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रूस और भारत की मित्रता पर क्या बोला अमेरिका?

हाल ही में अमेरिका ने रूस और भारत की मित्रता पर एक बयान दिया है! रूस के साथ भारत के संबंधों को लेकर चिंताओं के बीच, अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने गुरुवार को नई दिल्ली को आगाह किया कि एक दीर्घकालिक, भरोसेमंद साझेदार के रूप में रूस पर दांव लगाना ठीक नहीं है। उन्होंने दावा किया कि भारत और चीन के बीच संघर्ष की स्थिति में रूस, नयी दिल्ली के बजाय बीजिंग का पक्ष लेगा। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) जेक सुलिवन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हाल की मास्को यात्रा के बारे में टीवी चैनल ‘एमएसएनबीसी’ पर पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए यह टिप्पणी की। मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ व्यापक वार्ता की थी।सुलिवन ने कहा, ”हमने भारत समेत दुनिया के हर देश को यह स्पष्ट कर दिया है कि दीर्घकालिक, भरोसेमंद साझेदार के रूप में रूस पर भरोसा करना अच्छा दांव नहीं है।” सुलिवन पिछले महीने भारत के अपने समकक्ष अजीत डोभाल के साथ बैठक के लिए भारत आए थे। शीर्ष अमेरिकी अधिकारी ने अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी से भी मुलाकात की थी। सुलिवन ने कहा, ”रूस चीन के करीब होता जा रहा है। वास्तव में, यह चीन का साझेदार बनता जा रहा है। इस तरह, वे हमेशा भारत के बजाय चीन का पक्ष लेंगे।’’

उन्होंने हालांकि माना कि भारत जैसे देशों के रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं और यह स्थिति नाटकीय रूप से रातों-रात बदलने वाली नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए दो दिन के लिए रूस में थे और यूक्रेन में जारी संघर्ष के बीच उनकी इस यात्रा पर पश्चिमी देशों की भी करीबी नजर रही है। इस समय राष्ट्रपति बाइडन बहुत कमजोर दिख रहे हैं। राष्ट्रपति बदलने के लिए उठाए जा रहे कदम के बीच अमेरिकी बहुत चिंतित हैं।’पुतिन के साथ मंगलवार को वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति से कहा कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में संभव नहीं है और शांति प्रयास बम तथा गोलियों के बीच सफल नहीं होते।

बता दे कि अमेरिका में एक पाकिस्तानी -अमेरिकी व्यवसायी ने बुधवार को कहा कि देश कठिन समय से गुजर रहा है और दुनिया अमेरिकी लोकतंत्र पर करीब से नजर रख रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में पांच नवंबर को होने वाले चुनाव में मात्र चार माह से भी कम समय बचा है और सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन को हटाने का आह्वान किया गया है। प्रमुख पाकिस्तानी-अमेरिकी व्यवसायी साजिद तरार ने पीटीआई भाषा को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘मेरे विचार से इस समय पूरी दुनिया अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रणाली पर नजर रख रही है। अमेरिका विशेषकर लोकतंत्र के नजरिए से कठिन दौर से गुजर रहा है।’

मैरीलैंड के ‘मुस्लिम अमेरिकन्स फॉर ट्रम्प’ संगठन के संस्थापक और प्रमुख तरार अगले सप्ताह रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन (आरएनसी) के लिए विस्कॉन्सिन के मिल्वौकी जा रहे हैं, जहां ट्रम्प को पांच नवंबर के आम चुनाव के लिए औपचारिक रूप से पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामित किया जाएगा। बाइडन डेमोक्रेटिक पार्टी के संभावित उम्मीदवार हैं। 2016 में ट्रंप के पहली बार राष्ट्रपति चुने जाने से लगातार उनका समर्थन कर रहे कुछ मुस्लिम अमेरिकियों में से एक तरार ने कहा, ‘इस समय राष्ट्रपति बाइडन बहुत कमजोर दिख रहे हैं। राष्ट्रपति बदलने के लिए उठाए जा रहे कदम के बीच अमेरिकी बहुत चिंतित हैं।’

उन्होंने कहा कि अमेरिकियों को बाइडेन और ट्रंप प्रशासन के चार सालों की समीक्षा करने का मौका मिलेगा। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा प्रशासन की कमजोर विदेश नीति की वजह से दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर है। इससे पहले उन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार कमर चीमा से बातचीत में कहा था कि अमेरिका बीमार है। बता दें कि जारी संघर्ष के बीच उनकी इस यात्रा पर पश्चिमी देशों की भी करीबी नजर रही है। पुतिन के साथ मंगलवार को वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति से कहा कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में संभव नहीं है और शांति प्रयास बम तथा गोलियों के बीच सफल नहीं होते। उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। जो पैसा यूक्रेन जा रहा है, उसका 70 फीसदी यूएई की प्रॉपर्टी में लग जाता है। इसके अलावा उन्होंने कहा था कि नाटो समिट से रूस नहीं डरता। जिस दिन समिट शुरू हुई उसी दिन उसने यूक्रेन पर हमला किया।

क्या एशियाई देशों में हो चुकी है नाटो देशों की एंट्री?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एशियाई देशों में नाटो देशों की एंट्री हो चुकी है या नहीं! उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो ने अब एशिया में भी अपने विस्तार को तेज किया है। इसका एकमात्र लक्ष्य इंडो-पैसिफिक में चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकना है। इसके लिए नाटो ने एशिया से चार देशों को चुना है, जो क्षेत्र में उसके हितों की रक्षा करेंगे। हालांकि, इन चार देशों में भारत का नाम शामिल नहीं है। नाटो ने भले ही इन चारों देशों को पूर्ण सदस्य का दर्जा नहीं दिया है, लेकिन इनके साथ संबंध काफी मजबूत हैं। इन चारों देशों को नाटो-4 का उपनाम भी दिया गया है। हाल में ही नाटो के 75 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इन चारों देशों के साथ एक तस्वीर भी खिंचवाई थी, जिसकी काफी चर्चा हो रही है। एशिया में नाटो के उन चार मददगार देशों के नाम जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड है। ये चारों देश दशकों से नाटो के साथ किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। इनका अमेरिका के साथ भी नजदीकी संबंध है और अपनी सुरक्षा के लिए भी ये वॉशिंगटन पर काफी ज्यादा निर्भर हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भले ही एशिया का हिस्सा न हों, लेकिन इनकी गिनती इंडो-पैसिफिक के देशों में की जाती है। ये चारों देश हर साल अमेरिका के साथ कई सैन्य अभ्यास भी करते हैं। इसके अलावा दूसरे नाटो देशों के साथ भी इनके नजदीकी सैन्य संबंध हैं। बड़ी बात यह है कि इन चारों देशों के चीन के साथ किसी न किसी मुद्दे पर तनाव है।

अमेरिका के उप विदेश सचिव कर्ट कैम्पबेल ने कहा है कि नाटो के चार इंडो-पैसिफिक भागीदारों – दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के समूह को उनका देश “संस्थागत” बनाना चाहता है। उनका यह बयान उत्तर कोरिया और रूस के बीच बढ़ते सैन्य गठबंधन और चीन की बढ़ती आक्रामकता पर चिंताओं के बीच आया है। उन्होंने जोर दिया कि वाशिंगटन दक्षिण कोरिया के लिए अपनी निवारक गारंटी के लिए “पूरी तरह” प्रतिबद्ध है, जबकि सहयोगियों की सुरक्षा पहलों को “अनुकूल” और “दृढ़” बताया। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में आप इंडो-पैसिफिक 4 के बारे में और अधिक सुनेंगे – वह समूह जो वाशिंगटन में हमारे साथ है।

