Thursday, March 5, 2026
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क्या अब एनआईए चलाएगी महा अभियान?

आने वाले समय में अब एनआईए महा अभियान चलाने जा रही है! राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल में कार्रवाई की। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस हंगामेदार एक्शन से पहले राज्यों में 34 विशेष लोक अभियोजको की नियुक्ति को मंजूरी दी थी। उनमें से आठ को पश्चिम बंगाल और सात को दिल्ली को आवंटित किया गया, जहां एनआईए का मुख्यालय है। गृह मंत्रालय से जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है, ‘केंद्र सरकार अदालतों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए की ओर से मामलों की पैरवी करने के लिए अधिवक्ताओं को तीन वर्ष की अवधि के लिए विशेष लोक अभियोजक एसपीपी के रूप में नियुक्त करती है।’ एसपीपी स्पेशल एनआईए कोर्टों और हाई कोर्टों में पैरवी करेंगे। नोटिफिकेशन में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मद्रास, मेघालय सहित चरण मैती को गिरफ्तार करने में एजेंसी को कामयाबी मिली है। एनआईए ने आरोप लगाया कि दोनों आरोपियों ने कच्चे बम बनाने की साजिश में सक्रिय रूप से भाग लिया था। एजेंसी के बयान के अनुसार, गिरफ्तार दोनों आरोपियों को कोलकाता में एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया गया।अन्य राज्यों के लिए एसपीपी के नाम भी दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल के लिए जहां पांच एसपीपी के नाम दिए गए हैं, वहीं कोलकाता में एनआईए की विशेष अदालत और उच्च न्यायालय के लिए तीन की नियुक्ति की गई है। एजेंसी पश्चिम बंगाल में बम विस्फोटों, एफआईसीएन जब्ती, इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा की गतिविधियों से संबंधित 18 मामलों की जांच कर रही है। शनिवार को पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले में एनआईए की टीम पर हमला किया गया था, जब वह दिसंबर 2022 में हुए विस्फोट में कथित संलिप्तता के दो प्रमुख आरोपी बलाई चरण मैती और मनोब्रत जाना को गिरफ्तार करने के लिए उनके ठिकानों की तलाशी ले रही थी। उस बम ब्लास्ट में तीन लोग मारे गए थे।

पश्चिम बंगाल पुलिस ने विस्फोट में मारे गए तीनों के खिलाफ 3 दिसंबर, 2022 को प्राथमिकी दर्ज की थी, लेकिन विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं किए गए थे। न्यायालय के लिए तीन की नियुक्ति की गई है। एजेंसी पश्चिम बंगाल में बम विस्फोटों, एफआईसीएन जब्ती, इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा की गतिविधियों से संबंधित 18 मामलों की जांच कर रही है।ध्यान रहे कि भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ सीबीआई केंद्रीय जांच अभिकरण और ईडी प्रवर्तन निदेशालय धड़ाधड़ कार्रवाइयां कर रहा है। अब एनआईए के लिए पैरवीकारों की एकमुश्त हुई नियुक्ति से ऐसा लगता है कि अब आतंकवाद के मामलों में कार्रवाइयां और तेज होने वाली हैं।बाद में अधिनियम की प्रासंगिक धाराओं को लागू करने और मामले को एनआईए को ट्रांसफर करने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई, जिसने 4 जून, 2023 को इसे अपने हाथ में ले लिया और हाई कोर्ट के आदेश पर विस्फोटक पदार्थ अधिनियम सहित कानून की विभिन्न धाराओं के तहत दिल्ली में मामले को फिर से दर्ज किया।

एनआईए ने अपनी जांच के बाद मामले में कई लोगों की संलिप्तता का आरोप लगाया गया है। इनमें नारुआबिला गांव के मनोब्रत जाना और निनारुआ अनलबेरिया के बलाई चरण मैती को गिरफ्तार करने में एजेंसी को कामयाबी मिली है। एनआईए ने आरोप लगाया कि दोनों आरोपियों ने कच्चे बम बनाने की साजिश में सक्रिय रूप से भाग लिया था। एजेंसी के बयान के अनुसार, गिरफ्तार दोनों आरोपियों को कोलकाता में एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया गया।

नारुआबिला गांव में राजकुमार मन्ना के घर में हुए विस्फोट में तीन लोग मारे गए थे। विस्फोट में खुद मन्ना गंभीर रूप से घायल हो गए थे, साथ ही विश्वजीत गायेन और बुद्धदेब मन्ना भी जख्मी हुए थे। बाद में तीनों की मृत्यु हो गई थी। राज्यों के लिए एसपीपी के नाम भी दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल के लिए जहां पांच एसपीपी के नाम दिए गए हैं, वहीं कोलकाता में एनआईए की विशेष अदालत और उच्च न्यायालय के लिए तीन की नियुक्ति की गई है। एजेंसी पश्चिम बंगाल में बम विस्फोटों, एफआईसीएन जब्ती, इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा की गतिविधियों से संबंधित 18 मामलों की जांच कर रही है।पश्चिम बंगाल पुलिस ने विस्फोट में मारे गए तीनों के खिलाफ 3 दिसंबर, 2022 को प्राथमिकी दर्ज की थी, लेकिन विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं किए गए थे।ध्यान रहे कि भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ सीबीआई केंद्रीय जांच अभिकरण और ईडी प्रवर्तन निदेशालय धड़ाधड़ कार्रवाइयां कर रहा है। अब एनआईए के लिए पैरवीकारों की एकमुश्त हुई नियुक्ति से ऐसा लगता है कि अब आतंकवाद के मामलों में कार्रवाइयां और तेज होने वाली हैं।

बंगाल में हुए NIA पर हमले के लिए क्या बोली ममता बनर्जी ?

