Thursday, March 5, 2026
Home Blog Page 687

जब एक उम्मीदवार और दो सीटों पर चुनाव होते थे !

एक ऐसा भी समय था जब एक उम्मीदवार होता था और दो सीटों पर चुनाव होते थे! इस आम चुनाव में कितने नेता दो सीटों पर खड़े होंगे, इस पर सस्पेंस कायम है। चर्चा इसलिए कि हर चुनाव में कोई न कोई बड़ा नेता दो या कभी-कभी इससे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ता रहा है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी यूपी के अमेठी और केरल के वायनाड से मैदान में थे। अमेठी सीट पर स्मृति इरानी से उन्हें हार मिली थी और वह वायनाड से लोकसभा पहुंचे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की वडोदरा और यूपी की वाराणसी सीट से लड़े थे। दोनों सीटों पर जीत के बाद मोदी ने वड़ोदरा की सीट छोड़ी, जिसके बाद वहां उप-चुनाव कराने पड़े थे। साल 2014 में ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी और आजमगढ़ से चुनाव लड़ा था और वह भी दोनों सीटें जीत गए थे, जिसके बाद उन्होंने मैनपुरी सीट छोड़ी थी। भारतीय राजनीति में दल और उम्मीदवार कई वजहों से दो सीटों पर किस्मत आजमाते हैं। इनमें कई बार जीतने वाला फैक्टर तो कई बार विरोधियों के टिकट काटने की रणनीति काम करती है। इंदिरा गांधी ने 1980 में रायबरेली और मेडक दोनों सीटों पर दावेदारी रखी थी। साल 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी विदिशा और लखनऊ से खड़े हए, उसी साल लालकृष्ण आडवाणी ने दिल्ली और गांधी नगर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था। उसके बाद वाले चुनाव में वाजपेयी 1996 में गांधी नगर और लखनऊ से चुनावी मैदान में खड़े हुए और जीत हासिल की, तो 1999 में सोनिया गांधी ने बेल्लारी (कर्नाटक) और अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, जहां वह दोनों सीटों से जीती भी थीं।

एक चुनाव में तीन सीटों से लड़ने का उदाहरण भी सामने है। साल 1957 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा था। उन्हें लखनऊ, बलरामपुर और मथुरा से टिकट दिया गया था, लेकिन लखनऊ और मथुरा में वह हार गए थे। साल 1985 में आंध्र प्रदेश के दिग्गज राजनेता एन.टी. रामाराव ने विधानसभा में तीन सीटों से चुनाव लड़ा और जीता भी। मुलायम सिंह यादव ने 1993 के विधानसभा चुनावों में तीन सीटों पर दम ठोंका था और तीनों जीत भी गए थे। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव साल 2009 में सारण और पाटलिपुत्र से चुनाव मैदान में उतरे और जीते भी। साल 1991 में देवीलाल सीकर, रोहतक और फिरोजपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे, इसमें से दो सीटें उन्होंने जीतीं, लेकिन फिरोजपुर से हार गए। साल 1996 में कानून बदला और कोई नेता अधिकतम दो ही सीटों पर चुनाव लड़ सकता है।

जनप्रतिनिधत्व कानून के तहत कोई प्रत्याशी दो सीटों से चुनाव लड़ सकता है। यह मामला शीर्ष अदालत के सामने आया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह संसद को तय करना है कि कैंडिडेट दो सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं या नहीं। यानी मौजूदा समय में एक कैंडिडेट दो सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33 (7) एक कैंडिडेट को दो सीटों पर चुनाव लड़ने की इजाजत देती है। इसी कानून की धारा-70 कहती है कि दो सीटों से चुनाव लड़ने के बाद अगर प्रत्याशी दोनों सीटें जीत लेता है, तो उसे एक सीट से इस्तीफा देना होता है।

कानूनी जानकार और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय बताते हैं कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है कि वह कैंडिडेट का रेकॉर्ड और उसकी योग्यता को देखे और उसी हिसाब से वोटिंग करे। अगर दो जगह से कैंडिडेट जीतता है तो उसे एक सीट छोड़नी होती है और उस सीट पर दोबारा चुनाव होता है। दोबारा उपचुनाव होने से सरकार पर आर्थिक बोझ पड़ता है और साथ ही भारी संख्या में लोगों को चुनाव के लिए लगाना पड़ता है। इस तरह से देखा जाए तो वोटरों के साथ यह अन्याय है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा था कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा-33 (7) का प्रावधान सही है। सरकार का स्टैंड है कि इस कानून में अगर बदलाव किया जाएगा तो इससे उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन होगा। भारतीय राजनीति में दल और उम्मीदवार कई वजहों से दो सीटों पर किस्मत आजमाते हैं। इनमें कई बार जीतने वाला फैक्टर तो कई बार विरोधियों के टिकट काटने की रणनीति काम करती है।इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट की धारा-33 (7) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। चुनाव आयोग ने सुधारों के अपने प्रस्ताव में एक से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने पर बैन लगाने की सिफारिश की है।

क्या पूर्वांचल हो चुका है माफियाओं से मुक्त ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि पूर्वांचल माफियाओं से मुक्त हुआ है या नहीं! यूपी की बांदा जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी की गुरुवार को मौत हो गई। मुख्तार की मौत कार्डियक अरेस्ट की वजह से हुई। मुख्तार की मौत के साथ ही पूर्वांचल में अपराध के एक युग का अंत हो गया। पूर्वांचल के दो सबसे बड़े बाहुबली अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी का सालभर में मारे गए। पिछले साल अतीक अहमद को पुलिस हिरासत में बदमाशों ने गोलियों से भून दिया, तो वहीं मुख्तार अंसारी के परिवार का आरोप है कि उन्हें जेल में धीमा जहर देकर मारा गया। अतीक और मुख्तार पूर्वांचल के दो ऐसे नाम से जो दशकों से राजनीतिक संरक्षण में कई काले कारनामों को अंजाम देते रहे। दोनों के खिलाफ कई गंभीर मामले चल रहे थे। दोनों बाहुबलियों ने पूर्वांचल में गाजीपुर से प्रयागराज तक अपना दबदबा चलाया। उन पर हत्या, जमीन हथियाना, सुपारी लेकर हत्या करना, अपहरण और वसूली जैसे गंभीर अपराधों के आरोप थे। उनके गुर्गे इन सब गलत कामों को अंजाम देते थे। दोनों का रौब ऐसा था जैसे ये कोई असली नहीं बल्कि वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ या फिल्म ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की कहानी हो। मुख्तार अंसारी हो या अतीक अहमद दोनों अपराधी तो थे ही, लेकिन इनका कद बढ़ाने के पीछे राजनीतिक पार्टियों का हाथ था। सपा और बसपा दोनों पार्टियों ने अतीक और अंसारी का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए किया। पूर्वांचल ऐसे माफियाओं और संगठित अपराध के लिए बदनाम हो गया था। मुख्तार अंसारी 1995 से 2022 तक लगातार पांच बार मऊ से विधायक रहे। बिना किसी सजा के वो लगभग 27 साल विधायक रहे। हालांकि 2014 के बाद, खासकर 2017 में केंद्र और फिर राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से सब बदल गया। सीएम योगी खुद भी पूर्वांचल के गोरखपुर से ही आते हैं, ऐसे में उनका फोकस पूर्वाचंल की छवि बदलने पर रहा।