बता दे कि अमेरिकी तटरक्षक बल ने कहा है कि उन्होंने इस हफ्ते के अंत में अलास्का तट पर कई चीनी युद्धपोतों को देखा है। इसके बाद से पूरे अमेरिका में तटीय इलाकों की सुरक्षा को बढ़ा दिया गया है। बुधवार को जारी एक बयान में, अमेरिकी तटरक्षक बल ने कहा कि उसने अलेउतियन द्वीप समूह में अमचिटका पास के उत्तर में लगभग 124 मील, 200 किमी की दूरी पर तीन जहाजों का पता लगाया। इसके साथ ही बेरिंग सागर और उत्तरी प्रशांत महासागर के बीच एक जलडमरूमध्य अमुक्ता पास के उत्तर में लगभग 84 मील, 135 किमी की दूरी पर एक और जहाज का पता लगाया। अमेरिकी तटरक्षक बल के अनुसार, सभी चार चीनी जहाज “अंतरराष्ट्रीय जल में पारगमन कर रहे थे, लेकिन अभी भी अमेरिकी अनन्य आर्थिक क्षेत्र के अंदर थे, जो अमेरिकी तटरेखा से 200 समुद्री मील तक फैला हुआ है।” अमेरिकी तटरक्षक बल के आर एडमिरल मेगन डीन ने कहा, “चीनी नौसेना की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानदंडों के अनुसार संचालित हुई।” उन्होंने कहा, “हमने यह सुनिश्चित करने के लिए उपस्थिति का सामना उपस्थिति से किया कि अलास्का के आसपास के समुद्री वातावरण में अमेरिकी हितों में कोई व्यवधान न हो।”

अमेरिकी तटरक्षक बल के रेडियो संचार पर प्रतिक्रिया देते हुए, चीनी जहाजों ने कहा कि उनका उद्देश्य “नौवहन संचालन की स्वतंत्रता” था। अमेरिकी तटरक्षक बल ने कहा, “कोस्टगार्ड कटर किमबॉल ने सभी जहाजों की निगरानी तब तक जारी रखी जब तक कि वे अलेउतियन द्वीपों के दक्षिण से उत्तरी प्रशांत महासागर में नहीं चले गए। किमबॉल अमेरिकी जहाजों और क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी अनन्य आर्थिक क्षेत्र में गतिविधियों की निगरानी करना जारी रखता है।”

पिछले अगस्त में, अलास्का के पास कई चीनी और रूसी सैन्य जहाजों द्वारा संयुक्त नौसैनिक गश्ती करने के बाद अमेरिका ने एक टोही हवाई जहाज के अलावा चार नौसेना के युद्धपोत भेजे थे। उस समय चीनी युद्धपोतों के खिलाफ तैनात की गई अमेरिकी नौसेना की फ्लीट को यूक्रेन में रूस के चल रहे युद्ध के साथ-साथ ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच राजनीतिक तनाव के बीच “अत्यधिक उत्तेजक” युद्धाभ्यास के रूप में वर्णित किया गया था! 

क्या रूस वाले मामले में अमेरिका से झुकेगा भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रूस वाले मामले में अमेरिका से भारत झुकेगा या नहीं! पीएम मोदी की रूस यात्रा के बाद से ही अमेरिका बौखलाया हुआ है। अमेरिका ने भारतीय अधिकारी से मिलकर पहले कोशिश की कि पीएम मोदी की मास्‍को यात्रा को स्‍थगित किया जाए। भारत ने अमेरिका की इस मांग को खारिज कर दिया और पीएम मोदी ने यूक्रेन युद्ध के बाद मास्‍को की यात्रा की। इस यात्रा के बाद अमेरिका अब धमकाने में जुट गया है। भारत में अमेरिका के राजदूत ने कहा कि ‘कोई भी युद्ध अब दूर नहीं है’ और संघर्ष के दौरान रणनीतिक स्‍वायत्‍ता जैसी कोई चीज नहीं होती है। अमेरिकी राजदूत की इस धमकाने वाली भाषा के बाद अब विश्‍लेषकों ने करारा जवाब दिया है और कहा कि अमेरिका भारत के खिलाफ ठीक वही भाषा बोल रहा है जो 1950 के दशक में सोवियत संघ से नजदीकी रखने पर अमेरिका चर्चिल के शब्‍दों में धमकाता था।अमेरिका में पाकिस्‍तान के पूर्व राजदूत और विश्‍लेषक हुसैन हक्‍कानी एरिक गार्सेटी के बयान पर कहते हैं कि यह कुछ उसी तरह से लग रहा है जैसे जॉन फोस्‍टर डुलेस (तत्‍कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री) चर्चिल का भारतीयों को लेकर दिए बयान का हवाला देकर सोवियत जमाने में अमेरिका का साथ देने के लिए कहते थे। जॉन फोस्‍टर चाहते थे कि सोवियत संघ के खिलाफ भारत अमेरिका का पूरा साथ दे। चर्चिल कहते थे, ‘मैं आग और फायर ब्रिगेड के बीच निष्‍पक्ष रहने से पूरी तरह से इंकार करता हूं।’ हक्‍कानी ने कहा कि यह अमेरिकी बयान उस समय भी कारगर नहीं हुआ था और अब आगे भी इसके कारगर होने की कोई संभावना नहीं है।

बता दें कि गार्सेटी ने इस बात पर जोर दिया कि देशों को न सिर्फ शांति के लिए खड़ा होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम भी उठाने चाहिए कि जो लोग शांतिपूर्ण तरीके से काम नहीं करते, उनकी युद्ध मशीनें “बे रोकटोक जारी नहीं रहें।’ अमेरिकी राजदूत ने कहा, ‘और यही बात अमेरिका और भारत दोनों को मिलकर जानने की जरूरत है।’ उन्होंने दिल्ली और वाशिंगटन के बीच एक मजबूत साझेदारी की भी वकालत की। उनकी यह टिप्पणी यूक्रेन-रूस और इजराइल-गाजा सहित विश्व में चल रहे अनेक संघर्षों की पृष्ठभूमि में आई है।

अमेरिकी राजदूत ने कहा कि आपात स्थिति में, चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो या मानव-जनित युद्ध हो, ‘अमेरिका और भारत एशिया और दुनिया के अन्य भागों में आने वाली समस्याओं के खिलाफ एक शक्तिशाली अवरोधक साबित होंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हम सभी जानते हैं कि हम दुनिया में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, अब कोई युद्ध किसी से दूर नहीं है। हमें सिर्फ शांति के लिए खड़े नहीं होना चाहिए बल्कि हमें यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए कि जो लोग शांतिपूर्ण नियमों का पालन नहीं करते, उनकी युद्ध मशीनें बेरोकटोक जारी न रह सकें। यह बात अमेरिका और भारत दोनों को जाननी चाहिए।’बता दे कि 81 वर्षीय अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की यह हालिया गलती कुछ घंटों के अंतराल पर हुई, जब वे नाटो शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहे थे। ऐसे में उनसे फिर से चुनाव अभियान से हटने की मांग की जा रही है। नवंबर में होने वाले चुनावों में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप का सामना करने से पहले डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बाइडन को शासन करने की अपनी मानसिक क्षमता पर सवालों का सामना करना पड़ा है। 

