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ऐश्वर्या राय की सबसे करीब एक्ट्रेस कौन है?

आज हम आपको बताएंगे कि ऐश्वर्या राय के सबसे करीब एक्ट्रेस कौन सी है! ऐश्वर्या राय और बच्चन परिवार के बीच अनबन है! अभी तक फैमिली की तरफ से, ऐश्वर्या या अभिषेक की तरफ से इसपर कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है, लेकिन इनका साथ में नजर ना आना, सोशल मीडिया पर दूरी… ऐसी ही तमाम बातें गवाही दे रही हैं कि इनके बीच सबकुछ ठीक नहीं है। हाल ही में पूरा बच्चन परिवार अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी में शामिल हुआ, लेकिन ऐश्वर्या राय ने बाद में अपनी बेटी आराध्या संग एंट्री की। इसी वेडिंग सेरेमनी से एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें ऐश्वर्या एक एक्ट्रेस के साथ नजर आ रही हैं। फैंस दावा कर रहे हैं कि इसी एक्ट्रेस के साथ नजदीकियों के कारण उनकी सास जया बच्चन उनसे खफा हैं और इसी कारण परिवार में खटपट है। अनंत अम्बानी और राधिका मर्चेंट की शादी में अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, अभिषेक बच्चन, श्वेता नंदा, निखिल नंदा, नव्या नंदा और अगस्त्य नंदा एकसाथ पहुंचे। इन्होंने गेट पर एकसाथ पोज दिया। बच्चन परिवार में ऐश्वर्या और आराध्या की गैर-मौजूदगी फैंस को खटक गई। लोगों ने तो बच्चन परिवार को कोसना और ऐश्वर्या की तारीफ करना भी शुरू कर दिया। अभिषेक को भी जमकर खरी-खोटी सुनाई।

बच्चन परिवार के कुछ घंटे बाद ऐश्वर्या राय अपनी बेटी आराध्या के साथ नजर आईं। अब साफ होने लगा कि वाकई में ऐश और बच्चन परिवार अब साथ नहीं हैं। हालांकि, बाद में पार्टी का एक इनसाइड वीडियो भी सामने आया, जिसमें ऐश्वर्या और अभिषेक साथ नजर आए, तब जाकर फैंस ने राहत की सांस ली। हालांकि, ऐश अपने पति के अलावा परिवार के किसी और सदस्य के साथ नहीं दिखीं। इसके अलावा ऐश्वर्या को अनंत और राधिका की वेडिंग में ही दिग्गज एक्ट्रेस रेखा के साथ देखा गया। दोनों ना सिर्फ मिलीं और गले लगाया, बल्कि रेखा ने दोनों पर खूब प्यार लुटाया। ये पहला मौका नहीं है, जब ऐश्वर्या और रेखा को साथ देखा गया हो। इससे पहले साल 2019 में उर्दू कवि कैफी आजमी की 100वीं जयंती में दोनों को हाथ में हाथ डालकर चलते हुए देखा गया था।

रेखा और अमिताभ बच्चन के बीच क्या हुआ था, ये जगजाहिर है। यही वजह है कि बच्चन परिवार और रेखा के बीच हमेशा एक दूरी देखने को मिलती है। खासतौर से जया बच्चन की। ऐसे में फैंस ने दावा किया है कि रेखा संग ऐश्वर्या की नजदीकियों के कारण ही बच्चन परिवार उनसे खफा है। ऐश और बच्चन परिवार में कथित झगड़े के पीछे रेखा एक कारण हो सकती हैं। एक ने लिखा, ‘तो वे खुलेआम दिखा रहे हैं कि परिवार में कलह है? और पति अपनी मां और बहन की साइड है। अपनी बीवी और बेटी को अकेला छोड़ रहा है? वे 3 मिनट के लिए एक परिवार होने का नाटक नहीं कर सकते थे? एकसाथ एंट्री करके।’ दूसरे ने लिखा, ‘बच्चन परिवार एकसाथ एंट्री कर रहे हैं और ऐश्वर्या-रेखा एकसाथ। एक कहावत है- दुश्मन का दुश्मन मेरा दोस्त…।’ बता दे कि अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन पिछले कई दिनों से अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में बने हुए हैं। अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी में यह कपल शरीक तो हुआ, लेकिन अलग-अलग पहुंचने पर इनके बीच सब कुछ ठीक नहीं होने की खबरों ने तूल पकड़ ली। वहीं, हाल ही में ‘जूनियर बिग बी’ ने तलाक से जुड़ी एक पोस्ट लाइक की, जिसके बाद इन अटकलों को और जोर मिला। 

अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन बॉलीवुड के पावर कपल माने जाते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वक्त से कई बार दोनों के बीच अनबन की खबरें आई हैं। अनंत अंबानी की शादी में जब दोनों अलग-अलग पहुंचे और साथ में पोज भी नहीं दिया, तो अफवाहों का ये बाजार और गर्म हो गया। इन अफवाहों के बीच अभिषेक ने तलाक से जुड़ी पोस्ट लाइक की, जिसका अब असल कारण सामने आ चुका है।रेडिट पर एक पोस्ट सामने आई है, जिसमें अभिषेक के इस पोस्ट को लाइक करने का कारण बताया गया। बता दें कि बच्चन परिवार के कुछ घंटे बाद ऐश्वर्या राय अपनी बेटी आराध्या के साथ नजर आईं। अब साफ होने लगा कि वाकई में ऐश और बच्चन परिवार अब साथ नहीं हैं। बताया गया है कि पोस्ट में ऐश्वर्या के करीबी दोस्त जिरक मार्कर के इनपुट शामिल थे।

जब एक बेगुनाह को गुनाह ना करने पर भी मिली सजा!

हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है जब एक बेगुनाह को गुनाह ना करने पर भी सजा मिली है! छत्तीसगढ़ के एक गरीब घर के व्यक्ति को जिस जुर्म के लिए सजा मिली, वह तो उसने कभी किया ही नहीं था। उसे 11 साल जेल में डाल दिया गया था। उस व्यक्ति को देश की ही अदालतों पहले ट्रायल कोर्ट और फिर हाई कोर्ट ने हत्या का दोषी मान सजा दी थी। जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जैसे सारी तस्वीर ही शाशे की तरह साफ हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने उसे बेगुनाह साबित कर दिया और अत: उसे जमानत मिल गई। आइए समझते हैं कि कैसे बिना किसी गुनाह के छत्तीसगढ़ के इस शख्स को इतनी बड़ी सजा मिल गई थी। यह मामला देश की धीमी गति वाली आपराधिक न्याय प्रणाली का उदाहरण है।मुख्य परीक्षा और जिरह में गवाह का बयान पूरी तरह से अलग है। बता दें कि देश की धीमी गति वाली आपराधिक न्याय प्रणाली का उदाहरण है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बिलासपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में पांच साल और सुप्रीम कोर्ट ने उसे हत्या के आरोपों से बरी करने में छह साल लगा दिए,अपीलकर्ता का अपराध उचित संदेह से परे साबित नहीं हुआ है। क्योंकि उसने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उसके अपराध को साबित करने में विफल रहा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बिलासपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में पांच साल और सुप्रीम कोर्ट ने उसे हत्या के आरोपों से बरी करने में छह साल लगा दिए, क्योंकि उसने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उसके अपराध को साबित करने में विफल रहा।