माफियाओं के खिलाफ योगी सरकार का बुलडोजर ऐक्शन बहुत तेजी से चला। इस ऐक्शन के तहत अतीक और मुख्तार दोनों की अवैध संपत्तियों को या तो जब्त कर लिया गया या जमींदोज कर दिया गया। इसी तरह से उत्तर प्रदेश में ‘बाबा का बुलडोजर’ मॉडल फेमस हुआ। योगी सरकार ने अतीक और मुख्तार के लंबे समय से पेंडिग मामलों को अदालत में तेजी से आगे बढ़ाया, जिससे उन्हें आखिरकार सजा मिली। उनकी आर्थिक और कानूनी सुरक्षा दोनों खत्म हो गई। योगी के शासन में ही अतीक और अंसारी को पहली बार सजा सुनाई गई।

अंसारी 2005 से पिछले 18 सालों से जेल में था, उस पर 66 मामले दर्ज हैं, लेकिन अब तक वो किसी मामले में सजायाफ्ता नहीं था। मगर 2017 के बाद से उसे आठ बार सजा सुनाई जा चुकी है। पिछले साल मई में 32 साल पुराने अवधेश राय मर्डर केस में अंसारी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इस मामले में गवाही प्रभावित करने या कोर्ट की कार्यवाही में रूकावट डालने की उसकी चालों का अंत हो गया। राय हत्याकांड में 32 साल बाद उसे सजा मिली। इसी तरह 2021 में वाराणसी के भेलूपुर थाने में 1997 में दर्ज एक मामले में 24 साल बाद उसके खिलाफ आरोप तय किए गए। 2022 में आगरा के जगदीशपुर थाने में 1999 में दर्ज एक अन्य मामले में भी 23 साल बाद आरोप तय किए जा सके। साथ ही लखनऊ के आलमबाग थाने में 2000 में उसके खिलाफ दर्ज एक मामले में भी 21 साल बाद 2021 में आरोप तय किए गए। इससे पहले पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर उसके प्रभाव का पता चलता है।

इससे पहले, मुख्तार अंसारी के एक खास गुर्गे और शूटर मुन्ना बजरंगी को भी 2018 में बागपत जेल में ही मार दिया गया था। अतीक अहमद के खिलाफ भी 2017 से ही लगातार पुलिस कार्रवाई होती रही, पिछले साल उन्हें उनके भाई के साथ गोली मार दी गई थी। अतीक अहमद की मौत से कुछ दिन पहले ही उसके बेटे असद अहमद की भी पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई। पुलिस ने अतीक की 1400 करोड़ रुपये की संपत्तियों को जब्त कर लिया और करीब 50 बेनामी कंपनियों को सील कर दिया गया, जिनका इस्तेमाल अतीक वसूली से कमाए काले धन को सफेद करने के लिए करता था।

वहीं यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने सदन में कहा था कि ‘हम माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’ और कुछ ऐसा ही अतीक और मुख्तार के मामले में हुआ लगता है, हालांकि उनकी मौत विवादों में घिरी हुई है। मुख्तार के परिवार का हाल ही में ये आरोप था कि जेल में उन्हें धीरे-धीरे जहर दिया जा रहा है। उनकी मौत के बाद अब इन आरोपों की गहन जांच हो सकती है। लेकिन, बड़ी बात ये है कि पूर्वांचल अब अपने दो सबसे बड़े माफियाओं से मुक्त हो गया है और इसी के साथ बाहुबली और गुंडे से नेता बनने वालों का दौर भी खत्म हो गया है।

आखिर केजरीवाल सरकार को क्यों बर्खास्त नहीं कर पा रही केंद्र सरकार? जानिए!

यह सवाल उठना लाजिमी है कि केंद्र सरकार केजरीवाल सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं कर पा रही! दिल्ली शराब घोटाले का आरोप में गिरफ्तार अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ने पर घमासान मचा हुआ है। अब केंद्र सरकार से भी सवाल पूछा जाने लगा है कि आखिर वो दिल्ली में राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगा रही है? इसके जवाब में केंद्र की सत्ता में आसीन बीजेपी एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दे रही है। उधर, बीजेपी से सवाल करने वाले उस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि पार्टी डरी हुई है कि केजरीवाल सरकार को बर्खास्त करने से कहीं आम जनता के मन में आम आदमी पार्टी के प्रति सहानुभूति न पैदा हो जाए। इनका कहना है कि दिल्ली संवैधानिक संकट के दौर से गुजर रहा है तो केंद्र सरकार मूकदर्शक बने नहीं बैठी रह सकती है। परंपरा तोड़कर ईडी की हिरासत से ही सरकार चलाने की सीएम अरविंद केजरीवाल की जिद्द पर न्यूज चैनलों में भी बहस हो रही है। इसी तरह के एक कार्यक्रम में बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुधांशु तिवारी और पूर्व पत्रकार एवं पूर्व आप नेता आशुतोष के बीच दलीलों का दौर चला। दोनों की दलीलों के बीच हम यह भी जानेंगे कि आखिर एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट का वो ऑर्डर क्या था जिसका हवाला देकर बीजेपी केजरीवाल सरकार को बर्खास्त नहीं करने को जायज बता रही है। आशुतोष ने बीजेपी और आप, दोनों पर संवैधानिक मर्यादा का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल का सीएम पद से इस्तीफा नहीं देना, ऊपर से दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) का कोई कदम नहीं उठाना, संविधान के साथ मजाक नहीं तो और क्या है। आशुतोष कहते हैं कि जेल जाते ही अरविंद केजरीवाल कोई फैसला लेने में अक्षम हो गए हैं, इसलिए वो सरकार नहीं चला सकते। ऐसे में उपराज्यपाल (वीके सक्सेना) की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वो विधानसभा अध्यक्ष के जरिए सदन को बताएं कि चूंकि अरविंद केजरीवाल अब मुख्यमंत्री के रूप में अक्षम हो चुके हैं तो आप सदन का नया नेता चुन लें। अगर विधानसभा अपना नया नेता नहीं चुने तो एलजी का अगला दायित्व केंद्र सरकार को वाकिफ करवाने का है कि चूंकि दिल्ली विधानसभा ने नया नेता चुनने को तैयार नहीं है, इस कारण प्रदेश में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है जिसके समाधान के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।

इस पर सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जब विधानसभा सत्र में है तब एलजी कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं? ध्यान रहे कि दिल्ली की विधानसभा का हमेशा सत्र में रहती है। उन्होंने आगे एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया। उन्होंने कहा, ‘एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी सरकार को रहने का अधिकार है या नहीं, यह सिर्फ सदन के पटल पर तय हो सकता है। उसमें ये भी लिखा हुआ है कि यह बात किसी व्यक्ति की निजी राय का विषय नहीं हो सकती, चाहे वह व्यक्ति राज्यपाल या राष्ट्रपति ही क्यों न हो।’