वाल्टर ई. वाशिंगटन कन्वेंशन सेंटर को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा: “अब मैं यूक्रेन के राष्ट्रपति को सौंपना चाहता हूं, जिनमें दृढ़ संकल्प के साथ-साथ उतना ही साहस भी है। देवियो और सज्जनो, राष्ट्रपति पुतिन।” बाइडन ने मंच पर जेलेंस्की का अभिवादन करते हुए तुरंत खुद को सही किया, जो उनके पीछे खड़े थे। बाइडन ने आगे कहा, “राष्ट्रपति पुतिन को हराने जा रहा हूं, राष्ट्रपति जेलेंस्की। मैं पुतिन को हराने पर बहुत ध्यान केंद्रित कर रहा हूं।”

शाम को एक अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, बाइडन ने अपने उप राष्ट्रपति हैरिस को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ट्रंप के साथ मिला दिया। यह पूछे जाने पर कि उन्हें उनकी सेकेंड इन कमांड (उपराष्ट्रपति हैरिस) को लेकर क्या चिंताएं होंती अगर वह उनकी जगह चुनाव मैदान में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ चुनाव लड़तीं। उन्होंने भ्रमित करते हुए कहा: “देखिए, मैं उपराष्ट्रपति ट्रंप को उपराष्ट्रपति के रूप में नहीं चुनता… क्या मुझे लगता है कि वह राष्ट्रपति बनने के योग्य नहीं हैं… तो चलिए यहीं से शुरू करते हैं।”

जब UN की बैठक में शामिल हुआ भारत!

हाल ही में भारत UN की बैठक में शामिल हो गया है! दोहा में अफगानिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र के तीसरे सम्मेलन में भारत समेत 25 देशों ने शिरकत की। एक जुलाई को खत्म हुए इस दो दिवसीय सम्मेलन में पहली बार तालिबान के अधिकारी भी शामिल हुए। तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से काबुल में अपनी हुकूमत की मान्यता चाहता है। लेकिन महिलाओं की शिक्षा और नौकरी पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने को तैयार नहीं है। मई 2023 और फरवरी 2024 में हुई पिछली बैठकों में तालिबान शामिल नहीं हुआ था। इस सम्मेलन में अफगान महिलाओं को शामिल नहीं किए जाने पर मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आलोचना की है। भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान डिवीजन के संयुक्त सचिव जेपी सिंह ने किया। भारत, तालिबान के साथ बेहद एहतियात से आगे बढ़ रहा है। भारत, अफगानिस्तान में मानवीय सहायता पहुंचाने और अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए तालिबान के साथ मिलकर काम कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि सभी पक्षों को एक-दूसरे पर भरोसा बनाने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बातचीत ईमानदारी और सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और विभिन्न मानवाधिकार संधियों के सिद्धांत जिनका अफगानिस्तान एक पक्षकार है।लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहता जिससे लगे कि वह काबुल में तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत सरकार अफगानिस्तान की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की बातचीत के पिछले दौरों में भी शामिल हुई थी।

भारत का मानना है कि अफगानिस्तान से सटे देश होने के नाते, इसमें उसके जायज आर्थिक और सुरक्षा हित शामिल हैं। भारत ने अफगानिस्तान में 3 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। भारत इस समय पूरे देश के सभी 34 प्रांतों में पानी, संपर्क, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 490 परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इस बैठक का उद्देश्य तालिबान को मान्यता दिलाना नहीं था, बल्कि अफगान लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के तरीके तलाशना था। संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों ने इस बातचीत के जरिए तालिबान को यह समझाने की कोशिश की गई कि मानवाधिकार और नागरिक अधिकार काबुल शासन के लिए कोई आंतरिक मामला नहीं हो सकते। अफगानिस्तान ने अतीत में ऐसे मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तालिबान जोर देकर कहता रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय महिलाओं और बच्चों के साथ काबुल के व्यवहार से परे देखे। वो राजनीतिक और प्रगतिशील संबंध बनाने के उनके प्रयासों का जवाब दे।

राजनीतिक मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र अंडर सेकेट्री जनरल रोजमेरी डिकारलो ने बैठक के बाद कहा कि मानवाधिकार, खासकर अफगान महिलाओं और लड़कियों के अधिकार, और समाज के सभी वर्गों को शामिल करना, आगे भी सभी चर्चाओं का अभिन्न अंग रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सभी पक्षों को एक-दूसरे पर भरोसा बनाने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बातचीत ईमानदारी और सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और विभिन्न मानवाधिकार संधियों के सिद्धांत जिनका अफगानिस्तान एक पक्षकार है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, तालिबान ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के उस आह्वान को सुना जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक जीवन के सभी पहलुओं में महिलाओं और नागरिक समाज को शामिल किया जाए, भारत, अफगानिस्तान में मानवीय सहायता पहुंचाने और अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए तालिबान के साथ मिलकर काम कर रहा है। लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहता जिससे लगे कि वह काबुल में तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत सरकार अफगानिस्तान की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की बातचीत के पिछले दौरों में भी शामिल हुई थी।भले ही वे दोहा वार्ता में उनकी भागीदारी की अनुमति न दें। बता दें कि भारत इस समय पूरे देश के सभी 34 प्रांतों में पानी, संपर्क, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 490 परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इस बैठक का उद्देश्य तालिबान को मान्यता दिलाना नहीं था, बल्कि अफगान लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के तरीके तलाशना था। संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों ने इस बातचीत के जरिए तालिबान को यह समझाने की कोशिश की गई कि मानवाधिकार और नागरिक अधिकार काबुल शासन के लिए कोई आंतरिक मामला नहीं हो सकते। तालिबान के मुताबिक, बैठक में एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस बात पर सहमति बनी कि सभी देश अफगानिस्तान का समर्थन करना चाहते हैं। बैंकिंग और आर्थिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबंधों को हटाने का भी वादा किया गया।

जब एक-एक करके खुला ढोंगी बाबाओं का राज!