हाल ही में बंगाल में हुए NIA पर हमले के लिए ममता बनर्जी ने एक बयान दिया है! पश्चिम बंगाल के भूपतिनगर में एनआईए की टीम पर हमला हुआ। तीन माह के भीतर केंद्रीय एजेंसियों की टीम पर हमले की यह दूसरी घटना है। 5 जनवरी को, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और उनके साथ आए सीएपीएफ कर्मियों पर एक हजार से अधिक लोगों के एक समूह ने हमला कर दिया था। उस समय टीम पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखाली में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित नेता शेख शाहजहां के आवास पर छापेमारी और तलाशी के लिए गई थी। इस बार एनआईए की टीम भूपतिनगर में हुए विस्फोट के सिलसिले में लोगों की गिरफ्तारी करने पहुंची थी। पुलिस के अनुसार स्थानीय लोगों ने वाहन को घेर लिया। इसके बाद उस पर पथराव किया। इस संबंध में एनआईए का एक अधिकारी घायल हो गया। एनआईए ने इस संबंध में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। एनआईए ने विस्फोट की जांच से संबंधित दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। शहर की सेशन कोर्ट ने दोनों आरोपियों को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्हें 10 अप्रैल तक एनआईए की हिरासत में भेज दिया। गिरफ्तार किए गए दो टीएमसी नेताओं में से एक के परिवार के सदस्यों की तरफ से केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया। इसके बाद स्थानीय पुलिस स्टेशन में एनआईए के खिलाफ एक जवाबी एफआईआर भी दर्ज की गई है। इस मामले में राजनीति तेज हो गई है। चुनाव से पहले ममता ने स्थानीय लोगों को पक्ष लेते हुए एनआईए टीम पर पहले हमला करने का आरोप लगाया। वहीं, पीएम मोदी ने भी इस मामले में टीएमसी पर अटैक किया। इस बारे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि पूर्व मेदिनीपुर जिले में हमला भूपतिनगर की महिलाओं ने नहीं किया था, बल्कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण के अधिकारियों ने हमला किया था। उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं पर हमला होगा तो क्या महिलाएं शांत बैठी रहेंगी? महिलाओं ने एनआईए अधिकारियों का उनके घरों में जाने का केवल विरोध किया था। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी की सरकार पर चुनाव जीतने के लिए केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल की कोशिश का आरोप लगाया। ममता ने सवाल उठाया कि आखिर चुनाव से पहले ही ये गिरफ्तारियां क्यों की जा रही हैं। बनर्जी ने कहा कि एनआईए, सीबीआई बीजेपी के भाई हैं। ईडी और आईटी विभाग बीजेपी को फंड मुहैया कराने वाले बॉक्स हैं। उन्होंने एक रैली में कहा कि अगर आप बीजेपी में ताकत है, तो चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से लड़कर जीतें। मेरे बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं और चुनाव एजेंट को गिरफ्तार न करें।

एनआईए ने रविवार को तृणमूल कांग्रेस के सभी आरोपों का खंडन किया। केंद्रीय जांच एजेंसी ने कहा कि भूपतिनगर में की गई कार्रवाई वैध थी और कानूनी रूप से अनिवार्य थी। एनआईए ने दोहराया कि उसकी टीम पर अनियंत्रित भीड़ ने हिंसक हमला किया था। उस समय वे जांच के सिलसिले में नरूआबिला गांव में तलाशी के लिए गए थे। एनआईए ने कहा कि हमला पूरी तरह से अकारण और अनावश्यक था। एनआईए को उसके कानूनी कर्तव्यों को पूरा करने से रोकने का एक प्रयास था। केंद्रीय एजेंसी ने यह भी बताया कि स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में और सीआरपीएफ द्वारा प्रदान किए गए सुरक्षा कवर के तहत पांच स्थानों पर तलाशी ली गई। इसमें महिला कांस्टेबल भी शामिल थीं। भूपतिनगर में की गई कार्रवाई कच्चे बमों के निर्माण से संबंधित जघन्य अपराध की चल रही जांच का हिस्सा थी।

पश्चिम बंगाल में रविवार को चुनावी रैली को पीएम मोदी ने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधा। पीएम मोदी ने कहा कि टीएमसी पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार और हिंसा की खुली छूट चाहती है। यही वजह है कि इस तरह के मामलों की जांच कर रही केंद्रीय एजेंसियों को राज्य में हमलों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अपने जबरन वसूली करने वाले और भ्रष्ट नेताओं को बचाने के लिए टीएमसी केंद्रीय जांच एजेंसियों पर हमले करवाती है, जब वे यहां काम करते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस कानून और देश के संविधान की अवहेलना कर रही है। पीएम ने पश्चिम बंगाल में ‘तृणमूल कांग्रेस का सिंडिकेट राज’ होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य में स्थिति ऐसी है कि अदालत को विभिन्न मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। रैली से पहले एक्स पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री ने कहा कि केवल बीजेपी ही पश्चिम बंगाल के लोगों को राहत दे सकती है, तृणमूल कांग्रेस की सरकार के कुशासन से लोग थक गए हैं। प्रधानमंत्री ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर राज्य में गरीबों के लिए केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा डालने का आरोप लगाया।

भूपतिनगर में तीन दिसंबर, 2022 को एक कच्चे घर में विस्फोट हुआ था। विस्फोट में नरूबिला गांव में तीन लोगों की मौत हो गई थी। बाद में मामले की जांच एनआईए को सौंप दी गई थी। घटना दिसंबर 2022 में हुई थी। एजेंसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्देश पर 6 जून 2023 को मामले की जांच अपने हाथ में ले ली थी।

राहुल गांधी के सियासी करियर के लिए क्या बोले प्रशांत किशोर?

हाल ही में प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी के सियासी करियर के लिए एक बयान दिया है! देश के जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर कभी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के करीबी रहे थे। लोकसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि अगर कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मनमाफिक नतीजे नहीं मिलते हैं तो राहुल गांधी को अपने कदम पीछे खींचने पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल में अच्छे नतीजे नहीं आने के बावजूद वह न तो रास्ते से हट रहे हैं और न ही किसी और को आगे आने दे रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरे अनुसार यह भी अलोकतांत्रिक है।’ प्रशांत किशोर ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में बताया उन्होंने विपक्ष को फिर से मजबूत करने के लिए एक योजना तैयार की थी लेकिन उनकी रणनीति को लागू करने के तरीके पर उनके और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेदों के चलते वह अलग हो गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी के राजनीति से दूर रहने और 1991 में पी.वी. नरसिंह राव के कार्यभार संभालने को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘जब आप एक ही काम पिछले 10 वर्ष से कर रहे हैं और सफलता नहीं मिल रही है तो एक ब्रेक लेने में कोई बुराई नहीं है… आपको चाहिए कि पांच साल तक यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप दें। आपकी मां ने ऐसा किया है।’

