।

कर्नल जेरार्ड की सेना नारनौल की तरफ बढ़ रही थी। रास्ता रेतीला था। अंग्रेजी सेना नसीबपुर के मैदान के पास पहुंची थी, तभी राव तुला राम की सेना ने हमला बोल दिया। अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया। राव तुला राम के सैनिक बहादुरी से डटे रहे, मगर उनकी हार हुई। लेकिन वह वहां से निकलने में कामयाब रहे।

जख्मी राव तुला राम पहले राजस्थान पहुंचे, जहां इलाज कराने के बाद वह तात्या टोपे की सेना में शामिल हो गए। तात्या टोपे की सेना की भी जब हार हुई, तो वह पहले ईरान गए और फिर अफगानिस्तान। बता दें कि जिसमें करीब 87 गांव थे। राव तुला राम महज 14 साल के थे जब उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें सिंहासन संभालना पड़ा। लेकिन अंग्रेजों की नजर भी गद्दी पर थी और उन्होंने धीरे-धीरे आधी रियासत पर कब्जा जमा लिया। अपनी जमीन वापस पाने के लिए राव तुला राम ने सेना तैयार करनी शुरू कर दी। वहां उन्होंने भारत की आजादी के लिए मदद मांगी। अफगानिस्तान के शासक को उन्होंने मदद के लिए तैयार भी कर लिया था, लेकिन डिसेंट्री (पेचिश) की वजह से इतनी तबीयत बिगड़ी कि 23 सितंबर 1863 को काबुल में ही राव तुला राम का निधन हो गया। राव तुला राम को अंदाजा हो गया था कि रामपुरा के मिट्टी के किले में ब्रिटिश सेना को रोक पाना मुमकिन नहीं। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया।काबुल में उनका शाही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। रामपुरा गांव में आज भी उनके वंशज रहते हैं।

क्या हवाई जहाज पर नहीं होता है बिजली गिरने का असर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हवाई जहाज पर बिजली गिरने का असर नहीं होता है! बिहार में हाल ही में आसमानी बिजली गिरने से कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई है। कहीं पशुपालक तो कहीं किसान ने जान गंवाई है। बिजली की चपेट में आने से आरा में 3, जहानाबाद में 4, रोहतास में 3, औरंगाबाद में 4 और गया में 1 व्यक्ति की जान चली गई। मरने वालों में बच्चे और महिलाएं भी हैं। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में बिजली गिरने की घटनाएं हाल के दिनों में बढ़ी हैं। बीते जून से लेकर जुलाई के दौरान देश भर में बिजली की चपेट में आने से कम से 150 से ज्यादा लोगों की मौत की रिपोर्ट दर्ज की गई हैं। भारी बारिश के दौरान आसमानी बिजली आफत बनकर टूटती है, जिसमें फसलें और पेड़-पौधे नष्ट हो जाते हैं। वहीं, कई इंसानों की जान तक चली जाती है। आइए- समझते हैं कि क्या है आसमानी बिजली, यह कितनी घातक है। एक रिपोर्ट के अनुसार, एक आसमानी बिजली में औसतन 10,000 वोल्ट जितना करंट होता है। वहीं, एक बिजली का तापमान 54 हजार डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच सकता है। यानी यह हमारे सूर्य के सतह के तापमान से 5 गुना ज्यादा गर्म हो सकता है। आमतौर पर आसमानी बिजली की रफ्तार गोली से 30 हजार गुना तेज होती है। ब्रिटेन की वेबसाइट मेट ऑफिस के अनुसार, दुनिया में हर साल 140 करोड़ बिजली आसमान से गिरती है। यानी 1 दिन में औसतन 30 लाख बिजली धरती पर गिरती है। बिजली गिरने की रफ्तार इतनी तेज होती है कि यह चंद्रमा पर 55 मिनट में पहुंच सकती है। यानी दिल्ली से देहरादून तक जाने में इसे महज 1.5 सेकेंड ही लगेंगे।

लंदन स्थित मौसम विभाग की एक स्टडी के अनुसार, दुनियाभर में हेलीकॉप्टरों की वजह से भी काफी बिजली गिरती है। दरअसल, आसमान में उड़ते वक्त हेलीकॉप्टर निगेटिव चार्जेज को सोखते हैं। ऐसे में अगर ये हेलीकॉप्टर ऐसे इलाकों से गुजरते हैं जहां बादल पॉजिटिव रूप से चार्ज हों तो वहां पर आसमानी बिजली गिरने की आशंका बढ़ जाती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सना रहमान के अनुसार, आकाशीय बिजली को अक्सर साइलेंट किलर भी कहा जाता है। क्योंकि इससे हर साल होने वाली मौतें लू, बाढ़, भूस्खलन और चक्रवात से भी ज्यादा हैं। इसके बाद भी इस बारे में ज्यादा चर्चा नहीं होती और न ही यह अखबारों या न्यूज चैनलों की सुर्खियां बन पाती है। चूंकि, बिजली गिरने का समय और जगह अलग-अलग होती है, ऐसे में शायद इसे प्राकृतिक आपदा भी नहीं माना जाता है।

हमारी धरती के वायुमंडल में जब विद्युत आवेश डिस्चार्ज होता है तो उससे पैदा हुई गड़गड़ाहट यानी थंडरिंग को गाज या आसमानी बिजली कहते हैं। दुनिया में हर साल 140 करोड़ आसमानी बिजली पैदा होती है। इसे सबसे पहले 1872 में वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने पहचाना था, जिन्होंने पहली बार बिजली चमकने की सटीक वजह बताई थी। उन्होंने बताया कि आकाश में बादल छाने के दौरान उसमें मौजूद पानी की छोटी-छोटी बूंदों में मौजूद कण हवा की रगड़ से चार्ज हो जाते हैं। कुछ बादलों पर पॉजिटिव तो कुछ पर निगेटिव चार्ज आ जाता है। जब ये दोनों तरह के चार्ज वाले बादल मिलते हैं तो उनके मिलने से लाखों वोल्ट की बिजली पैदा होती है। एक बिजली में 10 हजार वोल्ट जितना करंट पैदा होता है।

आसमानी बिजली से एक बार 1.60 लाख ब्रेड सेंकी जा सकती है। अगर ग्लोबल वॉर्मिंग पर लगाम समय रहते नहीं लगाई गई तो साल 2100 में आज के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा बिजली गिरने की आशंका रह सकती है। आसमान में उड़ने वाले प्लेन पर भी बिजली गिरती है, मगर इन पर इसका असर नहीं होता है। दरअसल, 1963 के बाद हवाई जहाजों पर बिजली गिरने से कोई हादसा नहीं हुआ है, क्योंकि अब प्लेन को खास तरीके से डिजाइन किया जाता है, जिससे बिजली इसे नहीं छूती है। ज्यादातर प्लेन एल्युमिनियम के बने होते हैं जो बिजली को प्लेन के बाहरी हिस्से पर चारों ओर फैला देते हैं और अंदर नहीं जाने देते हैं। प्लेन की ईंधन टंकी को भी बिजली के खतरनाक प्रवाह से गुजार दिया जाता है, ताकि किसी तरह की विस्फोट की आशंका न रहे।