आज हम आपको बताएंगे कि जब एक-एक करके खुला ढोंगी बाबाओं का राज! एक तरफ विज्ञान मंगल और चांद के रहस्यों की थाह लेने में जुटा है, लेकिन भोले बाबा सरीखे तमाम नाम इस समाज में अपना ऐसा मायाजाल फैलाए हैं, जिनकी गिरफ्त में आम जनता है। ईश्वर पर प्रवचन तो उनका बाहरी चेहरा है, लेकिन उनका छिपा पक्ष कितना स्याह है, इसका अंदाजा लोगों को कम ही होता है। भोले बाबा के बहाने आइए चलते हैं उन चेहरों को पहचानने की कोशिश, जिनपर संगीन आरोप हैं। कुछ जेल में हैं। शुरुआत करते हैं उन 14 बाबाओं से, जिन्हें साल 2014 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने पाखंडी करार दिया था। आसाराम बापू कुछ साल पहले तक भारत में काफी प्रसिद्धि पाए हुए थे। लोग उन्हें भगवान का अवतार समझ कर पूजते थे। आसाराम का असली नाम आसुमल सिरुमलानी हरपालानी है। भक्त इन्हें श्रद्धा से आसाराम बापू कह कर बुलाते थे। ऐसा अनुमान था कि साल 2013 तक उन्होंने भारत और विदेशों में 400 से अधिक आश्रम और 40 स्कूल स्थापित किए थे। उनके ऊपर कई संगीन आरोप हैं। दिसंबर 2017 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने आसाराम को फर्जी बाबा घोषित किया गया था। फिलहाल आसाराम अवैध अतिक्रमण, बलात्कार और एक गवाह से छेड़छाड़ के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। 2018 में जोधपुर की एक अदालत ने आसाराम को नाबालिग लड़की के बलात्कार का दोषी पाया था। वर्तमान में वह जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया गया था। 25 अगस्त 2017 को एक विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें बलात्कार का दोषी पाया। इसके बाद, 28 अगस्त 2017 को उन्हें 20 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। जनवरी 2019 में, राम रहीम और तीन अन्य लोगों को पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या का दोषी ठहराया गया। इस मामले में, अदालत ने राम रहीम को आजीवन कारावास की सजा दी। एक पूर्व साधु ने डेरा पर 400 साधुओं को नपुंसक बनाने का आरोप लगाया। इस दावे ने गुरमीत सिंह राम रहीम के इर्द-गिर्द पहले से ही चल रहे विवाद को और बढ़ा दिया। सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां को उनकी जीवन शैली के चलते फर्जी करार दिया गया था। उनके पहनावे, मेकअप, भक्तों से गले मिलना और उन्हें फूल देकर आई लव यू कहना जैसी कई चीजें हैं जो जिनसे वह विवादों के केंद्र में आई थीं। साल 2007 में हैदराबाद की मक्का मस्जिद ब्लास्ट और समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट समेत तीन मामलों में शामिल होने के आरोप लगे थे। पुलिस और मैजिस्ट्रेट के सामने इन्होंने गुनाह भी कुबूल किया था। लेकिन बाद में अदालत से बरी हो गए।

बाबा रामपाल जो खुद को कबीर पंथी कहते हैं। हत्या, देशद्रोह और बंधक बनाने और अवैध हथियार सामग्री रखने समेत कई आरोप इनपर थे। दो मामलों में बरी तो हुए लेकिन साल 2018 में हिसार की आदलत ने उन्हें दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाबा 2014 से जेल में बंद हैं।

सच्चिदानंद गिरि का असली नाम सचिन दत्ता है। उत्तर प्रदेश के नोएडा के शराब कारोबारी सचिन दत्ता उर्फ सच्चिदानंद को निरंजनी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाने पर विवाद खड़ा हो गया था। गिरी को प्रयाग में महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई थी। सच्चिदानंद बीयर बार के साथ डिस्कोथेक और रियल एस्टेट कारोबार भी चलाता है।

एक रियल्टी शो के प्रतिभागी रहे और मार पीट कर शो से निकाले गए ओम बाबा का असली नाम विवेकानंद झा है। उनके खिलाफ साइकिल चोरी से लेकर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। ओम बाबा महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करने और अपने विवादित व्यवहार के चलते कई बार विवादों में रहे। कई बार सार्वजनिक स्थलों पर उनसे हाथापाई भी हुई। उत्तर प्रदेश के अलखनाथ ट्रस्ट के मंदिर से संबंधित बृहस्पति गिरि पर आरोप हैं कि जालसाजी करके अलखनाथ ट्रस्ट के मंदिरों पर अधिकार करने की कोशिश की है। इनपर ट्रस्ट के पूर्व महंत धर्म गिरि की हत्या के भी आरोप लगते रहे हैं। इनके अलावा ओम नम: शिवाय बाबा और मलकान गिरि के भी नाम अखाड़ा परिषद द्वारा फर्जी घोषित किए गए बाबाओं की सूची में शामिल था। दक्षिण भारत में एक प्रसिद्ध स्वयंभू धर्मगुरु स्वामी नित्यानंद, बैंगलोर-मैसूर राजमार्ग पर नित्यानंद ध्यानदीपम आश्रम का संचालन करते हैं। 2010 में, नित्यानंद उस वक्त विवादों में घिर गए जब उनके और एक अभिनेत्री से जुड़ी एक कथित सेक्स सीडी सामने आई। केंद्रीय फोरेंसिक लैब ने सीडी की जांच की और उसे प्रामाणिक घोषित किया। हालांकि, नित्यानंद के आश्रम ने एक अमेरिकी लैब की रिपोर्ट पेश की जिसमें दावा किया गया कि सीडी के साथ छेड़छाड़ की गई थी।

स्वामी विकासानंद जिनका असली नाम विकास जोशी है एक स्वयंभू बाबा हैं। बाबा ने जबलपुर में अपना आश्रम खोला और बाबा के तौर पर अपनी जड़ें जमा लीं। 2006 में स्वामी विकासानंद को नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बाबा के आश्रम से अश्लील सीडी भी बरामद की। फास्ट ट्रैक कोर्ट में चले मुकदमे के बाद 2010 में उसे जेल भेज दिया गया।भारतीय मूल के ढोंगी बाबा राजिंदर कालिया पर ब्रिटेन में यौन शोषण का मामला दर्ज हुआ है। खुद को भगवान बताने वाले राजिंदर कालिया पर उसकी पूर्व शिष्याओं ने रेप करने का आरोप लगाया है। आरोप हैं कि उसने कम से कम 1300 बार अपनी शिष्याओं का रेप किया है। ब्रिटेन की हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया है।

क्या वर्तमान की राजनीति हिंदुत्व को कमजोर बताती है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान की राजनीति हिंदुत्व को कमजोर बताती है या नहीं! आज देश में मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग फिर से विभाजनकारी मानसिकता का भौंडा प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन पूरा विपक्ष हिंदुत्व को जहरीला बता रहा है। इन्हें भी पता है कि अगर वो मलाई चाटने के लिए जिन चुनावों में जीतकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचते हैं, वो सिर्फ और सिर्फ इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि यहां हिंदुओं की बड़ बहुमत है। लेकिन इन्हें दुनिया की सारी बुराइयां हिंदुत्व में ही दिखती हैं। फिर चालाकी से ये भी बताते हैं कि वो जिस हिंदुत्व का विरोध करते हैं, वो कुछ और है और असली हिंदुत्व कुछ और है। लेकिन क्या मजाल कि वो यही बात इस्लाम के लिए कह दें। उन्होंने हिंदुत्व के भेद बता रहे समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता से जब पूछ लिया कि क्या वो इस्लाम में भी इसी तरह का भेद बता पाएंगे तो उन्होंने चुप्पी ठान ली। एंकर महोदय बार-बार पूछते रहे, सपा नेता बार-बार टालते रहे। एक बार भी इस्लाम का उच्चारण करने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाए। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और अभी-अभी लोकसभा में विपक्ष के नेता बने राहुल गांधी भी हिंदुत्व और आरएसएस से देश को खतरा बताते हैं। उन्होंने लोकसभा में यहां तक कह दिया कि जो अपने आपको हिंदू कहते हैं वो चौबीसों घंटे हिंसा करते हैं, नफरत में जीते हैं और असत्य बोलते हैं। फिर सत्ता पक्ष ने इस पर सवाल उठाया तो वो तुरंत चालाकी पर उतर आए कि उन्होंने तो बीजेपी वालों को कहा है, सभी हिंदुओं को नहीं। तो क्या बीजेपी से जुड़े नेता, कार्यकर्ता और उनके समर्थक हिंदू हिंसक हैं? सोशल मीडिया एक्स यूजर विजय पटेल ने राहुल की टिप्पणी का जबर्दस्त जवाब दिया है। उन्होंने लिखा, ‘राहुल गांधी इतने बहादुर हैं कि हिंदुत्व के खिलाफ लड़ रहे हैं! इसलिए मैं दुनियाभर के 143 हिंदुत्व आतंकी संगठनों के नाम बता रहा हूं। हमारी धरती और पूरी मानव जाति इन्हीं हिंदुत्व आतंकी संगठनों के कारण खतरे में है। मैं आपको वो सारे नाम दिखाता हूं।’