उन्होंने कहा कि दुनियाभर में अच्छे नेताओं की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि वे जानते हैं कि उनमें क्या कमी है और वे सक्रिय रूप से उन कमियों को दूर करने के लिए तत्पर रहते हैं। किशोर ने कहा, ‘लेकिन राहुल गांधी को ऐसा लगता है कि वह सब कुछ जानते हैं। यदि ऐसा लगता है कि आपको मदद की आवश्यकता नहीं है तो कोई भी आपकी मदद नहीं कर सकता। उन्हें लगता है कि वह सही हैं और वह मानते हैं कि उन्हें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उनकी सोच को मूर्त रूप दे सके। यह संभव नहीं है।’ 2019 के चुनाव में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने सबंधी राहुल गांधी के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वायनाड क्षेत्र के सांसद ने तब लिखा था कि वह पीछे हट जाएंगे और किसी और को दायित्व सौंपेंगे। लेकिन वास्तव में, उन्होंने जो लिखा था उसके विपरीत काम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं का एक वर्ग हालांकि निजी तौर पर यह भी कहता है कि स्थिति वास्तव में विपरीत है और राहुल गांधी वह फैसला नहीं लेते, जो वे चाहते हैं कि राहुल गांधी लें। किशोर ने कहा कि कांग्रेस और उसके समर्थक किसी भी व्यक्ति से बड़े हैं और गांधी को इस बात को लेकर अड़े नहीं रहना चाहिए कि बार-बार अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बावजूद वही पार्टी के लिए उपयोगी साबित होंगे। प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के इस दावे पर सवाल उठाया कि उनकी पार्टी को चुनाव में असफलताओं का सामना इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और मीडिया जैसी संस्थाओं को सरकार अपने प्रभाव में ले रही है। उन्होंने कहा कि यह आंशिक रूप से सच हो सकता है लेकिन पूरा सच नहीं है। उन्होंने कहा कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस की सीटों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी और उस वक्त वह सत्ता में थी और बीजेपी का विभिन्न संस्थानों पर बहुत कम प्रभाव था।

किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि मुख्य विपक्षी दल के कामकाज में ‘संरचनात्मक’ खामियां है और उसे अपनी सफलता के लिए इन खामियों को दूर करना जरूरी है। पार्टी के पतन की कगार पर होने संबंधी दावों के बारे में पूछे जाने पर किशोर ने ऐसे दावों का खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कहने वाले लोग देश की राजनीति को नहीं समझते हैं और इस तरह के दावों में दम नहीं है। किशोर ने कहा, ‘कांग्रेस को केवल एक पार्टी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। देश में इसके वजूद को कभी खत्म नहीं किया जा सकता। यह संभव नहीं है। कांग्रेस ने अपने इतिहास में कई बार खुद को उभारा है।’ उन्होंने कहा कि आखिरी बार ऐसा तब हुआ था जब सोनिया गांधी ने दायित्व संभाला था और इसके बाद 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी।

तापसी पन्नू शादी के बाद बिना पति के पहली बार सार्वजनिक तौर पर नजर आईं.

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तापसी पन्नू ने आधिकारिक तौर पर शादी की कोई तस्वीर जारी नहीं की है. उनका मानना ​​है कि शादी एक निजी मामला है, इसलिए वह इसे ज्यादा सार्वजनिक नहीं करना चाहते। हाल ही में उन्होंने अपने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड बैडमिंटन स्टार माथियास बोवे से शादी की है। शादी समारोह उदयपुर के एक लग्जरी रिसॉर्ट में हुआ। एक्ट्रेस ने बॉलीवुड से सिर्फ गिने-चुने लोगों को ही इनवाइट किया था. इस बार तापसी शादी के बाद पहली बार किसी फंक्शन में पहुंचीं। फोटोग्राफर्स ने उन्हें देखते ही पूछा, ‘क्या बात है, अकेले क्यों?’ सर नहीं आये!” तापसी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

इस स्टार को बॉलीवुड प्रोड्यूसर आनंद पंडित की बेटी की शादी के मौके पर देखा गया था. लाल साड़ी पहने, बालों में जूड़ा, लाल सिरे और उसी रंग में रंगे होंठ। शादी के बाद पहली बार एक्ट्रेस को कैमरे के सामने देखते ही फोटोग्राफर्स ने अपना उत्साह जाहिर किया. जब तापसी से उनके पति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”आप मुझे किसी दिन खतरे में डाल देंगे!” शायद वह अब भी कोहरे में रहना चाहती हैं। हालांकि कुछ दिनों पहले एक्ट्रेस ने शादी को लेकर कहा था, ”मैं नहीं चाहती थी कि जिस तरह कोई मशहूर शख्स शादी करके लोगों की चर्चा का विषय बनता है. मुझे यकीन नहीं था कि अगर लोगों को पता चला तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। इसलिए मैंने यह बात अपने तक ही सीमित रखी।”

कुछ दिनों पहले तापसी पन्नू ने अपने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड बैडमिंटन स्टार मैथियास बो से शादी की है। हालांकि, एक्ट्रेस ने कहा कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर शादी की कोई तस्वीर जारी नहीं की है. साधारण तरीके से शादी हुई. लेकिन शादी को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों? तापसी ने हाल ही में इस बारे में खुलकर बात की।

एक्ट्रेस के मुताबिक, ”मैं नहीं चाहती थी कि मेरी निजी जिंदगी और मेरी निजी जिंदगी से जुड़े लोगों को उस तरह का अनुभव हो जिस तरह एक सेलिब्रिटी शादी करता है और शहर में चर्चा का विषय बन जाता है। मेरे साथी या रिश्तेदारों से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह पूरी तरह से मेरा निर्णय है। मुझे यकीन नहीं था कि अगर लोगों को पता चला तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। इसलिए मैंने इसे अपने तक ही सीमित रखा।” दीपिका से लेकर आलिया तक, रोशनाई शाही शादी में हर जगह मौजूद हैं। फिर तापसी अचानक उल्टी राह पर चल पड़ीं क्यों? आपने खास दिन पर फैन्स से दूरी क्यों बनाए रखी?

तापसी ने कहा, ”मैं शादी को किसी भी तरह से सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी। फिर, अपनी शादी का आनंद लेने के बजाय, आपको इस बात की चिंता करनी होगी कि लोग क्या कह रहे हैं। मैं इस बारे में चिंता नहीं करना चाहता कि बाहर के लोग कैसा महसूस करते हैं। कम से कम शादी में तो मैं इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकती. संभवतः, जीवन में एक बार मिलने वाली चीज़।”

हालांकि, तापसी शादी समारोह को पूरी तरह प्राइवेट नहीं रखना चाहती थीं। उनके शब्दों में, “जो लोग वास्तव में मेरे करीब हैं वे उत्सव का हिस्सा थे। उन्हें भी मेरे रिश्ते के बारे में पता था. उन्हें शुरू से ही पता था कि शादी कब और कैसे करनी है.” तापसी पन्नू कर रही हैं शादी! यह खबर मंगलवार रात सूत्रों के जरिए सामने आई। ऐसी खबर थी कि अभिनेत्री मई में अपने लंबे समय के बॉयफ्रेंड बैडमिंटन स्टार मैथियास बोवे के साथ शादी के बंधन में बंध रही हैं। हालांकि, न तो तापसी और न ही उनके बॉयफ्रेंड मैथ्यूज ने खुद आधिकारिक तौर पर कुछ भी घोषित किया है। इस बार एक्ट्रेस ने शादी को लेकर खुलकर बात की है. उन्होंने साफ कर दिया कि वह अपनी निजी जिंदगी के बारे में बिल्कुल भी बात करने को इच्छुक नहीं हैं. वह नहीं चाहता कि उनका अभ्यास किया जाये। तो क्या अब तापसी नहीं कर रही शादी? सवाल उठता है.