उन्होंने आगे कहा, ‘इसका उदाहरण भी है। 22 अक्टूबर, 1997 को उत्तर प्रदेश की विधानसभा सत्र में थी। हमारे विरोधी दलों ने जाकर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को ज्ञापन दिया कि मुलायम सिंह यादव की सरकार बहुमत खो चुकी है, उसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाए। राज्यपाल ने सरकार को बर्खास्त कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को निरस्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोम्मई केस के फैसले को ही आधार बनाकर अपना आदेश दिया था।’

इस पर आशुतोष ने जवाब दिया, ‘यह सही है कि राज्यपाल के पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि वो मौजूदा सरकार के पास बहुमत है कि नहीं। लेकिन यहां बात संवैधानिक संकट की है। अगर संवैधानिक संकट पैदा होने की स्थिति में राज्यपाल दिल्ली के मामले में एलजी को पूरा अधिकार है कि वो तय करें कि संवैधानिक संकट पैदा हुआ या नहीं।’

खैर आइए जानते हैं कि एसआर बोम्मई केस क्या है और इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था। बात वर्ष 1989 की है। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाकर कर्नाटक में जनता दल के नेतृत्व वाली एसआर बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया। तत्कालीन राज्यपाल पी. वेंकट सुब्बैया ने कहा कि उन्हें 19 विधायकों ने सरकार से समर्थन वापसी का पत्र दिया। इस कारण उन्होंने केंद्र सरकार से प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि बोम्मई सरकार के पास बहुमत नहीं था, इसलिए उनका पद पर बने रहना असंवैधानिक हो गया। दूसरी तरफ कोई भी अन्य राजनीतिक दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था।

दरअसल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पद से इस्तीफा नहीं देने पर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली की जनता के बीच बहुत पहले एक सर्वे करवाने का दावा किया था और अब कह रही है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, इसलिए उसकी इच्छा के मुताबिक केजरीवाल जेल से ही सरकार चलाएंगे। आप का यह भी कहना है कि संविधान में कहीं यह नहीं कहा गया है कि जेल से सरकार नहीं चलाई जा सकती है। इसलिए अरविंद केजरीवाल अगर गिरफ्तारी के बाद भी मुख्यमंत्री बने हुए हैं तो इसमें कुछ भी असंवैधानिक या गैर-कानूनी नहीं है।

हालांकि, बीजेपी समेत उनके विरोधियों का कहना है कि जो पार्टी राजनीतिक शुचिता की दुहाई देकर ही गठित हुई, उसके नेता आज नैतिकता को ऐसी दुलत्ती दे रहे हैं, यह कल्पना से परे है। ऐसा कहने वाले हाल ही में भ्रष्टाचार के आरोप में ही गिरफ्तार होकर जेल गए झारखंड के मुख्यमंत्री समेत अतीत के अन्य मुख्यमंत्रियों का हवाला दे रहे हैं जिन्होंने जेल जाने से पहले पद से इस्तीफा दे दिया था। दलील यह है कि बात नियम-कानून से इतर नैतिकता और राजनीतिक परंपरा की है।

आखिर चुनाव में एक कैंडिडेट कितना रुपया खर्च कर सकता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि चुनाव में एक कैंडिडेट कितना रुपया खर्च कर सकता है !लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही राजनीति के इस महाकुंभ की शुरुआत हो गई है। 19 अप्रैल से 1 जून तक चलने वाले इस चुनावी अखाड़े में कई दिग्गज आमने-सामने होंगे। हालांकि देखा जाए तो मुकाबला दो टीमों के बीच ही होगा। एक तरफ तीसरी बार जीत के रथ पर चढ़ने को बेकरार एनडीए है तो सामने सालभर के अंदर बना नए विपक्षी गठबंधन इंडिया है। जीत किसे सिर पर ताज पहनने का मौका देगी, यह तो 4 जून को पता चलेगा। अब बात इस सबसे बड़े रण में उतरने वाले उम्मीदवारों की करते हैं। चुनाव आते ही कैंडिडेट पैसे को पानी की तरह बहाते हैं लेकिन ऐसा अब नहीं हो सकेगा। इसपर चुनाव आयोग ने सख्ती करते हुए कुछ सीमाएं लगा दी हैं। अब उम्मीदवार एक निश्चित अमाउंट तक ही चुनाव में खर्च कर सकेंगे। चुनाव में उम्मीदवारों के पैसे खर्च करने पर ईसीआई ने लगाम लगाई है। नई व्यवस्था के मुताबिक, लोकसभा चुनाव लड़ रहे हर उम्मीदवार के लिए खर्च सीमा ₹95 लाख और विधानसभा चुनाव लड़ रहे हर उम्मीदवार के लिए खर्च सीमा ₹40 लाख रुपये रखी गई है। यह खर्च उम्मीदवार की ओर से नामांकन दाखिल करने के बाद से चुनाव प्रक्रिया पूरा होने तक के बीच किया गया खर्च माना जाएगा। इसमें जनसभाओं, रैलियों, विज्ञापनों, होर्डिंग्स, पैम्फलेट्स, फ्लेक्स, प्रचार सामग्री और चुनाव से जुड़े अन्य सभी कार्यों पर होने वाला खर्च भी शामिल है।

पहले यह सीमा अलग-अलग राज्यों के हिसाब से 54 लाख रुपये से 70 लाख रुपये के बीच थी, जिसे अब बढ़ाकर 75 लाख रुपये से 95 लाख रुपये कर दिया गया है। वहीं, विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा भी बढ़ाई गई है। पहले यह सीमा 20 लाख रुपये से 28 लाख रुपये के बीच थी, जिसे अब बढ़ाकर 28 लाख रुपये से 40 लाख रुपये कर दिया गया है। यह नई सीमा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में लागू है, जबकि गोवा और मणिपुर में यह सीमा 28 लाख रुपये ही है।

2020 में कोरोना महामारी के चलते 10% की बढ़ोतरी को छोड़ दें, तो चुनाव खर्च सीमा में आखिरी बड़ा बदलाव 2014 में हुआ था। चुनाव आयोग ने 2020 में खर्च सीमा पर अध्ययन करने के लिए एक समिति बनाई थी. आयोग के बयान के अनुसार समिति ने राजनीतिक दलों, मुख्य चुनाव अधिकारियों और चुनाव पर्यवेक्षकों से सुझाव आमंत्रित किए थे। समिति ने पाया कि 2014 के बाद से मतदाताओं की संख्या और महंगाई में काफी बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, प्रचार के तरीकों में भी बदलाव को ध्यान में रखा गया, क्योंकि प्रचार अब धीरे-धीरे ऑनलाइन हो लगा है। चुनाव आयोग ने बताया कि समिति ने खर्च सीमा बढ़ाने की सिफारिश की थी। समिति ने दो मुख्य बातों को ध्यान में रखा – पहली, राजनीतिक दलों की मांग, और दूसरी, मतदाताओं की संख्या में वृद्धि। मतदाताओं की संख्या 2014 के 83.4 करोड़ से बढ़कर 2021 में 93.6 करोड़ हो गई है। साथ ही, 2014 से 2022 के बीच महंगाई भी 32.08% बढ़ी। चुनाव आयोग ने कहा कि उसने समिति की सिफारिशों को मान लिया है और उम्मीदवारों के लिए चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने का फैसला किया है।