रायपुर के खरोरा गांव में 2 मार्च, 2013 को अपनी सौतेली मां को जबरन डुबोने के आरोप में रत्नू यादव को गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 9 जुलाई, 2013 को फास्ट ट्रैक ट्रायल के जरिए उसे दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हाई कोर्ट ने 7 अप्रैल, 2018 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसलिए, हमारे विचार से गवाह की गवाही विश्वसनीय नहीं है।उसके लिए कोई वकील पेश नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए साक्ष्यों की जांच के आधार पर अधिवक्ता श्रीधर वाई चितले को न्याय मित्र नियुक्त किया। चितले ने कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि मौत डूबने से हुई थी, लेकिन अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने का भार नहीं उठाया है कि यह हत्या थी।

न्याय मित्र ने यह भी बताया कि गवाह मुकदमे के दौरान अपने बयान से पलट गया, जिससे अभियोजन पक्ष की इस कहानी की विश्वसनीयता खत्म हो गई कि उस व्यक्ति ने अपनी सौतेली मां को जबरन डुबो दिया। जस्टिस एस ओका और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि मानवीय आचरण का सामान्य नियम यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपने द्वारा किए गए अपराध को स्वीकार करना चाहता है, तो वह उस व्यक्ति के समक्ष ऐसा करेगा, जिस पर उसे पूर्ण विश्वास है। अभियोजन पक्ष का यह मामला नहीं है कि अपीलकर्ता (यादव) का घटना से पहले एक निश्चित अवधि तक इस गवाह से घनिष्ठ परिचय था। इसके अलावा, मुख्य परीक्षा और जिरह में गवाह का बयान पूरी तरह से अलग है। बता दें कि देश की धीमी गति वाली आपराधिक न्याय प्रणाली का उदाहरण है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बिलासपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में पांच साल और सुप्रीम कोर्ट ने उसे हत्या के आरोपों से बरी करने में छह साल लगा दिए, क्योंकि उसने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उसके अपराध को साबित करने में विफल रहा। इसलिए, हमारे विचार से गवाह की गवाही विश्वसनीय नहीं है।

अभियोजन पक्ष के मामले में कुछ और इसी तरह की विसंगतियां पाए जाने के बाद, पीठ ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को खारिज कर दिया, आरोपी को बरी कर दिया और कहा कि उसने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उसके अपराध को साबित करने में विफल रहा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बिलासपुर बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में पांच साल और सुप्रीम कोर्ट ने उसे हत्या के आरोपों से बरी करने में छह साल लगा दिए, क्योंकि उसने पाया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उसके अपराध को साबित करने में विफल रहा।अपीलकर्ता का अपराध उचित संदेह से परे साबित नहीं हुआ है।

आखिर समाज में क्या स्थान रखता है लाल बत्ती कल्चर?

आज हम आपको बताएंगे कि समाज में लाल बत्ती कल्चर क्या स्थान रखता है! वीआईपी कल्चर फिर से चर्चा में है। यह सब तब शुरू हुआ जब एक आईएएस प्रोबेशनर का वीडियो सामने आया जिसमें वह पुणे की सड़कों पर एक निजी लग्जरी वाहन में घूम रही थी। गाड़ी पर लाल, नीली और सफेद रंग की बत्ती लगी थी और ‘महाराष्ट्र सरकार’ का स्टिकर लगा था। तब से, उस अधिकारी और उसके परिवार के आचरण के बारे में बहुत कुछ सामने आया है। सरकार ने उन पर लगे आरोपों की जांच के लिए एक पैनल गठित किया है। मंगलवार को भावी सिविल सेवकों के लिए प्रशिक्षण संस्थान, एलबीएस नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन ने महाराष्ट्र में उनके जिला प्रशिक्षण कार्यक्रम को रोक दिया और उन्हें ‘आगे की आवश्यक कार्रवाई’ के लिए मसूरी वापस बुला लिया। लेकिन यह पूजा खेडकर का ‘लाल बत्ती’ के प्रति प्रेम ही है जिसने सबसे पहले उन्हें सुर्खियों में ला दिया और मीडिया में चर्चा का विषय बन गया। इसका कारण यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और कैबिनेट के फैसले के बाद, वीआईपी संस्कृति अतीत की बात हो गई है। स्पष्ट रूप से, ऐसा नहीं है और अधिकारियों को इस तरह से अपने अधिकार का अवैध रूप से दावा करने के लिए प्रेरित करने वाली मानसिकता अभी भी बरकरार है।

लेकिन बीकन लाइट के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले नियम क्या हैं? 1989 के केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम गाड़ियों पर लाइट लगाने के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है। इन नियमों का उल्लंघन करना हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए और इसके लिए कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, भले ही वास्तव में ‘लाल बत्ती’ संस्कृति दशकों से बिना रोक-टोक के पनप रही हो। कोई भी व्यक्ति उस दौर को याद कर सकता है जब भारतीय सड़कें लाल और पीली बत्तियों वाले सरकारी वाहनों से भरी रहती थीं, जिनके साथ अक्सर सायरन की आवाज भी होती थी। ‘वीआईपी संस्कृति’ के रूप में जानी जाने वाली इस घटना ने एक बड़ा सामाजिक विभाजन पैदा कर दिया: एक तरफ आम लोग और दूसरी तरफ ये तथाकथित वीआईपी।

2015 में परिवहन आयुक्त का कार्यभार संभाला, तो यह वीआईपी संस्कृति हर जगह व्याप्त थी। अनगिनत अधिकारी और यहां तक कि आम नागरिक भी अपने वाहनों पर अनधिकृत बीकन लाइट लगाकर कानून का उल्लंघन करते थे। नियमों को लागू करने के मेरे प्रयासों को काफी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। एक विशेष उदाहरण का जिक्र जरूरी है। एक वरिष्ठ अधिकारी को जब अवैध रूप से लगी लाल बत्ती को हटाने का निर्देश दिया गया, तो उसने मुझसे कहा, ‘तुम यह जो कर रहे हो, इसके नतीजे अच्छे नहीं होने वाले।’ यह एक छिपी हुई धमकी थी कि मेरे कार्यों के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

नासिक के कलेक्टर के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान भी ऐसा ही एक मामला हुआ था। 2003 के कुंभ मेले में, स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी, जब एक श्रद्धेय साधु को लाल बत्ती का इस्तेमाल करने से मना कर दिया गया था। नासिक के तत्कालीन मेयर के समय पर हस्तक्षेप करने के बाद ही स्थिति शांत हुई, जिन्होंने साधु को समझाया कि प्रशासन किसी भी परिस्थिति में नियमों के आगे नहीं झुकेगा, तब जाकर स्थिति शांत हुई। लाल बत्ती का इस्तेमाल कानून प्रवर्तन, रक्षा और अग्निशमन जैसी आपातकालीन सेवाओं के बजाय किसी की हैसियत को दिखाने के लिए किया जाना वास्तव में एक अभिशाप बन गया था। यहां तक कि उन राज्यों में भी जहां कानून का पालन होना चाहिए था, इसका दुरुपयोग व्यापक था, और कानून प्रवर्तन मशीनरी इसे रोकने में असमर्थ प्रतीत होती थी।