तापसी और डेनमार्क के बैडमिंटन खिलाड़ी माथियास करीब 10 साल से रिलेशनशिप में हैं। इतने सालों के प्रेम संबंध के बाद भी उन्होंने कभी किसी प्रेमी को इस तरह सबके सामने नहीं लाया। एक्ट्रेस ने कुछ महीने पहले पहली बार अपने रिश्ते पर मुहर लगाई थी. तापसी हमेशा से ही अपनी जिंदगी को लेकर काफी शांत रही हैं। वह अभिनय संबंधी खबरों को छोड़कर अपने जीवन को गुप्त रखना पसंद करते हैं। तापसी को निजी जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बारे में बात करते नहीं सुना गया। नतीजतन, कई लोग यह सुनने के लिए उत्सुक थे कि अभिनेत्री की शादी की खबर सामने आने के बाद तापसी क्या कहती हैं। तापसी ने इस बारे में बात की. लेकिन उन्होंने इस बात को लेकर अटकलें छोड़ दीं कि एक्ट्रेस शादी कर रही हैं या नहीं.

भारतीय सेना ने सिक्किम में एलएसी के पास एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल का प्रशिक्षण अभ्यास किया.

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भारतीय सेना चीनी टैंक हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार है, भारतीय सेना चुनाव से पहले सिक्किम सीमा के पास टैंक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए डीआरडीओ की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) ‘नाग’ के तीसरे संस्करण का उपयोग करने की योजना बना रही है। लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है। इस बीच भारतीय सेना ने सिक्किम में चीनी सीमा के पास युद्ध प्रशिक्षण और अभ्यास शुरू कर दिया है. संयोग से, 19 अप्रैल को सिक्किम में लोकसभा और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले!

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना की त्रि-शक्ति कोर ने सिक्किम में एलएसी के पास करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर युद्ध अभ्यास शुरू किया है. इस अभ्यास में मुख्य रूप से सेना की पूर्वी कमान की ‘मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री’ बटालियन हिस्सा ले रही हैं। अभ्यास का मुख्य उद्देश्य हिमालय से घिरी ऊंची घाटियों में चीनी टैंक हमलों को रोकने की तैयारी करना है।

हल्के टैंकों की कमी की पहचान तब की गई जब अगस्त 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी हमले के बाद संभावित चीनी हमले की आशंका के बीच सैनिकों को एलएसी पर जल्दी से तैनात किया गया, जिसमें 20 भारतीय सैनिक मारे गए। डीआरडीओ द्वारा निर्मित ‘अर्जुन’ या रूसी टी-90 (भीष्म), टी-72 (अजेय) भारी वजन के कारण लद्दाख या सिक्किम के पहाड़ी इलाकों में लड़ने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। दूसरी ओर, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पास ZTQ-15 लाइट टैंक है।

ऐसे में भारतीय सेना को चीनी टैंकों का मुकाबला करने के लिए 1980 के दशक में रूस से लाए गए बीएमपी-2 ‘इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल’ (बख्तरबंद वाहन) पर निर्भर रहना पड़ा। ऐसे में भारतीय सेना टैंक रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) नाग के तीसरे संस्करण के उपयोग पर जोर देना चाहती है। यह अभ्यास इसी उद्देश्य के लिए है.

संयोग से, ‘नाग’ उन पांच मिसाइलों में से एक है जिन्हें डीआरडीओ ने अस्सी के दशक में ‘एकीकृत मिसाइल विकास परियोजना’ के तहत विकसित करना शुरू किया था। इस परियोजना के अंतर्गत शेष मिसाइलें अग्नि, पृथ्वी, आकाश और त्रिशूल हैं। अग्नि, पृथ्वी और आकाश पहले से ही सेना के हाथों में हैं। ‘त्रिशूल’ प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया है. डीआरडीओ ने परीक्षणों के दौरान कई बार नाग का आधुनिकीकरण किया है। नाग के नए संस्करण को मिसाइल वाहक या लड़ाकू जेट से लॉन्च किया जा सकता है। जमीन से दागे जाने पर यह 500 मीटर से 4 किमी की दूरी तक टैंक को नष्ट कर सकता है। आसमान से दागे जाने पर यह सात से 10 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती है।

देश में केंद्र सरकार द्वारा संचालित आर्मी स्कूलों का निजीकरण किया जा रहा है। और एमओयू पर हस्ताक्षर के दौरान बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठनों या व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जा रही है! कांग्रेस ने हाल ही में ऐसी शिकायत की थी. पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर शिकायत की कि “सैनिक स्कूलों का राजनीतिकरण करने का प्रयास किया जा रहा है।” हालांकि केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने कांग्रेस के आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि एमओयू पर हस्ताक्षर के लिए चयन प्रक्रिया में कोई राजनीतिक या वैचारिक प्रभाव नहीं है।

2021 में केंद्र सरकार ने सैनिक स्कूलों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी या पीपीपी मॉडल पर चलाने का फैसला किया। राष्ट्रपति को लिखे पत्र में खड़गे ने दावा किया कि केंद्र ने गैर-सरकारी संगठनों के साथ जिन 40 एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं, उनमें से 62 प्रतिशत भाजपा, आरएसएस और संघ परिवार से प्रभावित संगठन या व्यक्ति हैं। खड़गे ने दावा किया कि एक मुख्यमंत्री का परिवार, कुछ भाजपा विधायक, आरएसएस नेता भी उस सूची में हैं।

कांग्रेस इस संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) पर एक जांच रिपोर्ट पेश कर रही है। इसलिए, उन्होंने मांग की कि केंद्र इस निजीकरण नीति को वापस ले और “राष्ट्रीय हित” में एमओयू को रद्द कर दे। खड़गेड़ का दावा है कि अगर केंद्र ने अपना फैसला नहीं बदला तो सैनिक स्कूलों का समन्वयकारी चरित्र खत्म हो जाएगा. राष्ट्रपति मुर्मू को लिखे दो पन्नों के पत्र में खड़गे ने लिखा, “भारतीय लोकतंत्र सेना को किसी भी तरह की राजनीति से दूर रखता है। पहले भी भारत सरकार ने सेना और उसके अधीनस्थ संस्थानों को किसी भी राजनीतिक विचारधारा से दूर रखा है.”

भारत ने ईरान और इज़राइल की यात्रा न करने की सलाह दी.

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अमेरिकी खुफिया सूत्रों के मुताबिक, ईरान 48 घंटे के अंदर इजरायल पर हमला कर सकता है। वह खबर सामने आते ही इस बार भारत सरकार हिल गई. विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर भारतीयों को ईरान और इजराइल की यात्रा न करने की सलाह दी.