छत्तीसगढ़ शासन के लाइटनिंग मैनेजमेंट मैगजीन के अनुसार, बिजली गिरने की सबसे ज्यादा आशंका दोपहर में होती है। यह इंसान के सिर, गले और कंधे पर सबसे ज्यादा असर करती है। इसमें एक्सरे होती है। आसमान से गिरने वाली बिजली करीब 5 किलोमीटर तक लंबी हो सकती है। बिजली की रफ्तार ध्वनि से कई गुना तेज होती है। यही वजह है कि हमें गिरती हुई बिजली पहले दिखाई देती है और उसकी गड़गड़ाहट बाद में सुनाई देती है। अगर बारिश न हो रही हो और बादल भी न हो, तो भी आप बिजली से सुरक्षित नहीं है, क्योंकि बिजली तूफान के सेंटर से 3 मील दूर तक गिर सकती है।

आरक्षण के लिए क्या बोले सुप्रीम कोर्ट के जज?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने आरक्षण के लिए एक बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से एससी-एसटी में कोटे के अंदर कोटे को मंजूरी दे दी है। यानी एससी-एसटी कोटे में उप-वर्गीकरण (सब कैटेगरी) किया जा सकता है। सात जजों की संविधान पीठ ने ईवी चिन्नैया के 2004 के फैसले को पलट दिया। उस फैसले में अनुसूचित जातियों के भीतर कुछ उप-जातियों को विशेष लाभ देने से इनकार किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पंकज मिथल ने कहा कि आरक्षण किसी वर्ग की पहली पीढ़ी के लिए ही होना चाहिए। जस्टिस मिथल ने आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा करने का आह्वान किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या दूसरी पीढ़ी सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। जस्टिस मिथल से स्पष्ट रूप से कहा कि आरक्षण किसी वर्ग में केवल पहली पीढ़ी के लिए होना चाहिए। यदि दूसरी पीढ़ी आ गई है तो आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही राज्य को यह देखना चाहिए कि आरक्षण के बाद दूसरी पीढ़ी सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आई है या नहीं। इस मामले में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र मिश्रा शामिल थे।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्थापित हो चुका है कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जाति एक ‘विषम वर्ग है, न कि समरूप’। एससी एसटी समुदाय के लोग अक्सर व्यवस्थागत भेदभाव के कारण सीढ़ी चढ़ने में सक्षम नहीं होते हैं। अनुच्छेद 14 जाति के उप वर्गीकरण की अनुमति देता है। कोर्ट को यह जांच करनी चाहिए कि क्या वर्ग समरूप है और किसी उद्देश्य के लिए एकीकृत नहीं किए गए वर्ग को आगे वर्गीकृत किया जा सकता है, राज्यों को एससी और एसटी में ‘क्रीमी लेयर’ की पहचान करनी चाहिए और उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना चाहिए। अनुसूचित जातियों में से कुछ को होने वाली कठिनाइयों और पिछड़ेपन का सामना प्रत्येक जाति द्वारा अलग-अलग तरीके से किया जाता है। ईवी चिन्नैया का फैसला गलत है। यह तर्क दिया गया कि कोई पार्टी राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए किसी उप जाति को आरक्षण दे सकती है, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। अंतिम उद्देश्य वास्तविक समानता का एहसास करना होगा। जैसा कि न्यायिक घोषणाओं में माना गया है।, इसे अनुभवजन्य डेटा द्वारा समर्थित होना चाहिए। जब कोई व्यक्ति किसी डिब्बे में चढ़ता है, तो वह दूसरों को उस डिब्बे में चढ़ने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश करता है। केवल सामाजिक न्याय के कारण उन्हें लाभ मिला है, लेकिन जब राज्य उन लोगों को लाभ देने का फैसला करता है जिनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। मैंने 1949 में डॉ. अंबेडकर के भाषण का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक हमारे पास सामाजिक लोकतंत्र नहीं होगा, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र का कोई फायदा नहीं है।

राज्य संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित अनुसूचित जाति सूची के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। राज्यों की सकारात्मक कार्यवाही संविधान के दायरे के भीतर होनी चाहिए। आरक्षण प्रदान करने के राज्य के नेक इरादों से उठाए कदम को भी अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट द्वारा उचित नहीं ठहराया जा सकता है। मैं बहुमत के फैसले से सम्मानपूर्वक असहमत हूं। इस मामले में, बिना किसी कारण के ईवी चिन्नैया पर पुनर्विचार करने का संदर्भ दिया गया और वह भी फैसले के 15 साल बाद। संदर्भ ही अपने आप में गलत था। विधायी शक्ति के अभाव में, राज्यों के पास जातियों को उप-वर्गीकृत करने और अनुसूचित जाति के सभी लोगों के लिए आरक्षित लाभों को उप-वर्गीकृत करने की कोई क्षमता नहीं है।

शीर्ष अदालत ‘ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ मामले में 2004 के पांच-जजों की संविधान पीठ के फैसले पर फिर से विचार करने के संदर्भ में सुनवाई कर रही थी। इसमें यह कहा गया था कि एससी और एसटी सजातीय समूह हैं। फैसले के मुताबिक, इसलिए, राज्य इन समूहों में अधिक वंचित और कमजोर जातियों को कोटा के अंदर कोटा देने के लिए एससी और एसटी के अंदर वर्गीकरण पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं। शीर्ष अदालत ने 2004 में फैसला सुनाया था कि सदियों से बहिष्कार, भेदभाव और अपमान झेलने वाले एससी समुदाय सजातीय वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनका उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। अब सुप्रीम ने इस फैसले को पलट दिया है। पीठ 23 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें से मुख्य याचिका पंजाब सरकार ने दायर की थी। याचिका में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

