Thursday, March 5, 2026
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क्या गैंगस्टर मुख्तार अंसारी को जेल में भी लग रहा है डर?

वर्तमान में गैंगस्टर मुख्तार अंसारी को जेल में भी डर लग रहा है! उत्तर प्रदेश के बांदा जेल में बंद मुख्तार अंसारी की तबीयत बिगड़ने के बाद मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। मंगलवार शाम करीब सवा छह बजे मुख्तार अंसारी को फिर से बांदा जेल में शिफ्ट कर दिया गया है। मेडिकल टीम अब जेल में ही मुख्तार अंसारी की जांच करेगी। मुख्तार अंसारी को जेल में जहर देने का दावा किया जा रहा है। स्लो प्वाइजन दिए जाने की बात परिजन कह रहे हैं। वहीं, मुख्तार अंसारी जेल में जान का खतरा कई बात बता चुका है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और पेशी पर हाजिर होने पर जज के सामने मुख्तार अंसारी अपनी जान का खतरा बताता रहा है। 2017 में योगी सरकार आने के बाद यूपी में माफिया, गुंडे और गैंगस्टरों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू हो गई थी। योगी सरकार माफियों पर बुलडोजर कार्रवाई में तेजी ले आई थी। माफिया मुख्तार अंसारी पर कई मुकदमे दर्ज किए थे। योगी सरकार में खुद पर ताबड़तोड़ कार्रवाई को देखकर बांदा जेल में बद मुख्तार अंसारी असुरक्षित महसूस करने लगा था। इसके उसने फिर 2019 में पंजाब के बिल्डर को बांदा जेल से कॉल करके 10 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद पंजाब पुलिस ने मोहाली में मुकदमा दर्ज किया।

मुख्तार अंसारी पर मुकदमा दर्ज करने के बाद पंजाब पुलिस प्रोडक्शन वारंट लेकर यूपी पहुंची। बांदा कोर्ट से परमिशन लेने के बाद 21 जनवरी 2019 को पंजाब ले गई। इस दौरान पंजाब पुलिस ने न मुख्तार अंसारी की आवाज का नमूना लिया और न ही ये जानने तक की कोशिश की कि मुख्तार ने फोन किया था या नहीं। पंजाब और दिल्ली में मुख्तार अंसारी पर दर्ज मामले में सुनवाई हो रही है। 2017 में मऊ से विधायक चुने गए थे। 15 दिसंबर 2022 को 1996 में गाजीपुर में दर्ज गैंगस्टर मामले में मुख्तार अंसारी को 10 साल की सजा और पांच लाख का जुर्माना लगाया गया था।वहीं, यूपी पुलिस बिना सोचे-समक्षे जाने दिया। यूपी सरकार मुख्तार अंसारी को वापस लागने के लिए फिर जुट गई, लेकिन हर बार पंजाब सरकार अड़ंगा लगा देती थी। उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। कई बार मुख्तार अंसारी को पंजाब सरकार ने अनफिट बताकर यूपी नहीं भेजा। करीब 40 बार यूपी सरकार ने मुख्तार अंसारी को लाने के लिए प्रयास किया था।

मुख्तार अंसारी को वापस यूपी लाने के लिए योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई। हर बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्तार अंसारी एक ही रट लगाए रहता था कि वह यूपी में सुरक्षित नहीं है। उसकी जान को खतरा है। आखिरकार 26 मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को मुख्तार अंसारी को यूपी भेजने का आदेश दिया था। इसके बाद 7 अप्रैल को भारी सुरक्षा इंतजामों के बीच बाहुबली मुख्तार अंसारी को पंजाब के रोपड़ से हरियाणा के रास्ते आगरा, इटावा और औरैया होते हुए बांदा जेल पहुंचाया गया था। मुख्तार अंसारी ने बांदा जेल से पेशी पर लाने के दौरान जान का खतरा बताया था। इसी के कारण उसको वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी की अनुमति मिली।उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली में मुख्तार अंसारी पर दर्ज मामले में सुनवाई हो रही है। 2017 में मऊ से विधायक चुने गए थे। 15 दिसंबर 2022 को 1996 में गाजीपुर में दर्ज गैंगस्टर मामले में मुख्तार अंसारी को 10 साल की सजा और पांच लाख का जुर्माना लगाया गया था।

गाजीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा से बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की 29 नवंबर 2005 में हत्या कर दी गई थी। मैच उद्घाटन के बाद लौटते समय उनकी कार को घेरकर एके-47 से गोलियां बरसाई गई थी। इस हमले में कृष्णनंद राय समेत छह और लोगों की हत्या हुई थी। इस मामले में 29 अप्रैल 2023 को कोर्ट ने 10 साल की जेल की सजा सुनाई थी। 30 अप्रैल 23 को यूपी की एक अन्य कोर्ट ने गैंगस्टर के मामले में 10 साल की सजा सुनाई थी। अवधेश राय हत्याकांड में 5 जून को 2023 को कोर्ट ने मुख्तार अंसारी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। खुद पर ताबड़तोड़ कार्रवाई को देखकर बांदा जेल में बद मुख्तार अंसारी असुरक्षित महसूस करने लगा था। इसके उसने फिर 2019 में पंजाब के बिल्डर को बांदा जेल से कॉल करके 10 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगी और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद पंजाब पुलिस ने मोहाली में मुकदमा दर्ज किया।27 अक्टूबर 2023 को अध्यापक कपिल देव सिंह की हत्या में 10 साल की सजा हुई। 15 दिसंबर 2023 को वाराणसी के एक कारोबारी को जानलेवा धमकी देने के आरोप में पांच साल की सजा सुनाई गई थी। 13 मार्च 2023 को एक अन्य मामले में मुख्तार अंसारी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

क्या दिल्ली की सरकार बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ का होना जरूरी है?

दिल्ली की सरकार बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ का होना अब बहुत जरूरी हो गया है!19 फरवरी को लखनऊ में ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी का मंच सजा था। पीएम नरेंद्र मोदी के अल्फाज थे,’ हर हिंदुस्तानी को गर्व होता है, जब हम सुनते हैं कि यूपी ने ठान लिया है कि एक ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनाएंगे। मैं देश के सभी राज्यों से आग्रह करूंगा, राजनीति अपनी जगह पर छोड़िए, जरा यूपी से सीखिए।’ योगी की नीति और यूपी की प्रगति पर मोदी की मुहर विकास संग सियासी अजेंडे में यहां की अहमियत बताती है। भाजपा इस समय मोदी की अगुआई में सत्ता की हैट्रिक की उम्मीद लिए चुनाव मैदान में है। इसी वक्त योगी की अगुआई वाली उसकी यूपी सरकार ने भी 7 साल पूरे किए हैं। योगी का यह ‘सत्ता’ भाजपा की सियासी बिसात के लिए भी अहम है। साल 2017 में मोदी-शाह ने यूपी सरकार की अगुआई के लिए जब योगी को चुना था तो राजनीतिक विश्लेषक आश्चर्य में थे। संकोच और सवाल पार्टी के भीतर भी थे। दो साल बाद खुद अमित शाह ने इसका जवाब दिया, ‘लोगों ने मुझसे कहा आप उनको इतने बड़े राज्य की कमान क्यों सौंप रहे हैं? लेकिन पीएम मोदी और मैंने उन्हें सीएम बनाने का फैसला किया क्योंकि वह कर्मठ हैं और उन्होंने अपने कम अनुभव को कठोर परिश्रम से कभी बाधा नहीं बनने दिया।’ साल 2022 में योगी सीएम चेहरे के साथ चुनाव में उतरे और दो-तिहाई बहुमत संग सत्ता में वापसी हुई। इसे नेतृत्व और जनता दोनों की अपेक्षाओं पर मुहर माना गया। 7 साल में सरकार के खाते में उपलब्धियां भी हैं, सवाल भी। हालांकि, जनादेश के मोर्चे पर पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक सफलता ही मिली है, जिससे सवालों की धार कमजोर पड़ जाती है।