समस्या की गंभीरता को समझते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में केंद्र को इस कुप्रथा को रोकने के लिए नियम बनाने और लागू करने का निर्देश दिया था। नतीजतन, 19 अप्रैल, 2017 को केंद्र ने कैबिनेट के एक निर्णय के माध्यम से, वीआईपी संस्कृति को खत्म करने का कदम उठाया। इसका परिणाम 1 मई, 2017 को केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत एक अधिसूचना के रूप में सामने आया, जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों तक सभी राज्य प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों के वाहनों पर बीकन लाइट के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके साथ ही आधिकारिक तौर पर वीआईपी संस्कृति का युग समाप्त हो गया।

नए नियम आवश्यक सेवाओं के लिए अपवाद प्रदान करते हैं। पुलिस वाहन, रक्षा विभाग की इकाइयां, अर्धसैनिक बल, प्राकृतिक आपदा में मदद पहुंचाने वाले इमर्जेंसी वीइकल्स और दमकल गाड़ियों को ऐसी लाइट का उपयोग करने की अनुमति है, लेकिन केवल ड्यूटी के दौरान। अन्य सभी समय में, लाइट बंद रहनी चाहिए। नियम कड़े हैं, जिसके तहत प्रत्येक राज्य के परिवहन विभाग को अधिकृत वाहनों की सूची सालाना प्रकाशित करनी होती है और छेड़छाड़ को रोकने के लिए वॉटरमार्क और होलोग्राम के साथ प्राधिकरण का पदनाम और वाहन संख्या प्रदर्शित करने वाला स्टिकर लगाना अनिवार्य है।

वीआईपी संस्कृति को आधिकारिक रूप से खत्म किए जाने के बाद किए गए प्रधानमंत्री के ट्वीट को दोहराने की जरूरत है: यह जड़ जमाए बैठी असमानताओं के खिलाफ बड़ी लड़ाई और ऐसे समाज की खोज का प्रतीक है, जहां हर नागरिक को समान सम्मान और गरिमा मिले।

आखिर कैसे हुई थी चारों धामों की रचना जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि चारों धामों की रचना कैसे हुई थी! बात आज से करीब 2000 साल पहले की है, जब केरल के एक दूरदराज के गांव में 8 साल के बच्चे ने देखा कि उसकी मां का नहाने के लिए गांव से काफी दूरी पर स्थित पूर्णा नदी तक जाना पड़ता है। हर बच्चे की तरह वह बच्चा भी अपनी मां को बेइंतिहा प्यार करता था। उस बच्चे ने इतनी कम उम्र में गांव से दूर बहने वाली नदी को गांव के पास मोड़ दिया। वह बालक थे आदि शंकराचार्य, जिन्होंने पूरे भारत को एकसूत्र में बांटने के लिए चारों दिशाओं में चार धाम या चार पीठ और 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की। यह वह दौर था, जब पूरे भारत में वैष्णव (आलवार) और शैव (नयनार) में खूनी लड़ाइयां हुआ करती थीं। दोनों संप्रदायों के लोग एक-दूसरे का फूटी आंख भी नहीं देखना चाहते थे। शंकराचार्य ने इन दोनों में सुलह कराई और भारतीय परंपरा और संस्कृति को फिर से स्थापित किया। शंकराचार्य ने जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका और बदरीनाथ धाम की स्थापना की थी। हाल ही में दिल्ली में श्रीकेदारनाथ धाम मंदिर बनाया जा रहा है। मगर, मंदिर के भूमि पूजन के साथ ही इसके नाम को लेकर विवाद हो रहा है। बुराड़ी में बन रहे इस केदारनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर विवाद गहराने के बाद श्री केदारनाथ धाम दिल्ली ट्रस्ट ने ट्रस्ट और मंदिर का नाम बदलने का फैसला लिया है। आइए-समझते हैं कि धाम और मंदिर में क्या फर्क है और केदारनाथ मंदिर इन चारों धामों से कितना अलग है?

दक्षिण भारत में 8वीं और 9वीं सदी में आलवारों और नयनारों में अपने-अपने संप्रदायों को लेकर खूब लड़ाइयां लड़ी जाती थीं। यहां तक कि मशहूर चोल साम्राज्य के शासक शैव धर्म को मानने वाले थे। डॉ. दानपाल के अनुसार, शंकराचार्य के चार पीठों की स्थापना से ही यह संघर्ष रुका और भारत में बौद्ध धर्म का असर भी कम हुआ। 8 साल की उम्र में चारों वेदों का ज्ञान हासिल करने वाले शंकराचार्य 12 साल की उम्र में अपनी मां से वचन लेकर ओंकारेश्वर से वेदांत के प्रचार के लिए निकले थे, जहां से वह ज्ञान लेकर काशी की ओर आगे बढ़े। 32 वर्ष की छोटी से आयु में ही शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार मठों ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ की स्थापना की थी। इन चार पीठों में आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं।

आदि शंकराचार्य ने कम उम्र में ही भारत की यात्रा की और चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी। उन्होंने उत्तर भारत के हिमालय में स्थित बदरीनाथ धाम में दक्षिण भारत के ब्राह्मण पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिर में उत्तर भारत के पुजारी को रखा। वहीं पूर्वी भारत के मंदिर में पश्चिम के पुजारी और पश्चिम भारत के मंदिर में पूर्वी भारत के ब्राह्मण पुजारी को रखा था। जिससे भारत चारों दिशाओं में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत हो रूप से एकता के सूत्र में बंध सके।

दुर्गा मंदिर, गाजियाबाद में आचार्य विनोद शर्मा के अनुसार, प्राचीन तीर्थ स्थलों पर जाने से पौराणिक ज्ञान बढ़ता है। देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं और परंपराएं मालूम होती हैं। प्राचीन संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। मंदिर के पंडित और आसपास रहने वाले लोगों से संपर्क होता है, जिससे अलग-अलग रीति-रिवाजों को जानने का अवसर मिलता है। भगवान और भक्ति से जुड़ी मान्यताओं की जानकारी मिलती है, जिसका लाभ दैनिक जीवन की पूजा में मिलता है। इसलिए चार धामों को अलग-अलग दिशाओं में स्थापित किया गया है।

यह तीर्थ बदरीनाथ के रूप में भगवान विष्णु को समर्पित है। अलकनंदा नदी के किनारे बसे इस मंदिर की स्थापना श्रीराम ने की थी। इस मंदिर में नर-नारायण की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञान ज्योति का प्रतीक है। यहां पर श्रद्धालु तप्तकुंड में स्नान करते हैं। बदरीनाथ मंदिर के कपाट अप्रैल के आखिरी या मई के शुरुआती दिनों में दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। लगभग 6 महीने तक पूजा के बाद नवंबर के दूसरे सप्ताह में मंदिर के पट फिर से बंद कर दिए जाते हैं। यहां हर साल करीब 6 लाख श्रद्धालु आते हैं।

रामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के किनारे स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित है। यहां शिवजी की पूजा लिंग रूप में की जाती है। माना जाता है कि भगवान राम ने ही इस रामेश्वरम् शिवलिंग की स्थापना की थी। यह शंकराचार्य के 12 ज्योतिर्लिंगों में से भी एक है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख जैसा द्वीप है।