खैर, ये तो हुई सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की कथित सेक्युलर माइंडसेट की बात। यही सेक्युलर ब्रिगेड जो स्वामी विवेकानंद और बीजेपी के हिंदुत्व में अंतर देखता है, वही किस तरह इस्लाम की खामियों पर पर्दा डालता है, अब इसकी बात हो जाए। हिंदू समाज में जाति एक सच्चाई है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। लेकिन क्या बदलते वक्त के साथ हिंदू समाज ने खुद को नहीं बदला? क्या आज जातियों का जकड़न तेजी से कमजोर नहीं पड़ रहा है? दूसरी तरफ, मुसलमानों का क्या? क्या वहां जातियां नहीं हैं? क्या वहां फिरके नहीं हैं? क्या मुसलमानों की उच्च जातियां पूरे समुदाय पर हावी नहीं है? लेकिन हिंदुओं को जाति के नाम एक-दूसरे से भिड़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने वाले मुसलमानों की एकता की चाहत रखते हैं। इसके पीछे की एक ही मानसिकता है, हिंदू जातियों में बंटकर एकतरफा वोट नहीं करे और मुसलमान का एकमुश्त वोट कथित सेक्युलर पार्टी को मिल जाए, फिर बल्ले-बल्ले। इसके लिए देश-समाज को गर्त में धकेलने को तैयार, ऊपर से खुद के सबसे पवित्र होने की भी धृष्टता। ये है सेक्युलर दलों की हकीकत। मुसलमानों में जाति, वर्ग के आधार पर विभाजन हो गया तब तो वो बोट बैंक नहीं रह जाएगा। फिर धर्मनिपेक्षता की ढोंगपूर्ण राजनीति कैसे चलेगी? इस्लाम के अंदर फिरकापरस्ती किस हद तक है, यह आप इस वीडियो क्लिप से अच्छे से समझ सकते हैं।

आज अनपढ़, पिछड़े मुसलमानों को तो छोड़ दीजिए, विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े सिलेब्रिटी टाइप मुसलमान भी राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान गाने से बचते हैं। भारत माता की जय का नारा नहीं लगाएंगे, वंदे मातरम नहीं कहेंगे। इसके पीछे उनकी हजार दलीलें हैं और उनसे भी ज्यादा तर्क हैं कथित सेक्युलर ब्रिगेड का। हैरत की बात है कि दुनियाभर में हिंसा का पर्याय बन चुके एक कौम भारत में धर्मनिरपेक्षता का झंडा लहरा रहा है। दुनिया को कोई कोना नहीं जहां आतंकवाद से मुसलमान से कनेक्शन नहीं जुड़ा हो। लेकिन भारत की सेक्युलर जमात को खतरा हिंदुत्व से दिखता है। ये वही मोहम्मद अली जिन्ना की मानसिकता है जिसने भारत के दो टुकड़े करवाए थे। ये वही जिन्ना की मानसिकता है जो कहता है कि हिंदू इतने नफरती हो गए हैं कि मुसलमान उनके साथ नहीं रह सकते। आज सात दशक में ही हिंदुओं में जिधर देखो खुद को दूसरों से बड़ा जिन्ना दिखाने को बेताब है- मैं मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी, हिंदुओं और जैसी गालियां दिलवानी है दिलवा लो।

डिबेट क्लिप के वायरल होने पर वो लिखते हैं, ‘क्या यह सच नहीं कि आज कल आए दिन हिंदुओं को गाली देना, उनका अपमान करना, हिंदुओं को बांटने का षडयंत्र करना कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं का प्रिय खेल बन गया है? कहीं डिसमैंटलिंग हिंदुत्व जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, कहीं मेरे धर्म को एड्स, डेंगू, मलेरिया कहकर उसका समूल नाश करने के भाषण दिए जा रहे हैं। इस सबसे मैं दुखी हूं, गुस्से में हूं और फिर उस दिन राहुल गांधी ने संसद में विश्व के सबसे शांतिप्रिय, सबसे सहिष्णु हिन्दू धर्म को हिंसक और नफरत फैलाने वाला बोल दिया। इस सबका गुस्सा और दर्द कुछ शब्दों के रूप में मेरे मुंह से निकल गए।’ वो आगे कहते हैं, ‘और जब यह क्लिप वायरल हुआ तो मुझे एहसास हुआ कि उस दिन मैंने जो कुछ कहा वो अकेले मेरी नहीं करोड़ों हिंदुओं के हृदय की आवाज है। उम्मीद है कि राहुल गांधी सहित जो लोग भी हिंदुओं को हिंसक, एड्स, डेंगू और मलेरिया कहते हैं, सनातन का समूल नाश करने की बातें करते हैं वो करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को समझेंगे और ऐसी घटिया हरकतों की पुनरावृति से बचेंगे।’

यह लेख पढ़कर एक वर्ग मुझमें जहर ढूंढेगा, लेकिन वही वर्ग बताएगा कि कश्मीर के मुसलमानों या देश के अन्य किसी हिस्से के मुसलमानों में अगर आक्रोश है तो क्यों। वो बताएगा कि दरअसल मुसलमानों को लेकर भड़काया जा रहा है, उन्हें हाशिये पर धकेला गया है। वही वर्ग बताएगा कि कैसे मुसलमानों की दिल जीतने की कोशिश करनी चाहिए। सोचिए, जिन मुसलमानों ने कश्मीर से हजारों हिंदुओं का नरसंहार किया, जिन्होंने डायरेक्ट ऐक्शन डे, मोपला नरसंहार समेत तमाम हिंसक कार्रवाईयों में हिंदुओं की लाशें बिछा दीं, उनके दिल जीतने की जरूरत अब भी है, लेकिन बात-बात में कत्लेआम हुआ हिंदू अपनी वेदना भी बयां कर दे तो जहरीला हो जाता है। ये है भारत में धर्मनिरेपक्षता का दंश। धर्मनिरपेक्षता की ऐसी राग किसी भी देश, समाज का मर्सिया है और कुछ नहीं। सोचिए, नूपुर शर्मा के मामले में देश में मुसलमानों का कैसा खौफ था। यह कोई छठी सदी की बात नहीं, बस सालभर पहले का खौफनाक वाकया है जब आठ निर्दोष हिंदुओं की बर्बर हत्या की गई। लेकिन खोंट हिंदुत्व में है। हिंदुत्व में यह खोट बताने वाले जबकि इस्लाम में अमन का पैगाम पढ़ने वाले धर्मनिरपेक्ष हैं। ये वर्तमान की सबसे बड़ी विडंबना है।

आखिर क्या खासियत रखता है भारत का स्वदेशी टैंक जोरावर?