मोदी-शाह ने इसे भली-भांति समझ लिया था कि यूपी सहित उत्तर भारत की राजनीति में अंगद की तरह पांव जमाने हैं तो जातीय गणित की काट तलाशनी होगी। एक दशक में मोदी ने गरीब केंद्रित योजनाओं का एक ऐसा गुलदस्ता तैयार किया जो सबको भाए। इसमें उज्ज्वला, पीएम आवास, पीएम कृषि सिंचाई योजना, किसान सम्मान निधि सहित कई फ्लैगशिप योजनाओं की शुरुआत यूपी से ही हुई। योजनाओं का यह गुलदस्ता सुहाए, इसके लिए उसकी लक्षित वर्ग तक पहुंच जरूरी थी। मोदी की इस अपेक्षा को योगी ने 7 साल में बखूबी अंजाम दिया। योगी सरकार फैमिली आईडी योजना के तहत हर परिवार की यूनिक आईडी बना रही है। पिछले महीने तक इसमें केंद्र-प्रदेश की योजनाओं के लगभग 7 करोड़ लाभार्थियों की सीडिंग हो चुकी थी। यूपी के कुल वोटरों का यह लगभग 46% है। इसी लाभार्थी वोट बैंक के जरिए भाजपा ने 2019 में यूपी में सपा-बसपा के गठबंधन को बेअसर कर दिया था। 2024 की चुनावी लड़ाई में भी लाभार्थी भाजपा का सबसे प्रमुख हथियार है, जिससे चुनाव के पहले विकसित भारत यात्रा, लाभार्थी संपर्क अभियान जैसे कार्यक्रमों से पैना किया जा चुका है।

राममंदिर सहित हिंदुत्व के कोर अजेंडे को मोदी ने विकास का तिलक लगाकर और ‘समावेशी’ बनाया है। भगवा बाना पहने योगी जब सीएम की कुर्सी पर बैठे तो इसे और विस्तार मिल गया। सात साल में योगी ने इससे जुड़ी हर अपेक्षा को परिणाम में बदला। राममंदिर का फैसला आने से पहले ही अयोध्या में दीपोत्सव के जरिए योगी ने ‘राममय’ परिवेश तैयार करने की कवायद कर दी थी। कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा से जैसे आयोजनों ने आस्था को ‘सहजता’ का रंग दे दिया। काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर, मथुरा में ब्रज तीर्थ विकास परिषद सहित सभी आस्था केंद्रों को विकास की योजनाओं से जोड़कर यूपी में पर्यटन का एक नया मानचित्र उभारा गया, जो इसे शिव, राम, कृष्ण, बुद्ध की धरती की पहचान से जोड़ते हैं।

काशी से अयोध्या तक मोदी की उपस्थिति व श्रद्धावनत तस्वीरों ने ‘हिंदू गौरव’ के स्वर को और मुखर कर दिया है। भाजपा चुनाव मंचों से इसे प्रखर बनाने में लगी है, जिससे आस्था का सियासी ‘प्रसाद’ भी हासिल हो सके। विपक्ष इसे ‘बहुसंख्यक तुष्टीकरण’ व अल्पसंख्यकों की उपेक्षा बता रहा है। जवाब में सरकार आंकड़े रख रही है कि यूपी में अल्पसंख्यकों की आबादी 20% है और लाभार्थीपरक योजनाओं में भागीदारी लगभग 36%।

27 फरवरी, 2017 को मोदी ने मुख्तार अंसारी के गढ़ मऊ में सुभासपा के सिंबल का जिक्र कर कहा, ‘यह छड़ी नहीं कानून का डंडा है, 11 मार्च को इसकी ताकत दिखाई देगी।’ योगी ने सात साल में इस ताकत का जमकर एहसास करवाया। मुख्तार से अतीक तक कई बड़े माफिया जो कभी कानून के शिकंजे में नहीं आए, वे दशकों बाद सजायाफ्ता हुए। बुलडोजर और एनकाउंटर मॉडल ने ऐसी सुर्खियां बटोरीं कि यूपी के बाहर दूसरे राज्यों ने भी इसे अपनाया। काम व कार्रवाई के मॉडल ने योगी को मोदी, शाह के बाद यूपी के बाहर भाजपा का सबसे बड़ा स्टार प्रचारक बना दिया। यूपी से मुलायम सिंह यादव, मायावती भी सीएम रहते प्रचार के लिए दूसरे राज्यों में अक्सर गए, लेकिन वे अपनी पार्टी के मुखिया थे। भाजपा शासित राज्यों के सीएम के तौर पर दूसरे राज्यों में योगी ने मोदी-शाह के बाद सर्वाधिक सभाएं की हैं। लोकसभा चुनाव में भी उनकी कई राज्यों से मांग है। हालांकि, बुलडोजर मॉडल पर ‘चुनिंदा’ होने के आरोप भी विपक्ष से लगे हैं। रोजमर्रा की घटनाओं को रोकना एक बड़ी चुनौती है। चुनाव के ठीक पहले भर्ती परीक्षाओं के पर्चा लीक का मुद्दा भी विपक्ष नीचे तक पहुंचा रहा है। फिलहाल, योगी ‘मिशन रोजगार’ के आंकड़े व पर्चा लीक करने वालों के घरों पर बुलडोजर के जरिए इसका जवाब दे रहे हैं। बुधवार से पक्ष-विपक्ष के शुरू हो रहे चुनाव प्रचार में ये मुद्दे और मुखर नजर आएंगे।

कमलापति त्रिपाठी ने कॉंग्रेस को क्या दी थी सलाह?

एक समय ऐसा था जब कमलापति त्रिपाठी ने कॉंग्रेस को सलाह दी थी! विंध्य क्षेत्र में एक जिला आता है मिर्जापुर। यह जनपद मूल रूप से वाराणसी और प्रयागराज के मध्य में है। मां विंध्यवासिनी की नगरी के यूं तो किस्से बहुत सारे हैं, लेकिन यहां की सियासत भी कम दिलचस्प नहीं है। जब बात लोकसभा चुनाव की आती है, तो मिर्जापुर लोकसभा सीट के चुनावी आंकड़े काफी कुछ बयां कर देते हैं। आजादी के बाद से इस जनपद में खुद के लिए अभेद्य किला बनाने वाली कांग्रेस आज वेंटिलेटर पर है। पिछले 40 वर्षों से कांग्रेस यहां से जीत के इंतजार में है। खैर यह जीत का इंतजार और भी लंबा होने वाला है, क्योंकि इस बार सपा-कांग्रेस गठबधंन के तहत सीट सपा के खाते है।आजादी के बाद हुए पहले चुनाव में कांग्रेस पार्टी के जॉन एन विल्सन चुनाव जीते थे। 1957 में हुए चुनाव में उन्हें पुनः जीत मिली। 1962 में फिर लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस के श्यामधर मिश्रा को जीत मिली। 1967 में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार मिली। 1971 में एक बार फिर कांग्रेस ने वापसी की। कांग्रेस के प्रत्याशी अजीज इमाम ने जीत हासिल किया। 1977 में फिर कांग्रेस के हाथ से सीट चली गई, जिसके बाद 1980 में एक बार फिर कांग्रेस के उम्मीदवार अजीज इमाम को जीत मिली। 1984 में कांग्रेस के उम्मीदवार उमाकांत मिश्रा को आखिरी बार जीत मिली। राम मंदिर को लेकर जब लहर चली, उसके बाद कांग्रेस की वापसी नहीं हुई। जिले में उस लहर का असर था। कुछ चुनावों में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रहीं, लेकिन वापसी नहीं हुई। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने मिर्जापुर को अनदेखा कर दिया। यहां पर मजबूत लोगों को पार्टी की कमान नहीं मिली और न ही मुफीद प्रत्याशी मैदान में उतारे। कांग्रेस के कमजोर होने का फायदा छोटे दल और भाजपा दोनों को मिला।