क्या मोदी सरकार पर उठ गया है मिडिल क्लास का भरोसा ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार का मिडिल क्लास पर भरोसा उठ गया है या नहीं! मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अब मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ अधिक पड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में देश को अमृत काल की ओर ले जाने का वादा किया था, लेकिन पिछले हफ्ते मोदी सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए इस वादे को किनारे करते हुए मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ बढ़ा दिया है। मोदी सरकार ने शेयर बाजार में निवेश, प्रॉपर्टी की बिक्री पर टैक्स नियमों में बदलाव किए हैं, जिससे मिडिल क्लास के हाथों में कम पैसे बचेंगे। वहीं अमीरों पर बोझ लग्जरी सामानों पर ज्यादा टैक्स लगाकर किया गया है लेकिन वे दुबई और सिंगापुर से खरीदारी करके इसे आसानी से टाल सकते हैं। मोदी सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मकसद टैक्स सिस्टम को आसान बनाना है, लेकिन मिडिल क्लास को लग रहा है कि उन पर टैक्स का बोझ और बढ़ा दिया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले बजट भाषण में अमृत काल शब्द का इस्तेमाल तक नहीं किया, जबकि पिछले दो सालों में उन्होंने अपने भाषणों में कई बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था। शायद यह सही ही था क्योंकि अब मोदी सरकार को संसद में पहले जैसा बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में मोदी का वादा अब सपना नहीं, बल्कि एक चुनौती बन गया है। समृद्धि का स्वर्णिम दौर तो अपने आप आ जाएगा, लेकिन फिलहाल मिडिल क्लास, जो प्रधानमंत्री के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है, उन्हें ज्यादा टैक्स चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।

कोरोना महामारी के बाद से शेयर बाजार में निवेश एक राष्ट्रीय जुनून बन गया है। अब इस पर ज्यादा सख्ती से टैक्स लगाया जाएगा। यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब सरकार लंबे समय के निवेश पर भी मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में लेगी, जिसमें बायबैक से होने वाला मुनाफा भी शामिल है। इसके साथ ही, प्रॉपर्टी की बिक्री पर महंगाई के मुकाबले इंडेक्सेशन बेनिफिट को भी खत्म कर दिया गया है, जिससे लोगों को कम टैक्सेबल प्रॉफिट दिखाने का मौका मिलता था। हालांकि, कैपिटल गेन टैक्स को 20% से घटाकर 12.5% कर दिया गया है। लेकिन यह राहत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ज्यादातर बड़े शहरों में, जो लोग एक या दो दशक पहले खरीदी गई प्रॉपर्टी को बेचने की योजना बना रहे हैं, उन्हें टैक्स चुकाने के बाद उम्मीद से कम पैसे मिलेंगे। उनके लिए कम से कम इतना तो किया जा सकता था कि 2019 से पहले होने वाले कैपिटल गेन को टैक्स फ्री कर दिया जाता।

1988 में ब्रिटेन ने भी ऐसा ही तरीका अपनाया था। उनका मानना था कि काम और संपत्ति से होने वाली आय पर समान रूप से टैक्स लगना चाहिए। सरकार का कहना है कि उसका मकसद टैक्स सिस्टम को आसान बनाना है, न कि ज्यादा राजस्व कमाना। लेकिन संपत्ति रखने वाले लोग इन बदलावों को इसी नजरिए से देख रहे हैं। तथाकथित ‘ऑक्टोपस क्लास’ यानी लगभग 10 लाख सुपर-एलीट खर्च करने वालों के लिए 10 लाख रुपये से ज्यादा कीमत वाले हैंडबैग, घड़ियों और अन्य लग्जरी सामानों पर विदहोल्डिंग टैक्स लगेगा। यह 18% से 28% के माल और सेवा कर (जीएसटी) के अलावा होगा। हालांकि, अमीर लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए दुबई और सिंगापुर जा सकते हैं।

इस साल के टैक्स कोड में हुए बदलावों से मिडिल क्लास काफी परेशान है। कुल कर राजस्व में व्यक्तिगत कर का योगदान पहले ही 30% है, जो कंपनियों द्वारा दिए गए 26% से ज्यादा है। भारत में 10 में से 8 काम करने वालों को नियमित वेतन नहीं मिलता है। जो लोग नौकरी करते हैं, उनमें से 10% से भी कम लोग 50,000 रुपये प्रति माह से ज्यादा कमाते हैं। मोदी उन लोगों से और कितना पैसा वसूलना चाहते हैं, जो अमृत काल पर विश्वास करते हुए महंगाई के बीच गुजारा करने के लिए कर्ज में डूबते जा रहे हैं। क्रेडिट कार्ड और अन्य असुरक्षित कर्ज सहित खुदरा कर्ज अब उद्योगों को वर्किंग कैपिटल या विस्तार के लिए दिए जाने वाले बैंक कर्ज से 1.5 गुना ज्यादा है। इस बीच, कंपनियों के लिए कम कर व्यवस्था नए निवेश को प्रोत्साहित नहीं कर रही है। 2019 में दी गई एक बड़ी छूट, जिसकी कीमत सरकारी खजाने को 100 अरब डॉलर पड़ी, ने कॉर्पोरेट मुनाफे को तो बढ़ाया है, लेकिन इससे रोजगार सृजन में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

2020 में, केंद्र सरकार ने निर्माताओं के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहनों के रूप में और 24 अरब डॉलर की पेशकश की थी। लेकिन इससे अब तक केवल 8,50,000 नौकरियां ही पैदा हुई हैं। जबकि भारत को हर साल 80 लाख नौकरियों की जरूरत है। हालिया केंद्रीय बजट में, सरकार ने नौकरियों और इंटर्नशिप के लिए 24 अरब डॉलर की पेशकश की, जिसमें आखिरकार उस रोजगार संकट को स्वीकार किया गया, जिसने मोदी के वोटों में सेंध लगाई। 2014 और 2019 में, गरीबों की तुलना में अमीर और मध्यम वर्ग के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने मोदी का समर्थन किया था। मोदी के अमीर समर्थकों को उस समय कोई दिक्कत नहीं हुई, जब उन्होंने 2016 में देश की 86% नकदी पर रातोंरात प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ महीनों बाद जीएसटी जिस तरीके से लागू किया उससे छोटी कंपनियां उत्पादन नेटवर्क से बाहर हो गईं।

2020 में कोरोना महामारी के दौरान लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं। इस आपदा में भी मिडिल क्लास पर तगड़ी मार पड़ी। इन सबके बावजूद मिडिल क्लास ने मोदी के पक्ष में वोट किया। कुछ महीने पहले चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री विपक्ष पर मुस्लिमों के बीच पुनर्वितरण के लिए निजी संपत्ति को छीनने की साजिश रचने का आरोप लगा रहे थे। अब वह क्या कर रहे हैं और उनके फैन क्लब को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है – चाहे अमृत काल आए या न आए।