विदेश मंत्रालय ने भारतीयों के ईरान-इजराइल जाने पर रोक लगाने के साथ ही उन दोनों देशों में रह रहे भारतीयों को भी चेतावनी दी है. इजराइल और ईरान में रहने वाले भारतीयों को सलाह दी जाती है कि वे तुरंत भारतीय दूतावास से संपर्क करें। उन्हें अपना नाम दर्ज कराने के लिए भी कहा गया है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत सरकार इजरायल और ईरान में भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है. नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें सावधान रहने की सलाह दी.

ईरान हमास के साथ इजरायल के संघर्ष में शामिल है। हालाँकि इज़राइल और ईरान अभी तक सीधे युद्ध में नहीं गए हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच कई दिनों से तनाव चल रहा है। सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी दूतावास पर हमले का आरोप इजरायली सेना पर लगा था. मिसाइल हमले में ईरानी सेना के दो जनरलों समेत सात लोगों की मौत हो गई. इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद तेहरान ने इजराइल पर सीधे हमले की चेतावनी दी. इतना ही नहीं, ईरानी सरकार ने इजराइल के मित्र अमेरिका को भी इस संघर्ष से दूर रहने का संदेश भेजा है.

शुक्रवार को वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक वरिष्ठ अमेरिकी खुफिया अधिकारी के हवाले से कहा कि इजराइल ईरान पर हमला कर सकता है. तेहरान उत्तरी और दक्षिणी इजराइल पर हमला कर सकता है. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, हमला 48 घंटे के भीतर हो सकता है. खबर सामने आते ही अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों ने अपने नागरिकों को चेतावनी दी है। इस बार भारत सरकार ने भी उसी राह पर चलते हुए सीरिया में ईरानी दूतावास पर इजरायली हमले के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने इस स्थिति में तेल अवीव के साथ खड़े होने की घोषणा की। उन्होंने गुरुवार को कहा, “हम इजरायल की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।” हम मजबूती से इजराइल के पक्ष में हैं.”

1 अप्रैल को इज़राइल ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी दूतावास पर हवाई हमला किया। हमले ने इमारत को नष्ट कर दिया और कई ईरानी राजनयिकों की मौत हो गई। इसके बाद से तेहरान ने हमले का जवाब देने की धमकी दी है. ईरान के सर्वोच्च नेता अली होसैनी खुमैनी ने गुरुवार को कहा, ”इजरायल को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए।” बिडेन ने संघर्ष विराम की वाशिंगटन की “सलाह” के बावजूद गाजा पर हमला जारी रखने के लिए बुधवार को इजरायली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की आलोचना की। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी अहम मानी जा रही है. संयोग से, ईरान 7 अक्टूबर को गाजा में संघर्ष शुरू होने के बाद से हमास, हिजबुल्लाह और हौथिस सहित इजरायल विरोधी सशस्त्र समूहों का समर्थन कर रहा है। इसी के चलते पिछले एक महीने में नेतन्याहू की सेना ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए हैं.

इजराइल में युद्ध चल रहा है. इजरायली सेना फिलिस्तीन के सशस्त्र बल हमास से लड़ रही है. यह युद्ध कब ख़त्म होगा यह किसी को पता नहीं है. इजरायली सरकार ने साफ कर दिया है कि वह तब तक नहीं रुकेगी जब तक गाजा से हमास का सफाया नहीं हो जाता. इस बार उस युद्ध में ईरान भी शामिल हो गया। इतना ही नहीं, ईरान ने अमेरिका को इसराइल के साथ उनके संघर्ष में हस्तक्षेप न करने की ‘सलाह’ दी है.

हमास के साथ युद्ध के बीच इजराइल ने सीरिया में एक के बाद एक हमले किए हैं. हाल ही में इजरायली सेना पर सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी दूतावास पर हमले का आरोप लगा था. मिसाइल हमले में ईरानी सेना के दो जनरलों सहित सात लोग मारे गए। इस बार भारत सरकार ने भी उसी राह पर चलते हुए सीरिया में ईरानी दूतावास पर इजरायली हमले के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने इस स्थिति में तेल अवीव के साथ खड़े होने की घोषणा की। उन्होंने गुरुवार को कहा, “हम इजरायल की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।” हम मजबूती से इजराइल के पक्ष में हैं.”

क्या वर्तमान में हिट हो चुका है योगी आदित्यनाथ का योगी मॉडल?

वर्तमान में योगी आदित्यनाथ का योगी मॉडल हिट हो चुका है! चाहे बुलडोजर एक्शन हो या लव जिहाद के खिलाफ कानून या फिर गोरक्षा का मुद्दा, लॉ एंड ऑर्डर को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार के ‘प्रयोगों’ को कई दूसरे बीजेपी शासित राज्यों में भी दोहराया गया। यूपी सरकार नियमित रूप से माफियाओं को खत्म करके राज्य की कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने में अपनी सफलता का ढिंढोरा पीट रही है। इसी का असर है कि राज्य में रोजगार और निवेश में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। इसका असर भी नजर आ रहा। कई दूसरे राज्यों ने न केवल लॉ एंड ऑर्डर पर योगी मॉडल को सराहा बल्कि इसे अपनाया भी। इतना ही नहीं बीजेपी इस लोकसभा चुनाव में योगी मॉडल को प्रमुख चुनावी मुद्दा भी बनाती नजर आ रही है। योगी आदित्यनाथ जब पहली बार यूपी के सीएम बने तो उन्होंने तुरंत न्याय और एक अपराधी को सबक सिखाने के लिए साल 2020 में बुलडोजर का इस्तेमाल किया। इसका इस्तेमाल कानपुर के बिकरू गांव में गैंगस्टर विकास दुबे की कथित अवैध संपत्तियों को गिराने के लिए किया गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि विकास दुबे और उसके गुर्गों ने एक छापेमारी के दौरान पुलिसकर्मियों पर गोलियां चलाई थीं। इसी के बाद सीएम योगी ने विकास दुबे के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की। इस कार्रवाई पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली, कुछ ने सीएम की सराहना की तो कुछ ने कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए। इसके बाद, तुरंत न्याय के लिए कई मौकों पर बुलडोजर का इस्तेमाल किया गया, जिसके बाद सीएम योगी को ‘बुलडोजर बाबा’ भी कहा जाने लगा।

ये बुलडोजर एक्शन बीजेपी समर्थकों के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका इस्तेमाल हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भी किया गया। यहां तक कि दिल्ली में भी बीजेपी समर्थकों की ओर से इसका इस्तेमाल झांकियों में किया गया। लखनऊ में बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि कुछ चीजें जैसे बुलडोजर एक्शन, जो योगी आदित्यनाथ ने शुरू की। इसके बाद अदालती आदेशों या पुराने कानूनों को लागू किया गया लेकिन इसमें योगी आदित्यनाथ ने अन्य राज्यों पर बढ़त बनाई। यही कारण है कि यूपी के लॉ एंड ऑर्डर मॉडल को अब हर जगह लागू किया जा रहा। जब तक कोई और इसी तरह की कार्रवाई लागू करना शुरू करता है, तब तक योगी आदित्यनाथ पहले ही यूपी में बढ़त ले चुके रहते हैं।