बता दे कि चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, लेकिन यह बेहद खर्चीला होने के साथ बड़े पैमाने पर अस्थायी रोजगार भी पैदा करता है। नगर निगम जैसे छोटे चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं तो विधानसभा चुनाव में इससे कई गुना अधिक खर्च होता है। बात जब लोकसभा चुनाव की होती है तो खर्च अरबों रुपये में पहुंच जाता है। बावजूद इसके कि चुनाव आयोग ने इस खर्च पर कई तरह की बंदिशें लगा रखी हैं। पिछले हर चुनाव में आयोग ने बढ़ती महंगाई के हिसाब से उम्मीदवारों के खर्च करने की सीमा बढ़ाई है। लोकसभा चुनाव के लिए अब यह 95 लाख रुपये प्रति उम्मीदवार तक जा पहुंची है।यह खर्च उम्मीदवार की ओर से नामांकन दाखिल करने के बाद से चुनाव प्रक्रिया पूरा होने तक के बीच किया गया खर्च माना जाएगा। इसमें जनसभाओं, रैलियों, विज्ञापनों, होर्डिंग्स, पैम्फलेट्स, फ्लेक्स, प्रचार सामग्री और चुनाव से जुड़े अन्य सभी कार्यों पर होने वाला खर्च भी शामिल है। लोकसभा की 543 सीटों के लिए खड़े उम्मीदवार कितना खर्च करेंगे, यह उनकी पार्टियों और इलाके पर निर्भर करेगा।देश के 75-80 चुनाव क्षेत्र ऐसे रहे, जहां 2019 लोकसभा चुनाव में हर संसदीय क्षेत्र में खर्च औसतन 40 करोड़ रुपये हुआ, जबकि इसकी सीमा महज 70 लाख रुपये प्रति उम्मीदवार थी।

क्या वर्तमान में आदिवासियों की कला बाहर निकल रही है?

वर्तमान में आदिवासियों की कला बाहर निकल रही है! कहा जाता है कि भारत गांवों का देश है। भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यहां हर गांव में कम से कम एक अनूठी कला का निवास है। लेकिन वह गांव से निकल नहीं पाती। उस कला के जानकार को कोई सहारा नहीं मिलता है। धीरे-धीरे यह कला विलुप्त हो जाती है, क्योंकि उस परिवार की नई पीढ़ी इसे अपनाने को तैयार ही नहीं होता है। लेकिन, कभी-कभी ऐसे गुमनाम कलाकार भी मुख्य धारा से जुड़ने में कामयाब हो जाते हैं, किसी की मदद की बदौलत। कुछ ऐसा ही किस्सा है पश्चिम बंगाल में पुरुलिया के जंगलों में रहने वाली संथाल परिवार की श्राबनी बासकी का। वह हुंडई मोटर इंडिया फाउंडेशन के आर्ट फॉर होप कार्यक्रम की बदौलत अपनी गृहस्थी की गाड़ी बड़े आराम से खींच रही हैं। यही नहीं, इनके जैसे कई कलाकारों को भी इस कार्यक्रम के बदौलत नई पहचान मिली है। आप यदि झारखंड और उससे लगते पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी गांवों में जाएं तो उनके मकानों पर आपको एक अलग तरह की चित्रकारी दिखेगी। इसे आदिवासी मिट्टी और गोबर को घोल कर बनाते हैं। उसमें पत्तों और प्राकृतिक रंगों का मिश्रण कर विविध रंग दिया जाता है। जैसे हम आप दिवाली त्योहार से पहले अपने घर-आंगन में रंग-रोगन करते हैं, उसी तरह आदिवासी सोहराय पर्व से पहले अपने घर के दीवारों को मिट्टी और गोबर से लीप कर चित्रकारी करते हैं। इससे आदिवासियों के मकान खिल उठते हैं।

पश्चिम बंगाल में पुरुलिया जिले के एक आदिवासी गांव में रहने वाली श्राबनी बासकी इसकी कला में पारंगत हैं। लेकिन, उनकी पूछ सोहराय पर्व के आसपास या फिर शादी-ब्याह के अवसर पर ही होती थी। इस कला से उनकी मौसमी आमदनी तो हो जाती थी, लेकिन नियमित आमदनी का स्रोत यह नहीं बन पाया। लेकिन उसे हुंडई मोटर इंडिया फाउंडेशन के आर्ट फॉर होप कार्यक्रम का सहयोग मिला। उनके साथ ही बदानी मुर्मू और रत्नाबोली बोस भी जुड़ीं। उन्होंने दरिचा फाउंडेशन बनाया। अब वह दीवारों पर भित्ती चित्र तो उकेरती ही हैं, इस कला के पोस्टर्स भी तैयार करती हैं।

हुंडई फाउंडेशन के आर्ट फॉर होप कार्यक्रम में इस बार ओडिशा के गंजाम जिले में रहने वाले लीसा मोहंती का भी चयन हुआ है। वह बचपन में एक चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में सिनेमा में भी काम कर चुके हैं। साल 2008 मंे उन्होंने निर्गुण सेंटर फॉर एक्सीलेंस बनाया। वह नृत्य और संगीत के जरिये भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने का काम करते हैं। लेकिन इससे उनकी गृहस्थी आसानी से नहीं चल पा रही थी। उन्होंने साल 2018 में हरिकथा ट्रेडिशन की शुरुआत की। इससे उनहोंने गंजाम जिले के बुनकरों को जोड़ा। उन्हें कार्यशालाओं के जरिये प्रशिक्षण दिया गया। आज वह गंजाम के कल्चरल हेरिटेज को न सिर्फ संजो रहे हैं बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक बढ़ा भी रहे हैं।

हुंडई मोटर इंडिया लिमिटेड के चीफ मैन्यूफैक्चरिंग ऑफिसर गोपाल कृशन सी.एस. का कहना है कि गांव-कस्बों की ढेर सारी ऐसी कला है, जिसे नई पीढ़ी नहीं सीखना चाहती। नई पीढ़ी को ऐसी पारंपरिक कला में इसलिए रुचि नहीं है क्योंकि इससे उनकी आमदनी इतनी नहीं होती कि उनकी गृहस्थी चल सके। इसलिए वे कुछ दूसरा काम करने लगते हैं। ऐसे ही कला और कलाकारों को संरक्षण देने के लिए हुंडई मोटर इंडिया फाउंडेशन ने आर्ट फॉर होप कार्यक्रम की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम के जरिये चयनित कलाकारों को एक लाख रुपये की सहायता दी जाती है। उन्हें मुख्य धारा से जुड़ने में मदद की जाती है। उन्हें देश में ही नहीं बल्कि विदेशी प्लेटफार्म से भी कनेक्ट करने में मदद की जाती है। और भी जो सहायता की जरूरत पड़ती है, उपलब्ध करायी जाती है।

हुंडई मोटर इंडिया लिमिटेड में कारपोरेट अफेयर्स के वर्टिकल हेड पुनीत आनंद बताते हैं कि आर्ट फॉर होप की शुरुआत साल 2021-22 में की गई थी। अपने घर-आंगन में रंग-रोगन करते हैं, उसी तरह आदिवासी सोहराय पर्व से पहले अपने घर के दीवारों को मिट्टी और गोबर से लीप कर चित्रकारी करते हैं। इससे आदिवासियों के मकान खिल उठते हैं।उस साल इस कार्यक्रम के तहत देश के 10 राज्यों में रहने वाले 25 कलाकारों को सहायता दी गई थी। साल 2022-23 में इस कार्यक्रम का दायरा 17 राज्यों तक फैलाया गया। साथ ही इस कोष से 35 कलाकारों को सहायता दी गई। इस साल मतलब कि साल 2023-24 में कार्यक्रम का फैलाव 20 राज्यों तक फैलाया गया। साथ ही अब सहायता पाने वाले कलाकारों की संख्या भी बढ़ा कर 40 कर दी गई है।

क्या विपक्ष को बैक फुट पर लाकर रख देगी बीजेपी?