क्या प्रधानमंत्री पर चन्नी की शिकायत का पड़ेगा कोई प्रभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रधानमंत्री पर चन्नी की शिकायत का क्या प्रभाव पड़ेगा! पंजाब के जालंधर से कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को चिट्टी लिखकर अपील की है कि वो प्रधानमंत्री के खिलाफ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की अनुमति दें। चन्नी का कहना है कि केंद्रीय मंत्री और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर के भाषण की कुछ बातें लोकसभा की कार्यवाही से हटा दी गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने हटाए गए शब्दों को भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर साझा किया है। कांग्रेस सांसद ने संसदीय कार्यवाही के नियमों का हवाला देकर कहा है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा करके विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। तो सवाल है कि अब आगे क्या होगा? दरअसल, लोकसभा की कार्यवाही की नियम पुस्तिका में एक अध्याय विशेषाधिकार प्रस्ताव से संबंधित है। रूलबुक में वर्णित नियम संख्या 222 में कहा गया है, ‘कोई भी सदस्य, लोकसभा अध्यक्ष की सहमति से किसी दूसरे सदस्य या लोकसभा या किसी समिति के खिलाफ विशेषाधिकार उल्लंघन का प्रस्ताव ला सकता है।’ नियम 225(1) में कहा गया है कि अगर लोकसभा अध्यक्ष नियम 222 के तहत विशेषाधिकार प्रस्ताव के नोटिस से सहमत होते हैं तो वो सदन की कार्यवाही के दौरान नोटिस देने वाले सदस्य को प्रस्ताव लाने की अनुमति दे सकते हैं। उनके कहने पर नोटिस देने वाला सदस्य अपनी सीट पर खड़ा होकर प्रस्ताव के बारे में संक्षिप्त बयान दे सकता है। लेकिन अगर लोकसभा अध्यक्ष ने नोटिस को अस्वीकार कर दिया और प्रस्ताव से सहमति नहीं जताई तो वो सदन में अपने आसन से अपना फैसला सुना सकते हैं।समिति अपनी रिपोर्ट में यह भी बता सकती है कि उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए। ऐसा करते वक्त वो सदस्य का दिया नोटिस पढ़ सकते हैं और आखिर में यह बता सकते हैं कि इसे ठुकरा दिया गया है।

मान लीजिए कि अगर लोकसभा स्पीकर चरणजीत सिंह चन्नी का नोटिस स्वीकार कर लेते हैं और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की अनुमति देते हैं तो क्या होगा? नियम 225(1) कहता है कि लोकसभा अध्यक्ष नोटिस में कही गई बातों से सहमत होते हैं तो वो किसी भी वक्त प्रस्ताव लाने की अनुमति दे सकते हैं। नियम 225(2) कहता है कि अगर अनमुति दी जाने पर आपत्ति की जाए तो अध्यक्ष अनुमति दिए जान के पक्ष वाले सदस्यों को अपनी सीट पर खड़े होने को कह सकते हैं। अगर ऐसे सदस्यों की संख्या कम से कम 25 हुई तो अध्यक्ष कहेंगे कि प्रस्ताव लाने की अनुमति है। अगर 25 से कम सदस्य खड़े हुए तो अध्यक्ष सदन को बताएंगे कि प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। अब नियम 226 कहता है कि अगर प्रस्ताव लाने की अनुमति मिल गई तो लोकसभा में प्रस्ताव पर विचार होगा और तय होगा कि आरोपों की जांच के लिए प्रस्ताव को विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाए।

विशेषाधिकार समिति का एक चेयरपर्सन और 14 सदस्य होते हैं। अगर विशेषाधिकार समिति के पास चरणजीत सिंह चन्नी के प्रस्ताव के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोप की जांच की मांग पहुंचती है तो समिति का दायित्व है कि वह जांच करे और अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे। समिति रिपोर्ट में न केवल यह बताएगी कि चरणजीत सिंह चन्नी का आरोप सही है या गलत बल्कि यह भी बताएगी कि अगर आरोप सही है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए। समिति अपनी रिपोर्ट में यह भी बता सकती है कि उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए।

दरअसल, प्रधानमंत्री भी लोकसभा के एक सदस्य होते हैं। नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से चुनकर आए हैं। प्रधानमंत्री लोकसभा में सदन के नेता होते हैं। प्रधानमंत्री भी लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमों से बंधे हैं। उनके कहने पर नोटिस देने वाला सदस्य अपनी सीट पर खड़ा होकर प्रस्ताव के बारे में संक्षिप्त बयान दे सकता है। लेकिन अगर लोकसभा अध्यक्ष ने नोटिस को अस्वीकार कर दिया और प्रस्ताव से सहमति नहीं जताई तो वो सदन में अपने आसन से अपना फैसला सुना सकते हैं।सदन के नेता की हैसियत से उन्हें बाकी सदस्यों से इतर कुछ अतिरिक्त सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन विशेषाधिकार उल्लंघन के मामले में विशेष छूट हासिल नहीं होती है। इसलिए संसद प्रधानमंत्री को भी उनके असंसदीय आचरण के लिए दंडित कर सकती है।

आखिर पहले ही कैसे की जाती है मौसम की भविष्यवाणी?

आज हम आपको बताएंगे कि पहले ही मौसम की भविष्यवाणी आखिर कैसे की जाती है!केरल के वायनाड में तेज बारिश के बाद लैंडस्लाइड में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। कई लोग घायल हैं और कई लोग अब भी लापता हैं। लैंडस्लाइड सोमवार देर रात चार गांवों में हुई। इनमें घर, पुल, सड़कें और गाड़ियां बह गईं। राहत बचाव का कार्य अब भी जारी है। एनडीआरएफ और सेना भी वहां मौजूद है। वायनाड हादसे पर बुधवार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में दावा किया कि भूस्खलन से सात दिन पहले ही राज्य को चेतावनी दे दी गई थी। उन्होंने कहा कि 24 जुलाई को भी एक और चेतावनी दी गई थी। उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे आधुनिक समय-पूर्व चेतावनी प्रणाली मौजूद है और 2014 के बाद भारत उन तीन-चार देशों में से एक है, जो आपदा से सात दिन पहले ही पूर्वानुमान साझा करते हैं।  मौसम विभाग 24 घंटों में 20 सेमी से अधिक बारिश होने और भारी से अत्यधिक भारी बारिश के लिये रेड अलर्ट जारी करता है, जबकि ऑरेंज अलर्ट का मतलब बहुत भारी बारिश (6 सेमी से 20 सेमी) है। एकत्रित डेटा का विश्लेषण मौसम वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है जो अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर मौसम के पैटर्न की पहचान करते हैं।मौसम पूर्वानुमान विभिन्न माध्यमों जैसे टेलीविजन, रेडियो, समाचार पत्रों और इंटरनेट के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाता है। कई मोबाइल ऐप्स भी मौसम की जानकारी प्रदान करते हैं।कंप्यूटर मॉडल भी डेटा का विश्लेषण करते हैं और भविष्य के मौसम की स्थिति की भविष्यवाणी करते हैं।भारत के पास दुनिया की सबसे आधुनिक समय-पूर्व चेतावनी प्रणाली मौजूद है और 2014 के बाद भारत उन तीन-चार देशों में से एक है, जो आपदा से सात दिन पहले ही पूर्वानुमान साझा करते हैं।