बुलडोजर एक्शन के अलावा यूपी सरकार की ओर से की गई एक अन्य कार्रवाई का भी उल्लेख अकसर होता है, खुद सीएम योगी ने मंच से कई बार इसका जिक्र किया, वो है मुठभेड़ यानी एनकाउंटर। सीएम योगी ने कई बार ये बात कही कि माफिया या तो प्रदेश छोड़ चुका है या उनका राम नाम हो गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से पिछले सात वर्षों में 10,902 मुठभेड़ हुई हैं, जिसमें 197 लोग मारे गए हैं। भले ही इन कार्रवाइयों पर मानवाधिकारों के आधार पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन बीजेपी ने इनका इस्तेमाल अपराध के प्रति जीरो टोलरेस पॉलिसी के तहत किया है। वास्तव में, राज्य की कानून और व्यवस्था सत्तारूढ़ दल के लिए बहुत गर्व की बात रही है, यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सरकार के काम की सराहना करने के लिए कई मौकों पर इसका उल्लेख किया है।

नवंबर 2020 में, राज्य सरकार ‘लव जिहाद’ और जबरन धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए एक कानून लेकर आई। इसी के तहत अब तक लगभग 900 लोगों को जेल में डाल दिया गया। इसके बाद कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई अन्य बीजेपी शासित राज्यों ने भी ऐसा ही किया। धार्मिक स्थलों पर, विशेष रूप से लाउडस्पीकर के खिलाफ अदालत के आदेश के बाद उनकी कार्रवाई ने भी सुर्खियां बटोरीं। इस आदेश के माध्यम से कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने के आरोप में सरकार ने कई हिंदू और मुस्लिम धार्मिक नेताओं की गवाही पेश की, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने सरकार के किसी दबाव के बिना अपने दम पर आदेश का पालन किया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सरकार के काम की सराहना करने के लिए कई मौकों पर इसका उल्लेख किया है।दिसंबर 2023 में शपथ लेने के बाद मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव की ओर से घोषित पहले बड़े फैसलों में से एक धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध था जिसका उपयोग तय डेसिबल स्तर से अधिक किया जाता था।

क्या चुनाव प्रचार में पार्टियां करेंगी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल?

चुनाव प्रचार में पार्टियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल भी करेंगी ! चुनाव में वोटरों के मन को जीतने के लिए हमेशा से नए-नए तरीके अख्तियार किए जाते रहे हैं। बीते दिनों पाकिस्तान में आम चुनाव के दौरान AI के जरिए एडिट हुए इमरान खान के भाषण की दुनियाभर में चर्चा रही। इन विडियो में इमरान को जेल की सलाखों के पीछे से पार्टी के लिए वोट मांगते दिखाया गया। इनका चुनावी नतीजों पर अच्छा खासा असर देखा गया और इमरान की तहरीक-ए-इंसाफ को फायदा पहुंचा। चुनाव अब दुनिया के किसी देश में हों, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इसमें अहम खिलाड़ी है। भारत में ही बीते दिनों ऐसे कई मंजर देखे, जब AI ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। यह AI का ही कमाल है कि 2016 में दुनिया छोड़ चुकी AIADMK सुप्रीमो जयललिता, इस साल फरवरी में पार्टी नेता पलानीस्वामी के समर्थन में ऑडियो क्लिप के जरिए संदेश देतीं सुनी गईं। डीएमके प्रमुख रहे करुणानिधि ने भी जनवरी में अपने अंदाज में कुछ ऐसा ही संदेश पार्टी सम्मेलन में दिया। साल 2018 में करुणानिधि की मौत के इतने साल बाद उनके सच्चे लगने वाले AI विडियो को देख समर्थक भी रोमांच से भर गए। जाहिर है देश के लोकसभा चुनावों में AI नया ताकतवर खिलाड़ी है।

इस बार की चुनावी जंग जेनरेटिव AI की पिच पर लड़ी जाएगी। जिसमें किसी भी राजनेता और उम्मीदवार की आवाज को क्लोन किया जा सकता है। उनके चेहरों का इस्तेमाल कर हूबहू असली दिखने वाला विडियो बनाए जा सकते हैं। यहां तक की BJP से लेकर कांग्रेस तक, हर कोई अपनी प्रचार रणनीति को इसी तरीके से धार देने में जुटा है। बीजेपी बड़े पैमाने पर नेताओं के भाषणों और संदेशों का सहारा लेने की योजना बना रही है। मोदी के भाषणों के रियल टाइम में कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मलयालम, बंगाली, उड़िया, पंजाबी और मराठी में अनुवाद पर काम शुरू भी हो गया है। कांग्रेस और दूसरे दल भी बड़े पैमाने पर AI का सहारा लेने की योजना पर काम कर रहे हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की इस दुनिया में प्रवेश दोधारी तलवार पर चलने से कम नहीं। चुनाव के दौरान प्रचार के साथ दुष्प्रचार की रणनीति भी नई नहीं है।

कुछ साल पहले कैंब्रिज एनालिटिका में उजागर गोरखधंधे से दुनिया अब आगे निकल आई है। उस वक्त इस घोटाले से पता चला था कि कैसे सोशल मीडिया ने वोटर के डेटा का गलत इस्तेमाल कर फेसबुक के यूजर्स को प्रभावित करने का खेल किया था। अब जेनरेटिव AI बहुत कम समय में वोटर्स पर आसानी से असर डालने की क्षमता रखता है। बीते साल एमपी विधानसभा के चुनाव में AI एडिटेड विडियोज ने चुनावी राजनीति को कैसे प्रभावित किया था, यह सबके सामने है। ऐसे में डीपफेक और इस संकट पर रोकथाम को लेकर भी सोचा जा रहा है।