आज हम आपको भारत के स्वदेशी टैंक जोरावर की खासियत बताने जा रहे हैं! चीन के साथ सीमा विवाद के बीच भारत स्वदेशी टैंक विकसित कर रहा है। भारत ने हल्के वजन वाले टैंक जोरावर को निर्माण की दिशा में अहम पड़ाव को पार कर लिया है। स्वदेशी टैंक जोरावर लद्दाख के ऊंचाई वाले क्षेत्रों के काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सेना में जोरावर के शामिल होने से चीन के खिलाफ भारत की स्थिति अधिक मजबूत दिखेगी। पर्वतीय इलाकों में यह टैंक अधिक स्पीड से चल सकता है। रूस और यूक्रेन संघर्ष से सबक सीखते हुए डीआरडीओ ने जोरावर टैंक में घूमने वाले हथियारों के लिए यूएसवी को इंटीग्रेट किया है। लाइट टैंक जोरावर 25 टन वजन का है। यह पहली बार है कि इतने कम समय में एक नया टैंक डिजाइन करके टेस्टिंग के लिए तैयार किया गया है। जोरावर टैंक की खास बात इसका वजन और साथ ही एक टैंक के मूलभूत मापदंडों का कॉम्बिनेशन है। इस टैंक में फायर, ताकत, मोबिलिटी और सुरक्षा है। लाइट टैंक को एक्शन में देखना हम सभी के लिए वाकई एक महत्वपूर्ण दिन है। यह मुझे खुश और गौरवान्वित करता है। यह वाकई एक मिसाल है। दो से ढाई साल की छोटी सी अवधि में, हमने न केवल इस टैंक को डिजाइन किया है, बल्कि इसका पहला प्रोटोटाइप भी बनाया है। जोरावर को सभी टेस्ट के बाद वर्ष 2027 तक भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है।

दो साल के रिकॉर्ड समय में विकसित यह टैंक स्वदेशी निर्माण में भारतीय प्रगति का प्रमाण है। हल्का टैंक जोरावर 25 टन वजनी है और यह पहली बार है कि इतने कम समय में एक नया टैंक डिजाइन किया गया है। अब यह टेस्टिंग के लिए तैयार किया गया है। इनमें से 59 टैंक शुरुआत में सेना को उपलब्ध कराए जाएंगे और यह 295 और बख्तरबंद वाहनों के प्रमुख कार्यक्रम के लिए अग्रणी होगा। भारतीय वायु सेना सी-17 श्रेणी के परिवहन विमान में एक बार में दो टैंकों की आपूर्ति कर सकती है क्योंकि यह टैंक हल्का है और इसे पर्वतीय घाटियों में हाई स्पीड से चलाया जा सकता है। अगले 12-18 महीनों में परीक्षण पूरा होने और शामिल किए जाने के लिए तैयार होने की उम्मीद है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख समीर वी कामथ ने शनिवार को कहा कि स्वदेशी हल्के टैंक जोरावर को सभी परीक्षणों के बाद वर्ष 2027 तक भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है।

डीआरडीओ प्रमुख ने एएनआई को बताया कि लाइट टैंक को एक्शन में देखना हम सभी के लिए वास्तव में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह मुझे खुश और गौरवान्वित करता है। यह वास्तव में एक मिसाल है। दो साल से ढाई साल की छोटी अवधि में, हमने न केवल इस टैंक को डिजाइन किया है, बल्कि पहला प्रोटोटाइप भी बनाया है। अब पहला प्रोटोटाइप अगले छह महीनों में डेवलपमेंट टेस्ट से गुजरेगा। फिर हम इसे अपने यूजर्स को यूजर टेस्टिंग के लिए पेश करने के लिए तैयार होंगे। सभी टेस्ट के बाद जोरावर को वर्ष 2027 तक भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है।

डीआरडीओ टैंक लैब के निदेशक राजेश कुमार ने कहा कि आम तौर पर तीन अलग-अलग प्रकार के टैंक होते हैं। वजन के आधार पर तीन श्रेणियां हैं। भारी टैंक, मध्यम टैंक और हल्के टैंक। हर एक की अपनी भूमिका है। एक सुरक्षा के लिए है, एक आक्रमण के लिए है। ये हल्के टैंक दोनों के लिए मिश्रित भूमिका निभाते हैं। इसलिए यदि आप एक हल्का टैंक देखते हैं, तो दुनिया के कई खिलाड़ी हल्के टैंक बना रहे हैं। पश्चिमी टैंक हैं, रूसी टैंक हैं, चीनी टैंक हैं।

जोरावर टैंक को लेकर लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के कार्यकारी उपाध्यक्ष अरुण रामचंदानी ने कहा कि आज एलएंडटी के लिए बहुत बड़ा दिन है। दो वर्षों के भीतर, हम टैंक को उस स्तर पर ले आए हैं, जहां इसे इंटरनल टेस्ट के लिए और बहुत जल्द यूजर टेस्ट के लिए ले जाया जा सकता है। यह एक बड़ा प्रयास रहा है। डीआरडीओ और एलएंडटी के बीच एक संयुक्त प्रयास है।अब पहला प्रोटोटाइप अगले छह महीनों में डेवलपमेंट टेस्ट से गुजरेगा। फिर हम इसे अपने यूजर्स को यूजर टेस्टिंग के लिए पेश करने के लिए तैयार होंगे। सभी टेस्ट के बाद जोरावर को वर्ष 2027 तक भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि यह इन दोनों टीमों की एक बड़ी उपलब्धि है। दुनिया में कहीं भी इतने कम समय में कोई नया उत्पाद तैनात नहीं किया गया है। यह डीआरडीओ और एलएंडटी दोनों के लिए एक अद्भुत उपलब्धि है।

विपक्ष के तौर पर क्या संदेश देना चाहते हैं अखिलेश यादव?