भारत में मौसम का पूर्वानुमान एक जटिल प्रक्रिया है। इसका सही पता लगाने के लिए कई तरह के उपकरणों और तकनीक का उपयोग किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में पहले से सक्षम हुआ है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) यह भारत में मौसम संबंधी सभी गतिविधियों का केंद्र है। यह विभाग देश भर में फैले हुए हजारों मौसम स्टेशनों के नेटवर्क के माध्यम से डेटा एकत्र करता है। ये स्टेशन तापमान, आर्द्रता, वायु दाब, वर्षा, हवा की गति और दिशा जैसे विभिन्न मौसम संबंधी पैरामीटरों को मापते हैं। IMD उपग्रहों से भी डेटा प्राप्त करता है जो बादलों की गतिविधि, समुद्र के तापमान और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

IMD वैश्विक और क्षेत्रीय मौसम मॉडल का उपयोग करता है। ये मॉडल भौतिक नियमों और गणितीय समीकरणों पर आधारित होते हैं। इसके लिए सुपरकंप्यूटरों की आवश्यकता होती है जो बड़ी मात्रा में डेटा का संग्रह करते हैं। इसके बाद डेटा का विश्लेषण मौसम वैज्ञानिक करते हैं। IMD अन्य देशों के मौसम विज्ञान विभागों के साथ सहयोग करता है ताकि वैश्विक मौसम प्रणाली को बेहतर ढंग से समझा जा सके।एकत्रित डेटा का विश्लेषण मौसम वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है जो अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर मौसम के पैटर्न की पहचान करते हैं।कंप्यूटर मॉडल भी डेटा का विश्लेषण करते हैं और भविष्य के मौसम की स्थिति की भविष्यवाणी करते हैं।

मौसम पूर्वानुमान विभिन्न माध्यमों जैसे टेलीविजन, रेडियो, समाचार पत्रों और इंटरनेट के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाता है। कई मोबाइल ऐप्स भी मौसम की जानकारी प्रदान करते हैं।जो आपदा से सात दिन पहले ही पूर्वानुमान साझा करते हैं।  मौसम विभाग 24 घंटों में 20 सेमी से अधिक बारिश होने और भारी से अत्यधिक भारी बारिश के लिये रेड अलर्ट जारी करता है, बता रहे हैं भारत में मौसम का पूर्वानुमान एक जटिल प्रक्रिया है। इसका सही पता लगाने के लिए कई तरह के उपकरणों और तकनीक का उपयोग किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में पहले से सक्षम हुआ है। बता दें कि वायनाड हादसे पर बुधवार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में दावा किया कि भूस्खलन से सात दिन पहले ही राज्य को चेतावनी दे दी गई थी। उन्होंने कहा कि 24 जुलाई को भी एक और चेतावनी दी गई थी। जबकि ऑरेंज अलर्ट का मतलब बहुत भारी बारिश 6 सेमी से 20 सेमी है। IMD लगातार अपने मॉडलों और तकनीकों में सुधार करने के लिए अनुसंधान करता रहता है। IMD अन्य देशों के मौसम विज्ञान विभागों के साथ सहयोग करता है ताकि वैश्विक मौसम प्रणाली को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

आखिर क्या है एयरफोर्स की मल्टी नेशनल जॉइंट एक्सरसाइज?

आज हम आपको एयरफोर्स की मल्टी नेशनल जॉइंट एक्सरसाइज के बारे में जानकारी देने वाले हैं! इंडियन एयरफोर्स अब तक की सबसे बड़ी मल्टी नेशनल जॉइंट एक्सरसाइज कराने जा रही है। यह एक्सरसाइज अगस्त में होगी और दो चरणों में होगी। इसमें अमेरिका, यूके, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस सहित 10 देश अपने एयरक्राफ्ट और एयर एसेस्ट्स लेकर शामिल हो रहे हैं। 17 देश ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल होंगे जिन्होंने आने का कंफर्मेशन दे दिया है। एक और देश ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल होगा। इस तरह इस एक्सरसाइज में भारत सहित 30 देश शामिल होंगे। इस एक्सरसाइज का नाम तरंग शक्ति रखा गया है। एयरफोर्स के वाइस चीफ एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने कहा कि तरंग शक्ति सबसे बड़ी इंटरनेशनल एयर एक्सरसाइज होगी। भारत ने रूस सहित कुल 51 देशों को निमंत्रण भेजा था। उन्होंने कहा कि यह मौका एक दूसरे देश की एयरफोर्स के साथ बेस्ट प्रैक्टिस शेयर करने का होगा। एक्सरसाइज का पहला फेज सुलूर तमिलनाडु में होगा जो 6 अगस्त से 14 अगस्त तक होगा। पहले फेज में फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और यूके की एयरफोर्स अपने एयरक्राफ्ट के साथ शामिल हो रही है। यही नहीं एक दूसरे के ऑपरेशंस पर भरोसा बढ़ेगा और भविष्य में कभी पीस कीपिंग या डिजास्टर रिलीफ में साथ काम करने की जरूरत पड़े तो उसका अनुभव रहेगा। उन्होंने कहा कि इस मल्टीनेशनल एक्सरसाइज से हम अपने देश की प्लानिंग और एक्जिक्यूशन की कैपेबिलिटी भी दिखाएंगे। दूसरा फेज 29 अगस्त से 14 सितंबर तक जोधपुर में होगा जिसमें ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, ग्रीस, सिंगापुर, यूएई और अमेरिका की एयरफोर्स अपने एयर एसेस्ट्स के साथ शामिल होगी।

एयर मार्शल सिंह ने कहा कि इस एक्सरसाइज का मकसद दुनिया को यह दिखाना है कि किस तरह भारत में डिफेंस इकोसिस्टम लगातार बढ़ रहा है, साथ ही भारत के आत्मनिर्भरता की प्रतिबद्धता को भी दिखाना है। हम दूसरे देशों को भारत की स्वदेशी इंडस्ट्री की ताकत भी दिखाएंगे। इसके लिए एग्जिबिशन भी होगा जिसमें डीआरडीओ, भारत की एविएशन इंडस्ट्री, पीएसयू स्वदेशी क्षमता दिखाएंगे।इस एक्सरसाइज का मिलिट्री ऑब्जेक्टिव है कि हमारे इन मित्र देशों के साथ संबंध और मजबूत हों और हम एक दूसरे से बेहतर स्ट्रैटजी और टेक्टिक्स सीखें।पहले फेज में 32 विदेशी एयरक्राफ्ट शामिल होंगे जिसमें फाइटर एयरक्राफ्ट और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी हैं। इसमें भारत के 40 एयरक्राफ्ट शामिल होगें जिसमें एलसीए तेजस, मिराज, सुखोई-30 फाइटर एयरक्राफ्ट भी हैं।