पूर्वांचल के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने जीवन के अंतिम क्षणों में कांग्रेस के आलाकमान को कहा था कि संगठन के प्रति समर्पित मजबूत नेताओं को पार्टी की कमान दी जाए। संगठन में उनको तवज्जों मिली, लेकिन उनके सलाह पर अमल नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि पहले और दूसरे स्थान पर रहने वाली कांग्रेस अब धीरे-धीरे अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रही है।

इस मुद्दे पर जनपद के कांग्रेसी नेता शीर्ष नेतृत्व पर ठीकरा फोड़ते हुए नजर आए। कांग्रेस पार्टी के पूर्व जिला प्रवक्ता दयाशंकर पांडेय ने बताया कि 1989 के बाद से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने जिले पर ध्यान नहीं दिया। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी कमजोर हुई। प्रियंका गांधी के नेतृत्व वाली प्रदेश कांग्रेस कमेटी में पिछले पांच वर्षों में प्रयोग चल रहा है। मूल वोटरों को बचाने में विफल शीर्ष नेतृत्व नए मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई विशेष फायदा नहीं हुआ।मिर्जापुर जिले में मां विंध्यवासिनी मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पहले कंतित में इस्माइल शाह चिश्ती की मजार है। मजार के आस-पास मुस्लिम लोग रहते हैं। मुस्लिम परिवार तीन पीढ़ियों से चुनरी व चौका बनाते हुए आ रहे हैं। चुनरी व चौका (चौकोर नुमा रुमाल कपड़ा) बनाने का काम सबसे पहले रहीम ने शुरू किया था, जिसके बाद कई परिवार के लोग चुनरी में चौका बनाकर जीवकोपार्जन कर रहे हैं।

मुस्लिम परिवार द्वारा बनाए जाने वाले चुनरी व चौका को मां विंध्यवासिनी धाम के साथ-साथ अष्टभुजा व कालीखोह में भक्त चढ़ाते है। चुनरी व चौका के साथ शादी में प्रयोग किए जाने वाले पिछौडी को भी बनाते हैं। पूरा परिवार शिद्दत के साथ मां की चुनरी को तैयार करता है, जहां मां के प्रति अपनी आस्था को भी प्रकट करता है।उसके बाद कांग्रेस की वापसी नहीं हुई। जिले में उस लहर का असर था। कुछ चुनावों में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रहीं, लेकिन वापसी नहीं हुई। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने मिर्जापुर को अनदेखा कर दिया। यहां पर मजबूत लोगों को पार्टी की कमान नहीं मिली और न ही मुफीद प्रत्याशी मैदान में उतारे। कांग्रेस के कमजोर होने का फायदा छोटे दल और भाजपा दोनों को मिला।मुस्लिम परिवार के द्वारा वाहन खड़ा करने के लिए स्टैंड की भी व्यवस्था की जाती है। चुनरी तैयार करने वाली शबनम ने बताया कि कुछ महीने पहले से हम लोग चुनरी बनाने काम में जुट जाते है। वर्षों से इसे बनाने का काम करते आ रहे है। पुरुष चुनरी की सिलाई करते है और महिलाएं व बच्चे गोटा व सितारा आदि लगाती है।

सीएम केजरीवाल की गिरफ्तारी पर क्या बोल रहे हैं यूरोपीय देश?

वर्तमान में सीएम केजरीवाल की गिरफ्तारी पर यूरोपीय देश भी अपना मुंह खोल रहे हैं! दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को बीते गुरुवार को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। जिसको लेकर देश ही नहीं विदेश से भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। आज अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि केजरीवाल की गिरफ्तारी पर हमारी करीबी नजर है। उन्होंने कहा कि हम ‘निष्पक्ष और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया’ की उम्मीद करते हैं। इससे पहले जर्मनी ने भी अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर कहा कि निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मेरिका हो या जर्मनी ये देश हमें निष्पक्ष जांच का पाठ पढ़ा रहे हैं लेकिन हमें कुछ सिखाने से पहले खुद के देश में फैले भ्रष्टाचार और आतंकवाद की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं करते हैं। इस साल की शुरुआत में ही ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने साल 2023 में 180 देशों के करप्शन की रिपोर्ट जारी की थी। जिसके अनुसार अमेरिका 24वें रैंक पर है। वहीं साल 2022 में भी रिपोर्ट में अमेरिका की यही रैंक थी। ऐसे में साल भर में तमाम कोशिशों के बाद भी देश में भ्रष्टाचार का लेवल जरा सा भी कम नहीं हुआ है। ऐसे में उन्हें हमें भ्रष्टाचार पर सलाह देने से पहले अपने देश के करप्शन को कम करने के बारे में सोचना चाहिए।

अमेरिका से पहले जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने जब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर टिप्पणी की तो भारत ने इसका विरोध जताया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि हम ऐसी टिप्पणियों को हमारी न्यायिक प्रक्रिया में दखल और हमारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने के रूप में देखते हैं। बता दें कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ही पहला मामला नहीं है जब इन देशों ने भारत पर टिप्पणी की हों। इससे पहले भी CAA और असहिष्णुता के मामले पर ये देश भारत पर टिप्पणी कर चुके हैं।

भारत के मामलों पर जब भी इन देशों से कोई प्रतिक्रिया आई हैं तो उसका भारत ने बखूबी जवाब दिया है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से पहले अमेरिका ने CAA पर भी टिप्पणी की थी। जिसमें अमेरिका ने सीएए लागू करने को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी की इस आपत्ति पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने गलत और बेतुकी बताई। भारत ने अमेरिका को जवाब देते हुए कहा कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, ऐसे में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार पर चिंता का कोई आधार नहीं है। बता दें कि ये CAA से पहले साल 2019 में अमेरिका के अधिकारी ने कहा था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में धार्मिक भेदभाव भयानक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता ने केजरीवाल मामले में रॉयटर्स के पूछे गए सवाल के जवाब में कहा, ‘हम मुख्‍यमंत्री केजरीवाल के लिए निष्‍पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध कानूनी प्रक्रिया के लिए प्रोत्‍साहित करते हैं।’ इससे पहले सीएए को लेकर भी अमेरिका ने भी भारत को ज्ञान दिया था और कहा था कि इस मामले में हमारी करीबी नजर है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमेरिका ने हाल के दिनों में ऐसे कई बयान दिए हैं जो भारत को असहज कर रहे हैं। वह भी तब जब भारत और अमेरिका के बीच रिश्‍ते नई ऊंचाई पर पहुंच गए हैं।

चीन के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत और अमेरिका हिंद प्रशांत क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं और क्‍वॉड के सदस्‍य देश हैं। इससे पहले पिछले दिनों अमेरिका के भारत में राजदूत ने कहा था कि भारत और अमेरिका के बीच रिश्‍ते चाहे कितने भी मजबूत क्‍यों न हो, हम ऐसे मुद्दे पर अपनी बात रखते रहेंगे। बता दें कि भारत ने शनिवार को यहां जर्मन दूतावास के उप प्रमुख को तलब किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर जर्मनी के विदेश मंत्रालय की टिप्पणी के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि जर्मन दूत जॉर्ज एनजवीलर को विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने तलब किया और बताया कि केजरीवाल की गिरफ्तारी पर जर्मन विदेश मंत्रालय की टिप्पणी भारत की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है। मंत्रालय ने कहा कि कोई भी ‘पूर्वाग्रह वाली पूर्वधारणा’ बिल्कुल अवांछित है। जर्मनी के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने केजरीवाल की गिरफ्तारी का संज्ञान लिया था। जर्मन अधिकारी ने कहा था, ‘हमारा मानना है और उम्मीद करते हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े मानक और मूलभूत लोकतांत्रिक सिद्धांत भी इस मामले में लागू होंगे।’

क्या भारत के लिए जरूरी धुरी है म्यांमार?