यह वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर में तीन मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा है। ये तीर्थ गरुण पुराणों में बताई गई 7 पवित्र पुरियों में एक है। यहां हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में दुनियाभर से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त आते हैं। यहां मुख्य रूप से भात का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

गुजरात के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे बसी द्वारका पुरी को चार धामों में से एक माना गया है। ये भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित तीर्थ है। ये तीर्थ पुराणों में बताई गई मोक्ष देने वाली सात पुरियों में से एक है। माना जाता है कि इसे श्रीकृष्ण ने बसाया था। स्थानीय लोगों और कुछ ग्रंथों के अनुसार असली द्वारका तो पानी में समा गई, लेकिन कृष्ण की इस भूमि को आज भी पूज्य माना जाता है। इसलिए द्वारका धाम में श्रीकृष्ण स्वरूप का पूजन किया जाता है। पुराणों के अनुसार, केदारनाथ धाम छोटा चारधाम में से एक है। यह हिंदू धर्म के हिमालय पर्वतों में स्थित पवित्रतम तीर्थ परिक्रमा मार्गों में से एक है। यह उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में स्थित है। इस परिपथ के चार धाम हैं- बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री। इनमें से बदरीनाथ धाम भारत के चार धामों का भी उत्तरी धाम है।

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि दिल्ली में प्रतीकात्मक केदारनाथ नहीं हो सकता। केदारनाथ हिमालय में है। यह दिल्ली में नहीं हो सकता। शंकराचार्य ने कहा, ‘कोई प्रतीकात्मक केदारनाथ नहीं हो सकता… शिवपुराण में 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख किया गया है। नाम और स्थान के साथ… जब केदारनाथ का पता हिमालय में है, तो यह दिल्ली में कैसे हो सकता है?

क्या कारगिल जैसा युद्ध करना चाहता है पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान कारगिल जैसा युद्ध करना चाहता है या नहीं! क्या पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कोई नई रणनीति बनाई है? क्या वह चाहता है कि भारत फिर उसके खिलाफ एयर स्ट्राइक या सर्जिकल स्ट्राइक करे? क्या पाकिस्तान युद्ध चाहता है- पूर्ण नहीं तो सीमित ही? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि डोडा हमले से यह संदेह पुष्ट होता दिख रहा है कि पाकिस्तान अपने रिटायर्ड फौजियों की घुसपैठ भारत में करवा रहा है। हमले में वीरगति को प्राप्त हुए भारतीय सैनिकों को जिस तरह निशाना बनाया गया है, उससे साफ पता चलता है कि हमला मिलट्री ट्रेनिंग में महारत लोगों ने किया है। भारतीय सैनिकों के शरीर में उन जगहों पर गोलियां लगी हैं जो हेलमेट या बुलेटप्रुफ जैकेट से कवर नहीं थे। इतना सटीक निशाना लगाना आम आतंकियों के बूते की बात नहीं है। दूसरी तरफ जिस तरह पाकिस्तानी हमलावरों ने भारतीय सीमा में आकर किसी स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर से मदद नहीं ली और जंगल में ही छिपे रहे, इसके लिए भी कठिन फौजी ट्रेनिंग में महारत रखने की जरूरत होती है। डोडा हमले में राष्ट्रीय राइफल्स के चार सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन बृजेश थापा, नायक डोक्करी राजेश, सिपाही बिजेंद्र और सिपाही अजय कुमार सिंह ने पाकिस्तानी हमलावरों से लड़ते हुए अपनी प्राणों की बलि दे दी। उनके शरीर पर गोलियों के निशान बताते हैं कि हमलावर कोई आम आतंकी नहीं बल्कि पाकिस्तानी आर्मी के विशेष खुफिया अभियान बल के लोग थे। पाकिस्तानी आर्मी ने स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) बना रखा है जिसके लिए सीधे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईसएसआई नियुक्तियां करती है। जम्मू डिविजन में अचानक बढ़े आतंकी वारदात के पीछे इसी एसएसजी का हाथ हो सकता है। पाकिस्तान ने करगिल में भी अपने नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री के जवानों को भेजा था जिसके चलते भारत को युद्ध छेड़नी पड़ी और पाकिस्तान चारों खाने चित हो गया।

अब तक की जांच में पता चला है कि डोडा के आतंकियों ने सुरक्षा कवच को भेदने वाली गोलियों और अमेरिकी एम4 कार्बाइनों से हमला किया है जो अफगानिस्तान युद्ध में इस्तेमाल हुए थे। अधिकारियों ने कहा कि डोडा हमले में शामिल आतंकियों ने जिस तरह खुद को बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से बचाए रखा और जंगलों में ही छिपे रहे, उससे पता चलता है कि उन्होंने फौजी ट्रेनिंग ले रखी है। संभव है कि आईएसआई से भर्ती एसएसजी जवानों ने डोडा अटैक को अंजाम दिया हो।

भारतीय सेना के उत्तरी कमांड ने डोडा हमले के बाद कहा है कि घुसपैठ की गंभीरता से जांच चल रही है। इस काम में जम्मू-कश्मीर पुलिस की मदद ली जा रही है। विदेशी घुसपैठिये जम्मू रीजन के उधमपुर, डोडा और किश्तवाड़ जिलों से होकर कश्मीर जा रहे हैं। उधर, छिपे हुए आतंकियों के सफाये के लिए राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोमवार रात से ही अभियान छेड़ रखा है। अभियान के तहत जंगलों की खास छानबीन की जा रही है। इसके लिए आर्मी, पैरा-कमांडोज के साथ-साथ हवाई निगरानी के लिए हेलिकॉप्टरों और ड्रोनों की मदद ली जा रही है। जम्मू-कश्मीर में हुए हालिया आतंकी हमलों के लिए जैश-ए-मोहम्मद के आउटफिट कश्मीर टाइगर्स ने जिम्मेदारी ली है। 2021 से जम्मू संभाग में आतंकी हमले बढ़ गए हैं। इन हमलों में अब तक 52 सैनिकों समेत कुल 70 लोगों की जानें जा चुकी हैं।

अगर इन हमलों के लिए पाकिस्तानी सेना जिम्मेदार है तो निश्चित रूप से भारत बदले की कार्रवाई करेगा। मोदी सरकार ने पाकिस्तान पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक्स किए हैं। बावजूद इसके पाकिस्तान की तरफ से हो रही आतंकी गतिविधियां बताती हैं कि उसके मन में कुछ ना कुछ चल तो जरूर रहा है। क्या उसने यही प्लानिंग की है कि भारत को युद्ध के लिए उकसाया जाए? क्या वह चीन के इशारे पर भारत को अशांत करना चाहता है? यह संभव है क्योंकि भारत की प्रगति की एक से बढ़कर एक गाथा सुनकर आर्थिक रूप से बर्बाद हो चुके पाकिस्तान की नींदे हराम तो जरूर हो रही होंगी।जम्मू डिविजन में अचानक बढ़े आतंकी वारदात के पीछे इसी एसएसजी का हाथ हो सकता है। पाकिस्तान ने करगिल में भी अपने नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री के जवानों को भेजा था जिसके चलते भारत को युद्ध छेड़नी पड़ी और पाकिस्तान चारों खाने चित हो गया। देखना होगा कि आखिर भारत अपने शैतान पड़ोसी की मंशा भांपकर भी सबक सिखाने की कार्रवाई से खुद को कब तक रोके रख सकता है।

क्या जम्मू से हिंदुओं को भागना चाहता है पाकिस्तान?