एक्सरसाइज के दूसरे फेज में दूसरे देशों के 27 फाइटर एयरक्राफ्ट, 2 टैंकर, 2 एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम, 3 स्पेशल फोर्स के एयरक्राफ्ट भी शामिल होंगे। यह पहली बार होगा जब एयरफोर्स कई देशों की एयरफोर्स के फाइटर एयरक्राफ्ट को शामिल करते हुए एक साथ एक्सरसाइज को होस्ट करेगा।भारत के फाइटर एयरक्राफ्ट को मिलाकर कुल 40 फाइटर एयरक्राफ्ट होंगे, हेलिकॉप्टर होगा जिसमें प्रचंड, रूद्र, अपाचे भी शामिल होंगे। कुल मिलाकर दूसरे फेज में 75 एयरक्राफ्ट शामिल होंगे। एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने कहा कि ये एक्सरसाइज किसी देश को ध्यान में रखकर नहीं की जा रही है बल्कि इससे अपने मित्र देशों के साथ इंटर ऑपरेबिलिटी (मिलकर काम करना) बढ़ेगी। एक दूसरे के ऑपरेशंस पर भरोसा बढ़ेगा और भविष्य में कभी पीस कीपिंग या डिजास्टर रिलीफ में साथ काम करने की जरूरत पड़े तो उसका अनुभव रहेगा। उन्होंने कहा कि इस मल्टीनेशनल एक्सरसाइज से हम अपने देश की प्लानिंग और एक्जिक्यूशन की कैपेबिलिटी भी दिखाएंगे।

इंडियन एयरफोर्स वैसे तो कई मल्टी नेशनल एक्सरसाइज का हिस्सा रहा है लेकिन एयरफोर्स ने आज तक कोई भी मल्टीनेशनल एक्सरसाइज एक्टिव पार्टिसिपेशन होस्ट नहीं की है। जानकार के लिए बता दे कि यह मौका एक दूसरे देश की एयरफोर्स के साथ बेस्ट प्रैक्टिस शेयर करने का होगा। एक्सरसाइज का पहला फेज सुलूर तमिलनाडु में होगा जो 6 अगस्त से 14 अगस्त तक होगा। बता दें कि इस एक्सरसाइज का मकसद दुनिया को यह दिखाना है कि किस तरह भारत में डिफेंस इकोसिस्टम लगातार बढ़ रहा है, साथ ही भारत के आत्मनिर्भरता की प्रतिबद्धता को भी दिखाना है। हम दूसरे देशों को भारत की स्वदेशी इंडस्ट्री की ताकत भी दिखाएंगे। इसके लिए एग्जिबिशन भी होगा जिसमें डीआरडीओ, भारत की एविएशन इंडस्ट्री, पीएसयू स्वदेशी क्षमता दिखाएंगे। भारत के फाइटर एयरक्राफ्ट को मिलाकर कुल 40 फाइटर एयरक्राफ्ट होंगे, हेलिकॉप्टर होगा जिसमें प्रचंड, रूद्र, अपाचे भी शामिल होंगे। कुल मिलाकर दूसरे फेज में 75 एयरक्राफ्ट शामिल होंगे।पहले फेज में फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और यूके की एयरफोर्स अपने एयरक्राफ्ट के साथ शामिल हो रही है। यह पहली बार होगा जब एयरफोर्स कई देशों की एयरफोर्स के फाइटर एयरक्राफ्ट को शामिल करते हुए एक साथ एक्सरसाइज को होस्ट करेगा।

अपने ऊपर लगे आरोपों पर क्या बोली IAS पूजा खेड़कर?

हाल ही में IAS पूजा खेड़कर ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर बयान दिया है! दिल्ली की एक अदालत धोखाधड़ी और जालसाजी के एक मामले में आरोपी ट्रेनी IAS अधिकारी पूजा खेडकर की अग्रिम जमानत अर्जी पर एक अगस्त को फैसला सुना सकती है। सुनवाई के दौरान खेडकर ने अदालत से कहा कि एक अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश देवेंद्र कुमार जंगला ने बुधवार को खेडकर द्वारा दायर अर्जी पर दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया। खेडकर ने अपने वकील के माध्यम से दायर अर्जी में दावा किया कि उन्हें गिरफ्तारी का खतरा है। अभियोजन पक्ष ने अर्जी का विरोध करते हुए दावा किया कि उन्होंने व्यवस्था को धोखा दिया है। कार्यवाही के दौरान, खेडकर ने कहा कि वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अग्रिम जमानत चाहती हैं। खेडकर की ओर से पेश वकील बीना महादेवन ने अदालत से कहा, मैंने (खेडकर ने) यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है, इसीलिए मेरे खिलाफ यह सब हो रहा है। अभी जांच के बहुत प्रारंभिक चरण में हैं। हमें उनसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत है। अदालत ने जब पूछा कि यदि जांच प्रारंभिक चरण में है तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की जल्दी में क्यों है, तो श्रीवास्तव ने कहा, यदि उन्हें अग्रिम जमानत मिल जाती है तो वह सहयोग नहीं करेंगी।यह सब जिलाधिकारी के इशारे पर हो रहा है, जिनके खिलाफ मैंने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है। उस व्यक्ति ने मुझे एक निजी कमरे में आकर बैठने को कहा। मैंने कहा कि मैं एक योग्य आईएएस हूं और मैं ऐसा नहीं करूंगी। मैं अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अग्रिम जमानत का अनुरोध कर रही हूं।

महादेवन ने अदालत को बताया कि खेडकर ने कोई जानकारी नहीं छिपाई तथा उन्होंने परीक्षा में शामिल होने की संख्या गलत बताई है। उन्होंने कहा, मैंने पांच लिखा था, लेकिन मुझे 12 लिखना चाहिए था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैंने अलग कोटे के तहत उन (परीक्षा में बैठने के) प्रयासों का लाभ उठाया। यह सद्भावना से किया गया था या नहीं, इसकी जांच की जानी चाहिए। वकील ने यह भी कहा कि जांच के तहत खेडकर को कई अधिकारियों ने बुलाया है। उन्होंने कहा, आईएएस अकादमी मसूरी ने मुझे (खेडकर को) बुलाया है, पुणे आयुक्त ने मुझे बुलाया है। डीओपीटी (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) ने भी मुझे नोटिस दिया है। मुझे इन सभी मंचों पर अपना बचाव करने के लिए अग्रिम जमानत की आवश्यकता है। वकील ने कहा कि इस मामले के बाद से मीडिया खेडकर को निशाना बना रहा है, लेकिन वह एक बार भी मीडिया के पास नहीं गईं क्योंकि उन्हें न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा है।

अभियोजन पक्ष ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए दावा किया कि खेडकर ने खामियों का फ़ायदा उठाया और अपना नाम बदल लिया। लोक अभियोजक अतुल श्रीवास्तव ने कहा, हम अभी जांच के बहुत प्रारंभिक चरण में हैं। हमें उनसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत है। अदालत ने जब पूछा कि यदि जांच प्रारंभिक चरण में है तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की जल्दी में क्यों है, तो श्रीवास्तव ने कहा, यदि उन्हें अग्रिम जमानत मिल जाती है तो वह सहयोग नहीं करेंगी।