भाजपा आने वाले समय में विपक्ष को बैक फुट पर लाकर रख सकती है! 2024 के चुनावी रण को लेकर सियासी बिसात बिछ चुकी है। सत्ता पक्ष हो या विपक्षी खेमा अपने-अपने तरीके से रणनीति में बनाने में जुटे हैं। ऐसे में सभी की निगाहें बीजेपी पर है, जो लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाने को बेहद एक्टिव दिख रही। पार्टी नेतृत्व ने इस चुनावी समर में अपने लिए 370 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। यही नहीं बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के लिए 400 पार का टारगेट सेट किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पॉपुलैरिटी, विश्वसनीयता के साथ-साथ मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए पार्टी नेतृत्व को पूरी उम्मीद है कि वो इस चुनावी समर में जोरदार प्रदर्शन में सफल होंगे। इसके लिए आलाकमान हर कदम फूंक-फूंक कर उठा रही है। चाहे टिकट बंटवारे में दलबदलुओं को कैंडिडेट बनाना हो या फिर विरोधियों को टारगेट करने की रणनीति, पार्टी पूरी प्लानिंग से आगे बढ़ती दिख रही है। जिस तरह से दिल्ली के सीएम और AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल पर ईडी का एक्शन हुआ, उसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। कहा जा रहा कि इस कार्रवाई से दिल्ली में AAP-कांग्रेस को सहानुभूति फैक्टर अहम रोल निभा सकता है। हालांकि, बीजेपी नेतृत्व इससे परेशान नजर नहीं आ रही और वो लगातार केजरीवाल के मामले पर हमलावर रवैया अपनाए हुए है।

19 अप्रैल को लोकसभा चुनाव में पहले फेज की वोटिंग है। अब तक की तैयारियों पर नजर दौड़ाएं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी इस चुनावी घमासान में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे दिख रहे हैं। चाहे प्लानिंग का सवाल हो या फिर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा, पार्टी और सरकार चुनावी शतरंज की बिसात में अपने हर मोहरों को बेहद तेजी से सोच-विचार के साथ आगे कर रही है। इसका ताजा उदाहरण रविवार को सामने आया जब बीजेपी ने उम्मीदवारों की पांचवीं सूची जारी की। इस लिस्ट में दूसरे दलों से आए तीन नेताओं को बिना देर किए ही टिकट दे दिया गया। जिन सियासी दिग्गजों को टिकट मिला वो कुछ घंटे पहले ही बीजेपी में शामिल हुए थे।

इस फेहरिस्त कांग्रेस के पूर्व सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल का नाम प्रमुख है। 78 वर्षीय रणजीत सिंह चौटाला, जो पूर्व उप-प्रधानमंत्री देवी लाल के पुत्र हैं। दोनों ही नेता हरियाणा से हैं, जिन्हें बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दिया। इनके अलावा वी वरप्रसाद राव, जो वाईएसआरसीपी के विधायक और आंध्र प्रदेश से पूर्व सांसद रहे हैं, उन्हें भी पार्टी ने बिना देर किए उम्मीदवार घोषित कर दिया। बीजेपी आलाकमान ने दूसरे दलों से आए इन नेताओं को टिकट देने से पहले डिटेल सर्वे और प्रतिक्रिया लीं। इसी के बाद प्रदेश यूनिट्स की ओर से सुझाए गए पार्टी नेताओं के नामों को खारिज कर दूसरे दलों से आए चेहरों पर भरोसा जताया।

टिकट बंटवारे को लेकर ही बीजेपी के रणनीतिकार प्लानिंग नहीं कर रहे, बल्कि विरोधी दलों पर भी पूरा फोकस है। तभी तो जब 21 मार्च को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने अरेस्ट किया तो बीजेपी ने पूरी ताकत से इस एक्शन के सपोर्ट में आवाज बुलंद की। पार्टी ने दिल्ली ही नहीं देशवासियों को बताया कि आखिर ईडी ने ये कार्रवाई क्यों की। दिल्ली एक्साइज पॉलिसी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में केंद्रीय जांच एजेंसी ने ये कार्रवाई की। आम आदमी पार्टी की ओर से इस कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन भी किए गए। ऐसे में बीजेपी नेता और कार्यकर्ता भी प्रोटेस्ट से पीछे नहीं रहे। दिल्ली बीजेपी चीफ वीरेंद्र सचदेवा ने कड़े शब्दों में सीएम अरविंद केजरीवाल पर अटैक किया। उन्हें भ्रष्ट और बेईमान बताया। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता को लूटा है, ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए।

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री पर एक्शन को लेकर सवाल उठे कहीं बीजेपी को इस मुद्दे पर नुकसान न उठाना पड़ जाए। कहीं सहानुभूति फैक्टर AAP और कांग्रेस को न मिल जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली में दोनों पार्टियां एक साथ चुनाव मैदान में उतर रही हैं। सियासी जानकार ईडी एक्शन की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, बीजेपी नेतृत्व इससे आगे की सोच रहा। पार्टी का स्टैंड साफ है कि जिस मामले को लेकर अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई उस पर ईडी कई बार उन्हें समन कर चुकी थी। वो जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हो रहे थे। ऐसे में ईडी की टीम ने जरूरी सबूतों के बाद ही ये कार्रवाई की। यही नहीं बीजेपी नेतृत्व को पता है कि इस मुद्दे पर विपक्षी मोर्चा एकजुट होकर सामने आएगा। हालांकि, पार्टी को ये भी उम्मीद है कि इसका कोई खास राजनीतिक असर नहीं होगा।

उधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा भी सामने आया। जिसमें पार्टियों की ओर से खरीदे और भुनाए गए चुनावी बॉन्ड की जानकारी साझा की गई। सर्वोच्च कोर्ट के आदेश पर भारतीय स्टेट बैंक ने पूरी जानकारी चुनाव आयोग को शेयर की और फिर उसे इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर साझा किया गया। इसमें पता चला कि बीजेपी इलेक्टोरल बॉन्ड की सबसे बड़ी लाभार्थी है। फिलहाल लोकसभा चुनाव 2024 करीब आते-आते कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन्हें लेकर विपक्षी दलों ने बीजेपी को घेरने की कोशिश की। हालांकि, केंद्र की सत्ताधारी पार्टी लगातार अपने टारगेट पर फोकस किए हुए नजर आ रही। हर मुद्दे पर पार्टी पूरी ताकत से रिएक्ट कर रही। यही नहीं चुनाव प्रचार हो या फिर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा बीजेपी अपनी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस से आगे ही दिख रही।

क्या विपक्ष की महारैली हो पाई सफल? क्या कहते हैं आंकड़े!