पाकिस्तान अब जम्मू से भी हिंदुओं को भागना चाहता है! जम्मू-कश्मीर में डोडा जिले में घात लगाकर किए गए आतंकी हमले में सेना के कैप्टन समेत 4 जवान शहीद हो गए। एक पुलिसकर्मी की भी मौत हुई है। सेना, राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस का इस इलाके में सर्च ऑपरेशन चल रहा था, जब ये हमला हुआ। आतंकी घने जंगल होने की वजह से बच निकले। हालांकि, सेना का तलाशी अभियान जारी है। 2022 और 2023 में जम्मू क्षेत्र में 3-3 आतंकी हमले हुए थे, जो इस साल अभी तक ऐसे 6 हमले किए जा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों के पीछे क्या वजह है? आखिर कश्मीर घाटी छोड़कर अब जम्मू को निशाना क्यों बना रहे हैं आतंकी? क्या ये पाकिस्तान और चीन की साजिश है? इन सभी सवालों के जवाब डिफेंस एनालिस्ट से जानेंगे। डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, इस साल के शुरुआत से दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियां बढ़ गई हैं। इसी साल से अब तक जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियां बढ़ गई हैं। इन दोनों बातों में एक सीधा कनेक्शन है। चीन और पाकिस्तान जान-बूझकर इन इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं। दरअसल, आगामी युद्ध के लिए यह पृष्ठभूमि बनाई जा रही है, ताकि दोनों देश ये अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ये बता सकें कि ये इलाके बेहद अशांति और अस्थिरता थी, इसलिए ये हमले करने पड़े।

लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि हांगकांग से प्रकाशित होने वाले चीन के सरकारी अखबार विएन वीपो के अनुसार, अगले 11 सालों में यानी 2035 तक तीन युद्ध होने हैं। इनमें पहली जंग 2027 में ताइवान के साथ होनी है, जब चीन उस पर हमला करेगा। दूसरा हमला 2029 में दक्षिण चीन सागर में स्थित स्पार्टली आईलैंड पर होगा, जो वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया से घिरा हुआ है। यह द्वीप रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। इसके अलावा, एक हमला चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत पर 2035 में करेंगे। ये टू फ्रंट वॉर होनी है, जिसके तहत चीन अरुणाचल प्रदेश सीमा पर जंग छेड़ेगा और पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में लड़ाई लड़ेगा। पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के घाटी के बजाय जम्मू में लगातार किए जा रहे हमलों के पीछे एक वजह चीन का आर्थिक गलियारा जो पीओजेके से गुजर रहा है। चीन के 65 बिलियन अमेरिकी डॉलर सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) प्रोजेक्ट के लिए निवेश हो चुके हैं। चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी योजना है, जिसकी शुरुआत 2013 में की गई थी। भारत इस प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है, क्योंकि पीओजेके भारत का अभिन्न हिस्सा है।

डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में आतंकी जान-बूझकर हिंदू बहुल जम्मू के इलाकों को निशाना बना रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू की कुल आबादी करीब 15 लाख है और इसमें से 84 फीसदी हिंदू और 7 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान अब कश्मीर की तरह जम्मू से भी हिंदुओं को भगाने की साजिश कर रहा हो। 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में महज 2700 से 3400 कश्मीरी पंडित ही रह गए हैं। जबकि 1981 की जनगणना के अनुसार, इस क्षेत्र में करीब 1.25 लाख हिंदू थे। इसमें ज्यादातर पंडित थे। 90 के दशक में आतंकवाद की शुरुआत के बाद से कश्मीरी पंडितों को साजिशन वहां से जान बचाकर भागना पड़ा।

जम्मू से पुंछ-राजौरी तक सीमावर्ती इलाका है और आगे अखनूर तक इंटरनेशनल बॉर्डर है। एलओसी में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब इंटरनेशनल बॉर्डर का भी सहारा लेकर आतंकी जम्मू क्षेत्र में बढ़ते जा रहे हैं। जम्मू का बड़ा इलाका भी इंटरनेशनल बॉर्डर के पास है। ऐसे में यहां से घुसपैठ भी आसान है। डोडा में तो इतने ज्यादा घने जंगल हैं कि उसका फायदा आतंकी उठा रहे हैं। इस इलाके में पहाड़ और घने जंगल बहुत हैं। इसके अलावा, सड़क संपर्क भी ज्यादा अच्छा नहीं है। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी और पुख्ता तैनाती हुई है। यह भी एक वजह है कि आतंकियों का नया टार्गेट अब जम्मू बन चुका है।

डिफेंस एक्सपर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव में भी जम्मू-कश्मीर के लोगों ने बढ़-चढ़कर वोटिंग की, जिससे आतंकी बौखलाए हुए हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आकाओं को भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से घबराहट होने लगती है। वो चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव जैसी कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया या विकास का कोई काम कामयाब न हो। वो हर हाल में कश्मीर में अशांति बनाए रखना चाहते हैं, ताकि उनके नापाक मंसूबे पूरे हो सकें। इस तरह के हमले कर आतंकी संगठन लोगों को डराने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।

पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई लद्दाख में भारत-चीन सीमा और कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती को कम करना चाहते हैं। ऐसे में जम्मू के इलाकों में लगातार हमले की साजिश की जा रही है, ताकि बाकी जगहों से भारतीय सेना को तैनाती घटानी पड़े। डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, डोडा हमले की जिम्‍मेदारी भी ‘कश्‍मीर टाइगर’ नामक आतंकी संगठन ने ली है। यह ग्रुप भी लश्कर और जैश से जुड़ा है, जो राजौरी, पुंछ, कठुआ और डोडा के अलग-अलग क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियां चला रहा है। जम्‍मू में काफी भीड़-भाड़ रहती है, ऐसे में आतंकियों की पहचान करने में मुश्किल आती है।

आतंकवादियों से ज्यादा शहीद क्यों हो रहे हैं हमारे सैनिक?