जानकार मानते हैं कि अभी बहुत कुछ सामने आना है। राजनीतिक विश्लेषक यशवंत देशमुख कहते हैं, ‘चाहे AI हो, डीपफेक या दुष्प्रचार हो, ये ऐसी चीज हैं, जो अभी हो रही हैं और इनसे निपटने का किसी के पास कोई प्लान नहीं है। पार्टियां, समाज, सरकार, सिस्टम- किसी के पास इनसे निपटने की कोई योजना नहीं है। ये अभी विकसित होने की प्रक्रिया में है।’ देशमुख आगे कहते हैं, ‘फिलहाल जो संकट दिख रहा है, उसे ऐसे समझने की जरूरत है कि यूं तो इसके प्रयोग में कोई बुराई नहीं, लेकिन उसमें फेक न्यूज को AI के जरिए प्रमोट करना, एकदम गलत है, क्योंकि कई बार किसी भी नेता को ऐसी बात कहते दिखाया जाता है, जो उनके खिलाफ परिणाम ला सकती है। ऐसे में जब तक सरकार और कोर्ट डीपफेक और AI की ओर से जेनरेटेड कंटेट पर कंट्रोल की कोई व्यवस्था लेकर नहीं आते तब तक कोई पार्टी या व्यक्ति इस पर शायद ही कुछ कर सकता है।

पिछले साल आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से डीपफेक को लोकतंत्र पर खतरा बताए जाने के बाद से ही सरकार ने इस दिशा में कई कोशिशें की हैं। दिसंबर में IT मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को इसके संबंध में आईटी नियमों का सख्ती से पालन करने की सलाह दी थी। बीती 1 मार्च को भी सरकार ने दूसरी अडवाइजरी में सभी AI मॉडल्स और सॉफ्टवेयर के लिए अंडर ट्रायल स्टेज में भारत सरकार से परमिशन लेना जरूरी कर दिया था। हालांकि बाद में कहा गया कि स्टार्टअप को इससे छूट रहेगी। दरअसल, पूरी कवायद के पीछे मकसद चुनावी प्रक्रिया को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के खतरे से बचाना है, दरअसल भारत में खतरा बड़ा इसलिए भी है कि भारत में 76 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं, जो आधी जनसंख्या से ज्यादा हैं।

क्या बीजेपी कर रही है अपने पुराने कार्यकर्ताओं को बाहर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भाजपा अपने पुराने कार्यकर्ताओं को बाहर कर रही है या नहीं! लोकसभा चुनाव के इस मौसम में बीजेपी में करीब हर रोज कोई न कोई किसी दूसरी पार्टी को छोड़कर शामिल हो रहा है। हर चुनाव की तरह इस बार भी चुनाव से पहले बीजेपी में ‘भर्ती मेला’ जोरों पर है। कुछ लोगों की बस जॉइनिंग हो रही है और कुछ को भर्ती के तुरंत बाद लोकसभा चुनाव का टिकट भी मिल रहा है। कई ऐसे नाम हैं जिन्हें जॉइन करवाने के आधे घंटे के भीतर पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया। जिस तरह दूसरी पार्टी से लोग बड़ी संख्या में बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, क्या उससे बीजेपी के कार्यकर्ता और लंबे वक्त से पार्टी से जुड़े लोग असहज (इनसिक्योर) फील कर रहे हैं? इस सवाल पर बीजेपी के एक सीनियर नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि ऐसा सवाल हर चुनाव के वक्त पूछा जाता है और हर बार एक ही जवाब देता हूं कि- इसे ऐसे समझिए… एक सीनियर कार्यकर्ता ने कहा कि जो लोग बीजेपी के खिलाफ बोलते रहे हैं और जिनके खिलाफ हम भी बोलते रहे हैं, वह जब साथ आ जाते हैं तो शुरू में थोड़ा असहज लगता है लेकिन राजनीति में यह सभी तरफ हो रहा है। इसमें क्या किया जा सकता है। जो लोग पार्टी नेताओं के खिलाफ खूब आग उगलते रहे हैं, उन्हें भी बीजेपी में शामिल कर लेना, अजीब नहीं लगता।बीजेपी एक ट्रेन है। ट्रेन में यात्री भरे हैं।जिन पर बीजेपी भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रहती है उन्हें भी पार्टी में शामिल कर लेना क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नहीं अखरता? संघ के एक स्वयंसेवक ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि राजनीति करना बीजेपी का काम है और बीजेपी वाले ये कहते हैं कि जब जंग चुनाव हो रही हो तो जीतने के लिए सभी तरह के हथियार इस्तेमाल करने पड़ते हैं। जब ट्रेन किसी स्टॉप पर रुकती है तो अंदर के यात्री सोचते हैं कि बाहर से और लोग ट्रेन में ना चढ़े, ताकि वह आराम से सफर कर सकें। लेकिन जब और यात्री चढ़ भी जाते हैं तो थोड़ा आगे जाकर जब ट्रेन हिलती डुलती है तो सभी के लिए जगह बन जाती है।

यही सवाल पूछने पर बीजेपी के एक दूसरे नेता ने कहा कि ऐसा नहीं है कि सब बाहर से आए हुए लोगों को टिकट दिया जा रहा है। जहां पार्टी मजबूत स्थिति में है वहां पार्टी के कार्यकर्ता को ही टिकट मिल रहा है। जिन जगहों पर बीजेपी के पास कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं था जो जीत दिला सके, वहां दूसरी पार्टी से आए लोगों को टिकट दिया है और अब तो वह भी बीजेपी के ही हैं। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता इसे समझते हैं और जो टिकट मांग रहे होते हैं उन्हें भी मालूम होता है कि वे जीत सकते हैं या नहीं। एक सीनियर कार्यकर्ता ने कहा कि जो लोग बीजेपी के खिलाफ बोलते रहे हैं और जिनके खिलाफ हम भी बोलते रहे हैं, वह जब साथ आ जाते हैं तो शुरू में थोड़ा असहज लगता है लेकिन राजनीति में यह सभी तरफ हो रहा है। इसमें क्या किया जा सकता है। जो लोग पार्टी नेताओं के खिलाफ खूब आग उगलते रहे हैं, उन्हें भी बीजेपी में शामिल कर लेना, अजीब नहीं लगता।

पार्टी के एक नेता ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि जो लोग पहले उलटा सीधा बोलते थे वही अब हमारे नेताओं को माला पहनाकर स्वागत कर रहे हैं, तो इसमें क्या दिक्कत है। पार्टी के एक नेता ने पिछले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और, छत्तीसगढ़ चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि वहां आपने देखा कि पार्टी ने अपने पुराने कार्यकर्ताओं को ही सीएम पद की जिम्मेदारी दी। पार्टी में नए लोग आते हैं तो पार्टी का प्रभाव ही बढ़ता है। जिन पर बीजेपी भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रहती है उन्हें भी पार्टी में शामिल कर लेना क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नहीं अखरता? संघ के एक स्वयंसेवक ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि राजनीति करना बीजेपी का काम है और बीजेपी वाले ये कहते हैं कि जब जंग चुनाव हो रही हो तो जीतने के लिए सभी तरह के हथियार इस्तेमाल करने पड़ते हैं। अगर सामने वाला गोला दागेगा तो हमें भी तो मिसाइल चलानी पड़ती है। हालांकि वे व्यक्तिगत तौर पर इस लॉजिक से सहमत नहीं हैं।