म्यांमार वर्तमान में भारत के लिए जरूरी धुरी बन गया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों भूटान का दौरा किया। इसके साथ ही केंद्र का फोकस अपने अन्य पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान पर भी रहा। इन पड़ोसी राष्ट्रों में म्यांमार का भी नाम बेहद अहम है। भारत और म्यांमार के संबंध सदियों पुराने हैं, इसमें बौद्ध धर्म एक मजबूत डोर है। वहां के समाज और संस्कृति पर बौद्ध धर्म की गहरी छाप साफ नजर आता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच 70-80 के दशक में संबंध खास अच्छे नहीं थे। 90 के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गर्माहट आई। आज भी भारत के लिए म्यांमार आर्थिक, सैन्य और सुरक्षा कारणों से बेहद अहम है। खास तौर पर इसलिए जब चीन की निगाहें लगातार म्यांमार पर टिकी हैं। चीन का म्यांमार में बढ़ता दखल भी भारत के लिए टेंशन की वजह है। ऐसे में जरूरी है कि केंद्र चीन से मुकाबले के लिए म्यांमार के साथ रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करे। भारत का म्यांमार के साथ 1643 किलोमीटर का बॉर्डर है, जो हमारे चार पूर्वोत्तर राज्यों अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से साझा होती है। एक हिस्सा समुद्र से भी छूकर गुजरता है। नॉर्थ ईस्ट में अशांति और उपद्रव को खत्म करने के लिहाज से म्यामांर अहम है। नॉर्थ ईस्ट के कई बड़े उग्रवादी संगठन म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल अपने हिंसक वारदातों की तैयारी के लिए करते रहे हैं। भारत ने इन देश विरोधी तत्वों से निपटने के लिए म्यांमार सेना से सहयोग मांगा। हालांकि, म्यांमार सेना, जो खुद घरेलू जातीय विद्रोहों का मुकाबला कर रही, क्या ये दावा कर सकती है कि वो इन संगठनों के खिलाफ किसी तरह का एक्शन लेने में सक्षम है। म्यांमार सीमा पर आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने पूरी तरह से बाड़ेबंदी का फैसला लिया। सरकार भारत-म्यांमार सीमा के 1,643 किलोमीटर में से अतिरिक्त 300 किलोमीटर के लिए स्मार्ट बाड़ लगाने की प्लानिंग की।

रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार में चीन के बढ़ते दखल और पड़ोसी देश में बदले हालात को देखते हुए मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों पर निरंतर ध्यान दिया। इन राज्यों का आर्थिक विकास उसके एजेंडे में सबसे ऊपर रहा है। यहां के लोगों तक पहुंच के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर अहम रोल निभाता रहा है। हालांकि, भौगोलिक बाधाओं को दूर करने के लिए, बांग्लादेश के माध्यम से ट्रांजिट लिंक स्थापित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा। म्यांमार के साथ कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में इन राज्यों को दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों से जोड़ने की रणनीति भारत का उद्देश्य रहा है। भारत ने पूर्वोत्तर राज्यों के विकास में जापानी सहयोग का स्वागत किया। म्यांमार के साथ प्रगाढ़ रिश्तों से पूर्वोत्तर क्षेत्र की स्थिरता और समृद्धि काफी हद तक जुड़ी हुई है।

म्यांमार में चीन की एंट्री भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। वह म्यांमार को अपने अहम सहयोगी की तरह मान रहा है। उसने इसके माध्यम से एक आर्थिक गलियारा बनाया है, जिसमें गैस और तेल पाइपलाइन हैं। ये चीन के युन्नान प्रांत को बंगाल की खाड़ी से जोड़ती है। चीनी निर्मित क्युकफ्यू के जरिए, पश्चिम एशिया से तेल पहले से ही युन्नान को पंप किया जा रहा। म्यांमार में थिट पोके तांग नौसेना बेस पर चीनी पनडुब्बियां देखी गई हैं। यही नहीं चीन इस देश में अपनी उपस्थिति का विस्तार करना जारी रख सकता है। चीन म्यांमार का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। वहां आने वाले कुल सामान यानी आयात में सबसे बड़ा हिस्सा चीन का है। म्यांमार से बाहर जाने वाले सामान यानी निर्यात में सर्वाधिक हिस्सा चीन पहुंचता है। चीन से मशीनरी, टेलीकम्युनिकेशन, गाड़ियां और धातु से बने सामान म्यांमार आते हैं। चीन बर्मा से केले, चावल, पेट्रोलियम गैस, रबड़ और टिन जैसी दुर्लभ चीजों का आयात करता है।

उधर, म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाना भारत के हित में नहीं है, लेकिन स्थिरता के लिए ये जरूरी है। भारत को म्यांमार में अधिक रुचि लेने और उससे अधिक निकटता से जुड़ने की जरूरत है। भारत के म्यांमार के साथ बढ़ते जुड़ाव का एक और मजबूत कारण चीन है। भारत हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है। म्यांमार में तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं। बढ़ती आबादी और तेज आर्थिक विकास दर की वजह से चीन की ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। अगर चीन और म्यांमार के बीच भविष्य में सैन्य सहयोग बढ़ा तो भारत के लिए दिक्कत हो जाएगी। भारत को अन्य देशों के साथ सिर्फ मैत्री के संबंध ही नहीं अब मिलिट्री टू मिलिट्री रिश्ते भी कायम करने चाहिए। भारत म्यांमार की अत्यधिक विविध आबादी को एक साथ जोड़ने के लिए एक मॉडल हो सकता है। म्यांमार वास्तव में चाहता है कि भारत एक बड़ी भूमिका निभाए। म्यांमार में एक विशेष दूत की नियुक्ति भी एक उपयोगी पहल हो सकती है। आसियान के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पास विशेष दूत हैं।

म्यांमार आसियान का अहम हिस्सा है। आसियान में एशिया के तेजी से बढ़ते कुछ अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। साउथ ईस्ट एशिया के साथ संबंध के लिहाज से भारत के लिए म्यांमार अहम सहयोगी हो सकता है। साउथ ईस्ट एशिया को भारत महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी के तौर पर देखता है। घरेलू व्यापार के लिहाज से भी म्यांमार अहम है कई प्रोजेक्ट से सीधे संपर्क बनेगा। यह नॉर्थ ईस्ट तक समुद्र के रास्ते पहुंचने के लिए भारत की महत्वाकांक्षी योजना है। पड़ोसी देश चीन की तरफ से एक के बाद एक भारत के लिए चुनौती पेश की जाती रही है। चीन ने म्यामांर में बंगाल की खाड़ी पर बंदरगाह निर्माण के लिए बड़ा निवेश का फैसला लिया। इससे पहले ऐसे ही प्रॉजेक्ट श्रीलंका और पाकिस्तान में भी चीन ने शुरू किए थे। चीन के ऐसे मंसूबों को नाकामयाब बनाने के लिए म्यांमार से भारत को अपनी नजदीकी को बढ़ाना ही होगा।