श्रीवास्तव ने कहा, ओबीसी कोटे में क्रीमी लेयर और नॉन-क्रीमी लेयर की अवधारणा है। उनके (खेडकर के) पिता ने 53 करोड़ रुपये की अपनी संपत्ति घोषित की है। खेडकर की ओर से पेश वकील बीना महादेवन ने अदालत से कहा, मैंने, खेडकर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है, इसीलिए मेरे खिलाफ यह सब हो रहा है। यह सब जिलाधिकारी के इशारे पर हो रहा है, जिनके खिलाफ मैंने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है। उस व्यक्ति ने मुझे एक निजी कमरे में आकर बैठने को कहा।सब जिलाधिकारी के इशारे पर हो रहा है, जिनके खिलाफ मैंने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है। उस व्यक्ति ने मुझे एक निजी कमरे में आकर बैठने को कहा। मैंने कहा कि मैं एक योग्य आईएएस हूं और मैं ऐसा नहीं करूंगी। मैं अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अग्रिम जमानत का अनुरोध कर रही हूं।इससे बचने के लिए उन्होंने दावा किया कि उनके माता-पिता का तलाक हो चुका है और वह अपनी मां के साथ रहती हैं। यह भी जांच का हिस्सा है। हम मेडिकल दस्तावेजों की भी जांच करेंगे।

केंद्र सरकार चाहती है कि राज्यपाल अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं.

भागदौड़ से दूर रहें. नरेंद्र मोदी सरकार राज्यपालों को अधिक सक्रिय भूमिका निभाते देखना चाहती है। राष्ट्रपति के साथ राज्यपालों का दो दिवसीय सम्मेलन आज से राष्ट्रपति भवन में शुरू हो गया है। केंद्र चाहता है कि राज्यपाल ‘जनता के राज्यपाल’ बनें। सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से सीधे संवाद करें। केंद्र राज्यपालों को इस बात के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहता है कि अगर केंद्र और राज्यों के बीच किसी नीतिगत मुद्दे पर कोई विवाद हो तो वे सोशल मीडिया पर खुलकर अपने विचार व्यक्त करें।

पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु जैसे विपक्ष शासित राज्यों ने बार-बार मोदी सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों की भूमिका निभाई है। राज्य विधानसभा से पारित बिल के राज्यपाल के पास अटके रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने राज्यपालों को संदेश दिया है कि उन्हें याद रखना चाहिए कि वे जनता द्वारा चुने गये राष्ट्र प्रमुख नहीं हैं.

आज राष्ट्रपति भवन में राज्यपालों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यपाल को केंद्र और राज्यों के बीच सेतु का काम करना चाहिए. लेकिन राज्यपालों का ‘जनता का राज्यपाल’ बनना सम्मेलन के एजेंडे में है। कहा गया है कि राज्यपालों को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए. राज्यपाल को अमजंता से जुड़े मामलों पर उचित रुख अपनाना चाहिए. जरूरत पड़े तो राज्य सरकार पर दबाव बनाया जाये. हालांकि, सरकारी सूत्रों का दावा है कि सिर्फ विपक्ष शासित राज्यों में ही नहीं बल्कि बीजेपी शासित राज्यों में भी यही बात कही जा रही है.

सम्मेलन में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस शामिल हुए। राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार और उनके बीच टकराव के कारण सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा. सम्मेलन की शुरुआत में अध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा व्यवस्था में सुधार का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने राज्यपालों से राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में इस संबंध में सक्रिय होने को कहा। उन्होंने इस पर भी विचार करने को कहा कि केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियों का राज्य सरकार के साथ समन्वय बढ़ाने में राज्यपाल क्या भूमिका निभा सकते हैं. सम्मेलन में तीन नए कानूनों, भारतीय न्याय संहिता, नागरिक सुरक्षा संहिता और साक्ष्य अधिनियम के कार्यान्वयन पर चर्चा होगी।

मोदी सरकार ने पिछड़े जिलों के लिए ‘आकांक्षी जिला’ योजना के साथ-साथ चीन की सीमा से लगे गांवों को विकसित करने के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज’ योजना शुरू की। केंद्र चाहता है कि राज्यपाल नियमित तौर पर वहां का दौरा करें. आज राष्ट्रपति और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यपालों से इस संबंध में सक्रिय रहने को कहा. देश की महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के संदेश के साथ नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल के बजट में सिर्फ उनके लिए लघु बचत योजनाएं शुरू करने की घोषणा की थी. लेकिन सूत्रों के मुताबिक काफी प्रचार-प्रसार के बावजूद अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली. नतीजतन, केंद्र व्यावहारिक तौर पर इस परियोजना को बंद करने की राह पर चल रहा है.

यह महिला सम्मान बचत प्रमाणपत्र पिछले साल अप्रैल में लॉन्च किया गया था। अवधि दो वर्ष है. एक बार में 2 लाख रुपये तक का निवेश किया जा सकता है. ब्याज दर 7.5% प्रति वर्ष है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह कुछ टैक्स छूट भी प्रदान करता है। हालाँकि, परियोजना को प्रतिक्रिया इतनी कम है कि इसे रोकने का कोई रास्ता नहीं है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के एक सूत्र के मुताबिक, अगले साल मार्च में दो साल की अवधि पूरी करने के बाद बचत प्रमाणपत्र चालू नहीं रहेगा। लगभग वही निर्णय अंतिम होता है. नतीजतन, सवाल उठता है कि कभी महिलाओं को बचत के लिए प्रोत्साहित करने की परियोजना को बढ़ावा देने वाली भाजपा इस स्थिति में क्यों आई है? इसे दो साल बाद ही क्यों देना होगा? देश की महिलाओं को जवाब क्यों नहीं दिया?

वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि महिला बचत प्रमाणपत्र समेत कई छोटी बचत योजनाओं से जितना निवेश आने की उम्मीद थी, उतना नहीं आया है। इसीलिए सरकार ने चालू साल के बजट में इस सेक्टर में फंड जुटाने का लक्ष्य करीब 50 हजार करोड़ कम कर दिया है. पिछले फरवरी में अंतरिम बजट में अनुमान लगाया गया था कि लघु बचत क्षेत्र में केंद्र को कुल 4.67 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे. पिछले महीने पूर्ण बजट में इसे घटाकर 4.20 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था. पिछले (2023-24) वित्तीय वर्ष में इस क्षेत्र में सरकार का पूंजी प्रवाह लक्ष्य से 20 हजार करोड़ रुपये कम था।