वर्तमान में हमारे सैनिक बहुत ही ज्यादा संख्या में शहीद होते जा रहे हैं! जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी घटनाओं में इजाफा हुआ है। सोमवार को डोडा में आतंकियों के साथ हुए मुठभेड़ में एक मेजर समेत 4 सैन्यकर्मियों की मौत हुई। उससे एक हफ्ते पहले कठुआ में सेना के 2 ट्रकों पर आतंकी हमले में 5 जवानों ने बलिदान दिया। इस साल अबतक जम्मू क्षेत्र में आतंकी हमले में 11 सैन्यकर्मी सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं। इसमें इंडियन एयर फोर्स का भी एक जवान शामिल है। दूसरी तरफ, इस साल जम्मू रिजन में अबतक सिर्फ 5 आतंकी ही मारे गए हैं। यानी इस साल अबतक जम्मू क्षेत्र में जितने आतंकी मारे गए हैं, उससे करीब दोगुने सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है। जम्मू क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में 2021 के बाद तेजी आई है। तब से लेकर अबतक 34 सैनिक सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं जबकि इसी अवधि में 40 आतंकी मारे गए हैं। जम्मू में आखिर क्यों बढ़ी हैं आतंकी घटनाएं? आइए समझते हैं। अगस्त 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म किए जाने और सूबे के 2 केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजन के बाद घाटी में तो आमतौर पर शांति है, लेकिन जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। खासकर, 2021 के बाद पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। सुरक्षा बलों के साथ-साथ सिविलियंस पर आतंकी हमले बढ़े हैं।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के उदय और उसके चरम पर पहुंचने के बाद 2003 आते-आते पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाके में आतंकवाद नियंत्रित हो चुका था। यह बात पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने भी इस साल जनवरी में कही थी। उन्होंने कहा कि इलाके में 2017-18 तक शांति रही। उसके बाद घाटी तो लगभग शांत है लेकिन जम्मू क्षेत्र अशांत है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अब जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद को नए सिरे से खड़ा करने में जुटी हुई है। इसकी एक वजह ये है कि एलओसी पर आतंकी घुसपैठ के मुकाबले इंटरनैशनल बॉर्डर से घुसपैठ आसान है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से छद्म तंजीमों के नाम पर लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन नए सिरे से सिर उठा रहे हैं। इस नापाक गठजोड़ का सिर नहीं कुचला गया तो आने वाले वक्त में जम्मू की शांति को गंभीर खतरा हो सकता है।

जम्मू क्षेत्र में 2022 और 2023 में सुरक्षा बलों पर 3-3 आतंकी हमले हुए थे। लेकिन इस साल भी ही सुरक्षा बलों पर 6 आतंकी हमले हो चुके हैं। 2022 में आतंकी हमलों में 6 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। 2023 में ये आंकड़ा 21 था और इस साल अबतक 11 सैनिक सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं।

जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों में इजाफे की एक वजह 2021 के बाद वहां सैन्य तैनाती में कमी भी है। 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच खूनी झड़प के बाद से ही लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर तनाव है। उसके बाद से ही वहां दोनों ओर से भारी सैन्य तैनाती की गई है। उसका असर जम्मू क्षेत्र में सैन्य तैनाती पर भी पड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में जम्मू क्षेत्र से करीब 4000 से 5000 सैनिकों को मूव किया गया था। आने वाले दिनों में जम्मू रिजन में सैन्य तैनाती बढ़ाई जा सकती है।

रिपोर्ट में राज्य पुलिस के सूत्रों के हिसाब से बताया है कि जम्मू में सुरक्षा बलों पर बढ़ते आतंकी हमलों के पीछे आतंक के आकाओं की सोची-समझी रणनीति है। रिपोर्ट में एक सूत्र के हवाले से कहा गया है, ‘2019 में जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बदलाव के बाद घाटी तो तकरीबन शांत है लेकिन तभी 2020 में गलवान (पूर्वी लद्दाख) में झड़प हो गई। उसके बाद से ही जम्मू क्षेत्र में आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं। इस तरह सेना के लिए एक तरह से तीन मोर्चे खुल गए हैं।’

जम्मू क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों में बढ़ोतरी की एक वजह लोकल और ग्राउंड लेवल इंटेलिजेंस में कमी को भी माना जा सकता है। हालांकि, आतंकियों ने अब लोकल स्तर पर लॉजिस्टिक सपोर्ट नहीं ले रहे हैं और छिपने के लिए गुफाओं और जंगलों का इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि किसी स्लीपर सेल के यहां पनाह ले रहे हैं। 2021 के बाद पीर पंजाल की पहाड़ियों के दक्षिण के इलाकों में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं। सुरक्षा बलों के साथ-साथ सिविलियंस पर आतंकी हमले बढ़े हैं।द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन आतंकी हमलों का नेतृत्व पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड सैनिकों की तरफ से किया जा रहा है।

जम्मू कश्मीर में क्यों मारे नहीं जा रहे आतंकवादी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवादी क्यों नहीं मारे जा रहे! करीब 20 सालों तक शांत रहे जम्मू में आखिर ऐसा क्या हो गया कि करीब तीन साल से वहां आतंकी कई वारदातों को अंजाम दे चुके हैं? घात लगाकर सिक्योरिटी फोर्स को ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं। सुरक्षा बलों के गहन अभियानों के बावजूद आतंकी अपने मंसूबों में सफल हो जा रहे हैं। जुलाई का महीना अभी पूरा गुजरा भी नहीं है कि भारतीय सेना के नौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। ढाई महीने में सुरक्षा बलों के कुल 13 सैनिकों की शहादत हुई है जबकि आतंकी सिर्फ तीन मारे गए हैं। आतंकी कम्युनिकेशन के लिए हाईलेवल इनक्रिप्टेड सेट, अल्ट्रा सेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह रेडियो कम्युनिकेशन सेट चीन मेड है और पाकिस्तान की सेना भी इसका इस्तेमाल करती है। मेजर जनरल यश मोर (रिटायर्ड) कहते हैं कि पहले हम आतंकवादियों की कम्युनिकेशन पकड़ लेते थे और इससे उनके मंसूबों का पता चल जाता था, लेकिन पिछले 1-2 साल में आतंकियों के पास अल्ट्रा सेट हैं जो पकड़ में नहीं आते इसलिए हमारी सिक्यॉरिटी फोर्स उन्हें पकड़ नहीं पा रही है। मेजर जनरल मोर के मुताबिक यह एक बड़ी वजह है जिससे आतंकी अपने मंसूबों में सफल हो पा रहे हैं क्योंकि उनकी भनक नहीं लग पा रही है।

मेजर जनरल मोर कहते हैं कि जिस तरह से आतंकी हमला कर रहे हैं उससे साफ है कि वे काफी ट्रेंड हैं। वे उन जगहों पर अटैक कर रहे हैं जहां सिक्यॉरिटी फोर्स हमले की सबसे कम आशंका मान रही है और वे सरप्राइज दे रहे हैं। साथ ही झूठी जानकारी या दूसरे तरीकों से ट्रैप कर रहे हैं और फिर घात लगाकर हमला कर रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (रिटायर्ड) ने डोडा, पुंछ, रजौरी इलाके की टेरेन बताते हुए कहा कि वहां विजिबिलिटी काफी कम होती है और अगर ऊंचाई से कोई घात लगाकर हमला करे तो वह उसके पक्ष में होता है। यहां आतंकी अपने टाइम पर पूरी रेकी कर हमला कर रहे हैं। इसलिए हर वक्त सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ये इलाके कई सालों तक शांत रहे लेकिन आतंकी अब इन्हें चुन रहे हैं तो सिक्यॉरिटी फोर्स को एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) का पूरा पालन करना होगा। शांत माने जा रहे इलाके में भी रिस्क नहीं लिया जा सकता और हर वक्त अलर्ट रहना होगा।