आज हम आपको बताएंगे कि विपक्ष की महारैली सफल हो पाई है या नहीं और आंकड़े क्या कहते हैं! अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने इंडिया गठबंधन के घटक दलों को फिर से एकजुट होने पर मजबूर कर दिया है। अपने तमाम राजनीतिक मतभेदों और लोकसभा चुनाव के लिए राज्यों में सीट बंटवारा नहीं हो पाने के बावजूद सभी विपक्षी दल एक मंच पर आने के लिए तैयार हैं। आम आदमी पार्टी (आप) भी केजरीवाल की गिरफ्तारी के मुद्दे पर जनता के बीच सहानुभूति की लहर पैदा करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। यह मुद्दा लड़खड़ा चुके विपक्ष को संभालने में कितना कारगर साबित होगा, इसका परीक्षण 31 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली महारैली में हो जाएगा। इस रैली की सफलता या विफलता विपक्ष की आगे की राह तय करेगी। यही वजह है कि आम आदमी पार्टी रैली को सफल बनाने का भरपूर प्रयास कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली प्रदेश संयोजक गोपाल राय ने कहा है कि इस रैली में एक लाख से भी अधिक लोगों की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने दावा किया कि यह अभूतपूर्व रैली होगी, जो 2024 के लोकसभा चुनाव को एक नई दिशा देगी। वहीं, कांग्रेस पार्टी इस महारैली के जरिए आप और केजरीवाल के प्रति उपजी संभावित सहानुभूति का फायदा उठाने की कोशिश में है। रैली को सफल बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियां चल रही हैं? इस बारे में गोपाल राय ने बताया कि हमने तैयारी के लिए थ्री लेयर सिस्टम बनाया है। आम आदमी पार्टी के जितने भी विधायक, पार्षद और विधानसभा के पदाधिकारी हैं, उनकी एक-एक टीम बनाई है, जो सभी विधानसभा क्षेत्र में रैली के लिए तैयारियों को देख रही है। दूसरे स्तर पर 2,600 से अधिक मतदान केंद्रों पर एक-एक प्रभारी नियुक्त किया गया है, जो मंडल स्तर पर टीमों का गठन करेंगे। तीसरे स्तर पर ये सभी टीमें अपने-अपने मोहल्ले और कॉलोनी में घर-घर जाकर लोगों को रैली में शामिल होने का न्योता देंगी। प्रत्येक टीम अपने से ऊपर के स्तर की टीम को रिपोर्ट करेगी। पार्टी के सात उपाध्यक्षों को सातों लोकसभा क्षेत्रों के ओवरऑल सुपरविजन का जिम्मा सौंपा गया है। कोशिश यही है कि हर क्षेत्र से अधिक से अधिक लोग रैली में शामिल हों।

हरियाणा और पंजाब से कितने लोग आएंगे? इस सवाल पर राय का कहना था कि हमारा फोकस दिल्ली पर ही ज्यादा है। यह जरूर है कि हरियाणा और पंजाब में पार्टी का मजबूत संगठन है, लेकिन बीजेपी और केंद्र सरकार पुलिस के जरिए रैली में ज्यादा भीड़ जुटने से रोकने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। ऐसे में संभव है कि पंजाब-हरियाणा से गाड़ियों में आ रहे आप समर्थकों को पुलिस बॉर्डर ही पार न करने दे। इसी वजह से पार्टी दिल्ली से ही अधिक से अधिक लोगों को इकट्ठा करने पर फोकस कर रही है। राय ने बताया कि इंडिया गठबंधन के सभी घटक दलों ने रैली में शामिल होने की रजामंदी दे दी है। अब वो लोग तय कर रहे हैं कि उनकी तरफ से कौन-कौन लीडर रैली में शामिल होंगे। रैली की परमिशन लेने की प्रक्रिया अभी चल रही है। मैदान में तैयारियां 29 तारीख से शुरू होंगी।

यह महारैली कांग्रेस के लिए भी कई मायनों में बेहद खास है। इस रैली में वैसे तो इंडिया अलायंस के सभी घटक दलों के प्रतिनिधियों के आने की संभावना है, लेकिन कांग्रेस के लिए यह रैली दिल्ली में फिर से अपनी ताकत दिखाने के एक अवसर के समान भी है। खासकर जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) दिल्ली में साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं, तब कांग्रेस को यह भी लग रहा है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद लोगों में उपजी सहानुभूति का लाभ लोकसभा चुनाव में कहीं न कहीं उसे भी मिलेगा। यही वजह है कि कांग्रेस भी रैली का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश करेगी और रैली में अपनी उपस्थिति केवल दर्ज ही नहीं, बल्कि महसूस कराने की भी कोशिश करेगी।

इंडिया अलायंस के बैनर तले होने जा रही रैली को सफल बनाने का मुख्य जिम्मा आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कंधों पर ही है। हालांकि, कांग्रेस के ही कुछ समर्थकों को इसमें विरोधभास भी नजर आ रहा है क्योंकि रामलीला मैदान वही जगह है, जहां कभी अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की अगुवाई में आंदोलन शुरू किया था। अब समय ने ऐसी करवट बदली कि अरविंद केजरीवाल को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है और इस गिरफ्तारी के विरोध में एकजुट हुए विपक्षी दलों में कांग्रेस भी साथ खड़ी है। हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद इंडिया गठबंधन के लिए माहौल बदला है और अब आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, दोनों ही इस गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहीं न कहीं अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में है। अगर 31 मार्च की रैली सफल होती है तो आम आदमी पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस को भी अपने चुनावी अभियान में बड़ा बूस्ट मिलने की उम्मीद है।

वहीं, कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौका तो जरूर है, लेकिन इस मौके को भुनाना आसान नहीं होगा। दिल्ली के कांग्रेस और आप नेताओं के अलावा हरियाणा और पंजाब के नेताओं पर भी इस रैली को सफल बनाने की जिम्मेदारी है। दिल्ली कांग्रेस ने भले रैली को सफल बनाने में बैठक शुरू कर दी है, लेकिन पंजाब और हरियाणा से उसके नेताओं और समर्थकों का कितना सपोर्ट मिलेगा, इसको लेकर पार्टी के नेता भी अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। पार्टी ने अभी तक लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशी भी घोषित नहीं किए हैं। इसी वजह से कांग्रेस को इस रैली के लिए अतिरिक्त जोर भी लगाना पड़ रहा है।

आखिर क्या है सन 1989 का चुनावी किस्सा?