निवेश सलाहकार नीलांजन डे ने कहा, ‘आजकल महिलाएं म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में ज्यादा निवेश कर रही हैं। क्योंकि जोखिम शामिल होने के बावजूद रिटर्न की दर बहुत अधिक है। तो कुल मिलाकर, इस प्रकार के ऋण-आधारित निवेश माध्यम के प्रति उत्साह कम होने की प्रवृत्ति है।” उनके अनुसार, कई महिलाएं अब जोखिम नहीं उठाती हैं। इसलिए वे उस 2 लाख रुपये को म्यूचुअल फंड या शेयरों में डालकर अधिक रिटर्न पाने की कोशिश कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि जोखिम है कि उन आय की गारंटी नहीं है। संबंधित हलकों के एक वर्ग के अनुसार, मोदी सरकार के कुछ नेता और मंत्री अब शेयर फंड में निवेश करने का संदेश देते हुए सुने जा सकते हैं। ऊपर से बैंक जमा पर ब्याज थोड़ा बढ़ गया है. यहां तक ​​कि कुछ छोटी बचत से भी अवधि के अंत में अधिक पैसा मिल सकता है। कुल मिलाकर, महिलाओं की बचत दरें कई महिलाओं के लिए आकर्षक नहीं बन पाई हैं। हालाँकि, इस मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई।

टीएमसी नेता ममता बाला ठाकुर ने सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

नए नागरिकता कानून (सीएए) आने के बाद से वह लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। शुक्रवार को राज्यसभा में शून्यकाल में इस बारे में बात करते हुए तृणमूल सांसद ममताबाला ठाकुर ने पेरिस ओलंपिक का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा, देश के 117 प्रतियोगी जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर देश के लिए लड़ रहे हैं. उस उदाहरण को ध्यान में रखते हुए भारतीय नागरिकों को धर्म, भाषा, जाति के आधार पर बांटने की राजनीति बिल्कुल गलत है। इसके बाद उन्होंने दावा किया कि सीएए, नागरिकों से पहचान पत्र दिखाने को कहने की कोशिश भी सही नहीं है. हालांकि, बीजेपी ने उनके इस रुख की कड़े शब्दों में आलोचना की है.

मतुआओं का एक वर्ग हमेशा से नागरिकता कानून की मांग करता रहा है. बीजेपी का केंद्रीय और राज्य नेतृत्व भी इस कानून के पक्ष में है. हाल ही में केंद्र ने लोकसभा चुनाव से पहले इस कानून को लाने का आदेश दिया था. बनगांव और राणाघाट लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों की बड़ी जीत को देखते हुए मटुआरा ने इस कानून के लिए प्रारंभिक समर्थन व्यक्त किया है। हालाँकि, तृणमूल नेता ममता बनर्जी हमेशा कहती रही हैं कि जो लोग इतने लंबे समय से मतदान का अधिकार लगाकर सरकार चुन रहे हैं, उन्हें अलग से यह नागरिकता देने की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्हें यह भी डर है कि जो लोग कागजात नहीं दिखा पाएंगे, वे अपनी नागरिकता खो सकते हैं।

इस दिन, ममताबाला टैगोर ने भी उसी स्वर में कहा, “मतुआओं ने हमेशा बिना शर्त नागरिकता की मांग की है।” सीएए के नाम पर केंद्र की भाजपा सरकार मतुआओं को गुलाम बनाने की कोशिश कर रही है। वे इसे ए, बी और सी श्रेणियों में बांटकर नागरिकता देने की बात कर रहे हैं.” भारतीयों के संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ”भारतीय विशेष हैं, कला, भाषा, धर्म की विविधता में एकता का स्वर हमें समृद्ध करता है. वहीं, ममता बाला ने सीएए की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए कहा, ”नागरिकों को नागरिकता साबित करने के लिए अवास्तविक, भ्रामक कागज दिखाना.” मैं ऐसा कहने के पक्ष में नहीं हूं.

मतुआ समाज के प्रतिनिधि नागरिक काबियाल असीम सरकार ने उनके इस रुख की आलोचना की. फिलहाल वह हरिनघाटा से बीजेपी विधायक हैं. उन्होंने कहा, ”मैं ममताबाला टैगोर से आग्रह करूंगा कि वे द्वंद्व की राजनीति बंद करें. क्योंकि, उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता का कहना है कि जिनके पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड है वही देश के नागरिक हैं. वहीं, ममता बाला का कहना है कि बिना शर्त नागरिकता दी जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे हड़ताल पर चले जायेंगे. तृणमूल की इन दोनों में से कौन सी स्थिति सही है, पहले उन्हें फैसला करने दीजिए।” भाजपा के बंगाण संगठनात्मक जिला अध्यक्ष देवदास मंडल ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि तृणमूल की राज्यसभा सांसद ममता ठाकुर की बेटी मधुपर्णा को अवैध रूप से संविदा डेटा-एंट्री के रूप में अस्थायी नौकरी पर नियुक्त किया गया था। राजनीतिक प्रभाव के माध्यम से हरिचंद गुरुचंद विश्वविद्यालय में संचालक रहे हैं विश्वविद्यालय में लंबे समय से कुलपति नहीं है। देवदास ने आरोप लगाया कि कार्यवाहक रजिस्ट्रार ने नियमों का उल्लंघन कर नियुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं. कोई भर्ती अधिसूचना जारी नहीं की गई या कोई परीक्षा आयोजित नहीं की गई।

ममता ने पलटवार करते हुए कहा, ”मेरी बेटी विश्वविद्यालय के छात्रों के हित में मुफ्त में काम कर रही है.” उस विश्वविद्यालय के कार्यवाहक रजिस्ट्रार आनंदी बागची ने कहा, ”मैं सारा काम नहीं रोक सकता क्योंकि वहां कोई कुलपति नहीं है. मैंने यह नियुक्ति उन छात्रों के बारे में सोचकर की है जो हताश हैं.” ममताबाला टैगोर ने शांतनु टैगोर का नामांकन रद्द करने की मांग की. ऐसा दावा तृणमूल के राज्यसभा सांसद ने शनिवार रात बनगांव में एक संवाददाता सम्मेलन में किया. बनगांव सांगठनिक जिला तृणमूल कार्यालय में बैठीं ममता बाला ने कहा, ”नामांकन पत्र जमा करते समय सही जानकारी दी जानी चाहिए. लेकिन हमें पता चला है कि बीजेपी उम्मीदवार शांतनु ने बहुत सारी गलत और असत्य जानकारी दी है. हम इस मामले को लेकर पहले ही चुनाव आयोग से संपर्क कर चुके हैं।’ कौशिक मलिक नाम का एक व्यक्ति पहले ही शांतनु की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते हुए कई दस्तावेज आयोग को सौंप चुका है। उन्होंने आगे कहा, ”शांतनु ठाकुर के नामांकन में उनकी आय शून्य दिखाई गई है. लेकिन उस शांतनुई ने फिर से चार लाख रुपये इनकम टैक्स जमा कर दिया. यदि हां, तो जिसकी कोई आय नहीं है, उसने आयकर कैसे जमा किया?”