लोकसभा चुनाव 2024 में कैसे जीत हासिल करेगी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी कैसे जीत हासिल करेगी! बीजेपी ने अब तक लोकसभा उम्मीदवारों की छह लिस्ट जारी की है। इसमें 405 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। इनमें बीजेपी ने अपने 89 मौजूदा सांसदों के टिकट काटे हैं। 11 नेता ऐसे हैं, जिन्होंने कुछ महीने पहले ही संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया है क्योंकि उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ाया गया। वे चुनाव जीतने के बाद विधायक हैं और एक सांसद को हरियाणा में सीएम बना दिया गया है। इस तरह बीजेपी ने पिछले चुनाव में जीते हुए अपने 101 सांसदों को इस बार बदल दिया है। कुछ सांसदों की लोकसभा सीट भी बदली गई है। माना जा रहा है कि सांसदों की एंटी इनकंबेंसी से निपटने के लिए बीजेपी ने सांसदों के टिकट काटे हैं। साथ ही कुछ विवादितों नेताओं से भी बीजेपी ने इस बार किनारा किया है और दूसरी पार्टी से आए नेताओं पर काफी प्यार लुटाया है। दूसरे पार्टी से कुछ दिनों पहले और कुछ घंटे पहले ही बीजेपी में आए नेताओं की भी टिकट दिया गया है। बीजेपी ने अब तक 66 महिला उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है। पहली लिस्ट में कुल 195 उम्मीदवारों के नाम थे जिसमें 28 महिलाएं हैं। दूसरी लिस्ट में कुल 75 उम्मीदवारों में से 15 महिलाएं, तीसरी लिस्ट में 9 उम्मीदवारों में से कोई महिला नहीं, चौथी लिस्ट में 15 में से 2 महिलाएं और पांचवीं लिस्ट में 111 उम्मीदवारों में से 20 महिलाएं हैं। छठी लिस्ट में तीन नाम में से एक महिला है। बीजेपी ने बिहार की 17 सीटों में से एक पर भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। बिहार में बीजेपी 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 16 सीटों पर सहयोगी जेडीयू, 5 पर सहयोगी एलजेपी (पासवान) और 1-1 सीट पर जीतन मांझी और उपेद्र कुशवाहा की पार्टी चुनाव लड़ रही है।

बीजेपी ने अब तक जितने उम्मीदवारों का ऐलान किया है, उसमें दिल्ली के सात सांसदों में से छह सांसदों का टिकट काट दिया है। उत्तराखंड में पांच सांसदों में से 2 का टिकट काटा है। राजस्थान में 8 सांसदों का टिकट कटा है, इसमें 3 पहले ही विधायक बन गए थे। असम में 9 सांसदों में से 5 का और गुजरात में 26 सांसदों में से 15 का टिकट काटा है। झारखंड में 11 सांसदों में से 5 का टिकट कटा और त्रिपुरा में दोनों सीटों पर मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं दिया गया है। हरियाणा में भी 3 सांसदों के टिकट कटे हैं, एक सांसद ने पहले ही कांग्रेस जॉइन कर ली और एक को सीएम बना दिया गया। कर्नाटक में 25 सांसदों में से 12 के टिकट कटे हैं। ओडिशा में 4 और बिहार में 3 सांसदों के टिकट काटे गए हैँ। बीजेपी ने कर्नाटक में अपनी मौजूदा सांसद शोभना कारंदलाजे और पश्चिम बंगाल में मौजूदा सांसद देबाश्री चौधरी और दिलीप घोष की सीट बदली है।

बीजेपी की लिस्ट देखकर साफ है कि बीजेपी ने अपने कई विवादित सांसदों के टिकट काटे हैं। हालांकि, लिस्ट में ऐसे नाम भी हैं जो विवादित तो रहे हैं लेकिन वह विपक्ष पर हमलावर रहे हैं और बीजेपी ने उनका टिकट बरकरार है। बीजेपी ने मध्य प्रदेश से प्रज्ञा ठाकुर का, दिल्ली से रमेश बिधूड़ी का टिकट काटा। महात्मा गांधी को लेकर प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर काफी विवाद हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पार्टी की इंटरनल मीटिंग में कह चुके थे कि वे दिल से उन्हें माफ नहीं कर पाएंगे। रमेश बिधूड़ी ने संसद में एक मुस्लिम सांसद पर विवादित बयान दिया था। मैसूर से सांसद प्रताप सिम्हा का टिकट काटा गया है। कुछ महीने पहले जब संसद की सुरक्षा में सेंध लगी थी और लोकसभा की विजिटर्स गैलरी से दो लोग हाउस में कूद गए थे तब यह सामने आया था कि वे प्रताप सिम्हा के नाम से ही पास बनाकर संसद पहुंचे। कर्नाटक से नलिन कुमार कतील का भी टिकट काटा गया है, वह भी अपने कट्टर हिंदूवादी बयानों से विवादों में रहे हैं। कर्नाटक से अनंत कुमार हेगड़े का भी टिकट कटा है। हाल ही में उन्होंने कहा था कि संविधान बदलने के लिए बीजेपी को 400 से ज्यादा सीटें चाहिए।

बीजेपी ने दूसरी पार्टी से कुछ समय पहले ही बीजेपी में आए नेताओं को भी टिकट दिया है। बीएसपी छोड़कर आए रितेश पांडे को यूपी की आंबेडकर नगर से उम्मीदवार बनाया है। झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री मधु कोड़ा की पत्‍नी और कांग्रेस सांसद गीता कोड़ा कुछ दिन पहले ही बीजेपी में शामिल हुई हैं। उन्हें भी चाईबासा से टिकट देने की घोषणा की है। कुछ दिन पहले ही बीआरएस से बीजेपी में आए बी.बी. पाटिल को भी तेलंगाना की जहीराबाद सीट से टिकट दिया है। हरियाणा के हिसार से रणजीत चौटाला को टिकट दिया है। चौटाला अभी हरियाणा सरकार में मंत्री हैं और निर्दलीय विधायक हैं। टिकट के ऐलान से कुछ घंटों पहले ही उन्होंने बीजेपी जॉइन की। कुरक्षेत्र से पूर्व सांसद नवीन जिंदल को टिकट दिया है। वह भी टिकट के ऐलान से आधे घंटे पहले ही कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए। इसी तरह आधे घंटे पहले ही बीजेपी में शामिल हुए वरप्रसाद राव को तिरुपति से उम्मीदवार बाया है। सिरसा से अशोक तंवर को टिकट दिया है। वह पहले कांग्रेस में रहे और फिर आम आदमी पार्टी में। कुछ महीने पहले ही वह बीजेपी में शामिल हुए। झारखंड के दुमका सीट से शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन को टिकट दिया है। वह कुछ ही दिन पहले ही जेएमएम छोड़कर बीजेपी में शामिल हुई थी। बीजेपी ने अपने राज्यसभा सांसदों को भी लोकसभा चुनाव में उतारा है। पीयूष गोयल, अनिल बलूनी, धर्मेंद्र प्रधान, मनसुख मांडविया को भी लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया है।

सोशल मीडिया पर प्रचार प्रसार को कैसे अनुमानित करेगा चुनाव आयोग?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि सोशल मीडिया पर प्रचार प्रसार को चुनाव आयोग कैसे अनुमानित करेगा! एक समय था जब चुनावों के दौरान सड़कों से लेकर गली-मोहल्लों में कार, रिक्शा और ऑटो समेत अन्य गाड़ियों में लाउडस्पीकर लगाकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार अपने-अपने चुनावी चिह्न लगे झंडों के साथ प्रचार करते थे। डिजिटल युग में तेजी से बदलते समय में जहां पारंपरिक तरीके से किए जाने वाले चुनाव प्रचार के तरीकों को थोड़ा कम किया है, वहीं इसकी जगह सोशल मीडिया नाम का प्लैटफॉर्म तेजी से लेता जा रहा है। हर पार्टी और उम्मीदवार अपने-अपने स्तर पर सोशल मीडिया के माध्यम से भी धुआंधार प्रचार करते हैं। सोशल मीडिया के इसी माध्यम से राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले प्रचार और किए जाने वाले खर्चों की निगरानी करना भी चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इससे निपटने के लिए आयोग इस बार बड़े स्तर पर काम कर रहा है। इस बारे में चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने भी कहा था कि हर जिले और राज्य स्तर पर बनाए गए कंट्रोल रूम के माध्यम से सोशल मीडिया समेत अन्य तमाम चुनाव प्रचार करने और आचार संहिता उल्लंघन पर निगरानी रखी जाएगी। यह राज्य के सीईओ की निगरानी में होंगी।राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार सोशल मीडिया के उन तमाम प्लैटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी रीच आम आदमी तक बहुत ही आराम और आसानी से होती है।