आतंकी जिस तरह वारदात कर भागने में सफल हो रहे हैं, उससे ह्यूमन इंटेलिजेंस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विदेशी आतंकी इलाके में हैं और वारदात कर रहे हैं लेकिन उनकी जानकारी क्यों नहीं मिल पा रही है? लेफ्टिनेंट जनरल कुलकर्णी कहते हैं कि मैंने खुद डोडा एरिया में कमांड किया है। किसी भी ऑपरेशन के लिए लोकल सोर्स बेहद अहम होते हैं। लोकल ही हमारे आंख-कान होते हैं। वे बताते हैं कि कहीं कोई संदिग्ध व्यक्ति दिख रहा है या कोई संदिग्ध हरकत दिख रही है। यह जानकारी भी लोकल से ही मिलती रहती थी कि बाहर से कब कहां कोई आया है। वह कहते हैं कि ह्यूमन इंटेलिजेंस पर ध्यान देने की जरूरत है। मेजर जनरल मोर भी सवाल उठाते हैं कि हम्यूमन इंटेलिजेंस बेस कैसे खत्म हो गया जबकि इतने सद्भावना के कार्यक्रम चलते हैं। वह कहते हैं कि ह्यूमन इंटेलिजेंस के लिए लगातार प्रयास करना होता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस से समन्वय से क्यों जानकारी नहीं मिल पा रही है।चार साल पहले जब चीन के साथ तनाव शुरू हुआ तो इस इलाके से सैनिकों को वहां भेजा गया। भारतीय सेना की आरआर फोर्स- रोमियो, डेल्टा, यूनिफॉर्म फोर्स के पास यहां अलग-अलग इलाके का जिम्मा था। लेकिन करीब चार साल पहले जब ईस्टर्न लद्दाख में चीन के साथ एलएसी पर तनाव बढ़ा और स्थिति हिंसक झड़प तक पहुंच गई तब यहां से यूनिफॉर्म फोर्स को हटाकर एलएसी पर भेज दिया गया। यहां से तीन ब्रिगेड जितने सैनिकों को कम किया गया। उनकी संख्या कम होने की वजह से बाकी फोर्स के पास उन इलाकों का जिम्मा भी आ गया जहां यूनिफॉर्म फोर्स तैनात थी। जानकारों के मुताबिक इसका फायदा भी आतंकियों ने उठाया और खुद को फिर से खड़ा करने के लिए काम किया।

पिछले कुछ समय में भारतीय सेना ने इन इलाकों में गैप भरने के लिए ज्यादा सैनिकों की तैनाती की है लेकिन सूत्रों के मुताबिक अब भी वह पुराने नंबर को मैच नहीं करते, यानी उतनी फोर्स नहीं है जितनी चार साल पहले थी। मेजर जनरल यश मोर (रिटायर्ड) कहते हैं कि जो आरआर फॉर्मेशन को चीन फ्रंट पर भेजा गया था उसे वापस लाया जाना चाहिए। लेफ्टिनेंट जनरल कुलकर्णी (रिटायर्ड) कहते हैं कि फौज ने 22-23 साल पहले वह इलाका आंतकियों से मुक्त कर सिविल एडमिनिस्ट्रेशन को दे दिया तो उनकी जिम्मेदारी बनती थी कि वे उस इलाके को शांत रखें, इंटेलिजेंस इक्ट्ठा करें और आतंकियों को फिर पनपने ना दें। वह कहते हैं कि फौज थ्रेट परसेप्शन के हिसाब से तैनाती करती है और रीडिप्लॉयमेंट करती है। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी को बढ़ा रहा है और इंटरनल सिक्योरिटी उनका काम है, फौज का काम एक्सटर्नल सिक्योरिटी है।

बेटी को दूसरी शादी के लिए उकसाने वाले मां-बाप से क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बेटी को दूसरी शादी से के लिए उकसाने वाले मां-बाप को खरी -कोटी सुनाई है! एक महिला ने पहली शादी के वैध रहते हुए दूसरी शादी कर ली। उसके माता-पिता ने भी उसका साथ दिया। दूसरी शादी से महिला को एक बच्चा भी हुआ लेकिन दूसरा पति अपनी पत्नी की पहली शादी से अनजान था। जब राज खुला तो उसने पत्नी के साथ-साथ उसके माता-पिता के खिलाफ भी केस दर्ज कराया। माता-पिता पर आरोप लगा अपनी बेटी को पहली शादी के प्रभावी रहते हुए दूसरी शादी करने के लिए उकसाने का। इस मामले में माता-पिता अदालत से दोषी भी करार दिए गए लेकिन सजा मामूली मिली। उन्हें सजा सुनाए जाने वाले दिन अदालत की कार्यवाही पूरी होने तक के लिए कैद की सजा सुनाई थी। शख्स ने सजा को मामूली बताते हुए इसे चुनौती दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने सजा को अपराध की गंभीरता के हिसाब से कम बताते हुए पत्नी के माता-पिता को 6 महीने कैद की सजा सुनाई है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ये फैसला सुनाया। महिला के माता-पिता ने पहली शादी के रहते हुए अपनी बेटी की दूसरी शादी कराने में मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा सुनाई जानी चाहिए। इससे पहले निचली अदालत ने महिला के माता-पिता को सिर्फ कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद की सजा सुनाई थी। जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने अपराध की प्रकृति और जिस तरह से इसे अंजाम दिया गया, उसे ध्यान में रखते हुए पत्नी के माता-पिता की सजा बढ़ाकर 6 महीने की कर दी।

जस्टिस सीटी रविकुमार के लिखे फैसले में कहा गया, ‘एक बार जब यह पाया जाता है कि आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध एक गंभीर अपराध है, तो इस मामले में मौजूद परिस्थितियां हमें यह मानने के लिए मजबूर करती हैं कि ‘कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद’ उचित सजा नहीं है। यह सजा देने में आनुपातिकता के नियम के अनुरूप नहीं है।’

इस मामले में महिला ने पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी रचाई थी। दूसरी शादी से एक बच्चे का जन्म भी हुआ था। दूसरे पति से पहली शादी के बारे में छिपाया गया था। महिला के माता-पिता पर अपनी बेटी की पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी कराने में मदद करने का आरोप था। महिला ने आईपीसी की धारा 494 के तहत दो विवाह करने का गुनाह किया और उसके माता-पिता ने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया। निचली अदालत ने पत्नी को दो विवाह करने और उसके माता-पिता को अपनी बेटी को ऐसा करने के लिए उकसाने का दोषी ठहराया था। शिकायतकर्ता-दूसरे पति ने माता-पिता को सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी।

महिला के माता-पिता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध के लिए कोई न्यूनतम सजा तय नहीं है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक राज्य बनाम कृष्णा उर्फ राजू, (1987) 1 SCC 538 के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि न्यूनतम सजा निर्धारित न होने का मतलब यह नहीं है कि अदालतें अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखे बिना मामूली सजा सुना दें।

कृष्णा उर्फ राजू मामले में अदालत ने सजा को बहुत ही कम या ‘मामूली’ बताते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में अत्यधिक सहानुभूति आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कम करेगी। इस तरह अदालत ने कहा कि भले ही सजा देना न्यायिक विवेक के दायरे में आता है, लेकिन सजा अपराध की प्रकृति के अनुपात में होनी चाहिए। अपराध की जैसी गंभीरता, उसी के हिसाब से सजा।