क्या वर्तमान में बिगड़ती जा रही है यंग जनरेशन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान में यंग जनरेशन बिगड़ती जा रही है या नहीं! जब पुरानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था ढह जाती है तो वह पितृसत्ता या परिवार में वरिष्ठ पुरुष वर्ग के पारंपरिक अधिकार को भी खत्म कर देती है। फिर भी घर पुरुषों से ही उम्मीद करता है कि वे परिवार का पालन-पोषण करेंगे। ऐसे में उन्हें नौकरी की तलाश में शहर भेज दिया जाता है, वो भी बिना किसी रोडमैप या तैयारी के। अकेला डरा हुआ प्रवासी, जो अब हर कदम पर अनिश्चित है, जल्द ही Manxiety पुरुषवादी चिंता से घिर जाता है। गांव में इतनी विशाल पितृसत्ता, शहरी परिस्थितियों में उस शख्स को पूरी तरह से जकड़ लेती है। इसमें न तो पिता और चाचा का अधिकार नजर आता है और न ही चचेरे भाइयों का साथ मिल सकता है। Manxiety तब शुरू होती है जब प्रवासी नए शहर में कदम रखते हैं, जहां रहने के लिए उन्हें दूसरे युवकों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करनी होती है, जिसके नियम बेहद अलग हैं। नया प्रवासी जल्द ही उन विशेषाधिकार प्राप्त लोगों से नाराज होने लगता है जो अपने शहरी कनेक्शन से आत्मसंतुष्ट हैं। ‘नामदार’ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के वंशज और ‘कामदार’ मेहनत करने वालों के बच्चे के बीच बीजेपी का अंतर इस जुझारू भावना को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। एक ऐसा रवैया जिसे 2016 के डिमोनेटाइजेशन ने और पुष्ट किया। शहरी निम्न वर्ग को अब लगा कि पीएम मोदी ने इस कदम से ‘नामदारों’ की हवा निकाल दी है।

ऐसी चीजें केवल भारत में ही नहीं होती हैं। 19वीं सदी के यूरोप में औद्योगीकरण और राजशाही विरोधी विद्रोहों के कारण सामाजिक मैशअप के बाद पुरुषों को Manxiety के समान झटके लगे। श्रमिकों ने फिर से शहरी अभिजात वर्ग को खराब स्थिति में पेश किया। इससे जल्द ही उभरा कि वह एक मर्दाना छवि की लालसा लिए है। जो उस उथल-पुथल को सबसे अच्छी तरह व्यक्त करती है जिसे पुरुषों को एक विदेशी शहरी परिवेश में सहना पड़ता है। अगर आज भगवान राम की प्रतिमा बनाई जाती है तो इसलिए क्योंकि वह राक्षसी ताकतों के खिलाफ एक बहादुर लड़ाई का प्रतीक हैं। अब वफादार हनुमान की तरह पुरुष आकांक्षाएं एक लक्ष्य की तरह लगती हैं। ये कमजोरों को मजबूतों के खिलाफ एक न्यायपूर्ण संघर्ष दर्शाता है।

क्रांति के बाद के फ्रांस में भी ऐसा ही मूड उभरा। जैकोबिन्स ने झंडा लहराते हुए मैरिएन को पाया, जिसने नागरिकों को राजशाही के खिलाफ इतना उत्साहित किया, कि बाकी नामदारों के खिलाफ उनकी लड़ाई में पर्याप्त प्रेरणा नहीं मिली। इसके बजाय उन्होंने भ्रष्ट अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले हाइड्रा-हेडेड राक्षस पर अपने पैर के साथ हरक्यूलिस के लिए जड़ें जमाईं। पुरुष चिंता विकसित होती है क्योंकि पितृसत्ता अपनी पकड़ खो देती है, और इसी से मर्दानगी विकसित होती है। अब बड़े लोग रोल मॉडल नहीं रहे, बल्कि खुद से बने लोग ही ऐसे हो गए हैं। इसलिए, ओम टीवी में 18 से 30 वर्षीय पुरुष सब्सक्राइबर्स के बीच एपीजे अब्दुल कलाम की लाइफ ने लोगों को ज्यादा प्रभावित किया। अब, यहां एक सच्चा कामदार था, जो अपनी विनम्रता के चलते भारत का राष्ट्रपति बना।

पुरुष चिंता से बोझिल ये युवक आमतौर पर शहरी प्रवासी होते हैं, जिनकी उम्र 30 साल से कम होती है। चूंकि 60 साल से ऊपर के लगभग 70 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं। शहरी भारत युवाओं और बेचैन लोगों का इलाका बन जाता है। प्रवासियों में से केवल एक अल्पसंख्यक ही निरक्षर हैं, केवल 14 फीसदी ग्रेजुएट हैं। ये नए शहरी युवा, बेचैन जरूर हैं लेकिन योग्य भी हैं। इस प्वाइंट पर, एक तुरंत ही सुधार की आवश्यकता है। Manxiety इसलिए नहीं है क्योंकि पुरुष महिलाओं के खिलाफ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, बल्कि वो अन्य पुरुषों के खिलाफ कंपटीशन कर रहे हैं। महिलाएं खतरा नहीं हैं क्योंकि उनमें से केवल 5 फीसदी के पास सैलरी बेस्ड नौकरियां हैं और केवल 4 फीसदी ही इंजीनियरिंग ट्रेड में हैं। 80 फीसदी एमएसएमई भी पुरुषों के स्वामित्व में हैं। साथ ही, पुरुष ज्यादातर काम के लिए पलायन करते हैं, जबकि महिलाएं शादी की वजह से अपने घरों से दूर जाती है।

वास्तव में दुख होता है जब मर्दानगी किसी पुरुष को आत्महत्या की कगार पर ले जाती है। लैंसेट के एक हालिया लेख के अनुसार, आत्महत्या से मरने वालों में से 75 फीसदी पुरुष हैं, जिनमें से कई आर्थिक रूप से अनिश्चित युवा हैं। भारत में आत्महत्या की दर 1978 में 6.3 प्रति लाख से बढ़कर आज 12.4 प्रति लाख हो गई है। ये हमारी पिछली जनगणना में दर्ज 44 फीसदी शहरी विकास के साथ लगभग बराबर है। पितृसत्ता का संरक्षण मिले बिना, पुरुषों की कमजोरियां सामने आती हैं और यह मुख्य रूप से खुद को साबित करने के लिए अपनी मर्दाना योग्यता दिखाने की इच्छा को जन्म देती है। समय के साथ, यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। शहरीकरण की रफ्तार संयुक्त परिवारों को विघटित कर देगा और महिलाओं को तकनीकी शिक्षा और कुशल नौकरियों में आगे बढ़ाएगा। आईआईटी आज काफी हद तक पुरुषों गढ़ नहीं रहे हैं जैसे वे हुआ करते थे।