उसमें लोगों को समझ में आने वाली और कोशिश की जाती है कि उन्हीं की भाषा में प्रचार की सामग्री तैयार की जाए। इसके लिए इंस्टाग्राम, यू ट्यूब, एक्स, फेसबुक, एमएमएस, वट्सऐप, विशेष प्रचार के लिए बनाए जाने वाले ऐप, टीवी, पहले से रिकॉर्ड संदेश, एआई के जरिए भी प्रचार, स्नैपचैट, ई-मेल, वेबसाइट, टीवी पर आने वाली फिल्म, सीरियल समेत न्यूज या अन्य किसी कार्यक्रम के बीच में दिए जाने वाले चुनावी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया के वह तमाम माध्यम से चुनावी प्रचार किया जाता है।

सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करना भी आदर्श आचार संहिता के दायरे में आता है। अगर कोई राजनीतिक पार्टी और उम्मीदवार सोशल मीडिया के किसी भी माध्यम से चुनाव प्रचार करता है, तो उसे ऐसा करने से पहले अपने इलाके के संबंधित चुनाव अधिकारी से इसे दिखाकर इसकी इजाजत लेनी होती है। चुनाव अधिकारी के संतुष्ट होने के बाद ही राजनीतिक दल या उम्मीदवार सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का चुनाव प्रचार कर सकते हैं।

अगर राजनीतिक पार्टी ऐसा नहीं करती हैं तो उनके खिलाफ आचार संहिता का उल्लंघन करने के आरोप में कार्रवाई की जा सकती है। सोशल मीडिया पर प्रचार करने के लिए जो भी राजनीतिक पार्टी या उम्मीदवार किसी टीम या स्टाफ को हायर करता है तो इसकी जानकारी और खर्चे का ब्यौरा समेत रील बनाने या अन्य प्रचार पर किए जाने वाले खर्चे की जानकारी भी चुनाव अधिकारी को बतानी होती है।

चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया समेत चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन पर निगरानी रखने के लिए देश के तमाम जिलों और स्टेट लेवल पर कंट्रोल रूम बनाए हैं। चुनावी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया के वह तमाम माध्यम से चुनावी प्रचार किया जाता है।इनमें ना केवल सोशल मीडिया के तमाम प्लैटफार्म बल्कि वेब कास्टिंग, टीवी, 1950 और सी-विजिल के अलावा पीजी सेल पर निगरानी करने के अलावा यहां मिलने वाली शिकायतों के निपटारे के लिए भी काम किया जाता है। इस बारे में चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने भी कहा था कि हर जिले और राज्य स्तर पर बनाए गए कंट्रोल रूम के माध्यम से सोशल मीडिया समेत अन्य तमाम चुनाव प्रचार करने और आचार संहिता उल्लंघन पर निगरानी रखी जाएगी। यह राज्य के सीईओ की निगरानी में होंगी।

आयोग का कहना है कि इन कंट्रोल रूम में बैठी आयोग की आईटी एक्सपर्ट टीम राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया पर किए जाने वाले चुनावी प्रचार की निगरानी रख रही है। बता दें कि उम्मीदवार अपने-अपने स्तर पर सोशल मीडिया के माध्यम से भी धुआंधार प्रचार करते हैं। सोशल मीडिया के इसी माध्यम से राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले प्रचार और किए जाने वाले खर्चों की निगरानी करना भी चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इससे निपटने के लिए आयोग इस बार बड़े स्तर पर काम कर रहा है। यह चुनौती से भरा काम है, लेकिन टीम इसे कर रही है।

क्या भारत और फिलीपींस की दोस्ती से चिढ़ रहा है चीन?

वर्तमान में चीन भारत और फिलिपींस की दोस्ती से चढ़ रहा है! भारत हमेशा ‘जियो और जीने दो’ की नीति में विश्वास करता रहा है। हम सिर्फ अपना फायदा नहीं देखते हैं बल्कि दूसरों के हितों का भी सम्मान करते हैं। ऐसे में किसी तीसरे को मिर्ची लगे तो लगे। भारत ने अब इसकी फिक्र करनी भी छोड़ दी है। तभी तो जब फिलीपींस की संप्रुभता की बात आई तो भारत बेधड़क उसके साथ खड़ा हो गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कहा कि फिलीपींस अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के लिए जो भी कदम उठाता है, वो सराहनीय है। इस पर चीन तिलमिला उठा है। उसने भारत को ‘तीसरा पक्ष’ बताते हुए कहा कि हमारे विवादों में किसी को दखल देने का अधिकार नहीं है। दरअसल, मामला दक्षिण चीन सागर एससीएस में चीन-फिलीपींस के बीच बढ़ते तनाव का है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर मंगलवार को फिलीपींस की राजधानी मनीला में थे। वहां उन्होंने अपने समकक्ष एनरिक मानलो के साथ बैठक के बाद फिलीपींस की संप्रभुता को बनाए रखने के प्रयासों का समर्थन किया। इस बैठक से एक दिन पहले फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर में चीन की ‘आक्रामक कार्रवाइयों’ के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के लिए चीनी राजदूत को तलब किया था। चीन दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर अपना दावा करता है। भारतीय विदेश मंत्री के फिलीपींस का समर्थन किए जाने से चीन इसलिए भी तिलमिला उठा क्योंकि पिछले हफ्ते अमेरिका ने भी फिलीपींस के वैध समुद्री अभियानों के खिलाफ चीन की ‘खतरनाक’ कार्रवाइयों की निंदा की थी।

जयशंकर ने नियम आधारित व्यवस्था के सख्त पालन का आह्वान किया और ‘फिलीपींस को उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखने के लिए भारत के समर्थन’ को दोहराया। उन्होंने समुद्र के संविधान के रूप में यूएनसीएलओएस (संयुक्त राष्ट्र समुद्र विधि सम्मेलन), 1982 के महत्व बताते हुए सभी पक्षों से इसका अक्षरशः पालन करने की अपील की। चीन इस पर भी चिढ़ गया जबकि इस बार भारत और फिलीपींस के विदेश मंत्रियें ने जून 2023 में हुई बैठक के बाद दिया बयान नहीं दुहराया। ध्यान रहे कि पिछले कुछ वर्षों से भारत और फिलीपींस संबंधों में गरमाहट आ रही है। दोनों देशों के बीच खासकर रक्षा क्षेत्र में आपसी रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। भारत ने मनीला को सस्ते दरों पर लोन ऑफर किया है। व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग के अलावा दोनों देश स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी पारस्परिक सहयोग कर रहे हैं। वक्त तो फिलीपींस के साथ विवाद में चीन के विस्तारवादी दावों का जोरदार खंडन किया गया था। तब दोनों विदेश मंत्रियों ने चीन से 2016 के कानूनी रूप से बाध्यकारी फैसले का पालन करने की अपील की थी। वह पहला वक्त था जब भारत ने दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर चीन के खिलाफ फिलीपींस का साथ दिया था। यूएनसीएलओएस मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने न केवल बीजिंग की नौ डैश लाइन को बल्कि फिलीपींस के समुद्री क्षेत्र में उसकी गतिविधियों को अवैध बताया था।