आज हम आपको सन 1989 का चुनावी मुद्दा सुनाने जा रहे हैं ! चुनाव आयुक्त के रूम से निकलते हुए चौधरी देवी लाल तमतमाए हुए थे। जाते-जाते उन्होंने इलेक्शन कमिश्नर एसएस धनोआ और वीएस सीगेल को चेताते हुए कहा, ‘कुछ महीनों में हम वापस आएंगे और तब सबसे पहले आप बाहर जाएंगे।’ 1989 के लोकसभा चुनाव के परिणाम ने देवी लाल को अपनी बात साबित करने का मौका दे दिया। उस आम चुनाव में जनता दल को बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन BJP और CPM के समर्थन के बूते उसने सरकार बना ली। विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने। एक जनवरी 1990 को राष्ट्रपति ने नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें इलेक्शन कमिशन में चुनाव आयुक्त के दोनों पद खत्म कर दिए गए। यह किस्सा बयान किया है पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने अपनी किताब The Chronicle of an Impossible Election में। जनता पार्टी के धड़ों को मिलाकर 1988 में जनता दल का गठन किया गया था। इस नए दल का भी लक्ष्य था कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना। चुनाव आयुक्तों के साथ टकराव वाली घटना तब की है, जब जनता दल के नेता अपनी पार्टी के लिए चुनाव चिह्न की तलाश में थे।

लिंगदोह की किताब के मुताबिक, जनता दल के नेता चक्र चाहते थे, जिसमें 24 तीलियां लगी हों यानी राष्ट्रीय ध्वज में बने अशोक चक्र की तरह। लेकिन चुनाव आयुक्तों धनोआ और सीगेल ने जनता दल के चक्र में केवल तीन तीलियों की मंजूरी दी। हालांकि बाद में इसे 6 कर दिया गया, क्योंकि तीन तीलियां होने पर जनता दल का सिंबल कुछ-कुछ यूथ कांग्रेस के सिंबल की तरह लग रहा था। लेकिन, जनता दल का प्रतिनिधिमंडल 6 तीलियों से संतुष्ट नहीं था। देवी लाल इसी प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे और वहां से लौटते समय वह अपना गुस्सा छिपा नहीं पाए। और जब जनता दल की सरकार आई, तो चुनाव आयुक्त के पद फिर से खत्म कर दिए गए। पूरी जिम्मेदारी आ गई मुख्य चुनाव आयुक्त पर।

भारत में जब चुनाव आयोग का गठन हुआ, तब केवल CEC की ही पोस्ट थी। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे सुकुमार सेन। उनकी नियुक्ति हुई थी 21 मार्च 1950 को। उन्होंने अकेले ही पहले दो आम चुनावों को मैनेज किया था। उनके बाद भी 1989 तक यह व्यवस्था बनी रही। 16 अक्टूबर 1989 को जाकर पहली बार आयोग में दो चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए, एसएस धनोआ और वीएस सीगेल। हालांकि चंद महीनों बाद ही इनकी भी छुट्टी हो गई और चुनाव आयुक्त पद की भी। राष्ट्रपति ने नोटिफिकेशन जारी कर चुनाव आयोग को फिर से एक सदस्यीय कमिशन बना दिया।

पूर्व CEC एसवाई कुरैशी की किताब An Undocumented Wonder : The Making Of The Great Indian Election बताती है कि धनोआ और सीगेल को पद से हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था। धनोआ ने इस आधार पर राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती दी कि उनकी नियुक्त पांच साल के लिए हुई थी। राष्ट्रपति ने Article 324 (5) के तहत बनाए गए सर्विस रूल के मुताबिक उन्हें नियुक्त किया था। जनता पार्टी के धड़ों को मिलाकर 1988 में जनता दल का गठन किया गया था। इस नए दल का भी लक्ष्य था कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना। चुनाव आयुक्तों के साथ टकराव वाली घटना तब की है, जब जनता दल के नेता अपनी पार्टी के लिए चुनाव चिह्न की तलाश में थे।अब राष्ट्रपति, चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में कटौती नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी पद का गठन करना और उसे खत्म करना एग्जिक्यूटिव का विशेषाधिकार है।

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर कहा कि एक से भले दो होते हैं, खासकर चुनाव आयोग जैसे संस्थानों के मामले में। कोर्ट का मानना था कि चुनाव आयोग के पास जैसी शक्तियां हैं, उसका इस्तेमाल अगर किसी एक शख्स द्वारा न किया जाए तो अच्छा। सुप्रीम कोर्ट का यह ऑब्जर्वेशन काफी काम आया। 1991 में राष्ट्रपति ने इलेक्शन कमिशन को फिर से मल्टी मेंबर बॉडी बना दिया। एक अक्टूबर 1993 को दो नए चुनाव आयुक्त मिले, एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति।

चुनाव आयोग में मदद के लिए रीजनल कमिश्नरों की नियुक्ति का भी प्रावधान है। लेकिन, पहले आम चुनाव को छोड़ दें, तो उसके बाद फिर कभी रीजनल कमिश्नर नहीं तैनात किए गए। साल 1951-52 में दो रीजनल कमिश्नर थे, टीजीएन अय्यर और एमआर मेहर। दोनों ही इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे और एक अप्रैल 1952 तक इस पोस्ट पर बने रहे।

आखिर वकीलों ने क्यों लिखी CJI को चिट्ठी?

हाल ही में 600 से ज़्यादा वकीलों ने CJI को एक चिट्ठी लिखी है! देश के दिग्गज वकील हरीश साल्वे समेत करीब 600 मशहूर वकीलों ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को चिट्ठी लिखी है। चिट्ठी में न्यायपालिका पर खास समूह के दबाव को लेकर चिंता जताई गई है। पत्र में न्यायपालिका की अखंडता को कम दिखाने को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। चिट्ठी में लिखा गया है कि एक खास ग्रुप देश में कोर्ट को कमजोर करने में जुटा हुआ है। हरीश साल्वे और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा समेत 600 वकीलों ने लिखा है कि अपने हित को साधने में लगे कुछ लोग ज्यूडिशियरी पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं और साथ ही अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए तर्कहीन तथ्यों के आधार पर अदालत को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। चिट्ठी में लिखा गया है कि कानून का समर्थन करने वाले लोगों के रूप में, हमें लगता है कि अपनी अदालतों के लिए आवाज उठाने का समय आ गया है। हमें साथ आने की जरूरत है। चिट्ठी में लिखा गया है कि छिपे हुए हमलों के खिलाफ बोलने की जरूरत है। चिट्ठी में लिखा गया है कि यह सुनिश्चित करते हुए कि हमारी अदालतें हमारे लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में बनी रहें, इन सोचे-समझे हमलों से बचने की जरूरत है।

पत्र में लिखा गया है कि खास समूह अलग-अलग तरीकों से प्रपंच कर रहे हैं। इससे न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान होता है। चिट्ठी में कहा गया है कि ये समूह ऐसे बयान देते हैं जो सही नहीं होते हैं और ये राजनीतिक लाभ के लिए ऐसा करते हैं। सियासी हस्तियों और भ्रष्टाचार के केस में दबाव का इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे लेटर में यह भी कहा गया है कि कुछ राजनीतिक लोगों के करप्शन के मामलों में फंसे होने के कारण यह दबाव की राजनीति की जा रही है। यह सब तकनीक हमारे ज्यूडिशियरी को नुकसान पहुंचा रहा है। साथ ही कहा गया कि यह हमारे लोकतांत्रिक तानेबाने के खिलाफ खतरा है।

करीब 600 वकीलों द्वारा लिखे गए लेटर में एक वकील का बिना नाम लिए उन पर निशाना साधा गया है और आरोप लगाया गया है कि वे दिन रात राजनीतिक व्यक्तिों को प्रोटेक्ट करते हैं और फिर रात को मीडिया के माध्यम से न्यायधीशों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इस तरह के हित साधने वालों द्वारा एक गलत नैरेटिव बनाया जा रहा है। उनकी टिप्पणियां न्यायालय को प्रभावित करने के उद्देश्य वाले हैं।