अदालत ने कहा, ‘संक्षेप में, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सजा सुनाते समय अदालत को अपराध की प्रकृति, उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है जिनके तहत इसे अंजाम दिया गया था। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ये फैसला सुनाया। महिला के माता-पिता ने पहली शादी के रहते हुए अपनी बेटी की दूसरी शादी कराने में मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए सजा सुनाई जानी चाहिए। इससे पहले निचली अदालत ने महिला के माता-पिता को सिर्फ कोर्ट के कामकाज खत्म होने तक की कैद की सजा सुनाई थी। अपराधी द्वारा दिखाई गई सोच, उसके पिछले रिकॉर्ड आदि को ध्यान में रखना होता है। कोई असाधारण परिस्थितियां न होने पर सजा देते समय आनुपातिकता के नियम का पालन किया जाना चाहिए।’

आखिर एक ही सांप एक व्यक्ति को सात बार कैसे डस सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक ही सांप एक व्यक्ति को सात बार कैसे डस सकता है! उत्तर प्रदेश के सौरा गांव के 24 वर्षीय निवासी विकास द्विवेदी बार-बार सांप के काटने से जुड़ी एक हैरान करने वाली कहानी को लेकर चर्चा में हैं। विकास का दावा है कि उसे महज 40 दिनों में सात बार सांप काट है। विकास के अनुसार पहली बार सांप काटने के बाद उसके सपने में आया था। विकास के अनुसार सांप ने कहा था कि वह उसे 9 बार काटेगा। विकास का कहना है कि सांप ने सपने में कहा था कि 8 बार तो वह बच जाएगा लेकिन नौवीं बार काटने पर उसे कोई नहीं बचा पाएगा। सांप काटने की इस घटना को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। जिला प्रशासन की तरफ से इस मामले में कमेटी बनाकर मामले की रिपोर्ट मांगी गई है। इस खबर के बाद विकास के परिवार के साथ ही गांव में चिंता और डर का माहौल है। विकास का कहना है कि सांप ने हमेशा उसे सोते समय काटा है। अब तो उसके पूरी तरह से डर लगा रहा है कि सांप उसे नौंवी बार भी काट लेगा। हालांकि, यह अभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है कि एक ही सांप ने विकास को 7 बार काटा है। इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या एक ही सांप किसी शख्स को बार-बार काट सकता है। आखिर इस मामले में को लेकर एक्सपर्ट्स की क्या राय है। न्यूज 18 की रिपोर्ट में इन सांपों के व्यवहार और इलाज को लेकर एक्सपर्ट जोधपुर, राजस्थान के एक प्रसिद्ध सांप पकड़ने वाले तौहीद अहमद खान से बातचीत की।

तौहीद ने पहले तो इस घटना को लेकर हैरानी जताई। तौहीद का खुद भी कई बार सांपों के साथ वास्ता पड़ा है। तौहीद का कहना है कि सांप का जहर पीड़ितों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। उन्होंने आगे कहा कि सांप काटने पर सटीक एंटी-वेनम इलाज की आवश्यकता होती है जो विशिष्ट प्रकार के सांप के लिए अनुकूलित हो। उन्होंने बार-बार काटने के खतरे और उनके द्वारा होने वाले शारीरिक नुकसान को भी बताया।

आमतौर पर सांप विषैले और गैर विषैले दोनों होते हैं। विष एक जहरीला पदार्थ है जो सांप अपने शिकार को पकड़ने, खुद की रक्षा करने और भोजन को पचाने में मदद करने के लिए बनाता है। यदि कोई सांप विषैला है, तो वह अपने दांतों (नुकीले दाँतों) के माध्यम से जिस किसी को भी काटता है, उसमें विष डाल देता है। सां पों की कई प्रजातियाँ कुछ खास तरह के विष रखती हैं जो आपके शरीर को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। बता दें कि उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित सोरा गांव इस समय एक अजीबोगरीब घटना के चलते पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं इस जगह का कनेक्शन दौसा जिले के प्रसिद्ध आस्थाधाम मेहंदीपुर बालाजी से भी जुड़ गया है। दरअसल, उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के मलवा थाना क्षेत्र के सोरा गांव निवासी 24 वर्षीय विकास द्विवेदी उर्फ बेटू पुत्र सुरेंद्र द्विवेदी को एक सांप अब तक 7 बार काट चुका है। वहीं सांप सपने में आकर पीड़ित को 9 बार काटने की चेतावनी दे चुका है। इस समस्या के समाधान के लिए कई जगह तांत्रिकों के चक्कर काटने के बाद अब पीड़ित विकास द्विवेदी अपनी परिवार और रिश्तेदारों के 11 सदस्यों के साथ दौसा जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ मेहंदीपुर बालाजी धाम में आया है। वहीं इस विकट परिस्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए बालाजी महाराज से प्रार्थना कर रहा है।

वहीं जब इस मामले की पड़ताल के लिए टीम पीड़ित विकास द्विवेदी से मिलने के लिए मेहंदीपुर बालाजी में स्थित एक विश्राम गृह में पहुंची। जहां विकास द्विवेदी अपने परिवार के साथ ठहरा हुआ है। विश्राम गृह में विकास द्विवेदी कुछ भी बताने की हालत में नहीं था। लेकिन उसके दोनों हाथों और पैरों पर सांप के काटने के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। ऐसे में काफी समझाने के बाद पीड़ित विकास कैमरे ने सामने बोलने को तैयार हुआ। पीड़ित विकास ने बताया कि चित्रकूट हनुमान जी के दर्शन कर 30 मई को गांव आया था। इस दौरान 2 जून की रात करीब 8 बजे टॉयलेट जाते समय सांप ने काट लिया। इसके बाद परिजन नजदीकी अस्पताल में ले गए। जहां इलाज के बाद ठीक हो गया। लेकिन उसके बाद 9 जून को सांप ने फिर से काट लिया। इस घटना के बाद परिवार के सदस्य भी भयभीत हो गए। लेकिन इस बार भी जान बच गई।

पीड़ित विकास द्विवेदी ने दावा किया है कि 16 जून शनिवार को सांप काटने से पहले सपने में आया। इस दौरान सांप ने उसे 9 बार काटने की चेतावनी दी थी। साथ ही सपने में कहा कि 8 बार तो जान बच जाएगी। लेकिन 9 वीं बार किसी भी हालत में जिंदा नहीं बचेगा, और इतना कहने के बाद तीसरी बार सांप ने काट लिया। इस घटना के बाद पीड़ित विकास ने सपने के बारे में अपने परिजनों को बताया। ऐसे में सांप के भय से भयभीत परिजनों ने विकास को 200 किलोमीटर दूर अपनी मौसी के यहां फतेहपुर में रहने के लिए भेज दिया। लेकिन जिद्दी सांप ने विकास का फतेहपुर में भी पीछा नहीं छोड़ा और 23 जून शनिवार की रात सोते समय चौथी बार काट लिया।

ऐसे में अब आखिरी उम्मीद लगाकर पीड़ित परिवार संकटमोचन के नाम से फेमस मेहंदीपुर बालाजी में आए है। यहां बालाजी महाराज के दरबार में पूरा परिवार इस अजीबोगरीब परेशानी से छुटकारा दिलाने के लिए बालाजी महाराज से प्रार्थना कर रहा है। पीड़ित के साथ आए रिश्तेदारों ने बताया कि पीड़ित परिवार की स्थिति बेहद तनावग्रस्त बनी हुई है। साथ ही आर्थिक स्थिति भी कमजोर है।