जयशंकर ने कहा कि भारत अपने एक्ट ईस्ट पॉलिसी और हिंद प्रशांत क्षेत्र पर विशेष नजरिए के कारण इस इलाके में हरेक गतिविधि पर गहराई से नजर रखता है। उन्होंने कहा, ‘हम आसियान के केंद्रीय महत्व, सदस्य देशों के बीच सामंजस्य और एकता के प्रबल समर्थक हैं। हमें पक्का यकीन है कि इस क्षेत्र की प्रति और समृद्धि नियम आधारित व्यवस्था के तहत ही सुनिश्चित होगी।’ जयशंकर ने अपने फिलीपीनी समकक्ष मनालो को लाल सागर और अरब सागर में भारतीय नौसेना की तैनाती के बारे में भी जानकारी दी और उन्हें बताया कि कैसे समुद्र में सभी तरह के खतरों से निपटने की पूरी तैयारी है।

चीन को इन्हीं बातों से मिर्ची लग गई। उसके विदेश मंत्रालय ने कहा कि समुद्री विवाद संबंधित देशों के बीच के मुद्दे हैं और तीसरे पक्ष को किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियां ने कहा, ‘हम संबंधित पक्षों से आग्रह करते हैं कि वे दक्षिण चीन सागर मुद्दे पर तथ्यों और सच्चाई पर गौर करें और चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों और हितों एवं दक्षिण चीन सागर को शांतिपूर्ण और स्थिर रखने के लिए क्षेत्रीय देशों के प्रयासों का सम्मान करें।’ चीन दक्षिण चीन सागर के अधिकांश हिस्से पर अपना दावा करता है जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के अपने-अपने दावे हैं।

ध्यान रहे कि पिछले कुछ वर्षों से भारत और फिलीपींस संबंधों में गरमाहट आ रही है। दोनों देशों के बीच खासकर रक्षा क्षेत्र में आपसी रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। भारत ने मनीला को सस्ते दरों पर लोन ऑफर किया है। व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग के अलावा दोनों देश स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी पारस्परिक सहयोग कर रहे हैं।

विराट कोहली की धीमी स्ट्राइक रेट के लिए फाफ डु प्लेसिस ने आरसीबी की पिच पर अंक दिए.

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फाफ डु प्लेसिस बने विराट कोहली की ढाल. विराट ने घरेलू मैदान पर कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ 83 रन की पारी खेली. इसके बाद भी उनकी आलोचना हुई. रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के कप्तान डुप्लेसी टैकल करने के लिए मैदान में उतरे.

कोहली की स्ट्राइक रेट को लेकर आलोचना होती रही है. उन्होंने 59 गेंदों पर 83 रन बनाए. 4 चौके और इतने ही छक्के लगाने के बावजूद विराट ने 140.68 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए. वह पूरे 20 ओवर तक क्रीज पर थे. खासकर अंत में कोहली का स्ट्राइक रेट काफी गिर जाता है। कोहली बड़े शॉट नहीं लगा सके. इसीलिए उनकी आलोचना की गई है. डु प्लेसिस ने मैच के बाद आलोचना का जवाब दिया. उन्होंने अपनी घरेलू पिच की ओर इशारा किया. डुप्लेसिस ने कहा, ”मैं पिच से हैरान था. सबसे पहले, मुझे एहसास नहीं हुआ कि पिच पर गुप्त गति है। एक गेंद तेजी से आ रही थी. एक गेंद रोकी गई. नतीजा ये हुआ कि बड़े शॉट खेलना मुश्किल हो गया. विराट की तरह यह बल्लेबाज भी मुश्किल में है. स्पीड कम होने के कारण उन्हें दिक्कत हो रही थी।”

लेकिन उस पिच पर रनों का पीछा करने उतरी कोलकाता ने पावर प्ले में 85 रन बनाए. मैच वहीं ख़त्म हो गया. डुप्लेसी ने इसे भी समझाया. उन्होंने कहा, ”बाद में ओस पड़ने से पिच काफी आसान हो गई. गेंद बल्ले पर अच्छे से लग रही थी. हमारे गेंदबाजों ने जोरदार गेंदबाजी करके उनका काम आसान कर दिया.’ हम योजना के मुताबिक गेंदबाजी नहीं कर सके।’ इसलिए हमें हारना पड़ा।” पूरा मैदान उन्हें देख रहा था. उनके शब्द बार-बार कमेंटेटर्स के मुंह में आ रहे थे. पिछले आईपीएल की सबसे विवादास्पद घटना के पीछे के दो व्यक्ति गौतम गंभीर और विराट कोहली उस समय मैदान पर थे। हालाँकि, गंभीर इस बार अलग खेमे में हैं। वह कोलकाता नाइट राइडर्स के मेंटर हैं। लेकिन इस बार एक और तस्वीर देखने को मिली. इस बार गंभीर-कोहली ने मैच के बाद हाथ मिलाया.

पिछली बार, तत्कालीन लखनऊ सुपर जाइंट्स के मेंटर गंभीर और कोहली मैच के बाद मुसीबत में पड़ गए थे। इसके बाद उन्होंने एक दूसरे से हाथ नहीं मिलाया. इस बार जब दोनों टीमों के क्रिकेटर और सपोर्ट स्टाफ मैच के बाद हाथ मिला रहे हैं तो गंभीर और कोहली भी हाथ मिलाते नजर आ रहे हैं. दोनों बातें भी करते हैं. उस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.

दोनों की मुलाकात एक बार मैच के दौरान हुई थी. आरसीबी की पारी के 16 ओवर के बाद टाइम आउट. ढाई मिनट के ब्रेक के बाद गंभीर और चंद्रकांत पंडित मैदान में उतरे. उन्होंने केकेआर क्रिकेटरों का आखिरी चार ओवर का प्लान बताया. विराट उनके बगल में खड़े होकर पानी पी रहे थे. अचानक दिखता है कि गंभीर उनकी ओर बढ़ रहे हैं. दर्शकों को लगा कि फिर से झगड़ा हो सकता है. तो चिन्नास्वामी की गैलरी से चीखें शुरू हो गईं. गंभीर ने सभी को पीछे छोड़ते हुए मुस्कुराते हुए कोहली को गले लगा लिया. कोहली वापस मुस्कुराये. दोनों के बीच कुछ बातचीत होती है. इसके बाद गंभीर डग आउट की ओर बढ़े. कोहली दोबारा बैटिंग करने उतरे. चिन्नास्वामी की गैलरी भी खामोश हो गई क्योंकि दोनों के बीच कोई परेशानी नहीं हुई।

गंभीर और कोहली का झगड़ा कोई नई बात नहीं है. जब गंभीर केकेआर के कप्तान थे, तब दोनों क्रिकेटर एक मैच में मैदान पर उतरे थे। गंभीर को मैदान पर बहस के बाद डगआउट में एक कुर्सी को लात मारते हुए भी देखा गया था। बाद में पिछले सीज़न में जब गंभीर लखनऊ के मेंटर थे, तब एक मैच के दौरान दोनों के बीच झगड़ा हो गया था। सबसे पहले कोहली का विवाद लखनऊ के क्रिकेटर नवीन उल हक से हुआ था. गंभीर ने उनकी एंट्री की. स्थिति ऐसी थी कि टीम के साथी दोनों को हटाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। हालांकि इस बार ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला. विराट कोहली ने इस बार आईपीएल में लगातार दूसरा अर्धशतक लगाया. कोलकाता के खिलाफ पंजाब किंग्स के बाद. कोहली ने शुक्रवार को चिन्नास्वामी स्टेडियम में 59 गेंदों पर 83 रनों की पारी खेली. साथ ही उन्होंने दो मिसालें कायम कीं. दोनों छह-छक्के लगाने वाले खिलाड़ी थे। कोहली ने एक मामले में महेंद्र सिंह धोनी को पछाड़ दिया.