ज्यूडिशियरी अंडर थ्रेट सेफगार्डिंग ज्यूडिशियरी फ्रॉम पॉलिटिकल एंड प्रोफेनल्स प्रेशर शीर्षक से लिखे लेटर करीब 600 वकीलों की ओर से लिखा गया है इनमें सुप्रीम कोर्ट बार असोसिशन के प्रेसिडेंट अदिश सी अग्रवाल, चेतन मित्तल, पिंकी आनंद, हितेश जैन, उज्जवला पवार, उदय होला आदि शामिल हैं। लेटर में किसी विशेष केस का जिक्र नहीं किया गया है लेकिन यह मामला उस समय उठाया गया है जब कई हाई प्रोफाइल करप्शन के केस अदालतों में चल रहे हैं इनमें कई केसों में नेताओं को आरोपी बनाया गया है। गौरतलब है कि कई विरोधी दल के नेताओं ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उन्हें टारगेट किया जा रहा है जबकि केंद्र सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे लेटर में वकीलों ने कहा है कि हित साधने वालों द्वारा बेंच फिक्सिंग का मनगढ़ंत सिद्धांत गढ़ा गया है। यह सब न्यायालय की गरिमा और मान प्रतिष्ठा पर हमला है। साथ ही कहा कि इस तरह के जो भी आलोचक हैं उन्होंने माई वे या हाइवे का दृष्टिकोण अपना रहे हैं। जिन फैसलों से वह सहमत हैं उनकी सराहना करते हैं और जिन फैसलों से समहत नहीं हैं उसे वह नीचा दिखाते हैं और गलत ठहराते हैं। यह दोहरा रवैया हमारे कानूनी सिस्टम के लिए हानिकारक है। हमें साथ आने की जरूरत है। चिट्ठी में लिखा गया है कि छिपे हुए हमलों के खिलाफ बोलने की जरूरत है। चिट्ठी में लिखा गया है कि यह सुनिश्चित करते हुए कि हमारी अदालतें हमारे लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में बनी रहें, इन सोचे-समझे हमलों से बचने की जरूरत है।साथ ही लेटर में कहा गया है कि 2019-19 में इन लोगों ने हिट एंड रन एक्टिविटी अपनाया था इस दौरान गलत नैरेटिव फैलाने की कोशिश की थी। इन गतिविधियों के जरिये ये राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से न्यायिक प्रक्रिया को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं और इसकी इजाजत नहीं होनी चाहिए और यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

क्या केजरीवाल की गिरफ्तारी से बीजेपी की हो रही है छवि खराब?

केजरीवाल की गिरफ्तारी से बीजेपी की वर्तमान में छवि खराब हो रही है! दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शराब घोटाले के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया। अदालत ने ईडी की मांग पर उन्हें छह दिनों की हिरासत में भेज दिया। इस पर पूरा विपक्ष केंद्र सरकार और बीजेपी पर हमलावर है। विपक्षी दलों का कहना है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी से लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया है। उनका दावा है कि लोकसभा चुनाव से ऐन पहले पद पर मौजूद एक मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करके पूरे विपक्ष को डराने की कोशिश की जा रही है। बड़ी बात है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी की चर्चा विदेशी मीडिया और राजनयिक दुनिया में भी हो रही है। अगर विदेशों में बन रही राय पर गौर करें तो इसमें कोई दो राय नहीं दिल्ली सीएम केजरीवाल की गिरफ्तारी के एपिसोड से मोदी सरकार की छवि खराब हो रही है। वॉशिंगटन पोस्ट ने केजरीवाल की गिरफ्तारी को मोदी सरकार की तरफ से विपक्ष के खिलाफ की गई कार्रवाई के रूप में पेश किया। उसने लिखा, ‘भारत ने विपक्ष पर कार्रवाई के तहत दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया।’ स्वाभाविक है कि भारत यानी भारत सरकार जिसके मुखिया नरेंद्र मोदी है। इसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘भारतीय विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव नजदीक आते ही उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।’ मुस्लिम दुनिया का मुखपत्र माने जाने वाले मीडिया हाउस अल जजीरा ने तो भारत के लोकतंत्र को मृत बता दिया। उसने लिखा, ‘मृत लोकतंत्र: क्या अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भारत के विपक्ष को एकजुट करेगी?’

बात यहीं तक सीमित रहती तो खैरियत थी, पहले जर्मनी और फिर अमेरिका की तरफ से आधिकारिक बयान आ गया। केजरीवाल की गिरफ्तारी के अगले ही दिन जर्मनी के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता सेबेस्टियन फिशर ने कहा कि आरोपों का सामना करने वाले किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह केजरीवाल को भी निष्पक्ष और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘हम मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांतों से संबंधित मानकों को इस मामले में भी लागू किया जाएगा।’

मोदी सरकार के लिए नीम पर करेला तब चढ़ गया जब अमेरिका ने भी केजरीवाल की गिरफ्तारी पर कमेंट कर दिया। अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने इस मामले में ईमेल से भेजे गए एक सवाल के जवाब में कहा, ‘हम मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समय पर कानूनी प्रक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं।’ ईमेल में पूछा गया था कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर टिप्पणी के जवाब में भारत सरकार ने जर्मन दूत को तलब कर लिया था, इस पर अमेरिकी विदेश विभाग की क्या राय है?

भारत ने जर्मनी और अमेरिका, दोनों की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। सरकार ने जर्मन दूतावास के उप-प्रमुख जॉर्ज एनजवेइलर को तलब कर अपना कड़ा विरोध व्यक्त किया। इस संबंध में भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, ‘हम इस तरह की टिप्पणियों को हमारी न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और हमारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने के रूप में देखते हैं।’ बयान में कहा गया है कि इस मामले पर की जाहिर हुई पक्षपाती धारणाएं बहुत बुरी हैं। दूसरी ओर भारत ने अमेरिकी उप-प्रमुख को भी तलब किया गया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर विदेशों में चर्चा मात्र से ही मोदी सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है। हालांकि, विदेश मामलों के भारतीय विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी का कहना है कि अमेरिका हो या जर्मनी, पश्चिमी देशों को होश में आ जाना चाहिए।भारतीय विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव नजदीक आते ही उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।’ मुस्लिम दुनिया का मुखपत्र माने जाने वाले मीडिया हाउस अल जजीरा ने तो भारत के लोकतंत्र को मृत बता दिया। उसने लिखा, ‘मृत लोकतंत्र: क्या अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भारत के विपक्ष को एकजुट करेगी?’ उन्होंने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को भी खरी-खरी सुनाई कि उन्हें भारत के साथ संबंधों को लेकर काफी सतर्क रहना चाहिए ना कि ऐसे अंदरूनी मामलों में टिप्पणियां करके यह आभास कराना चाहिए कि अमेरिका, भारत को सीख दे सकता है। खैर, बातें तो होती रहेंगी, लेकिन इतना तय है कि केजरीवाल से दुनिया में एक बज क्रिएट होता जरूर दिख रहा है।