हाल ही में अखिलेश यादव ने विपक्ष के तौर पर एक संदेश दे दिया है! नई संसद में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सोमवार को जब बतौर सांसद प्रवेश किया तो हर किसी की नजरें उन पर टिक गईं। अखिलेश के एक हाथ में संविधान की पुस्‍तक थी। दूसरे हाथ से उन्‍होंने अयोध्‍या से अपने नए नवेले सांसद अवधेश प्रसाद का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था। सीढ़ियां चढ़कर वह अवधेश प्रसाद को अपने साथ अंदर सदन में ले गए। इस दौरान अयोध्‍या सांसद ने झुककर संसद की सीढ़ियों को प्रणाम किया। अंदर सदन में अखिलेश यादव कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ विपक्ष की पहली पंक्ति में बैठे। खास बात यह रही कि यूपी विधानसभा की तरह यहां भी अवधेश प्रसाद अखिलेश के बगल में ही बैठे नजर आए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अवधेश प्रसाद को इतना महत्‍व देकर अखिलेश प्रसाद ने बड़ा सियासी संदेश दिया है। कहीं न कहीं अयोध्‍या में बीजेपी की हुई किरकिरी को उन्‍होंने भुनाने की कोशिश की है। संसद में प्रवेश के मौके पर अखिलेश अपनी पार्टी के सभी सांसदों के साथ मीडिया के सामने पहुंचे। उनके बगल में पत्‍नी डिंपल यादव और चाचा रामगोपाल यादव भी मौजूद थे। इस बीच अखिलेश ने पीछे खड़े अवधेश प्रसाद का हाथ पकड़ा और उन्‍हें सामने लेकर आए। सांसद अरुण गोविल शपथ ले रहे थे और उनकी ओर से संस्कृत में शपथ लेने के बाद जय श्री राम का नारा लगाया गया। इसके ठीक तुरंत बाद लोकसभा में सपा सांसदों की ओर से जय अवधेश के नारे गूंजने लगे। वहीं अखिलेश यादव ने अवधेश प्रसाद को अयोध्या का राजा तक कह दिया। उन्‍होंने सबसे परिचय कराया तो अवधेश प्रसाद ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। दलित समाज से आने वाले अवधेश प्रसाद को अखिलेश यादव लगातार तवज्‍जो देते रहे हैं। यूपी विधानसभा में भी वह अखिलेश के बगल में बैठते रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले सपा ने पीडीए की जो पॉलिटिक्‍स शुरू की, अवधेश प्रसाद उसका बड़ा चेहरा है। पिछड़ा, दलित और अल्‍पसंख्‍यकों को तरजीह देकर अखिलेश यादव ने 37 सीटों पर कब्‍जा जमा लिया है।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्‍यादा झटका उत्‍तर प्रदेश से ही लगा है। बीजेपी यहां मात्र 33 सीटों पर सिमट गई। जिस अयोध्‍या में ऐतिहासिक राम मंदिर से लेकर अरबों रुपये के विकास कार्य करवाए गए, वहां भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। 9 बार से सपा विधायक चुनते आ रहे अवधेश प्रसाद ने बीजेपी से दो बार सांसद चुनते आ रहे लल्‍लू सिंह को हरा दिया। इस हार की वजह से बीजेपी को देश और विदेश में किरकिरी का सामना करना पड़ा।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश यादव ने अयोध्‍या की जनसभा में गलती से अवधेश प्रसाद को पूर्व विधायक बता दिया था। अवधेश उस समय बीकापुर के सपा विधायक थे तो उन्‍होंने तत्‍काल सपा प्रमुख को उनकी गलती का एहसास दिलाया। बता दें कि संसद सत्र की शुरुआत होते ही लोकसभा में फैजाबाद के सांसद अवधेश प्रसाद पहली पंक्ति में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के साथ बैठे नजर आते हैं। संसद परिसर में सभी जगहों पर अखिलेश यादव के साथ अवधेश प्रसाद नजर आते हैं। संसद सत्र के दौरान जब सांसदों का शपथ ग्रहण चल रहा था उस वक्त यूपी के मेरठ लोकसभा सीट से जीते सांसद अरुण गोविल शपथ ले रहे थे और उनकी ओर से संस्कृत में शपथ लेने के बाद जय श्री राम का नारा लगाया गया। इसके ठीक तुरंत बाद लोकसभा में सपा सांसदों की ओर से जय अवधेश के नारे गूंजने लगे। वहीं अखिलेश यादव ने अवधेश प्रसाद को अयोध्या का राजा तक कह दिया। 

इस पर अखिलेश ने बात संभालते हुए कहा कि आपको पूर्व विधायक इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि आप अयोध्‍या के नए सांसद बनने जा रहे हो। उस समय कौन जानता था कि अखिलेश की भविष्‍यवाणी सच हो जागी।अखिलेश यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो लोग किसी को लाने का दावा कर रहे थे उन्हें अब खुद किसी के सहारे की जरूरत है। उन्होंने कहा हम अयोध्या से प्रेम का पैगाम लाए हैं। हालिया संपन्‍न हुए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीट में से समाजवादी पार्टी ने अपने स्‍थापना काल से अब तक रिकार्ड प्रदर्शन करते हुए सर्वाधिक 37 सीट पर जीत हासिल की। लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए तो अवधेश प्रसाद अयोध्‍या के नए सांसद बन चुके थे।

क्या अयोध्या ने सभी पार्टियों की राजनीति को धराशाही कर दिया है ?

वर्तमान में अयोध्या ने सभी पार्टियों की राजनीति को धराशाही कर दिया है! लोकसभा चुनाव नतीजों को आए हुए एक महीने का वक्त बीत गया है। एनडीए की सरकार बन गई है और इंडिया गठबंधन विपक्ष में है। सरकार गठन के बाद 18 वीं लोकसभा का पहला संसद सत्र भी बीत गया लेकिन एक शब्द जिसकी गूंज अब तक सुनाई पड़ रही है। वह है अयोध्या। लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है और 60 साल बाद ऐसा हुआ की कोई लगातार तीसरी बार सत्ता में वापस लौटा। लेकिन इस जीत में भी अयोध्या की हार ने बीजेपी के सामने कई सवाल खड़े कर दिए। वहीं बीजेपी की यहां हुई हार को विपक्षी दल खासकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अपने तरीके से पेश कर रही है। संसद में राहुल गांधी ने अयोध्या में बीजेपी की हार पर जो कुछ कहा उससे आगे बढ़ते हुए आज यानी शनिवार को गुजरात में उन्होंने कहा कि अयोध्या में बीजेपी को हराकर, इंडिया गठबंधन ने राम मंदिर आंदोलन को हरा दिया है। विपक्ष का नेता बनने के बाद राहुल गांधी पहली बार शनिवार को गुजरात पहुंचे। राहुल गांधी ने यहां कहा कि उनकी पार्टी आगामी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उसी तरह हराएगी, जैसे उसने हालिया लोकसभा चुनाव में अयोध्या में उसे हराया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अहमदाबाद में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की। राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने (भाजपा) हमें धमकाकर और हमारे कार्यालय को नुकसान पहुंचाकर हमें चुनौती दी है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि हम सब मिलकर उनकी सरकार को उसी तरह तोड़ देंगे जैसे उन्होंने हमारे कार्यालय को नुकसान पहुंचाया है। यह लिखकर ले लीजिए कि कांग्रेस गुजरात में चुनाव लड़ेगी और नरेन्द्र मोदी व बीजेपी को गुजरात में हराएगी, जैसा हमने अयोध्या में किया था।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि इंडिया गठबंधन ने अयोध्या में बीजेपी को हराकर राम मंदिर आंदोलन को पराजित कर दिया है जिसे लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू किया था। उन्होंने कहा कि अगले चुनाव में भाजपा का गुजरात में भी यही हश्र होगा। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस गुजरात में बीजेपी को हराएगी क्योंकि मोदी के विजन का गुब्बारा फूट चुका है। संसद में मैंने प्रधानमंत्री से पूछा कि क्या वह मनुष्य हैं, क्योंकि उन्होंने खुद कहा था कि वह नॉन बायोलॉजिकल हैं और उनका भगवान से सीधा संबंध है। अगर आप सीधे भगवान से जुड़े हैं, तो अयोध्या में आप कैसे हार गए?