कोहली आईपीएल के इतिहास में सबसे ज्यादा छक्के लगाने के मामले में पहुंच गए हैं. धोनी के नाम 239 छक्के हैं. शुक्रवार के बाद कोहली के 241 छक्के हो गए. क्रिस गेल के नाम सबसे ज्यादा छह (357) हैं। इसके बाद रोहित शर्मा (261) हैं। कोहली पूर्व साथी एबी डिविलियर्स (251) के बाद दूसरे स्थान पर हैं। उनके बाद धोनी (239) हैं। इनमें गेल और डिविलियर्स अब आईपीएल में नहीं खेलते हैं. हो सकता है कि इस सीजन में कोहली डिविलियर्स को पछाड़कर तीसरे नंबर पर आ जाएं.

इसके अलावा, कोहली ने आरसीबी क्रिकेटर के रूप में सर्वाधिक छक्के लगाने का रिकॉर्ड भी बनाया है। उनके 241 छक्कों ने गेल (239) को पीछे छोड़ दिया। उनके बाद डिविलियर्स (238) हैं। बाकी तो बहुत बाद की बात है. ग्लेन मैक्सवेल के नाम 67 और फाफ डु प्लेसिस के नाम 50 छक्के हैं.

कौन हैं आईपीएल 2024 के सबसे तेज गेंदबाज मयंक यादव?

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लखनऊ सुपर जाइंट्स-पंजाब किंग्स मैच में दिल्ली के युवा तेज गेंदबाज मयंक यादव चर्चा में आ गए हैं. 21 साल के मयंक ने लखनऊ की जीत में 27 रन देकर 3 विकेट का योगदान दिया. हालाँकि, वह अपनी गेंद की गति को लेकर चर्चा में आ गए हैं।

मयंक के नाम अब इस बार आईपीएल में सबसे तेज गेंद फेंकने का रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। शनिवार के मैच में उन्होंने अपनी गति से पंजाब के बल्लेबाजों को शर्मसार कर दिया. उनकी एक गेंद की रफ्तार 155.8 किमी प्रति घंटा थी. जिसने क्रिकेट विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है. पंजाब की पारी के 12वें ओवर की पहली गेंद खेलने के लिए शिखर धवन को बमुश्किल बल्ला उठाने का समय मिला। मयंक की सबसे धीमी गेंद 139 किमी प्रति घंटे की रही.

यह मैनक कौन है? मयंक को 2022 की नीलामी में लखनऊ ने 2 मिलियन टका में खरीदा था। उस बार उन्हें मैच खेलने का मौका नहीं मिला. 2023 में हैमस्ट्रिंग चोट के कारण नहीं खेल सके. उन्होंने शनिवार को अपने क्रिकेट करियर का पहला आईपीएल मैच खेला. दूसरे शब्दों में कहें तो दिल्ली का यह युवा खिलाड़ी डेब्यू मैच में अपने प्रदर्शन से चर्चा में आ गया है. मयंक ने अब तक एक प्रथम श्रेणी मैच खेला है. दिल्ली के लिए घरेलू क्रिकेट में उनके कुल विकेटों की संख्या 51 है. जो कि काफी आम है. तो शनिवार को पंजाब के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन का राज क्या है? मयंक ने कहा, ‘भले ही यह आईपीएल का पहला मैच था, लेकिन मैं कोई दबाव नहीं लेना चाहता था। मैंने गेंद को विकेट पर रखने की कोशिश की. यथासंभव तेज गेंदबाजी करने की कोशिश की. पहले तो मैंने सोचा, मैं गति बढ़ाकर और घटाकर बल्लेबाजों को भ्रमित करने की कोशिश करूंगा। पिच मजबूत गेंदबाजी के लिए अनुकूल थी. तो कप्तान निकोलस पूरन ने कहा, गेंद की गति धीमी करने की जरूरत नहीं है. मैंने इसे ऐसे ही कहने की कोशिश की.

इतने बड़े मंच पर पहला मैच खेलने का कोई दबाव नहीं था? मयंक ने कहा, ”मैंने कई लोगों से सुना है कि पहले मैच में दबाव होता है. पहली गेंद अच्छी जाने के बाद मुझे ज्यादा दबाव महसूस नहीं हुआ।’ पहला विकेट (जॉनी बेयरस्टो) हासिल करने का एहसास बहुत अच्छा है।’ पिछले साल की चोट ने मुझे थोड़ा पीछे धकेल दिया। अन्यथा, वह कम उम्र में अपना आईपीएल डेब्यू कर सकते थे। मैंने अपने लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया है. मैं यही करने की कोशिश कर रहा हूं.

मयंक की गेंद की स्पीड से जहां क्रिकेट विशेषज्ञ हैरान हैं, वहीं पूरन को कोई हैरानी नहीं है. शनिवार को लखनऊ में कप्तानी करने वाले वेस्टइंडीज के बल्लेबाज ने कहा, ‘मयंक नेट्स में भी धीमी गेंदबाजी नहीं कर सकते। वह शायद नहीं जानते कि गेंद को धीमा कैसे किया जाता है! मैंने उनकी गेंद को नेट में खेला. काइल मेयर्स ने पहले गेम से पहले मुझे चेतावनी दी थी। मुझे खुशी है कि मयंक ने आखिरकार अपना आईपीएल डेब्यू कर लिया है।’ उम्मीद है कि अगले दो हफ्तों में मयंक क्रिकेट चर्चा के केंद्र में होंगे.” हालांकि, डेब्यू मैच में सबका ध्यान खींचने वाले मयंक ने कहा, ‘मुझे वास्तव में पहले मैच में ऐसी किसी चीज की उम्मीद नहीं थी।’

पंजाब के कप्तान धवन ने विरोधी टीम के गेंदबाजों की भी तारीफ की. बाएं हाथ के सलामी बल्लेबाज ने कहा, ”मयंक ने अच्छी गेंदबाजी की. उनकी गेंद की गति ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया. मुझे बहुत मजा आया। गेंद की उस गति को लगातार बनाए रखना आसान नहीं है।” उन्होंने कहा, ”मयंक ने न सिर्फ अच्छी गेंदबाजी की. अहम विकेट भी चटकाए. पिछला सीजन उनके लिए अच्छा नहीं गया था. वह पहले तैयारी मैच में घायल हो गये थे. मैंने उनसे केवल एक ही बात कही, अच्छा क्रिकेट खेलने के लिए आपको बुनियादी चीजें सही करने की जरूरत है। मैंने आपसे कहा था कि गेंद की लाइन और लेंथ को लेकर सावधान रहें। मयंक यही करने की कोशिश करता है। मैच में कुछ अतिरिक्त करने की कोशिश नहीं की. उनकी गति का श्रेय उनकी गति को जाता है।” इंग्लैंड के पूर्व तेज गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड भी लखनऊ के युवा गेंदबाज के प्रदर्शन से हैरान थे। आईपीएल कमेंटेटरों में से एक ने कहा, “मयंक की गति स्वाभाविक है। कुछ भी अतिरिक्त प्रयास नहीं करता. लेकिन सबसे अहम चीज है गेंद की लाइन और लेंथ. आमतौर पर इतनी कम उम्र में ऐसा देखने को नहीं मिलता है।” जब उसे विकेट मिलता है तो वह उत्साहित हो जाता है और कुछ अतिरिक्त करने की कोशिश करता है। मयंक में बहुत कुछ नहीं देखा. काफी परिपक्व व्यवहार किया. उनकी गेंदबाजी का खूब लुत्फ उठाया.’ ब्रॉड ने शनिवार को सह-कमेंटेटर स्टीव स्मिथ को चेतावनी दी। उनके मुताबिक, अगर भारतीय टीम में मौका मिलता है तो मयंक साल के अंत में भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज में स्मिथ के लिए परेशानी भी खड़ी करेंगे। मयंक को संभालना एक कठिन चुनौती हो सकती है, खासकर ऑस्ट्रेलिया में पर्थ जैसी तेज़ गति वाली पिच पर।