अभी हाल ही में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की फैजाबाद लोकसभा सीट से बीजेपी की हार को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा था। इस लोकसभा क्षेत्र में अयोध्या शहर भी आता है। राहुल गांधी ने कहा था कि अयोध्या के लोगों को गुस्सा तब आया जब उन्हें पता चला कि राम मंदिर के उद्घाटन के लिए एक भी स्थानीय व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उनके सर्वेक्षकों ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह देते हुए कहा कि वह हार जाएंगे और उनका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा।

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद देश के बड़े सियासी सूबे में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की ताकत बढ़ी है। 80 में से 37 सीटें जीतकर सपा पहले नंबर पर यहां रही। इस जीत के बाद अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से 2027 में होने वाले राज्‍य विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटने की अपील करते हुए कहा कि अयोध्या जिले के फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र से पार्टी नेता अवधेश प्रसाद की जीत से जनता ने नफरत की राजनीति को खत्म कर दिया है। अखिलेश यादव की ओर से खासतौर पर अयोध्या का जिक्र चुनाव नतीजों के बाद किया गया। फैजाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट से सपा के अवधेश प्रसाद ने वहां से 2014 से लगातार दो बार चुनाव जीते भाजपा उम्मीदवार लल्‍लू सिंह को पराजित कर दिया और उन्‍हें तीसरी बार संसद पहुंचने से रोक दिया।

यह तो जीत के बाद की सिर्फ झलक थी। संसद सत्र की शुरुआत होते ही लोकसभा में फैजाबाद के सांसद अवधेश प्रसाद पहली पंक्ति में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के साथ बैठे नजर आते हैं। संसद परिसर में सभी जगहों पर अखिलेश यादव के साथ अवधेश प्रसाद नजर आते हैं। संसद सत्र के दौरान जब सांसदों का शपथ ग्रहण चल रहा था उस वक्त यूपी के मेरठ लोकसभा सीट से जीते सांसद अरुण गोविल शपथ ले रहे थे और उनकी ओर से संस्कृत में शपथ लेने के बाद जय श्री राम का नारा लगाया गया। इसके ठीक तुरंत बाद लोकसभा में सपा सांसदों की ओर से जय अवधेश के नारे गूंजने लगे। वहीं अखिलेश यादव ने अवधेश प्रसाद को अयोध्या का राजा तक कह दिया।

लोकसभा में फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में सपा की जीत का विशेष उल्लेख सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर किया गया। अखिलेश यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो लोग किसी को लाने का दावा कर रहे थे उन्हें अब खुद किसी के सहारे की जरूरत है। उन्होंने कहा हम अयोध्या से प्रेम का पैगाम लाए हैं। हालिया संपन्‍न हुए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीट में से समाजवादी पार्टी ने अपने स्‍थापना काल से अब तक रिकार्ड प्रदर्शन करते हुए सर्वाधिक 37 सीट पर जीत हासिल की। सपा की सहयोगी कांग्रेस को भी छह सीट पर जीत मिली, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 33 और उसके सहयोगी राष्‍ट्रीय लोकदल (रालोद) को दो और अपना दल (एस) को एक सीट पर जीत मिली। एक सीट आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने भी जीती है।

क्या उत्तर प्रदेश में अब अपनी पैठ बैठाने जा रही है कांग्रेस?

कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बैठाने जा रही है! लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इस बार उम्मीद से बढ़कर रहा है। पार्टी को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य यूपी में समाजवादी पार्टी से गठबंधन का पूरा फायदा मिला है। कई दशक बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने सुरक्षित दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने में सफल रही है। पार्टी इस सफलता के बाद, 2027 के विधानसभा चुनाव में दलित समुदाय को अपने पाले में बनाए रखने को लेकर खास रणनीति पर काम कर रही है। बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से सदन में उनके महत्व को उजागर किया है। इसके बाद, कांग्रेस के भीतर कई लोगों का मानना है कि प्रसाद को प्रमुखता देने से दलितों के बीच यह संदेश जाएगा कि इंडिया ब्लॉक समुदाय के सदस्यों को नेतृत्व की भूमिका देने के लिए तैयार है। प्रसाद एक पासी दलित हैं, एक ऐसा समुदाय जो कई सीटों पर निर्णायक संख्या में है, खासकर यूपी के अवध क्षेत्र में। कांग्रेस ने राज्य में दलित समुदाय के लिए एक व्यापक आउटरीच कैंपेन की तैयारी शुरू कर दी है। इस अभियान के तहत दलितों के बीच विशेष सदस्यता अभियान, प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में प्रभावशाली दलित हस्तियों की पहचान करना, साथ ही उनके मुद्दों पर बात करने के लिए संभाग स्तरीय ‘सम्मेलन’ और जिला स्तरीय ‘दलित चौपाल’ आयोजित करना शामिल होगा। हाल ही में लखनऊ में राज्य कांग्रेस मुख्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में राज्य भर के प्रमुख दलित नेताओं के सुझावों को सुनने के बाद 15 दिनों का रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया कि हालांकि कार्यक्रम की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है,हाल के चुनावों में उन्होंने संविधान के नाम पर या राहुल जी की वजह से हमारा समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर दलित हमारा समर्थन करने के लिए एक कदम बढ़ाते हैं, तो अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनसे संपर्क करने के लिए एक और कदम बढ़ाएं। उन्होंने हमारा समर्थन किया। अब उनकी समस्याओं को सुनने और समाधान खोजने की बारी हमारी है। लेकिन पहले चार सम्मेलन गोरखपुर पूर्वी यूपी, सीएम योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र, लखनऊ , वाराणसी पूर्वी यूपी, पीएम नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र और मेरठ पश्चिमी यूपी में आयोजित किए जाने का प्रस्ताव है।

रिपोर्ट में पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह कदम कांग्रेस आलाकमान के निर्देश के बाद उठाया गया है। पार्टी जमीनी स्तर पर अपनी अनुसूचित इकाई को मजबूत करने के लिए संगठन में प्रमुख दलित चेहरों को नई जिम्मेदारियां देने पर भी विचार कर रही है।विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया गया।

यूपी कांग्रेस के अनुसूचित जाति (एससी) विभाग के प्रमुख और यूपी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष आलोक प्रसाद के अनुसार दलित परंपरागत रूप से हमारे समर्थक रहे हैं, लेकिन बीच में कुछ गलतफहमियों के कारण वे समय के साथ हमसे दूर हो गए। हालांकि, हाल के चुनावों में उन्होंने संविधान के नाम पर या राहुल जी की वजह से हमारा समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर दलित हमारा समर्थन करने के लिए एक कदम बढ़ाते हैं, तो अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनसे संपर्क करने के लिए एक और कदम बढ़ाएं। उन्होंने हमारा समर्थन किया। अब उनकी समस्याओं को सुनने और समाधान खोजने की बारी हमारी है।

कई लोग समाजवादी पार्टी (सपा) के फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद को लोकसभा उपाध्यक्ष के रूप में निर्वाचित कराने के विपक्ष के प्रयास को सत्तारूढ़ बीजेपी को रक्षात्मक स्थिति में लाने का एक और प्रयास मानते हैं। खासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से सदन में उनके महत्व को उजागर किया है। इसके बाद, कांग्रेस के भीतर कई लोगों का मानना है कि प्रसाद को प्रमुखता देने से दलितों के बीच यह संदेश जाएगा कि इंडिया ब्लॉक समुदाय के सदस्यों को नेतृत्व की भूमिका देने के लिए तैयार है। कांग्रेस मुख्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में राज्य भर के प्रमुख दलित नेताओं के सुझावों को सुनने के बाद 15 दिनों का रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया कि हालांकि कार्यक्रम की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन पहले चार सम्मेलन गोरखपुर पूर्वी यूपी, सीएम योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र, लखनऊ , वाराणसी पूर्वी यूपी, पीएम नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र और मेरठ पश्चिमी यूपी में आयोजित किए जाने का प्रस्ताव है।प्रसाद एक पासी दलित हैं, एक ऐसा समुदाय जो कई सीटों पर निर्णायक संख्या में है, खासकर यूपी के अवध क्षेत्र में।